निवेदन।


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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

1997....तब्दीलियों की बड़ी भूख है ज़िंदगी में

स्नेहिल नमस्कार
---------
मानव शरीर का अस्तित्व मिट जाता है
और 
आत्मा और कर्म सदैव 
स्मृतियों में अमर हो जाते है

 सूचना मिली है कि अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली के मुखिया भूपी सूद नहीं रहे।

हंसमुख, मिलनसार और निहायत शरीफ़ इन्सान भूपी जी ने आज सुबह सीने में दर्द की शिकायत की और कुछ ही वक़्फ़े में उनकी आत्मा शरीर छोड़ गयी।
आदरणीय प्रभा जी को इन दुख के पलों में सांत्वना। भूपी जी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना।
इस वर्ष प्राकृतिक आपदा के रुप में बाढ़ के प्रलय से 
लगभग समूचा देश बेहाल है 
और जहाँ बाढ़ नहीं है वहाँ सूखे सी स्थिति हो रही।
कश्मीर का हाल, पाकिस्तान और चीन की बौखलाहट, 
राजनीतिक नाटकों और हलचलोंं का समाधान 
तो समयानुसार हो जायेगा
पर इन सबसे पृथक है-
देश में पाँव फैलाती आर्थिक मंदी जैसी
गंभीर समस्या,
जिसके समाधान के लिए
सर्वप्रथम ध्यान देने की आवश्यकता है।

आइये पढ़ते है आज की  रचनाएँ
★★★
सबसे पहले पढ़िये संवेदनशील बेहद उत्कृष्ट मनोभाव और समाज की रुढ़ियों पर 
कुठराघात करती सधे हुये शब्दों से गूँथी गयी कहानी



ये तुम्हारा कंकाल भी तो मेडिकल की पढ़ाई के काम आ जाएगा। और सोचो ना .. जरा ... 
कितना रोमांचक और रूमानी होगा वह पल जब युवा-युवती लड़के-लड़कियाँ 
यानि भावी डॉक्टर- डॉक्टरनी का नर्म स्पर्श मिलेगा इन हड्डियों को। 
है ना नुप्पू !? तुम्हे जलन होगी ना ? वही सौतन-डाह !? "
★★★★★★
मानवीय संबंधों की शब्दों की शिल्पकारी 
से सुंदरता से अभिव्यक्ति
बड़ी भूख है ज़िंदगी में

पापा, दिन, महीने
बीते बरस के
हर लम्हे ने मुझे आपके साथ
नहीं होने पर भी
हमेशा आपके साथ रखा
हर बार असंभव को
संभव किया
और कहा है मैंने
मुस्कराते हुए
जिसके सर पर अपनों का
हाथ होता है वो
इस बहते खारे पानी को

★★★★★★
अध्यात्म और मन के गहन चिंतन
से उत्पन्न सुंदर सृजन
उसने कहा था

अपने ही विरुद्ध किया जाता है यूँ तो हर पाप
यह पाप भी खुद को ही हानि पहुंचाता है
इसका दंड भी निर्धारित करना है स्वयं ही
'असजगता' के इस पाप को नाम दें 'प्रमाद' का
अथवा तो स्वप्नलोक में विचरने का
जहाँ जरूरत थी... जिस घड़ी जरूरत थी...
वहाँ से नदारद हो जाने का

★★★★★
प्रकृति और प्रेम का सुंदर संगीत

इश्क़ में इतने पागल हो तुम,
दिन में चाँद को बुला रहे हो ।

तूफानों से तो डर लगता था,
दरिया में नाव चला रहे हो।
★★★★★★★
अपने अंदाज़ में लिखी गयी 
व्यवस्था पर प्रश्न उठाती 
सुंदर अभिव्यक्ति
चाँद सूरज की मिट्टी की कहानी नहीं

कौन सा
पढ़ लेने
वालों को
भी
समझ में

सारा
सब कुछ
इतनी जल्दी
ही
आ जायेगा 

★★★★★★

और चलते-चलते बेहद सराहनीय 
अपनत्व के भावों से भरी
एक पुस्तक की मनमोहक समीक्षा


प्रिज्म से निकले रंग ” 
मुझे भी  इसे पढ़ने का अवसर मिला तो  पाठक के रूप में मुझे इन्हें पढ़कर बहुत  अच्छा  लगा 
और  आदरणीय रवीन्द्र जी के लेखन पर बहुत गर्व भी हुआ | जैसा  कि नाम  से  ही  पता चल  जाता है, 
संग्रह  में भावों और कल्पनाओं के इन्द्रधनुषी रंगो  को विस्तार मिला है | अलग-अलग  विषयों पर  
रचनाएँ अपनी  कहानी आप कहती हैं | इन रचनाओं में समाज, नारी, प्रेम, राष्ट्र, प्रकृति, इतिहास और 
जीवन में   अहम्  भूमिका  अदा करने वाले करुण-पात्रों  को  बहुत ही सार्थकता से प्रस्तुत किया गया है।   
एक पाठिका के रूप  में  इस संग्रह को पढ़ने का अनुभव  
मैं  दूसरे  साहित्य प्रेमियों  के  साथ बांटना चाहती हूँ |
★★★★★★

आज का अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।

हमक़दम का विषय है-


कल का अंक पढ़ना न भूलें
कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

1496...हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम.


सादर अभिवादन। 

ख़ुशख़बरी !
'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की एक चर्चाकारा आदरणीया पम्मी जी का नाम 
'ग्लोबल बुक ऑफ़ लिटरेचर रिकॉर्ड्स' 2019 में दर्ज़ किया गया है। विश्व की सर्वाधिक लोकप्रिय 111 महिला साहित्यकारों की सूची में एक नाम आदरणीया पम्मी सिंह 'तृप्ति' का भी शुमार किया गया है। 
इस शानदार उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामनाएँ।  
इस विषय पर और अधिक प्रकाश डालने का आदरणीया पम्मी जी से अनुरोध किया जाता है।  

आइए अब आज की पसंदीदा रचनाओं पर नज़र डालें-   


 My Photo

विद्रोही औरतें   

यूँ मुस्कुराना   
ख़ुद से विद्रोह सा लगता है   
पर समय के साथ चुपचाप   
विद्रोही बन जाती हैं औरतें   
अपने उन सवालों से घिरी हुई   
जिनके जवाब वे जानती हैं   
और वक्त पर देती हैं   
विद्रोही औरतें।   


 
कँधों पर हमारे  टिका है
समाज की अच्छाई का स्तम्भ,
हृदय जलाकर दिखाती हैं,
रौशनी समाज के भविष्य को
त्याग के तल पर जलाती हैं,
 दीप स्नेह का ,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं  हम |


एक साँस में कितने आस,

बांधता है आदमी,
ज़मीनें कम...पर ना जाने कितने,
आकाश बांधता है आदमी I




राजस्थान का लोहार्गल धाम, जहां पांडवों के हथियार गले थे..... गगन शर्मा 


 

लोहार्गल से भगवान परशुराम का भी नाम जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि क्षत्रियों के संहार के पश्चात क्रोध शांत होने पर जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो पश्चाताप स्वरुप उन्होंने यहां यज्ञ किया तथा नरसंहार के पाप से मुक्ति पाई थी। यहां एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पास ही पहाड़ी पर एक प्राचीन सूर्य मंदिर बना हुआ है। इसके साथ ही वनखण्डी जी का मंदिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव तथा हनुमान मंदिर तथा पांडव गुफा भी स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। 



अनामिका एक अस्तित्व के रूप में स्त्री होने को कभी नकाराती
 नहीं बल्कि गरिमा के साथ स्त्री होने को स्वीकारती हैं क्योंकि एक
 रचनाकार के रूप में स्त्री का व्यक्तित्व अपनी अस्मिता के होने
 को सभी भेद-प्रभेदों के बीच से निकलकर गुजरकर अपनी पहचान
 पाता है और फिर एक विशिष्ट मनोविज्ञान को रचता है   जिसे
 समग्रता से अनुभव किए बिना न तो कोई अहसास होता है न 
विचारन कल्पना न अतंर्दृष्टि. इसलिए एक कविता में अनामिका
 जी ने कहा था-


हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
❄️❄️

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 21 अगस्त 2019

1495..कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले..


।।प्रातः वंदन।।
"कौन विजयी है जगत में कौन हारा है
उषा आती है, प्रभा गाती है
कहाँ यह संध्या लिए जाती है
उषा संध्या दो लहर है एक धारा"
त्रिलोचन
प्रकृति द्वारा विचारपूर्ण तथ्यों को समेटती पंक्तियों के साथ 
आइए अब नज़र डालें आज की लिंकों पर..✍
❄️❄️



हरेक शख़्स को देना जवाब था शायद

पुराने खेल का कोई हिसाब था शायद।




भँवर तमाम क्यों मंडरा रहे उसी गुल पर

चमन में एक वो ही बस गुलाब था शायद

❄️❄️




प्रलयंकारी न बन

हे जीवन दायिनी,

विनाशिनी न बन

हे सिरजनहारिनी,

कुछ तो दया दिखा

हे जगत पालिनी

❄️❄️


जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। 
चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?..

❄️❄️


यूँ ही कल झाड़ पोंछ में ज़हन की

वक़्त की दराज़ से निकल आये 

कुछ ख़्याल पुराने 

जो कहने थे उनसे 

जो मौजूद नही थे 

सुनने के लिए....



कुछ ख़त 

जो लिखे गए थे..


❄️❄️




मंद सांसों में, बातें चंद कह दे!

तू आज, मुझसे कोई छंद ही कह दे!



चुप हो तुम, तो चुप है जहां!

फैली हुई है खामोशियाँ!

पसरती क्यूँ रहे?

इक गूंज बनकर, क्यूँ न ढले?

चहक कर, कह इसे हम क्यूँ न दें?

चल पिरो दें गीत में इनको..


❄️❄️
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
❄️❄️




"कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले

मूझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले"

मो.जहूर ख्य्याम (1927-2019)

श्रद्धांजलि





।।इति शम।।

धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति..✍
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