सादर अभिवादन
दीपमालिका
पर्व को बस कुछ ही दिन शेष
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
दीपमालिका
पर्व को बस कुछ ही दिन शेष
।।भोर वंदन।।
"जानकी जीवन, विजयदशमी तुम्हारी आज है,
दीख पड़ता देश में कुछ दूसरा ही साज है।
राघवेंद्र! हमें तुम्हारा आज भी कुछ ज्ञान है,
क्या तुम्हें भी अब कभी आता हमारा ध्यान है?"
मैथिलीशरण गुप्त
त्योहारों बीच कुछ पल रचनात्मक रूप से..आनन्द लिजिए लिंक पर क्लिक कर..✍️
विजयादशमी को दशहरा क्यों कहते हैं
✨️
एक दशहरा ऐसा भी हो
जल जाए हर कलुष हृदय से,
अहंकार का मुकुट गिरे फिर
भूमि पर श्री राम के शर से !
✨️
बारिश का मौसम है सर
बोर हो गया हूँ पढ़-पढ़कर
जल्दी से अब छुट्टी कर
झींगुर ने भी दौड़ लगाई
सबने हाँ में हाँ मिलाई
चलो भाइयों मौज मनाएँ
हम सब बारिश में नहाएँ..
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बहारें भी आ आकर लौट गयीं
तेरा इंतज़ार करते करते
खोया चॉंद से चेहरे का नूर
तेरा इंतज़ार करते करते ।..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।
सादर अभिवादन
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
किसलिए रट लगाए है बैठा है ये भी लिख दो और वो भी लिख
दो
पूंछ मोटी होना शुरू हो गई
बाल खड़े हो जाएंगे
साहिब के साहिबान पर लिख
दो
शर्म नहीं आएगी जरा भी
बलात्कार की खबर सुबह से
लेकर शाम लिख दो
किसी हजूर को बना भी दिया
जाएगा हजूरे आला
क्या उखाड़ लोगे आला कमान
लिख दो
*****
मिटी उम्मीद
अमावस की रात
नहीं बीतती,
कोई तो हो उपाय
नन्हा दीया जलाएँ।
*****
कद्र चीज़ों की नहीं, उन्हें परखने वाली नज़र की होती है,
वरना महलों में भी लोग तन्हाइयों में रह जाते हैं।
साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण
चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। उसी दौर में 'हमकदम' (१९८०) जैसी सार्थक फ़िल्म भी बनी जो नारी के नौकरी करने के विषय पर आधारित थी। नब्बे के दशक तक जब भारतीय दर्शक समुदाय की मानसिकता पुरुष-प्रधान समाज वाली थी तो फ़िल्मों में प्रायः नारियों को ही झुकते हुए दिखाया जाता था लेकिन जब नारी-सशक्तिकरण का दौर आया तो 'अस्तित्व' (२०००) तथा 'थप्पड़' (२०२०) जैसी फ़िल्में भी बनीं। आज के दौर के सिनेमा की नायिका के परिधान, हाव-भाव, शारीरिक व्यवहार और मानसिकता; सभी कुछ समाज में आए परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तित हो चुके हैं।
।।भोर वंदन।।
शुभ शनिवार माँ दुर्गा केवल शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, करुणा और धर्म की साक्षात प्रेरणा हैं।🙏नवरात्र पर्व की शुभेच्क्षा के साथ आनंद लिजिए रचनाओ के साथ✍️
नई टाउनशिप आ गयी है यहाँ भैय्या | प्लॉटिंग चल रही |
"अच्छा जी "
तगड़ा मुआवजा मिला है इन गाँवों में |
"अच्छा जी"
किया हुआ मुआवजे का ?
इन्वेस्टमेंट , शहर में प्लाट ले लिए | अपार्टमेंट ले लिए |
अच्छा जी
मतलब गांव की जमीन बेच कर शहर में प्लाट ले लिए ?
हाँ , ग्रोथ ज्यादा है
फिर धरा भी क्या है खेता में ?
खाएंगे क्या ? प्लाट ?
प्लाट क्यों , नौकरी
क्या बनेंगे , आर्किटेक्ट ?
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कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचानक कोई अनजाना, अनदेखा सा ख़्वाब टकरा जाता है। उसे देख अचकचाती हूँ। विस्मय से पूछती हूँ, 'तुम कौन? क्या तुम राह भटक गए हो?' वो मुस्कुराकर, सर पर हाथ फिराते हुए बोलता है 'अरी पगली, राह नहीं भटका, तेरा ही ख़्वाब हूँ। उन तमाम ख़्वाबों में से एक जिन्हें देखने से डरती ही रही तुम। आओ न, चलो, मेरे साथ।' ना-नुकुर करती हूँ लेकिन कोई सम्मोहन खींचता है। ..
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प्रेम - आत्मा के फूल की सुगंध !
जो कभी एक बीज था
अपने आप में सिमटा
ऊर्जा भीतर छिपाये
मिटकर बीज ही
एक दिन फूल उगाये..
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मेढक बोला टर्र टर्र टर्र
बारिश का मौसम है सर
बोर हो गया हूँ पढ़-पढ़कर
जल्दी से अब छुट्टी कर..
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भवजाल के जंजाल में ना फंस पिस जाए नौजवानी
छोटी सी ज़िन्दगी है मौज-मस्ती में बिताएं जिंदगानी
चार दिन हैं उम्र के ज़िन्दा-दिली ज़िंदगी के नाम कर
बेफिक्र हो ये ज़िंदगी का सफ़र सुबह-शाम में रवानी ।
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पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सादर अभिवादन