सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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सोमवार, 13 जुलाई 2026
4802 ..दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से
रविवार, 12 जुलाई 2026
4801...निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।*****शिवालयअसल में प्रेम ही शिव है
जब भीतर जागता है प्रेम
मन ख़ाली हो जाता है
सारे भेद मिट जाते हैं
श्वासें गढ़ती भीतर
वह मंदिर
जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती
*****
अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे
तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था
सियासत में वो नफरत बो रहे हैं
जिन्हें बस प्यार बोना चाहिए था
*****
12 जुलाई 2009 की तड़के नक्सलियों ने मदनवाडा़ कैम्प के दो जवानों को तब गोली मारी, जब वो शौच के लिए गए थे। इस घटना की खबर मिलने के बाद मैं, मेरे साथी पत्रकार कमलेश सिमनकर और दूरदर्शन के रिपोर्टर भाई परमानंद रजक के पुत्र युवा पत्रकार लोकेश रजक के साथ मानपुर और मदनवाडा़ के लिए रवाना हुआ। तब तक हममें से किसी को नहीं पता था कि मदनवाडा़ में नक्सलियों ने जो किया, वो सिर्फ एक ट्रेलर था, नक्सलियों ने कुछ बडा़ करने की तैयारी कर रखी थी। 12 जुलाई 2009 की उस रविवार की सुबह अपने दो जवानों की शहादत की खबर मिलने के बाद राजनांदगाँव के पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे खुद घटनास्थल के लिए निकले और नक्सलियों ने मानपुर से कुछ ही दूर कोरकोट्टी में राजनांदगाँव जिले के इतिहास का सबसे बडा़ खूनी खेल खेल दिया।*****डायरी के पन्नों से : कार्यशाला - प्रकृति संग्रहालय की स्थापनाशनिवार, 11 जुलाई 2026
4800..फिर क्यों नफरत के सौदागरों ने हर आँगन में जहर फैलाया
सादर अभिवादन
शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
4799 ..तुम्हारी पलकों पर अब वे ख़्वाब रखेंगे
सादर अभिवादन
फिर वे बारी-बारी से अपनी जगह बदल रही थीं ताकि हर किसी को आराम मिल सके।
गुरुवार, 9 जुलाई 2026
4798... स्पर्शजन्य अनुनाद दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है
सादर अभिवादन
बुधवार, 8 जुलाई 2026
4797.. सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...
।।प्रातःवंदन।।
अलि रचो छंद !
आज कण-कण कनक कुंदन,
आज तृण-तृण #हरित चंदन,
आज क्षण-क्षण चरण वंदन
विनय अनुनय लालसा है।
आज वासन्ती उषा है।
अलि रचो छंद !
सोहनलाल द्विवेदी
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढाते हुए..
जब नयनों में नींद नहीं थी
उसका ही तो ख़्वाब बसा था,
सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से
मन का आँगन पूर्ण भरा था !
✨️
अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है..
✨️
बादल भरी
उमस से भरपूर सुबह।
छोटे बच्चे
अपनी मस्तियों को
लगा चुके हैं तह ..
✨️
लूडो के सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...
कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है।
एकबारगी दो-तीन चाल में
हम सांपों से बचकर,
छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर
लाल होने तक पहुंच जाते
और रख चुके हैं
बीते जून ..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
4796...संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के...
मंगलवारीय अंक में
जीना आसान नहीं है,
यह कॉंटों का बिछौना है
मखमली कोई दालान नहीं है।
हर सुबह एक नया इम्तिहान लाती है,
उम्मीदों की पोटली पीठ पर बांधे,
हमें दौड़ना है अंधाधुंध
जिसकी कोई अंतिम रेखा ही नहीं।
ख्वाब कांच की तरह टूटते हैं,
और उनकी किरचें पैरों में नहीं,
सीधे रूह में चुभती हैं।
अपनों के बदले चेहरे,
और वक्त की बेरुखी,
कभी-कभी भीतर तक सब सुखा देती है।
पर शायद,
इस मुश्किल में ही जिंदगी का असली स्वाद है।
आंसुओं से भीगे चेहरे पर
जब एक छोटी सी मुस्कान खिलती है,
जीना आसान तो नहीं है, बिल्कुल नहीं,
लेकिन इस कांटों भरे रास्ते पर
अपने पैरों के निशान छोड़ जाना ही...
जिंदगी है शायद...।
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
अलगनी पर दिन भर टँगी
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई
रात भर चैन की नींद आई ।
भोर उजियारी चुनौती लाई
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई
छाँव बिन धूप रास न आई ।
“मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगी—पहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।”
उस दिन भी रोज की तरह नशे में झूमता शराबी आया और मंदिर का घंटा बजाने लगा। घंटा बजाने से पहले वह एक क्षण के लिए रुका। उसने एक नजर सामने देखा और फिर घंटा बजाने लगा। फिर वही सारी क्रिया दुहराई जो वह रोज करता था। मंदिर से निकलने से पहले उसने गणेश जी की ओर देखा और बोला, छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे। इतना कहकर वह निकल गया।














