सादर अभिवादन
पढ़े-लिखों की तरह समझो।
-ओंकार केडिया
हवाओं का अस्फुट स्वर
बूँदों का छनकना
जल का कल-कल बहना
बैलों के गले में घंटी का
रह-रह कर हिलना,
कोयल की कुहू-कुहू
चप्पू का चलना
सायरन का बजना
टाइपराइटर का टकटकाना
कीबोर्ड का सरपट दौड़ना
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन।।
"जीवन की सुन्दर बगिया में आशा
की कलियाँ महकाती
रैन अँधेरे भागे भागे
सोनेवाले जागे जागे
उषा आई, उषा आई "
ज़िया फतेहाबादी
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए ✍️
एक ही मौसम हरदम नहीं रहता
हमदम हमेशा हमदम नहीं रहता।
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अफ़सोस, राम लल्ला के नाम पर सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है
अफ़सोस, सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है। राम लल्ला के नाम पर एक स्कैम हो रहा है। और यहाँ बताया गया है कि यह सिर्फ़ क्रिमिनल गड़बड़ी से कहीं ज़्यादा क्यों है।
ताज़ा खबर यह है कि SIT राम मंदिर डोनेशन चोरी की जांच में चंपत राय के सा..
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आदमी
देख नहीं सकता,
यदि आँखें न हों।
सुन नहीं सकता,
यदि कान न हों।
बोल नहीं सकता,
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मैं गीता हूँ,
बाइबल हूँ,
क़ुरान हूँ। ..
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ए ज़िंदगी,
ज़रा आहिस्ता चल।
क्यों बेतहाशा भागती है,
बदहवास दौड़े जाती है।..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
बारिश का इंतजार करती चिड़िया
समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,
डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।
मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,
काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।
हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,
बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आज पितृ-दिवस(Father's Day) पर अपने पिताश्री का स्मरण करते हुए भूमिका में अपनी एक रचना 'पिता की स्मृति' प्रस्तुत कर रहा हूँ-
6 फरवरी 2008 से
अब तक
एक अधूरापन
मेरे भीतर
घर कर गया है
करते होंगे लोग
बरसी पर स्मरण पिता को
मेरी स्मृति से
वह पल जाता ही नहीं
जब मुखाग्नि दी थी
बड़े भैया ने चिता को
एक काया
अपना सफ़र
मुकम्मल कर रही थी
देखते-देखते
पिता जी की पार्थिव-देह
पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी
उन्हें लेकर गए थे
सजी हुई उदास अर्थी पर
श्मशान-घाट
लौट आए थे
उनकी स्मृतियों के साथ
बेबस बस ख़ाली हाथ
संस्कारों की फ़सल
मूल्यों की अक्षय पूँजी
कुल के दायित्त्व
विश्वास का घनत्त्व
इच्छाओं की गठरी
बोध-कथाओं की लायब्रेरी
जीने की कलाओं का विस्तार
देकर छोड़ गए हो संसार!
आपकी स्मृति
सघन परछाइयों में
शून्य लिख जाती है
जिसके अर्थ तलाशता हुआ
अपने पिता होने के
अर्थ तलाशता हूँ
तस्वीर हो जाने के ख़याल में
ख़ुद को खँगालता हूँ
नब्बे वर्ष की आयु
निरोग जीवन जीकर
आपका महाप्रस्थान
आपका साथी बूढ़ा नीम
है अब मेरा मित्र महान।
©रवीन्द्र सिंह यादव
रविवारीय अंक में पढ़िए चुनिंदा रचनाएँ (पीछे मुड़कर देखी एक झलक)-
धारा में पिता भी बहे,
तो बहते ही गये ,
बहते ही गये।
भ्राता भी बिन बहे न रहा ,
भगिनी भी बही,
वह ऐसी बही।
वह तो फूट ही पड़ी ,
बहना हम को क्यों तुम छोड़
चलीं।
*****
सुबह से शाम तक
समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
और मनुष्य..,
जेब में पड़े सिक्कों
की तरह
धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को
क्षीण होते देखता रहता है
छोटी-छोटी ज़रूरतों में
उसके दिन बँट कर रह जाते हैं
*****
पाल-पोस कर बड़ा करना,
और दूसरे घर भेज देना ।
अपने कलेजे का टुकड़ा ,
किसी और को सौंप देना ।
अच्छे संस्कार अपनी बिटिया को देना ।
उसे इसी पूँजी से घर बसाते देखना ।
या एकाकी दीपशिखा-सी स्वावलंबी बनते देखना ।
पिता के आशीर्वाद का सम्मान है ना ?
पिता की नम आँखों का स्वाभिमान है ना ?
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वृद्धाश्रम-मुक्त समाज और सामंजस्य की आवश्यकता
आज वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को स्वास्थ्य और रहन-सहन की सभी भौतिक सुविधाएँ
मिल रही हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता
बनी हुई है। जो संतान आज अपने माता-पिता को संस्थाओं के हवाले कर रही है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि
'समय का चक्र घूमकर वापस आता
है।' भविष्य में उनके साथ भी
वैसा ही व्यवहार होने की प्रबल संभावना है, जैसा वे आज अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं।
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बोध हो गया है
पर चलती रहती है साधना
संतोष नहीं होता
साधकों को
खोज ईश्वर की चलती रहती है
जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है
उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है!
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तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान ।
शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।
है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली ।
सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली ।
कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे ।
भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,
चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,
तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।
कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।
पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम
निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”