जीवन बिखरा है
प्रकृति का हास बनकर
आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान
या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से
अथवा तेज फूहड़ संगीत से
समंदर ने पानी उधार लिया है
नदियों से
नदियां जब सूख रही होती हैं
समंदर नहीं लौटता है
नदियों के हिस्से का जल !
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
जीवन बिखरा है
प्रकृति का हास बनकर
आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान
या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से
अथवा तेज फूहड़ संगीत से
समंदर ने पानी उधार लिया है
नदियों से
नदियां जब सूख रही होती हैं
समंदर नहीं लौटता है
नदियों के हिस्से का जल !
।।भोर वंदन।।
आज गुरुवारिय प्रस्तुति में ब्लॉग 'लिखो यहां वहां' पर नजर डालिए..✍️
कपास से बनी नरम रातें.
हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें
उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,
हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं
बेईमानी से,
उनकी कई तहें बना कर
अपने काबू में कर लेते हैं
अश्लील शान्ति के साथ मुस्कराते हैं ,
और अश्लील स्वप्न देखते हैं
अपनी शर्मिन्दगी को छुटा कर
हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,
जिनका निर्दोष स्पर्श छत की तरह तन जाना चाहता हैं,
और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता हैं,
सारी रात अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें
उन्मत्त होतीं हैं,
वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,
और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर
हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,
इन्ही रातों के नीचे तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ
रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,
लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में छिपा कर चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं
हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से
मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं
पर डटी रहतीं हैं,
हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.
हमारी नौली चांद पर है.
(गांव में पानी का स्रोत )
हमारी नौली चांद पर है
वह जितनी सुन्दर है
उतना ही दुख देती है
छेनी से काट काट कर
उसे सजाया मैने
झर झर झर झर
उससे पानी गिरता है
चांदी की तरह..
✨️
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
।।प्रातःवंदन।।
उगते सूरज की रंगोली को देखिए,
शीर्षक पंक्ति; आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।
तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ?
*****
एक प्रेम गीत लोकभाषा में-प्रेम के रंग
सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ
बाकी मुँह पर ताला हउवै
ई बाजारू प्रेम दिवस हौ
प्रेम क रंग निराला हउवै
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया पूनम चौधरी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
अब सुनो,
हम सागर की बात कर रहे थे
सागर में तैर रहा है एक जहाज़
जहाज़ पर हज़ारों लोग
लोगों में एक परिवार
जिनके मध्य बहता है प्यार
*****
पिता, माँ और रोने की
भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी
पिता कहते थे—
पुरुष अगर रोए
तो समय को असहज कर देता है,
और समय
कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।
उन्होंने सिखाया,
सुख सार्वजनिक है दुख निजी
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अब पापा ठीक हो रहे हैं। घर आ गए हैं। बड़ी
मुसीबत आई थी...लेकिन अब जबकि सब ठीक होने की तरफ है, सोचती हूँ, तो पापा की मुस्कुराहट हौसला देती है और उनका वो सर्जरी के
बाद चेतन होते ही किताब और चश्मा मांगना भी गुदगुदाता है।
*****
उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:
शत्रु: शिक्षा का पाखंड
शस्त्र: ज्ञान
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एक नई सुबह की शुरुवात कर सकेगा ।।
ज्ञान की नदियाँ बहा देगी बस एक उनको मौका तो दो ।
बच्चे काम पर जा रहे है बीन खाये - बिन नहाये ।।