मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए"
अलविदा डॉक्टर बशीर बद्र
उर्दू ग़ज़लों के आसमान का इक ऐसा सितारा
, जिन्होंने न केवल अपनी कला से, बल्कि अपनी इंसानियत से भी पूरे एक दौर को रोशन कर दिया। आज, ऐसी ही एक रोशनी अचानक बुझ गई। डॉ. सैयद मुहम्मद बशीर बद्र का निधन एक संवेदनशील दौर के अंत का दुख है। यह महान ग़ज़लकार, जिसने हमें शब्दों के साथ इत्र की तरह जीना सिखाया, जिसने कोमलता से दुख व्यक्त किया और प्यार को रोज़मर्रा की ज़िंदगी की भाषा में ढाला, आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी ग़ज़लें आज भी अनगिनत दिलों में धड़कती हैं।
आज, जब समाज और भी ज़्यादा बँट रहा है, और भी ज़्यादा असहिष्णु और मशीनी होता जा रहा है, तब बशीर बद्र की ग़ज़लें हमें फिर से इंसान बनना सिखाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि शब्दों का काम दीवारें खड़ी करना नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ना है। उनकी ग़ज़लों में, मोहब्बत महज़ एक रोमानी जज़्बा नहीं है; यह इंसानियत का सबसे आला इज़हार है।
बशीर बद्र का इंतकाल उस आवाज़ का खामोश हो जाना है, जिसने दर्द को भी संगीत में बदल दिया था। लेकिन सच्चे शायर कभी नहीं मरते। वे अपने शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं। आज भी, जब किसी तन्हा रात में कोई दिल टूट रहा होता है, तो शायद बशीर बद्र का कोई शेर उसे तसल्ली देता है। ग़ज़लों की दुनिया आज शोक में डूबी है, लेकिन शायद यही एक महान कवि की अमरता है—उनका शरीर भले ही चला जाए, पर उनकी भावनाएँ समय की सीमाओं से परे जीवित रहती हैं।
हमारे पॉंच लिंक परिवार की आपको विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
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किसी का जाना महज जाना नहीं होता
मगर दुनिया में संग किसी के मर जाना नहीं।
रो-रोकर तडप के भी यादों की गलियॉं में
साथ किसी के सॉंसों का थम जाना नहीं होता।#श्वेता
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आज की रचनाऍं-
कमरा टेबल और मैं
शब्दों से भरे
कागज़ों का ढेर
बचपन के साथ साथ
बढ़ते गए भावनाओं के चिनार
चन्द दिनों भीड़ में
गुज़ारने के बाद
वापस खामोशी की ओर
रुख करना
बेरंग भूख की बस्ती में
आश्वासन रंग-बिरंगा है।
समझ रहे जिनको दाता
सच में वो भिखमंगा है।
जिसको उडता देख रहे
वह महज एक पतंगा है।
पत्तों पर गिरती हुई जल धार
अचानक सीढ़ियों से आयी
पानी गिरने की आवाज़
सोचा नहीं था कि होने लगेगी
घर के अंदर ही बरसात
देखते ही देखते बहने लगी
पानी की धार
पहली मंज़िल की बालकनी में
आ गयी थी बाढ़
गाँव की मुखिया चाची अपनी भूली हुई चाँदी की थाली लेने लौटी थीं। बच्चों को देखकर उनका चेहरा तमतमा उठा।
बुचिया डरकर पीछे हट गई, पर मंगरू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया था, जिसमें थोड़ी-सी घी की परत और सिंदूर बचा था।
“इतनी मिठाई छोड़कर ये गन्दा दीया क्यों उठा रखा है?” चाची ने झुँझलाकर पूछा।
“माई ने कहा है, बरगद बाबा के पैर का सिन्दूर और घी लगा देंगे तो हमारे बाबू की भी साँस लम्बी हो जाएगी। भोर से भट्ठे पर खाँस रहे हैं…” मंगरू ने सहमे स्वर में कहा— वाक्य पूरा होते-होते उसकी आवाज भर्रा गई।
नाटक के संवाद अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भरसक, कहीं-कहीं तो कालजयी हैं। बानगी देखिए – ‘धर्म अगर इंसानियत से बड़ा हुआ तो ईश्वर भी रोएगा’, ‘वोट नहीं, संकल्प दो’, ‘जहाँ शरीर क़ैद होता है, वहीं आत्मा का विस्तार होता है। इतिहास के सबसे उजले अध्याय अक्सर जेल की कोठरियों में लिखे जाते हैं’, ‘जब विचार हथियार बन जाए और जनता ढाल, तब इतिहास की दिशा बदलती है’, आज़ादी बाहर नहीं होती, भीतर होती है’, ‘समय बहुत कुछ छीन लेता है, पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय को ही बदल देते हैं’, ‘जो आज पीछे हटा, समझो वह पीढ़ियों तक झुका रहेगा’, ‘क्रान्ति केवल टकराव नहीं, साहचर्य भी है। जहाँ विचार मिलते हैं, वहाँ इतिहास की रगों में रक्त तेज़ी से बहने लगता है’, तुम्हारे साहस में करुणा भी है’, और अंत में संवेदना का गढ़ियापन शब्दों में उतरता देखिए, ‘आज कोई माँ हिन्दू नहीं, कोई माँ मुसलमान नहीं, सबकी कोख डर से थर-थर काँप रही है, बाबू!’
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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