निवेदन।


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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

4869...ऐब कुछ लोग,सर-ए-आम उसमें ढूॅंढेंगे

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज की रचनाऍं- 


कभी बैरागी होकर
पहाड़ों में चले जाते हैं—
चुप्पी ओढ़कर,
ध्यान में बैठने।

और कभी
पर्वतारोही बनकर
पहाड़ को नापते हैं,
जैसे ऊँचाई से
कुछ नीचे छूट जाएगा।




बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता, 

ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमें ढूंढेंगे

 

मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली 

नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमें ढूंढेंगे







साधारण अस्त्रों-शस्त्रों से 
उसका वध नहीं हो सकता 
उसके क्रूर अत्याचारों से 
रक्षा करें हे परमपिता।

परोपकारी महान त्यागी
शिवभक्त दयालु हैं दधीचि 
विश्व के कल्याण हेतु वे
उत्सर्ग करेंगे अपनी अस्थि।




अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। 



यदि अकेले ही यात्रा करनी हो तो उसके पहले कुछ जरुरी एहतियात बरतना बहुत आवश्यक है ! सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का आकलन जरूर करें। हो सके तो अपने डॉक्टर की सलाह भी ले लें, इससे मनोबल में बढ़ोत्तरी होगी ! अपनी दवाइयों के साथ अपनी एक छोटी सी मेडिकल इन्फॉर्मेशन शीट भी रख लें ! ऐसी जगह चुनें, जहां आवागमन सुगम हो, जहां जा रहे हैं वहां के माहौल, मौसम की जानकारी भी जरूर ले लें !  एक दिन में कम जगहें, आराम से देखें, ताकि बिना थके यात्रा का आनंद ले सकें। अपने साथ एक छोटा कार्ड रखें, जिस पर आपका नाम, दो मोबाइल नंबर, जिनसे आपात स्थिति में संपर्क किया जा सके ! 




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

4868 ..दिन , तारीखें , महीनें , साल निकल जाने वाला है

 सादर अभिवादन

आज विश्वकर्मा जयंती है


भाई रवींद्र जी को आज आना था
लगता है कल गणेश पंडाल में कुछ ज्यादा ही
नाच लिए

देखिए रचनाएं....



दिन , तारीखें , महीनें , साल  निकल जाने वाली है
तुम चलते रहो , एक  समय  मंजिल तक पहुँच जाओगे
गोया मुस्कुराते  नहीं , मुस्कराओं  चलते  जाओ
मुसाफिरी  अभिमानी  नहीं , ईर्ष्या  नहीं  द्वेष  नहीं





यूं खुश होने को कई बातों पर खुश हुआ जा सकता था। और न जाने कितनी ही वजह थीं फफक फफक के रो लेने की। पर ऐसा कुछ न हुआ। ये किस कदर मुफ़लिसी के दिन हैं, कि साथ चलने को कोई उदासी भी नहीं, छूटने को कोई साथ भी नहीं। 
किसी ख़्वाब के टूट जाने का डर भी नहीं।





प्रेम शाश्वत है। उसे सीखा नहीं जाता, फिर भी जीव-जगत परस्पर जीवन जीने के लिए उसके व्यवहार और उसकी भाषा सीखता है। शायद प्रेम को नहीं, प्रेम के लेन-देन को सीखना पड़ता है।
स्त्री ने भी प्रेम के बारे में बहुत कुछ सीखा है। लेकिन सदियों से उसे प्रेम करने से अधिक प्रेम की प्रतीक्षा करना, दूसरों पर अपना बहुमूल्य लुटाना सिखाया गया। किसी को दुःख न हो, इसलिए स्वयं सह लेना। संबंध बना रहे, इसलिए अपनी सुविधाएँ छोड़ देना। और दूसरे की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना। इन सबको स्त्री के प्रेम के प्रमाण के रूप में देखा गया। लेकिन इस पूरे अभ्यास में एक प्रश्न अक्सर अनकहा रह गया। स्त्री की अपनी इच्छा कहाँ है?


खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 
उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।


सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 16 सितंबर 2026

4867..हर मौसम का मोहित रूप

 

।।प्रातःवंदन।।

"हमें चाहिए

हलचल ऐसी

धधके जो

दावानल जैसी

आँखें

उसे तलाश

रही हैं!"

नचिकेता

चलिए इसी को मद्देनजर रखतें हुए नज़र डालें आज की प्रस्तुति पर..

लोक चेतना में बसते हैं

गणपति उत्सव 


श्रीगणेश कारण हैं सबके 

मिट्टी, गोबर से भी रच लो, 

दूर्वा का तिनका कर अर्पण  

छोटा सा मोदक ही धर दो !

✨️

मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं

खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य 

ना पहले सी मिट्टी में ख़ुशबू रही ना वो पहले सी रीति ।


जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था 

पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का बीता जमाना था 

नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप 

✨️


छन्द जिज्ञासा के

आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास। 

नक्षत्रों ने दीप जलाए

(कविता संग्रह)

(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर) 

संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ..

✨️

ख़ामोश संवाद

 

उस दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,

हवा के भी
कान खड़े हो गए थे..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 15 सितंबर 2026

4866 ...ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़, इसको कभी भी मात न समझो।

सादर अभिवादन
गणेश चतुर्थी व हरतालिका तीज की
सादर शुभकामनाएं

आखिर कांटा तो कांटा है 
जो जगह जगह चुभ जाता है ।
मन मे चुभता तन में चुभता
पीड़ा देकर मुस्काता है ।

कंटक पर ही खिलता गुलाब
संगति भी और विसंगति भी ।
पैरों में जब चुभ जाता है

रुकती गति भी , झुकती रति भी ।



- अरुणेश मिश्र 

देखिए रचनाएं....




देवता भी मरते हैं
उनकी भी यात्रा होती है,
कभी-कभी
हम इंसानों को उनका शव ढोना पड़ता है,
हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यताओं के
तमाम देवताओं को इंसानों ने
डूबती सभ्यताओं के साथ दफन कर दिया,





है एक पल जो बीतता नहीं है 
समय गुजरता जाता है 
पर समय बीतता नहीं है।। 




इसको महज़ बात न समझो, 
बस एक मुलाक़ात न समझो।

ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़, 
इसको कभी भी मात न समझो।


हो जाएगा रोशन हर पन्ना, 
बस कोरा एक दवात न समझो।






चलते - चलते एक छोटी सी मुस्कुराहट
एक राजा ने अपने जीजा की सिफारिश पर एक आदमी को मौसम विभाग का मंत्री बना दिया।
 - एक बार उसने शिकार पर जाने से पहले उस मंत्री से मौसम की भविष्यवाणी पूछी।
- मंत्री जी बोले "ज़रूर जाइए, मौसम कई दिनों तक बहुत अच्छा है!"
 - राजा थोड़ी दूर ही गया था कि रास्ते में एक कुम्हार मिला - वो बोला, "महाराज तेज़ बारिश आने वाली है... आप कहाँ जा रहे हैं?"
अब मंत्री के मुकाबले कुम्हार की बात क्या मानी जाती, उसे वही चार जूते मारने की सजा सुनाई और आगे बढ़ गये।
 - वही हुआ... थोड़ी देर बाद तेज़ आँधी के साथ बारिश आई और जंगल दलदल बन गया, राजा जी जैसे तैसे महल में वापस आए, पहले तो उस मंत्री को बर्खास्त किया;
फिर उस कुम्हार को बुलाया - इनाम दिया और मौसम विभाग के मंत्री पद की पेशकश की - कुम्हार बोला,  "हुज़ूर मैं क्या जानू, मौसम-वौसम क्या होता है?" वो तो
जब मेरे गधे के कान ढीले हो कर नीचे लटक जाते हैं, मैं समझ जाता हूँ वर्षा होने वाली है,
और मेरा गधा कभी ग़लत साबित नहीं हुआ!
- राजा ने तुरंत कुम्हार को छोड़ कर उसके गधे को मंत्री बना दिया -


तब से ही गधों को मंत्री बनाने की प्रथा चली आ रही है!



सादर समर्पित
वंदन

सोमवार, 14 सितंबर 2026

4865...आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था?

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आज गणेश चतुर्थी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.

आज ही हिंदी दिवस भी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.

सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

भार्गव राम खण्डकाव्य - 57

ऋषिवर!पूत हमारा अनुशासित,

सदा मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।

गंगा  विनय  कर  रही  बार बार,

पूतहि  शिष्य बना  लो एक बार।।

*****

स्तुति

और याद है

आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को कैसे मारा था?

उस दिन के तो क्या ही कहने

आप अकेले ने दस-दस को गिराया था

तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा

*****

याद आता है वो बचपन का स्कूल प्यारा-प्यारा | Kasturba School Reunion गीत | 2 October Alumni Meet

छूट गया वो घर और स्कूल का प्यारा मंज़र,
बीत गए पचास-साठ साल ज़िंदगी के सफ़र।
पर बचपन का वो स्कूल दिल से न उतर पाया,
वही निश्छल पुराना प्यार फिर से लौट के आया!

*****

सूफ़ीमत...11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-

सूफ़ी दर्शन में जीव ब्रह्म  के  गुणों का प्रतिबिंब हैऔर भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होनायही उसका सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत भी  ब्रह्म  के  गुणों का प्रतिबिंब है। जीव को  हक़  (सत्‌,  ब्रह्म) से मिलने का एक ही रास्ता हैवह है -  प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम होता है। अलहक्क़ के साथ एकत्व प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है।  सूफ़ी संत सरमद ने सूफ़ी प्रेमोपासना का रहस्य इन शब्दों में बताया है 

मुमकिन न बुबद कि यार आयद बकिनार,

ख़ुदरा अज़ ख़्याले ख़ामो अन्देशा बरार,

हर चीज़ क़ि ग़ैर अस्त दर सीनए तुस्त,

बिसयार हिजाबेस्त मियाने तो व यार!

*****

अम्र उजाला शब्द सम्मान 2026: साहित्य की विभूतियों के सम्मान का आठवाँ पड़ाव, 30 सितंबर तक नामांकन 

भारतीय भाषाओं के सामूहिक स्वप्न को सम्मानित करने वाले अमर उजाला शब्द सम्मान के अंतर्गत इस वर्ष भी दो आकाशदीप अलंकरण और पाँच श्रेष्ठ कृति सम्मान प्रदान किए जाएंगे।

*****

फिर मिलेंगे।

 

रवीन्द्र सिंह यादव

 

रविवार, 13 सितंबर 2026

4864 .."एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?"

 सादर अभिवादन

आज ज़रा सा ठीक नहीं न लग रहा


लगता है गलत समय पर यह कदम लिया गया
फिर भी अनुभव तो मिला
आभार ,
पर लघुकथा आएगी जरूर, हर माह दूसरे रविवार को प्रतीक्षा करते रहें
आज की रचनाएं अखबारों से ली गई है
देखिए रचनाएं....

विसर्जन


राजमहल में ‘गणेश उत्सव’ की तैयारी हर वर्ष की तरह ज़ोर-शोर से चल रही थी। राज्य के मुख्य मंदिर से निकाल कर मूर्ति को दालान में रखा जाता था और उसकी सार्वजनिक पूजा होती थी। दस दिनों के बाद उसे पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता था। सदा से ऐसा ही होता आ रहा था। किंतु इस बार देश का वातावरण बदला हुआ था। आज़ादी का संग्राम धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रहा था। यह ज़रूरी था कि सभी जातियों के लोग इसमें भाग लें। महामंत्री ने पेशवा से कहा, जनसैलाब उमड़ा चला आ रहा है, 




एक गांव में बारात जीमने बैठी. उस समय स्त्रियां समधियों को गालियां गाती हैं, पर गालियां न गाई जाती देख नागरिक सुधारक बाराती को बड़ा हर्ष हुआ. वह ग्राम के एक वृद्ध से कह बैठा,”बड़ी खुशी की बात है कि आपके यहां इतनी तरक़्क़ी हो गई है."
बुड्ढा बोला, “हां साहब, तरक़्क़ी हो रही है. पहले गालियों में कहा 
जाता था.. फलाने की फलानी के साथ और अमुक  का अमुक के साथ..
लोग-लुगाई सुनते थे, हंस देते थे. अब घर-घर में वे ही बातें सच्ची 
हो रही हैं. अब गालियां गाई जाती हैं तो चोरों की दाढ़ी में 
तिनके निकलते हैं. तभी तो आंदोलन होते हैं कि गालियां 
बंद करो, क्योंकि वे चुभती हैं."






"यह तो पांच ही हैं मालिक।”
“पाँच, नहीं, दस हैं। घर जाकर गिनना।"
"नहीं सरकार, पाँच हैं।"
"एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?"





बादशाह ने उसकी कड़वी बातें सुनकर कहा— "उसका तो सिर्फ रंग-रूप ही बुरा है, लेकिन तुम्हारा तो मन कुरूप है। आज से मैं तुम्हें उसका अधीनस्थ (उसके नीचे काम करने वाला)
गुलाम बनाता हूँ।"

यह सुनकर वह गुलाम समझ गया कि यह बादशाह की परीक्षा थी, जिसमें वह असफल रहा। उसने अपनी गलती मानी और बादशाह से माफी माँगी।





रसोई में बर्तन समेटते हुए बेटी से पूछाः कॉलेज का फॉर्म भर दिया?
"हां"
'कौन सा कोर्स चुना'
"लॉ"
कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा
तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..
चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी





'मेरे लिए ?' मै हैरान था ,हां आपके ही लिए तो। आप इस फ्लैट में अकेले रहते हैं।आपकी उम्र लगभग 80 बरस की है, हम अपना दरवाजा इसलिए खुला रखते हैं ताकि यह पता लगता रहे कि कोई गलत इंसान तो आपके यहां नहीं आया आपके कोई परेशानी या दिक्कत तो नहीं और जरूरत पड़ने पर हम आपकी मदद कर सकें

सादर समर्पित
वंदन

शनिवार, 12 सितंबर 2026

4863...अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं...


शीर्षक
 पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ- 

भार्गव राम खण्डकाव्य - 58

अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,

अब थी निराश काशी नरेश बाला।

अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,

नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।

*****

810. प्यार (10 हाइकु)

कुछ बन्धन  
हँस-हँस के जीते 
गर प्यार हो। 

4.
ज़ख्म फूलों से 
प्यार में मिलता है 

नादान हूँ न!
*****

सूखी बारिश 

कहीं और सूरज वैसे निकलता ही नहीं।
चाँद में वह ख़ूबसूरती कहीं और नज़र ही नहीं आती।
खाने में वह ज़ायका नहीं मिलता,
बातों में वह बात नहीं होती,
और हँसी में वह खिलखिलाहट नहीं घुलती।

*****

स्तुति

और याद है

आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को कैसे मारा था?

उस दिन के तो क्या ही कहने

आप अकेले ने दस-दस को गिराया था

तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा

*****

तुम्हारे बारे में

आज सुबह नौ बजे वे नन्हे के घर जाने के लिए रवाना हुए। शाम को साढ़े छह बजे घर लौटे। एक अनुवाद कार्य किया। कल छोटी बहन का जन्मदिन है, एक पुरानी कविता को आज के परिप्रेक्ष्य में दुबारा लिखा। दिन में दोपहर बाद एक दूसरा हिन्दी नाटक देखा, ‘तुम्हारे बारे मेंमानव कौल द्वारा लिखित और निर्देशित भी।आधुनिक काल में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित है। सोनू को लेखक से मिलने का बहुत मन था, उसने मानव कौल के साथ तस्वीर भी खिंचवाई। 

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

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