आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
दिनकर जी आधुनिक युग के उन कवियों में से हैं, जिन्होंने काव्य जगत पर छाये हुए बादलों के कुहासे को चीरकर राष्ट्रीयता और मानवता का प्रखर प्रकाश विकीर्ण किया।
ऐसे समय में, जब देश का लेखक वर्ग राजनीतिक विचारों के आधार पर बुरी तरह विभाजित हैं, जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने में भी राजनीतिक दलों के नफ़े-नुकसान का गणित लगाया जा रहा है, यहां तक कि लोगों की जानों को भी जाति और धर्म के चश्मे से देखकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाने लगी हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
(23 सितंबर 1908 - 24 अप्रैल 1974)
को याद करना न सिर्फ़ समाज और राजनीति को नई दिशा देने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हो सकता है, बल्कि लेखकों को भी उनके दायित्व बोध का अहसास कराने में अहम साबित हो सकता है|
हिंदी साहित्य में दिनकर की पहचान राष्ट्रकवि के रूप में है। उनका साहित्य राष्ट्रीय जागरण व संघर्ष के आह्वान का जीता-जागता दस्तावेज़ है। दिनकर जी की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना कई स्तरों पर व्यक्त हुई है।
दिनकर मानव-मात्र के दुख-दर्द से पीड़ित होने वाले कवि थे. राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि था,शायद इसीलिए वह जन-जन के कवि बन पाए और स्वतंत्र भारत में उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला.
दिनकर को इस ऊँचे ओहदे पर देश की जनता ने बिठाया है।
उनके समालोचक भी दिनकर के योगदान को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए हैं। दिनकर जी की पथप्रदर्शक
लेखनी को शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं।
ज़िंदगी जिन खूबसूरत लम्हों की
तलाश में बीत गई,
काश! वे पल ठहर जाते
और ठहरती गर ये भागदौड़।
आपस की चुप्पियों और गलतफहमियों से
रिश्ते दम न तोडे
इसलिए बेहतर है कि
शिकायतें खुलकर कह दो,
किताब के पन्नों में सहेज कर रखी
अतीत की खूबसूरत निशानी,
ज़िंदगी की ढलती साँझ के साथ
धुंधला रही है।
बीता हुआ समय रीत रहा है
जिसे चाहकर भी अब वापस पाना मुमकिन नहीं।
ज़माने ने हमेशा मुझमें कमियाँ ही ढूँढ़ीं
और मेरे अस्तित्व पर
प्रश्न चिन्ह लगाया गया।
लाखों कोशिश और सारे प्रयास
व्यर्थ होकर रह गए।
पर सच तो यही है कि
यहाँ हर कोई अपनी ही
तकलीफों में पिघला जा रहा है,
अब कौन किससे मदद की गुहार लगाए?
घुट-घुटकर सिसकती
इंसानियत को देखकर लगता है—
जीवन के हर दर्द और धूप-छाँव को सहकर,
कुछ अपनों के बीच मुस्कुराकर जीना सीखा
है।
रास्ते में उदासी, बेबसी से मुस्कुरा कर मिले,
रिश्तों का मन रखने में मन अक्सर तड़पा,
पर न पॉंव थमे,न ही स्वाभिमान झुका।
आगे बढ़ते रहना ही
दृढ़ संकल्प है मेरा—
हर संघर्ष को पार करके,
अपनी मंज़िल
अब तो पाना है।
भीतर की उद्विग्नता
जालों से उलझनों के थमे कैसे
अब वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा...
अब तो शायद ईश्वर के अंतिम
फैसले का इंतज़ार है।









