सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
गुरुवार, 9 अप्रैल 2026
4707 ..अहं ब्रह्मास्मी, अहं कृष्णास्मी,अहं त्वमस्मी
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
4706..इंसान खुद को भगवान बना बैठा है
।।प्रातःवंदन।।
जंग… आखिर देती ही क्या है?
जंग जीतने वाले शायद जश्न पर हार तो इंसानियत की होती है..बचे मासूम चेहरों को न राजनीति समझ आती, न ही सरहदें…उन्हें बस विवशता भरी नजर और भूख लगती है और थोड़ा सा सुकून की आस।बहुत दुखद है यह देखना..
यह गुंजार कहाँ से आयी
चौंक पड़ा, मैं बोल उठा,
कँपने लगा हृदय, हरि जाने
मैं भय-विह्वल डोल उठा !
माखनलाल चतुर्वेदी
इन्हीं कशमकश के बीच बुधवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं..
कितनी पूनम जागेंगे हम
कितने सूरज और देखने,
छुपा गर्भ में यह भावी के
किंतु सजा सकते हैं सपने !
✨️
अस्पताल के बाहर कार और बाइक के स्टैंड अलग अलग बने थे और दोनों तरफ वाहन खड़े थे कि इतने में हड़बड़ी में एक साइकिल वाला आया और जल्दी से साइकिल खड़ी करके अंदर की तरफ भागा।
जल्दी में साइकिल डगमगा गयी,
✨️
आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है
अब AI (आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस) का जमाना है। बनाने वाले ने तो न जाने क्या सोच कर बनाया होगा मगर इस्तेमाल करने वालों के तो क्या कहने।
बनाया तो भगवान ने भी ..
✨️
पर आ न सकी कभी इकट्ठी..
✨️
तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह
मिलेंगे अब तो सिर्फ़ दुश्मन की तरह
तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 7 अप्रैल 2026
4705...अमित,तुम्हें कैंसर है...
नून-रोटी के जुगाड के ज़द्दोज़हद में अनगिनत पल ऐसे आते हैं जब निराशा एक अंधेरी गुफा की तरह
कोई राह नहीं सूझता,अंधेरे में अनजान मुसीबतों,
घुप्प अंधेरी गुफा का छोर ढूँढ़ना नहीं छोड़ता है
और तब तक टटोलता रहता है जब तक कोई
उजाला जीवन की सकारात्मकता,आशा,खुशियाँ और प्रगति का प्रतीक होता है।
यह पोस्ट लिखना इस लिए जरूरी लगा कि अब तक सबसे फ़ोन पर और इनबॉक्स में झूठ बोल बोल कर थक गया था। अधिकतर लोग शक कर रहे थे कि जिम की पिक नही आ रही, मुम्बई में इतने दिन क्यों, नए जॉब का क्या हुआ etc.
Life_is_so_unpredictable , क्या क्या नही सोच लिया इस बीच मगर यह समझ मे आया कि अंदर की मजबूती ही फाइट करने का सहारा बनती है बाकी दुनिया फिर बेमानी लगती है।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।
सोमवार, 6 अप्रैल 2026
4704 ...मैडम, हम आपके "फेसबुक फ्रेंड" हैं
सादर अभिवादन
आपको नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।
जो आपके पति ने शादी की सालगिरह पर आपको गिफ्ट की थी?"
निभाता क्यों नहीं ‘उलूक’ तू भी किसी
एक इसी तरह के एक आदमी का किरदार
कल जब उसकी आ जायेगी सरकार
तुझे क्या लेना और देना वो वहाँ क्या करता है
तुझे मालूम है तेरा यहाँ रहेगा अपना ही कारोबार
रविवार, 5 अप्रैल 2026
4703...रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से जब फूटेंगे कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे हरे-भरे पेड़...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच
पसंदीदा रचनाएँ-
बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक के ऑंसुओं की नमी
से
जब फूटेंगे
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
हरे-भरे
पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी
जीवन की पवित्र
प्रार्थनाऍं...।
*****
“चारित्रिक पतन
सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री
वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला
कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने
में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी
पड़ी— भीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो
उठे।
“गाँव में भीड़
द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को
मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत
नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है
कि साहित्य—जो समाज को दिशा देने वाला कहलाता है—वहाँ भी इस सोच से
अछूते मनुष्य नहीं हैं।” मेधा ने आगे कहा— अब उसकी आवाज़ और
गम्भीर हो गई थी—
*****
किसान ने एक योजना बनाई।
उनसे आठ लकड़ियाँ मंगाई।
चार को साथ रस्सी से बंधा।
चार को अलग - अलग रखा।
प्रत्येक पुत्र को पास
बुलाया।
बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।
पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी।
मिलकर पाई थी मजबूती।
शनिवार, 4 अप्रैल 2026
4702 सबमें अपनेपन की माया अपने पन में जीवन आया
सादर अभिवादन
आज आपकी जयन्ती है
साथ ही तेज मूसलाधार बारिश का सिलसिला जारी था।
बहुत करीब से महसूस कर रहा था।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026
4701... पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!
युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।
बिक रहा है ज़मीर यहाँ
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख़ मेरे
ज़िन्दा जज़्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह कर रही है
मेरे यादों के आकाश को




















