निवेदन।


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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

4892..मोही के संग पढ़ते दद्दू, होकर उसके संग...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

भार्गव राम खण्डकाव्य - 62

निराश  कर्ण अब जा पहुँचा,

गिरि महेंद्र विप्र राम के पास।

वेश बनाये था सरल विप्र का,

जँह पाया  ज्ञान दिव्यास्त्र का।।

*****

1533 आज की स्त्री / डॉ. कनक लता 

पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,

सृजित करती है,

सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,

उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती है,

और लौटा देती है

आपको,

आपके समाज को।

*****

निशान

मिट्टी को छू उस चुनर का श्रृंगार बन गया साँझ का गुलाब l

अँगीठी की राख लिख रही कच्चे घड़े उस चाँद का ही नाम ll

मोरनी सी पायलों की झंकार बज रही उड़ते पतंगों के साथ l

गुल गुलमोहर दरख्तों कर रही आसमाँ चाँदनी की ही बात ll

*****

मोही और दद्दू

किशोर जी के अट्ठाईस बाल गीतों का यह संग्रह सम्वेदना के इसी बीज तत्व को शिशु मन में अँखुआने, उगाने और अगोरने का अनोखा यज्ञ है –

‘हर शब्द में जैसे नयी कहानी,

हर पंक्ति में रंग।

मोही के संग पढ़ते दद्दू,

होकर उसके संग।

*****

 नक्षत्रों ने दीप जलाए: जिज्ञासा सिंह के गीत-संग्रह की समीक्षा

"यही समय है निज निर्णय का

गॉठे ढ़ीली करनी हैं

ले संकल्प सकल कर अर्पित

लंम्बित राह पकड़नी है"

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 11 अक्टूबर 2026

4891 ..किससे कहता, मेरी किश्ती को डूबने से बचा लो

 सादर अभिवादन

आज अग्रसेन जयंती है

अग्रकुल शिरामणि महाराजा अग्रसेन
11 अक्टूबर, रविवार (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा) को मनाई जा रही है

देखिए रचनाएं....



किससे कहता, मेरी किश्ती को डूबने से बचा लो,
मैं बिगड़ी क़िस्मत और नौका लिए उतर समंदर गया था।
पकड़नी थी मुझे खोई रफ्तार और बिखरे सपने,
जिसे मेरी लापरवाही ही निगल बन भंवर गई थी। 




दोपहर के आसपास
साइकिल की घंटी बजाते
आते थे डाक बाबू..
खाकी यूनिफॉर्म पहने
खाकी टोपी लगाए,
खाकी बस्ते में लिए 
चिट्ठियों के पुलिंदे ।





"बेटे! मैं उसके साथ आ जरूर रहा हूं, पर तुम करना वही जो तुम्हें करना है।”




जब  सबकुछ  प्रतिकूल  नजर  आए 
प्रंशसा - निंदा  का   धुँआ  दर्पण  को  ढ़क  जाए 
नियति  भाग्य   विश्वास  की  परीक्षा  लेने  आए 
तब  जीत  किसकी  होगी  ?  सदैव  तुम्हारी  
हे  मेरे  पथिक  !   




कान्हा मैं Gen zee हूँ, 
मैं मंदिरों से ज़्यादा कैफ़े जाती हूँ। 
कान्हा मैं तुमसे मंदिर में नहीं, 
कैफ़े में मिलना चाहती हूँ।
तुम मंदिर में मिलोगे, मैं तुम्हारी स्तुति करुँगी।
तुम मौन खड़े रहोगे, मैं अपनी अपूर्णताएं गिनूंगी।



सादर समर्पित
वंदन

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

4890 ..दिल की बातें कह दें, ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं .....

 सादर अभिवादन




एक नटखट किरण बच्चे-सी
खड़ी जंगला पकड़ कर,
किलकती है, "मुझे देखो !"
 
साँस रोके ---
बाँह फैलाए खड़ा गुलमुहर ...
कब वह कूद कर आ जाए उसकी गोद में !
-कुंवर नारायण सिंह

देखिए रचनाएं....























 श्वेता और दिग्विजय के सोच में फर्क
किसी नैन सुख को आसानी से नज़र आजाएगा



सादर समर्पित
वंदन


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

4889.... अंतिम शब्द

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आप हमेशा हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे।

तोड़ बंधन श्वासों का, हुआ मौन देह गीत, 

स्मृतियों के ऑंगन में अब गूॅंजेगा चिर संगीत।

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"आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने..."

फिल्म 'क्रांतिवीर' का यह कालजयी संवाद जैसे ही कानों में गूॅंजता है, मानसपटल पर भारतीय सिनेमा के एक ऐसे अद्भुत और अद्वितीय कलाकार की छवि उभरती है, जिसकी अभिनय शैली की कोई सानी नहीं है। रंगमंच से लेकर रूपहले पर्दे तक, नाना पाटेकर ने हर किरदार में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। उनका बोलने का लहजा, उनके संवादों का अनूठा उतार-चढ़ाव और उनकी ऑंखों की तीव्रता दर्शकों को पूरी तरह झकझोर देती है।

नाना पाटेकर सिर्फ संवाद नहीं बोलते, बल्कि वे हर शब्द की गहराई को जीते हैं। समाज की विसंगतियों और व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रहार करते हुए जब वे 'यशवंत' फिल्म में अपने चिर-परिचित अंदाज में कहते हैं— "एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!" —तो वह केवल एक फिल्मी लाइन नहीं रह जाती, बल्कि आम आदमी की बेबसी और व्यवस्था के खिलाफ एक तीखा व्यंग्य बन जाती है। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अपहरण' जैसी फिल्मों में उनका गंभीर और आक्रामक रूप जितना सराहा गया, 'वेलकम' जैसी व्यावसायिक फिल्मों में उनकी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों को उतना ही लोटपोट किया। 

एक अभिनेता के रूप में उनकी महानता केवल कैमरे के सामने तक सीमित नहीं है। वास्तविक जीवन में उनकी सादगी, संवेदनशीलता और 'नाम फाउंडेशन' के माध्यम से किसानों की मदद करने का उनका जज्बा उन्हें समाज का एक सच्चा नायक बनाता है। सिनेमा के मंच से लेकर जीवन के यथार्थ तक, उनका व्यक्तित्व हमें यह याद दिलाता है कि— "भगवान का दिया हुआ सब कुछ है, दौलत है, शौहरत है, इज़्ज़त है...", लेकिन इन सबके बीच अपनी ज़मीन और इंसानियत को कभी नहीं भूलना चाहिए। नाना पाटेकर का काम और उनकी निर्भीक कला आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।

किसी ने बिल्कुल सच कहा है कि

एक कलाकार सदैव अमर रहता है।

नाना भी बेहद सम्मान से सदियों तक याद किये

जाते रहेंगे।


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आज की रचनाऍं-














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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

4888...हे पुरुष! तुम नहीं पढ़ पाए तो सिर्फ और सिर्फ स्त्री- मन...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.अंजुल चौहान जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मानो उसने चुरा लिया उर

मची खलबली जिस अभाव से

संग लिए उसको उर फिरता,

एक विचित्र खेल ज्यों चलता

स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता!

*****

आवाज़

मरुस्थल चुप था,

पर उसकी चुप्पी में

कुछ था

जो रेत नहीं थी।

 उठती आँधियाँ

ग़ुस्सा नहीं,

मरुस्थल की

गर्म साँसें थीं।

*****

1532 हे पुरुष!/डॉ.अंजुल चौहान 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए

तो

सिर्फ  और सिर्फ

स्त्री- मन

और

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

*****

तो तब तक बस इंतज़ार...

जिस दिन हम हवा से बादल,

और बादल से बिजली बनेंगे ,

हम दिखाई भी देंगे ,

हम सुनाई भी देंगे I

तो तब तक बस इंतज़ार...

*****


अवसरवादी-एक लघु कथा

"वकील झूठ बोलते हैं" कहने वाले लाला जी को जब एक सिविल केस में कोर्ट में जाना पड़ा तो अपने वकील की दलीलों पर अपने वकील से हाथ मिलाते हुए बोले "NICE"

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

4887..बह रही हर नाव..

।।भोर वंदन।।

 "लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से

बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से

आदत न रही कुछ लिखने की

निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से

कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम.."

गोपाल सिंह नेपाली

नजर डालें आज की प्रस्तुति पर..✍️

बिडम्बना

टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को 

काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को 

बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को 

मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll

✨️

वो शहर "



तूफ़ान सुबहों में भरा हर रात में बहाव है

दरार सीने में लिए बह रही हर नाव है

गांव की नींदों में हरदम शहर के सपने रहे

शहर की आँखों में अब बस जागता एक गाँव है

✨️

खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,

वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।

इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,

अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।

✨️

जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का

ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगते दवा उसे अपने मर्ज़ का

कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से

जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे ग़ज़ल बज़्म में मर्म का,..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️


मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

4886...चीख़ का कारोबार....

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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जब-जब एशियन गेम्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा ऊपर उठता है और राष्ट्रगान बजता है, तो वह केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं होती, बल्कि देश की करोड़ों उन

नन्हें-नन्हें सपनों की जीत होती है

जो अपने पैरों पर खड़े होने और कुछ बड़ा करने का निश्चय करती हैं।

​एशियन गेम्स के मंच पर भारतीय महिला एथलीटों ने जिस निडरता और प्रतिबद्धता के साथ अपने हुनर का प्रदर्शन किया है, उसने देश के खेल इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। शूटिंग और एथलेटिक्स से लेकर बॉक्सिंग, हॉकी और तीरंदाजी तक—हर स्पर्धा में बेटियों ने न केवल पदक जीते, बल्कि यह संदेश भी दिया कि भारत की खेल क्रांति का नेतृत्व अब वे खुद कर रही हैं।

​इन बेटियों का यह ऐतिहासिक प्रदर्शन आने वाली पीढ़ी के लिए एक मजबूत नींव की तरह है।

शाबाश, लड़कियों हमें गर्व है तुम पर।


आज की रचनाऍं- 

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।
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