शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना शर्मा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए…
मिलकर
भी तू कहाँ मिला,
पूरा
किसी जनम !
जब भी
मिला, बिखरे हुए
हालात
में मिला!
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स्वर्ग से पृथ्वी
स्वर्ग से बेहतर दिखती थी
मगर पृथ्वी से स्वर्ग
कैसा भी नहीं दिखता था
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राम की सरलता और सादगी के समक्ष
रावण अपनी विराट अनैतिकता के साथ
कद में बड़ा होने लगा है!
और हम...
सत्य को सिकुड़ते और
अहंकार को छलाँग लगाते देखते हुए,
मूकदर्शक बनने को मजबूर हैं।
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“आपका टेलर कौन सा है नलिनी। फिटिंग बहुत बढ़िया होती है आपके कपड़ों की।”
सारे शरीर पर रेंगती बॉस की ललचाई नज़रें उसे कचोट रही थीं। रोज़ रोज़ की इस बदनीयती को कब तक नज़रअंदाज़ करती रहे वह!नलिनी ने कठोर दृष्टि से बॉस को घूरा! कुछ सकपका कर बॉस ने जोड़ा, “वो मेरी बेटी दीपा कह रही थी एक दिन! किसी दिन उसे भी ले जाइयेगा अपने साथ अपने टेलर के पास!”
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इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे
सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी
भारी माहौल रहा हो, किसी
कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ
मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि
दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा
कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे
! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता
तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो
जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव





































