निवेदन।


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शनिवार, 7 नवंबर 2026

4918 ..मैं ही पक्ष हूं मैं ही विपक्ष हूं. मैं चाहे जो खेलूं मेरी मरजी

 सादर अभिवादन


नरक चतुर्थी दो दिन बताता है पंचांग
नरक चतुर्दशी पर जलाएं यम दीपक
इसे लोग रूप चौदस भी करते है
आज छोटी दिवाली भी है

दीपावली 8 नवंबर को
इसे 8 नवंबर को मनाया जाएगा

अब देखिए रचनाएं ....



शंख नहीं था,
पर
शंखनाद हुआ।

जिसे
सिर्फ़ दो ने सुना—




जिंदगी में समस्याएं तो कभी खत्म नहीं हो सकतीं ! ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में हम ही पर मुसीबतें लदी बैठी हों। संसार की आबादी का बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में है ! पर इंसान ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ! इस बड़ी मुसीबत के बीच से ही यदि खुशी के कुछ छोटे-छोटे पल चुरा लिए जाएं, तो शायद मुसीबतें भी कुछ शर्मा जाएं ! इसके लिए सबसे अहम है, अपनी सेहत को बरकरार रखना है, ''सेहत हजार नियामत'', यह ठीक रहेगी तभी  परिस्थितियों का मुकाबला हो पाएगा ! तन ठीक रहेगा तो मन भी स्वस्थ बना रहेगा !




पर लगा जैसे वो मुस्काई ,
क्या हीं वो मंज़र होता ,
रात चाँद, वो, मैं और तन्हाई! 




अब मैं उस उम्र में पहुंच गया हूं, जहां अपनी सेहत का ख्याल रखना किसी
एडवेंचर स्पोर्ट्स से कम नहीं है।
मीठा खाता हूं तो शुगर बढ़ जाती है। नमक खाता हूं तो बीपी ऊपर चढ़ जाता है। दवाइयों की कीमत देखता हूं तो शुगर और बीपी दोनों एक साथ बढ़ जाते हैं।

खाना खाता हूं तो वजन बढ़ता है। नहीं खाता हूं तो कमजोरी आ जाती है। सिर्फ सलाद खाऊं तो मन उदास हो जाता है। और मन उदास हो तो कुछ अच्छा खाने का मन करता है। यानी समस्या का समाधान भी समस्या ही है!




सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

4917 ..किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाक़ी है

 सादर अभिवादन


कार्तिक मास (पूर्णिमांत) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि
के दिन समुद्र-मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे,
इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है



जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं।
भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में
जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद
योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये।
तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ

अब देखिए रचनाएं ....



मेरे पास पैसे नहीं हैं
पर मैं सकारात्मक रहूँगा,

मेरे विचार अच्छे हैं
मेरी संगति ठीक है

मेरा स्वास्थ्य अच्छा है।
मैं मंजिल के करीब हूँ,





वो शोर मृदंग मद्धम थाप बन
उधार का राहत दे जाता है
एक अरसे से उसे भूल जाने की नाकाम ज़िद में हूं।
कस्तूरी-मृग-सी बेचैन रही हूँ
अपनी ही कस्तूरी की महक से वंचित





"क्या हुआ मुनिया, 
कुछ कहना चाहती हो बिटिया ?" 
" पापा मुझे वो खाना है ! " 
" क्या खाना है ? " 
" वो जोशी अंकल के घर पर कटोरी में रखा है ना , वह मुझे खाना है ? " 
"अच्छा क्या है वो चीज़ ? "
 "पता नहीं क्या है, गुलाबी रंग की है ! "
 " अच्छा ! गुलाबी रंग की है ?" 
" कोई नाम तो होगा ? " 
" नहीं पता ! पहले कभी नहीं खाई ! " 
" ऐसी क्या हो सकती है 
जो तुमने अभी तक नहीं खाई ! 
कोई मिठाई है या फल ? "





स्वप्निल  चाहों   की   ठंडी  तासीरें
चिरागों  की   रोशनी  में  जलते

तिल - तिल  लौ   की   चुनर  में
तब  यथार्थ  को  जगह   मिलती  है

स्वप्नों   कों   पायदान   मिलता  है
सपनों   की   दुशाला   सींती





किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाक़ी है, 
किसी के नाम से दिल में हलचल अब भी बाक़ी है।

हमने तो बहुत पहले उसे रुख़्सत कर दिया, 
मगर भीतर कहीं उसकी आहट अब भी बाक़ी है।

सादर समर्पित
वंदन

गुरुवार, 5 नवंबर 2026

4916...जो तुम रख रहे हो, वही कूड़ा है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

874. दिवाली पर सफ़ाई

जो तुम हटा रहे हो,

बहुत क़ीमती है,

जो तुम रख रहे हो,

वही कूड़ा है।

*****

815. रंग-बिरंगा (8 हाइकु)

4.
चाँद-सितारे 
नभ में चमकते  
जैसे जुगनू। 

5.
चाँद ने ओढ़ी   
घटाओं की चादर,
रात धूमिल। 

 *****

श्रीराम : मर्यादा, धर्म और आदर्श

अयोध्या ने उस प्रभात न एक बालक को जन्म दिया,

युग के संकट का उत्तर, मानव को धर्म दिया।

दशरथ के आँगन उतरा था केवल राजकुमार नहीं,

वह था कालजयी संकल्प, कोई साधारण अवतार नहीं।

*****

रिश्ता बाप-बेटे का

फ़िल्म का अंत मन को छू लेने वाला है और पिता-पुत्र के भावनात्मक संबंध पर केंद्रित यह फ़िल्म निश्चय ही हृदय-विजयिनी है। सुनील शेट्टी एवं मयंक टंडन ने पिता-पुत्र की भूमिकाओं को सजीव कर दिया है। नेहा, किरण खेर एवं अन्य कलाकारों ने भी अच्छा अभिनय किया है। आनंद राज आनंद ने फ़िल्म में अच्छा संगीत दिया है। शीर्षक गीत (ये कैसा एहसास है) सबसे अच्छा है। फ़िल्म का परिवेश गोवा का एक ग्राम है तथा छायाकार ने गोवा की सुंदरता को रजतपट पर उतार दिया है। 

*****

मंज़िलें किसे पसंद होती हैं भला

एक और सूरज समंदर से उग रहा था। ढेर सारे लोग थे लेकिन कोई शोर नहीं था, न भीतर न बाहर। कुदरत का यही कमाल है वो आपको ख़ामोशी का वो सुर थमा देती है जिसकी तलाश में हर कोई भटक रहा है। वो सुर जो हमें हमारे भीतर ले जाता है। हमारे भीतर बिखरे कचरे को साफ करता है और एक सुंदर जीवन की, सुंदर सपनों की जगह बनाता है। हर यात्रा अपने भीतर की उथल पुथल को थामने, ज़ेहनी उलझनों से राहत देने का काम करती है। पहले से बेहतर मनुष्य बनाने की ओर अग्रसर करती है। अगर यात्राएं यह नहीं कर रही हैं तो यक़ीन मानिए आप सिर्फ दौड़ रहे हैं, तस्वीरें ले रहे हैं आप यात्री नहीं बन पाये हैं।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  

 

बुधवार, 4 नवंबर 2026

4915.. थोड़ी सी बात..

 प्रातःवंदन

मौसम की बदलती फ़िजा  आजकल सुबह-शाम पर ही पता चलता है। हल्की ठंड की चादर ओढ़े भीनी- भीनी हवा और ओस की बूंद में भीगे पेड पौधे .. अच्छा लगता है न पर काली धुंध (प्रदूषण)..मतलब कुछ न कुछ रह ही जाता है..चलिए इन कवायदो को नजरअंदाज करते हुए नजर डालते हैं लिंको पर..✍️

यही है जीवन

सुख मिल जाये...

बस थोड़ा सा सुख मिल जाये

इसी आस में मन मानव का डोला करता

इधर-उधर जा निज शक्ति को तोला करता..

✨️

चलना-रुकना / बलराम अग्रवाल

 चलते-चलते वे रुक गये।

मेरा हाथ पकड़कर उपदेशक के अंदाज में बोले :

“जीवन, चलने और चलते रहने का नाम है!…लेकिन ‘चलने’ से तात्पर्य सिर्फ ‘पैर’ नहीं है, ‘साँस’ भी है!”

✨️

विचित्र वक़्त 

ख़ूब नचाता 

साँसें न लेने देता 

वक़्त का ये पहिया

सब बेज़ार,

ख़ुद पर भरोसा..

✨️

पगला है तू !

लोकतंत्र आबाद रहेगा बरसों तक 

रावण आज ज़रूर मरेगा, पगला है तू !

जब-जब पाप बढ़ेंगे भू पर ,प्रभु आएँगे 

नेता उनका रूप धरेगा,पगला है तू !

✨️

एक गीत -रेशम के घूँघट में

रेशम के 

घूँघट में हँसकर 

करे चाँदनी बात.

रंगोली की 

आभा सुंदर 

दीवाली की रात.

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️






मंगलवार, 3 नवंबर 2026

4914.... अनकही मुकम्मल कविता


मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
---------



​जिसने कभी धूप में जलकर

किसी के पाँवों के छाले नहीं गिने,

वह क्या जाने

उस तपते रास्ते की खुरदुरी चुभन को!

​मखमली गद्दों पर सोए हुए लोग

महज़ तसल्ली के दो शब्द बोलकर

समझ लेते हैं कि उन्होंने सब बाँट लिया,

पर इस दर्द को

वही जानता है

जिसके पाँवों की हर आहट

दर्द की एक नई चीख सुनाती है।

​दूसरों के आँसू देखकर

सिर्फ आँखें भर लेना आसान है,

मगर वह खौलता हुआ लावा क्या है

जो भीतर ही भीतर सुलगता रहता है—

इसे महसूस करने के लिए

उसी आग में जलना पड़ता है।

​कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,

और उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!

जब तक अपनी खाल न उधड़े

तब तक दूसरों के घाव की गहराई

सिर्फ़ एक नज़ारा बनी रहती है,

पीड़ा का यथार्थ नहीं।

‌वो कहते है न-

"जाके पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई"।

-------
आज की रचनाऍं- 

 केबीसी की पितृसतात्मकता 



-----------


आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 2 नवंबर 2026

4913 ...मधुर यादों को दिल में समेटे !

रविवार, 1 नवंबर 2026

4912...आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है।

सादर अभिवादन

आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है। 

'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से 

ढेरों शुभकामनाएँ!

लंबे आंदोलनों और संघर्ष के उपरांत मध्य प्रदेश राज्य से विभक्त होकर एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बनाये जाने की घोषणा तत्कालीन अटल बिहारी बाजपेयी सरकार द्वारा की गयी जिसे छत्तीसगढ़ निवासियों ने तहेदिल से स्वीकार करते हुए केन्द्र सरकार का धन्यवाद किया था। छतीसगढ़ केवल अपनी प्राकृतिक संपदा के लिये ही नहीं जाना जाता बल्कि आदिवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी बोली के साथ-साथ अनेक सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिये विख्यात है। हिंदी भाषा के स्वनामधन्य श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल जी ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवांवित किया है। खनिज संपदा से समृद्ध यह प्रदेश अपनी अनुपम हरीतिमा के लिये सुविख्यात है। नक्सल समस्या का अंत भी सन् 2025-26 मे समूल उन्मूलन हो चुका है

*****   

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

पत्रिका सी तुम

किसी रोचक कहानी की तरह

मेरी कल्पनाओं को, मेरे सपनों को

कल्पना के पंख देकर

उड़ान भरने के लिए

आसमान में पहुँचा देती हो!

*****

1539 गीत / लिली मित्रा 

गुंजित मउमाछी की गुनगुन

पुष्प- पुष्प के कर्णों में

जैसे तुम खुसफुस हो करते

मधु मिश्रित से वर्णो में

झंकृत सुर में होकर गुम

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम

*****

अभिलाषा उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए

शहीदों की शहादत का, क़र्ज़ उतारने के लिए

वीर प्रसूता वसुधा का, फ़र्ज़ निबाहने के लिए ,

सुख-शान्ति अमन रहे चमन में वतन के लिए

अभिलाषा उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए ।

*****

824 ..यादों का बैंक

“मुझे अपनी जमा की हुई याद वापस चाहिए।” उसने कहा।

“लेकिन क्यों? आपने तो दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसे जमा किया था।”

अजित की आँखें भर आईं। “दर्द चला गया, पर उसके साथ मेरा बेटा भी चला गया।

अब मैं रोता नहीं, लेकिन मुस्कुराता भी नहीं। समझ आया कि कुछ दु:ख बोझ नहीं होते, वे हमारे अपनों के आखिरी निशान होते हैं।”बैंक ने उसकी याद लौटा दी।

*****

 नवगीत समीक्षा -सुप्रसिद्ध लेखक समीक्षक श्री रविनंदन सिंह

इस संग्रह में प्रकृति के साथ लोकजीवन का संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘मेड़ों पर वसंत’ में लोक केवल ग्रामीण परिवेश का पर्याय नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम, भाषा, संगीत, ऋतुचक्र, घरेलू संबंध और सामूहिक स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। लोक का अर्थ किसी काल्पनिक निष्कलुष संसार से भी नहीं है। गाँव में सौंदर्य है तो संघर्ष भी है; आत्मीयता है तो विषमता भी; सामुदायिकता है तो स्वार्थ और वर्चस्व के रूप भी। तुषार के गीतों में लोक का उज्ज्वल पक्ष अधिक प्रमुख है, लेकिन जहाँ वे श्रमिकों, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट की चर्चा करते हैं, वहाँ लोकजीवन की कठिन वास्तविकताओं की ओर भी संकेत मिलता है। ‘श्रमिकों के लिए’ इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय सामाजिक रचनाओं में से एक है। कवि लिखता है—

“अभी शहर से गाँव जा रहे

हर मुश्किल से लड़ने बाबू !

ख़त लिखना फिर आ जाएंगे

देश की मूरत गढ़ने बाबू !”

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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