
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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शनिवार, 7 मार्च 2026
4674 ...एक बीज की स्वतंत्रता, जमीन के अंधेरे में खो जाती है

शुक्रवार, 6 मार्च 2026
4673.... अयोग्यता योग्यता नहीं होती...
युद्ध
के सामने
अहिंसा शब्द
कितना बौना हो जाता है
दया और प्रेम
छटपटाते हुए मरते
दिखाई देते हैं
करुणा
के परखच्चे उड़ते हैं
धड़ाकों के साथ
इमारतें
विकास से लड़ते हुए
हो जाती हैं मलवे में तब्दील
आकाश
भर जाता है धुएँ से
ज़मीन
साक्षी बन रही होती है
खंडहरों की
ताक़तवर दर्ज़ करता है
फ़तह
लाशों के ढ़ेर पर
मानवता को कुचलते हुए
करुणा का गला घोंट कर।
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रचयिता का नाम याद नहीं मुझे
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गुरुवार, 5 मार्च 2026
4672 ..जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे
सादर अभिवादन
बुधवार, 4 मार्च 2026
4671..रंगों की आत्मगाथा
।।भोर वंदन।।
" तो बस इस बार
फेंकना अमन का गुलाल
कि सलामत रहे हर माँ का लाल
सब के हिस्से रहे आसमान नीले
हों निर्धन की बिटिया के हाथ पीले
घाव भर जाएं सब जो हैं अभी हरे
होली जीवन मे शान्ति का रंग भरे ।।"
होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
- बुशरा तबस्सुम
होली के दौरान बजने वाले होली गीत.. के साथ
ट्रम्प जोगीरा
आपस में ही लड़वाकर के, बेचे खुद हथियार।
युद्ध कराकर नोबेल चाहे, सामन्ती सरदार।।
जोगीरा सा रा रा रा
पल-पल में ये बोली बदले, बदले अपना भाव।
खुद को तानाशाह समझता, देता टैरिफ ताव।।
जोगीरा सा रा रा रा..
✨️
केसर रंग,रंग देना पिया अंग
अबकी बार होली में
फाग,चैती गाते बजाते मृदंग
अबकी बार होली में ।
माथे पे रोली गाल गुलाल
कोरी चूनर कर देना लाल
धो देना मन का मलाल
अबकी बार होली में ।
✨️
फागुन की पहली आहट में,
जब पवन ने गुपचुप संदेश दिया,
धरती ने ओढ़ी गुलाल की चूनर,
अंबर ने भी हँसकर साथ लिया।
टेसू की डालों से टपका सूरज,
सरसों ने सोने सा गान किया,
✨️
रंगों का अब इंतजाम ..बस करों,
होली पे ये इल्जाम ..बस करों
शिकायत अबकी हम से न होगी,
सुर्ख़ आरिज़ के अंजाम..बस करों। .
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 3 मार्च 2026
4670...नीले,पीले,हरे रंग जामुनी डाल अबकी बार होली में ...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।
भारतीय समाज की समृध्द सांस्कृतिक परंपरा का उमंग और उत्साह से परिपूर्ण
रंगोत्सव होली की शुभकामनाएँ।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
चिंतन के उस पावन रंग में
अपनी गरिमा भी आ सिमटा
विचारशील लोगों ने तो
होली को उन्माद ही समझा।
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गुबार मन में हो या पवन में ...
युद्ध-प्रतियुद्ध, अत्याधुनिक रासायनिक अस्त्र,
धमाके-धुआँ जानलेवा, पारिस्थितिकी दुस्सह।
हानिकारक है सदा गुबार मन में हो या पवन में,
होते हैं नष्ट देश-धरती संग समस्त ग्रह-उपग्रह।
मानसिक स्वास्थ्य केवल 'बीमारी की अनुपस्थिति' के रूप में नहीं
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर मानसिक स्वास्थ्य को केवल 'बीमारी की अनुपस्थिति' के रूप में नहीं, बल्कि एक मनो-सामाजिक (Psychosocial) वास्तविकता के रूप में देखना अनिवार्य है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य केवल हमारे दिमाग के रसायनों (Chemicals) पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि हम समाज में कैसे रहते हैं और दूसरे हमसे कैसे जुड़ते हैं.मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें नियंत्रित करने की क्षमता.
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सोमवार, 2 मार्च 2026
4669 ..जला के ईष्या,द्वेष की होलिका राख मले मतवारे,
रविवार, 1 मार्च 2026
4668...मेरा मन ही है जो सब जानता है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
यक़ीन की
धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
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हम मिले
गिरजे की उन सीढ़ियों पर
जहां न
जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के
कदमों के निशान थे
कितनी
उदासियों का ठौर था
कितने
कनफेशन सर झुकाये बैठे थे
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झांकता, कभी खिड़कियों से,
जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,
शाख की, रंगीनियों से,
पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,
झूलती, उनकी पत्तियों से,
कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!
पता ही ना चला....
व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....
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अश्वत्थामा
बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।
राजा जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते।
कौन सच । वह सच। या यह सच!
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फिर मिलेंगे।










