निवेदन।


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शनिवार, 30 जून 2018

1079... जय हिन्द


अगर ! अगर दैनिक इस्तेमाल में
स्टील के डिज़ाइन वाले बरतन
{थाली डोंगे कटोरे जिनके किनारे मुड़े रहते हैं ,अंदर बाहर उबड़-खाबड़ लकीरे हों}
गृहणी दृष्टि जरा जमा ,चश्मे लगाकर ख्याल रखें... स्वच्छता का


लहसुन प्याज मांसाहार
बिगाड़े व्यवहार
क्या-कैसा रहा होगा
दुर्वासा ऋषि का
संतुलित आहार

सारांश में अच्छे एवंम निरोगी स्वास्थ्य के लिए
 जीवन में नियमियता लाना जरूरी है जैसे की समय से सोना,
 समय से उठना, समय पर नास्ता करना, समय पर भोजन करलेना,
संध्या से पूर्व कुछ हल्का नास्ता चाय कोफ़ी के साथ
और बाद में रात नो बजे तक शाम का खाना खा लेना|



"बचपन से चाहे जितने मांसाहारी हों ,बड़े होने पर सभी शाकाहारी हो ही जाते हैं... हमलोग शाकाहारी बनने का गुण बताते हैं... हम जब रात में फल खाते हैं न..."
"अरे! ओह्ह! रात में फल नहीं लेना चाहिए..."
"व्वो तो पता है... लेकिन वो कय्या है न ,हमलोगों का पेट उस हिसाब से ढ़ला रहता है लयकाईं से खाते...
"बाकी लोग तो शायद जवानी आने के बाद खाना शुरू करते हैं?"

Image result for संतुलित भोजन पर कविता
स्वस्थ जीवन का आधार

ऊर्जा मिलती है बहुत, पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की, मिट जाए हर पीर!!

प्रातः काल पानी पिएं, घूंट-घूंट कर आप!
बस दो-तीन गिलास है, हर औषधि का बाप!!

ठंडा पानी पियो मत, करता क्रूर प्रहार!
करे हाजमे का सदा, ये तो बंटाढार!!

Image result for संतुलित भोजन पर कविता
संतुलित आहार

माँछ मटन आ अंडा चिकेन
पाकल फल दूध आ मक्खन
साँझ-भोर निश्चित सचार
नित लिअ संतुलित आहार

चाट समौसा चाउमिन छोड़ू
साफ-सफाइसँ नाता जोड़ू
बासी गंदा करय बेमार

bhojan
ध्यान रखें

जो गीले पैरों से भोजन करता है वह दीर्घायु होता है।
अन्न का सदैव आदर करें क्योंकि इस प्रकार ग्रहण किया हुआ
 भोजन प्रतिदिन आपके बल और पराक्रम को बढ़ाता है।
 भोजन ग्रहण करने के आधे घंटे बाद जल लेना चाहिए।

><
चलते-चलते
अब बारी है
हम-कदम की.....
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम पच्चीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
'मंजर'
उदाहरण.......
बड़ा भयावह
बड़ा दर्दनाक
होता है,
वह मंजर....
जब होता है कोई
अपना, बहुत अपना..
मानो दिल ही.... मृत्यु शय्या पर !
देखना उसे,
तड़पते हुए,
पल-पल, तिल-तिल..
क्षण-क्षण, जाते हुए
मृत्यु-मुख में....
बड़ा भयावह होता है
वह मंजर......!

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है


आप अपनी रचना शनिवार 30 जून 2018  

शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं 
आगामी सोमवारीय अंक 02 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

धन्यवाद

शुक्रवार, 29 जून 2018

1078.......पेड़ों का मौन रुदन सुनो

पेड़ों का मौन रुदन सुनो
अनसुना करो न तुम साथी
हरियाली खो जायेगी
तो गीत भी होंगे गुम साथी
#श्वेता
*******

देश की राजधानी दिल्ली स्थित सरोजनी नगर मेंआवासीय 
परिसर निर्माण के लिए 17,000 पेड़ काटने की योजना है। स्थानीय 
लोगों के विरोध के बाद 4 जुलाई तक अदालत ने पेड़ काटने की 
प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।
चिंता का विषय यह है कि राजधानी पहले ही प्रदूषण के आपात 
स्थिति से ग्रसित है, ज़हरीली हो चुकी हवा का मानक स्तर बेहद 
गंभीर है ऐसे में हज़ारों पेड़ोंं का कटना कितना घातक हो सकता है 
आप ख़ुद ही निर्णय कीजिए।

****
सादर नमस्कार

आइये आज की रचनाओं के संसार में-

***


आदरणीय विश्वमोहन जी  की कलम से-
My photo
पारण
नीरसता की झुर्रियों और
विरसता के घोसलों से
भरे चेहरों से अब कामनाओं
के सेहरे उजड़ने लगे हैं.
थकावट की सिलवटों से सिले
मुख सूख रहे हैं और
तुमको मुझसे उबास आने लगी ?

*****

आदरणीया शैल सिंह की कलम से
समंदर पर कविता

तेरी गहराईयों में इतनी मूक ख़ामोशी क्यों

तेरे उत्ताल तरंगों से जी है बहलता सभी का 

तूं तो खुद के प्यास की तलब बुझा पाता नहीं

पर शेर,ग़ज़ल,कविता तुझीसे संवरता सभी का।

*******

आदरणीया मीना भारद्वाज जी की लेखनी से
मुक्तक
मेरी फ़ोटो

जीने का शऊर आ गया तेरे बिन
तूने भी सीख लिया जीना  मेरे बिन
जरूरी है आनी दुनियादारी भी
मुश्किल है जिन्दगी काटनी इस के बिन

******

आदरणीया कुसुम जी की लेखनी से


मधुर मधुर वीणा बजती

ज्यों आत्मा तक रस भरती

सारंगी की पंचम  लहरी

आके हिया के पास ठहरी
सितार के सातों तार बजे
ज्यों स्वर लहरी अविराम चले।

*****

आदरणीय अमित निश्छल जी की कलम से
अमर जवान

अराति सैन्य श्रेणी को नित, काट रहूँ मैं सबसे आगे;

सहस सिरों को काट अघी के, बढ़ूँ अनवरत निर्भय मागे।

है वीर भुजा में लहू नहीं, हमने अंगारे पाले हैं;

निश्चिंत रहो तुम चमन-वतन, ये शोले शूरों वाले हैं।
नाम छोटा, काम भी छोटा, सेवक बन दिन रात भुलाऊँ;
दुश्मन भी गर माफी माँगे, उठकर उसको गले लगाऊँ।
शिलालेख अपना भी हो तो, उसपर नाम शहीद लिखाऊँ

*****

आदरणीया रेणु जी की लेखनी से

 मोको कहाँ ढूंढे  से बंदे मैं तो तेरे पास में -
ना तीर्थ में ना मूर्त में ना एकांत निवास में -

ना मंदिर में ना मस्जिद में  ना काबे कैलाश में | |

ना मैं जप में ना मैं  तप में  ना  व्रत उपवास में |
ना मैं क्रिया -क्रम में रहता - ना ही योग सन्यास में | | 
न ही  प्राण  में  -ना पिंड में - ना ब्रह्मांड  आकाश में |
ना मैं  त्रिकुटी  भवर में , सब स्वांसों के साँस में | | 
खोजी होए  तुरत मिल जाऊं - एक पल की तलाश में -
 कहे कबीर सुनो भाई साधो  - मैं तो हूँ विश्वास में !!!!!
******
हूं मैं एक अबूझ पहेली....अभिलाषा चौहान 
भीड़ से घिरी लेकिन 
बिल्कुल अकेली हूं मैं 
हां, एक अबूझ पहेली हूं मैं 
कहने को सब अपने मेरे 
रहे सदा मुझको हैं घेरे 
पर समझे कोई न मन मेरा 
खामोशियो ने मुझको घेरा 
ढूंढूं मैं अपना स्थान... 
*******
और चलते-चलते 
आदरणीया पम्मी जी की लेखनी से
प्रेमचंद जी ने समाज और राजनीति के आपसी संबंधों के 
बारे में कहा “जिस भाषा के साहित्य का साहित्य अच्छा होगा, 
उसका समाज भी अच्छा होगा। समाज के अच्छे होने पर स्वभावतः राजनीति भी अच्छी होगी। यह तीनों साथ - साथ चलने वाली 
चीजें हैं । इन तीनों का उद्देश्य ही जो  एक है। यथार्थ में समाज, साहित्य और राजनीति का मिलन बिन्दु है।“

छपते-छपते
कबीर दौड़ रहा है, 
सूर को सावधान रहने के लिये कहने के लिये ढूँढ रहा है, 
तुलसी अदालत में फंसा हुआ है.




***
इस सप्ताह के हमक़दम के विषय
की जानकारी के लिए

आज के लिए बस इतना ही
कल आ रही हैं आदरणीया विभा दी।
अगले शुक्रवार फिर मिलेंगे नयी रचनाओं के साथ

गुरुवार, 28 जून 2018

1077....फिर खोजती हूँ - वो छोटा झरोखा...

सादर अभिवादन। 
बारिश की फुहारें आ गयीं 
देने तन-मन को सुकूं 
लुभाने लगी है अब  
कोयल की कुहू-कुहू। 

इस बीच विदेश से ख़बर आयी है कि आज भारत स्त्रियों के 
लिये दुनिया का सबसे असुरक्षित देश है। जो 2011 में चौथे 
स्थान पर था। अमेरिका जैसा विकसित देश भी आज इस सर्वे के 
अनुसार 193 देशों की सूची में  10 वें  स्थान पर है।  हालाँकि हमारी 
सरकार ने इस सर्वे को नकार दिया है लेकिन यह गहन चिंता का 
बिषय है कि स्त्रियों के प्रति भारतीय नागरिक इतने बदनाम 
क्यों हो रहे हैं विश्व स्तर पर.....
हम इस ख़बर से मुँह भी नहीं मोड़ सकते। इसके लिये केवल 
सरकार को जवाबदेह ठहराना अनुचित होगा।  क़ानूनों को 
ईमानदारी से लागू न किया जाना और समाज में जागरूकता का 
अभाव व संवेदनहीनता का बढ़ते जाना घोर चिंता का बिषय है। 
ऐसे समाचार हमारी सांस्कृतिक छवि तो धूमिल करते ही हैं 
साथ ही पर्यटन व आर्थिक पहलुओं को भी प्रभावित करते हैं।  

आइये अब आपको ले चलते हैं शब्द ,कल्पना और भाव से रची दुनिया में जहाँ व्यथित मन को सुकूं मिलता है और विमर्श को नये-नये आयाम -   





त्रसीत धरा बरसे कछु ऐेसे 
अमि कलश बिखरे  गागरिया 
हरख हरख मन भयो रे बावरों 
दौउ नयन खंजन दृग भरिया 
आज सखी .......🐝




मेरी फ़ोटो

‘आज़ादी पहुँच तो गयी, पर बुरी तरह लहूलुहान, ज़ख़्मी – जगह-जगह 
से जिस्म फट गया. कुछ अंग टूट गए. कुछ अटके रह गए. 
न इस तरफ़, न उस तरफ़ ---.’
गुलज़ार के इस उपन्यास की कहानी फिर एकदम से छलांग सी लगा 
लेती है और हम सालों की दहायियाँ एक साथ पार करने लगते हैं. कहानी बहुत तेज़ी से दौड़ने लगती है और भारत-पाकिस्तान की सरहदों को पार करते हुए वो इंग्लैंड के रिफ्यूजियों तक पहुँच जाती है. यहाँ कहानी में वो दम नहीं रह जाता जो इसके पहले दो भागों में था. 
लेकिन एक बार फिर गुलज़ार की कहानी हमारे दिल को तब फिर से छूने लगती है है जब वो इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिक्खों के नृशंस हत्याकांड का दिल दहलाने वाला मंज़र पेश करते हैं.  



My photo

फिर खोजती हूँ -
वो छोटा झरोखा,
जिसमें से झाँके
अंबर का मुखड़ा,
सूरज की आँखें
बादल का चेहरा,
चंदा की साँसें
तारों की बातें,
हवा की हँसी !!!!



वो घर से बाहर क्या निकले
बाहर की दुनिया में खो गए
अपनी गृहस्थी बसा कर वो
मां-बाप की दुनिया भूल गए



My photo

मीठी वाणी से पता चला  वो इंसान कैसा है
तल्खियत से पता चला ज्ञान कितना है
स्पर्श से पता चला कि वो व्यक्ति कैसा है
वक्त ने बता दिया कि ये रिश्ता कैसा है




शाम को जब
दिन के तमाम
उलझनों से 
फारिग होकर
छत पर टहलने 
जाती हूँ तो ,
प्रकृति की छटा 
देखते ही बनती है 


अल्पाइन चाफ़ या पीले-चोंच वाली चाफ़, कौआ परिवार का  एक पक्षी है। इस पक्षी को, चमकदार काला पंख, एक पीली चोंच, लाल पैर और विशिष्ट आवाज़ के कारण आसानी से पहचाना जा सकता है।


छपते -छपते
आओ भूत खोद कर लायें 

आओ 
‘उलूक’ 
संकल्प करें 
प्राणवान 
कुछ भी 
समझ 
में आये 
उसका श्राद्ध 
गया जाकर 
प्राण 
निकलवाने 
से पहले 
करवाने 
का आदेश 
करवायें 



अब  इस सप्ताह का विषय
हम-क़दम के पच्चीसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........

आज के लिये बस इतना ही। 
मिलेंगे फिर अगले गुरूवार। 
कल की चर्चाकार हैं - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 27 जून 2018

1076.. आज बातें दिल्ली की मुहावरे से..



आज बातें दिल्ली के मुहावरे से..

हैं न कुछ अलग सी "आटे की आपा" और..इस "आठ अठारह करना" पर तो सब राजी 
फिर भी सब की  अजीज़ है दिल्ली..

इसी के साथ रूबरू होते है आज की शामिल लिंकों से..

🔴

देश केे लोकतंत्र  को 21 महीने का ग्रहण लगाने वाली इमरजेंसी पर आज बस इतना ही कह सकती हूं  कि…इतिहास की एक घटना जिसने भारतवर्ष की  राजनैतिक दिशा-दशा, आरोह-अवरोह, घटना-परिघटना,  विचारधाराओं का विचलन और समन्‍वय के साथ-साथ  हमारी पीढ़ियों को लोकतंत्र की उपयोगिता व संघर्ष को  बखूबी परिभाषित कर दिया….उसे शब्‍दों में समेटा नहीं  जा सकता।





🔴

दिग्म्बर नसवा जी ...एक खूबसूरत गज़ल ..



ये दाव खुद पे लगा दिया है

तुम्हारे ख़त को जला दिया है

तुम्हारी यादों की ईंट चुन कर 

मकान पक्का करा दिया है

जहाँ पे टूटा था एक सपना





🔴
अनुराधा जी की रचना..




निशब्द हुं मैं शब्द नहीं है मेरे पास

  देश में फैले भ्रष्टाचार से

  धोखा फरेब के जाल से

  गरीबों के उत्पीड़न से

  किसानों की बदहाली से

निशब्द हुं मैं शब्द नहीं है मेरे पास





🔴

ब्लॉग ब्रज की दुनिया से सारगर्भित लेख..



मित्रों, लगभग हर चुनाव में हम इस नारे को सुनते हैं-तख़्त बदल दो ताज बदल दो बेईमानों का राज बदल दो. एक समय था जब समाजवादी होना ईमानदारी का प्रमाणपत्र माना जाता था लेकिन आज अखिलेश टोंटी चोर के नाम से जाने जाते हैं. यूपी की ही तरह बिहार में भी पिछले २८ सालों से समाजवादियों का शासन..
🔴





अपना ही आशियाना कोई उजाड़ता नही है

आइना  घर का  उदास रहा करता है  अब

तेरे बाद उसकी ओर कोई निहारता नही है

आँगन की तुलसी भी दूब से  घिर  गई  है

उन गमलों से घास कोई उखाड़ता 



अमित मिश्रा जी के बिखरा आशियाना... से आज की समाप्ति से पहले..

अब  इस सप्ताह का विषय
हम-क़दम के पच्चीसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........



🔴
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..









मंगलवार, 26 जून 2018

1075,बचपन का भोलापन फिर से मिल जाए

जय मां हाटेशवरी....
जीवन में एक समय में एक लक्ष्य निर्धारित करो और
जिस काम को करने का संकल्प लो उसे पूरे
जी जान से करो बाकी उस समय अन्य सभी कामो को भूल जाओ
---स्वामी विवेकानन्द

अभिवादन आप का.....
पेश है आज के लिये मेरी पसंद....


तेरा साथ होने भर से
मैं जानता हूँ
ज़रूरतें कभी ख़त्म नहीं होतीं
फिर भी
मुझे ऐसा लगता है
कि तेरा साथ होने भर से
मुझे किसी की ज़रूरत नहीं रहेगी | ~


आप के इंतजार में ख्वाब ...
आसमां एक जमीं मिली कमोबेस सबको
आप हैं की ले नया राग बैठे हैं -
कोयल की मांग थी जमाने को
कंगूरो बाग में अब काग बैठे हैं -
ग्रंथ कहते हैं मानवता से बड़ा न कोई
ये सूत्र वाक्य भी त्याग बैठे हैं


जिंदगी
क्याssss \ जिंदगी पीछे मुड़कर बोली |
ईश्वर का शुक्रिया करने के लिए – उसने उत्तर दिया |
वर्तमान में जीने के लिए खुशनुमा पल छोड़कर बीती जिंदगी
मुस्कराहट के साथ मन के दरवाजे के पार निकल गई |


मुझसे बातें करती जाती है
उड़ती हूं बादलों में
रोम-रोम पुलकता है
स्‍नान करती है आत्‍मा
अपसृत धाराओं में
सितारों संग, बिखरी पड़ी है, शरद पूर्णिमा
आकाश में
चांदनी से नहायी पृथ्‍वी में
विभोर होती है मीरा गलियों में
कबीर एक तारा बजाते हैं


सामने दिखती ढलान
 स्वार्थ से वह घेरता है
अब नजर वह फेरता है
छल कपट का है अंधेरा
सामने दिखती ढलान


अंतराल
तारों को यूँ ही
आसमान
में रहने
दो अपनी जगह, दे सके रूह को
सुकूं ऐसा कोई ख़्वाब ओ
ख़्याल चाहिए।

पीहर
बाबुल का प्यार, माँ का दुलार
ममता की रोटी, आम का अचार
बहनों की बातें , शिकायतें हज़ार
चहल -पहल से भरा घरबार
कुल्फी की घंटी, बुढ़िया के बाल
बगीचे के झूले, बच्चो का प्यार
ढेरों खिलोने, पर नखरे हरबार
नाना के घर में इठलाते ये चार





वृद्ध वही जो पूर्ण तृप्त हो
और एक चक्र पूर्ण हो जायेगा. मानव का जीवन भी एक वृक्ष की भांति ही होता है,
शिशु रूप में जो कोमल है, युवा होकर वही कितने उत्तरदायित्व सम्भालता है.
अपने इर्द-गिर्द के वातावरण को विभिन्न रूपों से प्रभावित करता है.
उसके सम्पर्क में आने वाले अनेकों व्यक्तियों को चाहे वे परिवार के सदस्य हों
अथवा मित्र, या कार्यक्षेत्रके सहकर्मी सभी से विचारों और
भावनाओं का आदान-प्रदान करता है.

नव प्रवेश


रिश्ते कितने अजीब होते हैं....अभिलाषा चौहान
रिश्ते महकाएं जिन्दगी फूलों सी
रिश्ते कांटों सी चुभन भी देते हैं
रंग भरते हैं जिन्दगी में रिश्ते
बदरंग भी जिन्दगी को बना देते हैं।



आज बस इतना ही.....
अंत में आदरणीय दीदी के ब्लॉग से.....

ललक उठे है एक मन में मेरे
बचपन का भोलापन
फिर से मिल जाए
मीठे सपने, मीठी बातें,
था मीठा जीवन तबका
क्लेश-कलुष, बर्बरता का
न था कोई स्थान वहां
थे निर्मल, निर्लि‍प्त द्वंदों से,
छल का नामो निशां न था

अब बारी है
हम-कदम की.....
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम पच्चीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
'मंजर'
उदाहरण.......
बड़ा भयावह
बड़ा दर्दनाक
होता है,
वह मंजर....
जब होता है कोई
अपना, बहुत अपना..
मानो दिल ही.... मृत्यु शय्या पर !
देखना उसे,
तड़पते हुए,
पल-पल, तिल-तिल..
क्षण-क्षण, जाते हुए
मृत्यु-मुख में....
बड़ा भयावह होता है
वह मंजर......!
अभिलाषा चौहान

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना शनिवार 30 जून 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं 
आगामी सोमवारीय अंक 02 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें



धन्यवाद।



सोमवार, 25 जून 2018

1074...हम-क़दम का चौबीसवाँ क़दम


बीज के आवरण को भेद कर जो नन्हा ,
नरम कोंपल निकलता है 
उसे अंकुर कहते हैं।
बेहद कोमल भाव जागते है अंकुर शब्द के उच्चारण से। अंकुर जीवन 
का प्रतीक है,  एक आशा को पल्लवित करती है। ठूँठ, बंजर और 
निराशा की कठोर धरती को फोड़ कर निकले अँखुए हृदय में सकारात्मकता का संचरण करते हैं।

नारी के कोख के अंकुर से मानव का जन्म होता है।
धरा पर अंकुर फूटे तो प्रकृति का श्रृंगार होता है।
विचारों का अंकुर फूटे तो आविष्कार होता है।

अंकुर सृष्टि के निर्बाध संचालन का द्योतक है। जब तक अंकुर 
फूटते रहेंगे धरा पर जीवन का कोलाहल हमसब सुनते रहेंगे।

अब चलिए आप सबों के विचारों के अंकुर से प्रस्फुटित आज के विषय 
पर लिखी गयी रचनाओं की ओर।
कुछ नयी और कुछ पुरानी रचनाओं के मिश्रण से बना आज का यह विशेषांक आप पाठकगण को समर्पित करते हैं......

 सादर नमस्कार

🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की दो रचनाएँ
बीजाकुंर

सच ही है धरा को चीर अंकुर
जब पाता उत्थान है
तभी मिलता मानव को
जीवन का वरदान
सींचता वारिध उस को
कितने प्यार से
पोषती वसुंधरा , करती
उसका श्रृंगार है

भर लूं उन को बस मुठ्ठी मे
उन्हें छींट दूं आगंन मे
आंख के आंसू जब
बारिश बन कर बरसेंगे
नव खुशियों के अंकुर फूटेगें
प्यार की कलियाँ चटकेगी
रंग बिरंगे फूल खिलेंगे

🔷💠🔷

आदरणीया शुभा मेहता जी
अंकुर

इक बीज के हृदयतल में
बसता है इक छोटा अंकुर
अलसाया सा....
सोता हुआ.....
उठो ,उठो ..
रवि नें आकर चुपके से कहा
उठो ,उठो ....
वर्षा की बूँदों नें
आवाज़ लगाई ....

🔷💠🔷
आदरणीया सुप्रिया रानू जी

संग हंसने संग रोने के वादे,
एक दूसरे का सुख दुख बांटने का जज़्बा,
एक दूसरे के कदम से कदम मिला कर चलने के कसमे,
एक दूसरे के लिए खुद को भुला देना 
एक दूसरे में ही खुद को पा जाना,
होंगे न जाने कितने अंतर्मन के सागर की लहरों के झकोरे,
न जाने कितने उठते दबते ज्वर 
तब जाकर हृदय में पनपा होगा 
अंकुर प्रेम का....


🔷💠🔷

आदरणीय पंकज प्रियम जी
अंकुर

यूँ हीं नहींप्रस्फुटित होता है बीज अंकुर बनकर,
रहना पड़ता है धुप्प अंधेरों में जमीन के अंदर।
नवसृजन करता,जीवन का वही आधार बनता
होता है अंकुरित वो स्वयं का अस्तित्व खो कर।

🔷💠🔷

आदरणीया आशा सक्सेना जी
प्रेम के फल

गहरे बोए बीज प्रेम के
सींचा प्यार के जल से
मुस्कान की खाद डाली
 इंतज़ार किया शिद्दत से
बहुत इंतज़ार के बाद
दिखे अंकुरित होते चार पांच
 हुई  अपार प्रसन्नता देख  उन्हें 
 देखरेख और बढाई

🔷💠🔷

आदरणीय अमित जैन "मौलिक"
उफ़ान

तो समझा 
अब तक क्या जिया।
खुरदुरेपन में फूटे 
नवीन अंकुर
निकल आईं शाखायें
अब मैं हरा भरा हूँ
हाँ एक ही जगह खड़ा हूँ,

🔷💠🔷

पर पत्थर बनना आसान न था!
बची रह ही गयी थी नमी कंही
और शायद मिट्टी भी........
उड़ आए बीज कंही से;
कि लाख कोशिशों के बावजूद
उग ही आये कुछ अंकुर
बातें करने लगे हवा से
नाता जोड़ लिया इस धरा से,
गगन से और इंसानों से.......

🔷💠🔷

आदरणीया मालती मिश्रा जी
स्वार्थ का अंकुर

जुड़े हुए होते हैं जिनसे
गहरे रिश्ते जीवन के
टूटी एक कड़ी कोई तो
रिश्तों से प्यार फिसल जाते हैं
स्वार्थ का बीज अंकुर होते ही
काली परछाई घिर आती

💠🔷🔷

आदरणीया प्रभा मुजुमदार जी
शब्द

मिट्टी से सोच
आकाश की कल्पना
वक़्त से लेकर
हवा, धूप और बरसात
उग आया है
शब्दों का अंकुर

🔷💠🔷

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता जी
अंकुरण

कोमल पँखुरिया खुल  के 
खिल  कर स्पंदन करें नित्य 
हर मन अंकुर शाश्वत सा हो 
हर ओर दिखे आता बसंत !

🔷💠🔷

आदरणीया मीना शर्मा जी
मेघ-राग

चंचल दामिनी दमके,
घन की स्वामिनी चमके,
धरती पर कोप करे,
रुष्ट हो डराए....

गरजत पुनि मेह-मेह
बरसत ज्यों नेह-नेह
अवनी की गोद भरी
अंकुर उग आए....

🔷💠🔷
आदरणीया पूजा पूजा जी एक रचना
रुको ज़रा ठहरो

मत डालो खलल मेरी नींदों में
अभी ही तो मैंने सपनों के बीज बोए हैं
अभी ही तो ख्वाबों के अंकुर फूटे हैं
उम्मीदों की नर्म गीली मिट्टी पर
अभी ही तो हसरतों की कलियां गुनगुनाई हैं
तितलियाँ खुशियों को अभी उड़ने तो दो
रंगत उपवन की निखर जाने दो

💠🔷💠
और चलते-चलते आदरणीय सुशील सर
के बारे में नहीं 
सोचना होता है 

अंकुर फूटने का 
भी किसी को 
इंतजार नहीं 
होता है ना ही 
जरूरत होती है 

सोच लेने में 
कोई हर्ज नहीं है 
☘☘☘☘
आप के द्वारा सृजित हमक़दम का यह अंक 
आपको कैसा लगा कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के 
द्वारा अवश्य अवगत करवाइयेगा।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक देखना न भूले।

अगले सोमवार फिर मिलेंगे नये विषय पर  
आपके द्वारा सृजित रचनाओं के साथ।

आज के लिए बस इतना ही


-श्वेता सिन्हा



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