निवेदन।


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शुक्रवार, 15 मई 2026

4743...सभी तो ऊर्जा है

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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लौटना फिर से
अनजानों की भीड़ में
आसान नहीं
जहां आपके इंतज़ार में
कोई न हो....
 
यादों की छाँव में बैठे अक़सर सीते हैं कुछ टीसते घाव,
हँसाते कभी रूलाते हैं, नहीं भुलाये जाते क्यों दर्द के पाँव..।
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आज की रचनाऍं-


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!




लपेटा उँगलियों पे तुमने जो वो दुपट्टा कुछ शरमाकर, 
तुम्हारी बेवफ़ाई का हर इक शिकवा अब छूटा हुआ है।
 
सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से, 
मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।
 

इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास, 
फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास



हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे। 


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 14 मई 2026

4742..बच्चे छुट्टियाँ मना कर अपने अपने ठिकाने गए

 सादर अभिवादन


गुरुवार सप्ताह का पांचवा दिन है। इसे बृहस्पतिवार, वीरवार या बीफ़े भी कहा जाता है। 
यह बुधवार के बाद और शुक्रवार से पहले आता है। मुसलमान इसे जुमेरात कहते हैं क्योंकि
यह जुम्मा (शुक्रवार) से एक दिन पहले आता है।

बृहस्पति को देवताओ के गुरु माना जाता है,
अत: इस दिन को गुरुवार भी कहा जाता है।

रचनाएं



उपासना सियाग एक ख्यातिप्रात रचनाकार
ने लिखना कम कर दिया है
कुछ जूनी रचनाएं उनकी इस अंक में है
उनको कृपया लिखने पर मजबूर करें
*****



दादा - दादी टीवी के आगे बैठे हैं । 
दादी - " चीवी चांऊ (टीवी चलाऊं) ?" 
दादा जी - " हाँ...
" दादी - " मिक्की माउछ चांऊ ! 
दादा जी -" नहीं ऐलीफैत चाओ !" 
दादा - दादी का सम्मिलित ठहाका गूंजा , लेकिन आंखों में नमी थी 



कोरे काग़ज़ पर
सिर्फ़ एक प्रश्नचिह्न।
जवाब के बिना
हर सवाल है अधूरा ।
सवाल पर औंधा लटका
कोई कैसे जिए ?





दिल को दिल से राह !
अरे सब झूठी बातें हैं ।
चिन्तन में केवल छल बल
और मन में घातें हैं ।
नेह वचन विश्वास कि जैसे
माट-मटूने री ।





ईशान कोण के
उस पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना । अभी बहुत दूर है मुहाने का प्रकाश स्तंभ,
पहाड़, तलहटी, ग्राम
शहर, पुरातन
मंदिर,
उदास से खड़े हैं दोनों पार असंख्य आशातीत 




सोचती हूँ कभी- कभी 
इंतज़ार वाली तकदीर लिए
रखती होगी
ये छब्बीस- सताईस पौरवे वाली
उंगलियाँ। 






कॉमरेड कुलकर्णी ने प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, तुमने जो रैंडम सर्वे किया था, उसके आधार पर और तकनीक के क्षेत्र में परिवर्तनों के आधार पर तुम्हारी राय क्या है?"

प्रिया ने अपना टैबलेट खोला और डेटा दिखाते हुए कहा, "सर, आज स्थिति यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है. इस फैक्ट्री ने पिछले चार-पाँच सालों से अपनी तकनीक में कोई विकास नहीं किया है. जिसके कारण इसका मुनाफा नई इकाइयों की अपेक्षा कम हुआ है. इसके ग्राहकों की संख्या कम हुई है, क्योंकि सब अपने उत्पादनों में एडवांस आई. सी. लगाना चाहते हैं. नयी इकाइयों के साथ बाजार में बने रहने के लिए इन्हें अपनी तकनीक का नवीनीकरण करना होगा, जिसमें इन्हें पूंजी लगाना होगा. संभवतः इसीलिए कंपनी इस इकाई को बंद करके इसकी जमीन को औद्योगिक आवासीय या व्यवसायिक में परिवर्तित करवाकर बिल्डरों की मदद से अच्छा मुनाफा काटना चाहती है. वह मामूली पूंजी लगाकर किसी नए औद्योगिक क्षेत्र में बैंकों से 70-80 प्रतिशत सस्ता ऋण लेकर नयी यूनिट लगाने की जुगत में है. वहाँ कंपनी को अच्छी सब्सिडी मिल जाएगी और अनेक प्रकार के टैक्सों से कम से कम पाँच साल के लिए छूट मिल जाएगी. कंपनी का यही प्लान है 



युवक झल्लाकर बोला,
"जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं तो हम क्यों अजमेर शरीफ की 
दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।"
महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली,  "देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। 
ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।"
युवक की माँ मुस्कुराते हुए बोली, 


खर्च कम किया जाए पर कैसे
पर बाजार तो बाजार है, 
उसने हर पावन त्यौहार, समारोह, परंपरागत उत्सव सभी को 
अपनी गिरफ्त में ले लिया है 
और लेता जा रहा है.....

सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 13 मई 2026

4741..यादों की राख गर्म है..

।।भोर वंदन।।

 "एक किरण आई छाई,

दुनिया में ज्योति निराली

रंगी सुनहरे रंग में

पत्ती-पत्ती डाली डाली !

एक किरण आई लाई,

पूरब में सुखद सवेरा

हुई दिशाएं लाल

लाल हो गया धरा का घेरा !

~ सोहनलाल द्विवेदी  

  आज की पेशकश में शामिल रचनाए ✍️

शाख़-ए-वजूद

कुछ इस तरह फुसफुसाती है हवा,
शायद कोई ग़ज़ल सुनाती है हवा।

सुकून फिर भला कैसे नसीब हो,
ज़ख्मों को रोज़ छेड़ जाती है हवा।

यादों की राख अब भी गर्म है कहीं,
धीरे-धीरे फिर सुलगाती है हवा।

✨️

अमेरिकी जादूगर के नीले जादू की क़ैद में

हिमाचल..!!

दुनिया भर के लोगों को अपने श्वेत-बर्फीले हुस्न, आकाश छूते चीड़-देवदार और प्रकृति के हरियाली भरे श्रृंगार से अपनी ओर खींचने वाला हिमाचल प्रदेश इन दिनों एक अमेरिकी जादूगर के नीले जादू के मोहपाश में बंधा हुआ है। आमतौर पर जादूगर वैसे तो काला जादू करते हैं लेकिन इस विदेशी..

✨️

बोझिल मन !

अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,

इक ज़माना था जो हम गाते,

तय पथ था और सफ़र अटल,

उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।..

✨️

विषय

विषयों की तलाश में 

भटकता हुआ 

किसी कोने में 

कहीं अटकता हुआ 

बेसुध सा मन 

यहाँ-वहाँ ..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्‍ति'..✍️

मंगलवार, 12 मई 2026

4740...उसका घर उसका देश है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

मंगलवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

कौन हो तुम-एक दार्शनिक प्रेम कविता

स्वयं के अस्तित्व से बेखबर
दुर्गम पथ की बाधाओं से अनजान,
कठोर धरातल पर कुसुम-राह तलाशती।
जीवन के इस विस्तृत क्षितिज को
अदम्य उत्साह और चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

*****

माँ की प्रतिक्षाएँ

कोई पूछे

आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

*****

855. माँ

उसका घर उसका देश है,

देहरी देश की सीमा,

बच्चे देश के नागरिक,

उसके होने भर से

महफ़ूज़ रहता है उसका देश,

चैन से सोते हैं उसके बच्चे।

*****

सोशल मीडिया में मैडिटेशन का शोर

आज की दुनिया में, जहाँ लोग देर रात तक स्क्रीन देखते हैं और फिर नींद न आने की शिकायत करते हैं, यह विधि तेज़ी से प्रचलित हो रही है। अनिद्रा कुछ हद तक घटती है और नींद आ जाए तो चिंता भी कम हो जाती है। इस अभ्यास से शरीर और मन को आराम मिलता है। लेकिन इसका उद्देश्य सिर्फ़ नींद लाना है, आत्म-दर्शन नहीं। आराम और गहरी ध्यान-साधना के बीच का अंतर समझना ज़रूरी है।

 *****

मातृदिवस, दस मई को ही क्यों

माँ ! जैसे विशाल, अद्वितीय, अप्रतिम, दैवीय व्यक्तित्व के लिए एक दिन का निर्धारण ! इस बात को लेकर कई बार हम भावुक और आक्रोशित भी हो जाते हैं ! पर मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाने के पीछे भी एक बेटी की अपनी माँ के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और सामाजिक सुधार की भावना काम कर रही थी ! उस बेटी का नाम है, एना मारिया जार्विस ! एना की मां का निधन 9 मई 1905 को हुआ था, जो उस वर्ष मई का दूसरा रविवार था, इसीलिए मई के दूसरे रविवार को ही ''मदर्स डे'' मनाने की परंपरा शुरू हुई!

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 


सोमवार, 11 मई 2026

4739 तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन ......

सादर अभिवादन

मातृ दिवस कल सम्पन्न हुआ
पर रचनाएं हफ्तों आती रहेंगी
और माँ तो ताजिंदगी साथ नहीं छोड़ती है

रचनाएं




तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन,
कबहूँ-कबहूँ लागेला थोड़ा हिसाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल उठेला जिनगी के मौसम,
छँट गइल अन्हेरा काहे कि रात महताबी हौ।




क्या इस बार भी  
खूबसूरत आभासी गुलदस्ते, 
तरह-तरह के आभासी केक 
और वचना भरे शुभकामना सन्देश
भेज कर मना लोगे तुम
‘मदर्स डे’,
और खुश हो जाओगे  





कोई चाहता है 
हम पूर्ण विकसित हों 
इसलिए वह पाहन, बेड़ियाँ, प्रेम 
सब के साथ पूर्णता की चाह भी 
भर देता है !! 





उस दिन के बाद मणिकर्णिका पर 'कालू' कभी नहीं दिखा। पर लोग कहते हैं अमावस की रात जब कोई अकेला घाट पर रोता है, तो हवा में हल्की सी आवाज़ आती है —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे...

और रोने वाले को लगता है जैसे किसी ठंडे हाथ ने नहीं, किसी माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।

कहानी का सार: मंत्र में बिजली नहीं, ममता होती है। पिशाच की सबसे बड़ी प्यास खून नहीं, स्पर्श थी। और जब इंसान डर कर भागने की जगह गले लगा ले, तभी निर्वाण होता है।




आँखों के नम होनें का ,सबब ना पूछो दोस्तों 
यहाँ तो ये किस्सा आम हो गया है
आती हैं खबरें अखबारों में 
एक लाइनों में ,जिंदगी की कीमत 
हो जाती है बयाँ ..... 





“बब्बन भाई, मैं नहीं, आकाश जा रहे हैं.” प्रिया ने आकाश की ओर इशारा करते हुए कहा,
“ये मेरे मित्र हैं, जयपुर से आए हैं. इन्हें विक्रोली में अपनी कंपनी के गेस्ट हाउस जाना है.
आप छोड़कर आइएगा.”

“बिलकुल, दीदी.”

आकाश, प्रिया और आटोरिक्शा चालक के बीच के वार्तालाप को चकित होकर देख रहा था.
उसके विस्मय को देखकर प्रिया ने आकाश को कहा, “आकाश, बब्बन भाई आटोरिक्शा
चालक यूनियन के कार्यकर्ता हैं. ये तुम्हें ठीक गेस्ट हाउस ले जाकर छोड़ेंगे.”

आकाश के चेहरे से विस्मय अब कम नहीं हुआ था. वह प्रिया के व्यक्तित्व के
विस्तार को देखते हुए ही आटोरिक्शा में बैठ गया.


सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 10 मई 2026

4738...माँ खुल कर मुस्काई होगी...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया रेणु बाला जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

मातृ दिवस: आस की गूँज

पहला तारा

माँ सिखला रही है

गाँठ खोलना

*****

माँ के लिए दो कविताएँ

जब माँ- बेटी ने मिल कर
कुछ रातें संग बिताई होंगी
जी भर गुरबत कर बेटी से
माँ खुल कर मुस्काई होगी।

*****

धूप और छाँव के बीच

और तब लगता है

दुनिया में उतरना नहीं,

उतरने का अभिनय करना भर ही

अब शेष रह गया है।

*****

माँ 

मेरी चोट का मरहम माँ ही तो है

सबसे प्यारी हमेशा मेरी ही चिंता में घुलने वाली

माँ  देखती हूँ जो तेरा प्यार  मैं  भी  बड़ी बच्ची

तेरी स्नेह  छाँव  में  ही  हर पल  जीवन का गुजारु

अभिलाषा मन की,

*****

भीतरी मोर्चा

19 मई को सुबह आकाश मुंबई पहुँच रहा था. प्रिया ने उसे अपने यहाँ आने को कहा था लेकिन उसने मना कर दिया. आकाश ने मना करते समय जो बात कही थी, उसकी गूंज उसके ज़ेहन से नहीं जा रही थी. "यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके." फिर भी आकाश के मुंबई आते ही उससे मिलना चाहती थी.

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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