सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
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निवेदन।
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शनिवार, 26 सितंबर 2026
4877 ...वंदे भारत की तरह नहीं, कभी पैसेंजर की तरह भी आओ
शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
4876....न्याय से पहले
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
आज के आधुनिक दौर में अभिभावक होना केवल बच्चे की भौतिक ज़रूरतें पूरी करने या उसे बेहतर शिक्षा दिलाने तक सीमित रह गया है।
नौंवी-दसवीं कक्षा के स्कूली बच्चों को एक-दूसरे से होड़ करते,
गति की परवाह किये बिना रफ़्तार से स्कूटी और बाईक चलाते,हुल्लड़ मचाते देखकर मन विचलित हो गया। जाने किस प्रेम से वशीभूत होकर अभिभावक बच्चों को ऐसी दुर्घटना का सामान पकड़ा देते है, फिर अनहोनी होने पर ज़िंदगीभर रोते हैं। प्रशासन और नियति को दोष देने से अच्छा है क्यूँ न पहले सी सतर्क हो जायें।देशभर में प्रतिदिन होनेवाली सड़क दुर्घटनाओं में नाबालिग चालकों का योगदान भी करीब 4% है। सभी अभिभावकों से विनम्र अनुरोध है कृपया ऐसी जरुरी बातों पर जागरुक रहें।
आज की डिजिटल जीवनशैली में
जहाँ संवाद कम हो रहे और तनाव बढ़ रहा है, अभिभावकों को नियंत्रक के बजाय दोस्त और संबल बनने की ज़रूरत है।
बच्चों को असफलता से जूझने का धैर्य, नैतिक मूल्य और संवेदनशीलता सिखाना ही सच्ची परवरिश है। अभिभावकत्व का मूल अर्थ बच्चे को केवल एक सफल पेशेवर बनाना नहीं, बल्कि उसे एक आत्मनिर्भर और ज़िम्मेदार इंसान के रूप में गढ़ना है।
मेरा एक सवाल है-
क्या कर्तव्य निभाने की कीमत
एक शिक्षक का आत्मसम्मान है?
क्या अपराधी को बचाने के लिए
मुआवज़े का नक़ाब पहना दिया जाए?
यह तो न्याय से पहले,
अराजकता का सीधा निमंत्रण है।
नकल को संरक्षण देना
और अनुशासन को अपराध बनाना
शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।
न्याय की कसौटी पर
जब नियम अलग-अलग हो जाएँ,
तब शिक्षा का मंदिर नहीं
केवल राजनीति का बाज़ार बचता है।
किसी भी दुखद दुर्घटना
या अपराध पर सत्ता और प्रशासन का दुख
सिर्फ़ एक दिखावा है।
व्यवस्था के पास हर त्रासदी से निपटने के लिए
पहले से ही तैयार और रटे-रटाए शब्द होते हैं,
जिन्हें सोशल मीडिया और प्रेस में फैलाकर
अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जाती है।
शासक या तंत्र का
व्यक्तिगत दुख भी महज़ एक अभिनय है,
जहाँ आँसू पोछने के तुरंत बाद
काम सामान्य रूप से चलने लगता है
और अगली किसी घटना के लिए
फिर से वही नाटक दोहराने की तैयारी
कर ली जाती है।
नंगे पैर रेत पर चलना
फूलों की महक महसूस करना
दरिया में पैर लटकाकर बैठना
तितलियों के पीछे भागना
मिट्टी के घरौंदे बनाना
शायद भूल गये हैं हम
जीवन की आपाधापी में
जीने की जद्दोजहद की कड़वाहट भुलाकर
मासूमियत ज़िंदा रहे भी तो कैसे?
विपरीत परिस्थितियों की कोख में
उम्मीद और सीख के बीज छुपे होते हैं
हम हार मानने के बजाय
जब सामना करते है तो
नयी राह और रोशनी मुस्कुराकर
हौसला बढ़ाती है,
अपना रचा हुआ
सफलता और मंजिल के पीछे
अंधाधुंध भागती दुनिया
संघर्ष के पलों से मिली
जीवन की मिठास से
हमें दूर कर देती है
जिम्मेदारियॉं और हमारी गलतियॉं
हमें कमज़ोर नहीं बनाती
बल्कि एक नया
अस्तित्व गढ़ती है...
समय की सीमाओं को पार कर
गुफाओं, पर्वतों और खाइयों जैसी
कठिन राहों से गुजरती हुई
बहकर आती है नदी
रास्तों के पत्थरों से टकराकर
वह बिखरती नहीं,
बल्कि खुद को और निखारती है तथा
अपने हर प्रवाह में संगीत घोलती है।
बुलंद हौसलों से भरी नदी लगातार
अपनी असली ज़मीन और अस्तित्व की तलाश में
आगे बढ़ती है।
वह अपनी हर लहर से निस्वार्थ प्रेम करती है
और प्रकृति के नए रंगों से सजी रहती है।
कभी-कभी वह बाहर से शांत और मौन रहकर
अपनी ही गहराई में
नदी का बहना जीवन के साहस,
अटूट प्रवाह और आत्ममंथन
का ही एक रूप है।
गुरुवार, 24 सितंबर 2026
4875 ...देवत्व से भरता है मन मुंद जाते हैं स्वतः नयन
सादर अभिवादन
बुधवार, 23 सितंबर 2026
4874..हौसले का दामन
।।प्रातःवंदन।।
" अरुणिमा आते ही देखो,
विहग वृन्द उड़ान भरते,
शक्ति पंखों में समेटे,
नाप लेते दिशा चारों।
अब उठो कुंठा बुहारो।"
डॉ.मृदुल कीर्ति
आइए एक बार फिर साहित्यिक कृतियों से परिचित होतें हैं..✍️
आ ! नंगे पैर रेत पर चलें
खुशबू से हवाओं में घुलें,
बाँसुरी की तान पर झूमें
आहिस्ता से फूलों को चूमें,..
✨️
रामकथा को आधार बना कर अभिव्यक्ति के कौन-कौन से अनूठे आयाम का संधान संभव है इसका उदाहरण है भगवान सिंह की यह पुस्तक ‘अपने अपने राम‘। राम का चरित्र वर्ण कुव्यवस्था के खिलाफ और समावेशी राजनय के व्याख्याकार ..
✨️
झूठे-झूठे सपने, झूठे-झूठे वादे
मन ख़ुद से करता है
सच्ची-सच्ची बातों, सच की राहों
से शायद डरता है !..
✨️
अरसे
से गुम थी
पर अंततः
एक तबेले में
खुद अधमरी होते हुए भी
अधमरी गाय को
घास डालती मिली—
शिक्षा।
✨️
जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं
चौराहे से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।
थामे रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।
चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 22 सितंबर 2026
4873....जालों से उलझनों के
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
दिनकर जी आधुनिक युग के उन कवियों में से हैं, जिन्होंने काव्य जगत पर छाये हुए बादलों के कुहासे को चीरकर राष्ट्रीयता और मानवता का प्रखर प्रकाश विकीर्ण किया।
ऐसे समय में, जब देश का लेखक वर्ग राजनीतिक विचारों के आधार पर बुरी तरह विभाजित हैं, जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने में भी राजनीतिक दलों के नफ़े-नुकसान का गणित लगाया जा रहा है, यहां तक कि लोगों की जानों को भी जाति और धर्म के चश्मे से देखकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जाने लगी हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
(23 सितंबर 1908 - 24 अप्रैल 1974)
को याद करना न सिर्फ़ समाज और राजनीति को नई दिशा देने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हो सकता है, बल्कि लेखकों को भी उनके दायित्व बोध का अहसास कराने में अहम साबित हो सकता है|
हिंदी साहित्य में दिनकर की पहचान राष्ट्रकवि के रूप में है। उनका साहित्य राष्ट्रीय जागरण व संघर्ष के आह्वान का जीता-जागता दस्तावेज़ है। दिनकर जी की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना कई स्तरों पर व्यक्त हुई है।
दिनकर मानव-मात्र के दुख-दर्द से पीड़ित होने वाले कवि थे. राष्ट्रहित उनके लिए सर्वोपरि था,शायद इसीलिए वह जन-जन के कवि बन पाए और स्वतंत्र भारत में उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला.
दिनकर को इस ऊँचे ओहदे पर देश की जनता ने बिठाया है।
उनके समालोचक भी दिनकर के योगदान को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए हैं। दिनकर जी की पथप्रदर्शक
लेखनी को शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं।
ज़िंदगी जिन खूबसूरत लम्हों की
तलाश में बीत गई,
काश! वे पल ठहर जाते
और ठहरती गर ये भागदौड़।
आपस की चुप्पियों और गलतफहमियों से
रिश्ते दम न तोडे
इसलिए बेहतर है कि
शिकायतें खुलकर कह दो,
किताब के पन्नों में सहेज कर रखी
अतीत की खूबसूरत निशानी,
ज़िंदगी की ढलती साँझ के साथ
धुंधला रही है।
बीता हुआ समय रीत रहा है
जिसे चाहकर भी अब वापस पाना मुमकिन नहीं।
ज़माने ने हमेशा मुझमें कमियाँ ही ढूँढ़ीं
और मेरे अस्तित्व पर
प्रश्न चिन्ह लगाया गया।
लाखों कोशिश और सारे प्रयास
व्यर्थ होकर रह गए।
पर सच तो यही है कि
यहाँ हर कोई अपनी ही
तकलीफों में पिघला जा रहा है,
अब कौन किससे मदद की गुहार लगाए?
घुट-घुटकर सिसकती
इंसानियत को देखकर लगता है—
जीवन के हर दर्द और धूप-छाँव को सहकर,
कुछ अपनों के बीच मुस्कुराकर जीना सीखा
है।
रास्ते में उदासी, बेबसी से मुस्कुरा कर मिले,
रिश्तों का मन रखने में मन अक्सर तड़पा,
पर न पॉंव थमे,न ही स्वाभिमान झुका।
आगे बढ़ते रहना ही
दृढ़ संकल्प है मेरा—
हर संघर्ष को पार करके,
अपनी मंज़िल
अब तो पाना है।
भीतर की उद्विग्नता
जालों से उलझनों के थमे कैसे
अब वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा...
अब तो शायद ईश्वर के अंतिम
फैसले का इंतज़ार है।
सोमवार, 21 सितंबर 2026
4872...फिर भी हृदय विश्वास में पल रहा है
देखिए रचनाएं....
राह देखते रहे
क्षण-क्षण घडियां
घड़ी-घड़ी दिन
दिन-दिन माह बरस बीते
आंखों के सागर रीते--
उपासना एक्सप्रेस
अनायास उस अजनबी युवती को संबोधित करते हुए मेरे मुँह से निकल पड़ा है-
"आपनेर नाम टा की ?"। (आपका नाम क्या है ?)
वह मुस्कुराते हुए बोली - "मोनालिका .. कैनो ?" (क्यों ?)
वह अचरज भरे लहज़े में मुझसे पूछ बैठी- "आपनी की .. बंगाली, ना बिहारी ?"
(आप बंगाली हैं या बिहारी ?)
कन्या सोच, सोच, सोच
ये जग सारा
दिखता प्यारा
देता खूब निचोड़
कन्या सोच, सोच, सोच
कन्या सोच, सोच, सोच
हृदय में विश्वास पल रहा है
अस्थिर होती मति ,
अपना परिचय कहाँ पाएगी ?
क्षण - क्षण बदलते दृश्यों में
जगत का सार देख पाएगी ?
या सत्य की तलाश में ,
बेखबर बटोही बनकर रहना होगा ?
इतना प्रबल आवेग है ,
हताशा जब घटा घेर रही है
फिर भी हृदय विश्वास में पल रहा है ,
हे पथिक !
सादर समर्पित
वंदन
रविवार, 20 सितंबर 2026
4871 ...झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
सादर अभिवादन







