सादर अभिवादन
खास जानकारी
इस शनिवार से पम्मी सिंह जीआएंगी
सादर शुभकामनाए नए प्रभार हेतु
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन।।
"शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ।"
त्रिलोचन
बुधवारिय प्रस्तुतीकरण के क्रम को बढाते हुए आज इन लिंको पर पड़ी ..जो इस प्रकार से है
बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना..
✨️
नाम...
तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ
जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई..
✨️
वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है |
मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने
उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला
✨️
हवा की बरजोरी,
शाखा का सिहरना।
टहनी की गलबाँही,
पलक मिलमिलाना
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
भाव और वस्तुएँ संचित हैं
पर मन की भूमि
करुणा और संवेदना के बिना
सूख रही है
मानव-मन इस धरा की सुंदरता
पर कभी रीझता ही नहीं।
वही पुराने ढर्रे, वही संकीर्ण रवैये,
वह तो अपनी चेतना पर नैतिकता की
अपने अहंकार में
सच्चा सबक कभी सीखता ही नहीं।
शब्दों का बाज़ार लगा है
नज़्म की महफ़िलें सजती हैं यहाँ,
पर खो गई है मानवीय संवेदना,
केवल खोखले शब्द बचे हैं,
अंतर्मन की परतें अनछुई ही रह गयी...।
पारिजात और कनेर मदमाती बूंदों की
छुअन से मदहोश झूम रहे है
सलेटी आकाश, नशीली हवा, और
भीगी सड़कों के बीच
प्रकृति का संगीत सुनकर
दादुर, मोर और कोयल बाहर निकल आए हैं।
शीतल फुहारों से महक से अनजान
सिर पर बोझ उठाए गुज़रती है एक मज़दूरिन...
उसका पसीना वर्षा की बूँदों में मिलकर
उसके चेहरे को एक अनूठी चमक दे रहा है।
किसी के लिए बरखा
मौसम का उल्लास उल्लास है
किसी के लिए सरदर्दी
लेकिन जिसने जीवन को उसकी संपूर्णता में
स्वीकार किया
वही कुदरत का सच्चा साथी बनकर
भीतर से परम सुख और आनंद से भर पाता है।
पर
क्या सचमुच आनंद मिल पाता है
किसी पर किया गया अंधा ऐतबार
बेइंतहा रुलाता है,
और बेसबब इंतज़ार ने....
ज़िंदगी को बेचैनी में बदल दिया।
क्यों करते हैं लोग दावा
रूह और जिस्म के एक होने का
जब ज़िंदगी की सारी
ख़्वाब और ख्वाहिशें किसी मोड़ पर
अधूरा छोड़ जाना है
उन्हें किसी की मासूमियत पर भी
तरस नहीं आता
बेवफ़ाई चुनना कोई मजबूरी होती है क्या?
जो किसी के सच्चे ऑंसू और बेइंतहा दर्द
कोई देख नहीं पाता
शायद आगे बढ़ गये जो
पर उस दिल का क्या
जो इतने जख़्म खाने के बाद भी
ऑंखों में उनकी तस्वीर सजाये
चौखट पर चाहतों की पवनघंटियॉं लटकाए
उसकी प्रतीक्षा कर रही है।
जीवन सीधा दिखता है,
पर भीतर उलझनों के अनगिनत मोड़ हैं।
जन्म और मरण के बीच
सजा है एक
चारों तरफ़ मोह का चौखटा,
और ढलती शाम में स्याह होते परिंदे।
मासूम राहगीर अतीत के पानी में
अपनी ही परछाईं छूने को भटकते हैं।
सामने टंगा है आईना,
पर उम्र भर ख़ुद से मिलने की मोहलत नहीं।
धूप-छाँव का यह खेल,
और जन्म-मृत्यु का यह रहस्यमय कैनवास...
अविराम चलता रहता है।
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
आज के आधुनिक दौर में अभिभावक होना केवल बच्चे की भौतिक ज़रूरतें पूरी करने या उसे बेहतर शिक्षा दिलाने तक सीमित रह गया है।
आज की डिजिटल जीवनशैली में
जहाँ संवाद कम हो रहे और तनाव बढ़ रहा है, अभिभावकों को नियंत्रक के बजाय दोस्त और संबल बनने की ज़रूरत है।
बच्चों को असफलता से जूझने का धैर्य, नैतिक मूल्य और संवेदनशीलता सिखाना ही सच्ची परवरिश है। अभिभावकत्व का मूल अर्थ बच्चे को केवल एक सफल पेशेवर बनाना नहीं, बल्कि उसे एक आत्मनिर्भर और ज़िम्मेदार इंसान के रूप में गढ़ना है।
मेरा एक सवाल है-
क्या कर्तव्य निभाने की कीमत
एक शिक्षक का आत्मसम्मान है?
क्या अपराधी को बचाने के लिए
मुआवज़े का नक़ाब पहना दिया जाए?
यह तो न्याय से पहले,
अराजकता का सीधा निमंत्रण है।
नकल को संरक्षण देना
और अनुशासन को अपराध बनाना
शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।
न्याय की कसौटी पर
जब नियम अलग-अलग हो जाएँ,
तब शिक्षा का मंदिर नहीं
केवल राजनीति का बाज़ार बचता है।
किसी भी दुखद दुर्घटना
या अपराध पर सत्ता और प्रशासन का दुख
सिर्फ़ एक दिखावा है।
व्यवस्था के पास हर त्रासदी से निपटने के लिए
पहले से ही तैयार और रटे-रटाए शब्द होते हैं,
जिन्हें सोशल मीडिया और प्रेस में फैलाकर
अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जाती है।
शासक या तंत्र का
व्यक्तिगत दुख भी महज़ एक अभिनय है,
जहाँ आँसू पोछने के तुरंत बाद
काम सामान्य रूप से चलने लगता है
और अगली किसी घटना के लिए
फिर से वही नाटक दोहराने की तैयारी
कर ली जाती है।
फूलों की महक महसूस करना
दरिया में पैर लटकाकर बैठना
तितलियों के पीछे भागना
मिट्टी के घरौंदे बनाना
शायद भूल गये हैं हम
जीवन की आपाधापी में
जीने की जद्दोजहद की कड़वाहट भुलाकर
मासूमियत ज़िंदा रहे भी तो कैसे?
विपरीत परिस्थितियों की कोख में
उम्मीद और सीख के बीज छुपे होते हैं
हम हार मानने के बजाय
जब सामना करते है तो
नयी राह और रोशनी मुस्कुराकर
हौसला बढ़ाती है,
अपना रचा हुआ
सफलता और मंजिल के पीछे
अंधाधुंध भागती दुनिया
संघर्ष के पलों से मिली
जीवन की मिठास से
हमें दूर कर देती है
जिम्मेदारियॉं और हमारी गलतियॉं
हमें कमज़ोर नहीं बनाती
बल्कि एक नया
अस्तित्व गढ़ती है...
समय की सीमाओं को पार कर
गुफाओं, पर्वतों और खाइयों जैसी
कठिन राहों से गुजरती हुई
बहकर आती है नदी
रास्तों के पत्थरों से टकराकर
वह बिखरती नहीं,
बल्कि खुद को और निखारती है तथा
अपने हर प्रवाह में संगीत घोलती है।
बुलंद हौसलों से भरी नदी लगातार
अपनी असली ज़मीन और अस्तित्व की तलाश में
आगे बढ़ती है।
वह अपनी हर लहर से निस्वार्थ प्रेम करती है
और प्रकृति के नए रंगों से सजी रहती है।
कभी-कभी वह बाहर से शांत और मौन रहकर
अपनी ही गहराई में
नदी का बहना जीवन के साहस,
अटूट प्रवाह और आत्ममंथन
का ही एक रूप है।