शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ(अंक
प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी
नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष
प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)
हालात की दुश्वारियों ने
इस तरह कर दिया लाचार
कि हम आज गर्दिशों के
उफनते सैलाब में
तिनके की तरह
बहते रहे
बहते ही रहे
*****
श्वासें ही रस्ता दिखलायें
जब भी कोई भीतर जाता,
भीतर की गुंजन को सुनकर
मन का शावक थिर हो जाता !
*****
उसकी देह की दरारों में
चाक की स्मृति
अब भी बची है।
"वह टूट गया।"
*****
लोग सियासत
में आते हैं और ही मक़सद से,
जन-सेवा के दा'वे - ना'रे महज़ बहाने हैं।
हँसते-हँसते लाँघ गए हैं साहस के बल पर,
बाधाओं के पर्वत को हम कब गर्दाने हैं?
*****
Khari
Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026
जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या
बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर
का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप
में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे
- वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी
पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह
किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ
पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है
वो गाना था ना - "सीने
में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा
क्यों है"
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव





