निवेदन।


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शुक्रवार, 21 जून 2019

1435....पिटती लकीर है, मजे में फकीर है, सो रहा जमीर है...

स्नेहिल नमस्कार
--------

आप अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए
क्या करते है?
आप भी योग करते हैं क्या?
बात जब भी सेहत को  चुस्त-दुरुस्त रखने की हो तो निःसंदेह व्यायाम की श्रेणी के अंतर्गत प्राथमिक सूची में "योग" का नाम सबसे पहले लिया जाता है।
चमत्कारिक योग
मन,मस्तिष्क, आत्मा और शरीर में संतुलन बनाये रखने में सहायक होता है।
योग न केवल शारीरिक वरन् अनेक मानसिक व्याधियों से मुक्त कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के का प्रवाह करने में सहायक है।
आधुनिक अत्यधिक व्यस्तम् और तनाव भरे  जीवन शैली में तो योग के प्रभावशाली
परिणाम दृष्टिगत हुये है।

तो चलिये आज की रचनाओं का आस्वाद करते हैं-
★★★★★★

प्रीति "अज्ञात" जी
प्रकृति,पर्यावरण और पृथ्वी

ये मासूम पक्षी; जो हर वृक्ष को अपना घर समझ हमारी सुबह-शाम रोशन करते हैं। जो सुबह की पहली धूप के साथ हमारे आँगन में चहचहाहट बन उतरते हैं, जो किसी बच्चे की तरह खिड़कियों से लटक सैकड़ों करतब किया करते हैं, जो अलगनी को अपने बाग़ का झूला समझ दिन-रात फुदकते हैं। हमने इन्हें क्या दिया? आधुनिकीकरण और विकास के नाम पर हम इनके भी घर छीन रहे हैं।
★★★★★
ज्योति खरे सर

मुस्तैद हो गयी हैं 
कैमरों की आंखें 
खींच रही हैं फोटो
पहले नेगेटिव फिर पाजिटिव
निगेटिव, पाजिटिव के बीच 
फैले गूंगेपन में
चीख रहैं हैं बच्चे 
चीख रहा है 
मुजफ्फरपुर 
बेआवाज़
★★★★★
सुबोध सर
विवशताएँ..... अपनी-अपनी

" अब सरकारी कर्मचारी मैं कहाँ से लाऊँ !?
या बैंक के किरानी के लिए
दस- बीस लाख भला कैसे जुटाऊँ ?
बेटी ! मुझे तो पाँच-पाँच बेटियाँ ब्याहनी है
वीणा, गुड़िया को ब्याह चुका
माना अब तुम तीसरी हो
मगर अभी अन्नू  , नीतू तो बाकी है
और फिर .... ये लड़का 'प्राइवेट' नौकरी वाला
मेरी भी तो पहली पसंद नहीं
मगर क्या करें मजबूरी है

★★★★★★
सुजाता प्रिया जी

भोग-विलास की मरिचिका में,
भटक रहा  जन- जन है।

अधिकाधिक पाने की इच्छा से,
व्यथित  यह  मन  है।

इस जीवन में आवश्यकताओं का,
अंत   नहीं  हो  सकता  है।

एक  पूर्ण हो  जाता  तो,
पुनः दूसरा आ जाता है।
★★★★★★
उलूक के पन्नों से
सुशील सर
बरसों लकीर पीटना सीखने के लिए लकीरें क़दम दर क़दम

पिटती लकीर है
मजे में फकीर है
सो रहा जमीर है
अमीर अब और अमीर है

कलम
लिखती नहीं है
निकलता है
उसका दम 


★★★★★★

एम.वर्मा सर
अपराधों पर अंकुश का रामबाण

सरकार ने मंत्रिमंडल को अपराध के प्रति चिंतित होने का निर्देश दिया. एक हफ्ते की चिंता प्रक्रिया पूरी की गयी. तत्पश्चात एक उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया. इस बैठक में बढते अपराध के प्रति आक्रोश प्रस्ताव पास करने के उपरांत अपराध कम करने के लिये भी चिंतन मनन किया गया. अंततोगत्वा बैठक में अपराध पर अंकुश लगाने का रामबाण ढूढ ही लिया गया. जो प्रस्ताव पास हुआ वह निम्नवत है : 
१- छिनैती एवम लूट आर्थिक कारणो से होते हैं और पूंजी को चलायमान रखते है,  इसलिये इसे व्यापार की श्रेणी में शामिल कर लिया जाये. 

★★★★★★
आज का यह अंक 
आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।

हमक़दम के विषय के लिए

यहाँँ देखिये


कल का अंक पढ़ना न भूलें

कल आ रहीं हैं विभा दी 
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।
★★★★★★

ज़िंदगी दुधमुँहों की इतनी सस्ती है
हमने ये सोचा नहीं
ताडंव मौत का देखते रहे अनवरत
हमने कैसे रोका नहीं?
कलपती,सिसकती,बेबस,तड़पती माँ की
आँचल में राख भर गया
कैसे समझाये उनको
जिन्हें मिला है उम्रभर के ग़म का इनाम
यह हादसा नहीं बकायदा है हत्या 
कुदरत का दिया निर्मम तोहफ़ा नहीं


#श्वेता सिन्हा

गुरुवार, 20 जून 2019

1434...कितनी सभ्यताएँ हम लाँघ चुके हैं ....

सादर अभिवादन। 

हर रोज़ देश पर चिंतन करते हैं हम,
संसद में जनप्रतिनिधियों का चरित्र देखते हैं हम,
जल-संकट हो या सैकड़ों बच्चों की अकाल मौत,
संसद में तो कुछ और ही गूँजता सुनते हैं हम। 
-रवीन्द्र    

आइये अब आपको साहित्य के रसास्वादन हेतु कुछ रचनाओं से परिचय करायें- 





छूट जाउँगी 
सकल इन बंधनों से,
राम तुम बन जाओगे 
छूकर मुझे 
और मुक्त हो जायेगी 
एक शापित अहिल्या 
छू लिया तुमने 
उसे जो प्यार से 
निज मृदुल कर से !




वीरागंणा गजब
पवन अश्व सवार थी।
दुश्मनों को धूल चटाती
हिम्मत की पतवार थी।




मोड़ ले, अपनी राहें! 
भर ना तू, 
उनकी चाहत में आहें! 
क्यूँ उनको ही चाहे, 
खुद को भटकाए, 
अंजान दिशाएं,
 क्यूँ खुद को ले जाए? 



 
दरक रही धरती की मिट्टी, उजड़े सारे बाग।
 त्राहि - त्राहि मचा रहा, छेड़ों अब नये राग।।

जल ही कल का जीवन है,कर लो इसका भान।
जो समय पर न चेते,खतरे में होगी अपनी जान।।


 
नृशंसता और बर्बरता का जमाना गया नही है  
जरा सोचिए तो 
कितनी सभ्यताएं हम लांघ चुके है 
फिरभी सभ्य हुए है हम कितने !


 
आज जब वॄंदा काम करके घर जाने लगी तो अरुन्धती ने रोकते हुये कहा- वॄंदा आज तुम्हारे मधुर का रिजल्ट आ गया। बडी उत्सुकता से वॄंदा बोली मैडम जी मिल जायगा न मधुर को दाखिला। वॄंदा की आंखों में उभर आयी चमक को देखकर प्रिन्सिपल मैडम जो विघालय में एक तेज तर्राक, और हदयहीना महिला समझी जाती थी, यह साहस नही कर पा रही थी कि कैसे मै इस माँ और बच्चे की आशाओं के दिये को अपने निर्मम उत्तर से बुझा दूँ। तभी उस अनपढ वॄंदा को समझ आ गया कि उसके सपनों के पंख कट चुके है, बहुत धीरे से अपने बेटे के सर पर हाथ सहलाती हुयी बोली- मैडम जी क्या बहुत खराब परचा किया था मेरे बेटे ने। 

हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए

💮


आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति के साथ। 

रवीन्द्र सिंह यादव  

बुधवार, 19 जून 2019

1433..निरुद्देश्य चलते चलना स्वमेव एक उद्देश्य है..



।।प्रात:वंदन।।
अल्फाज जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते 
रहते हैं मेरे चारों तरफ,
अल्फाज़ जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते 
रहते हैं रात और दिन 
इन लफ़्ज़ों के किरदार हैं, इनकी शक्लें हैं,
रंग रूप भी हैं-- और उम्रें भी!
गुलजार 
💮
इसी शब्दों के रंग-रूप को जानने ,समझने के लिए निम्न लिंकों को पढ़ें..रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
💮
आदरणीय दिगंबर नासवा जी,
आदरणीय हेमंत दास 'हिम' जी,
आदरणीय ओंकार जी,
आदरणीया अनुपमा पाठक जी,
आदरणीया सुषमा वर्मा जी..


💮



धूप की बैसाखियों को भूल जा  
दिल में हिम्मत रख दियों को भूल जा


व्यर्थ की नौटंकियों को भूल जा
मीडिया की सुर्ख़ियों को भूल जा


💮


16 जून 2019 दिन रविवार को फादर्स डे 
यानी पितृ दिवस के उपलक्ष्य में लेख्य मंजूषा पटना के द्वारा काव्योत्सव मनाया गया। 
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था की अध्यक्ष श्रीमती विभा रानी श्रीवास्तव ने किया
 तथा मंच संचालन दिल्ली से आई पम्मी सिंह ने किया। इस अवसर पर विभा रानी श्रीवास्तव
 ने कहा कि बच्चों को संस्कार अगर मां देती है तो पिता सहने और जुझने की शक्ति..

💮


उस घर में एक लड़की थी,
सुन्दर-सी,मासूम-सी,
रह-रह कर खिलखिलानेवाली,
उसकी हंसी मोहल्ले में गूंजती थी.
बड़े सलीके से सजती थी वह,
रंगों का अच्छा सेंस था उसको


💮



निरुद्देश्य पैदल चलते हुए
रास्ते-दर-रास्ते अपने पाँव से नापते हुए
गति को आयाम मिलता रहा
जितना चलते चले गए
धूल पटे रास्तों पर
लगातार...

💮




तुम्हे आज लिखती हूँ मैं,
फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं...
उजली सुबह लिखती हूँ मैं,
ढलती शामे लिखती हूँ मैं..
गहरी खमोश राते लिखती हूँ मैं..
फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं..
मन की पगडंडियाँ,

💮
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
💮

।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

मंगलवार, 18 जून 2019

1432....आयु पूरी हो चुकी है आदमी की

सागर अभिवादन
माह जून समाप्ति की ओर
हमारे इस ब्लॉग की सालगिरह करीब ही है
सोच रहे हैं कैसे मनाया जाए सालगिरह
अब आप ही बताएँ..
4 जुलाई 2019 को है रथयात्रा
इसी दिन हमारा ब्लॉग शुरु हुआ था
4 जुलाई को हमारी पाँचवी साल गिरह होगी
जायजा लें हमारे पहले अंक का

कोई चित्र नहीं..कोई ताम-झाम नहीं
दो उत्सवों सा संगम था उस दिन
एक वो दिन था और एक आज का दिन...
इन्तजार कीजिए....

चलिए चलते हैं आज की रचनाओं की ओर

झुक रही है भूमि बाईं ओर, फ़िर भी
कौन जाने?
नियति की आँखें बचाकर,
आज धारा दाहिने बह जाए।

छल्ली कर अपने सीने को दे दी कुर्बानी जान की,
सुनो सुनाऊं मैं कहानी उस वीर के बलिदान की।

नटखट था लला मेरा वो, इधर उधर छुप जाता था,
खोज खोज जब तक जाती मैं दूर खड़ा मुस्काता था।

आयु पूरी हो चुकी है आदमी की,
साँस, या अब भी ज़रा बाकी रही है?
मर चुकी इंसानियत का ढेर है यह,
या दलीलें बाँचनी बाकी रही हैं?
हैं मगन इस सृष्टि के वासी सभी गर,
हर हृदय में वेदनाएँ कौन हैं?
कंदराओं में पनपती...

बरसते नहीं, यहाँ अब वो बादल, 
चल कहीं और चल.... 
बरसों हुए, अब-तक न भीगे! 
रंग बारिशों के, है कैसे ये हमने न देखे? 
कहते है, वो मेघ होते हैं पागल, 
झमा-झम बरस जाएँ, 
न जाने ये किस पल! 
पर भरोसे के, कब होते हैं बादल! 
चल कहीं और चल.... 

बर्तन .....
आज
बर्तन चमक रहे हैं
कुछ समय के लिए ही सही
बुजुर्ग माँ के घर
पकवान महक रहे हैं।

अब बारी है विषय की
छिहत्तरवाँ विषय
पालकी

 उदाहरण
ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की 
कभी तो बात भी हो पालकी लिए कहार की 

गुलों को तित्तलियों को किस तरह करेगा याद वो 
कि जिसको फ़िक्र रात दिन लगी हो रोजगार की 

बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुत्फ़े-ज़िन्दगी 

नहीं सुनेगा फिर वो बात कोई भी सुधार की
रचनाकार हैं
आदरणीय नीरज जी गोस्वामी
अंतिम तिथि -22 जून 2019
प्रकाशन तिथि -24 जून
प्रविष्टियाँ सम्पर्क फार्म द्वारा ही स्वीकार्य
यशोदा










सोमवार, 17 जून 2019

1431..हम-क़दम का पचहत्तरवाँ अंक... इंसानियत

स्नेहिल अभिवादन
----
इंसानियत
..................................
दुनिया के बाज़ार में इंसान खिलौना है।
मज़हब सबसे ऊपर इंसानियत बौना है।।
बिकता है ईमान चंद कागज़ के टुकड़ों में,
दौर मतलबों का, हृदयहीनता बिछौना है। 
धर्म ही धर्म दिखता है चौराहों पर आजकल,
रब के बंदे के लिए अफ़सोस नहीं कोना है।
जन्म से हे! सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति कहो,
कर्म का तुम्हारे रुप क्यों घिनौना है?#श्वेता
★★★★★
तो चलिए
विलंब न करते हुये हमारे 
सृजनशील,प्रतिभाशाली रचनाकारों के क़लम
से प्रवाहित
 हमक़दम के 
इंसानियत 
अंक की रचनाएँ पढ़ते हैं।
★★★★
कविता कोश से ली गई रचनाएँ

आदरणीया अनुपमा पाठक
इंसानियत का आत्मकथ्य  ...
भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

★★★★★★


ज़नाब 
सर्वत एम जमाल
इंसानियत दलदल में है.....
सच कहूँ इंसानियत दलदल में है 
आदमी तो आज भी जंगल में है। 

आप सोना ढूढ़ते हैं , किसलिए
आजकल गहरी चमक पीतल में है।

सारी नदियाँ चल पडी सागर की सिम्त 
सिरफिरा तालाब किस हलचल में है।

★★★★★★
अब ब्लॉग की रचनाएँ

आदरणीया साधना वैद
हारती संवेदना

भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,
मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,
है अचंभित सिहरती इंसानियत ,
क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 

कौन सत् के रास्ते पर है चला ,
कौन समझे पीर दुखियों की भला ,
हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,
सुन्न होती जा रही संवेदना !

★★★★★

आदरणीया आशा सक्सेना
इंसानियत के ह्रास पर ....

इंसानियत के ह्रास  पर
कितने भाषण सुन   कर
प्रातः काल नींद से जागते ही
अखवार पर नजर डालते ही
मन का सुकून खो जाता है|

★★★★★★


आदरणीया कामिनी सिन्हा
क्या हम अपने नौनिहालों को इंसानियत का पाठ पढ़ा पाएंगे ?

" इंसानियत " यानि इंसान की नियत ,तो शायद  इंसान के नियत के आधार पर ही उन्हें देवता या दानव कहा गया होगा। लेकिन जैसे जैसे हम सतयुग से द्वापर और त्रेतायुग की ओर चले देवताओ की संख्या तो वही रही पर दानवी गुणों में बढ़ोतरी होती चली गई,शायद सकारात्मक ऊर्जा से ज्यादा आकर्षक नकारात्मक ऊर्जा होती हैं। तभी तो द्वापर में एक व्यक्ति के सत्ता पाने की चाह में एक भरापूरा  परिवार बिखर गया ,एक बेटे को वन वन भटकना पड़ा,अपहरण जैसे घटनाक्रम का जन्म हुआ ,एक स्त्री के चरित्र पर लांझन लगाने का दुःसाहस शुरू हुआ ,नारी को अपने सतीत्व को प्रमाणित करने को वाध्य किया गया। त्रेतायुग आते आते तो सतयुग के सारे सद्गुण धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे थे। त्रेतायुग में तो  एक नारी को भरी सभा में नग्न करने का प्रयास किया गया और उस नारी के 
सभी शुभचिंतक मूक दर्शक बने देखते रहे। नारी के मान सम्मान और पवित्रता के साथ खिलवाड़ तो त्रेतायुग से ही शुरू हो गया था। सत्ता के 
लिए भाई भाई के बीच युद्ध और बटवारे की परपम्परा शुरू हो गई। त्रेतायुग में हुए महाभारत के युद्ध ने मानवता का बहुत हनन किया और मनुष्यों में "देने के गुण " में कमी आती चली गई, मनुष्य देवता 
ना रहकर सिर्फ इंसान रह गया। 



★★★★★★

आदरणीय डॉ. सुशील सर
हैवानियत है कि इंसानियत 

किसकी 
रही गलती 
कहाँ हो गई कमी 

इंसानियत 
क्यों हैवानियत 
होती जा रही है 

दानवों की सी 
नोच खसोट जारी है 

कितनी द्रोपदी 

पता नहीं 
कहाँ कहाँ 

दुशासन की 
पकड़ में 
बस कसमसा रही हैं 

★★★★★★

आदरणीया कुसुम कोठारी
न जाने क्या हो रहा है

संस्कार बीते युग की कहानी बन चुके
सदाचार ऐतिहासिक तथ्य बन सिसक रहे
    हैवानियत बेखौफ घुम रही
 नई सदी मे क्या क्या हो रहा है
इंसान इंसानियत खो के इतरा रहा है
और ऊपर वाला ना देख रहा ना सुन रहा ना बोल रहा है
जाने क्या हो रहा है जाने क्या हो रहा है।

★★★★★★

आदरणीया अनीता सैनी
ड्योढ़ी पर बैठी इंसानियत

अदृश्य  में  दृश्य, 
ड्योढ़ी   पर   बैठी   इंसानियत, 
  मटमैले  रंगों का पहन  परिधान,
साँसों   के   बहाव   में  बहती,
अस्थियों   में  आशियाना  अपना  बनाया | 

★★★★★★★

आदरणीया अनुराधा चौहान
 (दो रचनाएँ)

इंसानियत को भूलकर

इंसानियत को ताक पर रखकर
हरदम उनका उत्पीड़न किया
बाहर तिरछी नज़र कर व्यंग्य कसे
ढहना ही था उस घर को एक दिन 
संस्कार बिना खोखली थी उसकी नींव


घर एक मंदिर

बड़ों का आशीष अमृत बरसाए
जड़ों की मजबूत पकड़
बाँधे रिश्तों को बड़े प्यार से
नैतिक नियमों का मूल्य सिखाएँ
इंसानियत का मोल बताएँ
स्त्री का सम्मान जहाँ पर
बेटी की खुशियाँ वहाँ पर
प्रेम जिसका आधार प्रथम हो
बेटों को संस्कार दिए हों

★★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान
इंसानियत ही रीढ़ है...

इंसानियत ही रीढ़ है,
इस मानव समाज की।
होते हैं ऐसे लोग भी,
जो बचाते मानवता की लाज भी।
जिनके दम से ये समाज,
सिर उठाकर जी रहा।
जो स्वयं गरल नीलकंठ ,
बन के है पी रहा।
★★★★★

आदरणीया शुभा मेहता
इंसानियत ....
गुड्डे -गुडि़या खेल -खिलौने 
खेलने थे जब ...
नोंच -नोंच कर खा गए 
इंसान के खोल में 
गिद्ध ,चील ,कौवे
कहाँ का इंसान 
और कहाँ की इंसानियत ।

-*-*-*-
आज का यह हमक़दम का अंक
आपको कैसा लगा?
आपकी प्रतिक्रियाओं की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।

हम-क़दम का अगला विषय
जानने के लिए कल का
अंक पढ़ना न भूले।

#श्वेता सिन्हा

रविवार, 16 जून 2019

1430 एक ही ब्लॉग से...मेरे मन का एक कोना

सादर अभिवादन
आज भी भाई कुलदीप जी नहीं हैं
आज हम प्रस्तुति मे एक नया प्रयोग कर रहे हैं
आज की प्रस्तुति है एक ही ब्लॉग से
वो ब्लॉग है

मेरे मन का एक कोना
ब्लॉगर बहन हैं
आत्ममुग्धा

एक साधारण होममेकर जिसका दिमाग खुराफाती है। सक्रिय मस्तिष्क जो कही भी रचनात्मकता देखता है तो तुरंत अवचेतन मन में सहेज लेता है। अंतरंगी सी हूँ, सतरंगी सपने सजा कर चलती हूँ। छोटी छोटी बातों में खुशियाँ ढ़ूंढ़ती हूँ।

पिता ...
सिर्फ पिता होते हैं
एक समय में
एक ही किरदार होते हैं
वे पूरी तरह से
सिर्फ पिता होते हैं
वे पिघल के
बरसते नहीं हैं
बहुत कुछ सहते हैं
लेकिन 
कभी कुछ भी 
कहते नहीं हैं
पिता
सिर्फ पिता होते हैं


क्या आसान है प्रेम को समझ पाना
शायद नहीं....
पर मुश्किल भी नहीं, लेकिन
इसकी परिभाषा इतनी गहन बना दी गई है कि
साधारण इंसान समझ ही न पाये
असल में प्रेम परिभाषाओं के परे है
बस महसूस कर पाने की अवस्था है

देह के समीकरण से परे देखना कभी उसे
समूचा ब्रह्मांड समेट के रखती  है 
खिलखिलाते लबों के पीछे मुस्कुराती सी
जिंद़गानी सहेजे रखती है 
देखना कभी नजरे मिलाकर, न जाने कितने 
सैलाब समेटकर रखती है 

जीवन की राह में चलते हुए
अचानक दिख जाता है एक आईना
एक वजूद के रुप में
असमंजस होता है 
हुबहू कोई हम जैसा भी होता है
अजनबी होता है,लेकिन 
दिल की गहराइयों में 
स्थापित हो जाता है अनायास ही

हर चीज से परे उसकी हँसी
जादू सी है उसकी हँसी
मुझे चिंतन में डालती
चंचल सी चितवन उसकी 
हर बार वारी जाऊँ जिस पर
ऐसी है उसकी हँसी



तुम देह को भोग कर आना
अपना सारा इश्क़ करके आना
जब बातों से जी भर जाये
तब आना
तुम तब आना 
जब सूरज अस्त होते होते
थोड़ा सा बचा हो
सिंदूरी आसमाँ रात की अगवाई में सजा हो

मैं सपने देखती हूँ
हाँ.....मैं अब भी सपने देखती हूँ
चार दशक जीने के बाद
रिश्ते नातों की लंबी फेहरिस्त में
खुद को घोल देने के बाद
हर कटू शब्द को जीते हुए
कुछ प्रशंसाओं को पीते हुए
अपने अंदर कुछ बचा पाती हूँ
हाँ.....मैं अब भी सपने देखती हूँ

आज अब बस
आज्ञा दें
यशोदा

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