आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता,
ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमें ढूंढेंगे
मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली
नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमें ढूंढेंगे
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता,
ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमें ढूंढेंगे
मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली
नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमें ढूंढेंगे
सादर अभिवादन
आज विश्वकर्मा जयंती है
।।प्रातःवंदन।।
"हमें चाहिए
हलचल ऐसी
धधके जो
दावानल जैसी
आँखें
उसे तलाश
रही हैं!"
नचिकेता
चलिए इसी को मद्देनजर रखतें हुए नज़र डालें आज की प्रस्तुति पर..
गणपति उत्सव
श्रीगणेश कारण हैं सबके
मिट्टी, गोबर से भी रच लो,
दूर्वा का तिनका कर अर्पण
छोटा सा मोदक ही धर दो !
✨️
खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य
ना पहले सी मिट्टी में ख़ुशबू रही ना वो पहले सी रीति ।
जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था
पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का बीता जमाना था
नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप
✨️
आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास।
नक्षत्रों ने दीप जलाए
(कविता संग्रह)
(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर)
संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ..
✨️
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
आज गणेश चतुर्थी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.
आज ही हिंदी दिवस भी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
ऋषिवर!पूत हमारा अनुशासित,
सदा मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।
गंगा विनय कर रही बार बार,
पूतहि शिष्य बना लो एक बार।।
और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
*****
याद आता है वो बचपन का स्कूल प्यारा-प्यारा |
Kasturba School Reunion गीत | 2
October Alumni Meet
छूट गया वो घर और स्कूल का
प्यारा मंज़र,
बीत गए पचास-साठ साल
ज़िंदगी के सफ़र।
पर बचपन का वो स्कूल दिल से
न उतर पाया,
वही निश्छल पुराना प्यार
फिर से लौट के आया!
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सूफ़ीमत...11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-5
सूफ़ी दर्शन में जीव ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है, और भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होना, यही उसका सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत
भी ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है। जीव को हक़ (सत्, ब्रह्म) से मिलने का एक ही रास्ता है, वह है - प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक
प्रेम होता है। अलहक्क़ के साथ एकत्व
प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। सूफ़ी संत सरमद ने सूफ़ी
प्रेमोपासना का रहस्य इन शब्दों में बताया है –
मुमकिन न बुबद कि
यार आयद बकिनार,
ख़ुदरा अज़ ख़्याले
ख़ामो अन्देशा बरार,
हर चीज़ क़ि ग़ैर
अस्त दर सीनए तुस्त,
बिसयार हिजाबेस्त
मियाने तो व यार!
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अम्र उजाला
शब्द सम्मान 2026: साहित्य की विभूतियों
के सम्मान का आठवाँ पड़ाव, 30 सितंबर तक
नामांकन
भारतीय भाषाओं
के सामूहिक स्वप्न को सम्मानित करने वाले अमर उजाला शब्द
सम्मान के अंतर्गत इस वर्ष भी दो आकाशदीप अलंकरण और पाँच श्रेष्ठ कृति सम्मान प्रदान किए जाएंगे।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह
यादव
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,
अब थी निराश काशी नरेश बाला।
अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,
नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।
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और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव