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शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

1191... मुखौटा


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सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
माँ मैके आकर चली गईं... पुतला रावण जला दिया गया
इंसान कबतक दम साधे रहेगा
उतारेगा कभी न कभी अपने चेहरे से

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मुखौटा
जिनसे चुभन बढती है 
अकेलेपन का अँधेरा 
फैल जाता है 
जीवन का खालीपन 
और गहराता है 
लोग सांत्वना के 
दो बोल बोलते हैं

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मुखौटे
अन्दर का राम जला दिया,
कैसे उल्टे पड़े दशहरे हैं |
अपनी ही आवाज़ सुन ना पाएं,
पूर्ण रूप से बहरे हैं |

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मुखौटा
रंगे शराब से मेरी नियत बदल गई
वाईज की बात रह गई साकी की चल गई
तैयार थे नमाज पे हम सुन के जिक्रे-हूर,
जलवा बुतों का देख के नियत बदल गई

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मुखौटा
कुछ ऐसे भी चेहरे दिखते है
जो प्रेम-अनुराग में भी ज़हर भर देते हैं
यहाँ सब अपना असली रूप छिपाते हैं
मन ही मन में हैं गारियाँ देतें
पर ऊपर से मुस्कुराते हैं
रखते दिल के अंदर खोट ही खोट
और सिर्फ झूठा प्यार जताते हैं

मुखौटा
कलाकार छोटे बड़े
सब राम की सेना में
नाम लिखाते हैं
और तुमने
अपना नाम लिखाया
रावण की सेना में।

><
फिर मिलेंगे...
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का इकतालीसवें क़दम का
'वज़ह'
...उदाहरण...
तेरे होने न होने का अब फर्क नहीं पड़ता,

बीती बातों का क्यों अफसोस है तुझे,
ग़ज़ल लिखने की क्या थी वज़ह।

मगरूर हुए वो कुछ इस तरह,
दिल टूट बिखर जाने की क्या थी वज़ह।
-पंकज शर्मा
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
अंतिम तिथिः शनिवार 20 अक्टूबर 2018  
प्रकाशन तिथिः 22 अक्टूबर 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें



शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

1190....रावण अपने दस चेहरे बाहर ही रखता था..और हम??

शुभ विजयादशमी

दस इंद्रियों को जीत लो
यह विजयादशमी पर्व है।
राम सद्गुण के सम्मुख
पराजित दशानन गर्व है।।
-श्वेता
दशहरा का तात्पर्य, सदा सत्य की जीत।
गढ़ टूटेगा झूठ का, करें सत्य से प्रीत॥

सच्चाई की राह पर, लाख बिछे हों शूल।
बिना रुके चलते रहें, शूल बनेंगे फूल॥

क्रोध, कपट, कटुता, कलह, चुगली अत्याचार
दगा, द्वेष, अन्याय, छल, रावण का परिवार॥

राम चिरंतन चेतना, राम सनातन सत्य।
रावण वैर-विकार है, रावण है दुष्कृत्य॥

वर्तमान का दशानन, यानी भ्रष्टाचार।
दशहरा पर करें, हम इसका संहार॥
-अजहर हाशमी

★★★
सादर नमस्कार

चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-



आदरणीय रुपचंद्र शास्त्री जी 


विजयादशमी 
विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार।
आज झूठ है जीतता, सत्य रहा है हार।।
--
रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार।
लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।।
★★★
आदरणीय अमित निश्छल जी
पन्नों पर अभी पहरे हैं


लेखन नियम न समझा
संधानित नरकट ने
बदल दिया जज़्बाती
पारस को करकट में,
रच-रच उलाहनायें
सृजनें हैं अब देतीं
भस्म हुई ख़्वाबों की
सरसब्ज़ पड़ी खेती;
★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम जी
उद्वेलित हृदय


क्यूँ ये संताप में जले,

अकेला ही क्यूँ ये वेदना में रहे,

रक्त के इस भार से,
उद्वेलित है हृदय की जमीं....

★★★
आदरणीया नीलम अग्रवाल जी


इक अजब दर्द है अब कागज़ पर उतरता नहीं।
आइना बहुत साफ किया
पर अपना अक्स दिखता नहीं।
लाख कोशिशें की मुस्कुराने की
पर अब होंठो पर मुस्कान सजती नहीं!!
★★★
तुम  अमर 
नश्वर  सभी 

श्राप या वर 
सोचा  कभी ?

★★★
और चलते-चलते पढ़िए
आदरणीय शशि जी की क़लम से

  मन के इस अंधकार को मिटाने के लिये अपनी चिन्तन शक्ति को दीपक बनाने की कोशिश में बार-बार उसकी अग्नि से चित्त की शांति 
को झुलसाने की आदत से पड़ गयी है मेरी । फिर भी एक लाभ यह 
तो है ही कि आवारागर्दी से जो बचा रहता हूँ , दिखावे से बचा रहता हूँ 
और झूठ से भी.. भद्रजन कहलाने के लिये किसी मुखौटे की मुझे 
जरुरत नहीं.. यह समाज जानता है कि मुझे उससे अब और कुछ 
नहीं चाहिए.. जो दर्द मिला है , वह मेरी लेखनी में समा गया है.. 
वहीं मेरी पहचान है, वही मेरा ज्ञान है, भगवान है..?
★★★★
आज यह अंक आपको कैसा लगा?
कृपया अपनी प्रतिक्रिया के द्वार अपने सुझाव अवश्य दीजिए

हमक़दम के विषय के लिए 


कल आ रही आदरणीय विभा दी अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ
आज के लिए इतना ही

मनुष्य  कितने चरित्रवान है आज
हर दूसरे दिन गली, मुहल्लों में
अखबार की सुर्खियों में छपे नज़र आते है
अपनी ओछी चरित्र का
प्रमाण हम स्वयं ही दे जाते है
रावण अपने दस चेहरे बाहर ही रखता था
आज हम अपना एक चेहरा ही
अनगिनत में मुखौटों की तह में
छुपाते हैंं।

श्वेता

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

1189..गणित की किताब और रोज रोज का रोज पढ़ा रोज का लिखा हिसाब

सादर अभिवादन। 

आज कन्यापूजन के साथ शारदीय नवरात्र उत्सव सम्पन्न हो रहा है। भारतीय संस्कृति में व्रत-त्यौहारों का समावेश हमें धार्मिकता के 
परिवेश में मानवीय मूल्यों की सार्थकता का दर्शन कराता है। 
सामाजिक सद्भाव का उत्सव माँ शक्ति की आराधना और  
कन्यापूजन के साथ आने वाले मौसम की तैयारी में ख़ुद को सक्षम 
बनाने की सुखद परम्परा है। 

9 नन्हीं बालिकाऐं (माता शक्ति के नौ रूप ) और 2 नन्हे बालक (बजरंगबली और भैरव जी के रूप) कन्यापूजन की शोभा बनते हैं।  मान्यता है 
कि इस दिन माता शक्ति इन नन्हीं बालिकाओं के ज़रिये अपना प्रतिनिधित्व करती हैं।  श्रद्धालु अगाध निष्ठा के साथ कन्यापूजन 
को धार्मिक विधि-विधान से पूर्ण करते हैं और कन्याओं से 
आशीर्वाद लेते हैं।  

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं-   

व्यर्थ की बातों में
कुछ हासिल  नहीं होता
बस व्यर्थ  बहस का   मुद्दा 
अशांत मन करता
अकारण बहस का सबब
 प्रदूषण ही बढ़ता


आमावस्या का ना रहा नामोनिशान अब जीवन में
किरणों का वास मुझ गृह में,मैने चाँद थामा दामन में  ।
                  


मैं ही रण हूँ मैं ही शांति
मैं ही संधि की डोर हूँ,
मैं वरदान हूँ मैं ही वरदानी
कोमलांगी मैं ही कठोर हूँ।



मेरे जीवन का श्रृंगार हो तुम,
हर सफर में साथ रहेंगे हम।

मैं वीणा हूँ, संगीत हो तुम,
मैं दिल हूँ , तो धड़कन हो तुम।


My photo

मैं थोड़ा स्त्रैण पुरुष 
और थोड़ी पौरुषेण स्त्री जनना चाहती हूँ,
मैं माँ बनना चाहती हूँ..


Profile photo

जो उम्र भर नापता रहा रास्ते
नयी राहों में भटक गया देखो।


अपने पन का नक़ाब वक़्त रहते बिख़र गया,
वक़्त का आलम रहा, की वक़्त रहते सभँल गये,

हर   बार  की  मिन्नतों  से  भी वो  नहीं लौटे, 
 इंतज़ार में  हम, वो  दिल कहीं ओर  लगा बैठें,

चलते-चलते  ग्राफ़िक पर ध्यान मत लगाइये "उलूक" का गणित बहुत सरल है ज़िन्दगी की पेचीदगियों को हल करने के लिये....समझ आये तो कॉमेंट ( जी हाँ कमेंट नहीं ) भी लिखकर ब्लॉगर साहब का हौसला बढ़ाइये - 

गणित की किताब और रोज रोज का रोज पढ़ा 
रोज का लिखा हिसाब..... डॉ. सुशील कुमार जोशी 



गजब 
गणित है 
जीवन 
का भी 

दोनों  
गणित हैं 
दोनों में 
समीकरण हैं 

फिर भी 
अलग हैं 
दोनों 


हम-क़दम के इकतालीसवें क़दम
का विषय...
यहाँ देखिए.

🎆


आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी। 
रवीन्द्र सिंह यादव 
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