पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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गुरुवार, 27 जुलाई 2017

741..... क्योंकि वो ताजमहल नहीं था.

सादर अभिवादन!
नागपंचमी पर्व की शुभकामनाऐं ! 
भारतीय संस्कृति का परंपरागत त्यौहार है 
नागपंचमी जो कि श्रावण मास की पंचमी तिथि 
(शुक्ल पक्ष) को  मनाया जाता है।  
स्त्रियाँ अपने परिवार में ख़ुशियों के लिए 
नाग देवता से प्रार्थना करती हैं,पूजा करती हैं तथा नाग 
को दूध पिलाये जाने का चलन आम है। 
इस दिन सपेरे नाग के साथ बस्तियों में देखे जाते हैं।   



आदरणीय दिग्विजय जी के आग्रह पर 

आज का यह अंक तैयार किया है।  मेरी रचना 
"ख़त" पढ़कर उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की थी कि 
आज का अंक वियोग आधारित रचनाओं को 
समर्पित हो तो मैंने कोशिश की है .....
जो कि संयोगवश महिला रचनाकारों की प्रस्तुति बन गया है। 


वियोग या विछोह हमारे जीवन में रचा-बसा है। कभी न कभी वियोग को जीना होता है।  सामान्यतः वियोग को श्रृंगार रस के एक रूप (दूसरा रूप संयोग श्रृंगार ) में जाना जाता है किन्तु वियोग करुण रस में भी अपनी उतनी ही प्रधानता रखता है। वियोग श्रृंगार में जहाँ आशिक-माशूक़ा  के  मिलन की आश का तंतु प्रेम की व्यापक संभावनाओं को जीवित रखता है वहीँ करुण रस में यह नाज़ुक धागा टूटकर बिखर चुका होता है और वियोग भावविह्वल करता हुआ 
शोक का अथाह सागर बन जाता है। 


आइये अब आपको ले चलते हैं आज की वियोग से लबरेज़ रचनाओं की ओर -    
                   
 लावण्या शाह

नैन में असुवन झड़ी!

है मौनओंठों पर प्रकम्पित,
नाचतीज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, 
जल के अंधेरे पाट पे,
'स्मृतिदीपबन कर बहेगी,
यातनाबिछुड़े स्वजन की!
एक दीप गंगा पे बहेगा,
रोयेंगीआँखें तुम्हारी।
                             

हल्के-हल्के हाथों से फिर, 

अपनी आँखों को पोंछा भी होगा 
देख उँगली पर अटकी बूँद-
एक हल्की सी मुस्कुराती लकीर,
उसके होंठो को छूकर गुज़री होगी
                      
है मेरा भी लाल कोई

जैसे तुम थे माँ के अपनी...

बस उसी के अक्स को
तेरी जगह रखा था मैंने !
हाँउसी पल से...तभी से...
रुह मेरी सुन्न है और काँपते हैं हाथ मेरे !
शब्द मेरे रो पड़े और रुक गई मेरी कलम भी !
वीर मेरे ! अश्रुधारा बह चली...
                                 
सफ़र   का  सिलसिला बिन  मंज़िलों  का  हो गया

तुम नहीं हो ज़िन्दगी  जिसमें  वास्ता ढूँढ़ने चले हैं 

चीखती हैं  ख़ामोशियाँ  तन्हाई में तेरी सदाएँ हैं 
जाने  कब  ख़त्म हो दर्द की इंतिहा ढूँढ़ने चले हैं 
            
किसी जीवित घर का मिटाया जाना विधि का विधान नहीं  नियति का क्रूर मज़ाक है बल्कि मनुष्य के असंवेदनशील होने का प्रमाण है  उस घर का बाशिंदा कितना तड़पा होगा जब उससे वो घर छीन लिया गया होगा जिसमें उसकी प्रियतमा की हर निशानी मौज़ूद है और ये सब 
अतीत की कथा नहीं बल्कि उसका वर्तमान जीवन है  कितना रोया होगा वो  कितना पुकारा होगा वो अपनी प्रियतमा को जिसने अकेला छोड़ दिया 
यादों के सहारे जीने के लिएपर उसने सदैव उसे अपने साथ महसूस 
किया हैउसे सोचा नहीं  बल्कि उसके साथ जी रहा है ।कितनी बेबस हुई होगी उस औरत की आत्मा जब उसके सपनों का 
घर टूट रहा होगा और उसका हमसफ़र उसकी निशानियों को 
चुन-चुन कर समेट रहा होगा  तोड़ दिया गया प्रेम का मंदिर फफक पड़ी होंगी दीवार की एक-एक ईंटें चूर हो गया किसी औरत की ख्वाहिशों का संसार 
......... 

वियोग की चंद झलकियाँ 

आपको प्रभावित करने में 
कितनी सफल रहीं, 
बताइयेगा ज़रूर। 
आपके  मनमोहक, ऊर्जावान सुझावों की प्रतीक्षा के साथ 
अब आपसे आज्ञा लेता हूँ। 
फिर मिलेंगे। 



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