निवेदन।

*हम अपने पाठकों का हर्षित हृदय से सूचित कर रहे हैं कि शनिवार दिनांक 14 जुलाई, रथयात्रा के दिन हमारे ब्लॉग का तीसरा वर्ष पूर्ण हो रहा है, साथ ही यह ब्लौग अपने 11 शतक भी पूरे कर रहा है, इस अवसर पर आपसे
आपकी पसंद की एक रचना की गुज़ारिश है, रचना किसी भी विषय पर हो सकती है, जिससे हमारा तीसरी वर्ष यादगार वर्ष बन जाएगा* रचना दिनांक 13 जुलाई 2018 सुबह 10 बजे तक हमे इस ब्लौग के संपर्क प्रारूप द्वारा भेजे।
सादर


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रविवार, 18 मार्च 2018

975.....हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस

सादर अभिवादन..
आज वर्ष प्रतिपदा है


हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस
आहा..नया साल आ गया

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा 'वर्ष प्रतिपदा' कहलाती है। 
इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। 
कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, 
पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। 
शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। 
इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है।

मातारानी को नमन करते हुए
आइए देखें पिछले वर्ष में लिखी रचनाएँ....

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बूढ़े पीपल की 
नवपत्रों से ढकी 
इतराती शाखों पर
कूकती कोयल की तान
हृदय केे सोये दर्द को जगा गयी
हवाओं की हँसी से बिखरे 
बेरंग पलाश के मुरझाये फूल,

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न ही हृदय में आह के स्वर,
न ही भाव में पलते प्रवाह के ज्वर,
निस्तेज पड़ी मुख की आभा,
बुझी सी है वो तेज प्रखर.....

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दीप जैसे जले रोशनी के लिए
भाव जैसे मुखर जिंदगी के लिए

पी के स्वयं मैं अंधकार तुझे हमसफ़र
दे रही हूं दुआ उजाले के लिए

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें 
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त, 
कुछ  लजाए - सकुचाए से 
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे 
हुए जज़्बात -
अलमस्त। 

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कभी फ़िकर नहीं करती 
कि कैसी दिखती हूँ मैं
मुझे परवाह है तो इतनी 
कि तुम कैसे देखते हो मुझे
मैं 
रंग और नूर की 
बारात का हिस्सा तो नहीं हूँ 

आगे भी बढ़ूँगी...थमी नहीं हूँ अभी


पहला प्यार...मनोज नौटियाल
विद्यालय से लेकर घर तक ,और घर से विद्यालय आना 
तुम्हे देखने की चाहत का , वही ठौर था वही ठिकाना
मेरे बाल सखाओं की तुम, सबसे पहली भाभी जी थी 
सुलझ नहीं पाया है अब तक , रिश्तों का वो ताना बाना ।।


समझदार हो चला.....अनामिका घटक
कभी समंदर तो कभी दरिया बन के
कभी आग तो कभी शोला बन के

ज़रूरतमंदों ने खूब गले लगाया था मुझे
काम आया हूँ मैं जाने कैसे कैसे उनके
..................
आज काफी बतकही हो गई
इस प्रस्तुति को लेकर
हम लगाएँगे -
हम लगाएँगे  की
रट लगी....आखिर में
विजय श्री उन्हें ही मिली
वे थक-हारकर हमें इज़ाज़त दे दी

यशोदा
सादर..








5 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात दी:),
    बहुत सुंदर ज्ञानवर्द्धक भूमिका। नववर्ष का विस्तृत वर्णन अच्छा लगा। सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी दी। बहुत सुंदर सराहनीय प्रस्तुति आज के संकलन की। मेरी रचना को स्थान देने के लिए अति आभार आपका दी।
    सादर।
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ सभी को।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सर्वप्रथम नववर्ष तथा नवरात्र पर्व की बहुत बहुत बधाइयाँ
    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। सभी रचनाएँ दिल को छूती हुई ।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए तहेदिल से शुक्रिया दी

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति
    नववर्ष तथा नवरात्र पर्व की बहुत बहुत बधाइयाँ

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    नवसंवत्‍सर की सबको हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहतरीन प्रस्तुतिकरण उम्दा लिंक संकलन
    नववर्ष एवं नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं.....

    उत्तर देंहटाएं

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