निवेदन।


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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

4889.... अंतिम शब्द

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आप हमेशा हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे।

तोड़ बंधन श्वासों का, हुआ मौन देह गीत, 

स्मृतियों के ऑंगन में अब गूॅंजेगा चिर संगीत।

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"आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने..."

फिल्म 'क्रांतिवीर' का यह कालजयी संवाद जैसे ही कानों में गूॅंजता है, मानसपटल पर भारतीय सिनेमा के एक ऐसे अद्भुत और अद्वितीय कलाकार की छवि उभरती है, जिसकी अभिनय शैली की कोई सानी नहीं है। रंगमंच से लेकर रूपहले पर्दे तक, नाना पाटेकर ने हर किरदार में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। उनका बोलने का लहजा, उनके संवादों का अनूठा उतार-चढ़ाव और उनकी ऑंखों की तीव्रता दर्शकों को पूरी तरह झकझोर देती है।

नाना पाटेकर सिर्फ संवाद नहीं बोलते, बल्कि वे हर शब्द की गहराई को जीते हैं। समाज की विसंगतियों और व्यवस्था के खोखलेपन पर प्रहार करते हुए जब वे 'यशवंत' फिल्म में अपने चिर-परिचित अंदाज में कहते हैं— "एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!" —तो वह केवल एक फिल्मी लाइन नहीं रह जाती, बल्कि आम आदमी की बेबसी और व्यवस्था के खिलाफ एक तीखा व्यंग्य बन जाती है। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अपहरण' जैसी फिल्मों में उनका गंभीर और आक्रामक रूप जितना सराहा गया, 'वेलकम' जैसी व्यावसायिक फिल्मों में उनकी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग ने भी दर्शकों को उतना ही लोटपोट किया। 

एक अभिनेता के रूप में उनकी महानता केवल कैमरे के सामने तक सीमित नहीं है। वास्तविक जीवन में उनकी सादगी, संवेदनशीलता और 'नाम फाउंडेशन' के माध्यम से किसानों की मदद करने का उनका जज्बा उन्हें समाज का एक सच्चा नायक बनाता है। सिनेमा के मंच से लेकर जीवन के यथार्थ तक, उनका व्यक्तित्व हमें यह याद दिलाता है कि— "भगवान का दिया हुआ सब कुछ है, दौलत है, शौहरत है, इज़्ज़त है...", लेकिन इन सबके बीच अपनी ज़मीन और इंसानियत को कभी नहीं भूलना चाहिए। नाना पाटेकर का काम और उनकी निर्भीक कला आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।

किसी ने बिल्कुल सच कहा है कि

एक कलाकार सदैव अमर रहता है।

नाना भी बेहद सम्मान से सदियों तक याद किये

जाते रहेंगे।


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आज की रचनाऍं-














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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

4888...हे पुरुष! तुम नहीं पढ़ पाए तो सिर्फ और सिर्फ स्त्री- मन...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.अंजुल चौहान जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मानो उसने चुरा लिया उर

मची खलबली जिस अभाव से

संग लिए उसको उर फिरता,

एक विचित्र खेल ज्यों चलता

स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता!

*****

आवाज़

मरुस्थल चुप था,

पर उसकी चुप्पी में

कुछ था

जो रेत नहीं थी।

 उठती आँधियाँ

ग़ुस्सा नहीं,

मरुस्थल की

गर्म साँसें थीं।

*****

1532 हे पुरुष!/डॉ.अंजुल चौहान 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए

तो

सिर्फ  और सिर्फ

स्त्री- मन

और

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

*****

तो तब तक बस इंतज़ार...

जिस दिन हम हवा से बादल,

और बादल से बिजली बनेंगे ,

हम दिखाई भी देंगे ,

हम सुनाई भी देंगे I

तो तब तक बस इंतज़ार...

*****


अवसरवादी-एक लघु कथा

"वकील झूठ बोलते हैं" कहने वाले लाला जी को जब एक सिविल केस में कोर्ट में जाना पड़ा तो अपने वकील की दलीलों पर अपने वकील से हाथ मिलाते हुए बोले "NICE"

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

4887..बह रही हर नाव..

।।भोर वंदन।।

 "लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से

बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से

आदत न रही कुछ लिखने की

निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से

कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम

मेरा धन है स्वाधीन कलम.."

गोपाल सिंह नेपाली

नजर डालें आज की प्रस्तुति पर..✍️

बिडम्बना

टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को 

काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को 

बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को 

मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll

✨️

वो शहर "



तूफ़ान सुबहों में भरा हर रात में बहाव है

दरार सीने में लिए बह रही हर नाव है

गांव की नींदों में हरदम शहर के सपने रहे

शहर की आँखों में अब बस जागता एक गाँव है

✨️

खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,

वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।

इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,

अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।

✨️

जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का

ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगते दवा उसे अपने मर्ज़ का

कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से

जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे ग़ज़ल बज़्म में मर्म का,..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️


मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

4886...चीख़ का कारोबार....

 मंगलवारीय अंक में

आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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जब-जब एशियन गेम्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा ऊपर उठता है और राष्ट्रगान बजता है, तो वह केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं होती, बल्कि देश की करोड़ों उन

नन्हें-नन्हें सपनों की जीत होती है

जो अपने पैरों पर खड़े होने और कुछ बड़ा करने का निश्चय करती हैं।

​एशियन गेम्स के मंच पर भारतीय महिला एथलीटों ने जिस निडरता और प्रतिबद्धता के साथ अपने हुनर का प्रदर्शन किया है, उसने देश के खेल इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। शूटिंग और एथलेटिक्स से लेकर बॉक्सिंग, हॉकी और तीरंदाजी तक—हर स्पर्धा में बेटियों ने न केवल पदक जीते, बल्कि यह संदेश भी दिया कि भारत की खेल क्रांति का नेतृत्व अब वे खुद कर रही हैं।

​इन बेटियों का यह ऐतिहासिक प्रदर्शन आने वाली पीढ़ी के लिए एक मजबूत नींव की तरह है।

शाबाश, लड़कियों हमें गर्व है तुम पर।


आज की रचनाऍं- 

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

4885 ...शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है

 सादर अभिवादन

चल गया सितंबर भी


उसका भी समय आ गया था
मुझे भी अभी लगा कि अक्टूबर में तो हम हैं
अक्टूबर है  दो-दो उत्सव मनवा कर ही जाएगा
पूरे 31 दिन रहेगा

देखिए रचनाएं....





स्मित माछर 
जैसे बेटों पर है 
गर्व तिरंगा को,
यहीं भीष्म सा 
बेटा मिलता 
मुक्तिदायिनी गंगा को,
गीता पढ़कर 
वंशी सुनती 
वृंदावन की शाम लिखो.




30 दिन का यह सफर 
किसी साल सा बीतता है 
जाने कितनी सदियों का दुख 
सितम्बर के सीने में दफ्न है





मिट जाने का सुख अनुपम है 
मिट कर ग़र यह जान सको तो, 
खोकर ही पा सकता कोई 
सूत्र अनोखा मान सको तो !





किसी  की  बंद  मुट्ठी  खुल  गई है,
बची थी साख जो कुछ,धुल गई है।

अगर  सब  ठीक  है तो  ये बताओ, 
चमन को छोड़ क्यों बुलबुल गई है?




मेहमानों के आने से पहले टमाटर का गाढ़ा-गाढ़ा स्वादिष्ट सूप तैयार हो गया था । मेहमान आ चुके थे और डिनर का पहला कोर्स सूप ही था । पंकज सबके साथ बैठा हुआ बेमन से किसी तरह उस सूप को गले के नीचे उतार रहा था । उसे फिक्र हो रही थी कहीं इस सूप की वजह से वे लोग ऋतु दीदी को रिजेक्ट ना कर दें । तभी मेहरा साहब की बुलंद आवाज गूंजी । "भाभी जी आपने घर में बनाया है यह सूप ? भई वाह । मज़ा आ गया । ऋतु बिटिया को सिखाया है या नहीं आपने यह सूप बनाना । आपने तो दिल ही जीत लिया । बिटिया को अच्छी तरह प्रैक्टिस करवा दीजिएगा। शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है ।"


सादर समर्पित
वंदन

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

4884...जीवन टूटा शहर बना...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नीरज कुमार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …

हवा सर्द मौसम के नश्तर हों जैसे,
खिली धूप जैसे के जाड़ों की मरहम.

चिनारों पे फ़ुर्क़त के लम्हे मिलेंगे,
सुलगते हैं यादों की सिगड़ी में तुम-हम.

*****

भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है

वही चेहरे, वही हँसी, वही बाल मन लेकर आओ लौट चलें उस सावन में,
जहाँ फिर से वही बचपन मुस्कुराएगा, कमला नेहरू के इस पावन प्रांगण में!
पचास-साठ के पार हुए पर, दिल बचपन में खोया है,
भूले-बिसरे कमला नेहरू के दिनों को याद करने का दिन आया है!
हाँ, यादों के उसी पुराने आँगन में, फिर से खो जाने का दिन आया है...

*****

फलक


मैं अपनी तूलिका से बना दूँगी वहाँ

महकते फूल सितारे दमकता चाँद

और खूब सारे हंसते खिलखिलाते

चेहरे मासूम बच्चों के…!!

*****

अना

वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे

तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?

 

कैसे होगी जीत बाज़ी की तब,

जब दाँव अपना बेमाना रखोगे !!

*****

सोचा था एक घर बना लूंगा...

न घर बना  ना असर बना ,

जीवन टूटा शहर बना I

****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

4883..ढूँढ़ रहे हैं प्रीत..

 शनिवारिय भोर और साहित्यिक सृजन की पेशकश कुछ इस प्रकार से ..✍️


फासले चाँदनी स्पर्श बँधी थी हर जानिब ख्वाहिश राग सी I
सन्नाटे हर लहजे साजिश छवि थी कादंबिनी सर्द रात सी ll

सीते सीते दर्द किताब रूह पैबंद सिमटी चटक गांठ सी l

बिखरे आईने एक अपरिचित ताबीर थी अमावस रात सी ll

 ✨️
मैं चला आऊँगा
बिना साँकल बजाए
आँगन के फूलों को सहलाकर
खिड़की से होकर
बनकर हवा का झोंका,
बैठ जाऊँगा
अपनी व्हील चेयर पर...
✨️

हार मिली कि हार मिला, दोनों है स्वीकार।
एक हार में सीख तो, एक हार श्रृंगार।।

हार जीत कुछ भी नहीं, यह मन का विज्ञान।
हर चीजों का स्वाद है, अलग अलग श्रीमान।।
✨️



न था, न हुआ, न शायद होगा 
मानवता के प्रति 
तुम्हारी निष्ठा को प्रणाम 
बापू तुम्हें प्रणाम ! 
✨️



कहते दुख में डूबकर, मिला न सच्चा मीत।
स्वारथ मन में है भरा, ढूँढ रहे हैं प्रीत।।  

ढूँढ रहे हैं प्रीत, प्रेम की बात न जाने।
छल-छद्मों में डूब, प्रेम को सौदा माने

कहे सुधा सुन मीत, परख जो निज मन लेते,  
बनते सच्चे मीत, मित्र हित बात हैं कहते।।  


✨️
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
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