आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
आज के आधुनिक दौर में अभिभावक होना केवल बच्चे की भौतिक ज़रूरतें पूरी करने या उसे बेहतर शिक्षा दिलाने तक सीमित रह गया है।
नौंवी-दसवीं कक्षा के स्कूली बच्चों को एक-दूसरे से होड़ करते,
गति की परवाह किये बिना रफ़्तार से स्कूटी और बाईक चलाते,हुल्लड़ मचाते देखकर मन विचलित हो गया। जाने किस प्रेम से वशीभूत होकर अभिभावक बच्चों को ऐसी दुर्घटना का सामान पकड़ा देते है, फिर अनहोनी होने पर ज़िंदगीभर रोते हैं। प्रशासन और नियति को दोष देने से अच्छा है क्यूँ न पहले सी सतर्क हो जायें।देशभर में प्रतिदिन होनेवाली सड़क दुर्घटनाओं में नाबालिग चालकों का योगदान भी करीब 4% है। सभी अभिभावकों से विनम्र अनुरोध है कृपया ऐसी जरुरी बातों पर जागरुक रहें।
आज की डिजिटल जीवनशैली में
जहाँ संवाद कम हो रहे और तनाव बढ़ रहा है, अभिभावकों को नियंत्रक के बजाय दोस्त और संबल बनने की ज़रूरत है।
बच्चों को असफलता से जूझने का धैर्य, नैतिक मूल्य और संवेदनशीलता सिखाना ही सच्ची परवरिश है। अभिभावकत्व का मूल अर्थ बच्चे को केवल एक सफल पेशेवर बनाना नहीं, बल्कि उसे एक आत्मनिर्भर और ज़िम्मेदार इंसान के रूप में गढ़ना है।
मेरा एक सवाल है-
क्या कर्तव्य निभाने की कीमत
एक शिक्षक का आत्मसम्मान है?
क्या अपराधी को बचाने के लिए
मुआवज़े का नक़ाब पहना दिया जाए?
यह तो न्याय से पहले,
अराजकता का सीधा निमंत्रण है।
नकल को संरक्षण देना
और अनुशासन को अपराध बनाना
शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।
न्याय की कसौटी पर
जब नियम अलग-अलग हो जाएँ,
तब शिक्षा का मंदिर नहीं
केवल राजनीति का बाज़ार बचता है।
किसी भी दुखद दुर्घटना
या अपराध पर सत्ता और प्रशासन का दुख
सिर्फ़ एक दिखावा है।
व्यवस्था के पास हर त्रासदी से निपटने के लिए
पहले से ही तैयार और रटे-रटाए शब्द होते हैं,
जिन्हें सोशल मीडिया और प्रेस में फैलाकर
अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जाती है।
शासक या तंत्र का
व्यक्तिगत दुख भी महज़ एक अभिनय है,
जहाँ आँसू पोछने के तुरंत बाद
काम सामान्य रूप से चलने लगता है
और अगली किसी घटना के लिए
फिर से वही नाटक दोहराने की तैयारी
कर ली जाती है।
नंगे पैर रेत पर चलना
फूलों की महक महसूस करना
दरिया में पैर लटकाकर बैठना
तितलियों के पीछे भागना
मिट्टी के घरौंदे बनाना
शायद भूल गये हैं हम
जीवन की आपाधापी में
जीने की जद्दोजहद की कड़वाहट भुलाकर
मासूमियत ज़िंदा रहे भी तो कैसे?
विपरीत परिस्थितियों की कोख में
उम्मीद और सीख के बीज छुपे होते हैं
हम हार मानने के बजाय
जब सामना करते है तो
नयी राह और रोशनी मुस्कुराकर
हौसला बढ़ाती है,
अपना रचा हुआ
सफलता और मंजिल के पीछे
अंधाधुंध भागती दुनिया
संघर्ष के पलों से मिली
जीवन की मिठास से
हमें दूर कर देती है
जिम्मेदारियॉं और हमारी गलतियॉं
हमें कमज़ोर नहीं बनाती
बल्कि एक नया
अस्तित्व गढ़ती है...
समय की सीमाओं को पार कर
गुफाओं, पर्वतों और खाइयों जैसी
कठिन राहों से गुजरती हुई
बहकर आती है नदी
रास्तों के पत्थरों से टकराकर
वह बिखरती नहीं,
बल्कि खुद को और निखारती है तथा
अपने हर प्रवाह में संगीत घोलती है।
बुलंद हौसलों से भरी नदी लगातार
अपनी असली ज़मीन और अस्तित्व की तलाश में
आगे बढ़ती है।
वह अपनी हर लहर से निस्वार्थ प्रेम करती है
और प्रकृति के नए रंगों से सजी रहती है।
कभी-कभी वह बाहर से शांत और मौन रहकर
अपनी ही गहराई में
नदी का बहना जीवन के साहस,
अटूट प्रवाह और आत्ममंथन
का ही एक रूप है।





