निवेदन।


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रविवार, 17 मई 2026

4745...अभी शेष है युद्ध कला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच रचनाएँ-

भार्गव राम (खण्डकाव्य) - 9

राजर्षि कहें अब  राम  से,

अभी शेष  है  युद्ध कला।

आह्वान ही दिव्यास्त्रों का,

अरु प्रयोग है  युद्ध कला।।

*****

किताबें

किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है

कभी-कभी सच को छिपाकर

खेल खिलाती हैं।

*****

अनछुआ शिकवा  

सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से,

मैं हारा तो तुम जुदा हुईंदिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।

 अदाओं की नर्मी में ठहराव होता है असल शजर का,

तुम्हारे लहजे से साफ़ ये लगता सलीक़ा छूटा हुआ है।

*****

मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी होता है 

प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती

रेशों  रेशों, धानों धानों छिटक तिनके

अंक भर अपने प्रात लेती, हिये की संवेदी

निकृष्ट विचार न मैल रहे,

*****

सभ्यता के च‍िन्ह हैं भोजशाला के ये साक्ष्य.. हम अपनी धरोहरों के ल‍िए कोर्ट का मुंह ताकने को क्यों बाध्य हैं

मांडू में शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। "विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट "परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए।

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-"धार एंड मांडू।' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 16 मई 2026

4744 ..पीड़ा से ही परिचय था जब गुरु आनंद मित्र बन आया

 सादर अभिवादन



पिछले 10 दिन तक हम सब अपनी श्वेता के पितृ शोक शामिल थे, कल लगभग महीने भर बाद
शांत हृदय से  श्वेता ब्लॉग जगत में पुनः आई 
अपनी वेदना 
 लेकर, उनकी इस लेखनी को नमन...

.....लिखा नहीं जा रहा था उनसे
अनुभव नहीं न था उनको अपनी पीड़ा को व्यक्त करते उनकी लेखनी लड़खड़ा रही थी
 
धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता का परत चढ़ा रही है। 
पिछले कई दिनों से ऐसा लग रहा है कि मैं किसी श्मशान के प्रतीक्षालय में बैठी हूॅं।
तीव्र होती मृत्यु की गंध धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता का परत चढ़ा रही है। 
पापा की अनगिनत बातें,उनकी यादें दिल-दिमाग से लगाए बस सोचती रही 

और रात को अस्पताल से वापस लौटकर थोड़ा सा लेटी ही थी कि CCU  से
फोन आ गया कि "आ जाइये"।
पापा चले गये...
आधी रात को जब पापा को बर्फ़ पर लिटाकर लौटे तो मन 
उन्हीं के पास मंडरा रहा था कैसे रात बीती कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला।
पढ़िए और महसूस कीजिए उनके दुःख को....
***



चाहे हो कोई ऐरा-गैरा, या हो कोई खास यहाँ,
वक़्त पड़ने पर एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं बेसाख्ता यहाँ।
गर की किसी ने ऐसी-तैसी, तो मान-सम्मान सब जाता है,
पर जो सबको एक लाठी से हाँके, वही असल में पछताता है।




तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."





मुद्दत से दिल में थी प्यास 
जाने कब पूरी हो आस 
मिल कर जब बैठेंगे पास 
बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !







धूप के ज़ेवरों से घर सदा जगमगाऊँ मैं, 
तपिश-ए-दहर से आँगन को बचाये हूँ।

किरन की ओट में रखकर मैं साया बुन रहा हूँ, 
नज़र से धूप की हर चाल को उलझाये हूँ।





पीड़ा से ही परिचय था जब 
गुरु आनंद मित्र बन आया,  
ह्रदय को श्वासों की डोर में 
पिरो के चारु हार बनाया ! 




यूँ तो मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, आजन्म निःस्वता ही
है मेरी पहचान, फिर
भी वो कहते हैं
मेरे पास
है अंतहीन सपनों की ज़मीन
और एक मुट्ठी भर
आसमान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान ।
***
सादर
कल मिलिएगा भाई रवीन्द्र जी से
वंदन

शुक्रवार, 15 मई 2026

4743...सभी तो ऊर्जा है

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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लौटना फिर से
अनजानों की भीड़ में
आसान नहीं
जहां आपके इंतज़ार में
कोई न हो....
 
यादों की छाँव में बैठे अक़सर सीते हैं कुछ टीसते घाव,
हँसाते कभी रूलाते हैं, नहीं भुलाये जाते क्यों दर्द के पाँव..।
-------
आज की रचनाऍं-


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!




लपेटा उँगलियों पे तुमने जो वो दुपट्टा कुछ शरमाकर, 
तुम्हारी बेवफ़ाई का हर इक शिकवा अब छूटा हुआ है।
 
सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से, 
मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।
 

इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास, 
फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास



हालांकि उस समय अष्टावक्र और श्वेतकेतु की उम्र बहुत कम थी। मामा-भांजे दोनों किशोर ही थे। राजा जनक ने गंभीरता से अष्टावक्र से पूछा कि आप क्यों हंस रहे हैं? अष्टावक्र ने राजा जनक से पूछा कि महाराज! आप बता सकते हैं कि आपके दरबारी क्यों हंस रहे थे। 


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 14 मई 2026

4742..बच्चे छुट्टियाँ मना कर अपने अपने ठिकाने गए

 सादर अभिवादन


गुरुवार सप्ताह का पांचवा दिन है। इसे बृहस्पतिवार, वीरवार या बीफ़े भी कहा जाता है। 
यह बुधवार के बाद और शुक्रवार से पहले आता है। मुसलमान इसे जुमेरात कहते हैं क्योंकि
यह जुम्मा (शुक्रवार) से एक दिन पहले आता है।

बृहस्पति को देवताओ के गुरु माना जाता है,
अत: इस दिन को गुरुवार भी कहा जाता है।

रचनाएं



उपासना सियाग एक ख्यातिप्रात रचनाकार
ने लिखना कम कर दिया है
कुछ जूनी रचनाएं उनकी इस अंक में है
उनको कृपया लिखने पर मजबूर करें
*****



दादा - दादी टीवी के आगे बैठे हैं । 
दादी - " चीवी चांऊ (टीवी चलाऊं) ?" 
दादा जी - " हाँ...
" दादी - " मिक्की माउछ चांऊ ! 
दादा जी -" नहीं ऐलीफैत चाओ !" 
दादा - दादी का सम्मिलित ठहाका गूंजा , लेकिन आंखों में नमी थी 



कोरे काग़ज़ पर
सिर्फ़ एक प्रश्नचिह्न।
जवाब के बिना
हर सवाल है अधूरा ।
सवाल पर औंधा लटका
कोई कैसे जिए ?





दिल को दिल से राह !
अरे सब झूठी बातें हैं ।
चिन्तन में केवल छल बल
और मन में घातें हैं ।
नेह वचन विश्वास कि जैसे
माट-मटूने री ।





ईशान कोण के
उस पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना । अभी बहुत दूर है मुहाने का प्रकाश स्तंभ,
पहाड़, तलहटी, ग्राम
शहर, पुरातन
मंदिर,
उदास से खड़े हैं दोनों पार असंख्य आशातीत 




सोचती हूँ कभी- कभी 
इंतज़ार वाली तकदीर लिए
रखती होगी
ये छब्बीस- सताईस पौरवे वाली
उंगलियाँ। 






कॉमरेड कुलकर्णी ने प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, तुमने जो रैंडम सर्वे किया था, उसके आधार पर और तकनीक के क्षेत्र में परिवर्तनों के आधार पर तुम्हारी राय क्या है?"

प्रिया ने अपना टैबलेट खोला और डेटा दिखाते हुए कहा, "सर, आज स्थिति यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है. इस फैक्ट्री ने पिछले चार-पाँच सालों से अपनी तकनीक में कोई विकास नहीं किया है. जिसके कारण इसका मुनाफा नई इकाइयों की अपेक्षा कम हुआ है. इसके ग्राहकों की संख्या कम हुई है, क्योंकि सब अपने उत्पादनों में एडवांस आई. सी. लगाना चाहते हैं. नयी इकाइयों के साथ बाजार में बने रहने के लिए इन्हें अपनी तकनीक का नवीनीकरण करना होगा, जिसमें इन्हें पूंजी लगाना होगा. संभवतः इसीलिए कंपनी इस इकाई को बंद करके इसकी जमीन को औद्योगिक आवासीय या व्यवसायिक में परिवर्तित करवाकर बिल्डरों की मदद से अच्छा मुनाफा काटना चाहती है. वह मामूली पूंजी लगाकर किसी नए औद्योगिक क्षेत्र में बैंकों से 70-80 प्रतिशत सस्ता ऋण लेकर नयी यूनिट लगाने की जुगत में है. वहाँ कंपनी को अच्छी सब्सिडी मिल जाएगी और अनेक प्रकार के टैक्सों से कम से कम पाँच साल के लिए छूट मिल जाएगी. कंपनी का यही प्लान है 



युवक झल्लाकर बोला,
"जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं तो हम क्यों अजमेर शरीफ की 
दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।"
महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली,  "देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। 
ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।"
युवक की माँ मुस्कुराते हुए बोली, 


खर्च कम किया जाए पर कैसे
पर बाजार तो बाजार है, 
उसने हर पावन त्यौहार, समारोह, परंपरागत उत्सव सभी को 
अपनी गिरफ्त में ले लिया है 
और लेता जा रहा है.....

सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 13 मई 2026

4741..यादों की राख गर्म है..

।।भोर वंदन।।

 "एक किरण आई छाई,

दुनिया में ज्योति निराली

रंगी सुनहरे रंग में

पत्ती-पत्ती डाली डाली !

एक किरण आई लाई,

पूरब में सुखद सवेरा

हुई दिशाएं लाल

लाल हो गया धरा का घेरा !

~ सोहनलाल द्विवेदी  

  आज की पेशकश में शामिल रचनाए ✍️

शाख़-ए-वजूद

कुछ इस तरह फुसफुसाती है हवा,
शायद कोई ग़ज़ल सुनाती है हवा।

सुकून फिर भला कैसे नसीब हो,
ज़ख्मों को रोज़ छेड़ जाती है हवा।

यादों की राख अब भी गर्म है कहीं,
धीरे-धीरे फिर सुलगाती है हवा।

✨️

अमेरिकी जादूगर के नीले जादू की क़ैद में

हिमाचल..!!

दुनिया भर के लोगों को अपने श्वेत-बर्फीले हुस्न, आकाश छूते चीड़-देवदार और प्रकृति के हरियाली भरे श्रृंगार से अपनी ओर खींचने वाला हिमाचल प्रदेश इन दिनों एक अमेरिकी जादूगर के नीले जादू के मोहपाश में बंधा हुआ है। आमतौर पर जादूगर वैसे तो काला जादू करते हैं लेकिन इस विदेशी..

✨️

बोझिल मन !

अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,

इक ज़माना था जो हम गाते,

तय पथ था और सफ़र अटल,

उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।..

✨️

विषय

विषयों की तलाश में 

भटकता हुआ 

किसी कोने में 

कहीं अटकता हुआ 

बेसुध सा मन 

यहाँ-वहाँ ..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्‍ति'..✍️

मंगलवार, 12 मई 2026

4740...उसका घर उसका देश है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

मंगलवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

कौन हो तुम-एक दार्शनिक प्रेम कविता

स्वयं के अस्तित्व से बेखबर
दुर्गम पथ की बाधाओं से अनजान,
कठोर धरातल पर कुसुम-राह तलाशती।
जीवन के इस विस्तृत क्षितिज को
अदम्य उत्साह और चटख सुर्ख रंगों से
रंगने को आतुर-व्याकुल
कौन हो तुम!

*****

माँ की प्रतिक्षाएँ

कोई पूछे

आज तुमने क्या खाया?”

जैसे वह बरसों पूछती रही है सबसे।

वह प्रतीक्षा करती है

कि बच्चे जब सफल हों

तो परिचय में सिर्फ़ पिता का नाम नहीं,

उसकी जागी रातें भी दिखाई दें।

*****

855. माँ

उसका घर उसका देश है,

देहरी देश की सीमा,

बच्चे देश के नागरिक,

उसके होने भर से

महफ़ूज़ रहता है उसका देश,

चैन से सोते हैं उसके बच्चे।

*****

सोशल मीडिया में मैडिटेशन का शोर

आज की दुनिया में, जहाँ लोग देर रात तक स्क्रीन देखते हैं और फिर नींद न आने की शिकायत करते हैं, यह विधि तेज़ी से प्रचलित हो रही है। अनिद्रा कुछ हद तक घटती है और नींद आ जाए तो चिंता भी कम हो जाती है। इस अभ्यास से शरीर और मन को आराम मिलता है। लेकिन इसका उद्देश्य सिर्फ़ नींद लाना है, आत्म-दर्शन नहीं। आराम और गहरी ध्यान-साधना के बीच का अंतर समझना ज़रूरी है।

 *****

मातृदिवस, दस मई को ही क्यों

माँ ! जैसे विशाल, अद्वितीय, अप्रतिम, दैवीय व्यक्तित्व के लिए एक दिन का निर्धारण ! इस बात को लेकर कई बार हम भावुक और आक्रोशित भी हो जाते हैं ! पर मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाने के पीछे भी एक बेटी की अपनी माँ के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और सामाजिक सुधार की भावना काम कर रही थी ! उस बेटी का नाम है, एना मारिया जार्विस ! एना की मां का निधन 9 मई 1905 को हुआ था, जो उस वर्ष मई का दूसरा रविवार था, इसीलिए मई के दूसरे रविवार को ही ''मदर्स डे'' मनाने की परंपरा शुरू हुई!

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 


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