निवेदन।


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सोमवार, 31 अगस्त 2026

4851 ...जनारण्य में जिसे खोजता रहा वही छुपा हुआ था

 सादर अभिवादन 


कल स्वागत करिएगा माह सितंबर , इसी मास में हम
सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन से उनका जन्मदिन हम
शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं
और मनाते रहेंगे

इसी मास के परंपरागत उत्सव भी संग संग चलेंगे...मसलन ...
कृष्ण जन्माष्टमी, हल छठ, पोरा,  हरतालिका तीज, और गणेश चतुर्थी
लोगों से कहिए उपवास करें पर खा-पी कर

पसंदीदा रचनाएं




एक दिन स्वप्न पिटारा गिर 
कर बिखर जाएगा, 
मायावी आकाश की तरह बहुत
दूर कहीं तब नज़र आएगा 
देह का  शून्य पिंजर,
अंतरिक्ष में दिशाहारा पखेरू
जाने -किधर जाएगा,
एक दिन स्वप्न पिटारा
गिर कर बिखर
जाएगा 




रक्षाबंधन पर और भाई दूज पर बहन जी के नफ़ा-नुकसान की बात
सोचने में भी मुझे अब शर्म आती थी. 
बड़ा होने पर कमाऊ होने के बाद मैंने रक्षाबंधन पर पहली बार (1974 में) जब अपनी जेब से बहन जी को भेंट दी तो मैं बेहद ख़ुश था लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बहन जी की आँखें डबडबा रही थीं. 




रुक्मणी के व्रत भी 
कहाँ काम आए? 
राधा को ही दे सब 
मान संगिनी का 

वफ़ाओं का पट्टा 
गले पड़ गया है
सभ्यता का सबक 
जब से है सीखा 




हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, आरती या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के दौरान घंटी बजाना एक अनिवार्य परंपरा है। चाहे घर का छोटा सा मंदिर हो या विशाल देवालय, घंटी की सुरीली गूंज पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा के समय घंटी बजाना केवल एक रस्म है या इसके पीछे कोई ठोस वजह है? शास्त्रों और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार, घंटी की गूंज के पीछे कई आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रहस्य छिपे हैं।


चलते -चलते
लघुकथा/कविता का चौथा अंक
नया विषयः  गणपति उत्सव, और  जगराता, व्रत  
प्रेषण तिथिः 11 सितंबर 26
प्रकाशन तिथिः 13  सितम्बर 26

सादर समर्पित
वंदन

रविवार, 30 अगस्त 2026

4850...कभी समरभूमि में बहन ने, जय-तिलक संग राखी बाँधी

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनीता जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए कुछ लघुकथाएँ, कुछ कविताएँ-

२६ अगस्त २०२६ 

छड़ी तो सिर्फ़ ज़मीन का सहारा देती है, मालतीतुम्हारा हाथ थामता हूँ तो मन को सहारा मिलता है।दीनानाथ जी ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, वे कुछ पल रुके

पचास साल पहले जब इस हाथ को थामा था न, तब से आज तक कभी लगा ही नहीं कि मैं अकेला चल रहा हूँ।दीनानाथ जी ने कहा।

*****

रक्षाबंधन 

सीमा भी अपने घर में अकेली थी और उसका पति राजेश भी, इसलिए कोई चचेरा, ममेरा भाई या बहन भी नहीं थे।इसके पहले वे लोग जिस शहर में रहते थे, मकान मालिक के छोटे बेटे को राखी बाँधकर आशा कितनी खुश हुई थी। इस शहर में वे नये-नये आये थे। माँ को चुप देखकर आशा ने उसकी बाँह पकड़ कर हिलाई, तो अचानक जैसे उसे कोई अनोखा हल मिल गया।

*****

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ 

कभी समरभूमि में बहन ने, जय-तिलक संग राखी बाँधी

कभी संकट में इक पुकार पर, रिश्तों ने मर्यादा साधी !

इतिहास के पन्नों में मिलती, त्याग और साहस की कथाएँ

राखी की कच्ची डोरी ने, गढ़ डालीं कितनी गाथाएँ !

*****

पूरा डिब्बा वात्सल्य रस से सराबोर था

 
रोता बच्चा चुप होकर सो गया।

माँ ने सामने वाले माँ और जिद करते बच्चे को देखा,
भूख से वह भी रो रहा था, कोई डांट-फटकार उसे चुप नहीं करा पा रही थी,
भूखा है बच्चा तुम्हारा। कब से देख रही हूं, ...
बुरा न मानो तो ये बचा दूध उसे पिला दो,
दूसरी मां ने बिना ना-नुकुर किए बच्चे के मुख में बोतल दे दी।
बच्चे की क्या जात?

*****

परदेशी मन /शशि पाधा 

जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें

आधी रातें, कथा- कहानी

खाट, दरी, बस चादर, तकिया

माटी-रची सुराही पानी

*****

उसने पूछा-मैं क्या हूँ तुम्हारी?

चुप होना ! -

उसका चुप होना

लगता है मानो

धरती का रुक जाना !

 

रंग सी है -

वह ज़िन्दगी के

कैनवास में

ख़ुशी के एक रंग सी है !

*****

 बूंद भर खुशबू 

नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से  इन्होंनें खरीदी थी।

उसी क्षण समझ में आया दादी इत्र नहीं बचा रही थी

उस दिन की खुशबू  बचा रही थी
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना शुरू किया था।

*****

 फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

शनिवार, 29 अगस्त 2026

4849 ...रक्षाबंधन बीता है बस कल परसों

 सादर अभिवादन 

रक्षाबंधन बीता है बस कल परसों
फिर स्वागत करिएगा कृष्ण जन्माष्टमी, हल छठ, पोरा, 
हरतालिका तीज, और गणेश चतुर्थी
और न जाने क्या क्या

कल भाई रवींद्र जी आएंगे, लघुकथा का अंक लेकर

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पेड़ खड़े हैं क़तार में,
किसी के इंतज़ार में, 
न जाने कब आ जाए इस ओर  
कोई अजनबी मुसाफ़िर। 




जिस घर में लड़की अपनी
स्वाभाविक भाषा भी न बोल सके
वहाँ दीवारें भले साफ़ हों
हवा सड़ी हुई होती है

और जिस आदमी के सामने
लड़की बिना डर के
अपनी सबसे गंदी भाषा बोल सके
उसी के सामने
वह अपने सबसे मानवीय रूप में होती है




सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की 
फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की 


पत्रा में लग्न खूब थे पंडित भी कम न थे 
फिर भी कुँवारी रह गयी बेटी किसान की 




कल मस्त थे जिसके दल में
करने में गुणगान रे
पलभर में छोड़ चले सब
बेच दिया  ईमान रे
आओ - आओ, देर न करना
दल ,बदल के काम में




“बधाई हो, आपका घोड़ा बच गया। 
अब इसे नहीं मरना पड़ेगा।”

यह खबर सुन पठान बहुत खुश हुआ 
और तुरंत बोला....

“डॉक्टर साहब आज खुश कर दिया आपने। 
मैं आज बहुत खुश हूँ और इसी ख़ुशी में 
“आज बकरा कटेगा”!

सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

4848....धागे कच्चे है मगर

शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।


आज रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जा रहा।

कहते हैं, कच्चे सूत के धागों में जो ताकत होती है, वो दुनिया की बड़ी से बड़ी फौलादी जंजीरों में भी नहीं होती।  रक्षाबंधन सिर्फ एक पर्व नहीं है; यह तो भाई की आँखों में बहन के लिए छिपी फिक्र है, और बहन की दुआओं में भाई की तरक्की का अटूट विश्वास है। 


आज का दौर बदलाव का दौर है। हमारी जीवनशैली, हमारी प्राथमिकताएं और यहाँ तक कि हमारे त्योहार मनाने के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। ऐसे में जब 'रक्षा बंधन' का पावन पर्व हमारे सामने आता है, तो यह केवल एक पारंपरिक रीत मात्र नहीं रह जाता, बल्कि समकालीन समाज की प्राथमिकताओं को टटोलने का एक आईना बन जाता है।

इतिहास गवाह है कि रक्षा बंधन का उद्गम सुरक्षा के एक मूक आश्वासन से हुआ था। एक ऐसा दौर जहाँ कलाई पर बंधा सूत का धागा जीवन भर की रक्षा का दायित्व सौंप देता था। लेकिन आज, जब देश की बेटियाँ अंतरिक्ष से लेकर कॉरपोरेट जगत तक और खेल के मैदानों से लेकर सीमाओं तक अपनी योग्यता का परचम लहरा रही हैं, तब 'सुरक्षा' के इस पारंपरिक नजरिए को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। आज की बहन सिर्फ रक्षा की याचक नहीं है, वह खुद में इतनी सशक्त है कि संकट के समय अपने भाई की ढाल बन सके। आज का रक्षा बंधन भाई-बहन के बीच 'निर्भरता' का नहीं, बल्कि 'सह-अस्तित्व और समानता' का उत्सव है।



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आज की रचनाऍं--


















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आजकल राखी पर आधारित
गाने बनने बंद ही हो गये है लगता है।
सुनिये एक गीत


मेरे भैय्या मेरे चंदा

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

4847 किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

 सादर अभिवादन 


लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखें
अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
कल आखिरी दिन है
विषयः  रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
कृपया नोट करें


पसंदीदा रचनाएं




आज जरूरत है उसी परंपरा को जीवित कर सज्जनों के साथ-साथ दुर्जनों की वंशावलियों की भी पूरी कुंडली को जनता-जनार्दन के सामने लाने की ! उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए सारे कारनामों को जिनके अतीत के सच पर झूठ का चमकीला आवरण चढ़ा, असलियत छिपा, उनको महिमामंडित कर, अवाम को सच के सिवा कुछ और ही दिखा-समझा कर पीढ़ी दर पीढ़ी जो गलत इतिहास पढ़ाया-समझाया गया, उसका पर्दाफाश करने की ! वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के सामने सच रखने की ! उनके दिलों में राष्ट्र प्रथम की भावना सुदृढ़ करने की ! जिससे किले के दरवाजे की सुरक्षा पुख्ता हो जाए, अभेद्य हो जाए !






उस दिन’जुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।





अविकल, कोहरे में ढकी ये सुंदर
घाटियां, पहाड़ों से बहते हुए
ख़ूबसूरत वेगवान झरने,
आज भी बिखेरते हैं
ज़िन्दगी में रंगीन
सपने,





दोस्ती भी चाय की तलब-सी है,
जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है।
झटपट फोन घुमाया,
मिलने का वक्त और जगह तय हो आई,
फिर फोन रखने की देर थी बस—
एक प्यारी-सी शाम चली आई।






थोडी थोड़ी गल रही है 
थोड़ी थोड़ी जल रही है 
है पुरानी वेदनाये  
गीत में जो ढल रही है 





चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए




ये पैसे मांगेगा ज़रूर, यही सोचते हुए मांगे उसे रुपए देने के लिए अपने  पर्स में हाथ डाला इससे पहले मैं उसे रुपए देती इससे पहले उसने अपने 
कंधे पर झूलते हुए झोले से तीन साड़ियां निकाली और कहने लगा रु. नहीं 
चाहिए दीदी, हो सके तो इसमें से एक साड़ी खरीद लीजिए, 
मुझे ताली बजा कर मांगने वाली छवि से निकलने में मदद मिलेगी।

सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 26 अगस्त 2026

4846..सरगोशियों के स्वर ..

 ।।प्रातःवंदन।।

"सत्य का एक चेहरा होता है

रंगहीन भी नहीं होता सत्य !

लेकिन झूठ की तरह

हर कहीं नहीं होता सत्य

न ही झूठ में घुल पाता है

अगर होता है कहीं तो

अलग से दिव्या आलोक लिए

दमकता रहता है सत्य !"

गोविंद माथुर

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ आज शामिल रचनाए को देखिए ..✍️

अँधेरे का उजाला

शहर त्रस्त था

अँधेरों से।

उन्होंने

संविधान में संशोधन किया

और

अँधेरे का नाम

उजाला रख दिया..

✨️

सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद

 परिचय

सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव ..

✨️

कभी बेवजह ही गुनगुनाइये 

बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए 

छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल 

हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए ..

✨️

समय हूँ


नियति की

हर क्रिया में

कर्म की प्रतिक्रिया सा

निर्बाध निर्विरोध

लेता हूं अवश्य ही

प्रतिशोध..

✨️

सरगोशियों के स्वर 

‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीव..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '...✍️


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

4845....कास के फूल

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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संक्रमित पेड़ के 

एक डाल के कीड़ों 

पर कीटनाशक छिड़ककर

ख़ुश होना कि पेड़

संक्रमण मुक्त हुआ

जबकि सच तो जड़ 

को खोखला कर रहा

भ्रम में जीना 

अच्छा लगता है हमें।

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आज की रचनाऍं-


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।
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