निवेदन।


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बुधवार, 19 सितंबर 2018

1160..मुख़्तसर कहो इकरार क्या है?



।।भादवी सुप्रभात।।

हम ऐसी सब किताबें क़ाबिले ज़ब्ती

 समझते है,कि जिनको पढ के 

बच्चे बाप को ख़ब्ती समझते हैं।

अकबर इलाहाबादी



कुछ इस तरह की साफगोई सोच के साथ लिंकों की ओर नज़र डालते हैं...✍

💠



दिल से दिल तक..कुछ सवालों के साथ..




फकीर की फकीरी का कीमतें-बाजार क्या है?

बदलने से जुब्बा-ओ दस्तार ख्यालात नहीं बदलते,

मसनद मिले भी तो क्या हालात नहीं बदलते /



💠



स्वप्न मेरे से खूबसूरत रचना..



जैसे सर्दी की कुनमुनाती धूप

खिल उठो जैसे खिलता है जंगली गुलाब

पथरीली जमीन..



💠



समलैंगिक प्रेम
बड़ा अजीब है प्रेम,

किसी को भी हो जाता है,

लड़की को लड़की से,

लड़के को लड़के से भी,

समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में,

अपराध है सभ्य समाज में,..



💠



प्रशांत की पोएट्री..



कितना कुछ रह जाता है 

छूट जाता है 

और गुज़र भी रहा है 

पीछे 

न भरने वाले खड्ड मे समाता हुआ, 

एक अंतहीन खड्ड 

अंतहीन स्थान के साथ ..



💠



और अंत करती हूँ
 आदरणीय ज़फर जी की गजल से..

तू एक बार गले लगा के देख ले...
कितने बंदर हमने संसद पिछले सालों में भेजे हैं
एक बार सदन में डमरू बजा के देख ले,
तेरे कदमो में तमाम उम्र की गुलामी रख दी हैं
जरा मुझे  घूंघट उठा के देख ले,
💠
हम-क़दम के छत्तीसवाँ क़दम
का विषय...
यहाँ देखिए.


।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ती'..✍







मंगलवार, 18 सितंबर 2018

1159...वैसे तो फेसबुक पर जो भी चाहे एक खाता खुलवा सकता है

बदलाव प्रकृति का नियम है। बिना बदलाव के जागृति संभव नहीं। समय ही तय करता है बदलाव सकारात्मक है कि नकारात्मक। 
साहित्य जगत में भी बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है। देश की समसामयिक समस्याओं पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले हमारे बुद्धिजीवी रचनाकार गंभीर सृजनशीलता में जुटे है।
सृजनशीलता कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकती,
फर्क पड़ता है हमारे दृष्टिकोण से।
मतदाता का पक्ष होता है, 
वो किसी व्यक्ति को अपना मत देता है। 
लेकिन लेखक को निष्पक्ष होकर 
विषय पर ही लिखना चाहिए, 
व्यक्ति पर नहीं....

सादर अभिवादन....
आदरणीय भाई कुलदीप जी का संदेशा सुबह से ही आ गया
समय है...प्रस्तुति बन जाएगी समय से पहले...
आज एक नयापन...अगले सप्ताह का विषय पहले
यानि की प्रस्तुति नीचे से शुरु.....

-*-*-*-*-*-

हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का सैंतीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'तृष्णा'
...उदाहरण...
निर्णय-अनिर्णय के दोराहे पर डोलता जीवन,
क्या कुछ पा लूँ, किसी और के बदले में,
क्यूँ खो दूँ कुछ भी, उन अनिश्चितता के बदले में,
भ्रम की इस किश्ती में बस डोलता है जीवन।
-पुरुषोत्तम सिन्हा

फिल्म नयादिन नई रात
संजीवकुमार-जया भादुड़ी
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
एक खास बात और आप इस शब्द पर फिल्मी गीत भी दे सकते हैं

अंतिम तिथिः शनिवार 22 सितम्बर 2018  
प्रकाशन तिथि 24 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 

सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
-*-*-*-*-*-

अब आपको ले चलते हैं रचनाओं की ओर....
"कब तक”.......मीना भारद्वाज
नैन हमारे तकते राहें ,जाने तुम आओगे कब तक । 
जाओ तुम से बात करें क्यों , साथ हमारा दोगे कब तक ।। 

ना फरमानी फितरत पर हम , बोलो क्योंकर गौर करेंगे । 
तुम ही कह दो जो कहना है , हम से और लड़ोगे कब तक ।।

संध्या वंदन...नूपुर

सांझ की लौटती धूप
धीरे-धीरे आती है,
सोच में डूबी हौले-हौले 
भोले बच्चों जैसी
फूल-पत्तियों को..
सरल सलोने स्वप्नों को
दुलारती है ।
हल्की-सी बयार से
पीठ थपथपाती है ।

बह जाते हैं नीर....पुरुषोत्तम सिन्हा

असह्य हुई, जब भी पीड़,
बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,
नैनों से बह जाते हैं नीर,
बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...

मौसम बदलने लगा.....नीना पॉल

मिले हादसे मुझको हर मोड़ पर
सम्भलने से पहले फिसलने लगा

तेरी याद में खो गया इस क़दर
उम्मीदों का इक दीप जलने लगा

मिलने से पहले जुदाइयों का ग़म
पल-पल दिलों में ही पलने लगा

फिज़ूल टाईम्स.......डॉ. राजीव जोशी
मेरी आँखों ने ऐसे मंजर देखे हैं
भीख माँगते छोटे कोमल कर देखे हैं।

खून पसीने से तन उनके तर देखे हैं।
हवादार बिन दीवारों के घर देखे हैं



पिता सुधा स्रोत....कुसुम कोठरी
देकर मुझ को छांव घनेरी
कहां गये तुम हे तरुवर
अब छांव कहां से पाऊं

देकर मुझको शीतल नीर
कहां गये हे नीर सरोवर
अब अमृत कहां से पाऊं ।


शीर्षक कथा
उलूक उवाच....डॉ. सुशील जोशी

लिखने लिखाने के 
विषयों पर क्या 
कहा जा सकता है 
कुछ भी कभी भी 
खाली दिमाग को 
फ्यूज होते बल्ब के 
जैसे चमका सकता है 
कभी घर की एक 
बात उठ सकती हैं 
कभी पड़ोसी का 
पड़ोसी से पंगा 
एक मसालेदार 
मीनू बना सकता है 

इज़ाज़त दें 
दिग्विजय 





सोमवार, 17 सितंबर 2018

1158...हम-क़दम का छत्तीसवाँ क़दम... क्षितिज


देवताओं के वास्तुकार और धरती के प्रथम शिल्पकार माने जाने वाले भगवान विश्वकर्मा की जयन्ती हर वर्ष 17 सितम्बर को बड़ी धूम-धाम से मुख्यतः कर्नाटक,असम,पश्चिमी बंगार,बिहार,झारखंड, ओड़िसा और त्रिपुरा में मनायी जाती है। 
 कल-कारखानों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा विशेष रुप से की जाती है।

अंबरांत,अंबरांरभ,आकाश-रेखा,उफ़ुक,दिशा-मंडल,शफ़क या क्षितिज।
धरा,गगन के मिलन की भूल-भूलैय्या में दृग को उलझाता है।
भ्रमित मन का वह आभासी संगम "क्षितिज" कहलाता है।
हमक़दम के विषय "क्षितिज" पर उकेरी गयी क़लम की कूची से  रचनाकार चित्रकारों की अनुपम इंद्रधनुषी कलाकृतियाँ सच में सराहनीय है।  आपकी कलाकारी को हृदय से प्रणाम करती हूँ। किसी भी विषय पर सहजता से लिख जाना आपकी व्यापक दृष्टिकोण और रचनात्मक क्षमता का अपूर्व सुखद आभास करवाता है।
आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन है।

आइये आज की रचनाओं का आस्वादन करते हैं-
आदरणीया मीना जी


एक विनती मान लेना,
संग चलना उस क्षितिज तक,
देख लूँ नयनों से अपने,
मैं धरा से गगन मिलते...
लेख नियति ने लिखा यह,
क्यों मिटाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

★★★★★

जुल्म न झूठ का कोई स्थान होगा
हरेक जाति धर्म एक सामान होगा
मनुष्य बस मानव धर्म निभायेगा
इंसान बस इंसा कहलायेगा
हर विचार को जुबान मिलेगी
हर कली निर्भीक खिलेगी
नैतिकता ही नीति का आधार होगा
तेरे मेरे मन का नगर क्षितिज के पार होगा
★★★★★

आदरणीया सुधा जी की क़लम से

कली खिली फिर फूल बनी,
खुशबू महकी फ़िज़ा में मिली।
फ़िज़ा में महकी खुशबू से ही
कुछ खुशियाँ चुराया करता था।
वह दूर कहीं क्षितिज में खड़ा
बस प्रेम निभाया करता था ......

★★★★★

 आदरणीया कुसुम जी

अधोमुखी हो झुकता पुष्कर
एक दृष्टि सीमा तक जा रुकता नभ
धुमिल उच्छवास उठ सारंग तक
महि का हृदय आडोलित हतप्रभः

यही पावन मिलन एक रेख सा
अंकित सुनहरी लाल मनभावन
बन क्षितिज लुभाता सदा हमे
कितना मनोरम कितना पावन।
★★★★★
आदरणीया साधना वैद जी

दूर क्षितिज तक पसरे
तुम्हारे कदमों के निशानों पर
अपने पैर धरती
तुम तक पहुँचना चाहती हूँ !
सारी दिशाएँ खो जायें,
सारी आवाजें गुम हो जायें,
सारी यादें धुँधला जायें,
मेरी डायरी में लिखे
तुम्हारे पते की स्याही
वक्त के मौसमों की मार से
भले ही मिट जाय
★★★★★
आदरणीया एस. नेहा जी


क्षितिज के उस पार 
जहाँ  मेरी जाने के ख्वाहिश हैं

वहां न ख्वाहिशों की  बेड़ियाँ हैं 
और न ही रिश्तों का दोहरापन 
वहाँ न ही उम्मीदें हैं 
और न ही किसी प्रकार का सूनापन 
★★★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम जी

मन के क्षितिज पर,
गर कहीं चाँद खिला होता,
फिर अंधेरों से यहाँ,
मुझको न कोई गिला होता!

अनसुना ना करता,
मन मेरे मन की बातें सुनता,
बातें फिर कोई यहाँ,
मुझसे करता या न करता!
★★★★
आदरणीया अभिलाषा चौहान जी की तीन रचना
प्राची दिशा में
क्षितिज पर
छाई लालिमा
छटने लगी कालिमा
आ गए अरुण
ले दिनकर का रथ
वसुधा पर फैली उर्मियां
★★★
उस अनिर्वचनीय 
सौंदर्य में
देखती मेरी निगाहें
उल्लास का अतिरेक
जब दूर क्षितिज पर 
मिलते अवनि अंबर 
करते प्रेम का इजहार 
तब लहराती तरंगे
छू लेना चाहती आकाश
★★★
अवनि अंबर का
जहां होता मिलन
जहां मिल कर झूमें
धरती गगन
सुनती हूं वहां है
खुशियों का चमन
उस क्षितिज तक
मुझे जाना है
★★★★★
आदरणीया अनुराधा चौहान जी की दो रचना

कभी सुनी थी
बचपन में
एक कहानी
क्षितिज के पार
एक दुनिया सुहानी
सुंदर सुंदर
बाग बगीचे
उड़ते सब और
उड़न खटोले
कल कल करती
नदियां बहती
★★★

अनुराधा चौहान
रात देखा एक स्वप्न
क्षितिज पर मचा था
तारों का क्षितिज बंद
छोड़कर चमकना
सबका हुआ गठबंधन
सुनने समस्याओं को
मौजूद सभी देवगण
एक एक समस्याओं
का करके निदान
★★★★★
आदरणीया नीतू ठाकुर जी

क्षितिज के पार देखो , चांदनी आंसू बहाती है 
तेरा साया जहाँ पड़ता , सिसकती भोर आती है 

ये टूटे आशियाँ आँखों में , बिखरे ख्वाब बाकी हैं 
दिए सौगात में आंसू , बता तू कैसा साकी है 
★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना जी 

परम प्रेम का आगाज़ होगा
जीवन तभी सार्थक होगा
दूर क्षितिज तक कभी
शायद ही कोई पहुंचा होगा
पर हमें न कोई रोक सकेगा
वहीं हमारा घर होगा |
★★★
आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।


अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।
अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ



रविवार, 16 सितंबर 2018

1157....कितनी छलक गयी, कितनी जमा हुई, बूँदें बारिश की


तीज-त्योहारों की शुरुआत हो गई है
श्री गणेश जी राजित हो गए हैं
योमे-आसुरा (मोहर्रम) शुक्रवार को है
एक बार फिर दो उत्सवों का साथ है...
उल्हास भी मातम भी...
शुभकामनाएँ और अफ़सोस साथ-साथ...

चलिए चलें आज चयनित रचनाओं की ओर...



मेरा अस्तित्व....अभिलाषा अभि
'तुम गेम खेल रहे हो और तुम्हारी वजह से मैं टॉर्चर हो रही हूं। सौ बार बोला है वक़्त देखकर काम किया करो।' बेटे के हाथ से मोबाइल लेकर मैं सुकून की तलाश में फेसबुक लॉग इन करके किनारे बैठ गई।
यही कोई 10 मिनट के बाद बॉस की प्रोफाइल पर एक अपडेट आती है, '.... निःसन्देह एक कर्मठ एम्प्लॉई थीं पर ऑफिस से बेटे की बीमारी का बहाना करके छुट्टी लेकर फेसबुक पर सक्रिय पाई जाती हैं। मैं नहीं चाहता कि इनकी इस हरकत का असर फर्म के अन्य एम्प्लॉई पर पड़े। इनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त की जा रही हैं।'



कहीं कच्चे, कहीं पक्के,
कहीं समतल, कहीं गढ्ढों-भरे,
कहीं सीधे, कहीं घुमावदार,
अकसर पहुँच ही जाते हैं


युद्ध कोई भी हो,उसका कोई परिणाम नहीं होता पार्थ, मान लेना है, वह जीत गया,वह हार गया । क्या तुम्हें अपनी जीत पर भरोसा था ? क्या तुम जीतकर भी जीत सके ? कर्ण की हार का दोषी दुनिया मुझे ठहराती है, फिर इस तरह मैं ही हारा ! 

एक छोटी सी लम्बी कहानी
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"अरे का बताएँ भाई अब ई डर सताय रहा कि कइसे हम इत्ता बड़ा जिम्मेवारी संभालेंगे?"
रमेसर जो अब तक चुप था , बोल पड़ा।
"सब हो जाएगा काका चिन्ता न करो, हम हरपल तुम्हारे साथ हैं, अब गाँव को सही दिशा में लाना है और ई सब गाँव वाले मिल के करेंगे।" हरीश ने कहा। उत्साह उसके अंग-अंग से छलक रहा था आखिर उसने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था।
"अब बस एक चीज पूरे गाँव वालों को समझाना है काका...
ऊ का?
"चौधरी अब गाँव वालों को आपस में भड़काएगा, लड़वाएगा, कभी जाति के नाम पर कभी जमीन के नाम पर....लेकिन उसे बस अब सिर्फ एक ही तरीके से हरा सकते हैं...आपसी एकता से, चाहे कोई भी किसी के खिलाफ कुछ भी कहके हम सबको आपस में भड़काए पर हमें अपनी समझदारी नहीं छोड़नी।" हरीश ने सबको समझाते हुए कहा।
इतने बरस भोगे हैं बेटा, अब मुक्ति मिली है तो अब ऊकी ना चलने देंगे। भगवती प्रसाद ने गमछा कंधे पर डालते हुए कहा और सभी खुशी के भाव चेहरों पर सजाए अपने-अपने घरों को चल दिए। आज उनकी आँखों में सुनहरे सपनों ने पंख फैलाना शुरू कर दिया और उधर पश्चिम में दूर पेड़ों के झुरमुटों के पीछे दिनकर ने अपना दामन समेटना शुरू कर दिया है, आज डूबते सूरज की सिंदूरी लाली गाँव वालों की आँखों में सुनहरा सपना बनकर चमकने लगी है।



ना कहूँगी फ़िर कभी
कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना,
मैं नयन तुमको बसाकर
देखती हूँ एक सपना !!!
संग मेरे तुम ना आओ,
रूठ जाऊँ, मत मनाओ,
पर तुम्हारी राह में मैं
फूल बनकर तो खिलूँगी !
फ़िर वहीं तुमसे मिलूँगी !!!


डॉ. सुशील जी जोशी
कहाँ 
जरूरी है 
सब कुछ 
वही कहना 
जो दिखे 
बाहर बाजार 
में बिकता हुआ 
रोज का रोज 
‘उलूक’ 
किसी दिन 
आँखें बन्द 
कर के
झाँक भी
लिया कर
आज बस...
फिर मिलते हैं
यशोदा




शनिवार, 15 सितंबर 2018

1156... हिन्दी दिवस पखवाड़ा में कोलाहल


तराजू के
एक ओर सामान
दूसरी ओर तौल

वजन बराबर
पर दाम समान नहीं
बराबर होते हुए
बराबरी करने लायक नहीं
बराबर होना
और बराबर दिखना
बराबरी का एक छल है
छल प्रायः
मन के कोलाहल का कारण है~सुरजन परोही

सन 1881, में
बिहार पहला राज्य बना ,
जहाँ हिंदी को अाधिकारिक भाषा के रूप में
स्वीकार किया गया

आप सभीको यथायोग्य
प्रणामाशीष
परबचन में माहिर हम
क्या अपनी भूमिका के प्रति सचेत हैं
कुछ दिनों तक और मचा रहेगा
साल-छह महीने बाद किसी को डरते-डरते सुनाया भी जाए तो सिर्फ मरी हुई प्रतिक्रिया हासिल करने और दुखी होने के लिए। ऐसा बिल्कुल न होता अगर कुछ घटनाओं ने मुझे अपने इस पारंपरिक परिवेश से छिनगा कर अलग न कर दिया होता। लेकिन एक बार यह हो गया तो कविता एक विरोधी, विद्रोही, अंडरग्राउंड किस्म की हरकत की तरह मेरे भीतर पैदा हुई और एक बार पैदा होकर फिर कभी नहीं गई।

दरअसल अगर हम आज की हिंदी कविता को देखें तो यहां शोरगुल ज्यादा कविता को लेकर संजीदगी कम दिखाई देती है । इस वक्त हिंदी कविता को संजीदगी की ज्यादा जरूरत है कोलाहल की कम क्योंकि कोलाहल से जो कलह हो रहा है उससे हिंदी कविता का और हिंदी के नए कवियों का नुकसान संभव है ।

एक कन्या की जन्म जन्मान्तर की सहराई प्यास है बुझकर भी नहीं बुझती. औरत का एक जन्म नहीं होता, ज़िंदगी के सफर में हर पड़ाव पर एक नया जन्म होता है. वह औरत ही होती है जो मिट्टी से जुड़कर सेवा करती है. फिर भी समाज में पुरुष सत्ता के मान्यता के दायरे में कई कट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं. कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई करते करते हार जाती है, पर उसकी आवाज़ चीख बनकर अब ध्वनित व् प्रतिध्वनित हो रही है. ‘गुड़िया-गाय-गुलाम’ नामक यह कविता उसीकी तर्जुमानी है.
‘कल तुमने मुझे अपने खूंटे से गाय समझकर/ मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी आज तुमने मुझे /अपने हुक्म का ग़ुलाम समझकर/ गरम सलाख से मेरी जीभ दाग़ दी है/और अब भी चाहते हो/मैं शिकायत न करूं?

कोलाहल
अब तो
आदमी का ख़ून
बाज़ार की मंहगाई
खादी का भ्रष्टाचार
संसद का हंगामा
ग्लोबलवार्मिंग
प्रदूषण
और कन्याओं की भ्रूण हत्या ही हावी है मानस पटल पर

हमें पता है आप इज़्जत करते हैं एक स्त्री की.. पर इन सब घटनाओं से आपके अंतर्मन पर क्या प्रभाव पड़ता है..आपका दिल कितना दुखता है, ये बस आप ही समझते हैं।
कुछ चंद मानसिक रोगियों व वहशियों के कारण पूरे पुरुष समाज को इस दंश को झेलना पड़ता है।

><
फिर मिलेंगे...
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का छत्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
क्षितिज

उदाहरण..
आओ 
चलो हम भी
क्षितिज के उस पार चले

जहाँ 
सारे बन्धन तोड
धरती और गगन मिले

जहाँ 
पर हो
खुशी से भरे बादल

और 
न हो कोई
दुनियादारी की हलचल

बेफिक्र 
जिन्दगी जहाँ
खेले बचपन सी सुहानी

जहाँ 
पर नही हो
खोखली बाते जुबानी

खुले 
आकाश मे
पतन्ग की भान्ति

उडे 
और लाएँ 
एक नई क्रान्ति

जो मेहनत
को बनाएँ

सफलता की सीढी
आशा सच

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
अंतिम तिथिः शनिवार 15 सितम्बर 2018  
प्रकाशन तिथि 17 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 

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