आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
बाज़ार से चक्की और फिर घर आने तक किन-किन हाथों का स्पर्श मिला यह कितने लोग सोचते होंगे..?
सभी माँ या पत्नी के अपनेपन के स्नेहिल स्पर्श का स्वाद महसूस करते है।
पेट भरने वाले गेहूँ के दानों का कोई धर्म नहीं होता है।
इन दानों को पैदा करने वाले किसान कभी नहीं सोचते कि ये अनाज किस जात के लोगों का पेट भरेगा।
जो भूखे इसे खायेंगे वो किस संप्रदाय के होंगे।
फिर,
विकृत सोच के लोग समाज में क्यों हैं
जो रोटी का धर्म भी बाँटना चाहते है?
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इंसान बँटे,भगवान बँटे,
जाति,धर्म के नाम बँटे
सरहद में संस्कृतियों की
हृदय के सम्मान बँटे
और क्या-क्या बाँटोगे?
बाँट चुके टुकड़ों में मन
रहम करो ऐ इंसानों
न भूखों का कोई धर्म बने
जब हाथ उठे तो पेट भरे
कोई न फिर मज़हब पूछे
सबमें रोटी और नान बँटे।
माया स्वर्ण-मृगों की टोली, वन-वन मन को दौड़ाती
सत्य हिमालय-सा अडिग खड़ा, हर भ्रम-रेखा मिटवाती
सुख चंपा की गंध सलोनी, दुःख धधकता पलाश बना
दोनों के संग-संग चलकर ही, जीवन पूर्ण प्रकाश घना
कर्मों के कर से बुनती है, हर दिन नई चदरिया काल
एक सिरा उत्सव में भीगा, दूजा भीगा अश्रु-जाल।
पर मैं उसके कंधों पर
बेफ़िक्र बैठा रहता था,
जानता था कि वह
गिरने नहीं देगा मुझे ।
बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l
जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll
इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l
खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll





















