।।भोर वंदन।।
"लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम.."
गोपाल सिंह नेपाली
नजर डालें आज की प्रस्तुति पर..✍️
टीलों घुमावदार रेत धोरों जलते नंगे पैर अंगारों मरहम को
काँटे बबूल सेज लहू गागर चुभती जख्म घाव टिसन को
बिडम्बना मेहंदी पैरों उपजी विपश्यना झाँझर लाली को
मृगतृष्णा बेड़ियाँ करताल बिन पानी बरसते बादल को ll
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वो शहर "
तूफ़ान सुबहों में भरा हर रात में बहाव है
दरार सीने में लिए बह रही हर नाव है
गांव की नींदों में हरदम शहर के सपने रहे
शहर की आँखों में अब बस जागता एक गाँव है
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खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,
वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।
इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,
अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।
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जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का
ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगते दवा उसे अपने मर्ज़ का
कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से
जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे ग़ज़ल बज़्म में मर्म का,..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️












