सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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सोमवार, 10 अगस्त 2026
4830 ..कभी उसी स्याही ने "वंदे मातरम्" लिखा था,
रविवार, 9 अगस्त 2026
4829...व्योम से विशाल नयनों में जगत के दुख समा जाते ...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरं जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में चुनिंदा रचनाएँ-
(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की
विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर
डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत
किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान
करता है।)
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सोच रही हूॅं ...
मुझे नहीं समझ राजनीति की,
मैं खोना नहीं चाहती तर्क के ज़ाल फेंकते
वामपंथी,दक्षिणपंथी या विचारधाराओं की आड़ में
विष वमन करते क़लमधारियों की
मन में सवाल तैर रहे हैं—
क्या पढ़ाई की परिभाषा केवल कुछ नामों तक सीमित है?
या फिर उन हज़ारों बेटियों के पसीने में भी
वही मशाल जल रही है?
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धन मिला, पर बुझ गया मन
यश मिला, पर ढल गया तन
घर बनाया एक सुंदर
किंतु छायी ग़र थकन!
पूर्ण होकर भी,
अधूरे ही रहेंगे
वे सपन!
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मै हतप्रभ, सुनता रहा शब्दों
का झुनझुना,
व्यथा गढ़े, शब्दोऺऺऺ की अभिव्यऺजना,
कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?
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शनिवार, 8 अगस्त 2026
4828 ....लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं
सादर अभिवादन
आजादी, स्वतंत्रता, उड़ान
पिछला अंक देखिए
https://halchalwith5links.blogspot.com/2026/08/4823.html
आज रचनाएंं अधिक है
झेल लीजिएगा
शुक्रवार, 7 अगस्त 2026
4827....गधा आगे क्यों निकला?
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज की रचनाऍं-
किस दर्द में कितना दहाड़ना है
दर्द कौन सा वाला है
दर्द फायदा देगा या नुकसान
ये समझ पाना आसान नहीं।
यही हम अलग हो जाते हैं।
हमारी जात भी
ओर हो अपना प्रयाण
जानें उन्हें और पाएँ वरदान
मानव ह्रदय की
यही तो उपलब्धि है
अंतर में अभाव नहीं
पूर्ण समृद्धि है !
लोग हैरान थे— "भला गधा घोड़ों से कैसे जीत पाएगा?"
रेस शुरू हुई और कुछ देर बाद समाप्त भी हो गई।
नतीजा आया तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सबसे आगे गधा था।
लोगों ने उत्सुकता से पूछा, "इतने तेज़-तर्रार घोड़ों के बीच तुम जीत कैसे गए?"
गधा मुस्कुराया और बोला—
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 6 अगस्त 2026
4826...जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)
एक सखी कह रही सखी से,
जनक लली कर्पूर सी गौर।
राम दिख रहे कुछ काले काले,
दूजी सखी राम केश घुँघराले।।
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रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं ...
आँखों में आंसुओं का जो सैलाब है जमा,
लोगों पे
आज़माना इन्हें मेरे पर नहीं,
महसूस कर
सकोगे जो बैठोगे आस-पास,
शबनम की बूँद
हूँ मैं दहकता शरर नहीं,
'झ'
से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)
जब उम्मीदों
पर झाड़ू फिरती, तब होश ठिकाने आता है,
जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है।
तब अपनी ही नादानी पर, मन ही मन झख मारते हैं,
जो बैठे थे
भाग्य भरोसे, वो झक मारकर हारते हैं।
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कांधला के विश्व विख्यात पंडित व्यक्तित्व
खेतों में
ट्रैक्टर चलते देख हमने उसपर चढ़ाने की जिद की।चाचा ने कहा जाओ अंदर टेबल पर स्वीच बोर्ड है उसका हरा बटन दबा दो तब ट्रैक्टर पर चढ़ाएंगे।जब
हमने हरा बटन दबाया तो मोटर चलने की बड़ी तेज आवाज हुई। घबराकर दोनों बहनें जोर से
चीखती हुई एक-दूसरे से लिपट गई।दादाजी ने सोचा हमें करेंट लग गया। चाचा से गुस्से
से कहा-मार दिया न दोनों को?
चाचा ने जाकर जब हमें सही -सलामत देखा
तो मन बहलाने के लिए खेतों की ओर ले चले।एक खेत में घूसते ही
हमें भूतों के दर्शन होने लगे। बिना सिर बारे भूत, खेतों में
बोझ ढोते सिर्फ दो पैरों वाले भूत,खेतों में
कीचड़ से नहाये, पौधे उखाड़ते भूत। पेड़ों पर झूलते और
उछल-उछल कर चढते-उतरते हुए भूत।एक बूढ़ी खेत की क्यारी पर बैठी दो बच्चों को अपने
पास पकड़कर बैठाई थी,उनके बाहर निकले बड़े-बड़े दातों को देख
हमने उन्हें किचिन मान लिया।
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