निवेदन।


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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

4873....जालों से उलझनों के

मंगलवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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दिनकर जी आधुनिक युग के उन कवियों में से हैं, जिन्होंने काव्य जगत पर छाये हुए बादलों के कुहासे को चीरकर राष्ट्रीयता और मानवता का प्रखर प्रकाश विकीर्ण किया।

ऐसे समय में, जब देश का लेखक वर्ग राजनीतिक विचारों के आधार पर बुरी तरह विभाजित हैं, जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने में भी राजनीतिक दलों के नफ़े-नुकसान का गणित लगाया जा रहा है, यहां तक कि लोगों की जानों को भी जाति और धर्म के चश्मे से देखकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाने लगी हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

(23 सितंबर 1908 - 24 अप्रैल 1974)


को याद करना न सिर्फ़ समाज और राजनीति को नई दिशा देने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हो सकता है, बल्कि लेखकों को भी उनके दायित्व बोध का अहसास कराने में अहम साबित हो सकता है|


हिंदी साहित्य में दिनकर की पहचान राष्ट्रकवि के रूप में है। उनका साहित्य राष्ट्रीय जागरण व संघर्ष के आह्वान का जीता-जागता दस्तावेज़ है। दिनकर जी की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना कई स्तरों पर व्यक्त हुई है।

दिनकर मानव-मात्र के दुख-दर्द से पीड़ित होने वाले कवि थे. राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि था,शायद इसीलिए वह जन-जन के कवि बन पाए और स्वतंत्र भारत में उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला.

 दिनकर को इस ऊँचे ओहदे पर देश की जनता ने बिठाया है।

उनके समालोचक भी दिनकर के योगदान को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए हैं। दिनकर जी की पथप्रदर्शक

लेखनी को शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं।


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आज की रचनाऍं- 

ज़िंदगी जिन खूबसूरत लम्हों की

 तलाश में बीत गई,

काश! वे पल ठहर जाते 

और ठहरती गर ये भागदौड़।

आपस की चुप्पियों और गलतफहमियों से

रिश्ते दम न तोडे

इसलिए बेहतर है कि

 शिकायतें खुलकर कह दो,

किताब के पन्नों में सहेज कर रखी

अतीत की खूबसूरत निशानी,

ज़िंदगी की ढलती साँझ के साथ

धुंधला रही है।

बीता हुआ समय रीत रहा है 

जिसे चाहकर भी अब वापस पाना मुमकिन नहीं।

ज़माने ने हमेशा मुझमें कमियाँ ही ढूँढ़ीं

और मेरे अस्तित्व पर

प्रश्न चिन्ह लगाया गया।

लाखों कोशिश और सारे प्रयास 

व्यर्थ होकर रह गए।

पर सच तो यही है कि 

यहाँ हर कोई अपनी ही

 तकलीफों में पिघला जा रहा है,

अब कौन किससे मदद की गुहार लगाए?

घुट-घुटकर सिसकती 

इंसानियत को देखकर लगता है—

जीवन के हर दर्द और धूप-छाँव को सहकर,

कुछ अपनों के बीच मुस्कुराकर जीना सीखा

है।

​रास्ते में उदासी, बेबसी से मुस्कुरा कर मिले,

रिश्तों का मन रखने में मन अक्सर तड़पा,

पर न पॉंव थमे,न ही स्वाभिमान झुका।

आगे बढ़ते रहना ही 

​दृढ़ संकल्प है मेरा—

हर संघर्ष को पार करके,

अपनी मंज़िल 

अब तो पाना है।

भीतर की उद्विग्नता

जालों से उलझनों के थमे कैसे

अब वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा...

अब तो शायद ईश्वर के अंतिम

फैसले का इंतज़ार है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

4872...फिर भी हृदय विश्वास में पल रहा है


सोमवारीय अंक

सादर अभिवादन

देखिए रचनाएं....
राह देखते रहे



राह देखते रहे उम्र भर
क्षण-क्षण घडियां
घड़ी-घड़ी दिन
दिन-दिन माह बरस बीते
आंखों के सागर रीते--


उपासना एक्सप्रेस



अनायास उस अजनबी युवती को संबोधित करते हुए मेरे मुँह से निकल पड़ा है-
"आपनेर नाम टा की ?"। (आपका नाम क्या है ?)

वह मुस्कुराते हुए बोली - "मोनालिका .. कैनो ?" (क्यों ?)


वह अचरज भरे लहज़े में मुझसे पूछ बैठी- "आपनी की .. बंगाली, ना बिहारी ?"
(आप बंगाली हैं या बिहारी ?)



कन्या सोच, सोच, सोच


ये जग सारा
दिखता प्यारा
देता खूब निचोड़
कन्या सोच, सोच, सोच
कन्या सोच, सोच, सोच



हृदय में विश्वास पल रहा है


अस्थिर  होती  मति ,
अपना  परिचय  कहाँ   पाएगी   ?
क्षण - क्षण  बदलते  दृश्यों  में  
जगत  का  सार  देख  पाएगी ?
या  सत्य  की  तलाश  में  ,  
बेखबर  बटोही   बनकर  रहना  होगा ?
इतना  प्रबल  आवेग  है ,
हताशा  जब  घटा  घेर  रही  है
फिर  भी  हृदय  विश्वास  में  पल  रहा  है ,
हे  पथिक !  

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सादर समर्पित
वंदन

रविवार, 20 सितंबर 2026

4871 ...झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,

 सादर अभिवादन


देखिए रचनाएं....



राहुल गांधी लगातार 'छात्रों की गूँज' कार्यक्रम के जरिए नई पीढ़ी को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में इसी पीढ़ी द्वारा किए गए आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में ABVP की जीत भाजपा को बहुत राहत देगी।





मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.

झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.





"अच्छा, आप लोग जरा ये बताइए, ऐसी स्वतंत्रता और कहाँ मिलेगी, जहाँ दुनिया के किसी स्वतंत्र देश में 'स्वतंत्र' नामक गुण्डा टीव्ही पर खुले आम इंटरव्यू दे और पूरी दमदारी से कहे कि हाँ उसने एक ग़रीब आदमी का सिर फोड़ा, इसके बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया?" 
दूसरा आदमी बोला -"हाँ,उसका यह भी कहना था कि उस स्वतंत्र देश के बड़े -बड़े ताकतवर लोग उसके बड़े भाई हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहता है और अपराध करने के बाद भी इन ताकतवर लोगों के आशीर्वाद से ही आज वह आज़ाद घूम रहा था."






हर साल धोखा खाती है वह,
हर साल चली आती है बुलावे पर,
बस एक दिन की पूछ होती है,
फिर बेघर कर दिया जाता है उसे। 





आकाश 
एक वही अनंत आकाश 
 झरता है जिसमें से परम प्रकाश 
वही आश्रय है हमारा 
उपजे उसी से 
उसी में समा जाएँगे 
कुछ पल डोलेंगे यहाँ 
इंद्रधनुष की तरह 
देखते-देखते विलीन हो जाएंगे !


सादर समर्पित
वंदन

शनिवार, 19 सितंबर 2026

4870 ...बिना बातों के, जीवन कैसा

 सादर अभिवादन

आज रवींद्र जी फिर भूल गए
उनका पैर शायद भूलन जड़ी 
पर पड़ गया होगा
दिल्ली मे बहुतायत से पाया जाता है

देखिए रचनाएं....



दर्द लिखू या गीत लिखूं मै
मीत बता क्या रीत लिखूं मै 
सुबह - शाम की प्रीत लिखूं या 
तेरे विरह की गीत लिखूं मै
दोपहर की धूप लिखूं या 
रात की सुनी - सुनी बगिया 
अपने दिल के गीत लिखूं मैं 





सूरज कोई
आसमान से
अपने आप न आए
हम में सब में
जितना प्रकाश है
सारा बाहर जाए

सूरज बनता
किरण-किरण को
पुंज बनाने से






कर कुछ बात, ऐ उमस भरी काली रात,
बिना बातों के, जीवन कैसा,
जीवंत एहसासों बिन,आंगन कैसा,
जगाए, ऐसी ही बात!








सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

4869...ऐब कुछ लोग,सर-ए-आम उसमें ढूॅंढेंगे

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज की रचनाऍं- 


कभी बैरागी होकर
पहाड़ों में चले जाते हैं—
चुप्पी ओढ़कर,
ध्यान में बैठने।

और कभी
पर्वतारोही बनकर
पहाड़ को नापते हैं,
जैसे ऊँचाई से
कुछ नीचे छूट जाएगा।




बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता, 

ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमें ढूंढेंगे

 

मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली 

नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमें ढूंढेंगे







साधारण अस्त्रों-शस्त्रों से 
उसका वध नहीं हो सकता 
उसके क्रूर अत्याचारों से 
रक्षा करें हे परमपिता।

परोपकारी महान त्यागी
शिवभक्त दयालु हैं दधीचि 
विश्व के कल्याण हेतु वे
उत्सर्ग करेंगे अपनी अस्थि।




अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। 



यदि अकेले ही यात्रा करनी हो तो उसके पहले कुछ जरुरी एहतियात बरतना बहुत आवश्यक है ! सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का आकलन जरूर करें। हो सके तो अपने डॉक्टर की सलाह भी ले लें, इससे मनोबल में बढ़ोत्तरी होगी ! अपनी दवाइयों के साथ अपनी एक छोटी सी मेडिकल इन्फॉर्मेशन शीट भी रख लें ! ऐसी जगह चुनें, जहां आवागमन सुगम हो, जहां जा रहे हैं वहां के माहौल, मौसम की जानकारी भी जरूर ले लें !  एक दिन में कम जगहें, आराम से देखें, ताकि बिना थके यात्रा का आनंद ले सकें। अपने साथ एक छोटा कार्ड रखें, जिस पर आपका नाम, दो मोबाइल नंबर, जिनसे आपात स्थिति में संपर्क किया जा सके ! 




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

4868 ..दिन , तारीखें , महीनें , साल निकल जाने वाला है

 सादर अभिवादन

आज विश्वकर्मा जयंती है


भाई रवींद्र जी को आज आना था
लगता है कल गणेश पंडाल में कुछ ज्यादा ही
नाच लिए

देखिए रचनाएं....



दिन , तारीखें , महीनें , साल  निकल जाने वाली है
तुम चलते रहो , एक  समय  मंजिल तक पहुँच जाओगे
गोया मुस्कुराते  नहीं , मुस्कराओं  चलते  जाओ
मुसाफिरी  अभिमानी  नहीं , ईर्ष्या  नहीं  द्वेष  नहीं





यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजह थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। 
किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।





प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है।
स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है?


खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 
उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।


सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 16 सितंबर 2026

4867..हर मौसम का मोहित रूप

 

।।प्रातःवंदन।।

"हमें चाहिए

हलचल ऐसी

धधके जो

दावानल जैसी

आँखें

उसे तलाश

रही हैं!"

नचिकेता

चलिए इसी को मद्देनजर रखतें हुए नज़र डालें आज की प्रस्तुति पर..

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !

✨️

मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं

खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य 

ना पहले सी मिट्टी में ख़ुशबू रही ना वो पहले सी रीति ।


जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था 

पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का बीता जमाना था 

नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप 

✨️


छन्द जिज्ञासा के

आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास। 

नक्षत्रों ने दीप जलाए

(कविता संग्रह)

(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर) 

संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ..

✨️

ख़ामोश संवाद

 

उस दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,

हवा के भी
कान खड़े हो गए थे..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

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