निवेदन।


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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

4657..कौन है वह..

 ।।प्रातःवंदन।।

ऊषे!

यह रवि का प्रकाश जो

तेरे श्रम का ही है प्रतिफल!

ये अलग-अलग बिखरे

एकाकी प्रकाश-बिन्दू

तम के असीम सिन्धु में

करते झिलमिल

जिन्हें जगती के मानवगण!

कहते हैं तारकगण!

विजयदान देथा 'बिज्जी'

चलिए आज की प्रस्तुति की ओर ..

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे

दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो

अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो ।

तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को

तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को 

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे 

कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुझी को..

✨️

कौन है वह ! 

कुछ भी तो नहीं पता हमें 

न कभी हो सकता है 

क्यों और किसने बनायी यह दुनिया ?

बस मन उस जादूगर के 

प्रेम में खो सकता है !

✨️

नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके

झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा

अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल

करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर..

✨️

यादें पुरानी दे दो

रिश्ता बहुत पुराना, यादें पुरानी दे दो

धरती तरस रही है, कुछ तो निशानी दे दो

पिघलो जरा ऐ बादल, रोना शुरू करो तुम 

प्यासी धरा पे सबकी, आँखों में पानी दे दो..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

4656... जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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मौसम बदल रहा है। माघ की शीतल छुअन
 और फागुन की हल्की मीठी-सी आँच के मध्य खिलते पलाश कितने मनमोहक लगते हैं न...।

पिघल रही सर्दियाँ
झर रहे वृक्षों के पात
निर्जन वन के दामन में
खिलने लगे पलाश

सुंदरता बिखरी फाग की
चटख रंग उतरे घर आँगन
लहराई चली नशीली बयार
लदे वृक्ष भरे फूल पलाश।
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आज की रचनाऍं- 


दिल अगर टूटे तो धड़कन कम नहीं होती
हर किसी दर्द का मतलब बुरा नहीं होता
 

खामोशी भी कभी छेड़े मधुर सरगम को
हर किसी साज़ में होना तम्बूरा नहीं होता
 

जिसे पा लो तो कई बार क़दर खो जाए
हर कोई ख़्वाब हक़ीक़त में पूरा नहीं होता




कितना बदल  जाता  है
और  मैं  हारती  हूँ 
पर  मुझे  स्वीकार  तो  करना  है
ऋतु परिवर्तन  सदा  ही  रहा
इस जन्मदिन  बस  चाहूँ  यहीं
कोई  लाकर  दे  दे  मुझे  बचपन  का  वो भोलापन  फिर  वहीं ।


यह प्लेटफ़ॉर्म कम, चलती-फिरती प्रदर्शनी अधिक है। यहां लोग बोलते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। शब्द छोटे हुए, स्टोरी चौबीस घंटे में समाप्त होने लगी, और धैर्य पंद्रह सेकंड का रह गया।
मैंने भी सोचा कला से जुड़े लोगों को फ़ॉलो करना चाहिए, उन्होंने भी किया... एक परस्पर सम्मान जैसा भाव बना।
पर कुछेक को जैसे ही फ़ॉलो बैक किया, इनबॉक्स ने फिर दस्तक दी,
“हाय…”
संस्कारों ने कहा - नमस्ते लिख दो।
मैंने लिखा।
उत्तर आया — “हाँ, तो कुछ बोलो!!!”
अब यह आधुनिक संवाद शास्त्र का नया सूत्र है,
प्रारंभ वह करेगा, विस्तार आप करेंगे।
उत्सुकता उसकी होगी, उत्तरदायित्व आपका।




दशकों के अंतराल के बाद सब कुछ बदल गया है, शिक्षा का स्वरूप, शिक्षा का तरीका और उसकी विभिन्न शाखायें। अपने सपनों के लिए जहां मेडिकल के क्षेत्र में सिर्फ एमबीबीएस करना ही एकमात्र विकल्प था, सलेक्शन नहीं हुआ तो लोग उसको फेलियर समझते थे लेकिन आज इतने सारे विकल्प सामने आ चुके हैं कि प्रगति के तमाम रास्ते उन्हें उच्च पदों तक पहुंचा देते है। आप अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाइए और उन्हें अपनी इच्छानुसार करियर बनाने दीजिए।



चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

4655..भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही

भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
जब ठोकरों का दर्द उन्हें अपनी जड़ों की याद दिलाता है।
​दुआओं में असर रखना, यही अब तुम्हारा काम है,
भले  रास्ता आज कठिन और बदनाम है।
*****

सतह के ऊपर - -

उस अदृश्य

देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच पाना,

*****

कहीं और चला जा



जो ज़ख़्म पे मरहम होशफ़ा हो शुकून हो ये वो नहीं है घरतू कहीं और चला जा। खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा। 

*****

मर्डर ऑन वेलेंटाइन नाइट - 31

" रिंग किसने चुरायी होगी ?....अभय रिचा को नुकसान पहुंचाना चाहता था....क्यों ? ....कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भी रिचा से प्यार करता हो ?....और सौरभ ?....एक ऐसा शख्स , जिसे किताबों के अलावा किसी से कोई मतलब नहीं रहता , उसको रिचा की इतनी फिक्र क्यों थी ? "

*****

उनके हिस्से चुपड़ी रोटी ------


र लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,

ऐसे   ही   थोड़ी  धरती  की  चूनर  धानी-धानी  है।

        फ़स्ल हुई चौपट बारिश से और धेला भी पास नहीं,

कैसे क़र्ज़  चुके बनिये  का  मुश्किल में रमज़ानी है।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

4654 लोगों का बसियाया सा चेहरा मुझे हारे हुए जुआरी सा लगता है

 सादर अभिवादन 
लोगों का बसियाया सा चेहरा
मुझे हारे हुए जुआरी सा लगता है
आज रवींद्र भाई नही है
भूल गए हों शायद

रचनाएं देखें



तुम जैसे...
बंद पलकों की खिड़की पर
डोलता जुगनू,
अंधेरे की उंगली में जड़ा
 नीला रत्न,
अथाह जल के बीच
घड़ियाल के पीठ पर बैठकर
उकेरे गये सपने,
अंतिम इच्छा का उत्सव। 



लड़कों की जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की चुन्नी में
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
कलगी के साथ खुसा
सुहागन की
काली मोतियों के बीच में फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है 





एक रात, जब पहरेदार थक जाते हैं
और ताले अपनी चाबियाँ भूल जाते हैं,
धरती के भीतर
एक हल्की-सी खरोंच होती है—
जैसे इतिहास ने करवट ली हो।

वहीं से एक प्रश्न अंकुरित होता है—
बिना अनुमति, बिना आदेश।





इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने। 

न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने? 



हाथों की लकीरों सा पाला था जिन्हें,
आज वे ही हाथ अनजानी राहों पर चल पड़े।
जिनकी मुस्कान के लिए बेच दी थी अपनी रातें,
आज वे ही अपनी दुनिया के चकाचौंध में ढल पड़े।



प्रेम 
महज एक इन्द्रजाल  
एक कुहासा  
जिसमें विमुग्ध पथिक 
विलुप्त हुआ अपने आप से
खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 
अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,
एक साजिश से  
एक
स्कैम है प्रेम ।





समय बहुत कठिन था
पर उतना भी बुरा नहीं था
कि मैं बच नहीं सकती थी
मुझे तो मेरे  ह्रदय के गर्भ में जन्मे
प्रेम ने मार डाला जो तुम्हारे लिए था  |




हर एक रंग होता है प्यार ,यार किससे कहें
सभी तो होते हैं तलबगार ,यार किससे कहें

बहारें देख, खिलते हैं मन,और गुल गुलिस्तां मे
सभी होते हैं,बागों मे शुमार ,यार किससे कहें


आज का अंक भी
कुछ भारी हो गया है
सादर वंदन

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

4653 ...तुम्हारे अधरों की मिठास तृप्त कर जाती है

 सादर अभिवादन 



आज वेलेन्टाईन डे हैऔर
हमारे भारत में
वसंत का महीना चल रहा है
***
इंसान 
इंसान होता है 

और वो स्वामी भक्त
नहीं होता,

कुकुर तो
कुकुर होता है 
स्वामी भक्त
जो इंसान नहीं होता

दोनों में स्वाभाविक अंतर होता है। 

रचनाएं देखें




उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
 

फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान






नवांकुरों के, ज्ञान चक्षु खोल,
जीवन उजियारा करती 
कलम स्याही संग,शब्द उकेर,
कल्पनाएं, जीवंत कर देती 
तूलिका से, कैनवास में 
जीवन के रंग भर देती 





शून्य  की  संवेदनाएँ  सच्ची  होती  है
साथ  चलती  हुई   दुआओं   में
दीये  की   पीली   रोशनी  सी
अपने  विश्वास  का  उत्सव  मनाती   
कभी  बिफरने  नहीं  देती  




माँ को नित यही प्रार्थना करते देखा
जब बालक ने तो उत्सुकतावश पूछा
बोने की बात करे यह कैसी है वंदना ?
माँ ने हाथ जोड़े फिर सोच कर कहा
जानते हो ना धरा से जन्मी हैं मां सीता




हमें ज़िंदा रखा जाता है—
बस इतना भर,
कि हम धीरे-धीरे मरते रहें,
और हर चुनाव में
अपनी ही मौत पर
मुहर लगाते रहें।

हम मारे जा रहे हैं—
और ताली भी
हम ही बजा रहे हैं।






जी हाँ ! उत्तराखंड के उत्तरकाशी से 160 किमी की दूरी पर टौंस वन प्रभाग, पुरोला देवता रेंज के अंतर्गत मोरी-त्यूणी सड़क मार्ग पर टौंस नदी के किनारे स्थित है एक अनोखी समाधि ! जिसका एशिया के सबसे बड़े चीड़ के वृक्ष, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने ''महावृक्ष'' की उपाधि प्रदान की थी, की याद को बनाए रखने के लिए वन विभाग द्वारा निर्माण किया गया है ! इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है ! पर जिन्हें इस अनोखी और सुरम्य जगह का पता है, वह यहां मौका मिलते ही जरूर आते हैं !



तुम्हारे अधरों की
मिठास
तृप्त कर जाती है
जीवन की हर प्यास,
मृगतृष्णा-सा मन
भटकता रहता है
मरीचिका के उजास।




आज हठी ने 
ठान लिया है
अपने को ही नोच
नीति नियम क्यों

ताखे पर रख
अनुशासन का 
कभी स्वाद चख



आज का अंक
कुछ भारी हो गया है
झेल लीजिएगा
सादर वंदन

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

4652....अंबर तक उड़ जायेंगे..

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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बीज से वृक्ष 
तक का संघर्ष  
माटी की कोख से 
फूटना
पनपना,हरियाना,
फलना-फूलना
सूखना-झरना 
पतझड़ से मधुमास
सौंदर्य से जर्जरता के मध्य
स्पंदन से निर्जीवता के मध्य
सार्थकता से निर्रथकता के मध्य
प्रकृति हो या जीव
जग के महासमर में
प्रत्येक क्षण
परिस्थितियों के अधीन
जन्म से मृत्यु तक
जीवन के
मायाजाल में उलझी है
जिजीविषा...।
-----------
आज की रचनाऍं- 
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ओरे-बोरे दर्द छुपाया
आँसू कथरी-कथरी 
टांका बस पैबंद उम्र भर
भटका नगरी-नगरी
कमी नहीं कोई पाओगे
मेरे चहल-पहल में





जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 




साँसों के इस कोमल घर में, हम दो ज्योति समाएँगे,
अंग-राग की इस सीमा से, अंबर तक उड़ जाएँगे,
जब लय-प्रलय की इस संधि पर, काल स्वयं थम जाएगा,
तब प्रेम-समर्पण का यह क्षण, युग-युगांतर कहलाएगा!
अभी यहाँ यह रूप-झलक है, वहाँ अमित अनुराग रहेगा!



समंदर ने पानी उधार लिया है 

नदियों से 

नदियां जब सूख रही होती हैं 

समंदर नहीं लौटता है

नदियों के हिस्से का जल ! 



शाम को जब सूरज ढल रहा था, आयुष और शगुन छत पर मिले. "चाची भी लड़की चाहती हैं, आयुष," शगुन ने कहा. "पर चाचा को 'वारिस' चाहिए," आयुष ने मुंडेर पर हाथ रखते हुए कहा. "2006 आ गया है, पर सोच अब भी 1906 में अटकी पड़ी है. हम कुछ बनने के लिए कोटा और बनस्थली जा रहे हैं, पर क्या हम वाकई इस पिंजरे से बाहर निकल पाएंगे?"




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

4651..चांदी की तरह..

 ।।भोर वंदन।।

आज गुरुवारिय प्रस्तुति में ब्लॉग 'लिखो यहां वहां' पर नजर डालिए..✍️

राजेश सकलानी जी की कविताएं

 


 कपास से बनी नरम रातें.

 

हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें

उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,

 हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं

बेईमानी से,

 उनकी कई तहें बना कर

अपने काबू में कर लेते हैं

अश्लील शान्ति के साथ  मुस्कराते हैं ,

और अश्लील स्वप्न देखते हैं

  अपनी शर्मिन्दगी को छुटा  कर

 हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,

  जिनका निर्दोष स्पर्श  छत की तरह तन जाना चाहता  हैं,

 और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता  हैं,

 

सारी रात  अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें

 उन्मत्त होतीं हैं,

वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,

और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर

हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,

 

इन्ही रातों के नीचे  तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ

रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,

लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में  छिपा कर  चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं

 

हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से

 मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं

पर  डटी रहतीं हैं,

हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.


 हमारी नौली चांद पर है.

(गांव में पानी का स्रोत )

 

हमारी नौली चांद पर है

वह जितनी सुन्दर है

उतना ही दुख देती है

छेनी से काट काट कर

उसे सजाया मैने

झर झर  झर झर

उससे पानी गिरता है

चांदी की तरह..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

 

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