निवेदन।


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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

4643.. रैना कटे न दिन कटे

।।प्रातःवंदन।।

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..✍️

आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें 
✨️


बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !

उसका मर्द जब शराब में..
✨️

1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर । 

   रैना कटे न दिन कटे, कब होगी नव भोर ।।

2. माणिक माला कर गहे, नजर भरी मन मैल।
कलयुग का यह धर्म है, खड़े कुटिल बन शैल ।
✨️


क्या कहा—रोज़गार चाहिए?
तुम भूखे हो?
शर्म नहीं आती!
इस तरह तो तुम
देश को बदनाम करने की
साज़िश रच रहे हो।
 ✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '✍️

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

4642....लौट आना गौरैया का

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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बदलते मौसम का मिज़ाज आपने महसूस किया क्या
फूलों की खुशबू से भीगी हवाओं का संदेश लेकर उड़ती तितलियों की अठखेलियाँ ,गुनगुनाती धूप की छुअन से पर इतराता मन कहता है-
नभ के गेसुओं पर विरह का इतिहास लिखना,
'पी'तुम्हें महसूस कर अनछुए एहसास लिखना।
शरद के झरते बदन से शीत की चुनरी उतारूँ,
कोहरे पर रंग छिड़कूँ अब मुझे मधुमास लिखना।

मौसम से बातें करते हुए यह कविता अंतस तक भीगा गयी इसे पढ़ते कबीर की लिखी  पंक्तियाँ स्मरण हो आई..

आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगी रहे अनुराग।
हिरदै पलक न बीसरें, तब सांचा बैराग।।
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आज की रचनाऍं-



अगले ही पल
दोनों आदमी
मोहरों को डिब्बे में भरने लगे
राजा-रानी के साथ
 सभी जानवर पहले की तरह
कठुआए, एक-दूसरे से चिपककर 
गहरी नींद सो गये।



 

इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,


एक बार हमारे घर मेहमान आए जो मेरे लिए सुंदर सी गुड़िया लाए ...मैं बहुत खुश हुई । उन्होनें कहा देखो तुम -सी ही है न गुड़िया ..खेलोगी न इससे ,देखो इसे जैसे चाहो घुमा सकती हो ,नचा सकती हो ..चाबी की गुड़िया है ये तुम्हारे इशारों पर नाचेगी .......।



आयुष ने एक गहरी सांस ली. खुद को समझाने के लिए, विशाल से कहने लगा, "यार, इतना मत सोच. यह तो... कोचिंग का अपना इंटरनल टेस्ट है. असली मुकाबला तो आईआईटी एंट्रेंस है न? उसी से हमें फर्क पड़ना चाहिए."

विशाल ने उसकी ओर देखा. उसकी आँखों में थकान और एक कड़वी हँसी थी. "इंटरनल टेस्ट? यहीं से तो 'असली' की तैयारी होती है, आयुष. यहाँ नीचे गए तो वहाँ का सपना तक दिखना बंद हो जाता है."



हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, 
जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं 
और कोई निर्णय नहीं ले पाते। 
तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व 
व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 
अन्ततः यश, अपयश, हार, जीत, जीवन, मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है। 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

4641कभी न चाहते हुए भी कुछ लिखना जरूरी हो जाता है

 सादर अभिवादन 

आज भाई रवींद्र जी को आना था
हम उठ गए तो ..

सभ्य होने का मतलब
यह नहीं कि कोई आपको शासित करे।
नर्मी भी एक शक्ति है।
और कभी-कभी—
चले जाना,
छोड़ देना,
सबसे बड़ा साहस होता है।




“कुछ नहीं, बस यूँ ही.” आयुष को सामने देखा तो मम्मा ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. पूछने लगी, “कैसा है? तेरी शकल कैसी हो गयी है? तू ठीक से खाया पिया कर. दस-पाँच दिन में जब भी पापा कोटा आएंगे तेरे लिए चाची से बनवा कर बेसन के लड्डू और मठरी भिजवा दूंगी.

माँ के स्नेह से आयुष की आँखें भी नम हो गईं. शगुन ठीक थी. उसका लक्ष्य आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है, न कि बीच के टेस्ट.

तभी पापा ने कहा, “माँ बेटे का मिलन हो गया हो तो, चल कर चाय पी लें? आगे भी चलना है.”





पास ही पहाड़ की बाहों में
लिपटे घर से
नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर 
गूँज उठता है -
“लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,
हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,
मायें मेरिये, शिमले दी रावें,
चम्बा कितनी दूर…, 
चम्बा कितनी दूर…!”






आज के दिन तुम्हें याद करना
सबसे जरूरी है
क्योंकि
आज भी वैसे ही दिन हैं
जैसे तब थे जब तुम थे
‘उलूक’ नतमस्तक है तेरे सामने
जब तू नहीं है
राष्ट्रपिता बापू
आज ही नहीं हर दिन तेरा दिन है
नमन |





अपनी नासिक से कानपुर की यात्रा के दौरान मुझको अपने ही कंपार्टमेंट में कुछ अग्निवीरों से मुलाकात करने का मौका मिला। बोगी में हम दूर थे लेकिन कानपुर में उतरते समय हम सब एक ही गेट पर खड़े थे तो मैंने सोचा कि उनके कुछ अनुभव और उनके अपनी नौकरी के प्रति विचारों को साझा किया जाए. वह जो अग्निवीर बने वे बहुत ही संतुष्ट है और सरकार की भविष्य की नीतियों के प्रति भी उनके अंदर एक आश्वासन है, जो उन्हें एक सुरक्षित भविष्य देगा।


बस
वंदन

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

4640...पहले इलाज आँख का करते मेरे हजूर...

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा चयनित रचनाएँ-

घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए ...


*****कोई

एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !
*****

मिट्टी कटी किनारों की - राहुल शिवाय

उसी भाव से टाँके तुमने टूटे बटन कमीज के

जैसे मेरी उम्र माँगने करती हो व्रत तीज के।  

या

बीतता है दिन कि जैसे
चारपाई पर पड़ा बीमार कोई।  

या फिर

जीवन सारा कटु अनुभव है
मधु-मिसरी है माँ।  

*****

मासिक बाल पत्रिका किलोल में प्रकाशित बाल कविताएं -आकिब जावेद


*****
उपन्यास ‘उपेक्षिता’: सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज
डी.सी. का व्यक्तित्व एक ऐसे आदर्श नायक का है जो अन्याय के समक्ष झुकने के स्थान पर, आँखों में आँखें डालकर सत्य बोलने का साहस रखता है। काजल के हृदय में पश्चाताप की अग्नि प्रज्वलित होना और उसका आत्मघाती कदम उठाना, कथा को एक नया मोड़ देता है। डी.सी. द्वारा अपना रक्त देकर काजल के प्राणों की रक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि मानवीय रक्त का संबंध जातीय और वर्गीय दीवारों से कहीं अधिक ऊँचा और पवित्र होता है।*****फिर मिलेंगे। रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 31 जनवरी 2026

4639 ..ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी!

 सादर अभिवादन 


जनवरी जा रहे हो तुम
लम्बी प्रतीक्षा देते हुए इकट्ठा
11 माह का इंतजार झेलना होगा
खैर जग की रीति है
जो है सो 

रचनाएं देखें




अब 
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
उसे नहलाती धुलाती,
ब्रश कराती,
और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है,
चोट उसे लगी है इस कल्पना में भी,
वो खुद ही रोती है,





समुन्दर की असंख्य लहरों पर 
डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 
बढ़ता जाता है जहाज 
आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 
क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 
आकाश छू रहा है लहरों को 





ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
सत्ता की भूख में,
लालच की आग में—
इंसानियत जले तो
हुकूमत नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
जब रक्षक ही
गोली चलाएँ,
तो बताओ—




"नीलम मैम ने आंखें नीचे कर लीं लेकिन कुछ कहा नहीं। देव सर का हृदय धड़कने लगा। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें? डर था कि कहीं कोई बात नीलम मैम को बुरी न लग जाए। अचानक नीलम मैम बोली-"एक छात्र कह रहा था आप जैसा गणित कोई नहीं पढ़ाता!"देव सर ने नीलम मैम की तरफ देखते हुए कहा कि आप जैसी हिंदी भी कोई नहीं पढ़ाता। दोनों मुस्कराने लगे। फिर दोनों ही शांत हो गए। लेकिन पिलखन का पेड़ साक्षी था कि इस शांति में भी एक अपनापन था। एक प्रेम कहानी थी और दो प्रेमी थे जो प्रेम डगर पर चल पड़े थे।





चैता के 
गीत कहाँ 
शहरों के हिस्से,
वक़्त की 
किताबों में 
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.




फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला
कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।
अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 
छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।
लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .
*****
मौसम बदल रहा है
देश के कायदे भी बदल रहे हैं
कब क्या हो जाए
पता नहीं
जिधर से तेज हवा आए
पीठ उसकी ओर कर लें

वंदन

आज बस
सादर वंदंन

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

4638...चुप भी एक गुनाह है

 शुक्रवारीय अंक में 

आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------
शहीद दिवस

आज महात्मा गाँधी जी की

पुण्यतिथि है।

वैचारिक मतभेदों को

किनारे रखकर,

फालतू के तर्क-वितर्क में

पड़े बिना

आइये सच्चे मन से बापू को कुछ

श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

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दुख से दूर पहुँचकर गाँधी।

सुख से मौन खड़े हो

मरते-खपते इंसानों के

इस भारत में तुम्हीं बड़े हो


- केदारनाथ अग्रवाल 


एक दिन इतिहास पूछेगा

कि तुमने जन्म गाँधी को दिया था,

जिस समय अधिकार, शोषण, स्वार्थ

हो निर्लज्ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्द्व

सद्य: जगे, संभले राष्ट्र में घुन-से लगे

जर्जर उसे करते रहे थे,

तुम कहाँ थे? और तुमने क्या किया था?


- हरिवंशराय बच्चन


गाँधी तूफ़ान के पिता

और बाजों के भी बाज थे ।

क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।


-रामधारी सिंह "दिनकर"


तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,

हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,

जिसमें असार भव-शून्य लीन;

आधार अमर, होगी जिस पर

भावी की संस्कृति समासीन!


- सुमित्रानंदन पंत


युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख

युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,

तुम अचल मेखला बन भू की

खींचते काल पर अमिट रेख


-सोहनलाल द्विवेदी




आज की नियमित रचनाऍं- 

गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,
मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।
 
थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,
बना मोड़ हर आज तो श्मशान।


फूल बासी 
चढ़ रहे हैं 
देवता के माथ पर,
नहीं मेहंदी 
हलद के रंग 
चाँदनी के हाथ पर,
मिल रहे हैं 
खुशबुओं के
संग हवाओं में ज़हर.


यदि मेरे हाथ में शासन की बागडोर हो


टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये

हर बच्चे के जन्म पर....


कार,लिफ़ाफ़ा और लड्डू 


 चाची की आवाज़ ने बातचीत में दखल दिया. वे गर्म चपातियाँ लिए वहाँ थीं. खड़ी थीं. "बनस्थली में तो खादी पहननी पड़ती है. कुर्ता-पायजामा या सलवार-कमीज, सब खादी का. मेरी भांजी बताया था. और किताबें भी वहीं से मिलेंगी. कॉलेज बताएगा कि क्या चाहिए, और कैम्पस में ही प्रकाशक से भी कम दाम में मिल जाएंगी. खादी का कपड़ा और दर्जी भी वहीं मिल जाएंगे. उनका अपना सिस्टम है."


पिगी बैंक में सूअर ही क्यों🤔


कपड़ों की फिक्र न करो,"भले ही इतिहास, जिज्ञासाएं, कथाएं, कुछ भी हों, आज पिगी बैंक का मतलब या पर्याय सिक्के जमा करने के लिए बने किसी भी आकार और रूप के उपकरण से हो गया है ! ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा यह संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है और यह नियम लोगों के बड़े होने पर आदत में तब्दील होता चला जाता है !  


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

4637..वही बांट- बांट..

 गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं

नई सरकार, वही सम्राट

 जम्हूरी, जलालत ललाट,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

जो नैतिकता को काट- काट,

और मर्यादा छांट- छांट।


इज्जत आबरू चाट- चाट,

नराधमों में बांट- बांट।नई सरकार, वही  बांट- बांट।

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वसंत-पंचमी लघुकथा



वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई..

✨️

सवाल

वो लम्हा तुम जरा बताओ,

जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,

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चर्चा प्लस  

अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है 

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                             

     समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था। 

✨️

बुलंदी के मस्त,ताब तेवर


शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंस

सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे

एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,

सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



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