निवेदन।


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मंगलवार, 25 अगस्त 2026

4845....कास के फूल

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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संक्रमित पेड़ के 

एक डाल के कीड़ों 

पर कीटनाशक छिड़ककर

ख़ुश होना कि पेड़

संक्रमण मुक्त हुआ

जबकि सच तो जड़ 

को खोखला कर रहा

भ्रम में जीना 

अच्छा लगता है हमें।

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आज की रचनाऍं-


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

4844...प्रवासी पंछी अनजान देश में ढूँढे बसेरा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं सोमवारीय अंक में पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

सरगोशियों के स्वर 

कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है" कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है"

*****

खोज

जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में

 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

प्रवासी पंछी

प्रवासी पंछी

अनजान देश में

ढूँढे बसेरा

 

छूटे माँ बाप

छूटा कुल कुनबा

गाँव शहर

*****

ग़ालिब हुआ

कोई इधर गया, कोई उधर गया

कोई भी न मेरी जानिब हुआ

न मिलता है वो, न करता सलाम 

जब से वो शख़्स साहिब हुआ

*****

इस्मत चुगताई: बागी तेवरों वाली लेखिका, ज‍िन्होंने मौत के बाद दफ्न होने के बजाय दाह-संस्कार को चुना

ल‍िहाफ नामक कहानी ने उस दौर की महिला लेखिकाओं के लिए खींची गई 'लक्ष्मण रेखा' को हमेशा के लिए पार कर लिया. इस्मत चुगताई ने वो बंद दरवाजा खोल दिया, जिससे होकर आने वाली कई पीढ़ियों की लेखिकाओं ने समाज के तमाम वर्जित (taboo) और अछूते मुद्दों पर बेखौफ होकर अपनी आवाज बुलंद की. 

 *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

रविवार, 23 अगस्त 2026

4843...आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक की चुनिंदा पाँच रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

******************   

 हाइकु मुक्तक - सावन

आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई 

फूल ही फूल, चूनर में अपनी, टाँक ले आई 

बरसी बूँदें, गरजे घन घटा, तड़पे जिया

हर्षित धरा, लहरा के आँचल, ले अँगड़ाई !

*****

तेरी यादों से ओझल हो गया तो

बहाते हो जो भर-भर अश्क़ छुप कर,
ये रेगिस्तान जंगल हो गया तो.

रहेगा काम क्या लोगों पे बाक़ी,
धरम का मसअला हल हो गया तो.

*****

865. इंतज़ार

बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

उसकी पसंद की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है

उसका साफ़-सुथरा बिस्तर। 

*****

ऋतुएं

सूखे आषाढ़ के बाद सावन का हरा होना

केवल कल्पना है 

किसान बोएगा फिर भी धान 

इस उम्मीद में कि भादो जरूर बरसेगा

और भादो है कि

कई सालों से या तो खूब बरसा है

या एकदम ही नहीं 

*****

वास बन आ जा प्रिये

तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे 

प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से ,

समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये

तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 22 अगस्त 2026

4842 ...मर्यादा के ताले जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर 'किस पथ जाऊँ?'

 सादर अभिवादन 


लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखेंअगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
विषयः  रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
कृपया नोट करे

पसंदीदा रचनाएं




गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं




गीदड़ों के झुंड ने कब्जा किया है मकानों पर,
बन बैठे हैं राजा, मानो हैं आसमानों पर।
​बोलते हैं यूँ कि मानो वह हैं प्यारे मेमने से,
दुनिया है जालिम और वे हैं बिल्कुल छौने से।
​बातें करते हैं यूँ जो मानो वही हरदम सही,
धोखे में रखकर सबको वे जमाते अपनी दही।




गड़-गड़, गड़ -गड़ बोले बदरिया।
चम-चम,चम-चम चमके बिजुरिया।हो रामा,
हरि बोलो !अजब आवाज आबे, अम्बर से हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना...........





मरती है स्त्री
सुबह -शाम
घुट-घुटकर
अटकती हैं साँसें पसलियों में
दर्द बन जाता शिलालेख
सूखे अधरों का
किससे कहें, कैसे कहें
मर्यादा के ताले
जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर
'किस पथ जाऊँ?'




कई सौ साल पहले
सदी का आख़िरी ग्रहण उतरा
सूरज के पाँव में
कालिख उतर आई
और एक पहर
समय से बाहर सूख गया।
*****
सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

4841....पर एक ऐसा दिल है...

 शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।
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चार दिन की बारिश में

गंदला जल हर सीमा लाँघ चुका,

नक्शे पर बनी रेखाएँ डूब गई।

खेत, आँगन, चौखट और सड़क—

सब एक ही विशाल, निष्ठुर नदी बन चुके हैं।


​पेड़ों की डालियों से लटके

प्लास्टिक के डिब्बे, कपड़े, और भूली-बिसरी यादें।

दूर बहती जाती है किसी बच्चे की आधी डूबी गेंद,

पीछे छूट जाती है

सालों की हाड़-तोड़ कमाई।


​राहत की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए

छतों पर कैद इंसान,

जहाँ भूख से ज़्यादा बड़ा है डर—

धीरे-धीरे चढ़ते पानी का।


​पानी जब उतरता है,

अपने पीछे छोड़ जाता है

बदबूदार कीचड़, बीमारियॉं,

एक थका हुआ शहर और

शून्य के घेरे में छटपटाता

मजबूर आदमी...।



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आज की रचनाऍं- 


उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।

वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।

उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।



फिर सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !







बड़ी दुश्मनी है तो देखेंगे हम भी 
कि तलवार मुझ पर चलाते हो कैसे 

जली जिंदगी पर न निकले फफोले 
बताओ हमें ग़म को खाते हो कैसे 

जहा‌ॅं पर बिताई थी बचपन की दुनियां 
उन्हीं बस्तियों को जलाते हो कैसे 


जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।
रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?


धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
------
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
सादर।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

4840 ..आमतौर पर सत्ता कान रहित होती है

 सादर अभिवादन 

लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखें अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
विषयः रक्षाबंधन, तीज व्रत, रतजगा
पिछला अंक

पसंदीदा रचनाएं



आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है

जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।

जनता की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,





और देर तक प्रतिध्वनित होती रही मेरी ही आवाज़ 
मेरे कानों में 
और तैर गई एक आश्वस्ति उसके चेहरे पर।
यह सब सच था या मेरा भ्रम 
मुझे पता नहीं 
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी 
जी हां!
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी





एक दिन बारिश की बूंदों को टपकते हुए देखा 
टपकते ही आपस में मिलते हुए देखा 
न उन्हें टूट जाने का गम था 
न उन्हें बादल से बिछड़ जाने का गम था 
बच्चों की किलकारी और हंसी में 




उसने अपनी पसंद से शादी की
रंडी कहलायी 
बाल कटवाये तो परकटी
जो जींस पहन ली 
तो रांड शब्द उपहार मिला
उसने साड़ी पहनी जो दिखी नहीं 
सूट, बिंदी, चूड़ी 
नजरअंदाज किये गये




यह सिर्फ धागों की बुनावट नहीं
अनकहे जज़्बात हैं,
हर रंग में छुपी हुई, एक अलग ही बात है
कुछ सिलवटें हैं संघर्ष की, 
कुछ रंग हैं खुशियों के,
स्त्री और साड़ी की ये जोड़ी,
सदियों की खूबसूरत सौगात है




पलायन शुरु हो गया
इस चेतावनी के साथ
ध्यान रखना 
गलती से भी किसी 
मानव आबादी की ओर मत जाना
वे डरने का नाटक करेंगे
और
मारकर हमें ही आदमखोर करार दे देंगे।
अलविदा दोस्तों...




चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, 
अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।





नदी के दोनों किनारों की है अपनी
ही एक अलग कहानी, एक
तरफ जनशून्यता, दूसरी
ओर अंतहीन कोलाहल,


सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 19 अगस्त 2026

4839..अनवरत यात्रा

 ।।प्रातःवंदन।।

एक किरण आई छाई,

दुनिया में ज्योति निराली,

रंगी सुनहरे रंग में

पत्ती-पत्ती डाली डाली।

एक किरण आई लाई,

पूरब में सुखद सवेरा,

हुई दिशाएं लाल

लाल हो गया धरा का घेरा।

एक किरण बन तुम भी

फैला दो दुनिया में जीवन..!!

सोहनलाल द्विवेदी

बुधवारिय प्रस्तुति में पढिए..

जन-जन का मन भी प्रज्ज्वल हो 



नीले नभ में देख तिरंगा  

हर भारतवासी को गर्व है, 

वीरों के बलिदानों से ही 

आया आज़ादी का पर्व है !..

✨️

फ़ितरत

अनवरत यात्रा है,

यह जिंदगी हर पल।

नई आदतों के बनने और

पुरानी आदतों के ढहने की ।

जमती जाती हैं हर,

परवर्ती परत-दर-परत।

✨️

तुम ही तो हो....

एक लड़की है...

जो हर पाँच मिनट में कुछ न कुछ भूल जाती है,

कभी फ़ोन कहाँ रखा, कभी चश्मा कहाँ छोड़ा,

कभी खुद ही पूछकर अपना सवाल तक भूल जाती है।

✨️

इसलिए नहीं आ सका

याद तो आई थी माँ

अपने जन्मदिन पर 

तुझे याद कर मेरी 

आँख भी भर आई थी,

जब यारों ने बाज़ार से लाकर 

रेडीमेड केक खिलाया था..

✨️

अच्छा जिसका नसीब होता है, दोस्त उसके करीब होता है,

जो साथ हँसता और रोता है, सच्चा दोस्त वही होता है, 

राह में पड़ते हो काँटे अगर, हटा के उन्हें फूल वो बोता है

दिल गर कभी उदास हो तो, साथ अपना भी चैन खोता है,

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



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