निवेदन।


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बुधवार, 22 सितंबर 2021

3159..इल्म- औ -ज़द की भी बात होगी..

 ।। उषा स्वस्ति।।

"संदेश सहस्रों आशाओं के

आगत क्षण क्षण ले आएं !

अवसाद मिटें , भ्रम-जाल कटें ,

मिल जाएं बिछोही ; मुसकाएं !

विश्वास वृष्टि में आर्द्र-सजल,

आह्लादित हर दृग-कोर हो !

यह भोर सुहानी भोर हो !!"

राजेन्द्र स्वर्णकार

उठा रहे हैं हम कलम कुछ इस तरह मानों फूलों की ही बरसात होगी,

होगी.. जरूर होगी पर आपकी इल्म- औ -ज़द की भी दर्जात होगी.. ✍️ #तृप्ति

चलिए आज की पेशकश में ..धरोहर से 

किसी के समक्ष प्रिय…मत खुलना

फिर कई चाबियाँ आईं- 

चली गईं

लेकिन न खुला ताला

न ताले का मन

यहाँ तक कि..

❄️❄️


एक गीत-चाँदनी निहारेंगे

रंग चढ़े

मेहँदी के

मोम सी उँगलियाँ हैं ।

धानों की

मेड़ों पर

मेघ की बिजलियाँ हैं।

❄️❄️

सर ए० ओ० ह्यूम का विलाप

(सूरदास के पद – ‘तुम पै कौन दुहाबै गैया’ की तर्ज़ पर) 

कांग्रेस की डूबत नैया  

मात-सपूत जबर जोड़ी जब जाके बने खिवैया  

दल के नेता संकेतन पै नाचैं ताता थैया

❄️❄️



उठो कर्म का गान करो

------------------------------

अरुणोदय की स्वर्ण बेला।

लगा हुआ कर्मों का मेला।।


उदयाचल में स्वर गुंजित।

भाग्य कर्म रेखाएं पुंजित।।


तज आलस नींद से जागो।

स्वर्ण समय उठो आभागों।

❄️❄️

आलोचना 

आजकल हर जना 

जरूरत से ज्यादा होशियार है बना 

अपने गिरेबान में झांकना नहीं ,

करता है औरों की आलोचना 

सोच नकारात्मक है 

दृष्टिकोण भ्रामक है 

जो सिर्फ औरों की कमियां ही दिखाता है 

उसे आधा भरा हुआ नहीं ,

❄️❄️


ग़ज़ल - क़यामत हो गई

 ख्वाब टूटे आस बिखरी , क्या क़यामत हो गई|

हाथ से तक़दीर फिसली, क्या क़यामत हो गई|

कल में रहे, कल में जिए, कल की बनाई योजना,

कल न आया आज ही, ये तो क़यामत हो गई|

 ।। इति शम ।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

3158 ..हमारी तरफ बेटी से पांव नहीं झुवाते !

सादर अभिवादन..
विदा हो गए
श्री गणेश जी
फिर आने के लिए
पूरे जोर शोर से
चलिए रचनओं की ओर
..


अंगुली पकड़ चलना सिखलाया  
साध रखूँ कदमों को बतलाया  
सफर बीच हों कितने भी काँटे  
तेरा आशीष लगे हमसाया  
जीवन यात्रा में  
तेरी वीणा बन जाना है !  


यह कहानी वाकई कुछ अलग सा ही है


विजय बाबू ने गहरी सांस ली और धाराप्रवाह अठ्ठारह सालों का सारा विवरण मिनी को सुना दिया! कथा के आज तक वर्तमान तक आते-आते विजय बाबू का गला रुंध गया था ! कमरे में पूरी तरह खामोशी फैली हुई थी ! चारों प्राणियों की आँखों से अविरल अश्रु धारा बहे चली जा रही थी ! पता नहीं कितनी देर ऐसे ही सब बैठे रहे ! फिर मिनी उठी और शम्भू काका के पैरों में झुक गई ! शभ्भु अचकचा कर उठ खड़ा हुआ, बोला ना बिटिया ना ! हमारी तरफ बेटी से पांव नहीं झुवाते !'' फिर मिनी के सर पर हाथ फेरते हुए असंख्य आशीषें दे डालीं !




ले
शक्ति
आसक्ति
सीमा पर
फौजी सैनिक
होते हैं कुर्बान
हमारे अभिमान ।।




मुहाने पर जा कर
नदी भूल जाती है
समस्त अहंकार,
सुदूर पीछे छूट जाते हैं,




घुसी आवाज़ों के पेंच को कान से खींचकर निकालते हुए, 
आँखें तरेर के और मूँछों से गुर्राते हुए सक्सेना साब बोले-

अबे हट सुरेशवा के चाचा! हम बुलाए हैं। हमरे बहुत खास हैं।

सक्सेना ग्रुप ने चैन की सांस ली। आखिर आदरणीय सक्सेना जी ने 
गुल हुई बत्ती की मरम्मत जो करा दी है...
...
आज बस इतना ही
सादर

 

सोमवार, 20 सितंबर 2021

3157 ---------हम सच देखेंगे, सच ही कहेंगे

 नमस्कार !  स्वागत है आज के पाँच लिंक्स के आनन्द में । 

यूँ तो आपने एक उक्ति सुनी या पढ़ी ही होगी कि जहाँ न पहुँचे रवि , वहाँ पहुँचे कवि । यानि कि जहाँ सूर्य का प्रकाश भी न पहुँचे वहाँ की बातें कवि अपनी कल्पना में ले आता है । मैं तो कहती हूँ कवि ही क्यों हर लेखक की कल्पना शक्ति विस्तृत होती है । कोई भी लेखक अपनी कल्पना शक्ति द्वारा ही कहानी , कविता , लेख , उपन्यास लिख कर कुबेर का खज़ाना पा लेते हैं ( वैसे ये कवियों के लिए थोड़ी गलत बयानबाज़ी है )  । अमृता तन्मय जी का बड़ा मासूम सा सवाल कि यदि आपके सामने कुबेर का खज़ाना और कल्पना का खज़ाना हो तो आप कौन सा चुनेंगे ?  बाकियों का तो पता नहीं लेकिन  जब केवल  मान लेना है कि ये दो ख़ज़ाने सामने हैं तो कल्पना का ही चुनेंगे और कल्पना में ही सोच लेंगे की कुबेर का खज़ाना हमारे हाथ लग गया है ..... खैर  आप इनके द्वारा दिये तथ्यों पर गौर फरमाएँ  और इनकी कल्पना का आनंद उठाएँ ---– 


 कल्पना करें यदि आपके सामने एक तरफ कुबेर का खजाना हो और दूसरी तरफ कल्पना का खजाना हो तो आप किसे चुनेंगे ? गोया व्यावहारिक तो यही है कि कुबेर का खजाना ही चुना जाए और बुद्धिमत्ता भी यही है ।  तिसपर महापुरुषों की मोह-माया-मिथ्या वाले जन्मघुट्टी से इतर बच्चा-बच्चा जानता है कि इस अर्थयुग में परमात्मा को पाने से ज्यादा कठिन है अर्थ को पाना ।


कल्पना से निकल अब  कदम बढ़ाते है सत्य की ओर .......उस ओर बढ़ने से पहले एक बात अपनी कहना चाहूँगी , कुछ लोगों की पोस्ट का कथानक बहुत अच्छा होता है , उसे लोगों को पढ़ना भी चाहिए , लोगों तक पहुँचाने का मेरा मन भी करता है लेकिन वर्तनी की त्रुटियाँ होने के कारण अक्सर मैं छोड़ देती हूँ । विशेषकर अभी हिन्दी दिवस के उपलक्ष में आई बहुत सी कविताओं में त्रुटियाँ देख मन थोड़ा क्षुब्ध हुआ । खैर ...... हिन्दी भाषा को हम उसका स्थान दिलाने में जो असमर्थ हो रहे हैं उसकी जो टीस मन की गहराई में उभरती है उसकी एक सटीक बानगी संदीप कुमार  शर्मा जी की यह कविता कह रही है -----

हम सच देखेंगे, सच ही कहेंगे

हिंदी पर

लिखता हूं तो 

अपने आप को अपराधी पाता हूं। 

बच्चे जिन्हें 

जीने के लिए

अंग्रेजी का मुखौटा चाहिए था

मैंने दे दिया।


सच कहने पर आएँ तो बहुतों को कष्ट हो जाता है । क्योंकि सच तो होता ही कड़वा है , लेकिन बहुत बार एक लेखक सच को हास्य व्यंग्य में लपेट कर परोस देता है .... ऐसे ही आनंद पाठक जी ले आये हैं अल्लम गल्लम पर एक व्यंग्य रचना  .. पढ़ें और आनंदित हों ---


चाय का एक घूँट जैसे ही मिश्रा जी के हलक के अन्दर गया कि एक शे’र बाहर निकला।

चाय की प्याली नहीं है , ज़िन्दगी का स्वाद है, 

मेरे जैसे शायरों को आब-ओ-गिल है, खाद है ।

[आब-ओ-गिल है खाद है = यानी खाद-पानी है ]

मिश्रा जी ने अपनी समझ से शे’र ही पढ़ा था कि पास खड़े एक आदमी ने कहा--

-जी ! आप कौन ?



सच ही है कि जब से ज़ूम पर प्रबुद्ध  रचनाकार आने लगे हैं और विभिन्न प्रतियोगिता में उनकी हिस्सेदारी हुई है तो प्रतियोगिता जीतने  की होड़ भी लगी हुई है .  वैसे तो सभी कुछ न कुछ कमाने में लगे रहते हैं । कोई नाम कमा रहे है तो कोई पैसा । पैसा कमाने के लोगों ने बड़े शातिर तरीके अपनाये हुए हैं।  अब जब उन शातिरों पर सरकार की गाज गिरती है तो तिलमिला जाते हैं । आँख खोल कर जानिए कि आखिर देश में हो क्या रहा है ?  कैसी विचारधारा को विकसित किया जा रहा है ? अब छोडो भी ..... अरे मतलब इस  ब्लॉग पर  अलक नंदा जी  प्रस्तुत कर रही हैं एक सार्थक लेख .......... 

ठीक इसी तर्ज़ पर हमारे देश की सुरक्षा व समृद्ध‍ि पर घात कर रहे ब्‍यूरोक्रेट और कथ‍ित सामाज‍िक कार्यकर्ता हर्ष मंदर सरीखे भेड़‍ियों की अब पोल खुल रही है मगर कठघरे में अकेले हर्ष मंदर ही नहीं, उनकी पूरी लॉबी आती जा रही है क्‍योंक‍ि इसमें शाम‍िल 25 से ज्यादा “बुद्ध‍िजीव‍ियों” ने मंदर को “शांति और सौहार्द्र” के लिए काम करने वाला बताकर सरकार (ईडी) के ख‍िलाफ एक संयुक्‍त बयान जारी क‍िया है। 


और इस आँख खोलू ( Eye opener )  लेख के बाद बहुत खूबसूरत सीख देती एक रचना लायी हूँ  जिसे पढ़ आप सभी का मन ऊर्जा से भर जाएगा । कवि ने निरंतर जीवन में उत्साह बनाये रखने की सलाह दी है भले ही जो बनना चाहते थे न बन पाए हों लेकिन उत्साह नहीं खोना चाहिए ..... प्रवीण पाण्डे  जी की कविता पेश है ---

दुख सहना पर पीर पिरोना


बाहर तीखे तीर चल रहे,
सीना ताने वीर चल रहे,
प्यादे हो, हद में ही रहना,
दोनों ओर वजीर चल रहे।

मन अतरंगी ख्वाब न पालो,
पहले अपने होश सम्हालो,
क्यों समझो शतरंजी चौखट,
बचपन है, आनन्द मना लो।

ज़िन्दगी में  एक तरफ उत्साह बनाये रखने का आग्रह और दूसरी तरफ बहुत बार कुछ ऐसा घटित होता है कि जीवन ही कोई दाँव पर लगाने को प्रस्तुत हो जाता है । लेकिन फिर कहीं से अचानक कोई प्रेरणा पा अपने मन को  दृढ़ करता है । सच ज़िन्दगी भी कैसा ताना - बाना है !!!!!  और  ताना बाना पर पढ़िए उषा किरण जी की एक लघुकथा --  

स्थगित


रेल की पटरियों पर बदहवास रोती चली जा रही दीप्ति के पीछे एक भिखारिन लग गई।

- ए सिठानी तेरे कूँ मरनाईच न तो अपुन को ये शॉल, स्वेटर और चप्पल दे न…ए सिठानी …!

दीप्ति ने शॉल, स्वेटर और चप्पल उसकी तरफ उछाल दिए।  भिखारिन और तेजी से पीछा करने लगी।

- ऐ सिठानी ये चेन और कंगन भी दे न…भगवान भला करेंगे…!



इस कथा को पढ़ मुझे लगता है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग का  नेतृत्व करने वाली कुछ  महिलाएँ क्या सच ही स्त्री सशक्तिकरण पर कुछ सार्थक कर पाएँगी ....... या बस गोष्ठी और नारे ही रह जायेंगे ----    मन में   ऐसी ही कुछ  शंका लिए श्वेता सिन्हा एक सशक्त रचना ले कर आई हैं और जानना चाह रही हैं कि क्या सच ही कुछ बदलाव होगा ? पढ़िए उनकी रचना और थोड़ा विचारिये .....क्या सच ही स्त्रियों के लिए कहीं कुछ हो रहा है ?????   


नामचीन औरतों की
लुभावनी कहानियाँ
क्या सचमुच
बदल सकती हैं
हाशिये में पड़ी
स्त्री का भविष्य...?

उंगलियों पर
गिनी जा सकने वाली
प्रसिद्ध स्त्रियों को
नहीं जानती
पड़ोस की भाभी,चाची,ताई,

इस विचारणीय कविता के साथ ही आज की हलचल का समापन कर रही हूँ ।  फिर मुलाकात होगी ..... इसी जगह ........ इसी दिन ..... इसी समय .......एक ब्रेक के बाद । 


धन्यवाद 
संगीता स्वरूप ।

रविवार, 19 सितंबर 2021

3156 ..थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था

सादर नमस्कार
आज में हूँ
छुट्टी का सदुपयोग

रचनाएँ देखिए..



हिन्दी के वासी हिन्दी की बधाई देते हैं
इक दिवस की नहीं प्यासी हिन्दी
आंग्ल की है नहीं न्यासी हिन्दी
हँसते, रोते हैं कभी हम उदास होते हैं
सांस हिन्दी है, सदा इसके पास होते हैं।




खिलता है शतदल, हर किसी को कहाँ
मिलता है सपनों का ताजमहल।




कभी गाढ़ी नहीं छनी
इन आँखों की नींद से
बहाना होता है
इनके पास जागने का
कभी थकान का
तो कभी काम का
खुली छत पर..




एक तलहटी
जिसकी गहराई मे
जा बैठती है वह
मौन हो
एक नई प्रतीक्षा की
नदी फिर जी उठती है
सूर्योदय के साथ





उजाले पीटने के दिन
थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था
बस लिखने चला आया था
....
बस
सादर


शनिवार, 18 सितंबर 2021

3155.. हिन्दी दिवस पखवाड़ा

     


 हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

"हिन्दी को हम कैसे समृद्ध कर सकते हैं..?"

"आपलोग प्रिस्क्रिप्शन पर दवाइयों का नाम हिन्दी में लिखना शुरू कर दें..। बहुत वर्षों से साध थी कि किसी चिकित्सक से पूछ लूँ कि आप ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं कि केवल दवा का दुकानदार ही पढ़ पाता है रोगी नहीं..? आज चिकित्सकों की भीड़ से ही पूछ रही हूँ..।"

"अर्थात?"

"आंग्लभाषा से मुझे प्रत्यूर्जता नहीं... अब आपलोगों को प्रत्यूर्जता से ही प्रत्यूर्जता है तो क्या किया जा सकता है...?"

"सरल सहज भाषा में समझाने का कष्ट करें...,"

"अब man go और mango तथा अंकल आँटी जैसी इतनी सरल कृपण/सूम भाषा हिन्दी तो हो ही नहीं सकती...!"

”हिन्दी में बात करें, हिन्दी की बात ना करें।.. हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है। वैज्ञानिक होने के कारण ही यह बाचन एवं लेखन की दृष्टि से एक क्रमबद्ध भाषा भी है..,"

"विज्ञान की पुस्तकें हिन्दी में कितनी है?"

हर सुबह आपनी ख्वाहिशों को लेकर जगा कर,

सफलता का दीप जलाया कर,आलस्य  भगा कर

किसी न किसी रुप में आलस्य आकर हमें सताएगा।

हमारे कार्यो में रुकावट डाल कर हमारी उन्नति के

मार्ग को अवरूद्ध कर हमें भ्रमाएगा।

सच कहूँ तो यहीं आलस्य का फ़साना हैं,

परीक्षा और नींद दोनों को एक साथ आना हैं

आलस्य नाम का यह अवगुण भले ही एक प्रतीत होता हो

लेकिन अपने आप में कई दुर्गुण समेटे हुए है

जैसे- आलसी व्यक्ति काम करने से बचने के लिए झूठ बोलेगा ,

चोरी करेगा और शायद हेरा-फेरी भी करेगा ।

गाँवों की हरियाली और मनोरमता तन – मन के

कलुष तथा आलस्य को हर लेती है। वहाँ की शीतल मंद बयार में

प्रेम, सद्भावना व संवेदना की लहर बहती है। गाँवों के त्योहारों और धार्मिक

कर्मों में भारतीय परंपरा की समरसता समाहित है

इसी तरह रात दिन आलस्य में पड़कर हर दिन तुम गवाते जा रहे हो।

इस मानव जीवन को अति बहुमूल्य बताते हुए कबीर कहते हैं

कि यह जन्म हीरे के समान अनमोल था ।

कुटिलत संग रहीम कहि साधू बचते नाहि

ज्यों नैना सैना करें उरज उमेठे जाहि ।

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पुन: भेंट होगी....

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शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

3154.....लेखनी चलती रहनी चाहिए

 शुक्रवारीय अंक में मैं श्वेता
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन करती हूँ।

------

मेरी समझ से- 

पूजने का अर्थ है विशेष सम्मान देना। भारतीय संस्कृति में दैनिक जीवन से जुड़ी मुख्य चीज़ों को, जो जीवन जीने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती उसे पूजने की परंपरा है।

 उसी क्रम में-

देवताओं के वास्तुकार और धरती के प्रथम शिल्पकार माने जाने वाले भगवान विश्वकर्मा की जयन्ती हर वर्ष 17 सितम्बर को बड़ी धूम-धाम से मुख्यतः कर्नाटक,असम,पश्चिमी बंगाल,बिहार,झारखंड, ओड़िसा और त्रिपुरा में मनायी जाती है। 

 कल-कारखानों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा विशेष रुप से की जाती है जिसपर देश के लगभग सभी प्रदेशों की बहुत बड़ी आबादी जीवन-यापन के लिए निर्भर है।

 ------

आइये आज की रचनाओं का आस्वादन करते हैं-


हठी लिप्सा

अंतर्मन के आसमान में,
आराजक-सा शोर हुआ।
विघटन में विचारों के,
अंतर्द्वंद्व घनघोर हुआ।


----////-----
इन ऊँगलियों से न सही
पर उन ऊँगलियों से ही सही
लेखनी चलती रहनी चाहिए 
सतत् लेखनी चलती रहनी चाहिए .


------////-----
हम क्षमता रखते हैं
 एक दूसरे के व्यवहार और निर्णयों को प्रभावित करने  की
 उन्हें अपने हितों के अनुसार उपयोग और उपभोग करने की 
हम हिंसा में विश्वास नहीं करते -- ऐसा कहते कहते 
हमने हथिया लिए सब पहाड़, नदी, जंगल 
और प्रयोग कर लिए इतिहास से सबसे खतरनाक हथियार 
जिसके हथियार जितने खतरनाक हैं।


-------//////-----


सूखकर किताब के
पन्नों वाले जंगल के
आखिरी पृष्ठ
की निचली
पंक्तियों की बस्ती में
सूखे की अंतहीन
बाढ़ में समा गया है।


----//////-----

”बिटिया रानी के इन काग़ज़ों (टिसु पेपर ) की तरह होती है मुआवज़े की रकम। 'नाम बड़े दर्शन छोटे' किसान के ज़ख़्मों का उपचार नहीं करता कोई, दिलासा बाँटते हैं।
------/////-----

आज यही तक 
कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।



 

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

3153...दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक की रचनाएँ प्रस्तुत हैं-

 हो तुम मेरे ही कान्हां


अलग ही है पहचान तुम्हारी

बाल सुलभ चंचलता नयनों में

यही अदा प्यारी है मुझको

मैं हो जाऊं  तुम पर न्योछावर।

 

वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र


सुन चहल-कदमी गुज़रती उम्र की,

वक़्त की कुछ मान कर अब तो सुधर.

रात के लम्हे गुज़रते ही नहीं,

दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.

 

उतराई के चेहरे - -

ज़िन्दगी खोजती

है दूर सरकती

हुई सांसों

की

गुंजन

शाम ढले तलहटी पर थे सभी

चेहरे गहराई तक बोझिल

 

खेल खेल में - एक लघुकथा

पागल हो गया है क्या दीनू! तिरंगा ज़मीन पर फेंकेगा।” और झंडा हाथ में ऊँचा उठा वन्दे मातरम्’ का जयकारा लगाते हुए उसने दौड़ लगा दी! फ़ौजी और आतंकी सारे बच्चे उसके पीछे पीछे ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’ नारा लगाते हुए दौड़ पड़े!


शहर का नाम देहरादून कैसे पड़ा


 
गुरु राम राय जी ने कहा कि आप ग्रन्थ साहिब को दुबारा देखेंदुबारा देखने पर मुसलमान शब्द की जगह बेईमान शब्द पाया गया जो कि एक चमत्कार थाऔरंगजेब की तसल्ली हुई और उसने गुरु राम राय जी को 'हिन्दू फ़क़ीरऔर 'कामिल फ़क़ीरका दर्जा दे दियापर बाबा राम राय जी के इस चमत्कार से उनके पिता गुरु हर राय जी सख्त नाराज़ हुएगुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी के कारण नाराज़ पिता ने पुत्र को गद्दी से वंचित कर दिया और कह दिया कि तुम्हारा यहां रहना संभव नहीं है.

 *****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

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