निवेदन।


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रविवार, 19 जुलाई 2026

4808...सुनाई किसी को भूले से कभी जो दास्ताने गम...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंदपरिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

धूप

हालात की दुश्वारियों ने

इस तरह कर दिया लाचार

कि हम आज गर्दिशों के

उफनते सैलाब में

तिनके की तरह

बहते रहे

बहते ही रहे

*****

मन का शावक थिर हो जाता 

श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !

*****

चाक की स्मृति

उसकी देह की दरारों में

चाक की स्मृति

अब भी बची है।

लोग कहते हैं-

"वह टूट गया।"

*****

ताना-बाना

लोग सियासत में आते हैं और ही  मक़सद से,

जन-सेवा  के  दा'वे - ना'रे  महज़   बहाने  हैं।

हँसते-हँसते  लाँघ  गए हैं  साहस के  बल पर,

बाधाओं  के पर्वत  को   हम   कब  गर्दाने हैं?

*****

Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026

जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे - वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है

वो गाना था ना - "सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है"

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह याद

 


शनिवार, 18 जुलाई 2026

4807...सज़ा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ (अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार

सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार

क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की

सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार 

*****

सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

फिर जब कोई चारा नहीं बचा, हालत हद से गुजर गई और जान के लाले पड़ने लगे, तो किसी तरह इज्जत बचाने और यहां से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं से दुहाई की गई ! उनके कारकुनों से सोशल मीडिया पर अपील करवाई जाने लगी ! कुछ फुंके कारतूसों और भीगी दियासलाइयों ने उपस्थिति भी दर्ज भी करवाई ! पर ऐसे प्रयास अवाम के लिए प्रहसन जैसे ही रहे ! क्योंकि आज तो इसके खुद के पढ़ाए हुए बच्चे भी इसका साथ देते नजर नहीं आ रहे ! खैर ! सुनने में आया है कि जल्द ही उन्हें उन्हीं जैसे लोगों द्वारा उबार लिया जाएगा ! प्रभु उन्हें सेहत प्रदान करें!

**********

प्रिय रजनी

पर इधर जाने क्यों

मन के घुप अँधेरे को

लाख टटोला

पर कुछ मिला ही नहीं

जो तुम्हें लिख भेजूँ!

पर मेरी यामिनी

तुम अब भी हो मुझे याद

और मैं फिर लिखुँगी तुम्हें

पहले की तरह ढेरों तार,

*****

सोनम मरना चाहता है

वे सभी मरना चाहते हैं

जो बात-बात पर

धरने पर बैठ जाते हैं

सत्ता को आँखें दिखाते हैं

करते हें कोशिश

देश को जगाने की,

*****

प्राचीन तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का इतिहास

प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला महान व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ केवल वस्तुओं के लेन-देन का माध्यम नहीं था, बल्कि यह विचारों का महामार्ग भी था। बौद्ध भिक्षु, भिक्षुणियां और सार्थवाह (व्यापारिक कारवां) इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए आंध्र से सुदूर दक्षिण की ओर आते जाते थे।

बौद्ध साहित्य और "महावंश" (श्री लंका में लिखा गया पुरातन इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, सम्राट अशोक (राजकाल ईसापूर्व 268 से ईसापूर्व 232 तक) ने अपने पुत्र महेंद्र (पाली भाषा में महिंदा) और पुत्री संघमित्रा (पाली में संघमित्ता), को श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए भेजा था।

*****


*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

4806 ..तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन, पास सदा ही पाता है।

 सादर अभिवादन 


कल वर्षगाँठ मना लिए
तेरहवें वर्ष की ओर का
एक नया कदम 


मेरी पसंदीदा रचनाएं



 तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन,
पास सदा ही पाता है।
इधर-उधर नजर घुमाती मैं,
संग तुम्हारा भाता है।
​तुम हो मेरे अंदर-बाहर,
तुमसे एक गहरा नाता है।





रेत के घर
ढह
जाते हैं लहरों को उसकी ख़बर नहीं होती,
जी उठते हैं फिर भी आदिम जीवाश्म
सभी सुबह की दस्तक से, इस
रात की कोई अंतिम डगर
नहीं होती, गुज़र जाते
हैं




हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं............??  
    





देह, श्वास, मन तीनों मिलकर 
 देवालय ह्रदय में बनाते 
शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से 
आत्मा को उसमें बैठाते !




समुद्री घास  को आराम मिलता है,
 वह फिर से पनपती है
समुद्र की तलहटी किसी नियॉन रोशनी वाली दावत जैसी लगती है।
एल्कहॉर्न कोरल खिल उठते हैं, 
कछुए धीरे धीरे आ जाते हैं किनारों के पास।




वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है


सादर समर्पित
सादर वंदन

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

4805 ..आज ही के दिन पांच लिंकों का आनन्द का पहला अंक निकला था

बारह वर्षों से अनवरत साहित्य साधना


आज 16 जुलाई 2026 को जगन्नाथ रथ यात्रा और कर्क संक्रांति का विशेष महत्व है।
रथयात्रा भगवान जगन्नाथ की भक्ति और उत्सव का प्रतीक मानी जाती है,
जबकि कर्क संक्रांति सूर्य के राशि परिवर्तन का महत्वपूर्ण अवसर है।
धार्मिक आस्था रखने वाले लोग इसी दिन
स्नान, दान, पूजा और पुण्य कार्यों को विशेष महत्व देते हैं।

और यह भी याद है कि
आज ही के दिन पांच लिंकों का आनन्द का पहला अंक निकला था

 


कृपया देखे पहले अंक की एक झलक
और आकलन कीजिए

आज शुभारम्भ.....पांच लिंकों का आनन्द......
आज रथ यात्रा भी है...बड़ा ही शुभ दिवस
और सोने में सुहागा कि आज ईद-उल-फितर भी है
अद्भुत संगम है दोनों उत्सव का

रथयात्रा 2015 से आज रथयात्रा 2026 बारह वर्षों की लंबी यात्रा में
सोलह लाख से अधिक परिदृश्य और
चार हजार आठ सौ पांच प्रस्तुतियां इसी बात की गवाह है

पांच लिंकों का परिवार अपने शुभचिंतकों और सहयोगियों  और सुधी पाठकों का
आभार मानता है और इस सफर में सतत सहयोग का आकांक्षी है

है शौक यही अरमान यही,
हम कुछ करके दिखलाएँगे। 
मरने वाली दुनिया में हम,
अमरों में नाम लिखाएंगे

जो लोग गरीब भिखारी हैं,
जिन पर न किसी की छाया है।
हम उनको गले लगाएंगे, 
हम उनको सुखी बनाएँगे।। 
-रामनरेश त्रिपाठी


उनके वो आंसू पोछ रहा था
जिनकी पीडा मे पानी था
जो दर्द बसा था सीने
वो दुख की ही राजधानी था



नग़मे


नग़मे जो गाये नहीं गए
वक़्त की धुन पे बजाए नहीं गए
फूल झरते रहे डालियों से
ज़ुल्फ़ों में सजाए नहीं गए


सुख और संघर्ष

सुख और संघर्ष
जीवन के दो छोर हैं,
जो जैसा स्वीकार करे,
वैसा ही निखरता है।


आपदा में अवसर


राष्ट्र के समस्त सलाहकारों को निर्देश दिया गया था— "आपदा में अवसर खोजो।"
और इसीलिए स्मार्ट वैक्सीन का वितरण जारी रहा

जिसका असर आज भी कायम है,
और जो हर दिन
समाज को नए सिरे से संक्रमित कर रही है।


पढ़ लिख के


पढ़ लिख के
हमने किया क्या है?
कभी खुद को
तो कभी सबको गधा कहा है

जो जानते हैं
वे दुखी हैं
जो अनजान है
खुश ही दिखा है



कठघरे में चिड़िया


एक नाबालिग चिड़िया
उड़ान का संतुलन सीख रही थी।
उसकी आँखों में
बस आसमान की ऊँचाइयाँ थीं।

तभी
उड़ान पर अपना एकाधिकार समझने वाले
बीस-बाईस गिद्ध
उस पर टूट पड़े,
और नोच डाला
उसका पूरा आकाश


सादर समर्पित
सादर वंदन


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