पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

समर्थक

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

552...रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है

जय मां हाटेशवरी...

आज बरफीली हवाएं...
कंप्यूटर पर चलती उंगलियों को...
बार-बार रोक रही हैं...
पर मेरी उंगलियां...
रुकने वाली कहां...
ठंड और दिनों से ज्यादा है...
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आस्मान बुझता ही नहीं
और दरिया रौशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक़ पे तारों का
जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं
पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के
पेड़ों की झुरमुट में
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई..पीछे देखे शामत आई
दौड़ दौड़ के खेलता है
कंघी रखके दाँतों में
आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी फटी...झीनी झीनी
बालिग होते लड़कों की तरह !
इतना ऊँचा ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर वादी में
गाँव भर का पूछते हों..
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।---गुलजार
अब पेश हैं...
आज के लिये मेरी पसंद...


" मैं स्त्री ,, मेरा वजूद प्रश्न चिह्न है "
क्या कभी जिन्दगी जिन्दा सी मिलेगी ..
औरत को आजादी परिंदा सी मिलेगी ..
क्या कभी फूलो सी मुस्कान पाएगी ,,
सच बताना ,,जिन्दगी कभी अपने कदमों से माप पायेगी
क्या कभी इमानदारी से औरत अपना वजूद पाएगी ||  --------  विजयलक्ष्मी



तुम आओगे इक रोज
फिर न रहेंगी ये दूरियां भी
हमारे दरमियाँ
कि मैंने तन्हाईयों से तुम्हारे लिए
ये कलाम भेजा है -------
ANDROID MOBILE TOP 10 TIPS
2.Baar-Baar Mobile Hang Ho Toh Kya Karna Chahiye
list of 1 items
• Agar aap apne android mobile me kuch use kar rahe hai or baar baar aapka mobile hang maar raha hai.Toh sabse pehle Home par aa jaiye.Fir Sare Application
Close kar dijiye.Ab Task MangerMe jake Clear Ram par Click kar de.Ab aapka mobile hang hona band ho jayega.
list end
गांव तुम्हारा - शहर हमारा...
            बेटे ने जवाब दिया - हमारे पास 1 dog है और उनके पास 10-10 गाये है ।
            हमारे पास नहाने की छोटी सी जगह है और उनके पास पूरे तालाब हैं ।
              हमारे पास बिजली है और उनके पास सितारे...             हमारे पास जमीन का छोटा सा टुकडा है और उनके पास बडे बडे खेत......
             हम डिब्बे का पैक बासी खाना खाते हैं, और वो स्वयं उगाकर और ताजा तोडकर खाते हैं ।
संपत्ति पर आप का कब्जा है तो आप को अदालत जाने की जरूरत नहीं।
मकान तो नाना जी का था जिसे गिराया गया था। फिर आप की माता जी और मौसी के सहयोग से बनाया गया। मामाओं का भी कुछ तो सहयोग रहा होगा। उस मकान में अब कौन कौन रहते
हैं यह भी आपने नहीं बताया। जब तक पूरा विवरण न हो पूरा समाधान भी संभव नहीं है। नानाजी अब शायद नहीं हैं। यदि हैं तो मामाजी आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते।
अब चलते-चलते आनंद लिजिये...
कार्टून :- खुदा कि‍सी की साइकि‍ल यूं न छीने.
s400/17.1.2017_Cartoon_kajal_mulayam_shivpal_smajwadi
धन्यवाद।
















बुधवार, 18 जनवरी 2017

551....क्यों खो रहा है चैन अपना पाँच साल के बाद उसके कुँभ के आने में

सादर अभिवादन
रविवार को दहेज उत्पीड़न को न सह कर पाने की वजह से
एक नव-ब्याहता ने आत्मदाह कर लिया
मन खराब था...
होईहै वही जा राम रचि राखा...

आज की परिक्रमा...


पहली बार..
कविता"एक धरा है एक गगन है"...अर्चना सक्सेना
क्यों बना लीं इतनी दीवारें
दिल में भी न झाँक हैं पाते
दर्द भरा है सभी के अंदर
ये भी नहीं जता ही पाते

ये जो पल बिताएं हैं 
हमने साथ मिलके,  
खट्टी मीठी सी यादें 
बनकर रह जाएंगे !
बस कुछ यादों में सिमट जाएंगे 

निरुद्वेग है
विराम की प्रतीक्षा
आया विमान
जिया जीवन
अब तो करना है
महा प्रस्थान

जीना चाहती थी मैं भी कभी इन तरंगों की तरह,
सुनना चाहती थी कभी मैं भी इन की मधुरता को:

महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,

उसे 
पता है 
चूहा 
रख कर 
खोदा जायेगा 
पहाड़ इस 
बार भी 
निकलेगा 
भी वही 

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे





मंगलवार, 17 जनवरी 2017

550...जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया


जय मां हाटेशवरी...
हिंदी सिनेमा के बेहतरीन गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर  जावेद अख्तर  का जन्म आज के दिन ही यानी  17 जनवरी, 1945 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के खैराबाद कस्बे में हुआ था. उन्होंने बॉलीवुड में करियर की शुरुआत बतौर डायलॉग
राइटर की थी, लेकिन बाद वह  स्क्रिप्ट राइटर और लिरिसिस्ट  बने. जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ मिलकर बॉलीवुड को बेहतरीन फिल्में दीं. इनमें जंजीर, त्रिशुल, दोस्ताना, सागर, काला पत्थर, मशाल, मेरी जंग और मि. इंडिया,
दीवार, शोले जैसी फिल्में शामिल हैं.
आज की चर्चा का आरंभ...
इनकी ही लिखी एक गजल से...
जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया
उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया
उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया
सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई
और मुझ को एक कश्ती बादबानी दे गया
ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया



 तुम भी न बस कमाल हो...

न सोचते
न विचारते
सीधे-सीधे कह देते
जो भी मन में आए
चाहे प्रेम
या गुस्सा
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो


वाईकॉम का महादेव मंदि‍र और दीपमाला-

हम मंदि‍र के अंदर वाले भाग में घुसे। वहां दोनों तरफ गणेश और कृष्‍ण्‍ा के छोटे-छोटे मंदि‍र थे। मंदि‍र के चारों ओर लोहे की कड़ी में लटकने वाले दि‍ए लगे थे,
जो प्रज्‍जवलि‍त थे। बस, अद्भुत.... एक परि‍क्रमा कर हम बाहर आए तब ते मुख्‍य द्वार पर भक्‍तों की भीड़ लग चुकी थी। पट खुल चुके थे। ताजे फूलों का श्रृंगार
कि‍ए माता की मूर्ति दि‍खी। मां नींबूू  की माला भी पहने हुई थी। हम श्रद्धा से सर झुुकाकर मां को प्रणाम कर नि‍कल गए। ऐसा लग रहा था जैसे दीपपर्व मनाया जा
रहा हो।

छाया

तू चाहे या ना चाहे
साथ नहीं छोडूंगी
तू दीपक मैं बाती
तुझसे ही
 बंधी रहूंगी |

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...-

ज़ुल्म के तंदूर में भुनी  
चिपक न जाएं कहीं आत्मा पर
जाग न जाए कहीं ज़मीर
मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आवारा है पूनम की लहरों सी 
बेशर्म सावन के बादल सी
जंगली खयालों में पनपी
सभ्यता से परे
उतार न दे कहीं झूठे आवरण

ग़मों की सरपरस्ती में...-

न जाने किस भरोसे पर मुझे माँझी कहा उसने
कई सूराख़ पहले से हैं इस जीवन की कश्ती में
हमारी देह का रावन तुम्हारी नेह की सीता
'लिविंग' में साथ रहते हैं नई दिल्ली की बस्ती में


तुलसी प्रकृति का एक अदभुत उपहार है

तुलसी तपेदिक, मलेरिया व प्लेग के कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता तुलसी में विद्यमान है शरीर की रक्त शुद्धि, विभिन्न प्रकार के विषों की शामक, अग्निदीपक
आदि गुणों से परिपूर्ण है यह कुष्ठ रोग का शमन करती है इसको छू कर आने वाली वायु स्वच्छता दायक एवं स्वास्थ्य कारक होती है ये  घरों में हरे और काले पत्तों
वाली तुलसी पाई जाती है तथा दोनों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है एक वर्ष तक निरंतर इसका सेवन करने से शरीर के सभी प्रकार के रोग दूर हो सकते हैं

कुछ ख़ामोशियां हैं

कुछ उदासियाँ हैं
तुम्हारे नाम कीं
जो आज इन पलकों
पर बिखरी पड़ीं हैं ........

लागा चुनरी में दाग

राष्ट्र-प्रतिष्ठा का सवाल था.
एक बीरबल आगे आया,
प्रभू-कान में कुछ बतलाया,
प्रभु मुस्काए, शाबाशी दी,
फिर वो गरजे -
‘बैर, फूट का साबुन लाओ
इस कलंक को अभी मिटाओ’
और दाग वह तुरत मिट गया,
तस्वीरों से कोई हट गया,
कोई आ गया.
  

आज बस इतना ही...
फिर मिलेंगे...
धन्यवाद।






















सोमवार, 16 जनवरी 2017

549......ताजी खबर है देश के एन जी ओ ऑडिट नहीं करवाते हैं

सादर अभिवादन
सोलह एक सत्रह
गणित चलता ही रहता है
आज से नौ दिन बाद
एक राष्ट्रीय पर्व आने वाला है
दिन गुज़रते जा रहे हैं और
एक के बाद एक कील
हमारे ताबूत में ठुकती चली जा रही है अनवरत..
है न गहरी बात..
किसी फिल्म का एक डॉयलाग याद आ रहा है
जब ज़िन्दगी के दिन कम बचे होें तो डबल जीने का...
ये फिलासफी यहीं तक....
आगे बढ़ते हैं.....

जरा सा चूमकर, उनींदी सी पलकों को,
कुछ देर तक, ठहर गई थी वो रात,
कह न सका था कुछ अपनी, गैरों से हुए हालात,
ठिठक कर हौले से कदम लिए फिर,
लाचार सी, गुजरती रही वो रात रुक-रुककर।

शिव, अपना तीसरा नेत्र खोलो,
तो कुछ ऐसे देखना 
कि जल जाय एक-एक कर सब कुछ,
पर बची रह जाय आख़िर तक 
जाड़े की यह गुनगुनी धूप.

प्रीत पुरानी 
यादें हैं हरजाई 
छलके पानी। 

नेह के गीत 
आँखों की चौपाल में 
मुस्काती प्रीत


दुश्चिंता.... साधना वैद
ज़िंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर
अब तक चलती आई हूँ
तुम्हारा हाथ थामे !
कभी हाथों में संचित
चंद पाँखुरियाँ बिछा कर


आंसुओं का बोझ...मंजू मिश्रा
देखो...
तुम रोना मत 
मेरे घर की  दीवारें
कच्ची हैं 
तुम्हारे आंसुओं का बोझ 
ये सह नहीं पाएंगी 


उस पार का जीवन... सुशील कुमार शर्मा
है शरीर का कोई विकल्प
या है निर्विकार आत्मा
है वहां भी सुख-दु:ख का संताप 
या परम शांति की स्थापना।


आज का शीर्षक.......
ना थाने 
जाते हैं 
ना कोतवाल 
को बुलाते हैं 
सरकार से 
शुरु होकर 
सरकार के 
हाथों 
से लेकर 
सरकार के 
काम 
करते करते 
सरकारी 
हो जाते हैं । 

मेरे व्यथित दिमाग ने एक गलती कर डाली है
सभी को सत्रह तारीख की सूचना दे दी हूँ
नज़रअंदाज कर दीजिएगा

इज़ा़ज़ मांगती है यशोदा

इस डांस को देख कर मन हलका कर लीजिए

















रविवार, 15 जनवरी 2017

548..जिंदगी कुछ यूँ भी सँवर जाती ...

      नमस्कार  दोस्तो 

सुप्रभात 
आज 15 जनवरी को प्रस्तुत है 548 वी पोस्ट. ...✝✝✝
आज की सलेक्ट की हुई  पांच लिंक. ....✝✝✝

अब पछताये क्या होत - कहानी




विनय के घर आज हाहाकार मचा था .विनय के पिता का कल रात ही लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया .विनय के पिता चलने फिरने में कठिनाई अनुभव करते थे .सब जानते थे कि वे बेचारे किसी तरह जिंदगी के दिन काट रहे थे और सभी अन्दर ही अन्दर मौत की असली वजह भी जानते थे किन्तु अपने मन को समझाने के लिए सभी बीमारी को ही मौत का कारण मानकर खुद को भुलावा देने की कोशिश में थे .विनय की माँ के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .बच्चे और पत्नी इधर उधर के कामों में व्यस्त थे ....नहीं थी तो बस अवंतिका.....

जिंदगी कुछ यूँ भी सँवर जाती .






तुम्हारे रुखसार पर घिरी 

ये जुल्फें जरा सिमट जातीं 
चांदनी कुछ और निखर जातीं 
ये रात शबनमी यूँ ही बरस जाती 




निबाह ज़रूरी है - -

आसपास यूँ तो आज
भी हैं ख़ुश्बू के
दायरे,
गुल काग़जी हों या
महकते हुए
यास्मीन,
निबाह ज़रूरी है
मुख़ौटे हों या
असल
चेहरे। बर ख़िलाफ़
क़ुदरत के यूँ 




झरना

झर् झर् झर् झरता है झरना .
सर् सर् सर् बहता है झरना ,
पर्वत के अन्तर में पिघली ,
करुण-कथा कहता है झरना .

रात और दिन झरे निरन्तर .
धरती को जल देता भर भर.
पत्तों को हँसना सिखलाता ,
बंजर को भी करता उर्वर .
खुद ही अपनी राह बनाता ,
अपनी धुन रहता है झरना .
झर् झर् झर् झरता है झरना .



    

व्यंग्य / "साइकिल" जो किसी फेरारी, लैंबॉर्गिनी , बुगाटी या रोल्स रायल से कीमती है ! / विवेक रंजन श्रीवास्तव

हमारी  संस्कृति में पुत्र की कामना से बड़े बड़े यज्ञ करवाये गये हैं . आहुतियो के धुंए के बीच प्रसन्न होकर अग्नि से यज्ञ देवता प्रगट हुये हैं और उन्होने यजमान को पुत्र प्राप्ति के वरदान दिये . यज्ञ देवता की दी हुई खीर खाकर राजा दशरथ की तीनों रानियां गर्भवती हुईं और भगवान राम जैसे मर्यादा पुरोषत्तम पुत्र हुये जिन्होंने पिता के दिये वचन को निभाने के लिये राज पाट त्याग कर वनवास का रास्ता चुना . आज जब बेटियां भी बेटों से बढ़चढ़ कर निकल रहीं है , पिता बनते ही हर कोई फेसबुक स्टेटस अपडेट करता दीखता है " फीलिंग हैप्पी " साथ में किसी अस्पताल में एक नन्हें बच्चे की माँ के संग तस्वीर लगी होती 


आज्ञा दिजिये 
को

शनिवार, 14 जनवरी 2017

547..... खिचड़ी



Image result for पतंग कविता







सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

अरवा चावल ,तील ,गुड़ ,अदरक
मिश्रण प्रसाद में खिलाते रिश्ते उपचारक

दही-चुडा ,लाई ,तिलकुट के संग
मनाते भी हैं और हम आज खाते भी हैं 
















Image result for खिचड़ी पर कविता




पतंग



Image result for पतंग कविता




मकर संक्रांति की असीम शुभकामनायें



फिर मिलेंगे ... तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव





शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

546.....विश्व हिन्दी दिवस और शब्द क्रमंचय संचय प्रयोग सब करते हैं समझते एक दो हैं

सादर अभिवादन
तेरहवाँ दिन
साल सत्रह का
नया तो दिखता ही नहीं
राग वही पुराना ही है

आज जो मैं पढ़ी  अब तक...


रोमन में हिन्दी लिखी, रो मन बुक्का फाड़।
देवनागरी स्वयं की, रही दुर्दशा ताड़।
रही दुर्दशा ताड़, दिखे मात्रा की गड़बड़।
पाश्चात्य की आड़, करे अब गिटपिट बड़ बड़।

सुनार कहे वह सोना, डॅाक्टर बताये वह दवाई और मैडिकल स्टोर वाला माँगे वही दवा का दाम - यही नियति रही है हम लोगों की। मगर कुछ युग-दृष्टा ऐसी नियतियों को तोड़ते भी हैं। जिन दिनों हिन्दुस्तान टू जी थ्री जी फोर जी एट्सेक्ट्रा से गुज़र रहा था उन्हीं दिनों एस वी सी फाउण्डेशन वृहत्तर सामाजिक लाभार्थ कुछ करने के प्रयत्नों में लगा हुआ था। 

दिल में दर्द बहुत है लेकर थोड़ा मरहम आ जाओ
वक़्त नहीं होगा तुम पर तुम जो है वापस ले जाओ ।

अश्क़ो की जागीर भरी है थोड़े मोती हैं बाकी
छोटा सा झोला भर लो और बाकी फेक चली जाओ।

मुझे रहने दो मेरे घर मे अकेले
ये बखूबी जनता है मेरे मिज़ाज
जब भी ख्याल बिखरते हैं
बटोर कर सहेज लेता है उन्हें

कलियाँ बनकर पुष्प, आखिर झड़ रही,
वक्त की इस बेरहम, तलवार से ।।

हूँ   तड़प   उठता ,  अकेले  में  कभी,
क्या मिलेगा जिंदगी के , सार से।।

क्यूँ दौड़ लगाऊँ भला तुम्हे पाने को 
तुम तो चल ही रही हो ऊँगली पकडकर मेरी 
मैं चाहूं तो भी ..नहीं थाम सकती तुम्हे 
सबकुछ तुम चाहो तभी तक  

तनाव ओढ़ता है और तनाव ही बिछाता है
सुना है नौकरी करने कार्पोरेट दफ्तर जाता है।

नफे,नुकसान का सजा बाजार है हरदम
रेशमी बातों से यहाँ कारोबार किया जाता है

आज का शीर्षक क्या कह रहा है देखिए ज़रा..
सारे वादों के 
ऊपर का 
वाद होता है 
‘उलूक’ 
तेरे जैसे 
कई होते हैं 
अवसर 
मिलता है 
और 
दूसरों को 
देख हमेशा 
आँख मलते हैं 

आज्ञा दें यशोदा को
सादर














Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...