पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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बुधवार, 24 जनवरी 2018

922..तारीफ तो बनती है..


।।प्रातः भोर वंदन।।
🙏

आज जिंदगी का सार लिखते हैं..

तारीफ के चंद लफ्ज़ कई 

रिश्तों में ताजगी 

ला देती है ।बड़े हो या छोटे

 प्रंशसा,प्रोत्साहन व्यक्ति के मनोबल और मानसम्मान  का पुरस्कार है सो अब 

सराहना खुल कर करें ..

कभी - कभी ये चंद शब्द आत्मिक संतुष्टि

 के साथ - साथ जिंदगी भी बदल देती है...✍



अब रुख करतें हैं लिकों पे..




संजय ग्रोवर जी, की गज़ल...


माफ़िया एहतिराम करता है

तुम्हारा डर है माफ़िया की ख़ुशी

माफ़िया ऐसे काम करता है



पंकज भूषण पाठक "प्रियम" जी,की रचना..




शुरू हो गयी है फिर से अयोध्या की कहानी 

होगा कोर्ट में फैसला ,शुरू हो गयी जुबानी 

हे राम तेरे नाम साकेत हो रहा बदनाम 

तुझे तरस नही आती,क्यों नही तुम आजाते राम ।




किशोर चौधरी जी की रचना..


शैदा का अर्थ है जो किसी के प्रेम में डूबा हो.

सोचता हूँ कि मैं किसका शैदाई हूँ. सतरंगी तितलियों, बेदाग़ स्याह कुत्तों, चिट्टी बिल्लियों, भूरे तोतों, कलदुमी कबूतरों, गोरी गायों, चिकने गधों, ऊंचे घोड़ों, कसुम्बल ऊँटों से भरे इस संसार में कोई ऐसा न था, जिसके लिए जागना-सोना किया. पढने-लिखने में कोई तलब इस तरह की न थी जिसके बारे में बरसों या महीनों सोचा हो कि ऐसा हो सका तो वैसा करेंगे.

ज्योति खरे जी, की कलम से...



सफर से लौटकर 

आने की आहटों से

चोंक गए

बरगद, नीम, आम

महुओं का 

उड़ गया नशा 



रामबिलास गर्ग जी की रचना...

कलैक्टर साहब, आपने हमारी स्कूल खोलने के आवेदन को रद्द कर दिया ? भला क्यों ? -- 
आगंतुक ने ऑफिस में घुसते ही प्रश्न किया।

क्योंकि वो जमीन सरकार की है , और वहां बाजू में आपने जो गौशाला खोली हुई है 
वो जमीन भी सरकार की है। कलैक्टर ने जवाब दिया।



और अंत करती हूँ ..
दिगंबर नसवा जी की खूबसूरत कृति से..



तुम्हारा प्यार

जैसे पहाड़ों पे उतरी कुनमुनी धूप

झांकती तो थी मेरे आँगन  

पर मैं समझ न सका

वो प्यार की आंख-मिचोली है

या सुलगते सूरज से पिधलती सर्दियों की धूप..



नमस्कार के साथ आज यहीं तक कल फिर नई रचनाओं के साथ..

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह..✍


एक क़दम आप.....एक क़दम हम
बन जाएँ हम-क़दम का तीसरा क़दम 
इस सप्ताह का विषय
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यह चित्र देखकर आप पच्चीस विषयों में रचना लिखसकते हैंः
मसलनः तितली, फूल, मकरंद,पराग, मौसम, पत्ते, डाल, रंग
इत्यादि इत्यादि
आप अपनी रचनाऐं शनिवार (27  जनवरी 2018 ) 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक (29 जनवरी 2018 ) में प्रकाशित होंगीं। 
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछले गुरुवारीय अंक 
(11 जनवरी 2018 ) को देखें  या नीचे दिए लिंक को क्लिक करें 




























मंगलवार, 23 जनवरी 2018

921...मां का प्राणों से प्यारा, पुत्र आखिर गया कहां,

जय मां हाटेशवरी....
आज का दिन अर्थात 23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है क्योंकि इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाषचन्द्र बोस का जन्म हुआ था। वही सुभाष चन्द्र बॉस जिन्होनेदेश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया
आज की प्रस्तुति उन्ही को समर्पित करते हुए.....
मैं इस महानायक को कोटी-कोटी नमन करता हूं....
तुम मुझे खून दो...मैं तुम्हें आजादी दूँगा
मैं जिनके बारे में लिखने जा रहा हूँ। उनके लिए मेरी लेखनी बहुत छोटी पड जाती है । और अल्फ़ाजों से जिनकी तारीफ़ नही की जा सकती।   
वतन से किस कदर मोहब्बत की जाती है । ये उन से सीखी जा सकने वाली बात है । इन्हें मोहब्बत थी अपने वतन की फ़िजाओ से , अज्जाओ से , ख़ाक से राख से हर उस शख्स से जो उनके वतन का बाशिंदा था । वो मांगने के बजाय अपने अधिकार छीन लेने में विश्वास करते थे ।
जिनके दिलों दिमाग में बस एक ही बात थी वतन की आजादी और एक ऐसी युवा कोम जो अपने इल्म से , अपनी तालीम से वतन-ए-हिन्द को वो मुक्काम दिला सके जिसका वो सदियों से हकदार था और रहा ।इनके जन्मदिवस को देशप्रेम के रूप में मनाया जाता है । हमे सीखना चाहिए की सर-ज़मीं से मोहब्बत किस कदर की जा सकती है ।

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पूरा नाम  – सुभाषचंद्र जानकीनाथ बोस
जन्म       – 23 जनवरी 1897
जन्मस्थान – कटक (ओरिसा)
पिता       – जानकीनाथ
माता       – प्रभावती देवी
शिक्षा      – 1919 में बी.ए. 1920 में आय.सी.एस. परिक्षा उत्तीर्ण।
सुभास चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। जिनकी निडर देशभक्ति ने उन्हें देश का हीरो बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। बाद में सम्माननीय नेताजी ने पहले जर्मनी की सहायता लेते हुए जर्मन में ही विशेष भारतीय सैनिक कार्यालय की स्थापना बर्लिन में 1942 के प्रारम्भ में की, जिसका
1990 में भी उपयोग किया गया था।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए शांतिपूर्ण व अहिंसक मार्ग को अपनाया था जिसके केंद्र में मूल विचार अहिंसा थी। जबकि बोस का मानना था कि सिर्फ व्यापक हिंसा ही अंग्रेजों को देश छोडऩे के लिए मजबूर कर सकती है। भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के जारी रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण था भारतीय सैनिकों की ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी। एक बार यह समाप्त हो जाए तो फिर ब्रिटिश राज भारत में एक दिन भी कायम नही रह सकता था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बोस वैश्विक शक्तियों की सहायता लेना चाहते थे, जिससे औपनिवेशिक साम्राज्य पर सैनिक दबाव बनाया जा सके और ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंका जा सके। आज उपलब्ध तिहासिक अंत: दृष्टि ने यह साबित कर दिया है कि यह बोस की वृहत रणनीतिक सोच व बोस और उनकी आईएनए का ही साया था जिसने रॉयल भारतीय सेना तथा भारतीय सेना की इकाइयों में बगावत को प्रेरित किया था, जिससे अंग्रेज देश छोडऩे को विवश हुए। आज उस ऐतिहासिक बहस को पुन: समझना मार्गदर्शक हो सकता है, क्योंकि जिस व्यक्ति के प्रयास वास्तविक रूप से भारत को स्वतंत्रता दिलाने के केंद्र में रहे, 
उस व्यक्ति की समझ और निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सावधानीपूर्वक निर्मित की गई लोकप्रिय समझ के विपरीत 
हकीकत यह है कि अहिंसा स्वतंत्रता दिलाने में असफल हो 
चुकी थी। इसको काफी कुछ बांध कर रखा गया था और 
दूसरे विश्व युद्ध के बाद तो यह समाप्त सा हो चुका था। कांग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा था। अंग्रेजों ने इसका जवाब पूरे कांग्रेस नेतृत्व को जेल में डालकर दिया था। 

 राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्शों
सत्यम, शिवम्, सुन्दरम से प्रेरित है.
 भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी शक्ति का
संचार किया है जो लोगों के अन्दर सदियों से निष्क्रिय पड़ी थी..
 याद रखिये सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना
और गलत के साथ समझौता करना है.
 
(नेताजी का अंतिम भाषण) जरूर पढ़ें.... 
भारत और भारत के बाहर अनेक भारतीय हैं, जो यह मानते हैं कि संघर्ष के ऐतिहासिक तरीके से ही भारत की आजादी प्राप्‍त की जा सकती है। ये लोग ईमानदारी से यह अनुभव करते हैं कि ब्रिटिश सरकार नैतिक दबावों अथवा अहिंसक प्रतिरोध के समक्ष घुटने नहीं टेकेगी, फिर भी भारत से बाहर रह रहे भारतीय, तरीकों के 
मत-भेद को घरेलू मत-भेद जैसा मानते हैं। जबसे आपने दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस में स्‍वतंत्रता का प्रस्‍ताव पारित कराया था, भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के सभी सदस्‍यों के समक्ष एक ही लक्ष्‍य था। भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों की दृष्‍टि में आप हमारे देश की वर्तमान जागृति के जनक हैं और वे इस पद के उपयुक्‍त सम्‍मान आपको देते हैं। दुनिया-भर के लिए हम सभी भारतीय राष्‍ट्रवादी हैं। हम सभी भारतीय राष्‍ट्रवादियों का एक ही लक्ष्‍य है, एक ही आकांक्षा है। 1941 में भारत छोड़ने के बाद मैंने ब्रिटिश प्रभाव से मुक्‍त जिन देशों का दौरा किया है, उन सभी देशों में आपको सर्वोच्‍च सम्‍मान की दृष्‍टि से देखा जाता है-पिछली शताब्‍दी में किसी अन्‍य भारतीय 
राजनेता को ऐसा सम्‍मान नहीं मिला।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 18 अगस्त 1945 में ताइवान के फोरमोस में हुई विमान दुर्घटना की गुत्थी अभी तक अनसुलझी है। कुछ का कहना है कि इस दुर्घटना में जैसा की आधिकारिक रूप से बताया गया है कि वे सचमुच दुर्घटना के शिकार होकर मारे गए थे। लेकिन कई का मानना है कि यह एक साजिश थी और नेताजी को सुरक्षित निकल जाने के लिए यह साजिश रची गई। कई का मानना है कि नेताजी इसके बाद सर्बिया चले गए तो कुछ का मानना है कि वे भारत में भी कहीं गुमनाम जीवन गुजारने लगे। सच्चाई क्या है पिछले 70 साल से लोग जानना चाहते हैं, लेकिन अभी तक इसका जवाब नहीं मिल पाया है।

भ्रष्टाचार के पितामह थे जवाहर लाल नेहरू
देश आजाद कहां हुआ। आजादी के हीरो को ही देश की सरकार ने लापता कर दिया तो आम आदमी का क्या होगा। मुझे राजनीति नहीं करनी है। आज की राजनीति सड़ी हुई है। इसमें सच्चाई को छिपाओ, लूटो, खाओ चल रहा है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जाति-पांति के भेदभाव को कभी भी महत्व नहीं दिया। वे हिन्दू-मुसलमानों में भेद नहीं रखते थे। दोनों को भाई मानते थे। इसका एक उदाहरण है- एक दिन उनकेे मोहल्ले में छोटी जाति के एक व्यक्ति ने  उनके घर वालों को खाने पर बुलाया। सबने न जाने का निश्चय किया, लेकिन सुभाष बाबू ने अपने माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर उनके यहां जाकर खाना खाया। एक अन्य प्रसंग पर कटक में हैजे के दौरान उन्होंने रोगियों की घर-घर जाकर सेवा की। इस रोग से पीडि़त एक गुण्डे हैदर के घर जब कोई डाॅक्टर, वैद्य उनके बुलावे पर नहीं आये तो उन्होंने स्वयं उसके घर जाकर अपने साथियों के साथ मिलकर उसके घर की साफ सफाई की, जिसे देखकर वह कठोर हृदय वाला गुण्डा द्रवित होकर एक कोने में जाकर रोने लगा। उसे बड़ी आत्मग्लानि हुई। तब नेता सुभाषचंद जी ने उसे सिर पर हाथ फेरते कहा-“ भाई तुम्हारा घर गंदा था, इसलिए इस रोग ने 
तुम्हें घेर लिया। अब हम उसकी सफाई कर रहे हैं।

हर आते जाते मुसाफिर से पूछ रही है भारत मां,
मां का प्राणों से प्यारा, पुत्र आखिर गया कहां,
कोई कहता जीवित है, शायद शहीद हो गये
इस असीम संसार में, नेता जी कहीं खो गये।
न यान मिला न शव मिला, न मानती सत्य अनुमान को,

30 जनवरी 1948 यही वह तारीख है 
जब विश्व में सत्य और अहिंसा के 
प्रेरणास्रोत महात्मा गांधी की हत्या हुई थी. 
30 जनवरी 2018 को   गांधी जी की 70वीं  पुण्यतिथि है
इस बार दिन है...मंगलवार....इस लिये 30 जनवरी की 
प्रस्तुति इस युगपुरुष को समर्पित है.....
आप से निवेदन है कि आप भी ऊपरोक्त विषय ज्यादा से ज्यादा जानकारी पर भेजें.....रचनाओं की प्रतीक्षा में कुलदीप ठाकुर।
धन्यवाद।

एक क़दम आप.....एक क़दम हम
बन जाएँ हम-क़दम का तीसरा क़दम 
इस सप्ताह का विषय
एक चित्र है...
इस चित्र को देखकर एक रचना लिखिए
आप अपनी रचनाऐं शनिवार (27  जनवरी 2018 ) 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक (29 जनवरी 2018 ) में प्रकाशित होंगीं। 
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछले गुरुवारीय अंक 
(11 जनवरी 2018 ) को देखें  या नीचे दिए लिंक को क्लिक करें 




सोमवार, 22 जनवरी 2018

920....हम-क़दम का दूसरा क़दम.........बवाल

वन्दे सदा चेतसा ज्ञानशक्तिम्
हृदय से सर्वदा ज्ञानशक्ति प्रदात्री सरस्वती की वंदना करती हूँ।
ब्रह्मरूपिणी,सर्वव्यापिनी,चर-अचर मूढ़ जगत में 
बुद्धिरूपिणी देवी माँ सरस्वती को शत-शत नमन।

मानसिक प्रदूषण से रक्षा करने वाली देवी के आगमन से 
संपूर्ण प्रकृति उल्लासित और श्रृंगारित होने लगती है।
वृक्षों में नूतन किसलय,चित्ताकर्षक पुष्पों की सुवासित छटा,
आम्र मंजरियों से लदी अमराई में कोयल की कूक 
एवं भ्रमरों के गान, सरस रागिनी प्रकृति सौंदर्य 
को सुशोभित करते हैं, बसंती हवाओं की सुगंध कण-कण 
में बिखर जाती है। हर्षित धरा का गान हृदय में 
प्रेम और पवित्रता का संचार करते है। जग के झमेले 
से हटकर अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर 
आप भी प्रकृति के उत्सव को महसूस कीजिए।


चलिए अब चलते है आज के "बवाल" की ओर जिसका 
आप सभी को बेसब्री से इंतज़ार होगा। आप सभी के 
सृजनशीलता और उत्साह ने चिट्ठा जगत में रचनात्मक 
बवाल ला दिया है। सभी रचनाकारों की सृजनशीलता को नमन है। 
एक विषय पर इतनी विविधापूर्ण रचनाओं का आस्वादन किसी 
भी साहित्य प्रेमी के लिए अनूठा अनुभव होगा।आप सभी के 
लगन और उत्साह को देखते हुये यह निर्णय लिया गया है 
कि आप सभी माँ सरस्वती के साधकों द्वारा "बवाल" 
पर भेजी गयी रचनाएँ जो हमें प्राप्त है  उन सभी को 
प्रकाशित किया जा रहा है ।

एक विशेष बात कृपया अवश्य ध्यान दें-
रचनाओं का क्रम ऊपर या नीचे रहना, किसी भी रचना की 
उत्कृष्टता का मापदंड नहीं है। हमारी दृष्टि में आपके 
द्वारा भेजी गयी हर रचना सर्वश्रेष्ठ है। किसी रचना का क्रम 
तय नहीं किया गया है। लिंकों का संयोजन क्रमानुसार 
नहीं सुविधानुसार किया गया है।

तो चलिए आप सभी भी आज के बवाल का आस्वादन कीजिए।

आदरणीय विश्वमोहन जी
कचड़ा पेट में नदियों की
खो-दी सभ्यता सदियों की
और जंगल फटेहाल न हो।
फिर! बवाल न हो?
●●●●●●●●●●●

आदरणीय पुरुषोत्तम जी
बड़ी बवाल जिन्दगी, बेमिसाल जिन्दगी,
मसरूफियत में है, सरसब्ज़ सवाल जिन्दगी,
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आदरणीया पूनम मोहन जी
आंसुओ की धार से
नयनों में ये सैलाब ना होता।
समुंदर के हर उफान पे
फिर ,ये बवाल न होता।।
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आदरणीया मीना जी
इक बवाल मैं करूँ
इक बवाल तुम करो !
हर बवाल का,
बवाल ही जवाब हो
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आदरणीया पम्मी जी
हाकिम भी वही
मुंसिफ़ भी वही
सैयाद भी वही
शिकायत भी कि बरबाद भी वही,
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आदरणीया दिव्या जी
खत पर एक 
मासूम के 
बवाल था 
कितना...
नादानी थी 

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आदरणीया नीतू जी
आस लगाये बैठी जनता नेता घूमें कारों में,
अच्छे दिन की आस में सूखी रोटी हुई मुहाल,
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आदरणीया  डॉ.इन्दिरा जी
कलखाई सी आँखो मै
गूँज रहा है मौन बवाल
जाग गया समाज तो फिर
कैसा है ये नया बवाल !
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आदरणीय पंकज प्रियम् जी
रोज रहता है तुम्हारे लबों पे नाम मेरा
हमने ले लिया तो बस बवाल हो गया
चुरा के रखा है पास अपने  दिल मेरा
हाल  पूछा उसका तो बवाल हो गया।
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आदरणीया कुसुम दी
आज हुआ फिर से बवाल
सब ने  खूब आशीषें पाई
खाने को ढेरों थे पकवान
आज तो भइया बच गये कान।
आज हुवा फिर से बवाल ।
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आदरणीय लोकेश जी
कटे हैं यूँ हर पल ज़िन्दगी के अपने
नफ़स नफ़स में वो कितना बवाल था
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आदरणीया सुधा सिंह जी
बनता कभी है, ये फूटता कभी
अजी पानी का ये बुलबुला हो गया है
●●●●●●●●●●●
आदरणीया अनीता लागुरी जी
सोलहवां सावन
प्यार में डूबा मन
प्रेमी न समझे तो
दिल के टूटने का
बड़ा बवाल ....!
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आदरणीया सुधा देवरानी जी
ललचायी थी निगाहें
 नजरों से चाटते थे......
घूँघट स्वयं उठाया तो बवाल मच गया !!!
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आदरणीया वैभवी जी
बावली की जगह
बवाली....पूछ लिया
तो हो गया....वही
वो मुंआ बवाल
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आदरणीया उर्मिला सिंह जी
बवालों की भीड़ मच गयी
 जिन्दगी का सकूँन चैन खो गया आजकल
तर्क करते  दोस्त भी झुंझला के मचाते बवाल हैं!
बढ़ गईं बीमारियाँ जब से मचा देश  में बवाल है
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आदरणीया शुभा मेहता
बवाल
कभी धर्म के नाम पर
कभी संप्रदाय के 
हिंसा ,तोड़फोड़
धरने , हडतालें
बस ,बवाल ही बवाल है 
●●●●●●●●
आदरणीया आँचल जी
बवाल
जब सड़क पे दो गाड़ी भिड़ी
तब औकात पे उठे सवाल
और ट्रैफिक जाम का हुआ बवाल



आदरणीया अनिता निहलानी जी
रचना
बवाल
आये दिन इस शहर में होने लगा मलाल
फ़िक्र नहीं किस बात पर, पूछो नहीं सवाल
छोटी सी एक खबर पर जिसका सिर न पैर
पीछे पड़े गर मीडिया ना किसी की खैर
नेता हो या अभिनेता दोनों का यही हाल
कभी प्याज कभी आलू पर मचने लगा बवाल
धमकी देते ट्विटर पर आज राष्ट्र अध्यक्ष
फिर जाता है वचन से झंझट बना विपक्ष
सहिष्णुता कहीं खो गयी चहुँ ओर है शोर
क्या कम थे गम पहले, दिल जो मांगे मोर

●●●●●●●●●●
कमला देवी अग्रवाल
रचना
बवाल
नकारात्मकता से जन्मा
शब्द बबाल है
ऊर्जा है इसमें इतनी
राई से बना देता पहाड़ है ।
आवेश,आक्रोश और कुटिलता
में ये पला बढ़ा
पूरी दुनिया के लिए

जबाल है जबाल है ।

●●●●●●●●●●

कल के अंक में नया विषय दिया जायेगा। 
आप सभी का बहुमूल्य साथ "हम-क़दम" के सफर में और भी 
खूबसूरत पड़ाव लेकर आयेगा ऐसी उम्मीद करते है।
बताइयेगा कैसा लगा आपको आज का अंक
आप सभी के बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में

श्वेता

रविवार, 21 जनवरी 2018

919,....."बावला हो गया के....पिच्छे न लग बवाल हो जावेगा"

बवाली बवाल ने ऐसा बलवा मचाया
कि चिट्ठा जगत बावला हो गया है
............................
बिना बवाल के कोई रचना ही नही है
ऐसा नशा बवाल का कि लोग वसंत और
वसंत पंचमी को भुला बैठे.....
हमारे शहर के एक ऑटो के पीछे लिखा देखा
"बावला हो गया के....पिच्छे न लग बवाल हो जावेगा
"
बताइए किया क्या जाए....
बहरहाल पेशे खिदमत है बिना बवाल की रचनाएँ....

जरूरत होती है इंसान को,
सदा ही दूसरे इंसान की।
सोचता हूं क्या होता,
अगर मैं आने ही न देता,
किसी को जीवन में अपने।
पर संभव ही न था ऐसा हो पाना,



फूल खुशबू चमक तितलियां आ गईं
माँ के घर जब सभी बेटियाँ आ गईं

जा के अंदाज़ ताकत का फिर लग गया 
जब बगावत में सब लड़कियां आ गईं

मुझको उस पार जाना कठिन जब लगा 
फिर दुआ माँ ने की कश्तियाँ आ गईं

आवो सखी आई बहार बसंत 
चहूं और नव पल्लव फूले 
कलियां चटकी 
मौसम मे मधुमास सखी री 
तन बसंती मन बसंती 
और बसंती बयार सखी री


वीणावादिनी.... मीना शर्मा
वीणावादिनी ! वरदहस्त तुम
मेरे सिर पर धर देना...
अपनी कृपा के सुमनों से माँ,
आँचल मेरा भर देना !
ठगी...विभारानी श्रीवास्तव
दस मिनट के शोर में मोल तोल(बार्गेनिंग) के बाद 10-10₹ में पटा और श्रीमती की मंडली 10-10 माला खरीद कर गाड़ी में बैठीं
एक ने पूछा क्या करेंगी इतनी मालाएँ
-अरे सौ रुपये की ही तो ली है... किसी को देने लेने में काम आ जायेंगे
-दस रुपये की माला पहनेगा कौन
-कन्याओं को पूजन में देने के काम आ जाएंगी..
-काम वाली को देने से बाहर का तौहफा हो जाएगा



शहर में कोई हिन्दू मरा
मैं इसके खिलाफ हूं
कोई मुस्लिम
दंगों का शिकार हुआ
मैं उसके खिलाफ हूं
किसी सिक्ख के धर्म का अपमान हुआ
मैं उसके भी खिलाफ हूं
किसी ईसाई को अपने ही देश में
विदेशी कह कर मारा जाए
मैं इसके भी खिलाफ हूं
न मोहताज़ हो तुम किसी के,
न मोहताज़ हम हैं किसी के,
पर खाई थी हमने कसमें,
ये जीवन साथ बिताने का। 

सूना हो जाता है आँगन सारा,
जब-जब चली जाती है बिटिया ।  
कोई नहीं रखता ध्यान इतना,
बिना कहे जितना करती हैं बेटियां ।

आज .
अब. .
बस..
दिग्विजय

अजी छोड़ो बिना बात बातें बवाली
ये बवाल अब बड़ा मनचला हो गया है 
...............
नोटः ऊपर व नीचे की पंक्तिया सुधा दी की रचना से ली गई है 
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