निवेदन।


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सोमवार, 8 जून 2026

4767...गाथा कहें माँ भारती की हम सदा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन रचनाएँ-

माँ भारती

गाथा कहें माँ भारती की हम सदा।

हर ओर गौरव गान हो अभिमान से।।

रख स्वावलंबी आज अपना ध्येय भी।

पूरा न हो कोई प्रयोजन दान से।।

*****

चिंगारी प्रेम की

छिपी है हरेक मन में

उसे हवा देकर पल भर को सुलगाती हैं

या कोई मन छिपाये हो भीतर

प्यार की सुवास

वह बिखर जाती है

किसी अनजान पल में

*****

गुजारिश

बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll

*****

पंचम वेद ... (६)_, , ग से BPL कार्ड तक ... !

कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़ नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।

*****

मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!

ज‍िस जीव का नाम लेते ही मेरे शरीर में एक अजीब सा घ‍िनौना अहसास जागने लगे ऐसे में जब चारों ओर इन्हीं कॉकरोची च‍ित्रों से भरा ऐसा नजारा द‍िखे तो सोच‍िए मन क‍ितने भीतर तक घ‍िन से भर गया होगा...जी हां, आज कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर प्रदर्शन था... ''था''  इसल‍िए ल‍िखा, क्योंक‍ि यह प्रयास बुरी तरह फेल हुआ। स्वयं इस पार्टी को जन्म देने वाला द‍िल्ली की गर्मी से घबराकर भाग खड़ा हुआ। 

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 7 जून 2026

4766 ..सीमेंट की दीवारों ने आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।

 सादर अभिवादन 
नौतपा खत्म 


काले मेघा, काले मेघा, 
पानी तो बरसाओ
बिजुरी की तलवार नहीं,
 बूँदों के बान चलाओ
मेघा छाये, बरखा लाये
घिर-घिर आये, घिर के आये




याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं
ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे





धरती के दोनों ध्रुवों पर पर बसने वाले 
छोटे-छोटे मुल्कों को 
झेलनी पड़ रही है सजा 
उस जुर्म की, जो उन्होंने किया ही नहीं 
हर रोज़ मरते हैं हरित वन 
और जन्मते हैं कंक्रीट के जंगल 
हर रोज़ उगलते हैं करोड़ों वाहन, धुआँ 




मात यशोदा के घर आये
वहाँ नंद के लाल कहाये।
मोर पंख से सजता कुंतल
कानों में झूला था कुंडल।
जब जब मुख पर दधि लपटाए
नटखट बन अँखियाँ मटकाए।
खूब चराते हो तुम गैया
किये सर्प पर ता ता थैया।




ए ज़िंदगी,
ज़रा आहिस्ता चल।
क्यों बेतहाशा भागती है,
बदहवास दौड़े जाती है।
ज़रा रुक, दम भर तो ठहर,
ऐसी भी क्या जल्दी है।





पत्थर की छतों पर
अब धूप नहीं उतरती,
सीमेंट की दीवारों ने
आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।
जहाँ कभी
काफल की डालियों पर
बचपन झूलता था,
वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं
और पक्षियों की जगह
नेटवर्क के सिग्नल चहकते हैं।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 6 जून 2026

4765 ..हिंदू-मुस्लिम पुड़िया लेकर, भानुमती ये खोले पिटारा।

सादर अभिवादन 




चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।





तनाव चाहे जितना गहरा हो,
जीवन का सूरज डूबता नहीं,
एक नई सुबह की आस में
जीवन चलता रहता है।




कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।

“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।

कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।

“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”





एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।



हिंदू-मुस्लिम  पुड़िया लेकर,
भानुमती  ये खोले पिटारा।
आगे नाथ और पीछे पगहा,
गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।

हाय! कितनी बदल गयी यह,
संवादों की अपने दुनिया।
कल से आते- आते ‘आज तक’,
ख़बरनवीस बाजीगर बनिया! 


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 5 जून 2026

4764...प्रेम वह नहीं जो आपको किसी का गुलाम बना दे

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
मैं नीर भरी दुख की बदली
        ------------- महादेवी वर्मा 

इन पंक्तियों में छुपा सार संपूर्ण जीवन दर्शन है।
जीवन से मनुष्य का परिचय शिशु के रुप में होता है, उस शिशु का सर्वप्रथम परिचय माँ की गंध से 
होता है। धीरे-धीरे जीव सासांरिक स्वरुप से गंध और स्पर्श द्वारा,अचेतन से चेतनावस्था में 
प्रवेश करते समय  परिचित होता है।

बतायी गयी,समझायी गयी और स्वयं की तार्किक बुद्धि द्वारा मन का, किसी जीव के 
बाह्य स्वरूप को पहचानना परिचय कहलाता है। किसी व्यक्तित्व के अच्छे-बुरे स्वरूप 
को जानना उस जीव के आंतरिक रुप से परिचित होना कहलाता है।
परिचित वह है जिसके अंतर्मन के भावों को आप पहचानते है।
छोड़िये मेरी दार्शनिक परिभाषा को।
साधारण शब्दों में कहूँ तो
चिर-परिचित व्यक्तित्व 
परिचित कहलाते हैं शायद हैं न...?

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आज की रचनाऍं-

विश्व पर्यावरण दिवस पर एक 
विशेष रचना पढ़िए 


कौन जानता है

कि मौन भी एक भाषा होता है—

जिसकी वर्णमाला में

पत्तों की थरथराहट,

धूप की धीमी चाल

और जल की अनकही स्मृतियाँ लिखी होती हैं।

मैंने देखा है—





नन्हे सुकोमल हाथों ने 
बनाई थी जो पेंटिंग 
बच्चों के अनमोल रत्न खिलौने 
पढ़ने-लिखने के लिये किताबें-क़लम 
माँ के बनाये हुए स्वेटर
पिता ने सजायी थीं जो ईंटें  
सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी
सहेजे गये भोज्य-पदार्थ और दवाई 
आधुनिकता का साज़-ओ-सामान 
संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान 
यादें-रिश्ते-सपने सब धमाके में ख़ाक हुए जलकर



आख़िर
आत्महत्याएँ हुई ही कितनी हैं?
कुछ गिनी-चुनी।

जो कि उम्मीद से कम है
लोकतंत्र के गणित में
ये संख्याएँ हैं बेकार

आख़िर क्या-क्या देखेगी

बेचारी सरकार।

 



बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम



सत्ता के लोभी 
शकुनि सभी 
दुश्मन से हाथ मिलाते हैं,
भारत की मिट्टी में 
जन्मे गद्दार 
हमें धमकाते हैं,
हे कल्कि 
अवतरण लो जल्दी 
इस धरती का उद्धार करो.



बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता






"प्रेम वह नहीं है जो आपको किसी का गुलाम बना दे। प्रेम वह है जो आपको एक बेहतर इंसान बना दे। अगर किसी से जुड़कर आप खुद से और इस दुनिया से नफरत करने लगें, तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो वह है जो आपके भीतर की करुणा को जगा दे।"

और फिर वह रात आई, जब आरव के जीवन का सफर पूरा होने को था। वह अपने बिस्तर पर लेटा था, सांसें उखड़ रही थीं। कमरा अंधेरे में डूबा था। लेकिन तभी आरव को लगा कि उस अंधेरे में एक जानी-पहचानी चमक पैदा हुई है।




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 4 जून 2026

4763 ..नौतपा शेष हो गया बस कुछ दिनों की बात है

 सादर अभिवादन 

नौतपा शेष हो गया
बस कुछ दिनों की बात है



चाहे कितना भी हो विघटन 
समाज बंटे, टूटे परिवार
व्यक्ति रह जाए अकेला 
पर सदा साथ रहती है उसके 
एक अखंड आत्मा !




कुओं-तालों में  अब पानी   नहीं  है,
नदी   में  भी   वो  तुग़्यानी  नहीं  है।

सभी के ज़ख्मों पर रखना है मरहम,
किसी को  चोट  पहुँचानी  नहीं  है।

दुखों  में  भी  ये  कहते  थे पिता जी,
मुझे   कुछ   दुख-परेशानी  नहीं  है।   




माँ हूँ न तुम्हारी ! 
सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ  
तुम्हारी इस दरियादिली पर 
तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !






कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 3 जून 2026

4762..देखा जाए तो...

।।प्रातःवंदन।।

" पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर!

वह मुसाफिर क्या जिसे कुछ शूल ही पथ के थका दें?

हौसला वह क्या जिसे कुछ मुश्किलें पीछे हटा दें?

जिन्दगी की राह पर केवल वही पंथी सफल है,

आँधियों में, बिजलियों में जो रहे अविचल मुसाफिर!

पंथ पर चलना तुझे तो..."

गोपालदास नीरज

इसी वैचारिक रूप को संजोए चलते हैं बुधवारिय प्रस्तुतिकरण पर..

पुरुषार्थ के पथ पर..


 निकट भविष्य के श्रम-संघर्ष से,

तुम बिल्कुल ही अनजान हो।

या स्वयं को समझो पूर्ण समर्थ,

या चंद दिवस के मेहमान हो।

भूतकाल का अनुभव पथदर्शक,

वर्तमान कठिन या आसान हो।

मगर भविष्य कब ठहरा है,..

✨️

दो जून की या छह जून की...कौन सी रोटी है अच्छी!!

आज दो जून है तो सुबह से शाम तक सोशल मीडिया में ‘दो जून की रोटी’ छाई हुई है। हर कोई दो जून की रोटी का महत्व/संघर्ष गिनवा रहा है लेकिन मेरी समस्या यह है कि बदलते वक्त में किसे सही माने.. दो जून की रोटी को या छह जून की रोटी को। अब आप सोच रहे होंगे कि दो जून तो ठीक है पर ये छह जून क्या बला है?..

✨️

देखा जाए तो.............

देखा जाए तो 

बातें वही हैं 

हम सबकी 

जिन्हें कोई एक कहता है 

दूसरा भी 

अपने शब्द देकर  

सिर्फ दोहराता है। 

देखा जाए तो ..

✨️

फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा 

उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा ..

✨️

बिगाड़ के डर से--- 

एकता व्यास की कहानी ‘स्लीपिंग पार्टनर’ 

यह कहानी अपने शीर्षक के कारण प्रथम दृष्टया पाठक को एक ऐसे भ्रम में डालती है, मानो यह किसी यौन सम्बन्ध अथवा देहात्मक निकटता की कथा हो। किंतु कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता जाता है कि लेखिका का सरोकार शरीर से अधिक उस गहरे अकेलेपन से है, जो आधुनिक जीवन-शैली और बदलते पारिवारिक ढाँचों ने बुज़ुर्गों के हिस्से में छोड़ दिया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता भी है कि वह एक भ्रामक शीर्षक के भीतर अत्यंत मार्मिक मानवीय संवेदना को छिपाकर रखती है।..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 2 जून 2026

4761...झूठे आश्वासनों का थक्का

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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सुमन कल्याणपुर (28 जनवरी 1937 – 31 मई 2026)
विनम्र श्रद्धांजलि 

सुमन कल्याणपुर को अपने समय की और हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्ण युग की प्रसिद्ध गायिकाओं में गिना जाता है, जिनमें मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, मुकेश, किशोर कुमार, गीता दत्त, मन्ना डे, आशा भोसले, हेमंत कुमार, तलत महमूद, महेंद्र कपूर और शमशाद बेगम शामिल हैं। उन्होंने कुल 857 हिंदी गाने गाए हैं।
सुमन कल्याणपुर में संगीत की स्वाभाविक समझ थी। उनके गीतों में स्पष्ट उच्चारण और लय की बदौलत वे सहजता से गीत के भाव को आत्मसात कर लेती थीं। गीतों में उर्दू-फ़ारसी शब्दों का उच्चारण करते समय सुमन कल्याणपुर कभी लड़खड़ाती नहीं थीं और उनकी गायन शैली बेदाग थी। ढाका में जन्मीं सुमन कल्याणपुर को उर्दू का पहले से ही ज्ञान था और उन्होंने अपने कई गीतों में अपने सटीक उच्चारण का भरपूर इस्तेमाल किया। वे उर्दू, बंगाली और अपनी मातृभाषा मराठी में बोलती हुई बड़ी हुईं। यही कारण है कि वे कई बंगाली गीत सहजता से गा सकती थीं। 
करीब 28 साल के अपने करियर में सुमन कल्याणपुर ने पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया।

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आज की रचनाऍं- 

नदी ढूँढते 
पंछी सारे 
जून -जुलाई के,
नई -नई 
आँखों में सपने 
गोद भराई के,
मंडप -मंडप 
कलश सजे हैं 
हल्दी, दही, परात.


इसके अतिरिक्त
रक्त में धार्मिक घृणा के सूक्ष्म कण
असामान्य मात्रा में पाए गए,
जो लंबे समय से
उसकी संवेदनाओं को
भीतर ही भीतर नष्ट कर रहे थे।

रिपोर्ट पढ़ते ही
कमरे में सन्नाटा भर गया।

फिर अचानक
कुछ वरिष्ठ विशेषज्ञ बुलाए गए।
रिपोर्ट रोक दी गई।
शब्द बदले गए।
निष्कर्ष संशोधित हुए।





ख़ुद को तपाना है 

जीवन हरेक के योगदान से बना है 

एक घास का तिनका भी उतना ही ज़रूरी है 

जितना आकाश में कोई वृक्ष तना है 

एक पत्थर भी नदी के तल को 

मज़बूत बनाना है 




जिस की तस्वीर लगी रहती
थी शहर के हर एक गलि
कूचों में, वही आज
चेहरा छुपाए
बैठा है
गुमनाम दरीचों में, 
शून्य बटा सन्नाटा है सिर्फ उसके
आसपास, मिलता
नहीं किसी
को


तुम फेल होने पर इतने दुखी मत हो। विफलता सिखाती है कि जीवन में कैसे सफल हुआ जाए। इसलिए तुम परेशान होने की जगह नए जोश के साथ जुट जाओ और अगली परीक्षा में सफल होकर दिखाओ। लेकिन इतने से भी लड़के को संतोष नहीं हुआ। एक दिन आत्महत्या करने के इरादे से घर से निकल गया। रास्ते में उसे एक बौद्ध मंदिर दिखाई पड़ा जिसके अंदर से आवाज आ रही थी। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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