पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026
4666... प्रेम ने दर्द को स्वीकार कर लिया है...
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026
4665..ख़्वाहिशें..
भोर वंदन
गुरुवारीय प्रस्तुति में शामिल
'आपका ब्लॉग 'से रचनाए
कई शब्द रंग-ढंग को समेटे..✍️
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आओ किस्सा तुम्हे सुनाए
recent सा है यार
साठ साल की उमर में हो गया
ऑनलाइन मुझे प्यार
ऑनलाइन मुझे प्यार
मिले वो टिंडर पे थे यार
प्रोफाइल देखकर रीझ गया दिल
हुआ पहली नज़र में प्यार
✨️
बांचती रही हूं
बस तुम्हें औ तुम्हारा लिखा ही मैं बाँचती रही हूं
तुम्हे सोना चांदी हीरा मोती सम मैं आंकती रही हूं
अक्षरशः पढ़ना तुझे जैसे सांस सांस लेना
तेरा वजूद तूफान सा और मैं पत्ते सी कांपती रही हूं
✨️
बुधवार, 25 फ़रवरी 2026
4664..छटाँक भर का
।।प्रातःवंदन।।
" दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्ह खड़ी है आने को
धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को
प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गुंजेगी
देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव पे बाण चढ़ाने को..!"
गौतम राजरिशी
आइये चलें शब्दों की नगरी और बुधवारिय
प्रस्तुति के साथ..✍️
बरसाना की लट्ठमार होली: प्रेम, प्रतिरोध और भक्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं का एक जटिल और गहरा ताना-बाना है. इसमें बरसाना की 'लट्ठमार होली' अपने आप में अद्वितीय है. जहाँ दुनिया होली को केवल 'रंगों के खेल' के रूप में देखती है, वहीं एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से यह उत्सव दमित भावनाओं के रेचन (Catharsis), स्त्री सशक्तिकरण और सामूहिक भक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
✨️
"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है " !
एयरपोर्ट से बाहर निकलते बेटे के मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही शर्मा जी और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बेटे से मिलने का उत्साह जैसे कुछ ठंडा सा पड़ गया ।
सोचने लगे कहाँ तो हमें लगा कि इतने समय बाद हमें देखकर बेटा खुश होगा पर ये तो भगवान को ही कोसने लगा है" ।
तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?.. बता दे "?
बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" ।
"सही तो कह रहे तेरे पापा" - मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोली, "हमें देखकर भगवान को जो कोसने लगा तू ! क्या कह रहा था ये-
"ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है "
दोनों ने एकसाथ दोहराया और हँसने लगे ।
"शिट ! तो आप लोगों ने सुन लिया" ?
"बेवकूफ ! गॉड ने हमें भी कान दिए है", मम्मी बोली , "चल बता क्या चीटिंग हुई तेरे साथ " ?
तो बेटा बोला, " हाँ मम्मी ! चीटिंग ही तो है न ये , देखो ! मैं हमेशा आप लोगों के सामने छटाँक भर का ही क्यों रह जाता हूँ" ?
"छटाँक भर का" ! आश्चर्य ..
✨️
अक्सर प्रेमिकाएँ
तुनुक मिज़ाज़ होती हैं—
जैसे हवा में खेलती धूप
हल्की, नर्म, और चुलबुली।
कल तक गुस्सा, आज हँसी,
आँखों में चमक और थोड़ी..
✨️
एक निडर राजा था,
उसे किसी से डर नहीं लगता था।
डरता था तो बस—
प्रेस कॉन्फ़्रेंस से।
मंत्रिपरिषद ने समझाया—
“महाराज, प्रेस कॉन्फ़्रेंस..
✨️
1
खिले जलज
पवन मलयज
आया बसंत।
2
पीत पराग
ऋतुराज का पाग
है अनुराग।
3
मंद पवन
अनुरागी छुअन
बासन्ती मन।
4
विरही मन
कहाँ पाए बसंत
रंग बेरंग।
5
वाणी की वीणा
मंद मंद रागिनी
खोया है मन।
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026
4663...जहॉं मैं ख़ुद को थका हुआ न पाऊॅं...
खुशहाली बताने वाला सॉफ्टवेयर
कहीं से भी आयात कर लो,
आँकड़ों की चमक में
सच्चाई का चेहरा
लहूलुहान ही सही।
हर खेल मे पहली चाल तेरी, फिर हारना तो तकदीर से है ।
तू मासूम भी, तू ही कातिल भी, हीरे सी तेरी तासीर तो है
मेरे आँसू समंदर नहीं, पर सबसे क़ीमती नीर तो है ।
फिर आँगन में उतरे,
और शाम ढलते-ढलते
मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।
ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,
कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,
या शायद कोई ऐसा घर,
जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।
नहीं आयुष!" शगुन ने दृढ़ता से कहा. "तूने दिवाली पर 'मुक्ति' को अपनी गोद में लिया था, याद है? तूने कहा था कि हम उसे लेबल्स से मुक्त रखेंगे. अगर तू खुद को 'एवरेज' के लेबल से मुक्त नहीं कर पाएगा, तो उसे क्या सिखाएगा? आठ अप्रैल एक युद्ध नहीं है, वह सिर्फ तेरे और उन सिद्धांतों के बीच की एक बातचीत है जिन्हें तूने पिछले छह महीनों में जिया है. तू बस उन सिद्धांतों को कागज़ पर उतार देना, परिणाम के बारे में सोचने पर समय खराब मत करना."
तुम जानते हो, समझ सकते हो! वह समय बतौर निजी लेने का नहीं था,” रीमा ने संयत स्वर में कहा।
“पर असर तो निजी तौर ही हुआ, न! जब तक जाँच पूरी हुई, मुझे ‘गुनहगार’ की तरह देखा गया। टीम की मीटिंग्स से बाहर रखा गया। किसी ने पूछा तक नहीं कि सच क्या है!”
रीमा की निगाहें झुक गईं। “जाँच में तुम निर्दोष पाए गए हो, क्लाइंट ने लिखित माफ़ी भेजी है।” उसने धीमी स्वर से कहा।
अमित हल्के से मुस्कुराया— “निर्दोष साबित होना और निर्दोष माना जाना—दो अलग बातें हैं, महोदया!” अमित की भौं टेढ़ी और नथुने फड़क रहे थे।
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
4662 ..देश अलग हैं, देश अलग हों, वेश अलग है, वेश अलग हों,
सादर अभिवादन
देश अलग हैं, देश अलग हों,
वेश अलग है, वेश अलग हों,
मानव का मानव से लेकिन
अलग न अंतर-प्राण।
भूल गया है क्यों इंसान!
-हरिवंश राय बच्चन
रचनाएं देखें
होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.
ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.
यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,
ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.
अब वह
रास्तों की धूल में नहीं,
धूल की स्मृति में है
जहाँ
हर घुमाव
मिट्टी से मिलकर
अपना पहला हरापन
धीरे से दोहराता है।
रहबर ही जब न मुल्क में छोड़ें कोई कसर,
पहने हुए हैं जिस्म पे सब काग़ज़ी लिबास।
फूँका किए हैं दूसरों के घर जो अब तलक,
अब अपने ही मकाँ का नहीं होता है अभास।
सरसों फूल
पीले परिधान में
सजती धरा।
ले कुसुम
उमंग की बहार
राग बसंत।
वो जब मिले तो यूँ मिले इक ख्वाब की तरह,
दिल के मचलते प्यार में तूफाँ जगा दिया ।
लेकिन तू मुझको ये बता, मुझसे था क्या गिला,
इन साजिशों के शोलों में, दिल तक जला दिया ।
मुँह मीठे
पान भरे
काशी क्या बोले,
गंगा की
गठरी की
गांठ कौन खोले,
घाटों पर
बँधी हुई
नाव को सजाएँ.
जिस बहू के मायके जाने पर उसकी सास और ननद उसके बैग की तलाशी लेती थीं और उसे 'गरीब घर की' कहकर ताना मारती थीं, उसी बहू के बैग से एक दिन कुछ ऐसा निकला कि पूरे ससुराल की बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।
गरिमा जब भी अपने मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसके पेट में एक अजीब सी मरोड़ उठने लगती थी। यह डर मायके जाने का नहीं था, बल्कि वहां से लौटने पर होने वाली ‘अग्निपरीक्षा’ का था।
“बहु, बैग इधर लाओ,” सासू माँ, सुमित्रा देवी, सोफे पर पैर पसारकर हुकुम चलातीं।
गरिमा चुपचाप अपना बैग मेज पर रख देती।
सुमित्रा देवी की गिद्ध जैसी नज़रें बैग के एक-एक कोने को टटोलतीं। कभी वो साड़ियों की तह खोलकर देखतीं, तो कभी क्रीम-पाउडर के डिब्बे हिलाकर।
ससुराल का कर्ज,
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आज का ये अंक
भी झेलनीय है
सादर वंदन














