पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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सोमवार, 2 मार्च 2026
4669 ..जला के ईष्या,द्वेष की होलिका राख मले मतवारे,
रविवार, 1 मार्च 2026
4668...मेरा मन ही है जो सब जानता है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
यक़ीन की
धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
*****
हम मिले
गिरजे की उन सीढ़ियों पर
जहां न
जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के
कदमों के निशान थे
कितनी
उदासियों का ठौर था
कितने
कनफेशन सर झुकाये बैठे थे
*****
झांकता, कभी खिड़कियों से,
जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,
शाख की, रंगीनियों से,
पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,
झूलती, उनकी पत्तियों से,
कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!
पता ही ना चला....
व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....
*****
अश्वत्थामा
बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।
राजा जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते।
कौन सच । वह सच। या यह सच!
*****
फिर मिलेंगे।
शनिवार, 28 फ़रवरी 2026
4667 फरवरी का अंतिम दिवस
सादर अभिवादन
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026
4666... प्रेम ने दर्द को स्वीकार कर लिया है...
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026
4665..ख़्वाहिशें..
भोर वंदन
गुरुवारीय प्रस्तुति में शामिल
'आपका ब्लॉग 'से रचनाए
कई शब्द रंग-ढंग को समेटे..✍️
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आओ किस्सा तुम्हे सुनाए
recent सा है यार
साठ साल की उमर में हो गया
ऑनलाइन मुझे प्यार
ऑनलाइन मुझे प्यार
मिले वो टिंडर पे थे यार
प्रोफाइल देखकर रीझ गया दिल
हुआ पहली नज़र में प्यार
✨️
बांचती रही हूं
बस तुम्हें औ तुम्हारा लिखा ही मैं बाँचती रही हूं
तुम्हे सोना चांदी हीरा मोती सम मैं आंकती रही हूं
अक्षरशः पढ़ना तुझे जैसे सांस सांस लेना
तेरा वजूद तूफान सा और मैं पत्ते सी कांपती रही हूं
✨️
बुधवार, 25 फ़रवरी 2026
4664..छटाँक भर का
।।प्रातःवंदन।।
" दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्ह खड़ी है आने को
धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को
प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गुंजेगी
देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढ़ाने को..!"
गौतम राजरिशी
आइये चलें शब्दों की नगरी और बुधवारिय
प्रस्तुति के साथ..✍️
बरसाना की लट्ठमार होली: प्रेम, प्रतिरोध और भक्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं का एक जटिल और गहरा ताना-बाना है. इसमें बरसाना की 'लट्ठमार होली' अपने आप में अद्वितीय है. जहाँ दुनिया होली को केवल 'रंगों के खेल' के रूप में देखती है, वहीं एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से यह उत्सव दमित भावनाओं के रेचन (Catharsis), स्त्री सशक्तिकरण और सामूहिक भक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
✨️
"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है " !
एयरपोर्ट से बाहर निकलते बेटे के मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही शर्मा जी और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बेटे से मिलने का उत्साह जैसे कुछ ठंडा सा पड़ गया ।
सोचने लगे कहाँ तो हमें लगा कि इतने समय बाद हमें देखकर बेटा खुश होगा पर ये तो भगवान को ही कोसने लगा है" ।
तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?.. बता दे "?
बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" ।
"सही तो कह रहे तेरे पापा" - मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोली, "हमें देखकर भगवान को जो कोसने लगा तू ! क्या कह रहा था ये-
"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है "
दोनों ने एकसाथ दोहराया और हँसने लगे ।
"शिट ! तो आप लोगों ने सुन लिया" ?
"बेवकूफ ! गॉड ने हमें भी कान दिए है", मम्मी बोली , "चल बता क्या चीटिंग हुई तेरे साथ " ?
तो बेटा बोला, " हाँ मम्मी ! चीटिंग ही तो है न ये , देखो ! मैं हमेशा आप लोगों के सामने छटाँक भर का ही क्यों रह जाता हूँ" ?
"छटाँक भर का" ! आश्चर्य ..
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अक्सर प्रेमिकाएँ
तुनुक मिज़ाज़ होती हैं—
जैसे हवा में खेलती धूप
हल्की, नर्म, और चुलबुली।
कल तक गुस्सा, आज हँसी,
आँखों में चमक और थोड़ी..
✨️
एक निडर राजा था,
उसे किसी से डर नहीं लगता था।
डरता था तो बस—
प्रेस कॉन्फ़्रेंस से।
मंत्रिपरिषद ने समझाया—
“महाराज, प्रेस कॉन्फ़्रेंस..
✨️
1
खिले जलज
पवन मलयज
आया बसंत।
2
पीत पराग
ऋतुराज का पाग
है अनुराग।
3
मंद पवन
अनुरागी छुअन
बासन्ती मन।
4
विरही मन
कहाँ पाए बसंत
रंग बेरंग।
5
वाणी की वीणा
मंद मंद रागिनी
खोया है मन।
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️










