खेतों में पानी बबूल,
पछुवा के हाथों में शाखें हिलेंगे,
पुरवा के हाथों में फूल,
आना जी बादल ज़रूर !
धान तुलेंगे कि प्रान तुलेंगे,
तुलेंगे हमारे खेत में,
आना जी बादल ज़रूर !!
~ केदारनाथ सिंह
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
मंगलवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
ललनाओं को राम ने छुआ नहीं,
अधिकार कर लिया था राज्य पर।
गर्भ में बालक पल रहे, उन्हें छोड़.
शेष थे रुधिर में डूबे भूमि पर।।
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जीना है हर पल को शिद्दत से
न रहे कोई कटु स्मृति
न भीतर रह जाये
कोई अधपका विचार
संतुलन ही वह अग्नि है
जो भीतर जगानी है
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और मत झुकाओ मुझे,
ज़रा सीधा होने दो,
इतना झुक चुका हूँ मैं
कि मुझे साफ़-साफ़ दिखने लगा है
अपना ज़रूरत से ज़्यादा झुकना,
तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा तनना।
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अशोक कालीन भारत (269–232 ईसा पूर्व) में नारी की सत्ता और सीमाएँ: एक विश्लेषण
"सुख से सुख उत्पन्न होता है, दुःख से दुःख ही आता है;
जब मैंने सुख
में छिपा हुआ दुःख पहचाना,
तब मैंने दुःख
में छिपा हुआ सुख पाया।"
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वक़्त की एक सबसे खूबसूरत और सबसे खतरनाक खूबी
यही है कि 'यह भी गुजर जाएगा'। आज जो हालात
आपको अपाहिज महसूस करा रहे हैं,
कल वो आपकी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा होंगे
जिसे सुनाकर आप दूसरों को प्रेरित करेंगे।
हालात को खुद को तोड़ने मत दीजिए, बल्कि उन्हें एक
ऐसा हथौड़ा बनने दीजिए जो तराशकर आपको और मजबूत बना दे। उठिए, री-प्रोग्राम
होइए और आगे बढ़िए!
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।*****शिवालयअसल में प्रेम ही शिव है
जब भीतर जागता है प्रेम
मन ख़ाली हो जाता है
सारे भेद मिट जाते हैं
श्वासें गढ़ती भीतर
वह मंदिर
जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती
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अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे
तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था
सियासत में वो नफरत बो रहे हैं
जिन्हें बस प्यार बोना चाहिए था
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12 जुलाई 2009 की तड़के नक्सलियों ने मदनवाडा़ कैम्प के दो जवानों को तब गोली मारी, जब वो शौच के लिए गए थे। इस घटना की खबर मिलने के बाद मैं, मेरे साथी पत्रकार कमलेश सिमनकर और दूरदर्शन के रिपोर्टर भाई परमानंद रजक के पुत्र युवा पत्रकार लोकेश रजक के साथ मानपुर और मदनवाडा़ के लिए रवाना हुआ। तब तक हममें से किसी को नहीं पता था कि मदनवाडा़ में नक्सलियों ने जो किया, वो सिर्फ एक ट्रेलर था, नक्सलियों ने कुछ बडा़ करने की तैयारी कर रखी थी। 12 जुलाई 2009 की उस रविवार की सुबह अपने दो जवानों की शहादत की खबर मिलने के बाद राजनांदगाँव के पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे खुद घटनास्थल के लिए निकले और नक्सलियों ने मानपुर से कुछ ही दूर कोरकोट्टी में राजनांदगाँव जिले के इतिहास का सबसे बडा़ खूनी खेल खेल दिया।*****डायरी के पन्नों से : कार्यशाला - प्रकृति संग्रहालय की स्थापनासादर अभिवादन
सादर अभिवादन
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