निवेदन।


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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

4718 ..वह खाना इतना अच्छा बनाती थी कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी

 सादर अभिवादन

रविवार, 19 अप्रैल 2026

4717...सब दर्शन को थे लालायित, प्रथम दर्शन हों शिशु राम के...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

भार्गव राम

जब जाना ऋषियों मुनियों ने,

भीड़ जुटी  ऋषि आश्रम पर।

सब दर्शन  को थे  लालायित,

प्रथम  दर्शन हों शिशु राम के।।

*****

'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख)

चंदर सुधा से प्रेम तो करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान और व्यक्तित्व पर हावी उसके आदर्श कुछ ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता। सुधा की नजरों में वह देवता बने रहना चाहता है और होता भी यही है। सुधा से उसका नाता वैसा ही है, जैसा एक देवता और भक्त का होता है। प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद्व उपन्यास के ज्यादातर हिस्से में बना रहता है। नतीजा यह होता है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है और अंत में उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ता है।

*****

शांति लाउंज: कहानी (सुशील कुमार)

नीचे उतरते ही शोर छँटने लगा — कदमों की आहट, बच्चों की हँसी, दुकानों के कनफोड़ संगीत — सब पीछे छूट गए। बेसमेंट में हल्की ठंडक थी और दीवारों पर नीली धुँधली रोशनी फैल रही थी। बीचों-बीच एक पारदर्शी केबिन था, जिस पर लिखा था — शांति लाउंज – पाँच मिनट का पूर्ण मौन अनुभव; नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — कृपया अपनी आवाज़ अपने भीतर रखें। शीशे के पार दो-तीन आकृतियाँ धुँधली दिखीं। उसने फोन साइलेंट किया और काउंटर की ओर बढ़ी।  

*****

खेद

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती हैलिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

*****

इसरो का पीएसएलवी-सी ५२

जून आज सुबह जल्दी चले गये।शनि व रविवार को उन्हें असोसिएशन के काम में और अधिक समय देना होगा।वह अपने कार्य में बहुत रुचि ले रहे हैं, और उन्हें अपने काम में बहुत आनंद आ रहा है। उसने काव्यालय में एक कविता प्रकाशित की। छोटी ननद ने बताया छोटे पुत्र का कॉलेज दो वर्ष के बाद खुल रहा है। 

*****

शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों... क्यों शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता

सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

▪️ क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :- सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 18 अप्रैल 2026

4716 ..रंगाली बीहू के किस्से तय हो जाते जीवन भर के, आँखों ही आँखों में रिश्ते

 सादर अभिवादन

सप्ताहान्त शुभ हो
रचनाएं ....



हरे साग-सब्जियाँ पकाती, 
माँ का काम बहुत बढ़ जाता 
दुनिया भर में इस उत्सव का, 
अब हर कोई नाम जानता 

कुदरत के इस मधु उत्सव में, 
रंगाली बीहू के किस्से 
 तय हो जाते जीवन भर के, 
आँखों ही आँखों में रिश्ते 





पञ्च तत्व से तन बना , 
रखे इसे संभाल । 
पंछी इक दिन उड़ चला , 
छोड़ सभी जंजाल।। 
साँस साँस की बात है, 
साँस लगे अनमोल। 
राम नाम की साँस ले, 
साँसें करें कमाल।।




“मैं समझ गयी.” प्रिया ने मुसकुराते हुए कहा, “आप मुझे अपना असिस्टेंट वकील दिखाना चाहते हैं. 
बस एक कोट की कमी है, तो कल मैं एक काला समर कोट खरीद लूंगी. 
अब तक यूनियन दफ्तर में जिन्होंने मुझे देखा है वे भी मुझे आपका असिस्टेंट वकील समझने लगेंगे.”
तय हुआ कि जिरह के वक्त प्रिया वकील के आउटफिट में चव्हाण की सहायता के लिए उपलब्ध रहेगी.



रंग तो दो ही थे, उनसे ही
अद्भुत रचना कर दी ..
मिट्टी पर बनी आकृतियाँ
सजीव हो उठीं , गीत गाती
गुनगुनाती छवि से उसकी
मैत्री है चिरंजीवी ।






पास रखी वो खाली कुर्सी,
किसी अपने का इंतज़ार करे,
या खुद से मिलने का मौका,
कुछ पल दिल को उपहार करे।
ये कॉफी नहीं, एक एहसास है,
थोड़ा शहर, थोड़ा गाँव है,
भागती दुनिया के बीचों-बीच,
ये पल ही तो असली ठहराव है।




सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

4715 ..आज बारिश बरसते हुए मेरे साथ मुस्कुराई

 सादर अभिवादन

आज श्वेता जी नहीं है
शायद कल मिलेंगी

रचनाएं ....




“हाँ माँ… वो तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—

थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-

“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली! देखना मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, उसने खिड़की बन्द नहीं की।





आज बारिश बरसते हुए 
मेरे साथ मुस्कुराई 
उसने कहा, आज मैं 
आँखों के पानी की तरह 
नहीं बरसूँगी 
मुस्कुराहट के मोतियों सी 
बिखरुंगी 
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी 
खिड़की के शीशे पर 






इतिहास कह रहा है ज़रा सी न भूल हो
स्वार्थ की तनिक सी भी मन पर न धूल हो
शृंगार करें मिलके सभी राष्ट्र-धर्म का
हाथ में सद्भाव का सुन्दर-सा फूल हो ।।







मैं मुखड़ा गाता,
तुम अंतरा गातीं
या गीत के सम पर किसी
वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी
थाप अपनी हथेलियों की,
लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,
पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।
या फिर .. 
बतकही पर मेरी किसी, 
"वाह-वाह" ना सही,
निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...





समंदर के देश में मछलियां मरती नहीं है
उनकी सामूहिक हत्या की जाती हैं
मेरे देश की तरह उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है
हां मेरे देश की तरह वहां हत्यारे
पुनः पुनः आ जाते हैं बेखौफ



सादर समर्पित
सादर वंदन

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

4714 ...पेड़ ! सावधान रहना राजमार्ग से सटा जंगल अब सबकी निगाह में है।

 सादर अभिवादन

किताबें और माँ बाप की बातें 
जिंदगी में  कभी धोखा नहीं देती


रिश्तों को रिश्तेदारों पर मत छोड़ो, 
खुद अपने निर्णय लें 
आपस मे बात करें, अगर
अपनी गलती हो तो स्वीकार करें।

रचनाएं ....



हमने तुम्हें
हमेशा शक की नज़र से देखा

तुम हँस दो तो
“इशारा”
तुम चुप रहो तो
“घमंड”

तुम किसी से बात कर लो तो
“चरित्र”
और न करो तो
“रहस्य”

तुम्हारे जीवन का हर रंग
हमने
अपनी सुविधा से तय किया।




लिख डाले कितने खत
जोश में हमने
तुम्हारे लिए

कितने ही कोरे कागज
रंग डाले हमने
तुम्हारे लिए




कविता सिर्फ शुरुआत है—
और वही कविता सबसे पूरी है
जो अधूरी रह जाती है,
क्योंकि
कविता कभी पूरी नहीं होती।




पेड़ !
सावधान रहना
राजमार्ग से सटा जंगल
अब सबकी निगाह में है।
फ्लाईओवर, मोबाइल टावर, सिगरेट, आरियां, 
सब दिन दहाड़े घात लगाए बैठे हैं...





इनके बचपन के संग - संग में 
अपना बचपन जी लेती हूँ 
मेरे आँगन हर दिन आये 
ऐसे ही बचपन का झोंका 
जिनमे झूम के मैं गाऊँ 
हर दिन खुशियों से भर जाऊँ ।





काफी दिनों बाद पति का स्पर्श कलाई पर महसूस हुआ तो वह भावुक हो गई। पति बोला " चलो अपने घर चलते हैं। " इतना सुनते ही रौनक बोली " तलाक के कागजों का क्या होगा..??? " पति बोला " फाड़ देंगे। इतना सुनते ही वह दहाड़ मार कर पति के गले से चिपट गई। 




तन्मयता से अभ्यास वह,कर रहा था तीर चलाने का ।
अलग-अलग अंदाज में ,निशाना वह वहांँ लगाने का।
ध्यान भंग कर गुरुवर ने पूछा,कौन तुम्हारे गुरु है तात। 
कौन तुमको तीर चलाने की,यह  विद्या देते हैं सौगात।
कहा एकलव्य ने विनीत भाव से,मैंने गुरु आपको माना। 


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

4713..नूतन वर्ष फले-फूले

।।भोर वंदन।।
बुधवारिय प्रस्तुति कुछ इस तरह से है आप सभी जरूर नजर डाले 
इन पंक्तियो के साथ 
ओ आस्था के अरुण!
हाँक ला
उस ज्वलन्त के घोड़े।
खूँद डालने दे
तीखी आलोक-कशा के तले तिलमिलाते पैरों को
नभ का कच्चा आंगन!

बढ़ आ, जयी!
सम्भाल चक्रमण्डल यह अपना..!!
अज्ञेय
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फसल कटी है !

खुशी की घङी है !

बहुत दिनों बाद

भूले सुर आए याद..
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कल दोपहर नन्हा और सोनू असम की यात्रा समाप्त होने से तीन दिन पहले ही वापस आ गये। कल शाम सोनू की कोविड की रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी है, नन्हे को भी सिर में दर्द था। पूरी दुनिया में कोरोना का नया वेरियेंट ओमिक्रॉन बुरी तरह फैल रहा है। प्रतिदिन लाखों लोग इससे संक्रमित हो रहे हैं। अब दस दिन तक पुन: उन्हें बिना मेड और कुक के रहना होगा। आज सुबह नींद देर से खुली।सुबह पानी पीकर, तैयार होने के लिए जल्दी में सीढ़ियों से ऊपर आते समय नूना की चप्पल अटक गई और बायें घुटने में हल्की चोट लग गई। जून ने बहुत ..

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व्यक्ति


इतना भरा भी नहीं कि..
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एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की 

नर्म देह पर..

टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच


घुटनों के बल झुककर

मैंने तुम्हारा नाम लिखा था

अपनी तर्जनी की नोक से..
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और मैं उसे ही भूल जाता हूँ।

उसे रहता है 

किस फ़ंक्शन में

मैंने किस रंग की शर्ट पहनी थी,

किस पल

मैंने भीड़ में

किस लड़की को ज़रा ज़्यादा ..
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।।इति शम ।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

4712...प्रेम में व्याकुल हुआ मन

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
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*जो झुक सकता है वो झुका भी सकता है।
 जीवन लंबा होने की बजाए महान होना चाहिए। 
* कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।
 * एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।
 * धर्म मनुष्य के लिए बना है न कि मनुष्य धर्म के लिए।

*देश के विकास से पहले हमें अपनी बुद्धि के विकास की आवश्यकता है।
आज
स्वतंत्र भारत के महान संविधान के रचयिता 
बाबा भीमराव अंबेडकर जी की जयंती पर 
पूरा भारत उन्हें याद कर रहा है।

किसान और फसल भारतीय संस्कृति में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। फसल के हर मौसम को देश के 
विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से उत्सव की तरह
मनाया जाने की परंपरा अनेकता में एकता का बेजोड़ उदाहरण है। इसी समृद्ध कड़ी में हर वर्ष 14-15 अप्रैल को 
विशेष रूप किस रूप में मनाते है आइये जानते हैं-
 पंजाब और हरियाणा में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू,बंगाली समुदाय का पोइला बोइशाख, केरल में
 विशु कानी,तमिल में पुथंडु, बिहार,मिथिलांचल में सतुआनी... मुझे इतनी ही जानकारी थी अगर आपको 
 इस संबंध में कुछ और पता है तो कृपया जरूर साझा करें।
क्षमा चाहेंगे
 आज भूमिका काफी लंबी हो गयी है।
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आज की रचनाऍं- 


लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।


 मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 


प्रेम  की  सूक्ति  रही   ,क्यों  प्रेम  से  भयभीत  है 
प्रेम  निर्मल  भावना  है , ईश की  यह  प्रीत  है 

प्रेम  न  उन्माद  होता , न  हार  होता  जीत  है 
प्रेम  में  व्याकुल  हुआ  मन, प्रेम  आकुल चित है 

प्रेम  से  रहना  पड़ेगा,  प्रेम  से  बढ़ना  पड़ेगा 
प्रेम  की  ताकत मिली तो ,जीत  हुई  निश्चित  है 


ब्रह्म कमल की खुशबू इसमें 
गंगा निर्मल बहती है,
भक्ति भाव से सरयू माता 
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ 
निधि वन में रास रचाते हैं.






अपने इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह बोले कि बताओ तो जरा- बनारस से चुनाव जीते हैं और दिन रात योगा दिवस की रट लगाते हैं। यह बनारस का और बनारसी पान का सरासर अपमान है। इतना कहते हुए उनके भीतर का नेता जागा और वो कहने लगे कि या तो बनारस से इस्तीफा दो या योगा बैन करो। घँसु ने भी सदा की तरह हाँ मे हाँ मिलाई। तिवारी जी ने तब तक सुबह सुबह हुए पान के नुकसान और कुर्ता खराब हो जाने के लिए योगा को गरियाते हुए नया पान मुंह में भर लिया। अब वे कुछ घंटे मुंह में पान घुलाएंगे और मौन चिंतन में डूबे रहेंगे।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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