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सोमवार, 18 जून 2018

1067....हम-क़दम के तेईसवाँ अंक

सीप एक समुद्री जीव होता है जिसका शरीर दो पार्श्व,
कठोर कपाटों से बंद रहता है 
और जो मध्य पृष्ठ पर एक दूसरे से जुड़े रहते है।
समुद्री जीव "सीप" एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने शरीर को कष्ट देने वाले हानिकारक तत्त्वों को मोती में बदल देता है।

जन्तु विज्ञान के वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सीप न हो तो
 पृथ्वी पर स्वच्छ और मीठा पानी मिलना मुश्किल है।

सीप की ऐसी विशेषता होती है कि वह प्रकृति से एक बार आहार ग्रहण करने के बाद लगभग 96 ली. पानी कीटाणुमुक्त करके शुद्ध कर देता है। बचे हुये अपशिष्ट, कण या मृतकोशिकाओं को मोतियों में 
बदलने का अद्भुत गुण बस सीप में ही है।

ऐसा माना जाता है कि स्वाति नक्षत्र में वर्षा की जो बूँद सीपी मे गिरती है वह कालान्तर में मोतियों का रुप ग्रहण करती है।
इस सप्ताह शायद हमारे प्रिय रचनाकारों की व्यस्तता अधिक रही होगी इसलिए हमारे रखे गये विषय "सीप"
 पर रचनाएँ कम आईं हैं
उम्मीद करते है आने वाले सप्ताह के विषय पर आप सभी का प्रेम हमारे सोमवारीय विशेषांक को मिल पायेगा।

 चलिए अब आपकी रचनाओं के सुंदर संसार में-
🔷💠🔷

आदरणीया आँचल पाण्डेय जी की रचना


मैं उतर गयी जल के भूतल पे
फ़िर वही कहीं से परियाँ आयी
साथ अपने एक एक सीप सब लायी
देखकर आँखें अचरज में थी
जलपरियों के मैं बीच खड़ी थीं

🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया अपर्णा जी

तुम्हारी सीप सी आंखें
और ये अश्क के मोती,
बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...
तलब थी एक अनछुए पल की

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया कुसुम दी की रचना

महावीर और बुद्ध की तरह
वो चली निरन्तर
वीतरागी सी
राह मे रोका एक सीप ने 
उस के अंदर झिलमिलाता
एक मोती बोला
एकाकी हो कितनी म्लान हो,
कुछ देर और
बादलों के आलंबन मे रहती
मेरी तरह स्वाती नक्षत्र में
बरसती तो देखो
मोती बन जाती
बूंद ठिठकी
फिर लूं आलंबन सीप का !!
नही मुझे अपना अस्तित्व चाहिये
सिद्ध हो विलय हो जाऊं एक तेज में।

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया साधना वैद जी

सीप ने भी कंकड़ को
हृदय से लगाया
उसके चारों ओर अपने
अंतर का दिव्य स्त्राव लपेट
उसे एक सामान्य कुरूप कंकड़ से
अनुपम अपरूप
बहुमूल्य मोती बनाया !

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया आशा सक्सेना जी
सच्चे मोतियों  को परखा 
उनकी आव का अनुभव किया
उन्हें यथोचित स्थान दे कर  
मनोबल मेरा  बढ़ाया
शब्दों में संचित  भावनाएं 
दौनों के बीच सेतु बन गईं 
अपने अनुभव बांटने  के लिए
शब्दों की धरोहर मिल गई |
🔷💠🔷

आज का हम-क़दम का यह विचारों का विस्तृत आकाश लिए 
मुस्कुराता हुआ अंक आपको कैसा लगा? जरुर बताइयेगा।

नये विषय के लिए कल का अंक देखना न भूले जो 
आदरणीय कुलदीप जी लेकर आयेंगे।
सादर नमस्कार

रविवार, 17 जून 2018

1066....पिताजी आइये, आपको याद करते है, आज आप का ही दिन है

सादर अभिवादन..
कल ईद हो गई...
अभी सप्ताह भर गहमा-गहमी रहेगी
ज़ाफरानी पुलाव और मीठी सेॆवई की
मीठा उत्सव है ईद-उल-फितर
सभी को शुभकामनाएँ ईद की...

आईए चलते हैं आज सी पसंदीदा रचनाओं की ओर....

सर्वप्रथम आज पितृदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ....


पापा....श्वेता सिन्हा

जग सरवर की स्नेह बूँद
भर अंजुरी कैसे पी पाती
बिन "पापा" पीयूष-घट आप 
सरित लहर में खोती जाती
प्लावित तट पर बिना पात्र के

मैं प्यासी रह जाती!


हे श्वेत तुंरग उतरे हो कहां से
क्या इंद्र लोक से आये हो
ऐसा उजला रूप अनुपम
कहो कहां से लाये हो
कैसे सुरमई राहो पर तुम


चित्र में ये शामिल हो सकता है: वृक्ष, आकाश और बाहर
कलाकारी करते समय 
कूँची थोड़ा आड़ा-तिरछा कमर की और 
जरा सा दूसरे जगह भी अपना रंग दिखा दी... 
हाथी पर चढ़े, 
टिकने में टक टाका टक अव्यवस्थित 
ऐसे कलश को देख मटका आँख मटका दिया...

ये इत्तफ़ाक नहीं है ।
सीमा पर तैनात जवान
रोज़ शहीद हो रहा है ।
तब जाकर इस देश का
हर आदमी 
चैन से सो पा रहा है ।

मैं अनन्त पथ गामी,
घायल हूं पथ के कांटों से,
पथ के कंटक चुनता हूं,
पांवों के छालों संग,
अनन्त पथ चल पड़ता हूं,

मुँह फेर लिया फिर आज चाँद
फिर भी मैं तुझे बुलाता हूँ,
कातर नयनों से उबल रहे
मनभावों को ठहराता हूँ;
चाहो, तो लो अग्निपरीक्षा

ऊपर भी पिता...और नीचे भी पिता
पिता नहीं होते तो हम होते ही नहीं...


उलूक का पन्ना...डॉ. सुशील जी जोशी

उलूक टाइम्स
‘उलूक’ 
मजबूर है तू भी 
आदत से अपनी 
अच्छी बातों में भी 
तुझे छेद हजारों 
नजर आ जायेंगे 

ये भी नहीं 
आज के दिन ही 
कुछ अच्छा 
सोच लेता 

डर भी नहीं रहा कि 
पिताजी पितृ दिवस 
के दिन ही 
नाराज हो जायेंगे।

आज्ञा दें
यशोदा ...








शनिवार, 16 जून 2018

1065... ईद की बधाई



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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

9 जून को दी गई शादी के सालगिरह की
शुभकामनाओं की आभारी हूँ...

मोनू की पहली हवाई यात्रा (बाल कहानी)

वेद और वायुयान

मैं मानता हूं कि यह सब कुछ सत्य है परन्तु तुम उसके गलत कारण ढूंढ रहे हो। तुम स्वयं भटके हुए हो और भटके हुए दिमाग से उन दैविय कारणों को समझने की कोशिश में लगे हो जिनको तुम समझ ही नहीं सकते। पुराण के अनुसार केवल हनुमान ही नहीं हैं जो आकाश में उड़ा करते थे। पुराण अन्य व्यक्तियों का भी उल्लेख करता है जो ऐसा करते थे।

डूबने का डर गर मुझे हो तो कैसे हो मैं तेरा,
कश्ती तेरी , साहिल तेरा और दरिया तेरा @अज्ञात
कुछ ही देर में हमारी यात्रा शुरू होगी अंदमान निकोबार के लिए

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हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहां, कल वहां चले

चरमर- चरमर- चूं- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी!
गति के पागलपन से प्रेरित चलती रहती संसृति महान;
सागर पर चलते हैं जहाज, अंबर पर चलते वायुयान,
पर इस प्रदेश में जहां नहीं उच्छ्वास,भावनाएं चाहे,
वे भूखे अधखाये किसान, भर रहे जहां सूनी आहें, नंगे बच्चे,
चिथरे पहने, माताएं जर्जर डोल रही, है जहां विवशता नृत्य कर रही,
धूल उड़ाती हैं राहें! भर-भरकर फिर मिटने का स्वर,
कंप-कंप उठते जिसके स्तर-स्तर, हिलती-डुलती,
हंफती-कंपती, कुछ रुक-रुककर, कुछ सिहर-सिहर,
चरमर- चरमर- चूं- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी!

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बने ना तुमसे रोटी गोल

कुछ लोग सामाजिक स्तर पर तो आधुनिक हो जाते है,
पर घर में वही ढाक के तीन पात...
कितने ही कीर्तिमान कर ले,रेल,वायुयान चला ले।
पर नहीं।वैसे देखा जाए तो
लेखिकाओं की भी यही दशा है,क्या कर लेंगी लिखकर

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कल और आज

फ़ैशन का छलावा नहीं था;सादगी के प्रति आकर्षण था।
अभिकलित्र नहीं था फिर भी लोग कार्यकुशल थे।
संगणक नहीं था पर लोगों के पास हरतरह की गणना थी।
आलीशान महल नहीं था फिर भी परिवार में शांति थी।
दूरभाष नहीं था पर मन की आवाज़ तक सुन ली जाती थी।

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‘कथाओं से भरे इस देश में… मैं भी एक कथा हूं’

दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो

और मेरे उलझे हुए धागो उठो

तुमसे मिलना मुक़द्दर था औ’ बिछड़ना क़िस्मत
इसलिए शिक़ायत कभी होंठों तक ला न सके
फिर मिलेंगे....
अब बारी है....
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम तेईसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है

सीप


मैंने अनजाने ही भीगे बादलों से पूछा
छुआ तुमने क्या
उस सीप में मोती को
बादलों ने नकारा उसे
बोले दुहरी है अनुभूति मेरी
बहुत सजल है सीप का मोती
- रजनी भार्गव
.....................
हम आपको ये बता दें कि सीप का
नक्षत्र स्वाति से गहरा नाता है
और इस नक्षत्र में गिरे जल की एक बूंद को
सीप, मोती मे परिवर्तित कर देती है
उपरोक्त विषयों पर आप सबको अपने ढंग से
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना आज शनिवार 16 जून 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं
आगामी सोमवारीय अंक
18 जून 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

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धन्यवाद।

शुक्रवार, 15 जून 2018

1064...चिकने खंबे पर ही चढ़ता है, रोज उसी तरह फिसलता है, हर बार जमीन पर आ जाता है

आधुनिक समाज में सोशल मीडिया जो समाज का आईना 
होता जा रहा है, उस पर किसी भी समसामयिक, सामाजिक 
या राजनीतिक मुद्दों पर होने वाली विचारोत्तेजक बहस पर 
आपने कभी गौर किया है?

समाज की युवा पीढ़ी में तेजी से हो रही विचारधारा परिवर्तन 
पर अगर ध्यान दिया जाय तो किसी भी संवेदनशील मुद्दे 
पर उनकी असंवेदनशील प्रतिक्रिया पढ़ने को मिल जायेगी। 
अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उनका यह विक्षिप्त 
और बदमिजाज आचरण कितना उचित है?

 भाषा में अभद्रता और अशिष्टता की प्रचुरता सोचने पर 
मजबूर करती है आखिर हमारा सभ्य  समाज किस 
दिशा की ओर अग्रसर है?

मेरा ऐसा मानना है इसका कारण कहीं न कहीं युवा वर्ग 
का साहित्यिक अभिरुचियों से दूर होने से पनपा 
वैचारिकी खोखलापन ही है। 

अब चलिए आपके द्वारा रची अनुपम रचनाओं के संसार में

आदरणीय लोकेश जी...
बिखर जाने दे....

अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे
मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे

मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे
चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे

दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं
दर्द कोई नया ज़िगर से गुज़र जाने दे


आदरणीय गगन शर्मा जी....
सौंदर्य प्रसाधनों में "केसर" के उपयोग का छलावा..

यह इसलिए याद आया क्योंकि कई दिनों से घर में आ रहे पतंजलि के एलोवेरा जेल की ट्यूब पर उसमें मिश्रित सामग्री के रूप में केसर और चंदन के भी होने की बात लिखे होने से कौतुहल तो होता था कि केसर जैसी चीज जिसके कुछ ग्राम की कीमत ही हजारों रूपए है, उसका उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से कैसे 70-80 रूपए के उत्पाद में किया जा सकता है ! पर जैसी की हमारे जैसे अधिकाँश लोगों की आदत है कि लिखी बात पर विश्वास कर लेते हैं, आँख मूँद कर ! सो मान लेते रहे कि 'बाबाजी' कह रहे हैं, तो होगा ही, और बात आई-गयी हो जाती थी। पर कल जब एक ट्यूब सामने दिखी तो रहा नहीं गया और छीछालेदर करने पर जो बात सामने आई..... वह यह रही !

आदरणीया प्रीति सुराना जी
साथ दोगी मेरा?
रिश्ते में मौजूद डर का बीज
जो बार-बार उगकर
आतंकित करता है जीवन को,
खत्म हो जाए पल्लवन के पहले ही
यह हानिकारक
अनावश्यक खरपतवार
और फिर दोबारा उगने की हिम्मत न करे,
अब डाल दो मिट्टी पुराने सारे गिले-शिकवों पर...

एक रचना गद्दार शायर की कलम से

मैं ख़ुद ही नहीं चाहता

हमी फेंक आये ख़ुद को सरे दरिया अर
हमी देखते है, के कब बुलबुले ख़त्म हो

चले जाए शोरों शग़ब से कही दूर क्या ?

किसी तरह तो ख़ुद से ये फ़ासले ख़त्म हो

आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना
दो पथिक किनारे

सागर से वक्षस्थल पर
पसरा  चिर  सन्नाटा,
उर-अंतर्मन के स्पन्दन ने
रचा ज्वार और भाटा

आदरणीय पुरुषोत्तम जी की रचना
कोई अंत न हो

जब यूं चुपके से पुरवैय्या लहराए,
कोई खामोश लम्हों मे दस्तक दे जाए,
फिर यूं किसी का गले लग जाना,
चंद लम्हों में उम्र भर की कसमें खाना,
इन लम्हातों का कोई अन्त न हो.....

 ध्रुव जी की लेखनी से निकली भक्ति-भाव युक्त भजन
मन श्याम रंग

बन बिम्ब मेरी वो खड़ा ,पत्थर की प्रतिमा में कहीं 
है झाँकता मन में मेरे ,बन ह्रदय की धड़कन-सा मेरे। 
ब्रह्माण्ड मुख में समात है ,पर चरण धरती पर धरत 
जग का तू पालनहार ,पर पालत माँ है, यशोदा बन। 
मन श्याम रंग विचार में तज, भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत ,चित्त रोअत है अभिभूत बन


आदरणीय सुशील सर का पन्ना...

गलतफहमी 
को 
खुशफहमी 
बना कर 
खुद की 
खुद ही 
नाचना 
शुरु हो 
जाने वाला




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कल मिलना न भूलिएगा विभा दीदी से

श्वेता

















गुरुवार, 14 जून 2018

1063....शान्ति के लिये सम्वाद होना चाहिये...


सादर अभिवादन। 
ख़ुश-ख़बरी!!! 
शान्ति के लिये सम्वाद होना चाहिये, 
दुनिया में विवेक का बोलबाला होना चाहिये,
परमाणु हथियार की होड़ बंद होना चाहिये, 
सनक त्यागकर रहबर को सिंगापुर में मानवीय होना चाहिये। 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें -



चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं

- विज्ञापन देखी होंगी तो उसमें 30-40 उम्र सीमा तय है ,उसपर आपकी नजर जरूर पड़ी होगी... उस स्थिति में आपका फोन करना, आपको ही शक के दायरे में ला खड़ा किया... एक औरत होने के नाते हर लड़की के बारे में सोचना मैं अपना दायित्व बना ली हूँ... कोई बच्ची मकड़जाल में फँस ना जाये... इसलिए आपको भी कहती हूँ पहले पढ़ाई पूरी कीजिये... माँ बाप जो तय करें उसमें उनका सहयोग करें... "



My photo

जीवन की व्यस्तता ने हमें और बड़ा कर दिया था।इसी बीच एक बार मौका मिला फिर गाँव जाने का।चाचा के बेटे को पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई थी।मुझे बड़े अरमानों के साथ बुलाया गया।इन सब में मैं ये बताना कैसे भूल सकती हूँ कि मेरे चाचा चाची के तीन पुत्रियों के साथ एक पुत्र था, हम सब साथ में ही पापा के पास शहर में रह कर पढ़ते थे,जो की उन दीनों मे आम बात थी।चाचा चाची गाँव में रहते थे। सबसे खास बात ये कि मुझसे चाचा और चाची दोनों का बहुत हीं लगाव था और ढेर लाड़ मिलता था मुझे । दोनों हीं मुझसे अक्सर अपने दिल की बात किया करते थे ,पता नहीं क्यों।




सोए सपनों को झकझोरो
माटी को सोना कर दो ना !
पार क्षितिज के कहाँ रुके हो,
आओ मेघा, बरसो ना !!!



My photo

सब कुछ सदा ही ठीक-ठीक चलता रहे ऐसी कामना जो करता है, उसे दो के पार ही जाना होगा. उस स्थिति में मन साक्षी भाव में टिकना सिख जाता है. साक्षी भाव में रहकर, कर्त्तव्य कर्म को पालन करते हुए अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने वाले साधक के जीवन में भविष्य के लिए पाप कर्म जमा नहीं होते. उसका वर्तमान भी संतुष्टिदायक होता है.



है आँख किसी की खुली
किसी की सोती
खोजो,
पा ही जाओगे कोई मोती







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मैं आऊंगा, फिर आऊंगा,
निज को विसर्जित कर
सामूहिक चेतना का अंग बन
अन्तहीन भीड़ में मिल जाऊंगा।

अब बारी है...
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कल मिलिए श्वेता सिन्हा से
रवीन्द्र सिंह..

बुधवार, 13 जून 2018

1062.....खोखला बौद्धिक अहंकार हमें कहाँ ले आया है?

सादर अभिवादन....
सच में हम चाहते ही थे कि आज की प्रस्तुति हम दें
सखी पम्मी कहीं किसी काम में उलझ गई हैं
वे सफल हो गई होंगी निश्चित रूप से
चलिए चलते हैं आज के आनन्द की ओर.....
-0-

अश्कों का आँख से ढलना हमें अच्छा नहीं लगता
तड़पना,तेरा दर्द में जलना हमें अच्छा नहीं लगता

भीगाती है लहर आ कर, फिर भी सूखा ये मौसम है
प्यास को रेत का छलना  हमें अच्छा नहीं लगता 


बहुत भारी हो चली है
गुनाह में लज़्ज़त की तलाश
उग आयी नाग-फनी
कभी लुभाते थे
जहाँ गहरे सुर्ख़ पलाश

एक दिन यूँ ही 
अलसायी सी 
दोपहर में 
तुम्हारी कविताओं की 
किताब हाथ में आ गयी 
जिसमे तुमने लिखी थी 
मेरी ये सबसे पसंदीदा 
कविता 

कुर्सी के सामने दो कलमें खड़ी थीं,
सिर झुकाए... आँखों में पानी भरे,
दीनता मंडित चेहरे...
जन्मों से, अघी हों जैसे।
पर, ऐसा कैसे हो सकता है...?
कलमें?...
हाँ कलमें...,
कलमें तो समाज को रास्ता दिखाती हैं।

मुझे नकार मुझे ही अपनाती है
सीप में मोती बन स्वाति नक्षत्र को दमका जाती है
मेरा ही पात्र बन मुझे ही अँगुलि भर पानी पिला जाती है
इसी गरिमा को अपना मुझे ही छू जाती है।
मैं यही अनुभूति लिए
नकारते हुए अपनाते हुए
भीगते हुए बहते हुए
सीप में ही मोती बन जाती हूँ।

उसकी शख्शियत....सुप्रिया पाण्डेय


दर्द लफ़्ज़ों में बयाँ हो जाये तो,
कसक ही क्या रह जायेगी,

कांटो को अलग कर दें जो फूलों से,
शनाख्त गुलशन की क्या रह जायेगी,

अच्छी पत्नी चाहिए तो...ज्योति देहलीवाल
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मॉल में घुमते हुए शिल्पा को उसकी प्रिय सहेली उषा मिल गई। दो-तीन साल बाद अचानक मुलाकात होने पर उसकी खुशी का पारावार नहीं था। 'कैसी हो उषा?'  'अरे, पुछ मत यार...बहुत टेंशन हैं।'  'टेंशन? किस बात का टेंशन हैं?' 
'वो मेरा बेटा दीपक...' 'क्यों, क्या हुआ दीपक को ? ...

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आज्ञा दें यशोदा को










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