निवेदन।


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सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

1683..हम-क़दम का एक सौ आठवां अक,,वेदना

स्नेहिल अभिवादन
वेदना मूलतः संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक 
अर्थ पीड़ा,दर्द,व्यथा इत्यादि है।
मनुष्य के मन की भावनाओं में दो भावों की प्रधानता है  
सुख और दुख। दुख को नैसर्गिक रुप से बिना किसी कृत्रिमता और छल,कपट के बड़बोले आडंबरों से मुक्त, 
मानसिक व्यथा की अनुभूति ही वेदना है।

अनुभूति जब तीव्र वेग से भावनाओं को उद्वेलित करती है तो संवेदनशील कवि हृदय की करुण शाब्दिक अभिव्यक्ति 
रचना के रुप में व्यक्त होती है।

कुछ कालजयी रचनाएँ

स्मृतिशेष सुभद्रा कुमारी चौहान
वेदना ....
दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी,
हे शशि! है मुझे जलाती॥

संध्या की सुमधुर बेला,
सब विहग नीड़ में आते।
मेरी आँखों के जीवन,

बरबस मुझसे छिन जाते॥

स्मृतिशेष महादेवी वर्मा
विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात!
वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास;
अश्रु चुनता दिवस इसका, अश्रु गिनती रात!
जीवन विरह का जलजात!


ना आए विरह की रैन ...रानी विशाल

कोयल कूहके बाग में, पपीहे ने मचाया शोर
ऋतु पर भी यौवन चड़ा, पर ना नाचे मन का मोर

लगे है चन्दन आग सा, पुरवाई चुभोए शूल
मैं जोगन बन राह तकू, पियुजी गए तुम मुझको भूल

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा

....
नियमित रचनाएँ
.....
आदरणीय शुभा मेहता
मन की वेदना के ,
आँगन में.......
कुछ फूल खिले
अश्रु बूँदों से सिंचित
श्वेत से थे कुछ -कुछ
रंगहीन .....


आदरणीय व्याकुल पथिक
हम हिन्दीभाषी सच पूछे तो परिस्थितिजन्य 
कारणों से दो नावों की सवारी के 
आदती हो गये हैं और हमारे पास अध्यात्म, 
साहित्य, संस्कृति एवं संस्कार का विपुल 
भण्डार होकर भी ऐसा क्यों लगता है 
कि अपना कुछ भी नहीं है !

आदरणीय भाई रवीन्द्र सिंह जी
असीम वेदना ...
असीम वेदना से 
सहती है नादान इंसान के 
स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप 
हवा-पानी धूप-चाँदनी से 
कहती है-
भेदभाव हमारी नीयत में नहीं


आदरणीय उर्मिला सिंह
वेदना के पल
आस का पक्षी फडफडाता,उम्मीदों की शाख पर 
मन की डारियां झुला झूलाती पीले पीले पात पर 
चट्टानों की दरारों से झांकता सहमा सा उजास है 
वेदना की  मुस्कान अँधेरों  से  मिली  सौगात है!! 

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा
लहर! नही इक जीवन!

टिसते, बहते ये घन,
हलचल है, श्मशान नहीं,
रुकना होता है, थम जाना होता है,
भावों से, वेदना को, 
टकराना होता है,
तिल-तिल, जल-कर, जी जाना होता है!
जीवन, तब बन पाता है!

आदरणीय साधना वैद
वेदना की राह पर

वेदना की राह पर
बेचैन मैं हर पल घड़ी ,
तुम सदा थे साथ फिर
क्यों आज मैं एकल खड़ी !

थाम कर उँगली तुम्हारी
एक भोली आस पर ,
चल पड़ी सागर किनारे
एक अनबुझ प्यास धर !


आदरणीय कविता रावत
असहाय वेदना.....
किन्तु अब पुत्र-वियोग है भारी,
न सुहाग न पुत्र रहा अब
खुशियाँ मिट चुकी है मेरी सारी।'
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी
दूर कहीं की रहने वाली।।



आदरणीय सुजाता प्रिय
विरह वेदना
वेदना से क्या कहूँ,
यह दिल बड़ा बेचैन है।
दिन नहीं कटता यहाँ,
कटता नहीं अब रैन है।
अहसास हो कुछ आस का,
तुम ऐसी कोई शाम दे दो



आदरणीय कुसुम कोठारी
राधा जी की विरह वेदना 

विरह वेदना सही न जावे
कैसे हरी राधा समझावे
स्वयं भी तो समझ न पावे
उर " वेदना "से है अघावे।

आदरणीय अनुराधा चौहान
मेरी वेदना ..

तेरी यादों की हवा मुझे छूकर गुजरती है
मेरे जख्मों को कुरेद आँखें नम कर देती है
डूबती हूँ मैं अपने अतीत की गहराई में 
तुझसे मिलने की चाहत बेचैन करती है

मेरे दर्द की इंतहा उफ़ ये तेरा इंतज़ार
बेकरार कर देती है आहट हर प्रहर
हवाओं के झोंके यादों को झिंझोड़ते
आँखों में उतरने लगती दर्द की लहर

आदरणीय मीना शर्मा
सृजन गीत
वेदना,पीड़ा,व्यथा, को
ईश का उपहार समझो,
तुम बनो शिव,आज परहित
इस हलाहल को पचा लो !
सृजन में संलग्न होकर.....

नीर को, अब क्षीर से,
करना विलग तुम सीख भी लो,
उर-उदधि को कर विलोड़ित,
नेह के मोती निकालो !
सृजन में संलग्न होकर.....

श्वेता 
विरहिणी/वसंत

विरह की उष्मा  
पिघलाती है बर्फ़
पलकों से बूँद-बूँद
टपकती है वेदना 
भिंगाती है धरती की कोख 
सोये बीज सींचे जाते हैं,
फूटती है प्रकृति के
अंग-प्रत्यंग से सुषमा,
अनहद राग-रागिनियाँ...,
....
वेदना एक गम्भीर विषय
इस विषय पर रचना लिखना
एवरेस्ट फतह के समान है
सभी को शुभकामनाएँ
कल आएँगे भाई कुलदीप जी
नए विषय के साथ
विदा दें ..
सादर..














रविवार, 23 फ़रवरी 2020

1682...स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार...


 सादर अभिवादन। 

आदमी पर आदमी के अत्याचार 
असुरक्षा का मन पर भारी भार,
आख़िर हासिल होता क्या उन्हें
क़ानूनी मार सामाजिक तिरस्कार।
-रवीन्द्र 
आज भाई कुलदीप जी के स्थान पर मैं हाज़िर हूँ 
सद्य प्रकाशित पसंदीदा रचनाओं के साथ। 
आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-


सदा ट्रम्प को होत है, पत्तन में सत्कार,
स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार.

फ़ितरत..... डॉ. जेन्नी शबनम 

मेरी फ़ोटो

साथ सफर पर चलने के लिए   
एक दूसरे को राहत देनी होती है   
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है   
और वह हमने खो दिया था   
जिंदगी को न जीने के लिए   
हमने खुद मजबूर किया था,   
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं   
न सीने में दफ़न हो सकती हैं   


लगता रावण की बस्ती में
मुझे अचानक राम मिला है

खुशबू बांटो डूब प्यार में
तुझे सुमन जो नाम मिला है
 
 
मेरी फ़ोटो

वो के हवाले से उसकी सारी बात कह देते हैं महफिल में
ये तो शायरों की जुबान फिसलती है और क्या है
 
वो क्या है जिसका इस्तेमाल खाने में नहाने में लगाने में होता है
तन्हा इसका जवाब हल्दी है और क्या है


बचपन-के-कड़वे-घूँट-Poor-Children-in-India
आज इन बच्चों को सड़क पर इस तरह देखा तो मन में एक साथ हज़ारों सवाल फूट पड़े इतनी छोटी सी उम्र में ये बच्चें ये सब क्या कर रहे हैं ? ये सब काम अपनी मर्ज़ी से कर रहे हैं या फिर इनके घर वाले करवा रहें हैं ? क्यूँ इन मासूमों से इनका बचपन छीना जा रहा है ?  






आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

1681...धतूरा


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
इंसानों के लिए जो होते विष
धारण करने वाले हैं जगदीश
कर देता संज्ञानाश
धतूरा
घुन लगी कविताएँ,
जूठन में बची थोड़ी सी सच्चाई,
हँसी जिस पर जाले जमे हुए हैं,
एक चूहे की लाश, और मेरा साहस,
वर्षों बाद आज मैं छू रहा हूँ धतूरे का फूल
तो छू रहा हूँ अपने दोस्तों को
छू रहा हूँ उनकी हँसी उनके विश्वास को
देख रहा हूँ पीछे मूड़ कर
-उजाले बंद करके ;
कवि पर कर लगाकर ,
-अस्मिता को छुआ है ;
लोग सब जानते हैं ,
-आखिर क्या हुआ है ?
 धतूरा खाक कर कोई तो मर जाता और कोई पागल हो जाता।
उन दिनों भी उसके धतूरे के प्रभाव से एक व्यक्ति पागल होकर
नगर की सड़कों पर घूमा करता था। लेकिन धतूरा खिलाने वाले
व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं था,
इसलिए वह खुलेआम सीना तानकर चला करता।
इसके पीछे पुराणों में जहां धार्मिक कारण बताया गया है वहीं इसका वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो भगवान भोलेनाथ एक सन्यासी हैं और वह कैलाश पर्वत समाधि लगाते हैं| पहाड़ों पर होने वाली बर्फ़बारी की वजह से यहाँ बहुत अधिक ठंडी होती है| गांजा, धतूरा, भांग जैसी चीजें नशे के साथ ही शरीर को गरमी भी प्रदान करती हैं। जो वहां सन्यासियों को जीवन गुजारने में मददगार होती है। भांग-धतूरे और गांजा जैसी चीजों को शिव से जोडऩे का एक और दार्शनिक कारण भी है। ये चीजें त्याज्य श्रेणी में आती हैं, शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं। जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं।
><><
पुन: मिलेंगे
><><
अब विषय भी बता दें
एक सौ आठवाँ विषय
वेदना
उदाहरण

चित्कारती वेदना, भ्रमित अविचल,
सृजन में संहार है, हर एक पल ।
खण्डित आशा रोती, संत्राण भी ,
आज दुष्कर है जीवन ,औ प्राण भी।।
रचनाकार कुसुम कोठारी
अंतिम तिथिः 22.02.2020
प्रकाशन तिथिः 24.02.2020
सम्पर्क फार्म द्वारा


शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

1680...आपके लिखने ना लिखने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है...

सादर अभिवादन। 

आज महाशिवरात्रि है. 
हार्दिक शुभकामनाएँ. 

शिक्षा को बेधड़क अपनाया 
सबका जीवन बेहतर करने,
न जाने कितने पूर्वाग्रह पाले हैं 
कि स्त्री-शिक्षा से लगे डरने।  
#नारी मुक्ति आंदोलन 
-रवीन्द्र 

आइए पढ़ते हैं आज की कुछ पसंदीदा रचनाएँ-


 मेरी फ़ोटो

साँसें भी थक चली ,पग भी थम गये
मंजिल का उधार अभी बाकी है

*तन* तो मिट्टी हुआ भस्म यूँ बन गया
एक पेड़ का उधार अभी बाकी है

  

 
यूँ बूँद कोई, कभी छलक आए,
चले पवन कोई, बहा दूर कहीं ले जाए,
बहकी, कोई बात करूँ!



कोरी, प्यारी, सुंदर सी किताब लीजिये
स्याही मिले तो फिर खिजाब लीजिये
घोलने को आंसुओं का सैलाब लीजिये
खुद से कुछ सवालों के जवाब लीजिये



 

जब हम घर पहुंचे तो मेरी नन्द सारी घटनाक्रम को सुनकर मुझे पकड़कर रोने लगी और बोली -" भाभी आप की वजह से सोनाली पर से एक खतरा टल गया और उसकी जान बच गईमैंने कहा - " आप गलत बोल रही हैं ,हमारी किस्मत अच्छी थी कि सोनाली हमारे साथ थी ,उसकी वजह से  हम सब की जान बचीहम सभी ने ईश्वर का धन्यवाद किया। उस दिन यकीन हो चला था कि -" आस्था में बहुत शक्ति होती हैं " मेरी एक गुहार -" गुरुदेव ,मेरी सोनाली की रक्षा करना " इतना सुन गुरुदेव ने हम सभी को बचा लिया था। 



"बिल्कुल सही कहा आपने। लेकिन ऐसा क्यों है, कोई बताएगा?" जब उन्हें कहीं से जवाब मिलता नहीं दिखा। तो बोले, "दरअसल पूरे देश में बिहार एकमात्र राज्य है जो अपनी जीडीपी का साढ़े पांच प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। लेकिन यह खर्च शिक्षकों के वेतन नहीं ट्रेनिंग और अन्य मदों में होता है।"


 


आप

लिख रहे हैं
लिखते रहें

आपके
लिखने
ना लिखने से
किसी को
कोई
फर्क
नहीं पड़ता है



हम-क़दम का नया विषय



आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव  

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