निवेदन।


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रविवार, 5 जुलाई 2026

4794 ... जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

 सादर अभिवादन 


पी.ओ.के. की चर्चा है जोरो पर
कुछ चित्र दिखा रहा हूँ

आपका भी मन करेगा कि जाकर वापस ले आऊं


और भी है , ब्लॉग में जाकर देखिए

मेरी पसंदीदा रचनाए



एक जुनून सा छाया रहा दौर-ए-जवानी 
तेज धार में दरिया के मयार का पता ही नहीं चला

तसव्वुर में तेरा चेहरा रख  यू लिया 
कंकड़ पत्थर और खार का पता ही नहीं चला




अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, फिल्में बनी हैं ! इन चलचित्रों ने इन बिमारियों के प्रति लोगों को जागरूक भी किया है ! यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जिया भी है...............!  




ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल




है अधूरे और पुराने 
गीत हृदय में लिखे है
 पंखुड़ी से प्रीत करते
 भ्रमर भी गुंजित दिखे है 





वहां का कश्मीर ,भारत के कश्मीर से ज्यादा खूबसूरत है , 
वहां हिंगलाज मंदिर है। वो हिन्दुओ के 51 शक्तिपीठों में से एक है । 
जहाँ सती माता का सर काट के गिरा था। 
वहीं पर वेदों की रचना हुई थी। 
जिसे सप्तसैंधव प्रदेश कहते है। वहां सात नदियां थी।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 4 जुलाई 2026

4793 ...संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है

 सादर अभिवादन 

एक शिक्षक कक्षा में दाखिल हुए और उन्होंने देखा कि
जिस कुर्सी पर उन्हें बैठना था वह छत पर टंगी हुई थी।
उन्होंने छात्रों की ओर देखा और मुस्कुराए।
बिना कुछ कहे, वे ब्लैकबोर्ड की ओर बढ़े और लिखा:

परीक्षा - 15 मिनट, 30 अंक


प्रश्न 1. कुर्सी और फर्श के बीच की दूरी सेंटीमीटर में परिकल्पित करें (1 अंक)।
प्रश्न 2. कुर्सी का छत से झुकाव कोण परिकल्पित करें और अपनी कार्यविधि दिखाएं (1 अंक)।
प्रश्न 3. उस छात्र का नाम लिखिए जिसने कुर्सी को छत पर टांगा था और उन दोस्तों का नाम लिखें जिन्होंने उसकी मदद की थी। (28 अंक)।
इसलिए हमेशा ख्याल रहे, गुरु तो हमेशा गुरु ही रहेंगे ।
गुरु से किसी भी प्रकार की मजाक नहीं 


मेरी पसंदीदा रचनाएं



शिक्षक ने राघव की दुविधा को भांप लिया और बेहद शांत स्वर में कहा, "धर्म शिक्षण है, जाति से शिक्षक हूँ तो मेरा सम्प्रदाय आस्था का विषय है, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर श्रद्धा का और जरूरतमंदों की मदद करना ही मेरे लिए पूजा है। तो दान हमेशा पात्र व्यक्ति को देना ही श्रेयस्कर समझता हूँ!”

“बड़े-बड़े नोट बाँटकर मैं खुद को बहुत बड़ा धर्मात्मा महसूस कर रहा था। आपका कर्म देखकर मेरी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। मैंने जिन लोगों को रुपये दिया, रात में ही उसी रुपये से नशा करने वाले होंगे जबकि यहाँ एक स्वाभिमानी परिवार को सचमुच मदद की जरूरत थी।” राघव ने कहा।





रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।





माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा.





संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,
हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।

बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,
परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।





खिल उठे बहार बन
झुलस गए थे जो वन,
श्रावण की भेंट पा
जुड़े मन, जुड़े नयन !  


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

4792....जहॉं भूख पर लंबी-लंबी चर्चाऍं होती हैं....

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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​रंगमंच बहुत बड़ा है इस दुनिया का,
और हम सब सिर्फ अदाकार हैं,
परदे के पीछे छिपी पटकथा के हिसाब से
अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
​कोई नायक की भूमिका में मुस्कुराता है,
तो कोई खलनायक बनकर कोसा जाता है,
पर सच तो यह है कि भूमिका कोई भी हो—
महत्व इस बात का है कि उसे जिया कैसे गया।
​इतिहास गवाह है,
किताबों की 'भूमिका' अगर कमज़ोर हो,
तो लोग आगे के पन्ने पलटना छोड़ देते हैं,
और यदि जीवन में अपनी 'भूमिका' से इंसान भटक जाए,
तो पीढ़ियाँ रास्ता भूल जाती हैं।
​यह सिर्फ एक पद, एक नाम या एक काम नहीं,
यह तो वह उत्तरदायित्व है,
जो हमें समय सौंपता है।
महान वह नहीं जिसे बड़ी भूमिका मिली,
महान वह है जिसने अपनी भूमिका को बड़ा बना दिया।


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आज की रचनाऍं-


इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।



उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी 
सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ .
उनके लिए तो खेल है ये रोज का यहाँ 
हाथों में जिनके है सिंहासन की रस्सियाँ.
आएगा तूफ़ाँ क्या उनको नहीं पता,
भंवर में छोड़ जाएगा जो उनकी कश्तियाँ.




जनता में महंगाई बिजली पानी का हंगामा
नेताओं ,दलों में सत्ता हथियाने का हंगामा
गरीबी,बेकारी दूर खड़ी देख रही   निःशब्द
वोट किसे  देना होगा मचा है मन में हंगामा।।


कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l
आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll
स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l
टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll



निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

4791 ..प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, तो जीवन महक उठता है

 सादर अभिवादन 


आ गया जुलाई
टिफिन, रिक्शा, बस का चक्कर
 होता मन में धक-धक

मेरी पसंदीदा रचनाएं


प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, 
तो जीवन महक उठता है,

पर मर्यादा खोने वाले का, 
जग में मान घट जाता है।

वरना ऐसी विपदा आएगी, 
फिर चैंदिया खुजानी पड़ जाएगी,

समय की मार पड़ी जो सिर पर, 
चैंदिया पर बाल न छोड़ेगी।




ठेले वाले की आँखों में जो चमक आई, भाई साहब... सीधे अंबानी वाली थी! 
उसने मैडम को आधा नींबू-पानी मिला जूस थमाया, मैडम ने एक घूंट पिया और बोलीं—
"वाह! एकदम प्योर शुगर-फ्री है, गन्ने का स्वाद भी आ रहा है और कैलोरी भी नहीं है!" 
₹120 देकर मैडम तो पतली कमरिया मटकाते हुए चली गईं, पर पीछे हम दोनों का बिजनेस सेट हो गया!




हर बुझी हुई राख में—
एक ऐसी चिंगारी अब भी जीवित रहती है,
जो यदि एक बार विश्वास की हवा पा जाए,
तो
केवल एक दीपक नहीं,
पूरे आकाश को फिर से रोशन कर सकती है।



 हैं रातें काली,डरावनी,दिन पहाड़ से लगते 
हंसी खोखली सी आती है, आंसू खारे लगते 

रोज सुबह सूरज की किरणें आकर मुझे जगाती 
प्रात काल की हवा थपेड़े देकर नींद भगाती 
बासीपन सारा हट जाता , तन हो जाता 
ताजा मेरा मन चेतन हो जाता ,अपनेपन का राजा





पंच इन्द्रियों से हम जानें  
उत्पन्न होकर बढ़े व मिटे
दो पंछी रहते हैं जिस पर
एक सनातन वृक्ष जगत है !


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 1 जुलाई 2026

4790..धूप का लिबास

।।प्रातःवंदन। ।

रात की अब तह बना दो, विगत को चादर उढ़ा दो,

प्रात की गाओ प्रभाती, उदित रवि को जल चढ़ा दो।

अब उठो कुण्ठा बुहारो !


~ डॉ मृदुल कीर्ति

चलिये चंद वैचारिक,अलंकृत शब्दों से रूबरू हो, अब नज़र डालते हैं लिंको पर..✍️



चलन दुनिया का


दुनिया का चलन

लगे सीखने सबक

बहुत नादान थे हम

समझ न पाये सबब।


छल प्रपंच से भरी..

✨️

दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...

तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.

मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.


कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,

हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे...

✨️

कर दो दिल को आज़ाद


एहसान मानेंगे जनम सात .



तुम आओ न मेरे दिल को याद


एहसान मानेंगे जनम सात ..

✨️


मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं

✨️

रे मन !

मानसून का जोर,


मूसलाधार बारिश,


आंधी और तूफान बहुत हैं,..

✨️

इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 30 जून 2026

4789...एक मुट्ठी राख...

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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बहुत पास से गुज़रा तूफान
धरती पर लोटती
बरगद,पीपल की शाख,
सड़क के बीचोबीच पसरा नीम
असमय काल-कलवित  
धूल-धूसरित,गुलमोहर की
डालियाँ, पत्तियाँ, कलियाँ 
 पक्षियों के घरौंदे,
बस्ती के कोने में जतन से बाँधी गयी
नीली प्लास्टिक की छत,
कच्ची माटी की भहराती दीवार
अनगिनत सपनें
बारिश में बहकर नष्ट होते देखती रही
उनके दुःख में शामिल हो 
शोक मनाती रही रातभर उनींदी
अनमनी भोर की आहट पर
पेड़ की बची शाखों पर
 घोंसले को दुबारा बुनने के उत्साह से
 किलकती तिनका बटोरती
 चिड़ियों ने खिलखिलाकर कहा-
एक क्षण से दूसरे क्षण की यात्रा में
 समय का शोकगीत गाने से बेहतर है
 तुम भी चिड़िया बनकर
उजले तिनके चुनकर 
 चोंच मे भरो और हमारे संग-संग
 जीवन की उम्मीद का
गीत गुनगुनाओ। #श्वेता
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आज की रचनाऍं- 


दर्द जब ज्वार से भी ऊँचा उठता है,
लहरें शोर करना छोड़ देती हैं।
समुद्र सिर्फ़ गहरा हो जाता है।
दुःख का बिम्ब भाटा में नीचा बैठता है

लकड़ी जब पूरी जल जाती है,
लपटें नहीं बचतीं—
बस एक मुट्ठी राख
हवा के साथ चल देती है।
राख के बिम्ब के लिए वैतरणी मचल जाती है



भूख की आँखों में सपनों का आख़िरी दीपक बुझ गया,
आँकड़ों में तिलस्मी ख़ुशहाली थमी है, बाकी सब ठीक है।

लब सिल गए हैं डर के मारे शहर के हर गवाह के,
क़ातिल के हक़ में हर गवाही थमी है, बाकी सब ठीक है।



सड़कों पर दौड़ती काली थार,
गुड़गांव के रईसजादों का व्यवहार,
और रोड़ रेज में तू तू मैं मैं के आसार,
आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 



हे सूर्य देव!

ज़रा रहम करो 

धरती को बचाओ 

मेघ को भेजो  

तपते जीव-जन्तु

करुणा दिखलाओ। 

मायका नदियों का

इस दुनिया में करीब डेढ़ लाख नदियां बहती हैं, जिनमें छोटी-बड़ी मिला कर तकरीबन दो सौ प्रमुख नदियां हमारे देश में लोगों को जीवन प्रदान करती हैं ! मायके से निकलने के बाद जनहित में ये कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखतीं ! ऐसी जीवन दायिनी, प्रभु की अमूल्य भेंट के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम इनका ख्याल रखें ! इनका सम्मान करें ! यदि कुछ ना भी कर सकें तो कम से कम इन्हें ''व्यथित'' तो ना करें ! 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 29 जून 2026

4788 ... पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे

 सादर अभिवादन 

लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।
मेरी पसंदीदा रचनाएं


राजेश : क्या हुआ आरती
पत्नी को झकझोरते हुए बोला..
आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए.
किस पर विश्वास करें और सगे भी ?
पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे.




कहाँ गया बिटिया का वो रूप 
जब बिटिया अपने माँ-बाप के लिए 
अपनी खुशियां भी छोड़ देती थी 
अपनी माँ के लिए हमेशा पहले सोचती थी 
शादी के बाद पति की ख़ुशी ही उसका सब कुछ होता था 




प्यार की जब बात कहें बोले ईश्वर से प्यार
संसार यह भ्रमजाल है मुक्ति इसका द्वार
मानवीय प्रणय खड़ा आत्म देह की गर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना



समय का एक पुराना बरगद
अब भी खड़ा है
सभ्यता के चौराहे पर।
उसकी जड़ों में
पूर्वजों की असंख्य पदचापें सो रही हैं।

जब भी कोई पीढ़ी
अपने अतीत को भूलने लगती है,
बरगद की जड़ें
पत्थरों को चीरकर बाहर आ जाती हैं।






धीरे-धीरे प्रतीक्षा
दूब-सी धरती पर फैल जाती है।

वह पेड़ों में बस जाती है,
रास्तों में, ऋतुओं में,
यहाँ तक कि घर की दीवारों में भी।

और फिर
वह आत्मा का स्वभाव बन जाती है।
***
सादर समर्पित
सादर वंदन
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