निवेदन।


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सोमवार, 30 मार्च 2026

4697 ..कुछ उनकी सुनी होती, कुछ अपना कहा होता.

सादर अभिवादन
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चंद श्वास लेकर आये थे
कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,
कहीं अधूरा न रह जाये
किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !




 जल्दी ही स्क्रीन पर मूवी का नाम लिखा आया - ' इश्क हुआ है धीरे - धीरे '
कॉलेज स्टोरी से शुरू होकर मूवी धीरे - धीरे आगे बढ़ती है और लव स्टोरी का तड़का लेकर कई स्ट्रगल करते हुए एंड में हीरो - हीरोइन की शादी तक पहुंचकर खत्म हो जाती है।
बीच - बीच में कई जगहों पर कुछ रोमेंटिक सीन भी आते जा रहे थे।
सौम्या ने नोट किया कि उनके आगे - पीछे की सीट पर और बगल की सीटों पर भी ज्यादातर यंगस्टर्स ही बैठे थे।
और सिर्फ बैठे नहीं थे, बल्कि एक - दूसरे के हाथों में हाथ लिए हुए या गले बाहें डाले हुए भी बैठे थे।
लेकिन सीट पास होने के बाद भी उसे लग रहा था कि ईशान उससे काफी दूर बैठा है।





जीवन का सफ़र हमने, तन्हा न चुना होता.
कुछ उनकी सुनी होती, कुछ अपना कहा होता.

इक बार सनम लब से डाली को छुआ होता.
मुमकिन है के पतझड़ में, पत्ता न जुदा होता.




चिड़ियों के 
पँख बचे 
नदियों में धार रहे,
बारूदी गंध 
मिटे 
दुनिया में प्यार रहे,
ओ वंशीधर 
अपनी 
बॉसुरी बजाना.




कुछ दूर पराई बस्ती में
इक दीप जलाना बाकी है।

तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।


सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 29 मार्च 2026

4696..यादों की महफ़िल में फिर कहीं सितार बजे

 सादर अभिवादन 


29th March Special Day 

29 मार्च को रविवार के दिन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। 

29 मार्च का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1857 में इसी दिन मंगल पांडे ने बैरकपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति की चिंगारी सुलगाई थी। इसके अलावा, 1953 में हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल की थी।

हर साल 29 मार्च को 'विश्व पियानो दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है

 

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वे तो सर्वदा
तुम्हारे नियम के
प्रतिगामी रहे,
वे तो सर्वदा
ऊर्ध्वगामी रहे।

काश, तुम उस दिन
सेब की बगिया में नहीं,
प्रेम की बगिया में होते।



रामजी कहने लगे, “मुम्बई पुलिस जब काम करती है तो तेजी से करती है. फिर प्रशांत बाबू जाएँ तो पुलिस को फौरन एक्शन में आना पड़ता है. बिटिया, तुम्हें मेरे रहते मुंबई में किसी तरह की फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है.” रामजी का स्नेह उसे अपनी पुरानी ज़मीन से जोड़ता था.

तभी आकाश का कॉल आया. "प्रिया, मैंने साइबर विंग के उच्च अधिकारियों से बात की थी. सभी फेक आईडी ब्लॉक कर दी गई हैं. वे जल्दी ही विक्रांत का आईपी एड्रेस ट्रैक करके कोटा पुलिस को सूचित करेंगे. जिससे उसे मुंबई लाया जा सके. तुम अपने काम पर ध्यान दो."



किसी वायरस को हमारे शरीर में प्रवेश करने के लिए किसी पासपोर्ट और वीजा की तो आवश्यकता नहीं होती न! यह वैक्सीनेशन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, तब इंड्यूस्ड इम्यूनाइजेशन का क्या औचित्य? प्रचार किया जाता है कि टीकों में एटेनुएटेड वायरस या एंटीजेन सीरम का प्रयोग किया जाता है।
यही प्रक्रिया तो प्रकृति की भी है, तब इंड्यूस्ड क्यों?
यह पाया जाता रहा है कि निर्धन परिवारों के मिट्टी में खेलने वाले बच्चों की रोगप्रतिकारक
क्षमता उन बच्चों से अधिक होती है जो हाइजीन का बहुत अधिक पालन करते हैं।
यह निर्धन देशों के लिए प्रकृति की निःशुल्क व्यवस्था है।

चिंता का विषय यही है कि कैंसर रोकथाम के नाम पर कहीं
यह बिल गेट्स प्रायोजित जैविक युद्ध तो नहीं?




होठों पर 
मधुर हँसी 
आँखों में स्वप्न सजे,
यादों की 
महफ़िल में 
फिर कहीं सितार बजे,
बचपन फिर 
खो जाए 
परियों की रानी में.




यमुना के इसी पाट पर
कालिन्दी के इसी घाट पर
कन्हैया ने की थी लीला,
यहीं शीश नवाते हैं हम 
लीला स्मरण कर अब तक ।
यमुना की लहरों पर लिखा
अब भी साकार लीला सार ।




सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 28 मार्च 2026

4695 ..होश है या कोई ख़ुमारी है, है सुकूँ या कि बेक़रारी है,,,

 सादर अभिवादन 

कल अष्टमी थी
आज रामनवमी है
और मार्च मास की विदाई
इस मार्च में, अप्रैल मास में होने वाले उत्सव 
इन दो-तीन दिनो ं सम्पन्न हो गया

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फ्लैट फर्निश्ड था लेकिन कुछ ज़रूरी बर्तन, बेड के लिए चादर, तकिए के गिलाफ और कुछ किराना के सामान वह ले आई थी. पहली रात उसने खुद के लिए चाय बनाई. वह सोच रही थी कि उसे अपनी जरूरतों के लिए जो सामान चाहिए सुबह उनकी लिस्ट बनानी पड़ेगी. जिससे सप्ताहांत के इन दो दिनों में सारा जरूरी सामान खरीद ले. उसने सोने की कोशिश की लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थीं. उसने उठ कर खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुम्बई कभी नहीं सोती. उसे समझ आया कि आज़ादी की सबसे बड़ी चुनौती 'अकेलापन' है. तभी फोन पर आकाश का मैसेज चमका— "फ्लैट कैसा है? तान्या कह रही है कि अब वह अपनी छुट्टियाँ मुम्बई में दीदी के साथ ही बिताएगी."

मैसेज पढ़कर प्रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने महसूस किया कि वह एक साथ दो लड़ाइयाँ लड़ रही है—एक बाहर की दुनिया से और दूसरी अपने ही परिवार के प्रति उपजे उस 'अविश्वास' से, जो उसे अपनी ही जड़ों से दूर कर रहा था.




“अरे, इतनी भी चिंता क्यों कर रहे हो उपले भाई ! मैं हूँ ना चिर युवा ! मेरे होते तुम पर कोई आँच नहीं आएगी ! तुम्हारी साज सजावट तो सिर्फ इसलिए है कि घर में ब्याह शादी हो तो सारे बारातियों को 
सज धज के तैयार रहना चाहिए ! न जाने किसकी पुकार लग जाए ! तुम चिंता न करो ! मेरे होते तुम्हारी शहादत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी इसका भरोसा है मुझे !”

तसल्ली देती यह आवाज़ थी इन्डक्शन चूल्हे की! 




मन पूछता है 
क्या सच में हम 
इतने बेबस हैं? 
शायद, हमारे भीतर का मनुष्य 
धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है, 

पर फिर, 
एक छोटी-सी, 
शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद 
कहती है कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से 
हमारे हिस्से के तेल-गैस के जहाज़ 
सही-सलामत आ जाएँ…



एक जादू तुमको दिखलाये 
डालो बीज पेड़ बनेगा 
हरा - भरा यह बाग़ बनेगा 
जब तुम इसको देखोगे 
हंसी - ख़ुशी तुम गाओगे 
पेड़ को दोस्त बनाओगे 




होश है या कोई ख़ुमारी है? 
है सुकूँ या कि बेक़रारी है? 

तेरा होना अजाब था दिल पे, 
तू नहीं तब भी दिल ये भारी है| 

रतजगे बन गए नसीब उनका, 
वस्ल में शब जो इक गुजारी है| 


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

4694...उस अनचाही युद्ध की दास्तां...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

101-युद्ध के आखिर में जला

आने वाली पीढ़ियों को सुनाओगे

सदियों तक,

उस अनचाही युद्ध की दास्तां

जो कभी नहीं चाही थी,

उस जली हुई जमीन ने,

सड़े हुए जवान जिस्मों ने,

और एक उजड़ी हुई सभ्यता ने,

*****

परछाइयाँ

जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.उन्होंने थाली के पैसे लेने से भी इन्कार कर दिया. आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.रामजी ने खुद को प्रिया का चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.रामजी ने उससे पैसे नहीं ही लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.

*****

 उस बारिश के बाद-11

सौरभ की मां को जरूर उसके बारे में सब कुछ पता था। लेकिन उन्होंने कभी सौरभ के पिता को इस बारे मे कुछ नहीं बताया था और आगे भी बताने का कोई इरादा नहीं रखती थी।

अब जबकि पूरे तीन साल बाद सौरभ लौटकर शहर वापस आ चुका थातब सौरभ की मां को लगा कि शायद अब वह अपना अतीत भूल चुका होगा और एक नई शुरुआत करने के लिए वह वापस आया है।

लेकिन उसने तो पहले ही दिन अपनी मां के विचारों को गलत साबित कर दिया था।

*****

तीखे बोल-(लघुकथा)

सोनाक्षी को समझते देर नहीं लगी- यह फिकरे किस पर......।
उसका दिल लहूलुहान........।
 मन में संकल्प लिया- "चाहे जो हो, अब कभी भी इनके बच्चों की ........।"
      ईश्वर ने जल्द ही वह दिन दिखा दिया। अर्चना की जेठानी जी स्वर्ग सिधार........।
गाँव जाना भी आवश्यक है और बच्चों की छह माही परीक्षा ........।
अब न अर्चना जी को ही मुँह रहा कि बच्चों की देखभाल की...........।
 न ही सोनाक्षी का मन...........।

*****

कठिनाई

हमने तो ज़िन्दगी को बड़े करीब से देखा है 

हर मुश्किल को लड़कर जीता है 

हर मुश्किल से एक नया सबक सीखा 

आज ऐसा लगता है कि 

अगर ये मुश्किलें न होती तो 

शायद इतनी खूबसूरत मुस्कान भी न होती 

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


गुरुवार, 26 मार्च 2026

4693 रीति-नीति हर आयातित है भागें कहां,

 सादर अभिवादन 


इस बार लोगों में रामनवमी की सही तारीख को लेकर कंफ्यूजन है. 
जानें 26 या 27 मार्च में कब मनाई जाएगी रामनवमी,  
ये युद्ध क्या हुआ, सारे धार्मिक पंचांग गड्ड-मड्ड हो गए
चलिए दो दिन मना लेते हैं दो दिन पंजीरी खा लेंगे

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हाँ , मन लौटना चाहता है
अंतरतम की गहरी गली में..
जहाँ मिले उसे 
अपना संतुलन,
अपनी गहराई,
अपना मौन और
असीम शांति के साथ वही स्थिरता
जिसमें बड़े  सुकून  से
धीरे-धीरे जन्म लेगी
फिर से...
उसकी अनुभूतियों की
वही कोमल धारा ।
उसकी अपनी कविता !




वह रहती या रहता कान्हा 
दोनों नहीं समाते घर में, 
नील गगन सा जो विशाल है 
प्रेम रहेगा कैसे मन में !





धोखेबाज खुश्बुओं के वृत
केंद्र बदबुओं से शासित है 
नाटक-त्राटक, चढ़ा मुखौटा 
रीति-नीति हर आयातित है 

भागें कहां, 
खडे सिर दुर्दिन 
पड़ा फूंस है, लगे पलीते---





समाप्ति की क़गार पर खड़े 
बोझिल संबंधों के कदम, 
छटपटाते बेचैन हो, 
दहलीज पार करने को, 
लुभा रहा जो आकर्षण, 
बाहर की दुनिया का




वो जो, गुजर रहा ये लम्हा,
वो जो, पुनः घटित हो रहा ये यहां,
उकेरेगी मन पर कोई निशाँ,
कल वे, बनेंगी दास्तां!




कुएँ की अँधेरी देह में
जल की तरह
ठहर जाती है
जहाँ गिरती हुई आवाज़ें
अपने ही वज़न से
धीरे-धीरे
डूबती हैं,
मौन की तलछट में बदलती,
और फिर
किसी अनजानी प्यास की दरार से
फिर से
कविता की तरह
रिसने लगती हैं।




गद्दारों के मुँह पर चाँटा 
पाकपरस्तों में सन्नाटा 
सत्तर साल का भांडा फूटा 
सेकुलरिज्म के पाँव में कांटा 
भारत की सेना की ताकत 
का सुन्दर पैगाम धुरंधर.

सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 25 मार्च 2026

4692..मतभेद तो होते रहे हैं..

 "उषा सी स्वर्णोदय पर भोर

दिखा मुख कनक-किशोर;

प्रेम की प्रथम गदिरतम-कोर

दृगों में दुरा कठोर !

छा दिया यौवन-#शिखर अछोर

रूप किरणों में बोर;

सजा तुमने सुख-स्वर्ण-सुहाग,

लाज-लोहित-अनुराग..!!"

 सुमित्रानंदन पंत

 सुभाषितवाणी लिए आज फिर हाजिर हूँ बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ..

एक्सपायरी डेट का उजाला

 

अंधेरे के हिमायती

उजाले के लिए सुरक्षित खेतों में

चुपचाप अंधेरा बो गए।

जब फसल लहलहाई,

तो पहरे पर खड़े कर दिए गए

असंख्य प्रवक्ता—

✨️

इंसान आपस में लड़ते ही रहेंगे | 

तब तक , जब तक तीन टांगी वाले एलियंस धरती पर नहीं आ जाते और इंसानो को एक साझा दुश्मन नहीं मिल जाता | 

जैसे प्रेम है , भूख है , लालच है , वैसे ही इंसान के वजूद में नफरत भी है | 

✨️

छत्तीसगढ़ी गजल"

करथे अलकरहा बात कभू

दिन ला वो कहिथे रात कभू

जिनगी के पोनी उरकत हे

तँय सूत करम के कात कभू..

✨️

शब्द !

          अक्सर देखती हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों की शिकायत होती है कि लोग सुप्रभात, शुभ रात्रि भेजते रहते हैं और हमें इस बात से बहुत ही चिढ़ होती है। अगर इसे भेजने की जरूरत को समझा जाय तो इस जीवन की आपाधापी में हम न तो अपने बहुत करीबियों से ..

✨️

बधाई जीते जी इलाहाबाद!

हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही है। यहाँ परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष नहीं, अपितु समीक्षा का विधान रहा है। शास्त्रार्थ के बिंदु विचारधारा नहीं विचार रहे हैं। मतभेद होते रहे हैं, किंतु मनभेद किंचित नहीं। दर्शनों की धारा में विचार आस्तिक और ..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 24 मार्च 2026

4691... आरंभ हुआ नवीन अध्याय

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------
मानवता की सीख बचपन से ही
कंठस्थ करवाया जाता है
जब घर के बड़े समझाते हैं
"सबसे प्यार करो"
"पशुओं पर दया करो"
"भूखे को खाना खिलाओ"
"प्यासे को पानी पिलाओ"
"किसी को अपने फायदे के लिए मत सताओ"
और भी न जाने कितनी अनगिनत बातें होगी
जो हम सभी समझते और जानते हैं।
फिर भी समाज में अमानवीयता और बर्बरता 
की बहुलता,असंतुलन
क्या हमारी जड़ोंं के
खोखलेपन का संकेत है?
या फिर,
मानवता और दानवता के 
दो पाटों में पीसते मनुष्य मन
की कहानी
सृष्टि के विधान के अनुसार? 
-----------
आज की रचनाऍं- 

 
आरंभ हुआ नवीन अध्याय
संघर्ष और विजय का पर्व
समय की समता का उत्सव
नव चेतना का शुभ पदार्पण 


मगर इश्क़—
मंज़िल नहीं पूछता,
वो बस चलाता है…

कभी किसी के साथ,
कभी बिल्कुल अकेले—
पर हर मोड़ पर
तुम्हें तुमसे मिलाता है।




खुशियों की दौलत बटोरी उन्होंने
गमों की सौगात मिरे नाम आई
 
ख़ुशी का है आलम, तुम संग में हो
बड़ी मुश्किलों से है ये शाम आई





एयरपोर्ट पर भी और फिर पूरे सफर में सभी लोग अपने अपने फोनों में घुसे मानो फोन नहीं देश चला रहे हों – सब एकदम धीर गंभीर। कान में इयरफोन और उँगलियाँ फोन की स्क्रीन पर घूमती। पति पत्नी भी आपस में बात करने की बजाय अपने अपने फोन में मशगूल दिखे। अच्छा लगा कि इसी बहाने उनका सफर बिना झगड़े और बहस के कट गया।




ऐसी तुकबन्दियाँ और भी हैं पर अभी मुझे इतनी ही याद हैं ।
कपड़ा, जेवर, शान-शौक और सुविधाओं से वंचित, जीवन की गाड़ी को मरुस्थल में भी हँस कर खींचने वाली ये ग्रामीणाएं जिस सहिष्णुता से जीवन की विसंगतियों से जूझती हैं ,सम्बन्धों का उत्सव भी उतने ही उल्लास से मनातीं है । स्नेह का ऐसा उदार और गहरा रूप अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । हालाँकि उनके स्नेह व उदारता की कभी कोई कहानी नही बनती ।
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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