निवेदन।


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गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

4707 ..अहं ब्रह्मास्मी, अहं कृष्णास्मी,अहं त्वमस्मी

 सादर अभिवादन


एक व्यक्ति होटल की टेबल पर बैठा था.
वेटर बोला - सर क्या लेंगे?
व्यक्ति - गुजरा हुआ वक़्त.
वेटर बोला - सर वो तो खत्म हो गया पछतावा ताजा है वो ले आऊँ.



सब्र का रास्ता मुश्किल ज़रूर होता है
लेकिन सब्र करने वाले की मंजिल
खूबसूरत होती है


रचनाएं ....



तुम्हारे हर उस जुर्म का
मैं ही हूँ कारक 
तुम्हारे हर उस पुण्य का
अहं ब्रह्मास्मी 
अहं कृष्णास्मी
अहं त्वमस्मी





प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: 
"दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."

शाम को रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें 
तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर 
यहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना खाएंगे."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. 
कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."




मगर मैं भी तो इंतज़ार करती हूँ 
अपने समय का, अपने पल का।
शाम होती है, पाँच बजे…
मुझे भी लीश डाल कर ले जाते हैं
घूमने, हवा में सांस लेने।





बचपन बीता, जवानी आई, बढ़ती रही ये लगन,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा उसे दिल में बसा लिया है।

आज वो आधा सा क्यों नज़र आता है मुझे,
लगता है उसका आधा दिल मैंने ही ले लिया है।





फिर—
उसकी उसी मुस्कुराती तस्वीर को
हर चौराहे पर
होर्डिंग बनाकर टाँग दी गई,

और नीचे लिखा था—
“यह है
राज्य की खुशहाली का प्रमाण।”




सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

4706..इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

 ।।प्रातःवंदन।।

जंग… आखिर देती ही क्या है?

जंग जीतने वाले शायद जश्न पर हार तो इंसानियत की होती है..बचे  मासूम चेहरों को न राजनीति समझ आती, न ही सरहदें…उन्हें बस विवशता  भरी नजर और भूख लगती है और थोड़ा सा सुकून की आस।बहुत दुखद है यह देखना..

यह गुंजार कहाँ से आयी

चौंक पड़ा, मैं बोल उठा,

कँपने लगा हृदय, हरि जाने

मैं भय-विह्वल डोल उठा !

माखनलाल चतुर्वेदी

इन्हीं  कशमकश के बीच बुधवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं..

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !

✨️

नई पीढ़ी !

                   अस्पताल के बाहर कार और बाइक के स्टैंड अलग अलग बने थे और दोनों तरफ वाहन खड़े थे कि इतने में हड़बड़ी में एक साइकिल वाला आया और जल्दी से साइकिल खड़ी करके अंदर की तरफ भागा। 

जल्दी में साइकिल डगमगा गयी, 

✨️

आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

अब AI (आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस) का जमाना है। बनाने वाले ने तो न जाने क्या सोच कर बनाया होगा मगर इस्तेमाल करने वालों के तो क्या कहने।

बनाया तो भगवान ने भी ..

✨️

चार दिशाओं में
मिलने के लिए आना चाहती थी
मायके की छत के नीचे
ताकि बांट सके अपने संताप को
और सुख के संदूक को 

पर आ न सकी कभी इकट्ठी..

✨️

तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह

मिलेंगे अब तो सिर्फ़ दुश्मन की तरह

तुम भुला दो मुझे बचपन की तरह


।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

4705...अमित,तुम्हें कैंसर है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------
जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है।
नून-रोटी के जुगाड के ज़द्दोज़हद में अनगिनत पल ऐसे आते हैं जब निराशा एक अंधेरी गुफा की तरह
मन पर छा जाती है।
कोई राह नहीं सूझता,अंधेरे में अनजान मुसीबतों,
 ठोकरों और शत्रुओं के प्रति आशंकित मन फिर भी
घुप्प अंधेरी गुफा का छोर ढूँढ़ना नहीं छोड़ता है
और तब तक टटोलता रहता है जब तक कोई
 उजाले की किरण उस कालिमा को मिटा न दे।
उजाला जीवन की सकारात्मकता,आशा,खुशियाँ और प्रगति का प्रतीक होता है।


आज की रचनाऍं- 


यह पोस्ट लिखना इस लिए जरूरी लगा कि अब तक सबसे फ़ोन पर और इनबॉक्स में झूठ बोल बोल कर थक गया था। अधिकतर लोग शक कर रहे थे कि जिम की पिक नही आ रही, मुम्बई में इतने दिन क्यों, नए जॉब का क्या हुआ etc.

Life_is_so_unpredictable , क्या क्या नही सोच लिया इस बीच मगर यह समझ मे आया कि अंदर की मजबूती ही फाइट करने का सहारा बनती है बाकी दुनिया फिर बेमानी लगती है।




जघन्यता और पाशविकता
चीखों की जनक हैं
इनका जन्म
अक्सर
आदिम हवस
और धार्मिक कट्टरता की
अंधी सुरंगों में होता है।

 




बस… यहीं से हर किसी की आँखें नम हो गईं… 😢
क्योंकि ये सिर्फ़ कार्ड नहीं था, ये इंसानियत का पैग़ाम था।  
आज जब दुनिया धर्म के नाम पर बंट रही है, तब ये कहानी हमें याद दिलाती है:
👉 मोहब्बत का कोई मज़हब नहीं होता
👉 रिश्ते खून से नहीं… दिल से बनते हैं




सेना की भर्ती खुली है
बीच युद्ध के दौरान
और इसमें भर्ती होने से मना करना 
राष्ट्र के लिए कर्तव्य की अवहेलना है
जबकि रोजगार के अवसर भेंट चढ़ गए हैं
युद्ध के उन्माद के ! 



सुनो, सीता,

मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ, 

तुम्हारा अपहरण नहीं होता, 

तो मैं युद्ध नहीं करता,

पर मेरी जगह कोई और होता,

तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,

उठवा लेता लंका का सारा सोना।




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

4704 ...मैडम, हम आपके "फेसबुक फ्रेंड" हैं

 सादर अभिवादन



तीन चोर अचानक एक घर में घुसे।
उन्होंने महिला से कहा, "हम आपके घर का सामान बिखेरना नहीं चाहते और न ही
आपको नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।
इसलिए हम यहाँ सोफे पर बैठ रहे हैं, जो भी नकदी और गहने आपके पास हैं, चुपचाप लेकर आइए।"

महिला नकदी और गहने लेकर आई। चोरों के सरदार ने कहा, "वो हीरे की अंगूठी कहाँ है
जो आपके पति ने शादी की सालगिरह पर आपको गिफ्ट की थी?" 
महिला चुप रही और अंगूठी लाकर दे दी।

"वो घड़ी भी लाइए जो आपकी बहन ने दुबई से भेजी थी।"
महिला की आँखों में आँसू आ गए और उसने अपनी बहन का दिया हुआ उपहार भी सौंप दिया।

इसके बाद चोरों ने कहा, "अब हम 'नेसकैफे' की इंस्टेंट कॉफी पीएंगे, क्या आप इजाजत देंगी?"
कॉफी पीने के बाद, चोरों के सरदार ने कहा, "अब वो पाइनएप्पल केक लाइए जो कल बचा हुआ था।"

जब चोर सारे सामान लेकर जाने लगे, तो महिला ने झिझकते हुए कहा, "आप लोग बड़े प्रोफेशनल और 
नैतिक चोर लगते हैं लेकिन आपने हमारे घर की इतनी सारी चीजों के बारे में कैसे पता लगाया?"
चोरों के सरदार ने अपने चेहरे पर मास्क ठीक करते हुए कहा- "मैडम, हम आपके "फेसबुक फ्रेंड" हैं 
और #आपकी_पोस्ट और स्टेटस नियमित रूप से पढ़ते रहते हैं।"

रचनाएं देखें



चीख की
कोई भाषा नहीं होती,
उसे सुनने के लिए
किसी अनुवादक की ज़रूरत नहीं—
उसका एकमात्र वाहक
संवेदना है,
और संवेदना की भी
कोई भाषा नहीं होती।

हृदयविदारक होता है
चीख और संवेदना का मिलन,
क्योंकि इस मिलन से
जन्म लेती हैं
पराश्रव्य सुबकियाँ।




सुन के हज़ार क़िस्से 
हमने ये आज माना 
हर बार ही नए हैं 
क़िस्से ये प्यार के

मुझसे ख़फ़ा है आज जो 
बरसो के मीत है 
कहते हैं आप ही क्यूँ 
दुख औरों के काटते




जगाए, यूँ कोई उत्सुकता,
बढ़ाए, सफर में, हर पल कोई, मेरी उत्कंठा,
न प्रारब्ध हो, फिर यहां,
न अंत हो कहीं, इस सफर का!





बच्चों को भी अगर एकदम से बहुत सारी बातें समझाने लगो, तो वो भी ‘उछल’ जाते हैं… मानते नहीं।
लेकिन अगर प्यार से, धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा समझाया जाए… तो वो भी मान जाते हैं।”
निधि मुस्कुरा उठी।
उसे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।





प्रशांत बाबू ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा, "कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो गेट पर केवल मज़दूर आत्म-सम्मान के साथ खड़े होंगे. हमें हड़ताल को अहिंसक बनाए रखना है, इसका ध्यान यूनियन के पदाधिकारियों को रखना है. अफवाहों का खंडन करने के लिए समय-समय पर ‘पर्दाफाश’ संदेश और हर आधा घंटे में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' व्हाट्सएप पर आते रहेंगे. प्रबंधन मजदूरों को उकसाने के लिए गुंडों या बाउंसरों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन हमें पूरा ध्यान रखना होगा कि हम उत्तेजित न हों. यदि मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाने की कोई कार्यवाही हो तो हम उससे तुरन्त निपटेंगे और अपनी ओर से हिंसा न करेंगे. हमारे मजदूरों को हर हाल में हिंसा से बचना है. हमारी शांति ही हमारा सबसे बड़ा हथियार होगी."

प्रिया और उसके साथियों ने महसूस किया कि वे पहली बार किसी 'सिस्टम' को क्रैश होने से बचाने का काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक नए, न्यायपूर्ण सिस्टम को जन्म लेने में मदद कर रहे थे. दफ्तरों और घरों में घंटों कोडिंग के जालों से उलझने के दौरान जिस तरह की बोरियत और ऊब उन्हें सामना करना पड़ता था,वैसी यहाँ नहीं थी. उसके विपरीत उन्हें अपने कोडिंग के ज्ञान की ताकत और उसके उपयोग का एक नया मानवीय चेहरा नज़र आ रहा था.





निभाता क्यों नहीं ‘उलूक’ तू भी किसी
एक इसी तरह के एक आदमी का किरदार
कल जब उसकी आ जायेगी सरकार
तुझे क्या लेना और देना वो वहाँ क्या करता है
तुझे मालूम है तेरा यहाँ रहेगा अपना ही कारोबार 

****
सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 5 अप्रैल 2026

4703...रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से जब फूटेंगे कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे हरे-भरे पेड़...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

युद्ध और चिड़िया 

बंजर हुई धरती की दुर्दशा पर
रोते चातक के ऑंसुओं की नमी से
जब फूटेंगे 
कुछ रंग और ख़ुशबू से भरे
 
हरे-भरे पेड़
उनकी डालियों में वो
फुदक-फुदक कर गा सकेगी
फिर से प्रेम और करुणा से भरी

जीवन की पवित्र प्रार्थनाऍं...।

***** 

मैग्मा की रसीद

चारित्रिक पतन सिर्फ़ स्त्रियों के लिए ही क्यों कहा जाता है? अगर कोई स्त्री वैश्या बनती है, तो क्या पुरुष सहभागी नहीं होता? जो स्त्री को मैला कहकर खुद को साफ़ घोषित कर देते हैं, वे आखिर किस आईने में खुद को देखते हैं?” अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना ही वह बोल भी पड़ीभीड़ में हलचल हुई। मंच पर बैठे चेहरे असहज हो उठे।

गाँव में भीड़ द्वारा स्त्रियाँ प्रताड़ित की जाती हैं, तो उसके चरित्र को मोहरा बनाया जाता है, कार्यालय में किसी स्त्री को पदोन्नति मिल जाए, तो उसकी मेहनत नहीं, उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं। और हद तो यह है कि साहित्यजो समाज को दिशा देने वाला कहलाता हैवहाँ भी इस सोच से अछूते मनुष्य नहीं हैं।मेधा ने आगे कहाअब उसकी आवाज़ और गम्भीर हो गई थी

*****

लोक उक्ति में कविता

लोक उक्ति में कविता’* के मूर्त रूप लेने पर हृदय अगाध कृतज्ञता से भरा है। इस यात्रा में मिले सहयोग को शब्दों में पिरोना कठिन है, किंतु भावों की अभिव्यक्ति अनिवार्य है।​*प्रकाशक एवं मार्गदर्शक*​सर्वप्रथम, मैं *कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर* की हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मेरी अनुभूतियों को मुद्रित अक्षरों का स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से, श्रद्धेय *डॉ. शास्त्री मयंकजी* के प्रति मैं नत-मस्तक हूँ, जिन्होंने अपनी ओजस्वी भूमिका और आशीर्वचनों से इस कृति की गरिमा बढ़ाई है।

*****

पुर्जा नहीं, इंसान

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

*****

संगठन में शक्ति

किसान ने एक योजना बनाई।

उनसे आठ  लकड़ियाँ मंगाई।

चार को  साथ रस्सी से बंधा।

चार को अलग - अलग रखा।

प्रत्येक पुत्र को पास बुलाया।

बँधी लकड़ियों को तोड़बाया।

पर लकड़ियां उनसे नहीं टूटी।

मिलकर  पाई  थी  मजबूती।

*****

जीवन के पास क्या मरहम है?

सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।

*****

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव 

 

 

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

4702 सबमें अपनेपन की माया अपने पन में जीवन आया

 सादर अभिवादन


ये है छत्तीसगढ़ की पावन धरा के महादानी
दीवान बहादुर रायसाहब दाऊ  कल्याण सिंह जी रायपुर 
शहर का प्रतिष्ठित डी. के. हॉस्पिटल इन्ही के नाम पर है
आज आपकी जयन्ती है


सबमें अपनेपन की माया
अपने पन में जीवन आया 
-त्रिलोचन


रचनाएं देखें



हैं रेल-पेल भी फिर ना जाने 
कितनी कथाओं की, 
आरतियों की, व्रतों की,
मन्दिरों की, मूर्तियों की, 
पर सर्वोपरि बन,
सर्वत्र है छाया आज 
"जै जै जै हनुमान गोसाईं"
पर रहे ना हम सब अब भाई-भाई,
क्योंकि ..
हो गया है मानव-मानव में ..




इंस्पेक्टर ने प्रिया को कहा, “आपको कुछ देर के लिए पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा. 
हमने आपकी सूचना दर्ज कर ली थी. आपको आकर दस्तखत करने होंगे. 
फिर हम उसे एफआईआर के रूप में दर्ज कर आपको उसकी एक प्रति दे देंगे.

प्रिया अपने ही ऑटो से पुलिस स्टेशन पहुँची, कुछ देर बाद ही राहुल और आदित्य भी पहुँच गए. 
इंस्पेक्टर ने सूचना पर प्रिया के हस्ताक्षर लिए फिर एफआईआर दर्ज कर उसपर और एक प्रति प्रिया को दी. 
फाइल देखकर उसने कहा, “जयपुर का पुराना रिकॉर्ड, मुम्बई में फेक प्रोफाइल का मामला और 
अब स्टॉकिंग का नया मामला... इस बार विक्रांत साहब का बिना सजा काटे जेल से बाहर आना मुश्किल होगा. 
प्रिया, राहुल ओर आदित्य बाहर आए. राहुल ने प्रिया से पूछा, “अब?”

“अब क्या? अब मेवाड़ भोजनालय चलना है, सब वहाँ प्रतीक्षा कर रहे होंगे. आज डिनर वहीं होगा.”




“मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।”

“इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने।”

“बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या?”



बाहर बिजलियों की कड़कड़ाहट और बादलों के गरजने के
साथ ही तेज मूसलाधार बारिश का सिलसिला जारी था।
भीतर प्यार की खुमारी और जुनून अपने परवान पर था।
ईशान, सौम्या के साथ अपने बेडरूम में था और सौम्या की गर्म सांसों को करीब से..
बहुत करीब से महसूस कर रहा था।

उनके चेहरे एक दूसरे के इतने करीब थे कि हवा भी उनके बीच से गुजर कर नहीं जा पा रही थी।






विश्व भर में हलचल मची,
डगमग हर एक राह,
मंदी की आहट संग जगी,
स्थिरता की चाह।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

4701... पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------
सोच रही हूॅं ----
इंसान 
सभ्य और असभ्य की 
परिभाषा भूल चुका है।
अंहकार का पोषण
सर्वोपरि है,
क्या मनुष्यता, इंसानियत 
धीरे-धीरे इतिहास के
पृष्ठों में सुंदर कहानियॉं 
बनकर जायेंगी?
क्या सचमुच 
"जीओ और जीने दो"
 का सिद्धांत 
मानना बहुत कठिन है?
---------
आज की रचनाऍं- 



सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते 
विवेकहीन नेताओं के आदेश
भरा है जिनमें तकनीकी आवेश  
अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं 
धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!
जागो शांति के मसीहाओ!
वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!




चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।


युद्ध जारी है


युद्ध जारी है
हर तरफ़ दहशत, ख़ून-ख़राबे
चिथड़े-चिथड़े जिस्म की पहचान नहीं
किसी का अपना शहीद हुआ
न जाने कितनी जानें क़ुर्बान हुईं
इस ख़ौफ़नाक मंज़र पर
कोई जश्न मना रहा
तो कोई छाती पीट रहा।


मेरी यादों का आकाश


बिक रहा है ज़मीर यहाँ

बस बची है अंगारों के नीचे

दबी हुई कुछ राख़ मेरे

ज़िन्दा जज़्बों की

जो धाँय धाँय उड़कर

काला स्याह कर रही है

मेरे यादों के आकाश को





उसकी बाते सुनते सुनते और गाड़ी के तेज़ झटकों से कब ऋतु की आँख लग गई उसे पता ही नही चला ,आँख खुली तो मथुरा स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाड़ी रूकी हुई थी ,घड़ी में समय देखा तो ठीक चार बज रहे थे ,उसने प्लेटफार्म पर नज़र दौड़ाई तो देखा वह औरत बेंच की एक सीट पर गोद में बच्चा लिए बैठी हुई थी और उसकी बगल में दो बड़े बड़े अटैची रखे हुए थे ,लेकिन उसकी बेचैन निगाहें अपने पति को खोज रही थी ,पांच मिनट तक ऋतु उसकी भटकती निगाहों को ही देखती रही ,तभी गाड़ी चल पड़ी और वह औरत धीरे धीरे उसकी नज़रों से ओझल हो गई 
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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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