निवेदन।


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बुधवार, 18 मार्च 2026

4685..आगत की आहट ..

 ।।प्रातःवंदन।।

"मन से; वाणी से, कर्मों से,

आधि, व्याधि, उपाधि हरो।।

अक्षय आत्मा के अधिकारी,

किसी विघ्न-भय से न डरो।।

विचरो अपने पैरों के बल,

भुजबल से भव-सिन्धु तरो।।

जियो कर्म के लिए जगत में-

और धर्म के लिए मरो।।"

-मैथिलीशरण गुप्त 

चलिए आज शुरुआत हुई सोच ,विचार से ..बढते है प्रस्तुतिकरण की ओर✍️

उसने मेरा हाथ थाम लिया था

सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता। ..

✨️

प्रकृति से दूर


कल-कल, निश्छल, सी ये नदियाँ,

छल-छल, अविरल, बहती जाती सदियाँ,

निरंतर, इक प्रवाह यहाँ,

पर, दूर कहीं, प्रकृति से, मैं कहाँ!..

✨️

वह लड़का है - लघुकथा

राधिका बहुत खुश थी ! उसके परंपरावादी परिवार ने बड़ी कशमकश और तनातनी के बाद अंतत: बड़े भैया माधव के अंतरजातीय विवाह के लिए अनुमति दे ही दी ! उनके रूढ़िवादी ब्राहमण परिवार में यह एक ऐतिहासिक फैसला था कि माधव का विवाह उसके साथ पढ़ने वाली रागिनी के साथ होने जा रहा था ! यद्यपि उसके..

✨️

 मेरी साँसों में अटकी तुम

तुम गई तो

दरवाज़ा बस

हल्के से बंद हुआ,श

पर कमरे में

कुछ रह गया था। .

✨️

विष पान - -



हर एक वक्षःस्थल है एक गहन सरोवर लेकिन

कमल नहीं खिलता हर किसी के सीने में,

कुछ कुहासों को छुपाए नयन कोरों

में हर चेहरा चाहता है सुबह का

मधुर आलिंगन, एक अद्भुत

सुख छुपा होता है जान..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


मंगलवार, 17 मार्च 2026

4684...कौओं की पंचायत से...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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भूख के एहसास पर
आदिम युग से
सभ्यताओं के पनपने के पूर्व
अनवरत,अविराम
जलते चूल्हे...
जिस पर खदकता रहता है
अतृप्त पेट के लिए
आशाओं और सपनों का भात, 
जलते चूल्हों के
आश्वासन पर 
निश्चित किये जाते हैं
वर्तमान और भविष्य की
परोसी थाली के निवाले
 उठते धुएँ से जलती
पनियायी आँखों से
टपकती हैं 
 मजबूरियाँ
कभी छलकती हैं खुशियाँ,
धुएँ की गंध में छिपी होती हैं
सुख-दुःख की कहानियाँ
जलती आग के नीचे
सुलगते अंगारों में
लिखे होते हैं 
आँँसू और मुस्कान के हिसाब
बुझी आग की राख में
उड़ती हैंं
पीढ़ियों की लोककथाएँ
बुझे चूल्हे बहुत रूलाते हैं
स्मरण करवाते हैं
जीवन का सत्य 
कि यही तो होते हैं 
मनुष्य के
 जन्म से मृत्यु तक की 
यात्रा के प्रत्यक्ष साक्षी। #श्वेता


आज की रचनाऍं- 
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कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।



पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !

जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 





मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।


मगर
मेरी आवाज़
समुंदर के शोर में
कहीं खो जाती है,
तुम तक पहुँचने से पहले ही
पानी उसे निगल लेता है।



समय की कमी थी। शादी ब्याह के कार्यक्रम भी अटेन्ड करना थे अतः बहुत लंबा न रुक पाए मगर जितना भी रुके पाण्डे दंपति की मेहमान नवाजी ने दिल जीत लिया। हमारे साथ हमारे साडू भाई भी थे वो भी शहर के इतना नजदीक गाँव के माहौल से बहुत प्रभावित हुए। खास तौर पर पाण्डे जी के सानिध्य में चिड़ियों का दाना चुगना उन्हें काफी भाया।

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 16 मार्च 2026

4683 ..विश्व कीर्तिमान की ओर बढ़ते कदम

 सादर अभिवादन 

आज भी भाई रवीन्द्र जी नहीं हैं
बिना किसी लाग-लपेट के
रचनाएं देखें



चंगों को;
नंगों को;
बनावटी भिखमंगों को,
कभी भी मत दान करो





विश्व कीर्तिमान की ओर बढ़ते कदम
​12 फीट 8 इंच की यह विशालकाय तुलसी संभवतः दुनिया की सबसे ऊँची तुलसी है। इस प्रामाणिक माप के आधार पर अब हम इस अद्वितीय उपलब्धि को 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' और 
'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज कराने हेतु शीघ्र ही आधिकारिक आवेदन प्रस्तुत करने जा रहे हैं।
​सफलता का मंत्र: रसायनों को 'ना' और प्रकृति को 'हाँ'





ओ कान्हा! तू बाँसुरी की मीठी धुन,
रोज सुनाया कर मुझको।

आग की लपटें जब भी घेरें,
 शीतल कर आया कर मुझको।

लहराते तूफानों का शोर दबा,
 मधुर बनाया कर मुझको।





रविवार  की सुबह सुहानी 
बुला रही है घर को आओ !

 कर्मयोगी आधुनिक युग के 
कह सकते हैं जिन्हें तपस्वी, 
 न खाने की सुध न निद्रा का
 निश्चित रहा समय है कोई !

सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 15 मार्च 2026

4682..अपनी कब्र का कौन परवाह करता है..सब पड़ोसी की साज सज्जा देखते हैं

 सादर अभिवादन 

बिना किसी लाग-लपेट के
रचनाएं देखें




एक कदम
दूसरा कदम
तीसरा कदम
चौथा भी
फिर कोई कदम नहीं। 

***

पेड़ पर घोंसला
लटका रहा पूरे साल
पक्षी लौटा 
और 
टूट गई घोंसले वाली वो डाल।




और बाउजी कैसे हो.......... 
संजय के मुंह से ये सुनते ही नरेंद्र बाउजी के दिल का गुबार सा फूट पड़ा..... 
एकदम बोले 

"अब तक ठीक थे."
क्यूँ! अब क्या हुआ? संजय ने पूछा 

कुछ नहीं भाई, खाने के लाले पड़ गए -लगभग रोते हुए बाउजी बोले.

क्यूँ! बिजनेस में घाटा हो गया क्या -संजय ने चिंतित होते हुए पूछा.

अरे नहीं! गैस खत्म हो गई -बाउजी ने बताया.




भूख की आँखों में जलते प्रश्न हैं,
उनसे आँखें आप भर कर देखिये

तालियों से सच बदलता ही नहीं,
आईनों से भी गुज़र कर देखिये





स्वप्न देखा है मानव ने
न जाने कितनी-कितनी बार
लायेगा चिरस्थायी शांति
इक दिन वह
स्वर्ग से धरा पर उतार
चैन की श्वास लेंगे जब जन
 बहेगी प्रीत की बयार.. 





‘उलूक’ पूरी जिंदगी कट जाती है 
खबर दूर देश की चलती चली जाती है
अपने बगल में ही खुद रही कब्र से 
मतलब रखना उसपर बहस करना
उसकी खबर को 
अखबार तक पहुँचने देने वाले से बड़ा बेवकूफ 
कोई नहीं होता है ।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 14 मार्च 2026

4681 ...भाषा टकटकी बाँधे कुछ लिखने को कहती है ,,,

 सादर अभिवादन 

अगले शनिवार को शायद सिमई बनेगी
पता नही क्य़ूं
रचनाएं की ओर चलें...



कोरे कागज की निःशब्द 
भाषा टकटकी  
बाँधे कुछ लिखने को कहती है
सुख - दुख , आशा - निराशा
राग - विराग , तृष्णा और तोष




कट ही जाएगी, ये जिंदगी.... 
कुछ तुम्हारे साथ में, कुछ तुम्हारी याद में!

रेत में लिपटी, लंबी ठंड सी रात में,
इस धूप में, उन उम्मीदों की बरसात में,
अनबुझ से, जज्बात में,
तेरी चुप-चुप सी, हर बात में!




जीवन मिल सके सबको, इसलिए
तुम्हें जीते जी मरते देखा है।
तुमने ही तो दी है सबको,
आज जो परिवारों की रूपरेखा है।
कौन हो तुम कब से सोच रहे हो, 
सुनो! वही मर्द है ये,
जिसे तुमने हर रोज शीशे में देखा है।




एक समय था 
जब हिन्दू 
ब्राह्मण राजा 
रावण से 
अपनी पत्नी को छुड़ाने
के लिए 
वनवासी राम को 
लंका पर चढ़ाई 
करनी पड़ी 




संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 




बुद्धिमान गदहा
व्यापारी ने एक नहीं मानी।
हारकर धोबी ने व्यपारी  को 
अपना गदहा दे दिया।
गदहे को अपने मालिक की 
विवशता देखी नहीं जा रही थी।
सोचा व्यपारी के साथ ना जाए।
पर नहीं जाने से भी 
उसके मालिक को पर



सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

4680... स्वतंत्रता का अर्थ...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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पंछी, 
तुम्हारे परों में ताक़त है, 
आसानी से जा सकते हो तुम 
हज़ारों किलोमीटर दूर,   
मगर पंख उड़ने के लिए होते हैं,
भागने के लिए नहीं। 


दबा-दबा के गए जो सारे पाँव, वह अपने ही थे।
दोष क्या तुम्हारा नहीं था, जो तुम दबते ही गए।
​हर किसी पर कर्ज उसका खुद का भी होता है।
फिर क्यों मौन का पर्दा उसको ढकता रहता है।
​फूल खिलाना है तो उठो चीत्कार करो।



जिसके हर कोना ,अलग -अलग रंगों से सजा हो 
  खुशी देते थे ये रंग ....
    रंगीन चादरें करीनें से लगी हुई 
       बडी सुकून भरी नींदें दे जाती थी ..
     अब ,ये सफेद दीवारें , अलमारी ,चादर 
       भाती नहीं मन को ..





जब सबको प्यार चाहिए तो ये नफ़रत कौन परोस रहा है। इतनी नफ़रत कि इंसान को इंसान ही न समझें। दुनिया की नफ़रत के बारे में ड्राइंगरूम या सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने या ज्ञान देने के बाद वक़्त मिले तो यह ज़रूर सोचना चाहिए कि एक व्यक्ति के रूप में हमारे भीतर कितनी हिंसा है। हमने कितनी बार हिंसक व्यवहार किया। किसके साथ किया। हिंसा को किस तरह समझा।



"स्वतंत्रता का अर्थ रिश्तों को तोड़ना नहींबल्कि रिश्तों में अपनी पहचान को ढूँढना है. संबल केवल सहारा नहीं, बल्कि वह विश्वास है जो आपको तब भी उड़ने की शक्ति देता है जब हवाएँ खिलाफ बह रही हों.


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 12 मार्च 2026

4679 धूप पड़ी, लहरें चमकीं उसकी लाचारी प्रतिभा घोषित हो गई।

 सादर अभिवादन 

आज पम्मी जी नहीं है
शायद भूल गई
चलिए चलें 
आज की ताजी रचनाएं देखें



तुम चाहो मैं ध्यान करूँ 
मैं चाहूँ उड़ान भरूँ 
तुम चाहो मैं घर में बैठूँ 
मुझे नापनी दुनिया सारी

जीवन का निचोड़ यही है 
तू-तू मैं-मैं होगी ही 
गले मिलने से विचार मिलेंगे 
सोच है बिलकुल बचकानी





कली क्या करती है फूल बनने के लिए
विशालकाय हाथी ने क्या किया
निज आकार हेतु
व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए
वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास
आदमी क्यों बौना हुआ है





कभी भी न सिमटने वाला 
सन्नाटा.., 
फासला तो अधिक नहीं है 
हमारे बीच
मगर सोचों  की गहराई का 
छोर..,




एक मछली थी—
उसे तैरना नहीं आता था।
वह धारा के साथ
बस बह रही थी।

धूप पड़ी,
लहरें चमकीं—
और उसकी लाचारी
प्रतिभा घोषित हो गई।





“हाँ पापा, मेरे आते ही मेहमानों के आने का उल्लेख चल निकला और मैं यह पत्र और आप सबको बता नहीं पायी. मेरी नियुक्ति बनस्थली विद्यापीठ में टीचिंग असिस्टेंट के पद पर हो गयी है. मैं इसके साथ ही एम.एससी. और पीएचडी कर सकती हूँ. बल्कि अपना खर्च उठाने के साथ ही कुछ बचा भी सकती हूँ.”

गुप्ताजी की आँखें सजल हो गयी थीं. गुप्ता जी ने पास बैठी शगुन को अपनी छाती से लगा लिया. 
अब शगुन की आँखें भी छलकने को थीं.


बस
फिर मिलूंगा
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