निवेदन।


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सोमवार, 14 जून 2021

3059 -------- मास्क अब जीवन का हिस्सा हैं ......

 लीजिये इस बार भी सोमवार कुछ जल्दी ही आ गया लग रहा है .... कोई बात नहीं आज शुरू करेंगे एक ऐसे ब्लॉग से जो आम आदमी को भी आइना  दिखाता  हो ..... हांलांकि  फिलहाल इस ब्लॉग पर पोस्ट आ नहीं रही हैं फिर भी आप पाठकों को इसका पता ठिकाना देना चाह रही हूँ . क्यों कि इस ब्लॉग पर बहुत कुछ तीखा तीखा मिलता रहा है .... यदि इस ब्लॉग पर कुछ  पुरानी  पोस्ट पढेंगे तो मुद्दों पर किस तरह विचार विमर्श हो जाया करता था उससे परिचित होंगे ... इस ब्लॉग का सञ्चालन  अंशुमाला जी करती हैं .और अपने इस ब्लॉग  mangopeople के बारे में कहती हैं कि -----





मैंगो पीपल यानी हम और आप वो आम आदमी जिसे अपनी हर परेशानी के लिए दूसरो को दोष देने की बुरी आदत है . वो देश में व्याप्त हर समस्या के लिए भ्रष्ट नेताओं लापरवाह प्रसाशन और असंवेदनशील नौकरशाही को जिम्मेदार मानता है जबकि वो खुद गले तक भ्रष्टाचार और बेईमानी की दलदल में डूबा हुआ है. मेरा ब्लाग ऐसे ही आम आदमी को समर्पित है और एक कोशिश है उसे उसकी गिरेबान दिखाने की.....

जब  कोरोना का पदार्पण हुआ ही था तो ४ महीने के अन्दर ही उन्होंने समझ लिया था कि ---

मास्क अब जीवन का हिस्सा हैं -------mangopeople


दुनियां और देश के बाकि हिस्सों का हाल मार्च में जो भी था लेकिन मुंबई में मास्क की कमी कभी नहीं रही | मार्च में यहाँ फुटपाथों पर 30 ,50 , १०० रुपये तक के मास्क के ढेर लगे थे , अब भी लगे हैं |  वो अलग बात हैं कि वो थ्री लेयर नहीं थे  और  जरुरत के मुताबिक भी ,  लेकिन मास्क थे | इसलिए कोई कम से कम तब और अब मास्क ना मिलने का बहाना मार कर मास्क पहनने से इंकार नहीं कर सकता हैं | 

आज मास्क  हेलमेट की तरह हो गया है .......  सावधानी हटी दुर्घटना घटी ..... तो मेरी भी यही गुज़ारिश कि बिना मास्क घर से बाहर न निकलें .... 

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रही बाहर निकलने की बात तो आज  की स्त्रियाँ  हर ओर अपना परचम लहरा रही हैं ...... कोई भी क्षेत्र हो .... लेखन को ही ले लीजिये ....  हर तरह का लेखन हो रहा है ...... और स्त्रियाँ बेबाक अपनी बात रख रही हैं .... ... और चुनौतियाँ भी दे रही हैं .... राहुल देव  जी के ब्लॉग अभिप्राय  पर पढ़िए एक मंथन करने वाला लेख ...जिसके लेखक हैं विमल चंद्राकर .... 




स्त्री लेखन की चुनौतियाँ


आज के प्रासंगिक समय में बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है।आज स्त्रियाँ जहाँ प्रगतिवादी कविता के भीतर वैयक्तिक सामाजिक जीवन के प्रेम मूल्य को साध चुकी हैं। वे  नागार्जुनत्रिलोचनमुक्तिबोधशमशेर के प्रेम काव्य से हटकर स्त्री पुरूष संबंधो पर बेबाकी से लिखना चाहती हैं। वह छायावादी वायवीय वातावरण से कोसों दूर खास किस्म की फैंटेसी से इतर प्रणय-व्यंजना जैसे विषय को लेखन का विषय नहीं चुनती। अतएव इन सब कारणों को देख स्त्री का लेखन कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा यह अनुभूत होता है।

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एक ओर स्त्री लेखन की  चुनौतियाँ हैं ....तो दूसरी ओर ज़िन्दगी से लड़ने कि जद्दोजहद चल रही है ...... किसी  की ज़िन्दगी में सुकून नहीं  .  हर्ष महाजन जी लाये हैं अपनी दुविधा को  एक ग़ज़ल के रूप में ..... 





पर निगाहों से गिरे कैसे उठा लूँ यारो


फैसले के लिए उसने था बुलाया मुझको,

दिल में क्या बात कहा बात बता लूँ यारो ।


आस्तीनों में यूँ साँपों को मैं कैसे झेलूँ,

दो इज़ाज़त तो ज़रा बीन बजा लूँ यारो ।

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अब देखिये बीन तो न जाने कौन-कौन और कहाँ -कहाँ बजा लेगा  ....... वैसे  पूरे साल भर किसी न किसी बात की  बीन ही बजती रहती ...... कभी  मजदूर दिवस तो कभी हिंदी दिवस ....  अब तो माता पिता .....सभी के दिन मुक़र्रर हो गये हैं ...... तो हमारी चिंतनशील   ब्लॉगर  डा ०  शरद सिंह  जी एक सलाह दे रही हैं ....  अब मानें या न माने  ये आपके ऊपर निर्भर है ..... 



चलो ‘चिन्ता दिवस’ मनाएं | 


यूं भी एक दिवसीय चिन्ताओं का हमारा अद्भुत रिकॉर्ड पाया जाता है। अब देखिए न, हम हिन्दी की चिंता सिर्फ एक दिन करते हैं। उस एक दिन हम हिंदी के उद्भव, विकास, अवसान आदि सब के बारे में चिंता कर डालते हैं। यह ठीक भी है क्योंकि शेष दिनों में अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चलता। यदि इंग्लिश-विंग्लिश नहीं बनती तो हिंग्लिश से काम चला लेते हैं।

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वैसे हर कोई सलाह देने में बहुत माहिर होता है ..... कोई सुने या न सुने ..... असल में सबको दूसरों  की चिंता रहती है ... अब आज कल सब घर में रह रह कर बहुत उकता गए हैं तो धीरेन्द्र जी  चाहते हैं कि कुछ तो रचा जाये ..... लिखा जाये .... कहीं तो भावनाओं की  नदी बहे ....




गीत लिखो कोई भाव सरणी बहे
मन की अदाओं को वैतरणी मिले
यह क्या कि तर्क से जिंदगी कस रहे
धड़कनों से राग कोई वरणी मिले |

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एक ओर धीरेन्द्र जी सरिता बहाने  की बात कर रहे तो दूसरी ओर हमारी एक  अन्य ब्लॉगर  आज के हालत को देख अपना आक्रोश रोक नहीं पा रहीं .......  


अनुराधा जी अपने अंदाज़ में बता रहीं हैं कि 

मानव सो रहा


चीखती धरणी पुकारे
जाग मानव सो रहा है।
काल को घर में बुलाने
बीज जहरी बो रहा है।

अब अनुराधा जी  की रचना पढ़ कर तो जागिये .......    चलिए  आज इतना ही ........ पाँच से थोडा ज्यादा हो गया ...... सब्जी खरीदते वक़्त धनिया  पत्ती और हरी मिर्च  अलग से ले आते हैं .....बस वैसे ही .... :)  :) 


फिर मिलते हैं ......... आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा ........ शुक्रिया . 

संगीता स्वरुप . 








रविवार, 13 जून 2021

3058...दिया जैसे जलाया,रोशनी ब्रम्हांड में फैली


 प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे
तब दुगुने वेग से
दागने चाहिये सवाल
सवाल,सवाल और सवाल
अनगिनत ,अनवरत
प्रश्न ही प्रश्न पूछे जाने चाहिये
तभी यह अघोषित आपातकाल
प्रश्नकाल में बदल सकता है.

सादर वन्दे ....
आज की रचनाएँ ...

दिए का मोल करने लग गईं अनमोल आँखें
गगन में उड़ चलें लाखों पतंगे खोल पाँखें

ये मिट्टी से बना दीपक है या है धातु निर्मित
अलौकिक ज्योति इसकी कर रही है विश्व जागृत


झील सी, दो नीली आँखें,
झुकी, पर्वतों पर, अलसाई सी पलकें,
कजराए नैनों में, नींदों के पहरे,
कुछ, तुझे कहने से पहले,
जिक्र थोड़ा,
बादलों का, कर लूँ!


राम चले वनवास सखी,
नयना सबके नदियाँ बहती।
लोचन पंकज से दिखते,
सुन बात सभी सखियाँ कहती।


जो कुछ भी बिखरा हुआ है मेरे
आसपास, उन्हीं को मैंने
माना है ज़िन्दगी
का इतिहास,
कुछ
धूसर चेहरों में आज भी खेलते हैं


कवि को कल्पना के पहले,
गृहणियों को थकान के बाद,
सृजक को बीच-बीच में और
मुझे कभी नहीं चाहिए..'चाय'
आज शाम में भी चकित होता सवाल गूँजा
कैसे रह लेती हो बिना चाय की चुस्की?
.....
आज बस इतना ही
सादर नमन

शनिवार, 12 जून 2021

3057... चाय की चुस्की

 

हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

कवि को कल्पना के पहले, गृहणियों को थकान के बाद, सृजक को बीच-बीच में और मुझे कभी नहीं चाहिए..

चाय

एक गज़ल की बात हुई थी आप डायरी तक जा पहुँचे

इसी तरह तो लोग उंगलियाँ थाम, पकड़ लेते हैं पहुंचे

दीवान-ए-गालिब तो बल्लीमाराँ से है लाल किले तक

उसे ढूँढने आप यहाँ अमरीका तक कैसे आ पहुंचे

चाय की चुस्की में घुला है रफ़्ता-रफ़्ता प्यार

मुस्कुराते लबों पर सदा बढ़ता रहता ख़ुमार।

एक कुल्हड़ चाय से उतरे सिरदर्द की मार,

हो चाय सा इश्क़ भी हर दिन बन जाए इतवार

रखो अंदाज़ अपना जैसा होता है दिलदार,

छूटती नहीं तलब इसकी भले ही हो जाए उधार

एक अदद गंध, एक टेक गीत की

बतरस भीगी संध्या बातचीत की

इन्हीं के भरोसे क्या क्या नहीं सहा

छू ली है सभी एक–एक इंतहा

एक चाय की चुस्की , एक कहकहा

चाय की चुस्की

बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.

 ढूंढ़ना उसे , अपने किचन में
जहाँ  हमने साथ चाय बनाई थी
तुम चीनी कम लेते हो
ये बात तुमने उसे पीने के बाद  बताई थी
उस गरम चाय की चुस्की लेकर
जब तुमने रखा था दिल मेरा
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पुन: भेंट होगी...
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शुक्रवार, 11 जून 2021

3056...छोटी-सी ज़िंदगी में...

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

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छोटी-सी ज़िदगी में अपनी---
अनगिनत नन्हीं ख़्वाहिशों की
डोर थामे चलते जाते हैं
कुछ पूरी होती कुछ अधूरी रहती
कुछ दर्द देती बहुत
कुछ से ज़िंदगी पूरी बदल जाती है
पर नयी ख़्वाहिश करना
दिल की फितरत बदल नहीं पाते हैं
टूट कर बिखर भी जाए
नयी उम्मीद की डोर बाँध लेते हैं
समेटे गए टुकड़ों से
एक और खूबसूरत ख़्वाब सजाते हैं
जब तक जीवन का
उलझा-सुलझा-सा ताना-बाना है
जीने के लिए आशा
नयी ख़्वाहिशों का आना-जाना है
इन रंगों की आभा से
 जीवन सफ़र सुहाना है।
#श्वेता

आइये आज के रचनाओं के संसार में-

------

 कुछ ख़्वाहिशें अनछुई ही रह जाती हैं, कुछ दुआएँ हवाओं में बिखरकर गुम हो जाती हैं। जाने क्यों जुड़ जाते हैं एहसास जब तारे हैं दूर आसमां में 


अच्छा किया, तुमने मेरी 
वफा पे शक किया,
कुछ और सबक सीखने थे, 
सीख ही लिए।
-----////-----




मुस्कुराहट,आँसू,खुशी,बेबसी 
भावनाएँ महसूसना स्वाभाविक मानवीय गुण है न फिर किसी की बेरूख़ी पर भी  मौन रहकर गहन अनुभूति में गोते लगाकर रहा जा सकता है तपस्वियों की भाँति अनाहत

तुम महसूस नहीं कर पाते उसे
तुम्हारे संवेगो के चलते
भय की गुंजन से
बस वो एक अनवरत स्पंदन में है
अनियंत्रित रुप से धड़कती 
तुम्हारी धड़कने तुम्हे डरा देती है
उस लौ को बुझा देती है
----//////----




मन की तितलियों के बौराने का भी समय होता है शायद मन भी थक जाता है  पहेलियों सी भरी उम्र की यात्रा के बाद फिर नहीं भटकना चाहता बनकर खानाबदोश

कोई जंगल है जो भीतर
अनगढ़ से विचारों का
उसे बाहर लाना है
किसी ऊँची पहाड़ी पे
एक घर भी बनाना है
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किसी भी चिकित्सा पद्धति की श्रेष्ठता पर खींचा तानी और बेतुके बहस आम जनता को भ्रमित करते हैं इसलिए जब जीवन हमारा है तो विवेक और तर्क के आधार हमें जो जँचता है उस चिकित्सा पद्धति को चुनना  मर्ज़ी हमारी

बड़ा दुखद है अपनों को भुलाकर हमने गैरों को अपना लिया। गैरों को अपनाने में कोई बुराई नही ये तो हमारी सहृदयता है, सबको मान-सम्मान देने की हमारी भावनाओं ने ही तो हमें अपनी अलग पहचान दी है। मगर, इसके लिए क्या अपनों को उपेक्षित करना जरूरी था ?बिलकुल नहीं।  200 सालो की गुलामी ने हमसे हमारा बहुत कुछ छीन लिया। ये बात सत्य है कि -अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनकी गुलामी से हम कभी आजाद नहीं हुए। उन्होंने हमारी रग-रग में अपनी अपनी संस्कृति और सभ्यता भर दी और उसी में ये एक "एलोपैथ" भी है। 
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महामारी के इस दौर सीमित संसाधनों में दूसरों की मदद करने की कोशिश करना खासकर ऐसे स्वाभिमानियों की मदद की चेष्टा करना जो चाहकर भी मदद की गुहार नहीं लगा सकते उनके स्वाभिमान की रक्षा की जवाबदेही किसकी है इस

धीरे - धीरे सहायता माँगने के लिए फोन आने लगे और सहायता करने की चाह रखने वालों के भी.  सहायता पहुँचाई जाती रही. पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि किसे सहायता की गई, उनका नाम पता नहीं बताया जायेगा, न कोई तस्वीर. बस एक शर्त थी कि जरूरतमंदों को अपने आधार कार्ड की कॉपी देनी होगी ताकि रिकार्ड रखा जा सके.  जितनी जरूरत थी, उतनी ही सहायता ली गई. 
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और चलते-चलते
एक ही आसमां के नीचे विसंगतियों का डेरा है जिसे समझा गया हो अहं,  शायद वहाँ समय की गूँज में खोये आत्मसम्मान का बसेरा हो जरुरी नहीं परिस्थितियों के सूनापन में गूँथा हो  अहंकार


ज्वार में अहंकार की
धंसती फुफकारती भंवर-सी
तुम्हारी क्षुद्रता की भाटा है।
उठो, झाड़ो धूल अपने अहं की,
गिरा दो दीवार और महसूसो,
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कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।

गुरुवार, 10 जून 2021

3055...इंतज़ार कीजिए, यह वक़्त भी गुज़र जाएगा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है।

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

लो आया नया विहान...कुसुम कोठारी 

झरनों का राग,पहाड़ों की अचल दृढ़ता,

सुरमई साँझ का लयबद्ध संगीत,

नीड़ को लौटते विहंग ,अस्त होता भानु,

निशा के दामन का अँधेरा कहता।

लो आया नया विहान।।


५७६.रात... ओंकार 

ऐसे में ख़ुद को थामे रखिए,

हाथों में हाथ डाले रहिए,

इंतज़ार कीजिए,

यह वक़्त भी गुज़र जाएगा.


उदासी | कविता | डॉ शरद सिंह

इस शब्द के भीतर

है कांच की तरह टूटे हुए

ख़्वाब की किरचें

जो लहूलुहान कर देती हैं

एहसास के

हाथों को, पैरों को

बल्कि समूचे जिस्म को

लहू रिसता है बूंद-बूंद

आंसू बन कर

और देता है जिस्म के

ज़िन्दा रहने का सबूत

कैसे कहूं कि उदासी क्या है?

 

नूतन तरु के गात हो रहे... अनीता 

शब्दों को आशय तुम देते

वाणी के तुम संवाहक हो,

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


ओ री जिंदगी...सुन तो सही... संदीप कुमार शर्मा 

सोचिए
जिंदगी हार रही है
या
हम
जिंदगी हार रहे हैं।
बचपन के बाद
कभी नहीं हंसते
अब
हर पल
हम
अपने जंजाल में
खुद फंसते हैं
और

फंसते जाते हैं। 


चलते-चलते पढ़िए कुछ अलग-सा- 

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-). अन्तिम भाग)... सुबोध सिन्हा 

पर जब उसी दिन शाम तक दुबारा फेसबुक पर झाँका, तो पाया कि उनकी तरफ से हम 'अनफ्रैंड' यानी तड़ीपार किए जा चुके हैं। अफ़सोस इस बात की रही, कि हम वेब पन्ने के उस अपशब्द वाले हिस्से का स्क्रीन शॉट (Screen shot) नहीं ले पाए थे, जिसे उन किन्नर मोहतरमा की कलुषिता को प्रमाण के तौर पर, उस दिन या आज भी दिखलाने पर, उनको आदर देने वाले सभी पटना के बुद्धिजीवियों की आँखें फटी की फटी रह जाती .. शायद ...

 

आज बस यहीं 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 


रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 9 जून 2021

3054..अभी जमीर में जान बाकी है..

।। भोर वंदन ।। 
 "भोर की हर किरण को मैं बांध लेना चाहती हूँ, 
तिमिर की सारी दिशाएं लाँघ लेना चाहती हूँ। 
 बहुत दिन तक मौन रहकर फिर कहीं जो खो गया था, 
आज उस स्वर को तुम्हारे द्वार पर गुंजन करूंगी। 
एक दिन माथे चढ़ाकर मैं इसे चंदन करूंगी." 
-निर्मला जोशी 

स्वयं को उठायें और चलते रहे.. साथ ही नज़र डालें लिंकों पर.. 

कतरा के चलते थे जो कभी अपनों की नजर से 
तड़पते है मिलाने को नज़रे अब उनकी नजर से।। 

 बेवफाई की अदा में माहिर थे वो सदा से ही... 
कसूर अपना था मिल गई नज़र उनकी नजर से। 

 क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं, 
दिया दुश्मनी का जलाने लगे हैं । 
 वो चुपके से रख कर काँधे पे उनके, 
वफ़ा नफ़रतों की बढ़ाने लगे हैं .. 

दिल को, तसल्ली 
थोड़ी सी, मैंने, दी तो थी, 
अभी, कल ही! 
 पर ये जिद पर अड़ा,
रूठ कर पड़ा, 
बेवजह, दूर वो खड़ा.. 

अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाकी है ज़मीर ज़िंदा रख, 
कबीर ज़िंदा रख सुल्तान भी बन जाये तो, 
दिल में फ़कीर ज़िंदा रख 
 (अज्ञात) 

 "उदासी, संताप, कष्टों से भरा अजीब समय आ गया है। 
कुर्सी पर मायूसी से बैठे 'क' ने गहरी उसाँस भरी। 
 "समय परिवर्तनशील है। 
एक समान कभी नहीं रहता। इसमें अजीब क्या है?" 

क्यों कहते हो कि उसे छोड़ दूँ 
 अदना-सी, वह क्या बिगाड़ती है तुम्हारा? 
 मैंने समय इसके साथ ही गुज़ारा 
 इसने ख़ुद को जलाए दिया मुझको सहारा 
 इसके साथ मेरा वक़्त बेफ़िक्र रहता है 
 और जीवन बेपरवाह चलता है 
 तन्हाइयों में एक वही तो है जो साथ रहती है 
 ** 
।।इति शम ।। 
धन्यवाद
 पम्मी सिंह 'तृप्ति'.. ✍️   

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