निवेदन।


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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

4666... प्रेम ने दर्द को स्वीकार कर लिया है...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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जब भोर की अलसाई हवाएँ सर्दी का लिहाफ़
 हौले से सरकाने लगे,
जब फागुन की पहली लहर गाँव के खेतों को
 पियरी पहनाने लगे,
जब शीतल हवाओं से लदी माघ की मदमस्त रात 
चाँदनी में नहाने लगे,
 जब कोयलिया पीपल की फुनगी में झूलकर
 स्वागत गीत गाने लगे,
 जब भँवरे तितलियों संग छुआ-छाई खेल-खेल कर
 फूलों को लुभाने लगे,
तब समझो...
 रंगों की छुअन से बौराने का मौसम आया है।
दिलों में जमी बर्फ पिघलाने का मौसम आया है।
 जीवन में रचे प्रेम, उत्सव और समर्पण के रंग;
फगुनहट में सॉंसें महकाने का मौसम आया है।

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आज की रचनाऍं- 
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धूप जब उन पर गिरती है,
तो रंग और गहरा हो जाता है,
मानो प्रेम ने
दर्द को भी स्वीकार लिया हो।
इस अग्नि में
कोई राख नहीं,
सिर्फ़ अस्तित्व की चमक है 
जो कहती है,
“मैं जलता हूँ,
इसलिए हूँ।”



दोनों बातूनी थे।
एक ने कहा
मरने के बाद बड़ा मज़ा आया दोस्त,
जिनके लिए मैं ज़िंदगी भर बोझ था,
आज वही
मुझे अपने कंधों पर उठाकर लाए हैं।

 




इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले 
पकड़कर हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |



सितम सहकर भी 'शायर' मुस्कुराता ही रहा हरदम,
यही तो ज़िंदगी की खूबसूरत ये अदाएं हैं।

खिज़ां का खौफ़ क्या होगा जिसे मंज़िल  मिल पाई,
लहू से सींच दी हमने चमन की सब कथाएं हैं।

दुआ में हाथ जो उठता है तो महसूस होता ,
मिरे हक में ज़माने की बदलती अब दुआएं हैं।



लगता है समूचा बनारस
गंगा की केवल एक बूँद से बना है
मूल है गंगा, बनारस तना है
जो भी बनारस जाता है
कोई सिर के बाल, कोई जेब, कोई मन, कोई तन
अर्थात् कुछ न कुछ खोकर आता है
और जब कोई यहाँ से जाता है
हरी झंडी की तरह
बनारस अपने दोनों हाथ हिलाता है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

4665..ख़्वाहिशें..

 भोर वंदन 

गुरुवारीय प्रस्तुति में शामिल
'आपका ब्लॉग 'से रचनाए
कई शब्द रंग-ढंग को समेटे..✍️






न बीवी मिली न प्यारे

  आओ किस्सा तुम्हे सुनाए 

recent सा है यार 

साठ साल की उमर में हो गया 

ऑनलाइन मुझे प्यार 

ऑनलाइन मुझे प्यार 

मिले वो टिंडर पे थे यार

प्रोफाइल देखकर रीझ गया दिल 

हुआ पहली नज़र में प्यार 

✨️

बांचती रही हूं

 बस तुम्हें औ तुम्हारा लिखा ही  मैं बाँचती रही हूं

तुम्हे सोना चांदी हीरा मोती सम मैं आंकती रही हूं


 अक्षरशः पढ़ना तुझे जैसे सांस सांस लेना

तेरा वजूद तूफान सा और मैं पत्ते सी कांपती रही हूं

✨️



टेली कॉल वालों के जी के जंजालों ने


अजब मोबाइल है

गजब सी उस की उल्फ़त है

नजदीकिया है दूरी

दूरियां में क़ुर्बत है

कोई दुखड़ा सुना रहा

अपना व्हाट्सएप पे..
✨️
जिंदगी में कुछ पाने की ख़्वाहिश हमेशा होनी चाहिए क्योंकि ख्वाहिशें ही हकीक़त बनती हैं।जब ख़्वाहिशें हकीकत का जामा पहनती हैं तब जो आंतरिक सुख मिलता है, उसका रसास्वादन स्वयं के अलावा कोई नहीं कर सकता। हम दूसरों से अपने अनुभव बता तो सकते हैं, किंतु उन्हें महसूस नहीं..
✨️
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

4664..छटाँक भर का

।।प्रातःवंदन।।

दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्‍ह खड़ी है आने को

धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को


प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गुंजेगी

देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढ़ाने को..!"

गौतम राजरिशी

आइये चलें शब्दों की नगरी और बुधवारिय

प्रस्तुति के साथ..✍️



बरसाना की लट्ठमार होली: प्रेम, प्रतिरोध और भक्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण



ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं का एक जटिल और गहरा ताना-बाना है. इसमें बरसाना की 'लट्ठमार होली' अपने आप में अद्वितीय है. जहाँ दुनिया होली को केवल 'रंगों के खेल' के रूप में देखती है, वहीं एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से यह उत्सव दमित भावनाओं के रेचन (Catharsis), स्त्री सशक्तिकरण और सामूहिक भक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.

✨️

छटाँक भर का





"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है " !


एयरपोर्ट से बाहर निकलते बेटे के मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही शर्मा जी और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बेटे से मिलने का उत्साह जैसे कुछ ठंडा सा पड़ गया ।


सोचने लगे कहाँ तो हमें लगा कि इतने समय बाद हमें देखकर बेटा खुश होगा पर ये तो भगवान को ही कोसने लगा है" ।


तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?.. बता दे "?


बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" ।


"सही तो कह रहे तेरे पापा" - मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोली, "हमें देखकर भगवान को जो कोसने लगा तू ! क्या कह रहा था ये-


"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है "


दोनों ने एकसाथ दोहराया और हँसने लगे ।


"शिट ! तो आप लोगों ने सुन लिया" ?


"बेवकूफ ! गॉड ने हमें भी कान दिए है", मम्मी बोली , "चल बता क्या चीटिंग हुई तेरे साथ " ?


तो बेटा बोला, " हाँ मम्मी ! चीटिंग ही तो है न ये , देखो ! मैं हमेशा आप लोगों के सामने छटाँक भर का ही क्यों रह जाता हूँ" ?


"छटाँक भर का" ! आश्चर्य ..

✨️

तुनुक मिज़ाज़ प्रेमिका


अक्सर प्रेमिकाएँ


तुनुक मिज़ाज़ होती हैं—


जैसे हवा में खेलती धूप


हल्की, नर्म, और चुलबुली।


कल तक गुस्सा, आज हँसी,


आँखों में चमक और थोड़ी..

✨️

निडर राजा और जिद्दी प्रश्न


एक निडर राजा था,

उसे किसी से डर नहीं लगता था।

डरता था तो बस—

प्रेस कॉन्फ़्रेंस से।


मंत्रिपरिषद ने समझाया—

“महाराज, प्रेस कॉन्फ़्रेंस..

✨️


बासंती हाइकु


1


खिले जलज


पवन मलयज


आया बसंत।


2


पीत पराग


ऋतुराज का पाग


है अनुराग।


3


मंद पवन


अनुरागी छुअन


बासन्ती मन।


4


विरही मन


कहाँ पाए बसंत


रंग बेरंग।


5


वाणी की वीणा


मंद मंद रागिनी


खोया है मन।

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

4663...जहॉं मैं ख़ुद को थका हुआ न पाऊॅं...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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ताज़ी फूलगोभी की डंठल तोड़ते हुए
छोटे-छोटे कीड़े दिखाई दिए उन को हटाते हुए
सोचने लगी
 बैंगन , भिंडी या किसी भी सब्जी 
के कीड़े लगे हिस्से को काटकर
बाकी बचे हिस्से का प्रयोग आसानी से करते हैं 
हम। 
दैनिक जीवन की दिनचर्या में 
अनगिनत उदाहरण मिलेंगे जब हम अपने
 जरूरत के हिसाब से उपभोग की जाने
वाली वस्तुओं के साथ एडजस्ट करते हैं
पर भावनाओं,संवेदनाओं,अनुभूतियों 
 से ओत-प्रोत होकर भी हम
मनुष्य, मनुष्यों के अवगुणों को,बौद्धिक कमियों
 को, छोटी से छोटी गलतियों को 
 अनदेखा क्यों नहीं
कर पाते हैं?
मनुष्य का मनुष्य के साथ एड्जस्ट कर पाना 
क्यों मुश्किल है? 
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आज की रचनाऍं- 


बदहाली को
खुशहाली बताने वाला सॉफ्टवेयर
कहीं से भी आयात कर लो,
आँकड़ों की चमक में
सच्चाई का चेहरा
लहूलुहान ही सही।


तेरे लफ़्ज़ भले चाशनी से हों, घाव करे तो तीर से है 
हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।
तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है
मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।


इक ऐसी जगह हो...।


जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,
फिर आँगन में उतरे,
और शाम ढलते-ढलते
मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।

ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,
कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,
या शायद कोई ऐसा घर,
जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।


शब्दों का संबल

नहीं आयुष!" शगुन ने दृढ़ता से कहा. "तूने दिवाली पर 'मुक्ति' को अपनी गोद में लिया था, याद है? तूने कहा था कि हम उसे लेबल्स से मुक्त रखेंगे. अगर तू खुद को 'एवरेज' के लेबल से मुक्त नहीं कर पाएगा, तो उसे क्या सिखाएगा? आठ अप्रैल एक युद्ध नहीं है, वह सिर्फ तेरे और उन सिद्धांतों के बीच की एक बातचीत है जिन्हें तूने पिछले छह महीनों में जिया है. तू बस उन सिद्धांतों को कागज़ पर उतार देना, परिणाम के बारे में सोचने पर समय खराब मत करना."


संवाद का व्यास

तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।

“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”

रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।

अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

4662 ..देश अलग हैं, देश अलग हों, वेश अलग है, वेश अलग हों,

 सादर अभिवादन 


देश अलग हैं, देश अलग हों, 
वेश अलग है, वेश अलग हों, 



मानव का मानव से लेकिन 
अलग न अंतर-प्राण।
भूल गया है क्यों इंसान!

-हरिवंश राय बच्चन


रचनाएं देखें



मर का तो अंजाम आएगा

होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.

ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.


यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,

ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.


कालिख का वृत्त



अब वह

रास्तों की धूल में नहीं,

धूल की स्मृति में है

जहाँ

हर घुमाव

मिट्टी से मिलकर

अपना पहला हरापन

धीरे से दोहराता है।



दिन भी हुआ धुआँ-धुआँ



रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,

पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।


फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,

अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।




आया बसंत



सरसों फूल

पीले परिधान में

सजती धरा।


ले कुसुम

उमंग की बहार

राग बसंत।



ढलने लगी ये सांझ



वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,

दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।


लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,

इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।



आसपास फूलों की गंध को सजाएँ



मुँह मीठे 

पान भरे 

काशी क्या बोले,

गंगा की 

गठरी की 

गांठ कौन खोले,

घाटों पर 

बँधी हुई

नाव को सजाएँ.


ससुराल का कर्ज


जिस बहू के मायके जाने पर उसकी सास और ननद उसके बैग की तलाशी लेती थीं और उसे 'गरीब घर की' कहकर ताना मारती थीं, उसी बहू के बैग से एक दिन कुछ ऐसा निकला कि पूरे ससुराल की बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।

गरिमा जब भी अपने मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसके पेट में एक अजीब सी मरोड़ उठने लगती थी। यह डर मायके जाने का नहीं था, बल्कि वहां से लौटने पर होने वाली ‘अग्निपरीक्षा’ का था।

“बहु, बैग इधर लाओ,” सासू माँ, सुमित्रा देवी, सोफे पर पैर पसारकर हुकुम चलातीं।

गरिमा चुपचाप अपना बैग मेज पर रख देती।

सुमित्रा देवी की गिद्ध जैसी नज़रें बैग के एक-एक कोने को टटोलतीं। कभी वो साड़ियों की तह खोलकर देखतीं, तो कभी क्रीम-पाउडर के डिब्बे हिलाकर।



ससुराल का कर्ज, 

ये कथा फेसबुक के ब्लॉग की रचना है, इसी  एक रीडिंग लिस्ट को बुकमार्क में रखें





आज का ये अंक

भी झेलनीय है

सादर वंदन


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