निवेदन।


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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

4847 किले का दरवाजा अंदर से ही खुलता है

 सादर अभिवादन 


लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
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अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
कल आखिरी दिन है
विषयः  रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
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आज जरूरत है उसी परंपरा को जीवित कर सज्जनों के साथ-साथ दुर्जनों की वंशावलियों की भी पूरी कुंडली को जनता-जनार्दन के सामने लाने की ! उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए सारे कारनामों को जिनके अतीत के सच पर झूठ का चमकीला आवरण चढ़ा, असलियत छिपा, उनको महिमामंडित कर, अवाम को सच के सिवा कुछ और ही दिखा-समझा कर पीढ़ी दर पीढ़ी जो गलत इतिहास पढ़ाया-समझाया गया, उसका पर्दाफाश करने की ! वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के सामने सच रखने की ! उनके दिलों में राष्ट्र प्रथम की भावना सुदृढ़ करने की ! जिससे किले के दरवाजे की सुरक्षा पुख्ता हो जाए, अभेद्य हो जाए !






उस दिन’जुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।





अविकल, कोहरे में ढकी ये सुंदर
घाटियां, पहाड़ों से बहते हुए
ख़ूबसूरत वेगवान झरने,
आज भी बिखेरते हैं
ज़िन्दगी में रंगीन
सपने,





दोस्ती भी चाय की तलब-सी है,
जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है।
झटपट फोन घुमाया,
मिलने का वक्त और जगह तय हो आई,
फिर फोन रखने की देर थी बस—
एक प्यारी-सी शाम चली आई।






थोडी थोड़ी गल रही है 
थोड़ी थोड़ी जल रही है 
है पुरानी वेदनाये  
गीत में जो ढल रही है 





चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए




ये पैसे मांगेगा ज़रूर, यही सोचते हुए मांगे उसे रुपए देने के लिए अपने  पर्स में हाथ डाला इससे पहले मैं उसे रुपए देती इससे पहले उसने अपने 
कंधे पर झूलते हुए झोले से तीन साड़ियां निकाली और कहने लगा रु. नहीं 
चाहिए दीदी, हो सके तो इसमें से एक साड़ी खरीद लीजिए, 
मुझे ताली बजा कर मांगने वाली छवि से निकलने में मदद मिलेगी।

सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 26 अगस्त 2026

4846..सरगोशियों के स्वर ..

 ।।प्रातःवंदन।।

"सत्य का एक चेहरा होता है

रंगहीन भी नहीं होता सत्य !

लेकिन झूठ की तरह

हर कहीं नहीं होता सत्य

न ही झूठ में घुल पाता है

अगर होता है कहीं तो

अलग से दिव्या आलोक लिए

दमकता रहता है सत्य !"

गोविंद माथुर

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ आज शामिल रचनाए को देखिए ..✍️

अँधेरे का उजाला

शहर त्रस्त था

अँधेरों से।

उन्होंने

संविधान में संशोधन किया

और

अँधेरे का नाम

उजाला रख दिया..

✨️

सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद

 परिचय

सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव ..

✨️

कभी बेवजह ही गुनगुनाइये 

बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए 

छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल 

हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए ..

✨️

समय हूँ


नियति की

हर क्रिया में

कर्म की प्रतिक्रिया सा

निर्बाध निर्विरोध

लेता हूं अवश्य ही

प्रतिशोध..

✨️

सरगोशियों के स्वर 

‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीव..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '...✍️


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

4845....कास के फूल

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
---------

संक्रमित पेड़ के 

एक डाल के कीड़ों 

पर कीटनाशक छिड़ककर

ख़ुश होना कि पेड़

संक्रमण मुक्त हुआ

जबकि सच तो जड़ 

को खोखला कर रहा

भ्रम में जीना 

अच्छा लगता है हमें।

------------

आज की रचनाऍं-


-----------


आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

4844...प्रवासी पंछी अनजान देश में ढूँढे बसेरा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं सोमवारीय अंक में पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

सरगोशियों के स्वर 

कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है" कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है"

*****

खोज

जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में

 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

प्रवासी पंछी

प्रवासी पंछी

अनजान देश में

ढूँढे बसेरा

 

छूटे माँ बाप

छूटा कुल कुनबा

गाँव शहर

*****

ग़ालिब हुआ

कोई इधर गया, कोई उधर गया

कोई भी न मेरी जानिब हुआ

न मिलता है वो, न करता सलाम 

जब से वो शख़्स साहिब हुआ

*****

इस्मत चुगताई: बागी तेवरों वाली लेखिका, ज‍िन्होंने मौत के बाद दफ्न होने के बजाय दाह-संस्कार को चुना

ल‍िहाफ नामक कहानी ने उस दौर की महिला लेखिकाओं के लिए खींची गई 'लक्ष्मण रेखा' को हमेशा के लिए पार कर लिया. इस्मत चुगताई ने वो बंद दरवाजा खोल दिया, जिससे होकर आने वाली कई पीढ़ियों की लेखिकाओं ने समाज के तमाम वर्जित (taboo) और अछूते मुद्दों पर बेखौफ होकर अपनी आवाज बुलंद की. 

 *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

रविवार, 23 अगस्त 2026

4843...आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक की चुनिंदा पाँच रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

******************   

 हाइकु मुक्तक - सावन

आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई 

फूल ही फूल, चूनर में अपनी, टाँक ले आई 

बरसी बूँदें, गरजे घन घटा, तड़पे जिया

हर्षित धरा, लहरा के आँचल, ले अँगड़ाई !

*****

तेरी यादों से ओझल हो गया तो

बहाते हो जो भर-भर अश्क़ छुप कर,
ये रेगिस्तान जंगल हो गया तो.

रहेगा काम क्या लोगों पे बाक़ी,
धरम का मसअला हल हो गया तो.

*****

865. इंतज़ार

बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

उसकी पसंद की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है

उसका साफ़-सुथरा बिस्तर। 

*****

ऋतुएं

सूखे आषाढ़ के बाद सावन का हरा होना

केवल कल्पना है 

किसान बोएगा फिर भी धान 

इस उम्मीद में कि भादो जरूर बरसेगा

और भादो है कि

कई सालों से या तो खूब बरसा है

या एकदम ही नहीं 

*****

वास बन आ जा प्रिये

तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे 

प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से ,

समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये

तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 22 अगस्त 2026

4842 ...मर्यादा के ताले जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर 'किस पथ जाऊँ?'

 सादर अभिवादन 


लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
पिछला अंक देखेंअगला अंकः 30 अगस्त 26 को
रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
विषयः  रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
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पसंदीदा रचनाएं




गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं




गीदड़ों के झुंड ने कब्जा किया है मकानों पर,
बन बैठे हैं राजा, मानो हैं आसमानों पर।
​बोलते हैं यूँ कि मानो वह हैं प्यारे मेमने से,
दुनिया है जालिम और वे हैं बिल्कुल छौने से।
​बातें करते हैं यूँ जो मानो वही हरदम सही,
धोखे में रखकर सबको वे जमाते अपनी दही।




गड़-गड़, गड़ -गड़ बोले बदरिया।
चम-चम,चम-चम चमके बिजुरिया।हो रामा,
हरि बोलो !अजब आवाज आबे, अम्बर से हरि बोलो।
हरि बोलो!सावन महीना...........





मरती है स्त्री
सुबह -शाम
घुट-घुटकर
अटकती हैं साँसें पसलियों में
दर्द बन जाता शिलालेख
सूखे अधरों का
किससे कहें, कैसे कहें
मर्यादा के ताले
जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर
'किस पथ जाऊँ?'




कई सौ साल पहले
सदी का आख़िरी ग्रहण उतरा
सूरज के पाँव में
कालिख उतर आई
और एक पहर
समय से बाहर सूख गया।
*****
सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

4841....पर एक ऐसा दिल है...

 शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।
----------


चार दिन की बारिश में

गंदला जल हर सीमा लाँघ चुका,

नक्शे पर बनी रेखाएँ डूब गई।

खेत, आँगन, चौखट और सड़क—

सब एक ही विशाल, निष्ठुर नदी बन चुके हैं।


​पेड़ों की डालियों से लटके

प्लास्टिक के डिब्बे, कपड़े, और भूली-बिसरी यादें।

दूर बहती जाती है किसी बच्चे की आधी डूबी गेंद,

पीछे छूट जाती है

सालों की हाड़-तोड़ कमाई।


​राहत की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए

छतों पर कैद इंसान,

जहाँ भूख से ज़्यादा बड़ा है डर—

धीरे-धीरे चढ़ते पानी का।


​पानी जब उतरता है,

अपने पीछे छोड़ जाता है

बदबूदार कीचड़, बीमारियॉं,

एक थका हुआ शहर और

शून्य के घेरे में छटपटाता

मजबूर आदमी...।



--------------

आज की रचनाऍं- 


उसकी शरारतें किसी को सताने के लिए नहीं,
हर उदास चेहरे पर हँसी टाँक देने के लिए होती हैं।

वो नटखट है, पर किसी का दिल दुखाना नहीं जानती।
वो भूलक्कड़ है, पर रिश्ते निभाना कभी नहीं भूलती।

उसके पास बहुत बड़ी दौलत नहीं,
पर एक ऐसा दिल है
जिसमें छल की जगह नहीं,
सिर्फ़ अपनापन रहता है।



फिर सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन !







बड़ी दुश्मनी है तो देखेंगे हम भी 
कि तलवार मुझ पर चलाते हो कैसे 

जली जिंदगी पर न निकले फफोले 
बताओ हमें ग़म को खाते हो कैसे 

जहा‌ॅं पर बिताई थी बचपन की दुनियां 
उन्हीं बस्तियों को जलाते हो कैसे 


जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।
रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?


धुँध इतनी घनी थी कि बालकनी के पार सब कुछ सफेद रहस्य में डूब गया था। बच्ची देर तक उस अँधेरी खिड़की को देखती रही। फिर उसने अपने घर जाकर, अपनी गुल्लक तोड़ी और थोड़ा-सा तेल लेकर लौटी। दीपक जल गया। हवा ने टूटे तारों को छू लिया- धुँध में चित्र उभरने लगे।
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
सादर।
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