निवेदन।


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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

4907 ..जीवन में ढलते रंग, जीवन को ढालते रंग

सादर अभिवादन  

श्वेता  जी अवकाश पर
कारण अपरिहार्य
सादर वंदन
      
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तुम्हारे दमन ने
मृत्युदंड के आदेश पर
हस्ताक्षर करके
निब तोड़ने की
परम्परा का
निर्वहन किया।




अंतस  के  हिंडोले  हृदय  की  हारिल
प्रदक्षिणा  के  फेरे  सब कुछ  को  लुटा के
लय  का  रुप  सिरजता  है
नृत्य , गीत , संगीत
पुलक  नव - नव  रुप  धरे



बोलते रंग, 
फूलों से खलते रंग,
पत्तों में डोलते रंग। 

इंद्रधनुष में लिपटे रंग,
सूर्यकिरण में सिमटे रंग । 



शिशिर  ऋतु में, 
माँ के कहने पर, 
रखी थी खीर शरद पूर्णिमा 
की चाँदनी में, 
खीर में चाँद का पीलापन 
बचा रहा, 





खीर के 
सुंदर कटोरे 
छतों पर रखना,
ओ गगन की 
चाँदनी 
आकर इन्हें चखना,
आज 
निधिवन 
रास का सुंदर नज़ारा है.




वो जो कहते हैं
वक्त हर ज़ख्म भर देता है

उन्होंने उन सब निशानों को शायद
कभी गौर से देखा ही नहीं



सादर समर्पित
वंदन  

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

4906 ..नहीं छिटकन और विघटन, नहीं अब कुछ और क्षति हो

 सादर अभिवादन


अक्टूबर इजाजत मांग रहा है
मांगने वाले को देना ही पड़ता है
आने वाला शोर-शराबे के साथ जो आ रहा है
स्वागत है दीपमालिका पर्व का


रचनाएं देखें



(आपका कॉमन सेंस CJP के प्रोटेस्ट में गया है जो मुझे ये बात लिखनी पड़ रही है।) मैंने ड्राइवर से पूछा कि अचानक ब्रेक क्यों मारा? उसने कहा कि कुत्ता सामने आ गया था। मैंने कहा चढ़ा देता, बोला मैं शाकाहारी हूँ। थोड़ी देर बाद मेरा गंतव्य आ गया। मैंने 15 की जगह 10 रुपया दिया क्योंकि बस इस मुझे 5 मिनट लेट पहुँचाया। ड्राइवर गुस्सा हो गया, बोला 5 रुपये और दो। मैन कहा, कुत्ते से माँग लो।





बच्चा नमक से 
रोटी खा रहा है
नेता विकास के फर्जी आंकड़े बता रहा है 

नेता ने अभी अभी छीनी है
एक बच्चे के हाथ से मेलोडी 
उड़ रहा है जहाज में 
नेविगेशन डेटा कर रहा चुगली 
वह उतर रहा है इटली में 
वहीं बनेगी नई रील
मेलोडी इतनी चाकलेटी क्यों है?




नहीं छिटकन और विघटन,  
नहीं अब कुछ और क्षति हो,
एक धड़कन, एक जीवन, 
बन चले सम्मिलित प्रगति हो,

गर्व, बल अग्रज सहित सब,  
प्रेम, करुणा अनुज प्रति हो,
बस यही आग्रह सभी से, 
एक गति हो, एक मति हो।





क्रूज की उस छत पर सब हैरान परेशान घूम रहे थे कि सूरज किधर से निकलेगा। रात में हमारे कैप्टन ने क्रूज को किस दिशा में मोड़ा है कोई नहीं जानता। बस सब इंतज़ार में थे। मैं भी। लेकिन मन में यह बात भी चल रही थी कि रोशनी के लिए यह तलब हम सबके भीतर है। अंधेरा किसको चाहिए, रोशनी ही सबको चाहिए। लेकिन क्या सूरज निकलने से सबके अंधेरे दूर हो जाते हैं? काश कि हो जाते!





लगता नहीं है दिल
लहरें पाती नहीं साहिल
गम के समंदर में तूफान उठाने
हो जाती है अब तन्हाई भी शामिल .


सादर समर्पित
वंदन 

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

4905...ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-

कविता के माध्यम से संवाद

की    गई    छेड़-छाड़    क़ुदरत   से,

यूँ   ही  थोड़ी   बिफर   गया  मौसम।

खिल उठा दिल, जब उनकी यादों का-

सहने-दिल   में   उतर   गया  मौसम।

*****

'ट' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)

ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़कर, टाँग पसारकर सोते हैं,

समय निकलने पर फिर अपनी, किस्मत को वो रोते हैं।

ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई,

उनकी हस्ती बाज़ार में बिकती, जैसे टके सेर हो कोई।

*****

फेल केवल भारत की जनता

तब रोती हुई पोती को समझाते हुए दादी बोली - न तो भारत की सरकार फेल है ना ही विपक्ष फेल है. फेल केवल भारत की जनता है, जिसमें इस समय नेतृत्व चयन की समझ ही खत्म हो गई है.

*****

पापा! मुझे क्यूँ नहीं?-एक लघुकथा

तब ही लाला जी का बेटा निक्कर टी शर्ट पहने आया और बोला - पापा हर जगह आपको और मेरे बेटे को ही बुलाते हैं, मुझे क्यूँ नहीं?

*****

817 ..भाई इधर तुम्हारे गार्डन में झूले पे बैठा हूँ

"शराबी भी इंसान होते है, बेचारे ने बड़ी उम्मीद से बेल बजायी होगी...

उसे तुम्हारे रूप में भगवान नजर आ रहे होंगे..

उसके बीवी बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे होंगे,

तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिये" पत्नी ने समझाया..

पत्नी के समझाने पर पति दोबारा बाहर गया..

तब तक अंधेरा और गहरा हो गया था, बारिश और तेज हो चुकी थी,

कुछ नजर नहीं आ रहा था ..

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

4904...जब भी मिला, बिखरे हुए हालात में मिला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना शर्मा जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए…

छोटी सही मगर वो सकारात्मक तो हो,
फिर मिल के इस विचार का विस्तार कीजिए.

क्यों बीच राह आपने रोका है नाव को,
इस पार कीजिए या तो उस-पार कीजिए.

*****

कितने भरम मिटा गया...

मिलकर भी तू कहाँ मिला,

पूरा किसी जनम !

जब भी मिला, बिखरे हुए

हालात में मिला!

*****

स्वर्ग 

स्वर्ग से पृथ्वी

स्वर्ग से बेहतर दिखती थी

मगर पृथ्वी से स्वर्ग

कैसा भी नहीं दिखता था

*****

राम का सत्य 

राम की सरलता और सादगी के समक्ष
रावण अपनी विराट अनैतिकता के साथ
कद में बड़ा होने लगा है!
​और हम...
सत्य को सिकुड़ते और
अहंकार को छलाँग लगाते देखते हुए,
मूकदर्शक बनने को मजबूर हैं।

*****

बस! अब और नहीं

“आपका टेलर कौन सा है नलिनी।  फिटिंग बहुत बढ़िया होती है आपके कपड़ों की।”

सारे शरीर पर रेंगती बॉस की ललचाई नज़रें उसे कचोट रही थीं। रोज़ रोज़ की इस बदनीयती को कब तक नज़रअंदाज़ करती रहे वह!नलिनी ने कठोर दृष्टि से बॉस को घूरा! कुछ सकपका कर बॉस ने जोड़ा, “वो मेरी बेटी दीपा कह रही थी एक दिन! किसी दिन उसे भी ले जाइयेगा अपने साथ अपने टेलर के पास!”

*****

प्रणाम करें और सिखाएं भी

इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव    


शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

4903... बदलते हुए दिन

 शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

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धर्म हो या अधर्म,

कोई भी विचार जब तक स्वविवेक से

न उत्पन्न हुआ हो, तबतक धूलकणों की

आँधी मात्र होती है 

जिसमें कुछ भी सुस्पष्ट नहीं होता है।

उधार का ज्ञान किसी भी विषय के अज्ञान को ढक 

सकता है समाप्त नहीं कर सकता।

अंधश्रद्धा, कल्पना,आडंबर और ढोंंग का

आवरण जब कठोर हो जाता है

तो आत्मा की कोमलता और

लचीलेपन को सोखकर पूरी तरह

अमानुषिक और कट्टर 

बना देता  है और अगर धर्म की "कट्टरता" 

मानवता से बड़ी हो जाती है तो

उस व्यक्ति के लिए परिवार, समाज या देश से 

बढ़कर स्व का अहं हो जाता है और वह

 लोककल्याण,परोपकार जैसे मानवीय गुण को

अनदेखा कर,

अपने लोग,अपनी जाति का चश्मा पहनकर

सबकुछ  देखने लगता है।

धर्म का अधकचरा ज्ञान 

ऐसे विचार जिसमें उदारता न हो, उसमें हम अपनी आत्मा की नहीं, छद्म ज्ञानियों के उपदेश से प्रभावित होकर

उनके स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र रह जाते हैं।

काश! कि हम समझ पाते

कि हम अन्य मनुष्यों की भाँति ही

एक मनुष्य सबसे पहले हैं,

किसी भी जाति या धर्म के अंश उसके बाद।


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आज की रचनाऍं-



















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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

4902 ..एक अधूरी आशा बार-बार देती थी दुःख

 सादर अभिवादन


दीपमालिका 
पर्व को बस कुछ ही दिन शेष

रचनाएँ देखें



वापसी मद्रास-निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस से थी ! सुबह जब वेंडर चाय लाया तो उसके साथ भी वही दो डाइजेस्टिव बिस्कुट फिर किसी साये की तरह मेरे सामने उपस्थित थे ! लगने लगा था कि एक तरह से मिडास हो गया हूँ, जिस बिस्कुट को छूता हूँ वही ''वह'' बन जाता है ! समझ नहीं आ रहा था कि रोऊं या उस बिस्कुटिया आत्मा से माफी मांगू .




ढलते-ढलते शाम रात के काँधों से आ लगी थी। रात के कांधे से टिकी शाम देखी है कभी? वो भी मौसम की उस दहलीज़ पर जब एक मौसम ने विदा ली न हो और दूसरे मौसम की आमद घुंघरुओं सी बज उठी है। नवेली दुल्हन सी वो शाम बस रात में घुल जाने को आतुर। कुछ रातें अपने भीतर ढेर सारा उजास सहेजे होती हैं। यह उजास चाँद के आने-जाने के हिसाब से परे होता है। कल की रात भी ऐसी ही उजास भरी रात थी। ज़र्रर्रर्र से गुज़रते दिन का हाथ थाम शाम ने ऋषिकेश के रास्ते पर रख दिया था। सदा का प्यारा ऋषिकेश। 





मीडिया में
बहस छिड़ गई—

ख़ास लोगों के लिए
आरक्षित साँसों की
तस्करी में
किन लोगों का हाथ है?





जो बस में होता मेरे,
मैं लिख देता तुम्हारे...
आसमान में सिर्फ सवेरे 
मैं  लिख देता तुम्हारी...
किस्मत में रौशनी के फेरे




विराज गए 
राम तो कब के, 
प्रासाद में अपने।
चौकीदारी  करने 
अपनी चढ़ौती की!

रेंगते तिलचट्टों और 
भिनभिनाती मक्खियों 
के इस आवर्त्त में।
मचाएंगे धूम
संततियों संग अपनी, 
अब भी कृतिकर ही,
कलियुग के!




एक अधूरी आशा 
बार-बार देती थी 
दुःख उन्हीं से मन रखता था उम्मीद 
जो शायरी की तरह नहीं जानते थे 
कि 'उम्मीद-ए-वफ़ा' क्या है! 



सादर समर्पित
वंदन
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