आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
प्रकृति कभी स्वार्थी नहीं रही; उसने हमेशा जीवन का पोषण किया है। लेकिन जब मनुष्य उसके धैर्य की सीमा लांघ जाता है, तो संतुलन बनाने के लिए प्रकृति अपना रूप बदलती है। ये प्रलयंकारी आपदाएँ वास्तव में मानव सभ्यता के लिए एक अंतिम चेतावनी हैं। यदि हमने अब भी अपनी जीवनशैली, लालच और प्रकृति के प्रति अपने रवैये को नहीं बदला, तो आने वाली नस्लों के लिए अस्तित्व का संकट और गहराता जाएगा।
मद्धम और शांत संगीत की तरह है
जिसकी स्वर्णिम आभा में बहती गुनगुनाहट को
केवल एकाग्र और शांत मन से ही
महसूस किया जा सकता है।
परंतु, दिन की आपाधापी,
दौड़-भाग और कोलाहल में
आत्मा को तृप्त करने वाली मधुर ध्वनि
कहीं लुप्त हो जाती है।
फिर जब ढलती शाम के धुंधलके में
सृष्टि का कोलाहल शांत होने लगता है,
तब वही नीरवता चुपके से पास आकर
जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—
कि कुछ पाने और हासिल करने की लालसा में
हम निरंतर भागते तो रहते हैं,
किंतु जीवन का वास्तविक आनंद, सत्य और सार
केवल भागने में नहीं,
बल्कि अंततः ठहर जाने और शांत हो जाने में ही है।
ज्ञान की पहली सीढ़ी यही है कि
हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर लें,
जो बीत गया वह विधि का विधान था,
किंतु आने वाला कल अब भी हमारे संकल्पों के अधीन है।
यदि मन में जानने की सच्ची तड़प हो
और जीवन में त्याग का भाव समाहित हो,
तो समय का हर क्षण एक नया मार्गदर्शक बन जाता है।
बहती नदी की भांति निरंतरता ही
मन और चरित्र को निर्मल बनाए रखती है;
जहाँ निष्काम भाव से कर्म करते हुए
परिणामों को ईश्वर अथवा समय के
चरणों में सौंप दिया जाता है।
इस निष्काम कर्म तथा निस्वार्थ समर्पण की नींव
केवल और केवल 'प्रेम' ही हो सकती है,
क्योंकि प्रेम के बिना सच्चा समर्पण संभव ही नहीं।
हमारी खामोशी को गलती मान लिया गया,
असल में हम इस दुनिया का दस्तूर और चालाकी बहुत जल्दी समझ गए।
जब महफिल में हमारा परिचय हो रहा था,
तब किसी खास की चुप्पी
असलियत बयान कर गई।
हमने हमेशा अपनी सीमाओं को स्वीकार किया ,
क्योंकि हम खुद को असीम दरिया नहीं,
बल्कि एक सीमित दायरा में रहने वाला इंसान मानते हैं।
सिर्फ़ वाह-वाही और तारीफ पाने के लिए नहीं लिखी
कभी हमने दास्तां अपनी
आपने हमारी आत्मा की पुकार को महज एक मुशायरे की नुमाइश समझ लिया।
हम तो बस कुछ पल के लिए क़लम बदलने ओझल हुए थे,
और आपने इतनी ही देर में हमें हमेशा के लिए लापता मान लिया।
अक्सर परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव या समय की विपरीत चाल में जो लोग लापरवाह होते हैं, वे संयोगवश सफल और सही दिखाई देने लगते हैं, जबकि अपनी जिम्मेदारी और नियमों का ईमानदारी से पालन करने वाले लोग असमंजस में पड़कर असफल या बेवक्त साबित हो जाते हैं।
किंतु दुनिया का यह अन्याय या अनिश्चितता हमारे सिद्धांतों को बदलने का आधार नहीं बननी चाहिए। बाहरी परिणाम और दुनिया की सराहना चाहे जैसी भी हो, व्यक्ति को समय की कद्र, अपनी जिम्मेदारी और अपने नैतिक मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए। सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर बने रहना ही जीवन का वास्तविक धर्म है।
मिट्टी की सोंधी महक महसूस करना
अपनी जड़ों की ओर लौटते मन की एक पुकार है,
जहाँ प्रकृति के आंगन में खिलते जीवन की रंगत
और समाज की विविध परतों का सच सिमटा हुआ है।
इंसानी रिश्तों के अनसुलझे ताने-बाने,
दिलों में पनपते प्रेम, करुणा और संघर्ष के भाव,
और बदलती दुनिया के बीच
मेरी माटी तेरा मोह न छूटे वाली
अनवरत तड़प
इस जीवन का हर एक पृष्ठ
मनुष्य के व्यवहार और स्वभाव का दर्पण है,
जो यह याद दिलाता है कि इंसान
चाहे कितना भी उड़ ले,
उसकी आत्मा का अंतिम विश्राम
अपनी ही माटी के आँचल में है।
-श्वेता






