सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
4896 ...वृंदावन गोकुल का ग्वाला कनेर कुण्डल वाला
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
4895...कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी की नहीं कोई कहानी...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
जो मैं कर पाया,
वह बहुत अच्छा था,
पर जो कर नहीं पाया,
उसको कर न पाने से
मैं उदास रहता हूँ।
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नहीं सरल समर्पण की राह
पीड़ा से होकर जाती है,
पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा
दुनिया सुखमय हो जाती है!
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नियति उसे
डाँटती-फटकारती है।
एक उम्र तक
दोनों खूब झगड़ते हैं।
फिर
एक दिन
कवि झोले में हाथ डालता है।
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कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी
की नहीं कोई कहानी
धुवें के छल्ले की तरह उड़ा
दें हंस के सारी परेशानी
ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा
देते ठोकरों से सावधानी
अपनी मौज में रह सीखें सलीका
जीने का आसानी।
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
4894 ..नौ दिन माँ के नाम और दसवां दिन विजयादशमी
सादर अभिवादन
सिर्फ नै दिन क्यों ,
सारी उमर माँ के नाम ही तो है
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
4893....जग के भीषण कोलाहल में...
देवी का आह्वान करने से तात्पर्य मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं, अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।
व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करना और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों अर्थात् रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कु-वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं अध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।
सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
4892..मोही के संग पढ़ते दद्दू, होकर उसके संग...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
निराश कर्ण अब जा पहुँचा,
गिरि महेंद्र विप्र राम के पास।
वेश बनाये था सरल विप्र का,
जँह पाया ज्ञान दिव्यास्त्र का।।
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1533 आज की स्त्री / डॉ. कनक लता
पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,
सृजित करती है,
सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,
उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती
है,
और लौटा देती है
आपको,
आपके समाज को।
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मिट्टी को छू उस चुनर का
श्रृंगार बन गया साँझ का गुलाब l
अँगीठी की राख लिख रही कच्चे घड़े उस चाँद का ही
नाम ll
मोरनी सी पायलों की झंकार बज
रही उड़ते पतंगों के साथ l
गुल गुलमोहर दरख्तों कर रही
आसमाँ चाँदनी की ही बात ll
किशोर जी के अट्ठाईस बाल गीतों का यह
संग्रह सम्वेदना के इसी बीज तत्व को शिशु मन में अँखुआने, उगाने और अगोरने का अनोखा
यज्ञ है –
‘हर शब्द में जैसे नयी कहानी,
हर पंक्ति में रंग।
मोही के संग पढ़ते दद्दू,
होकर उसके संग।
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"यही समय है निज निर्णय का
गॉठे ढ़ीली करनी हैं
ले संकल्प सकल कर अर्पित
लंम्बित राह पकड़नी है"
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रविवार, 11 अक्टूबर 2026
4891 ..किससे कहता, मेरी किश्ती को डूबने से बचा लो
सादर अभिवादन
शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
4890 ..दिल की बातें कह दें, ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं .....
सादर अभिवादन
किसी नैन सुख को आसानी से नज़र आजाएगा


































