निवेदन।


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सोमवार, 29 जून 2026

4788 ... पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे

 सादर अभिवादन 

लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।
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राजेश : क्या हुआ आरती
पत्नी को झकझोरते हुए बोला..
आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए.
किस पर विश्वास करें और सगे भी ?
पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे.




कहाँ गया बिटिया का वो रूप 
जब बिटिया अपने माँ-बाप के लिए 
अपनी खुशियां भी छोड़ देती थी 
अपनी माँ के लिए हमेशा पहले सोचती थी 
शादी के बाद पति की ख़ुशी ही उसका सब कुछ होता था 




प्यार की जब बात कहें बोले ईश्वर से प्यार
संसार यह भ्रमजाल है मुक्ति इसका द्वार
मानवीय प्रणय खड़ा आत्म देह की गर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना



समय का एक पुराना बरगद
अब भी खड़ा है
सभ्यता के चौराहे पर।
उसकी जड़ों में
पूर्वजों की असंख्य पदचापें सो रही हैं।

जब भी कोई पीढ़ी
अपने अतीत को भूलने लगती है,
बरगद की जड़ें
पत्थरों को चीरकर बाहर आ जाती हैं।






धीरे-धीरे प्रतीक्षा
दूब-सी धरती पर फैल जाती है।

वह पेड़ों में बस जाती है,
रास्तों में, ऋतुओं में,
यहाँ तक कि घर की दीवारों में भी।

और फिर
वह आत्मा का स्वभाव बन जाती है।
***
सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 28 जून 2026

4787 ..यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।

 सादर अभिवादन 

ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
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हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है




हथौड़ा बजाते हुए बोला—
"वादी, प्रतिवादी, दोनों पक्षों की दलीलें और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि अभियुक्त निर्दोष है। अतः इसे सम्मान पूर्वक बरी किया जाता है।"

फैसला सुनाकर वह मुस्कराया, न्यायाधीश की कुर्सी से उतरा और एक बरीशुदा चोर की तरह अदालत से बाहर चला गया।




कमाल है ना, मोहब्बत समझने के लिए हम अपने दिल के तिलिस्म के भीतर उतरना चाहते हैं। ख़ुद को बेहतर समझने के लिए, अपनी सारी गुत्थियाँ खोलना चाहते हैं। जब कि मुहब्बत सा सबसे ज़रूरी फैक्टर होता है, भूगोल। कि तुम मेरे स्पेस में इर्द-गिर्द रहते ही नहीं तो मुझे तुम्हारे होने न होने से क्या ही फ़र्क़ पड़ना था।





बहुत स्वाभिमानी भी हूँ 
मगर नारी का अपमान हो ये सोचता भी नहीं 

स्त्री पुरुष तो हमसफ़र हैं जिंदगी के 
एक दूसरे के खिलाफ कभी भी नहीं



सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 27 जून 2026

4786 और वही इसका पहला अपराध था।

सादर अभिवादन 


कल मोहर्रम का उत्सव हो गया
रचनाएं




न्याय दिलाएं मित्र को अपने बाली वध का काज करें ,
मित्रता का समस्त विश्व में सर्वश्रेष्ठ प्रमाण हैं .

सिया हरण का सबक सिखाने रावण का संहार करें ,
अखिल जगत में राम नारी का इसलिए अभिमान हैं .







युद्ध विराम
ढोल का शोर
भगोड़ा का बजाया—

अमराई में
तोता का कलरव—
युद्ध विराम





“अरे, हम काहे नहीं जा पाएंगे ! हम तो ज़रूर जाएंगे बिटिया के जन्मदिन पर ! हमें तो वहाँ की दाल बाटी, चूरमा, खीर सभी बहुत पसंद आती हैं! तुमसे कौन बोला हम नहीं जाएंगे !” दादी हैरान थीं ! 

“नहीं अम्माँ, वहाँ तुमको कैसे पता चलेगा कि खाना बनाने वाले की और परसने खिलाने वाली की जात कौन सी है ! कहीं तुम्हारा धरम भ्रष्ट हो गया तो क्या होगा !”





माया हर्फों की जहां सारा
‘चुप’ में वह रब बसा होता है

 करीब वही है सबसे उसके
 दिल में जिसके फना होता है




अक्सर मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।

फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।




सादर समर्पित
सादर वंदन 


शुक्रवार, 26 जून 2026

4785...जिनकी नहीं क़लम से कभी दोस्ती हुई

 शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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जब भी समाज में कोई अविश्वसनीय हिंसक और क्रूरतम घटनाएं होती हैं—खासकर जब उसमें कोई युवा या लड़की/लड़का शामिल हो—तो यह पूरे समाज को भीतर तक झकझोर कर रख देती है। जब कोई इतनी कम उम्र में ऐसा कदम उठाता है, तो यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर इतनी कम उम्र में इतनी नफरत या संवेदनहीनता कैसे आ सकती है? 
यह सवाल खड़ा होता है कि हमारी न्याय प्रणाली, परवरिश या मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर कहां कमी रह गई कि कोई इस हद तक चला गया। कुछ लोग अपने जीवन में इस हद तक आत्मकेंद्रित (Self-centered) हो जाते हैं कि उन्हें दूसरों का दर्द, यहाँ तक कि दूसरों का जीवन भी अपने स्वार्थ के आगे बहुत छोटा लगने लगता है। यह एक गंभीर मानसिक और नैतिक पतन है।
मैं मानवीय मूल्यों के पतन से आहत हूॅं खासकर एक स्त्री जो ममता ,दया, त्याग,सृजन और प्रेम का स्वरूप मानी जाती है और उसके द्वारा ऐसे हत्याकांड किया जाए तो बहुत शर्म आती है मुझे एक स्त्री होने के नाते।

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आज की रचनाऍं-


जिसकी नहीं कलम से कभी दोस्ती हुई,
कहते हैं वो भी एक उपन्यासकार है.

क़ानून सिर्फ़ एक है क़ानून कुछ नहीं,
जंगल का फिर भी हाल मगर शानदार है.

पैसा अगर हो पास तो जितनी बुराई हो,
बच्चा रईस बाप का भी होनहार है.


एक और गंभीर प्रश्न है

जब शिक्षा स्वयं
'सीमित अनुमति' में बदल चुकी हो,
तो इतनी डिग्रियाँ
आख़िर आई कहाँ से?
किस अदृश्य बाज़ार से?
और किस स्वीकृत वास्तविकता में
उन्हें प्रमाणित किया गया?



नियम को तोड़ना ही शान समझें जब।
सुरक्षा का उन्हें कब अर्थ आएगा।।

सरल है दोष दूजे पर लगा देना।
स्वयं के खोट मानव कब गिनाएगा।।




एक दिन गांव में बहुत तेज आंधी आई। लोगों ने देखा कि बुजुर्ग का दीपक तेज आंधी में भी जल रहा है। युवक फिर बुजुर्ग के पास गया और पूछा, बाबा! आपका दीपक कैसे जल रहा है? बुजुर्ग ने कहा कि मैंने अपने दोनों हाथों से दीपक को बुझने से बचाया था।  युवक ने कहा कि बाबा, इस एक दीपक से पूरी दुनिया का अंधेरा दूर नहीं हो सकता। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 25 जून 2026

4784 मुझे थोड़ा पढ़ो, ज़्यादा समझो,

 सादर अभिवादन 

मुझे थोड़ा पढ़ो,
ज़्यादा समझो,
मुझे अनपढ़ों की तरह पढ़ो,
पढ़े-लिखों की तरह समझो। 
-ओंकार केडिया






सच्ची बात बताता हूँ 
आज तुम्हें समझाता हूँ 
हर पल खुशियों को चाहो 
गम को पास न आने दो 
जीत हमेशा पाओगे 
भय को जीत जो जाओगे 
गर्व सदा खुद पर रखना 
हर मुश्किल से डटकर लड़ना 


क्या तुमने सुना


पत्तों की सरसराहट
हवाओं का अस्फुट स्वर
बूँदों का छनकना
जल का कल-कल बहना
बैलों के गले में घंटी का
रह-रह कर हिलना,
कोयल की कुहू-कुहू
चप्पू का चलना
सायरन का बजना
टाइपराइटर का टकटकाना
कीबोर्ड का सरपट दौड़ना







कालिदास के 
मेघदूत की 
आँखों में भी पानी कम है,
कड़ी धूप में 
उजले बादल 
देख देख जंगल बेदम है,
टूटी रीलों वाले 
कैसेट में 
गाता जगजीत कहाँ है?




शायद उस पार
जहाँ सांसारिक बन्धन रहित नाव तो है 
मगर खिवैया अब भी अदृश्य है,
वहीं कहीं अनंत में कोई शांतिपूर्ण तट भी होगा
जहाँ पहुँच कर सभी प्रश्न स्वतः मौन हो जाएँगे 





योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,
पिता का चेहरा उसी उजाले में नजर आया।

पिता ने उंगली थाम कर चलना सिखाया है,
योग ने गिरकर भी संभलना सिखाया है।

योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,
वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।




सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 24 जून 2026

4783..चुना हुआ मौन


।।प्रातःवंदन।।

"जीवन की सुन्दर बगिया में आशा

की कलियाँ महकाती

रैन अँधेरे भागे भागे

सोनेवाले जागे जागे

उषा आई, उषा आई "

ज़िया फतेहाबादी 

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए ✍️

एक ही मौसम हरदम नहीं रहता

 एक ही मौसम हरदम नहीं रहता


हमदम हमेशा हमदम नहीं रहता।

✨️

अफ़सोस, राम लल्ला के नाम पर सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है

 अफ़सोस, सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है। राम लल्ला के नाम पर एक स्कैम हो रहा है। और यहाँ बताया गया है कि यह सिर्फ़ क्रिमिनल गड़बड़ी से कहीं ज़्यादा क्यों है।

ताज़ा खबर यह है कि SIT राम मंदिर डोनेशन चोरी की जांच में चंपत राय के सा..

✨️

चुना हुआ मौन



आदमी

देख नहीं सकता,

यदि आँखें न हों।


सुन नहीं सकता,

यदि कान न हों।

बोल नहीं सकता,

✨️

ऐसे पढ़ो मुझे

मैं गीता हूँ,

बाइबल हूँ,

क़ुरान हूँ। ..

✨️

अभिलाषा:

ए ज़िंदगी,

ज़रा आहिस्ता चल।

क्यों बेतहाशा भागती है,

बदहवास दौड़े जाती है।..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 23 जून 2026

4782...एक मौन शिल्पकार है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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बारिश का इंतजार करती चिड़िया

​तपती दोपहर, सूखा शजर,
आसमान पर टिकी नजर।
पंख समेटे, आस लगाए,
ताक रही है सूनी डगर।

​सूख गई हैं नदियां-नहरें,
धूल भरी हैं ठंडी लहरें।
प्यासी चोंच, उदास है मन,
बीत रहे हैं मुश्किल पहरें।

​कब गूंजेगी मेघों की मल्हार,
कब थमेगा यह अंगार?
प्यासे कंठ से पुकारती वो—
"बरसाओ न मेघ थोड़ी-सी फुहार।"
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आज की रचनाऍं- 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 
लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 
आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 
सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.



वह तूफ़ान नहीं
जो पेड़ को गिरा दे।
वह तो जड़ के पास बैठा हुआ
एक मौन शिल्पकार है,
जो हर चोट के साथ
मनुष्य के भीतर से
अनावश्यक पत्थर हटाता रहता है।
कई बार परिणामों की धूप
हमारे हिस्से नहीं आती,
कई बार
मेहनत का पूरा आकाश
बादलों में घिर जाता है।



समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।





बेवजह का यात्री
वर्तमान की  सच्चाईयाँ - वह 
फिर भी तो नहीं है  मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं ,  मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की  जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल 
खुदा से मिलने का अशराना  लिये  हुए  पथ पर बढ़ते जाना ।



कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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