निवेदन।


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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

4881 ...जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था

 सादर अभिवादन

चल दिया सितंबर भी


धन्यवाद सितंबर
उसका भी समय आ गया था
अक्टूबर है  दो-दो उत्सव मनवा कर ही जाएगा
पूरे 31 दिन रहेगा
खास जानकारी
इस शनिवार से पम्मी सिंह जीआएंगी
शनिवार बोले तो 03 अक्तूबर से लगातार 
सादर शुभकामनाए नए प्रभार हेतु
देखिए रचनाएं....




श्याम   संध्या   दीप   जलाए 
अस्ताचल   सूर्य   सागर   अंक
अब   विश्राम   पाये 
दिन   का    ताप   उतरा
शीतल  हवा  का   झोंका  धीरे  से  बह  निकला
अस्फुट   ध्वनि   कुछ   सहज   हुई





सांसों के रास्ते है समाना
पलकों में आकर बैठ जाना
दिल को जरा मेरे अपनाना
एहसान मानेगा दिल ये दीवाना .





ज़मीं से आस्माँ तक चल
मकीं अपने मकाँ तक चल

ये भटकन दूर हो जाए
तू लश्कर कारवाँ तक चल




जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता है। नींद में कोई बुरा ख़्वाब देखो तो आँख खुलने पर राहत होती है कि चलो ख़्वाब था, बीत गया। अगर अच्छा ख़्वाब देखो तो जागने पर अच्छा महसूस होता है, चेहरे पर मुस्कुराहट खेलती रहती है। 





सुबह रोज की तरह 6 बजे मेरी आँख खुली। रात जितना सन्नाटा था सुबह उतना ही शोर हो रहा था। आँख मींचते हुए मैं बाहर निकला। पता चला कि पड़ोस के चाचाजी का किसी ने धारदार हथियार से गला रेतकर मर्डर कर दिया है। आज भी मैं सोचता हूँ कि क्या मैं उस रात उनकी जान बचा सकता था? पर मैं तो सिर्फ़ 9 साल का था। 


सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 30 सितंबर 2026

4880..क्या लिखा जाए..

।।प्रातःवंदन।।

 "शब्द

मालूम है

व्यर्थ नहीं जाते हैं

पहले मैं सोचता था

उत्तर यदि नहीं मिले

तो फिर क्या लिखा जाए

किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-

लिखा कर

तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे

एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए

अब मैं लिखा करता हूँ

अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने

कागज पर बस उतार देता हूँ।"

त्रिलोचन 

बुधवारिय प्रस्तुतीकरण के क्रम को बढाते हुए आज इन लिंको पर पड़ी ..जो इस प्रकार से है

मौन

बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना 

कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना..

✨️

नाम...

तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ

जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…

चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे

जैसे सामने देख रही हूँ कोई..

✨️

असली कला

 वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है | 

मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने 

उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला

✨️

बस, यूँ ही थामे रहना।

हवा की बरजोरी,

शाखा का सिहरना।

टहनी की गलबाँही,

पलक मिलमिलाना

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

4879....ना ही आए लौटकर ही

मंगलवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
------------
वर्षा ऋतु और शरद काल के बीच क्वार की छुअन
ऋतुओं के संधिकाल को तरंगित कर देती है।
कास के फूल मन को जाने कैसे इंद्रधनुषी कर देते हैं।
हरी धरती का पवित्र शृंगार श्वेत कास और आसमान में अठखेलियाँ करते झक बादल।
आप भी महसूस करिये दूब की नोंक पर ठहरे ओस की मदिर बूँदों को पीते खूबसूरत हरसिंगार के बिछौने पर 
उड़ते शरारती भँवरों के झुंड। फुदकती चिड़िया हरे खेतों के मेड़ पर कच्चे धान के पकने की प्रतीक्षा में, दिन-भर धमा -चौकड़ी करती गिलहरियाँ नव ऋतु का स्वागत में दिन कुतरती धूप, शीतल होती हवाओं के संग आँख मिचौली 
खेलता मुस्कुराता चाँद क्वार से शरद की यात्रा का
साक्षी बनने को आतुर है।


आप की रचनाऍं मेरे दृष्टिकोण से - 

भाव और वस्तुएँ संचित हैं

पर मन की भूमि 

करुणा और संवेदना के बिना

सूख रही है

मानव-मन इस धरा की सुंदरता 

पर कभी रीझता ही नहीं।

​वही पुराने ढर्रे, वही संकीर्ण रवैये,

वह तो अपनी चेतना पर नैतिकता की 

 लकीरें खींचता नहीं

​अपने अहंकार में 

सच्चा सबक कभी सीखता ही नहीं।

​शब्दों का बाज़ार  लगा है

नज़्म की महफ़िलें सजती हैं यहाँ,

पर खो गई है मानवीय संवेदना,

केवल खोखले शब्द बचे हैं,

अंतर्मन की परतें अनछुई ही रह गयी...।

पारिजात और कनेर मदमाती बूंदों की 

छुअन से मदहोश झूम रहे है

सलेटी आकाश, नशीली हवा, और 

भीगी सड़कों के बीच

प्रकृति का संगीत सुनकर 

दादुर, मोर और कोयल बाहर निकल आए हैं।

​शीतल फुहारों से महक से अनजान

सिर पर बोझ उठाए गुज़रती है एक मज़दूरिन...

उसका पसीना वर्षा की बूँदों में मिलकर

उसके चेहरे को एक अनूठी चमक दे रहा है।

किसी के लिए बरखा

मौसम का उल्लास उल्लास है

किसी के लिए सरदर्दी 

लेकिन जिसने जीवन को उसकी संपूर्णता में 

स्वीकार किया

वही कुदरत का सच्चा साथी बनकर

भीतर से परम सुख और आनंद से भर पाता है।

पर 

 क्या सचमुच आनंद मिल पाता है

किसी पर किया गया अंधा ऐतबार

बेइंतहा रुलाता है,

और बेसबब इंतज़ार ने....

ज़िंदगी को बेचैनी में बदल दिया।

क्यों करते हैं लोग दावा

रूह और जिस्म के एक होने का

जब ज़िंदगी की सारी

ख़्वाब और ख्वाहिशें किसी मोड़ पर

अधूरा छोड़ जाना है 

उन्हें किसी की मासूमियत पर भी 

तरस नहीं आता

बेवफ़ाई चुनना कोई मजबूरी होती है क्या?

जो किसी के सच्चे ऑंसू और बेइंतहा दर्द 

कोई देख नहीं पाता

शायद आगे बढ़ गये जो 

 ना ही आए लौटकर ही

पर उस दिल का क्या 

जो इतने  जख़्म खाने के बाद भी

ऑंखों में उनकी तस्वीर सजाये

चौखट पर चाहतों की पवनघंटियॉं लटकाए

उसकी प्रतीक्षा कर रही है।

​जीवन सीधा दिखता है,

पर भीतर उलझनों के अनगिनत मोड़ हैं।

जन्म और मरण के बीच

सजा है एक

शून्य कैनवास

​चारों तरफ़ मोह का चौखटा,

और ढलती शाम में स्याह होते परिंदे।

मासूम राहगीर अतीत के पानी में

अपनी ही परछाईं छूने को भटकते हैं।

​सामने टंगा है आईना,

पर उम्र भर ख़ुद से मिलने की मोहलत नहीं।

धूप-छाँव का यह खेल,

और जन्म-मृत्यु का यह रहस्यमय कैनवास...

अविराम चलता रहता है।


आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।


सोमवार, 28 सितंबर 2026

4878 ..थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी

 सादर अभिवादन


शायद आपको पता हो


रावण का जन्म त्रेता युग के आरंभिक चरण में आज से लगभग 23 लाख वर्ष पूर्व हुआ था। मृत्यु के समय उसकी आयु लगभग 6 लाख वर्ष थी। वास्तविक तिथि कोई ब्रह्म संवत काल गणना विधि का जानकार ही बता सकता है।
उसके पिता का नाम महर्षि विश्रवा और माता का नाम कैकसी था। विश्रवा ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। ऋषि पुलस्थ ब्रह्मा के पुत्र, अर्थात आदि ऋषि माने जाते हैं।
उसकी माता कैकसी राक्षसराज सुमाली की पुत्री थी।
उसी सुमाली के देश को आज हम सोमालिया के नाम से जानते हैं। वहां के लोग
आज भी लूट-पाट को अपना धर्म मानते हैं।
उसकी पत्नी मंदोदरी मय दानव की पुत्री थी। वही मय दानव जिन्होंने बाद में
द्वारका और इंद्रप्रस्थ नगरी बसाई थी। वे माया सभ्यता के जनक थे जिसकी निशानियां
आज भी मेक्सिको में उपस्थित है।
-कोरा से   

देखिए रचनाएं....



कहते हैं कि पूर्वलिखित है,
किसके बंधन कहाँ बँधेंगे ?
किस रस्ते से मिले हमसफर,
किस दोराहे पर बिछड़ेंगे !
पूर्वलिखित ही अगर सभी कुछ,
फिर किसका वश चलता है !
जो जिसके लायक होता है,
वो ही उसको मिलता है !




हे जीवन,
इतना भी मत कस
अपनी मुट्ठी की गिरह,
कि भीतर बैठी चिड़िया
आकाश का नाम भूल जाए।

इतना भी मत खींच
दिनों की रस्सी,
कि उसकी रगड़ से
आत्मा की हथेलियाँ छिलने लगें।





संस्कृति का यह रूप तो हमारा नहीं है । पर बना दिया गया है । चन्दा इकट्ठा करके हर चार कदम पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के बाद भक्ति कम उच्छ्रंखलता अधिक दिखाई देती है ।  गणेश उत्सव हो या दुर्गा उत्सव ,जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर अन्य कोई आयोजन हो  लाउडस्पीकर पर तेज गीत बजाकर  रात रात भर गीत चलाए जाते हैं । अगर कोई आपत्ति करे तो “खुशी बर्दाश्त नहीं होती” या “धर्म विरोधी हो ” जैसे आरोप लग जाते हैं । मोहल्ले में एक आयोजक को कहा कि गीत बजाओ पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं तब एक महिला तन कर आगई -–“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी 






पितृ पक्ष केवल भय, अंधविश्वास या दबी हुई मान्यताओं का नाम नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक हीलिंग, एपिजेनेटिक्स जागरूकता, पारिस्थितिक संतुलन और मौसमी स्वास्थ्य रक्षा का एक वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित ताना-बाना है। जब हम विज्ञान और संस्कृति के इस अनूठे संगम को समझ लेते हैं, तो ये परंपराएं बोझ न लगकर हमारे जीवन को संतुलित और समृद्ध बनाने का माध्यम बन जाती हैं।





मालूम नहीं .. तुम्हें मैं याद हूँ भी या नहीं ? .. तुम यदि आज पास होती, तो मैं तुम्हें इसी "पल्लवी" नाम से सम्बोधित करता या फिर बड़े लाड से "पुल्लु" बुलाता। है ना ? 

कभी तुम मेरी अध्यापिका बन जाती और कभी मैं तुम्हारा अध्यापक। है ना "पुल्लु" ?

कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार, तो क्या मुझे दुख होता ? 




सादर समर्पित
वंदन

रविवार, 27 सितंबर 2026

4877...आदमखोरों से लड़ना है तुझको चाकू बना लेखनी ...

शीर्षक पंक्ति: 
आदरणीय रमेशराज तेवरीकार जी की रचना से।  
सादर अभिवादन।  
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएं-



आदमखोरों से लड़ना है
तुझको चाकू बना लेखनी । 

हर अल्फ़ाज़ आग जैसा है
कविता में जो रखा लेखनी । 

छल सरपंच बना बैठा है
इस पै अँगुली उठा लेखनी ।



बहला रहे हैं सब यहाँ,
अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएं संग,
बस मौन है अपना
 



जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई चलचित्र




कलियों के घूँघट को छूकर
सूरज की किरणें मचली।
शून्य पड़ी मन की गागर से 
कुछ भाव भरी बूँदे फिसली।
भीग उठा सूखा आँचल यूँ
नयनों ने बारिश बरसाई।



 अब इस मंदिर के नाम की बात! मंदिर का ''शोर'' नाम पर्यटकों को कुछ असमंजस में डाल देता है, क्योंकि सुनने वाले को शोर का मतलब कोलाहल या शोरगुल समझ में आता है, पर यह शोर (SHORE) अंग्रेजी का शब्द है, जो इसके समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण पड़ा है, जिससे इसे तट मंदिर भी कहा जाता है ! पर सवाल यह उठता है कि आठवीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का नाम शोर कैसे हो गया ? जबकि अंग्रेज तो 17 वीं शताब्दी में भारत आए थे ! तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि समय, परिस्थितियों और समुद्र के अविराम शोर के चलते ऐसा हुआ होगा! 


फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 26 सितंबर 2026

4877 ...वंदे भारत की तरह नहीं, कभी पैसेंजर की तरह भी आओ

 सादर अभिवादन


आखिरी चिट्ठी


रायपुर के पुराने मोहल्ले में रामलाल काका 38 साल से डाकिया थे। रिटायर हुए तो 2 साल हो गए, पर आदत नहीं गई। हर सुबह 6 बजे साइकिल लेकर निकलते, लोगों से मिलते, और शाम को चौक की चाय दुकान पर बैठते।

एक दिन उन्हें अपने ही घर के लेटर-बॉक्स में एक चिट्ठी मिली। पीला लिफाफा, उसी की लिखावट में — जो 20 साल पहले मर चुकी उनकी पत्नी सावित्री की थी।

देखिए रचनाएं....



वंदे भारत की तरह नहीं,
कभी पैसेंजर की तरह भी आओ,
मेरे छोटे से स्टेशन पर 





फजिरे से बारिश हो रही है। नींद में थी तब से बूँदों की रुनझुन सुन रही हूँ। अब तो शाम ढलने वाली है और लगातार बारिश… थोड़ी ठंड भी महसूस हो रही है। बारिश में मन अच्छा हो जाता है।
फजिरे लिखकर सोच रही हूँ कि आख़िर इसी शब्द से शुरुआत क्यों हुई ? 




ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,
हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रही.

शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,
क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.




विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।





ऐसे रहे शांत अंतर्मन 
हाथ कर्म में लगें निरन्तर
मीलों की दूरियाँ नाप लें  
लेकिन हो अचलता भीतर !







सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

4876....न्याय से पहले


शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज के आधुनिक दौर में अभिभावक होना केवल बच्चे की भौतिक ज़रूरतें पूरी करने या उसे बेहतर शिक्षा दिलाने तक सीमित रह गया है।


बाज़ार से घर लौटते वक़्त बिना हेलमेट पहने आठ-दस, 
नौंवी-दसवीं कक्षा के स्कूली बच्चों को एक-दूसरे से होड़ करते, 
गति की परवाह किये बिना रफ़्तार से स्कूटी और बाईक चलाते,हुल्लड़ मचाते देखकर मन विचलित हो गया। जाने किस प्रेम से वशीभूत होकर अभिभावक बच्चों को ऐसी दुर्घटना का सामान पकड़ा देते है, फिर अनहोनी होने पर ज़िंदगीभर रोते हैं। प्रशासन और नियति को दोष देने से अच्छा है क्यूँ न पहले सी सतर्क हो जायें।देशभर में प्रतिदिन होनेवाली सड़क दुर्घटनाओं में नाबालिग चालकों का योगदान भी करीब 4% है। सभी अभिभावकों से विनम्र अनुरोध है कृपया ऐसी जरुरी बातों पर जागरुक रहें।

एक माता-पिता की भूमिका में
अपने बच्चों का
जीवन तराशने और चरित्र निर्माण
की साधना में हम फेल होते जा रहे है।

आज की डिजिटल जीवनशैली में

जहाँ संवाद कम हो रहे और तनाव बढ़ रहा है, अभिभावकों को नियंत्रक के बजाय दोस्त और संबल बनने की ज़रूरत है।

​बच्चों को असफलता से जूझने का धैर्य, नैतिक मूल्य और संवेदनशीलता सिखाना ही सच्ची परवरिश है। अभिभावकत्व का मूल अर्थ बच्चे को केवल एक सफल पेशेवर बनाना नहीं, बल्कि उसे एक आत्मनिर्भर और ज़िम्मेदार इंसान के रूप में गढ़ना है।


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आपकी की रचनाऍं मेरी दृष्टिकोण से - 


मेरा एक सवाल है-

​क्या कर्तव्य निभाने की कीमत

एक शिक्षक का आत्मसम्मान  है?

क्या अपराधी को बचाने के लिए

मुआवज़े का नक़ाब पहना दिया जाए?

 यह तो न्याय से पहले,

अराजकता का सीधा निमंत्रण है।

​नकल को संरक्षण देना

और अनुशासन को अपराध बनाना

शिक्षा व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।

न्याय की कसौटी पर

जब नियम अलग-अलग हो जाएँ,

तब शिक्षा का मंदिर नहीं

केवल राजनीति का बाज़ार बचता है।


किसी भी दुखद दुर्घटना

या अपराध पर सत्ता और प्रशासन का दुख 

सिर्फ़ एक दिखावा है।

व्यवस्था के पास हर त्रासदी से निपटने के लिए 

पहले से ही तैयार और रटे-रटाए शब्द होते हैं, 

व्यवस्था दुरूस्त है

जिन्हें  सोशल मीडिया और प्रेस में फैलाकर 

अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जाती है।

​शासक या तंत्र का 

व्यक्तिगत दुख भी महज़ एक अभिनय है, 

जहाँ आँसू पोछने के तुरंत बाद 

काम सामान्य रूप से चलने लगता है 

और अगली किसी घटना के लिए

फिर से वही नाटक दोहराने की तैयारी 

कर ली जाती है।


नंगे पैर रेत पर चलना

फूलों की महक महसूस करना

दरिया में पैर लटकाकर बैठना

तितलियों के पीछे भागना

मिट्टी के घरौंदे बनाना

शायद भूल गये हैं हम 

जीवन की आपाधापी में 

जीने की जद्दोजहद की कड़वाहट भुलाकर 

मासूमियत ज़िंदा रहे भी तो कैसे?


विपरीत परिस्थितियों की कोख में

उम्मीद और सीख के बीज छुपे होते हैं

हम हार मानने के बजाय

जब सामना करते है तो

नयी राह और रोशनी मुस्कुराकर

हौसला बढ़ाती है,

अपना रचा हुआ

अभंग  सुनाती है।

सफलता और मंजिल के पीछे

अंधाधुंध भागती दुनिया 

संघर्ष के पलों से मिली

जीवन की मिठास से

हमें दूर कर देती है

जिम्मेदारियॉं और हमारी गलतियॉं

हमें कमज़ोर नहीं बनाती

बल्कि एक नया 

अस्तित्व गढ़ती है...


समय की सीमाओं को पार कर 

गुफाओं, पर्वतों और खाइयों जैसी

कठिन राहों से गुजरती हुई

बहकर आती है नदी

रास्तों के पत्थरों से टकराकर 

वह बिखरती नहीं,

बल्कि खुद को और निखारती है तथा

अपने हर प्रवाह में संगीत घोलती है। 

बुलंद हौसलों से भरी नदी लगातार

अपनी असली ज़मीन और अस्तित्व की तलाश में

आगे बढ़ती है।

​वह अपनी हर लहर से निस्वार्थ प्रेम करती है

और प्रकृति के नए रंगों से सजी रहती है। 

कभी-कभी वह बाहर से शांत और मौन रहकर 

अपनी ही गहराई में

नापती ख़ुद को नदी है।

नदी का बहना जीवन के साहस, 

अटूट प्रवाह और आत्ममंथन 

का ही एक रूप है।

 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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