निवेदन।


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रविवार, 5 फ़रवरी 2023

3660 ...विश्व में विष का शमन, बुद्धि में प्रभु का मनन

 सादर अभिवादन

आज कुलदीप भाई जी के यहां बिजली गुल है
मेंटेनेंस चल रहा है
चलिए चलें अब देखें रचनाएँ ....



इससे बेहतर तो हम
नदी के तट पर
चुपचाप बैठ कर,
जो साबित नहीं
किया जा सकता,
उसे अनुभव करते
तो संभवतः अधिक
समझ में आता ।




कुछ ही क्षणों में चाय बनकर तैयार थी।दादाजी ने एक घूँट पिया कि 
पोती चिल्लाई- कैसी बनी है, दादाजी?
पति ने एक नज़र पत्नी को देखा फिर दबी सी आवाज़ में पोती से बोले- बहुत अच्छी है बेटा।
पोती नाच उठी। बोली अब तो रोज़ मैं ही आपके लिये चाय बनाऊँगी। 
दादाजी बेचारे सकपका कर रह गए और दादी खिलखिलाकर हँस पड़ीं।




फागुन आया देखकर आम उठा बौराय।
पिया बसे परदेश में, कोयल रही बुलाय।
कोयल रही बुलाय, धरा है धानी धानी।
मादकता सिर चढ़ी कर रही पानी पानी।
समझ न आवें मित्र! ससुर बहुओं के लच्छन।
मन को दे भरमाय मदन का भाई फागुन।।




विश्व में विष का शमन
बुद्धि में प्रभु का मनन.
कराता ईश का वंदन
हमारे रुके नहीं चरण.
तेरी उपमा है दी जाती, तू मामा है बच्चों का,
तेरी महिमा सुहाती है, तू प्रेमा के मुखड़े सा




धूसर
जीवन के उपर पड़ी रह जाती हैं कुछ उड़ते
हुए बादलों की परछाइयां। इक अजीब
सा ख़ालीपन रहता है बहुत कुछ
पाने के बाद, पल्लव विहीन
दरख़्त देखते हैं शून्य
आकाश की तरफ


आज बस
सादर

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

3659...बुद्धू-बक्सा

 
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

 शिक्षा के लिए सबकी जरूरतों में शामिल यानी हर घर की जरूरत

बुद्धू-बक्सा

 विज्ञान कितना भी विकास कर ले. उन्नत से उन्नत रोबोट बना ले और उसमें दुनिया भर के चाहे जितने डाटा फीड कर ले, लेकिन कोई मौलिक कविता या कहानी तब भी नहीं रच सकता. सृष्टि में यह वरदान सिर्फ और सिर्फ मनुष्य को मिला है कि वह अपनी या दूसरी की भावनाओं, विचारों और अनुभूतियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति दे सके. यह रचनात्मक अभिव्यक्ति दरअसल अपनी एक अलग दुनिया बनाने की कोशिश की तरह है. उसी तरह जैसे विश्वामित्र ने कभी इन्द्र से नाराज होकर अपना एक अलग स्वर्ग बनाने की कोशिश की थी. 

मुजफ्फर हनफी

 मज़े से गिन सितारे छत न हो तो

समंदर क्या अगर वुसअत न हो तो

कहा ठंडी हवा ने कैक्टस से

इधर भी आइयो ज़ह्मत न हो तो

तुम्हें भी आ गया ख़ैरात करना

कोई फ़ितना सही आफ़त न हो तो

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल हुआ कश्‌मकश-ए चारह-ए ज़ह्‌मत में तमाम

मिट गया घिस्‌ने में इस `उक़्‌दे का वा हो जाना

अब जफ़ा से भी हैं मह्‌रूम हम अल्‌लाह अल्‌लाह

इस क़दर दुश्‌मन-ए अर्‌बाब-ए वफ़ा हो जाना

ज़ु`फ़ से गिर्‌यह मुबद्‌दल ब दम-ए सर्‌द हुआ

बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना

फैज़

उम्र देखो तो आठ साल की है, अक्ल देखो तो साठ साल की है,

वो गाना भी अच्छा गाती है, गरचे तुमको नहीं सुनाती है,

बात करती है इस क़दर मीठी, जैसे डाली पे कूक बुलबुल की है,

जब कोई उसको सताता हैतब ज़रा ग़ुस्सा आ जाता है,

पर वो जल्दी से मन जाती हैकब किसी को भला सताती है,

शिगुफ्ता बहुत मिज़ाज उसकाउम्दा है हर काम काज उसकाहै

परवीन शाकिर

बाहों में लिपट रहा था गजरा

और सारे बदन से फूटता था

उसके लिए गीत जो लिखा था

हाथों में लिए दिये की थाली

उसके क़दमों में जाके बैठी

आई थी कि आरती उतारूं

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पुनः भेंट होगी...
>>>>>><<<<<<

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

3658....सृष्टि के पहले दिन...

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

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मेरे छुटपन में मेरी दादी अक़्सर एक कहानी सुनाती
 थी आज आप भी पढ़िए-
किसी गाँव में एक बेहद सरल गरीब दंपत्ति रहते थे खेत-खलिहान तो नहीं थे उनके पास, हाँ एक गाय थी जिसके दूध का पनीर बनाकर वह ग्रामीण शहर के एक दुकान में दे आता और बदले में दुकानदार उसे कभी चावल,आटा तो कभी तेल,चीनी और मसाले देता  जिससे उसका गुज़ारा चल रहा था।
एकदिन उसकी पत्नी ने कहा मैंने आज मक्खन बनाया है तुम आज इसे बेच आओ। ग्रामीण मक्खन लेकर उसी दुकानदार के पास गया, दुकानदार ने पूछा कितना मक्खन है ग्रामीण ने कहा दो किलो दुकानदार ने खुशी-खुशी सारे मक्खन ले लिए और बदले में आटा,चावल, चीनी, मसालों के साथ तेल और कुछ नकद रूपए भी दिए ,ग्रामीण बहुत उत्साहित हुआ और जल्दी ही ज्यादा मक्खन लेकर आने का कहकर वापस गाँव लौट गया। 
दुकानदार बार-बार मक्खन की थैलियों को देख रहा था उसे  मक्खन का वजन कम लग रहा था उसने सोचा सीधा-साधा ग्रामीण है क्या बेईमानी करेगा पर फिर भी शंका समाप्त करने के लिए उसने मक्खन तराजू पर चढ़ाया देखा तो दो सौ ग्राम कम है उसने झट से दूसरी थैली भी चढ़ाया इसमें भी दौ सौ ग्राम कम थे उसका गुस्से के मारे बुरा हाल था। इसबार जब ग्रामीण मक्खन लेकर आया तो वह दुकानदार उसे देखते ही फट पड़ा,खूब खरी-खोटी सुनाने लगा कहने लगा तुम बेईमान हो, तुम झूठे हो, मक्खन का वजन कम था  इस बार भी कम होगा कहकर ग्रामीण के द्वारा लाए मक्खन की थैलियों को तोलने लगा और दिखाने लगा देखो सबमें दो सौ ग्राम कम है ग्रामीण हक्का-बक्का दुकानदार के सामने हाथ जोडकर खड़ा हो गया और बोला सेठ जी मैं गरीब आदमी जैसे-तैसे करके पुरानी डलिया से तराजू तो बनवा लिया तोलने के लिए बटखरे कहाँ से लाता  इसलिए आपके दिए किलोभर चावल से मक्खन का वजन तोलकर पोटली बनायी है।
आप कहानी का संदेश और दुकानदार की हालत समझ सकते हैं।

-------

अब आइये चलते हैं रचनाओं के संसार में-

आज की पहली रचना में कवि के 
गहन मनोभावों को
पढ़ने का प्रयास करते हुए-
तुम क्या नहीं जानते /शांति का प्रतीक चिह्न
नन्हा, मासूम कबूतर/तुम्हारी मजबूत हथेलियों की 
कैद में सहमा हुआ छटपटाता रहता है
उस स्त्री की तरह ही/जो भरमा जाती है जादुई बातों से,
पुचकार सकते हो जिसे/रोज़-रोज़ बिखेर कर दानें।
 तुम सजग हो जाते हो/जब तुम्हारे बलपूर्वक किये गये
उपक्रमों से स्वतंत्र होने के लिए
वो जूझती हैं/तब तुम उदारता का ढोंग करते हो
क्योंकि तुम जानते हो/तुम्हारे लिए आसान नहींं होगा
पंख खोलती चिड़िया को पा लेना
पर बहुत ही आसान होगा/उसके पंख मरोड़कर चल देना...।
हैं सृष्टि के पहले दिन से ही स्वयंसिद्धा नारी,
जिस दिन से वो गर्भ में अपने हैं गढ़ती सृष्टि।
ना जाने क्यों समाज मानता कमजोर कड़ी ?
फिर ढोंग नारी दिवस का दुनिया क्यों करती ?

हमारा पूर्ण अस्तित्व भावनाओं की गीली यादों से भरी एक गठरी ही तो है, जिसे हम हर वक़्त उठाए या लटकाए चलते रहते हैं।  सोते समय भी उसे तकिये की तरह इस्तेमाल करते हैं, जागते-सोते हर समय इन्हीं में उलझे रहते हैं।  इसी गठरी की गांठे खोल समय-समय पर अपने मीठे-कड़वे अनुभवों को भावुकता के पालने में बैठाकर अतीत और भविष्य के बीच झुलते हुए वर्तमान जीना ही भूल जाते हैं और स्वयं
को आहत करते हैं।


वक्त के साथ चलते-चलते
जब पुरानी बातें कभी-कभी
दिल के कोने से निकल कर
आँखों के सामने दिखती हैं
तब मन का कुछ असहज सा
हो जाना, क्या स्वभाविक नही है!
यदि स्वीकार भी कर लूं तो
ये बावरा मन न जाने क्यूं
मजबूर कर देता है सोचने के लिए।
बीते दिनों के संघर्ष को,
राग और विराग को,


लाखों – करोड़ों का
 लेखा -जोखा/विश्लेषक बताते रहे
किसे मिला मौका
किसके साथ हुआ
फिर से  धोखा/एंकर चीखते-चिल्लाते रहे
हम मुँह बाये,
दिमाग चलाने का शो-ऑफ करते
पक्ष-विपक्ष में उलझे
ब्लड-प्रेशर बढ़ाते रहे...।
पढ़िये एक समसामयिक रचना।
तू आंकड़ों की बात कर
या डॉलरों पे आह भर
हम यू. एन. में ईतरा रहे
पाक को चिढ़ा रहे
चाइना को झूला रहे
छप्पन को फुला रहे

जीवन एक यात्रा है जो अपने अंर्तमन की यात्रा करता है 
वो इस संसार में आवागमन के रहस्यों के उस पार पहुँच जाते हैं और जो बाह्य जगत की  यात्रा करते है वो अगले जन्म का इंतज़ार करते है।प्रकृति में होने वाले
परिवर्तनों के माध्यम से संपूर्ण जीवन-गाथा 
कहती एक रचना।

निरंतर प्रवाह से जल धार के
मन के भी मौसम होते हैं और तन के भी
जैसे बचपन भी एक मौसम है
और एक ऋतु तरुणाई की
जब फूटने लगती हैं कोंपलें 
मन के आंगन में
और यौवन में झरते हैं हरसिंगार


और चलते-चलते
अनेक बार प्रयास किय मैंने
पृथ्वी की भाषा का अनुवाद भावनाओं में करने का
जीवंत हवाओं की ताल पर फुदकती मासूम भंगिमाओं के
परों को प्रखर सूर्य से छुपाकर विशाल छाया में समेटने का 
भगीरथ प्रयास सृष्टि का सबसे पवित्र संवाद है।
वृक्ष: आपकी ही बात नहीं, पतझड़ की शुष्कता सभी को उदासी से भर देती है लेकिन बसंत का आगमन पतझड़ के बाद ही होता है इसलिए सब मौन होकर रूखापन झेल लेते हैं। और अगर सच कहें तो उसमें बुरे लगने जैसी कोई बात है भी नहीं। ये तो प्रकृति देवी का बनाया गया नियम हैजिसे कोई भी तोड़ नहीं सकता। आगे-पीछे आना जाना ही संसार की नियति। 

/----///----/
आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही है प्रिय विभा दी।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

3657 ....सबके दिलों में अपने -अपने “अचल” बसते हैं

 सादर अभिवादन

प्रेम के इस अनूठे माह में
उसकी गर्दन को देखकर
चूम लेने का ख़याल आया ही नहीं था
बल्कि तस्वीर में उसकी गर्दन पर
अनगिनत बोसे रखे भी थे
लेकिन वह तस्वीर थी।

अब देखें रचनाएँ ....


आज का सच कहता है कि-
“सबके दिलों में अपने -अपने “अचल” बसते हैं”
जो दरकते हैं
तो तकलीफ़ों के साथ
कोरी टीस का ही सृजन करते हैं ॥




अपने प्यार की तुम
सदा करते हो
हम पर बरसात
कैसे समझ जाते हो तुम
हमारी खामोश
पुकार को
नहीं कहते जो
अपनी जुबां से हम
पूरी कर देते हो तुम




क़र्ज़ ए ज़िंदगी
कम नहीं, तक़ाज़ा
भी है बेहिसाब,
अक्स मुरझाया
हुआ, ओंठों पे है
खिलता गुलाब,





'छोटी जाति'
और 'बड़ी जाति'
ये दो शब्द हमें
हमारी मूर्खता का
प्रमाण देते हैं।
सृजनकर्ता ने जब
हमारे सृजन में
कोई भेद नहीं किया तो
वर्गीकरण का अधिकार
हमे किसने दिया?




मेरे गांव में उतरा करते हैं प्रेत,
जवान लड़कियों की दाग दी जाती है ज़बान,
मिर्चा और सरसों का धुँआ प्रेत भगाने का अचूक हथियार है,
औरतों के ही शरीर में पैठती है चुड़ैल,


आज बस
सादर

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

3656..चिराग जो जल रहा...

 ।।प्रातः वंदन।।

"द्वार खुले श्री ने शिशुओं के सर सूँघे, आँखें खोली,
सूर्य किरण का इंगित पा कर डाल डाल चिड़ियाँ बोलीं।

दिवा - प्रभा सब ओर दिवा की प्रभा हुआ रवि आरोही,
अन्धकार के जीव छिपे, जो रवि के नैसर्गिक द्रोही.."
पं. नरेंद्र शर्मा
प्रस्तुति क्रम के सिलसिले में आज लाई हूँ चुनिंदा लिंक जिसे आप सभी पढ़ें और चंद शब्दों से अलंकृत करें.✍️

वसंत आया देहरी पर 

सुबह हवाओं में खुशबू थी

खिले बाग़ में ढेरों फूल

कोयल कुहुक रही अमराई

पंछी रहे शाख पर झूल..

🏵️

 कई बार दरिया मेरे पास से गुज़र गया

और बात मै प्यासा का प्यासा रह गया


इक चराग़ जो जल रहा था मुसलसल 

रुखसती से उसकी वो  भी बुझ  गया ..

🏵️

डर..! सभी को लगता है

समाज में सबसे निडर फौजी जवानों को माना जाता है ! इसी विषय डर पर, 

सेना से अवकाश लेने के बाद जब 

एक साक्षात्कार में सैम मानेकशॉ से पूछा गया तो 

उन्होंने कहा कि जो इंसान..

🏵️

छलकी बदरी


छलकी क्यूं बदरी,
इक बूंद गिरी, या दुःख की जलधि!
समझ सके ना हम!

भीगे सब पात, यूं जागी रात,
हुई सजल, हर बात,

🏵️

जाएँगे हम मगर इस क़दर जाएँगे.
रख के सब की ख़बर बे-ख़बर जाएँगे.


धूप चेहरे पे मल-मल के मिलते हो क्यों,
मोम के जिस्म वाले तो डर जाएँगे...

🏵️

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

3655 ..मतलब वही... ग्रहदोष लगता है

 सादर अभिवादन

आखिर सन 2023 की आँखें बाहर देखने लगी
फरवरी की ओर...
इस वसंत को मौसम में एक और चढ़ेगा बुखार
कल से..वो है वैलेंटाइन का

अब देखें रचनाएँ ....




जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने  का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान  को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय।




विहीन प्रणय कविता, तलाशते हैं हम
रेत के नीचे अविदित जलाधार,
जहाँ छुपी रहती है अनंत
प्रीत की उत्पत्ति, धूप -
छाँव की तरह
प्रतिध्वनित
होती है




मेरी लाठी मुझे
सहारा तो देती है,
पर मुझे अच्छा नहीं लगता,
वह जब चलती है,
तो शोर बहुत करती है.




हे
सखी
वसंत
ऋतु आया
सब का मन
नाचे हो मतंग
खुशी से अंग-अंग
भर   गया   उमंग
सखियों के संग
देखूँ हो दंग
प्यारा रंग
अलग
रूप
है





अभी साधने है कई लक्ष्य ,
ज़िम्मेदारी के निभाने है कई चक्र ,
लिखनी कई #इबारत पसीने और खून से ,
अभी रखें दिल को जरा सुकून से ।




"ठीक है दादी ! मैं जरूर बात करुँगी मम्मी-पापा से।पर दादी ! मैंने एक बुक में पढ़ा कि अगर हम अच्छे से नहीं रहते , अपना काम अपने आप नहीं करते , चीजों को अस्त-व्यस्त फैलाकर रखते हैं और घर में जूते-चप्पल सही जगह सलीके से नहीं रखते तो हमारे ग्रहों पर भी इसका गलत असर पड़ता है। मतलब वही... ग्रहदोष लगता है, और फिर ऐसी गलतियों पर जब हमें बार-बार बड़ों की डाँट पड़ती है तो हम चिड़चिड़े भी हो जाते हैं" ।
.........................
आज बस
सादर

सोमवार, 30 जनवरी 2023

3654 / फ़िजाएँ बेईमान लगती हैं.

 

नमस्कार !   यूँ आज  शहीद दिवस है ........ महात्मा गाँधी जी की पुण्य तिथि  को  शहीद दिवस के रूप में  मनाते  हैं ...... जब - जब    महात्मा  गाँधी का  नाम आएगा  गोडसे  का नाम स्वयं ही याद आ जायेगा .....  ये ऐसा विषय है जिस पर कुछ न कहा जाये वही बेहतर है  यूँ  मैं गोडसे को हत्यारा  मानती हूँ देशद्रोही नहीं ..... 

खैर ..... आइये चलते हैं आज की हलचल पर ... ............  ब्लॉग्स  पर आने वाली पोस्ट क्या हलचल कर रही है  , यही देखना है ....... आज कल बसंत छाया हुआ है ...... प्रकृति में भी और ब्लॉग्स की रचनाओं में भी . आइये हम भी बसंत का आनंद लें ........ 

और बसंती ऋतु



झुंड में लहरों पे उड़ना

चहचहाना चोंच भरना।

एक लय एक तान लेके

फ़लक पे जाके उतरना॥


नए वर्ष का भी एक माह बीतने वाला है .......मात्र एक दिन बचा है .... और जनवरी का आखिरी इतवार लोग कुछ यूँ मना रहे हैं ....


ऊँची उड़ान


सफर जिंदगी का भाग रहा है

अपने वेग से,

चेहरे पर इस हँसी के पीछे दर्द

बहुत है..

यहां हौसलों ने जिद की है |

ऊँची उड़ान के लिए हौसले और संकल्प की ज़रूरत होती है  , लेकिन बचपन तो बस इन्द्रधनुषी सपनों में रहता है ....... आइये  आज की ही तारिख की एक  पाँच  साल  पुरानी पोस्ट पढ़िए .... 

इंद्रधनुषी स्वप्निल बचपन


सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियाना
जिसके तले मस्ती मे झुमता एक भोला बचपन ।

सपने थे सुहाने उस परी लोक की सैर के
वो जादुई रंगीन परियां जो डोलती इधर उधर।


हम यहाँ  बचपन के सपनों की रंगीनी से सराबोर हैं  लेकिन आज का बचपन किन परिस्थितियों से जूझ रहा है ये जानना बहुत ज़रूरी है ........ सबको इस विषय में जागरूक रहना आवश्यक है .... विशेष रूप से जिनके बच्चे अभी स्कूल  में पढ़ रहे हैं ........ बहुत बार अनजाने में ही ऐसा कुछ हो जाता है जिससे बच्चे और माता पिता भी परेशानी में आ जाते हैं ....... आइये जानते हैं इसके बारे में ......

वेपिंग…एक नया खतरा !

क्या आप जानते  हैं कि Vape यानि कि E Cigarette क्या है ? मैं तो नहीं जानती थी। यदि आप भी नहीं जानते तो जरा गूगल पर सर्च करिए और जान लीजिए। यदि आपके घर में युवा या टीनएजर हैं तो बैठ कर उनको उसके नुक़सान बता कर सख्त ताकीद करिए क्योंकि ये एक ऐसी लत है जो बहुत तेजी से स्कूल के बच्चों में पैर फैला रही है।

अभी फिलहाल हमारे एक परिचित का बेटा अज्ञानता के कारण मुसीबत में आ चुका है। उसकी क्लास के कुछ बच्चे क्लास में वेप ले रहे थे अज्ञानतावश उसने भी उसकी सुगंध से आकृष्ट होकर ले  ली। टीचर तक बात पहुँच गई और सख़्त एक्शन लिया गया। घर पर खबर भेजी गई। रेस्टीकेट करने की बात चल रही है। बच्चे का कहना था कि वो सुगन्ध से आकर्षित हुआ उसे पता नहीं था कि ये क्या चीज है ? यदि उसे पता होता तो मुसीबत से बच जाता।

पूरी जानकारी लीजिये लेख को पढ़ कर ...... और जहाँ तक हो सके बच्चों को भी इसके बारे में बता कर  आगाह करें ...... जितना ज्यादा ये इ - नेट वर्किंग है उतने ही ज्यादा खतरे बढ़ रहे हैं . नयी नयी तरह की नशे की चीज़ें ईज़ाद हो रही हैं .....हम जैसों को तो कभी कभी पुराना ज़माना ही याद आ जाता है ......

वो फ़ोन कॉल


हमारे समय में कम्प्यूटर नहीं था, नेट नहीं था, मोबाइल नहीं थी। किसी को जरूरी समाचार देना होता तो शहर में हरकारा दौड़ाया जाता, बात दूर, दूसरे राज्य की हो तो टेलीग्राम किया जाता। घर में किसी की बीमारी की खबरें तो खत का हिस्सा भी नहीं बनती थी, साफ छुपा ली जाती। तर्क यह होता, "बिचारे को क्यों परेशान किया जाय? आकर भी क्या कर लेगा!" 

घर में कोई मर जाय तो सीधे टेलीग्राम होता....Come soon. यहाँ भी मौत की खबर छुपा ली जाती, "बिचारा, अधिक दुखी हो जाएगा तो आएगा कैसे?"


कितनी ही बातें यूँ ही याद आ जाती हैं ....... तार का नाम सुनते ही घर में कोहराम सा मच जाता था ....... भले ही कोई ख़ुशी की बात हो ...... वैसे ख़ुशी पर टेलीग्राम  कम ही आते थे ....... अब तो टेलीग्राम का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है ...... सच कितना बदल गया है सब  कुछ ...... यहाँ तक कि इंसान भी ...... 

लोग बदल गए हैं


चिड़िया ने चिड़े से कहा - 

सुना है, लोग बदल गए हैं

और उनकी कोशिश रही है हमें बदल देने की !!!

पहले सबकुछ कितना प्राकृतिक, 
और स्वाभाविक था,
है न ?

बदल तो सच ही बहुत कुछ रहा है ...... हो सकता है कि स्थानों के नाम परिवर्तन से कुछ को आपत्ति हो ........ तो कुछ इसके पक्ष में हों ....... अपनी  राय न रखते हुए बस आप लोगों को इसकी जानकारी मिले इस उद्देश्य से  एक पोस्ट यहाँ  ले कर  आई  हूँ ...... 

अमृत-काल' की 'गणतंत्रीय सूचना' :
प्रतिवर्ष भ्रमणार्थियो के लिए खुलनेवाला 'मुग़ल गार्डन' इस वर्ष  'अमृत उद्यान' (नामांतरण) होने के बाद ही  31 जनवरी 2023 से खुलेगा।

सामान्य जानकारियां शेष नागरिकों के लिए :

1. 'भारतीय राष्ट्रपति भवन' के अंदर, रायसीना हिल्स पर 15 एकड़ में स्थित है मुग़ल गार्डन। 
2. 26 जनवरी 2023 से 'मुग़ल गार्डन' का नाम  'अमृत उद्यान' कर दिया गया है।


शेष जानकारी ब्लॉग पर जा कर लें ........कल  यानि २८ जनवरी को  नर्मदा जयंती थी ..... इस बात की जानकारी मुझे फेसबुक पर एक लेख पढ़ने से हुई ........ और उसके बाद ही ब्लॉग पर माँ नर्मदा की स्तुति में एक खूबसूरत रचना पढ़ने को मिली .... जिसे आप सबके साथ साझा कर रही हूँ ..... 

माँ नर्मदे ! उत्साह का आशीष दो माँ ...


अंतस भरा
तव औज से
मन तम हरा
रव मौज से

श्रद्धा का तुम
अवगाह हो 
भक्ति का नित
प्रवाह हो |

इंसान अपने ही बनाये चक्रव्यूह में  फँसता चला जाता है ........ ईश्वर  के भेजे सन्देश पढ़ ही नहीं  पाता ..... प्रकृति हमें नित नए सन्देश देती है ..... एक खूबसूरत रचना पढ़िए ....

गुंजार


तू जगा रहा है निज गुंजार से 

और हम न जाने

किन अंधेरों में सोए हैं 

एक क्षण के लिए

तुझसे नयन मिलते हैं तो |


किस कदर इंसान हैरान है ... परेशान है कि उसे सब कुछ बेईमान ही लगता है ..... कुछ ऐसा ही कह रही है ये ग़ज़ल ......


फ़िजाएँ बेईमान लगती हैं.


मुकद्दस  हवाएं  भी परेशान लगती हैं।

पातों की खड़खड़ाहट तूफान लगती हैं।

आग से शोर तो लाजमी है  बस्तियों में,

महलों की कैफ़ियत शमशान लगती हैं।

 अब अधिक तूफ़ान को न लाते हुए आज लिंक्स का सिलसिला यहीं ख़त्म कर रही हूँ ........ मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद ...... तब तक के लिए ...... 


नमस्कार 

संगीता स्वरुप .


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