सादर अभिवादन
अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
कल आखिरी दिन है
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन।।
"सत्य का एक चेहरा होता है
रंगहीन भी नहीं होता सत्य !
लेकिन झूठ की तरह
हर कहीं नहीं होता सत्य
न ही झूठ में घुल पाता है
अगर होता है कहीं तो
अलग से दिव्या आलोक लिए
दमकता रहता है सत्य !"
गोविंद माथुर
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ आज शामिल रचनाए को देखिए ..✍️
शहर त्रस्त था
अँधेरों से।
उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया..
✨️
सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद
परिचय
सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव ..
✨️
बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए
छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल
हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए ..
✨️
नियति की
हर क्रिया में
कर्म की प्रतिक्रिया सा
निर्बाध निर्विरोध
लेता हूं अवश्य ही
प्रतिशोध..
✨️
सरगोशियों के स्वर
‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीव..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
मंगलवारीय अंक में
संक्रमित पेड़ के
एक डाल के कीड़ों
पर कीटनाशक छिड़ककर
ख़ुश होना कि पेड़
संक्रमण मुक्त हुआ
जबकि सच तो जड़
को खोखला कर रहा
भ्रम में जीना
अच्छा लगता है हमें।
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शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी
की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं सोमवारीय अंक में पाँच चुनिंदा
रचनाएँ-
कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से
मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं।
"गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के
चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:
"गौरैया /
रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."
"आदमी /
चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है" कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म
बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं।
"गौरैया" कविता में
पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:
"गौरैया /
रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."
"आदमी /
चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है"
*****
जीवन भी ऐसा ही है
कभी धूप,
कभी घनघोर घटाएँ,
कभी उजास,
कभी अनंत प्रतीक्षा ।
नेह के घट से
अमृत छलकता है,
तो उसी प्रेम की गहराई में
अश्रु भी जन्म
लेते हैं ।
प्रवासी पंछी
अनजान देश में
ढूँढे बसेरा
छूटे माँ बाप
छूटा कुल कुनबा
गाँव शहर
*****
कोई इधर गया, कोई उधर गया
कोई भी न मेरी जानिब हुआ
जब से वो शख़्स साहिब हुआ
*****
इस्मत चुगताई: बागी तेवरों वाली लेखिका, जिन्होंने मौत के बाद दफ्न होने के
बजाय दाह-संस्कार को चुना
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक की चुनिंदा पाँच रचनाएँ-
(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)
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आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई
फूल ही फूल, चूनर में अपनी, टाँक ले आई
बरसी बूँदें, गरजे घन घटा, तड़पे जिया
हर्षित धरा, लहरा के आँचल, ले अँगड़ाई !
*****
बनाने लगती है
अपने बेटे के लिए
बेसन के लड्डू,
उसकी पसंद की सब्ज़ी,
झाड़ने लगती है
उसका साफ़-सुथरा बिस्तर।
*****
सूखे आषाढ़ के बाद सावन का हरा होना
केवल
कल्पना है
किसान
बोएगा फिर भी धान
इस
उम्मीद में कि भादो जरूर बरसेगा
और
भादो है कि
कई
सालों से या तो खूब बरसा है
या
एकदम ही नहीं
*****
तराश तेरी
तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे
प्रायः कर
लेती दीदार तूलिका के इमदाद से ,
समीर के
झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये
तुझे मिल
जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सादर अभिवादन
चार दिन की बारिश में
गंदला जल हर सीमा लाँघ चुका,
नक्शे पर बनी रेखाएँ डूब गई।
खेत, आँगन, चौखट और सड़क—
सब एक ही विशाल, निष्ठुर नदी बन चुके हैं।
पेड़ों की डालियों से लटके
प्लास्टिक के डिब्बे, कपड़े, और भूली-बिसरी यादें।
दूर बहती जाती है किसी बच्चे की आधी डूबी गेंद,
पीछे छूट जाती है
सालों की हाड़-तोड़ कमाई।
राहत की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए
छतों पर कैद इंसान,
जहाँ भूख से ज़्यादा बड़ा है डर—
धीरे-धीरे चढ़ते पानी का।
पानी जब उतरता है,
अपने पीछे छोड़ जाता है
बदबूदार कीचड़, बीमारियॉं,
एक थका हुआ शहर और
शून्य के घेरे में छटपटाता
मजबूर आदमी...।
तन यह माटी, मन पानी सा
दोनों आते-जाते रहते,
आत्म ज्योति से टिके हुए हैं
जिससे हम अनजाने रहते !
मन के पीछे चलता है तन
तन की सेवा में रहता मन,
सेवक बाहर, मालिक भीतर
कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !