निवेदन।


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सोमवार, 23 मई 2022

3402 ....... / हर पल फूलों सा खिल महके

 

नमस्कार !  आज वार के अनुसार बहुत दिनों बाद सोमवार की प्रस्तुति लगा रही हूँ  .  उम्मीद है इतने दिनों में भूले तो न होंगे ? वैसे याद दिलाने के लिए पिछले सप्ताह ही एक प्रस्तुति लगायी थी ...... वैसे कितना अपनापन सा मिलता है न जब कोई ये कहे कि आप हमें भूले तो न होंगे ........  खैर ...... हम तो इसी उम्मीद  में गुज़ार देते हैं वक़्त कि   ----

रहें ,  न रहें  इस जहाँ में हम 

करोगे  अक्सर  हमें  याद  तुम |

ब्लॉगिंग का जहाँ ज़िक्र होगा , 

उनमें एक नाम मेरा भी होगा ..|


एक बात बताइए कि यदि कोई आपसे आपका परिचय पूछे तो क्या जवाब होगा आपका ?  नाम , काम , धाम , घर गृहस्थी  आदि या ज्यादा से ज्यादा अपनी पढाई और उम्र  बता कर सोच लेंगे की परिचय  का आदान प्रदान हुआ ..... लेकिन कभी कभी इतना गूढ़ , और बिंदु बिंदु छूता हुआ , अपने आप को हर कसौटी पर उतारते हुए जो परिचय मिले तो बस उसमें डूब कर ही जाना जा सकता है ........ बानगी देखिये ... 

'अमृता तन्मय' : अपनी अन्तर्दृष्टि में


 "अपेक्षाकृत वह एक धीर-गंभीर श्रोता ही है और अपने समभागियों की निजी अनुभूतियों के भेद को भी स्वयं तक रखती है। वह निजता की मर्यादा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए खींची गई सीमा तक अस्पृश्य ही रहती है। वह न तो अन्य के जीवन में हस्तक्षेप करती है और न ही किसी को स्वयं के जीवन में हस्तक्षेप करने देती है। वह जितनी स्वतंत्रता औरों से चाहती है, उससे कहीं अधिक औरों को देती भी है। "

परिचय पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा की बहुत कुछ  " गीता "  के ज्ञान से प्रभावित  व्यक्तित्त्व  है ..... काश ऐसा कुछ  रंच मात्र भी जीवन में अपना लें तो जीवन सरल हो जाए ..... लेकिन कर्मों  का हिसाब तो होना ही है ........ जब गीता ज्ञान की बात चली है तो कृष्ण का होना तो ज़रूरी है ......... महाभारत के सभी पात्र मुझे बहुत आकर्षित करते रहे हैं ........ विशेष रूप से   "कर्ण .  '  लेकिन आज तक कभी कर्ण  पर कुछ लिख  नहीं पायी ......  आज आपके समक्ष  लायी हूँ कर्ण और कृष्ण   का वार्तालाप ...... 


कल रात

दिखा कुरुक्षेत्र का शमशान

कर्ण की रूह

अश्रुयुक्त आँखों से

धंसे पहिये को निहारती

जूझ रही थी

ह्रदय में उठते प्रश्नों के अविरल बवंडर से ...

- ऐसा क्यूँ . क्यूँ , क्यूँ ???


रश्मि प्रभा जी का लेखन बहुत गहन चिंतन की मांग करता है ....... कोई भी बात या काम अकारण नहीं होता ,  श्री कृष्ण का यही सन्देश है ..... तो यही मानते हुए कि जो हो रहा है सही है  --  बेचैन आत्मा उर्फ़ देवेन्द्र जी  भी अपनी बात रख रहे हैं ..... 

सत्ता



आम आदमी 
चिड़ियों की तरह
चहचहाता है..
वो देखो
चांद डूबा,
वो देखो
सूर्य निकला!

जहाँ सत्ता  की बात आती है  वहीँ न जाने कितनी प्रकार की  चिंगारियाँ प्रस्फुटित होने लगती हैं ....... अब इनको कुछ लोग  हवा देते हैं तो कुछ बुझा देते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो ऐसा ही छोड़ देते हैं ...... तो  कवि  दीपक जी ऐसे लोगों को सन्देश दे  रहे हैं  कि या तो हवा दो या बुझा दो ..... 

यूं ही #बेपरवाह न छोड़े #चिंगारी को !


र कहीं कुछ सुलग रहा है ,

तो उसे हवा दो या बुझा दो ।

यूं ही बेपरवाह न छोड़े #चिंगारी को ,

पर उसे उसका सबब बता दो । 

चलिए चिंगारी का तो इलाज  हो जाएगा लेकिन जो लोग निराशा के सागर में डूबते -उतरते रहते हैं उनका क्या ?  उनके लिए भी एक सार्थक सन्देश है .... मन की  वीणा  पर एक सुर मुखर हुआ है  -----

निराशा को धकेलो।



चारों ओर जब निराशा

के बादल मंडराए

प्रकाश धीमा सा हो

अंधेरा होने को हो

कुछ भी पास न हो

किसी का साथ न हो. 

 कुसुम जी --- माना कि  निराशा को हम धकेल दें लेकिन जो कुछ समाज में हो रहा है क्या उसे भी बदल सकते हैं .....  बराबरी की होड़ में कौन कहाँ पहुँच रहा जरा देखिये इस लघु कथा में ----

तीक्ष्ण दृष्टि


यहाँ घर में,कांता के मोबाइल में भी आठ आँखें बड़े गौर से उस वीडियो को देखने में व्यस्त हैं ।

ये लघु कथा इतनी लघु है कि इससे ज्यादा पंक्तियाँ मैं दे नहीं सकती ...... हाँ एक बात कि पढ़ते हुए कांता की जगह शांता पढियेगा ...... 

आज समाज में इतनी विसंगतियां देखने को मिलती हैं  कि सीधा साधा व्यक्ति तो स्वयं  ही  कीचड़ से किनारा करके  चलता है .....  गिरीश पंकज जी अपनी रचना से दूसरों को भी सन्देश दे रहे हैं ..... 



ऊपर उठने की ख्वाहिश में कुछ नीचे गिर गए
मन है मैला लेकिन बंदा तन को सजा रहा

जो सत्ता में आया समझो तानाशाह बना
हर कोई चमड़े का अपना सिक्का चला रहा|

इस सन्देश के साथ एक और सलाह ........ बहुत खूबसूरत सलाह दे रही हैं अनिता जी ...... काश सब उपवन सा खिले रहें .... 


उलझ न जाएँ किसी कशिश में 

नयी ऊर्जा खोजें भीतर,

बहती रहे हृदय की धारा 

अंतर में ही बसा समुन्दर !




दो दिन पूर्व चाय दिवस था ...... विभा जी ने बहुत खूबसूरत प्रस्तुति लगायी थी ........ उस दिन चाय दिवस  मनाते  हुए बहुत  सारी  पोस्ट  आयीं   पढने में बहुत आनंद आया और पढने से  ज़्यादा  यादों    को सहेजने में  आया ....... अब कुछ ने तो यादों की गुल्लक ही फोड़  दी ......... वैसे गुल्लक सोनी टी वी पर एक अच्छी सिरीज़ भी है ....... वो भी यादों की गुल्लक है ....... खैर ..... हम   अभी  बात कर रहे हैं ज्योति  खरे  जी की  , उन्होंने गुल्लक में से क्या  निकाला  है  ---


हांथ से फिसलकर
मिट्टी की गुल्लक क्या फूटी
छन्न से बिखर गयी
चिल्लरों के साथ
जोड़कर रखी यादें 

इन यादों के साथ चलते चलते  ज़रा   बच्चों की सोच पर भी ध्यान दे लिया जाय ........ बड़े लोगों की बड़ी बातें तो हम समझना चाहते हैं लेकिन बच्चों के मनोभाव पर भी थोडा सोचें ......... 

बिटियानामा


बिटिया हिंदी की एक कहानी पढ़ते जब चौरासी लाख योनि पढ़ी तो उसका मतलब पूछने लगी | हमने तमाम जीव  जंतु कीड़े मकोड़े की प्रजाति का नाम लेते ,  बात का मतलब बताते एक छोटा सा  लेक्चर भी  साथ दिया कि मनुष्य के रूप मे जन्म लेना कितना महान हैं | 


अब  सोचिये   कि मनुष्य जन्म कितना महान है .............   और  अभी अभी एक पोस्ट आई है  जिसे आप लोगों के साथ बाँट कर मुझे ख़ुशी होगी ........ परिचय से बात शुरू हुई थी और जिस शख्स  के बारे में पोस्ट है वो किसी परिचय का मोहताज नहीं ....... गगन शर्मा जी  लाये हैं कुछ अलग सा ..... 

रुस्तम ए हिंद गामा, कुश्ती का पर्याय, जीत की मिसाल


आज एक ऐसे भारतीय पहलवान का जन्म दिन है जो अपने जीवन काल में कभी भी कोई कुश्ती का मुकाबला नहीं हारा ! विश्व विजेता गामा एक ऐसा नाम, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है, जो जीते जी किंवदंती बन गया था। कुश्ती की दुनिया में गामा पहलवान का कद कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जन्मदिन के मौके पर गूगल ने भी डूडल बनाकर उन्हें सम्मान दिया है। 


आज की शीर्ष पंक्ति  अनीता जी की कविता का शीर्षक है ....

आज बस इतना ही ............ मिलते हैं अगले सोमवार को इसी मंच पर कुछ नए और पुराने  सृजन  ले कर .......  तब तक के लिए  इजाज़त दें ......
नमस्कार 

संगीता  स्वरुप 



रविवार, 22 मई 2022

3401 ....एक तिनका आँख में जो चुभ रहा, ढूँढना एकाग्र होकर चाहती

जय श्री राधे.....



आज सीधे रचनाओं की ओर..
भाई कुलदीप जी व्यस्त हैं आज

पहली बार


जग  को  अंधियारा  बांटती
है  ऐसी  मशाल दुनिया की

विंकल,  लम्हों का मेहमान
उम्र अनंतकाल  दुनियां की




वक्त का वरदान तुमसे चाहिए,
जिंदगी है वक्त मुझसे मांगती ।
एक तिनका आँख में जो चुभ रहा,
ढूँढना एकाग्र होकर चाहती ।।
क्या किया क्या कुछ मिला ये सोचना है ?
अंत में कुछ और क्या कर पाऊँगी ?
जिंदगी बन जाऊँगी ।।





मैं फुरसत से नहीं
उनसे एक जरूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा।
इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।'




रेखा के कैरियर में उमराव जान एक नया मोड़ साबित हुई, जिसमें रेखा ने अदायगी का जादू बिखेरा। इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना रेखा की अभिनय क्षमता का प्रमाण था। उमराव जान के बाद रेखा के करियर में मंदी जरूर आई, लेकिन निजी तौर पर फिल्म-जगत में उनका जादू अब भी बरकरार है। आज भी रेखा की क्षमता और रहस्य हमेशा दिलचस्पी का सबब बना हुआ है और शायद हमेशा बना रहे।


चाय है आज के जमाने का
अमृत पेय,
न मिले तो सुबह नहीं होती,




दूर से आती हुई आवाज़ भला कैसे सुनूं
मुझे अनहद पे यकीं आज भी बेइंतहा होता है
याद आता है स्पर्श माँ का जब भी
दिल के कोने में फिर इक ख़ाब सा महकता है



पुरानी बात, दूर की बात, 
छोटी बात भी कभी बड़ी लगती है
पर पास खड़ी ख़ुशी, मज़ा, 
हंसी, वफ़ा ओझल हो जाती है


.....
आज बस

सादर 

शनिवार, 21 मई 2022

3400... अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस

 

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...


चाय का इतिहास बहुत पुराना है. कहा जाता है कि लगभग 2700 ईसापूर्व चीनी शासक शेन नुंग बगीचे में बैठकर गर्म पानी पी रहे थे. इसी दौरान उनके कप में एक पेड़ की पत्ती आ गिरी. इसके बाद पानी का रंग बदल और महक भी उठी. जब राजा ने पत्ती वाले पानी के चखा तो उन्हें एक अलग स्वाद आया जो उन्हें अच्छा लगा. कुछ इस तरह से चाय का अविष्कार हुआ।


कुछ कथाओं में ऐसा भी कहा जाता है कि बौद्ध भिक्षुों द्वारा चाय का इस्तेमाल औषधि के रूप में किया जाता था और यहीं से चाय की शुरुआत हुई. वहीं भारत में चाय लाने का श्रेय ब्रिटेश ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया जाता है. आज चाय किसी परिचय की मोहताज नहीं है. घरों और बजारों में चाय के कई प्रकार मौजूद हैं. जैसे - वाइट टी, ब्लैक टी,  ग्रीन टी,  ओलांग टी और हर्बल टी आदि. भारत में चाय का सबसे ज्यादा उत्पादन असम राज्य में किया जाता है

मेरी तस्वीर देखकर भ्रम में ना पड़ें कि मैं चाय पीती हूँ.... कुछ बातें दिखावा की भी होती...

शुक्रिया

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 20 मई 2022

गुरुवार, 19 मई 2022

3398...गंगा-जमुना हैं कि बस.., बह निकली...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के साथ हाज़िर हूँ।

अभिवादन के इंतजार में

तभी तो वह

कागज में लिखे

शब्दों को पढ़ पाएगी

फिर

शब्दों के अर्थों को

लपेटकर चुन्नी में

हंसती हुई

दौड़कर छत से उतर आएगी

त्रिवेणी

किर्चें चुभ गई काँच सरीखी

और लहू की बूँद भी नहीं छलकी..,

गंगा-जमुना हैं कि बस.., बह निकली ॥

 

कविता | वस्त्र के भीतर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नेशनल एक्सप्रेस

आवरण है वस्त्र तो

जिसे पड़ता है बुनना

वरना

हर देह रहती है नग्न

अपने वस्त्र के भीतर

वस्त्र चाहे रेशम का हो

या सूत का,

वस्त्र मिलता है

दुनिया में आकर

और छूट जाता है यहीं

 माँ तुम यहीं हो

उस टकराते पानी को 
ध्यान से सुनती हूँ 
उस आवाज़ में मुझे 
अहसास होता है की 
माँ तुम यहीं हो

एक लघु कथा:

शाम होने लगी थी, लेकिन उसकी स्पीड कम नही हुई। ऐसा लगने लगा था जैसे आज तो कमरे में यही सोएगा। पर अब हमने कमर कस ली और डट कर मुकाबला करनी की सोची। एक झाड़ू हाथ मे लेकर उसे हवा में घुमाना शुरू किया ताकि उसका ध्यान भंग हो। लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। अब तो हम भी कमरे में ही घुस गए और उस पर निशाना साधने लगे। इस बीच श्रीमती जी को याद आया कि लोग इस पर तौलिया फेंककर पकड़ लेते हैं। लेकिन वह तरीका भी कारगर साबित नहीं हुआ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 18 मई 2022

3397..अजब युग है..

 ।।प्रातः वंदन ।।

जब उभरता है उफ़क की सुर्ख़ियों से आफ़ताब

खेलता है सरमदी नग़मों से फ़ितरत का रबाब

दौडती है पैकर ए आलम में जब रूह ए शबाब

कैफ़ में डूबी हुई होती है चश्म ए नीमखवाब


आसमान की रिफतों को छोड़कर आती है तू

तीरगी के आइनों को टोकर आती है तू

ज़िया फ़तेहाबादी

इसी खूबसूरत शायराना अंदाज के साथ आज की यानि बुधवारिय  सुबहा का आगाज़ करते हैं..






नीम का पेड़

शुक युगल 

एक सूनी डाल पर पत्तों के झुरमुट में छिपा सा बैठा था 

ऊँघता सुस्ताता कौआ

बिना ही काम चीं-चीं करती

किसी को खोजती, बुलाती एक पागल सी..

➖➖

मत चूको चौहान

 शिव दर्शन पाने को आतुर 
 सदियों से बैठा नंदी
 सौ करोड़ का गौरव क्यों 
 बना हुआ अब भी बंदी

तुष्टिकरण का आंखों पर 
चढ़ा हुआ था मोतियाबिंद
धर्म संस्कृति पर हमलों से
घायल पड़ा हुआ था हिन्द

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तुमसे कोई उम्मीद नहीं

तुमसे कोई उम्मीद नहीं
फिर भी न जानें क्यों सारी उम्मीदें तुमसे ही है
तुमसे कोई ख्वाहिश नही
फिर भी न जाने क्यों सारी..
➖➖

एक शाम मेरे नाम

जगजीत सिंह यूं तो आधुनिक ग़ज़ल के बेताज बादशाह थे पर उन्होंने समय समय पर हिंदी फिल्मों के लिए भी बेहतरीन गीत गाए। अर्थ, साथ साथ, प्रेम गीत, सरफरोश जैसी फिल्मों में उनके गाए गीत तो आज तक बड़े चाव से सुने और गुनगुनाए जाते हैं। पर इन सब से हट कर उन्होंने कुछ ऐसी अनजानी फिल्मों के गीत भी निभाए जो..

➖➖

मर्द हूं, अभिशप्त हूं

मर्द हूँ, 
अभिशप्त हूँ, 
जीवन के दुखों से 
बेहद संतप्त हूँ। 
बोल नहीं सकता 
कह नहीं सकता 
सबके सामने 
मै रो नहीं सकता.
भरी भीड़ में रेंगता है हाँथ कोई..
➖➖

 


परिवार

मनाने लगे 

परिवार दिवस 

अजब युग 


यह तो जुड़ा

।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

मंगलवार, 17 मई 2022

3396 .......... मोबाईल को छुट्टी दे दो .......

 

 नमस्कार ! यशोदा जी के आग्रह पर प्रयास कर रही हूँ  ........ हांलांकि  आग्रह तो उनका पिछले मंगलवार के लिए भी था ...... लेकिन तब नहीं कर पायी ........ श्वेता ने हनुमान बन संकट से  उबार लिया था ...... और सच कहूँ तो आज भी कुछ ऐसा ही लग रहा था की श्वेता को ही पुकारना पड़ेगा .... लेकिन कुछ हिम्मत कर ही ली .... तो हाज़िर हूँ आज कुछ चुनी हुई पोस्ट के साथ ..... 


यूँ तो भाषा का विकास अपने मनोभावों को एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए हुआ था और हम सब अपने मन की बात शब्द शब्द  दूसरे तक पहुँचाते हैं ...... लेकिन हर शब्द अपना अलग ही प्रभाव छोड़ता है ...... शब्द को ग्रहण कर कैसी मनः स्थिति रहती है ये तो वही बता सकता है  जिसने शब्दों के मर्म को समझा हो ...  समझिये आप भी -----

शब्द प्रभाव


जलते शब्दों के अमिट निशान
चिपक जाते हैं उम्रभर के लिए
मन के अदृश्य सतह पर
अनुपयोगी 
बर्थमार्क की तरह,

शब्दों का प्रभाव ही हमें ज़िन्दगी के बारे में अलग अलग नज़रिए से सोचने पर मजबूर करता है ... ज़िन्दगी  किसी को कुछ नज़र आती है तो किसी को कुछ ....... एक नयी उपमा के साथ रेखा जी बता रही हैं  कि  ज़िन्दगी क्या है .....

ये हादसों की इमारत !


ये जिन्दगी
हादसों की इमारत है,
जिसकी एक एक ईंट के  तले दबे
इस जिन्दगी के
कुछ न भूलने वाले 
हादसे ही तो हैं.

 आप हादसों की इमारत कहती हैं तो कोई ज़िन्दगी की तुलना चाय से दे देती हैं ..... उनका कहना है कि


वाणी जी का कहना है कि जिस तरह से चाय को अपनी पसंद का बना कर पिया जाता है उसी तरह ज़िन्दगी को भी अपने मन के अनुसार बना लेना चाहिए .....
लेकिन क्या सच ही इतना सरल है  ज़िन्दगी को अपने अनुरूप ढाल लेना ?  यदि सच ही ऐसा होता तो कोई दुखी तो हो ही नहीं सकता था ...... क्यों कि सब तो सुखी ही रहना चाहते हैं ......  अनीता जी भी तो यही कह रही हैं .... 

नहीं चाहिए


किसी को नहीं चाहिए 

कोई भी दुःख, पीड़ा या उलझन 

मिला भी है उसे हज़ार बार प्रेम का वर्तन !


वैसे वक़्त वक़्त की बात है ......... किसी को उसी बात में दुःख नज़र आता है तो किसी को ख़ुशी ...... कभी हमें कोई बात पसंद होती है तो कभी नापसंद ......... और कभी कभी तो जिसे हम नापसंद करते हैं वही शिद्दत से पसंद करने लगते हैं ..... .... उषा जी भी तो अपनी नापसंद को पसंद में तब्दील कर कुछ ऐसा ही लिख रही हैं .....


पीला


मुग्ध हो कहा पीले से-

माफ कर दो मुझे 

बहुत अनादर किया तुम्हारा 

हँस कर कहा उसने-

कोई बात नहीं

आदत है हम रंगों को…

रंगों के  माध्यम से क्या इंसान को लपेटा है ........  मान गए ........ अरे भई मानना तो हमें बहुतों को पड़  जाता है जो बिना लाग लपेट के खरी खरी कह जाता है ....  अब देखिये  ये आम आदमी पार्टी तो अभी बनी है ... लेकिन ये आम आदमी ( mangopeople )  वाला ब्लॉग  तो पहले से है , और इस पर निष्पक्ष रूप से अपनी बात रख दी जाती है .... आज भी कुछ विशेष लिखा है ..... 

विदेशी , भारतीय कैलेंडर


ज्यादातर लोग ध्यान नहीं देते लेकिन हमारे सारे तीज त्यौहार , हमारे यहाँ शादी विवाह आदि ज्यादातर शुभ काम सब भारतीय हिन्दू कैलेंडर से होता हैं और मुसलमानो का हिजरी | यहाँ अंग्रेजी कैलेंडर कोई नहीं देखता | ज्यादातर  सरकारी छुट्टियां भारतीय कैलेंडर के अनुसार होते हैं क्योकि त्यौहारों के कारण मिलने वाली ये छुट्टियां  अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से नहीं होती | 

उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कम्पनियाँ अपनी योजनाएं भी भारतीय कैलेण्डर को ध्यान में रख कर बनाती हैं | आपको बताऊ अकेले दिवाली पर जितने  फ्रिज टीवी एसी आदि इलेक्ट्रॉनिक सामन बिक जाते हैं उतना साल भर नहीं बिकता |

लोगों को कितना ही समझा लें लेकिन  सब अपने अधिकार याद रखते हैं लेकिन जब कर्तव्य की बात आये तो बगलें झांकने लगते हैं ...... इसी बात को खूबसूरत ग़ज़ल में ढाला है  गिरीश पंकज    जी ने .....



जाने क्या पाने की खातिर भटक रहे हैं हम दर-दर 
पास रखा संतोष हमारे वही ख़ज़ाना भूल गए

और जहाँ तक भूलने की बात है तो हम आपस के रिश्तों के साथ ही  हर चीज़ के प्रति फ़र्ज़ निभाना भूलते जा रहे हैं .... भूलते जा रहे हैं कि प्रकृति  ही हमारी  रक्षक   है ...... इसी भाव को सुधाजी ने  अपने शब्द दिए हैं ..... 



हम अचल, मूक ही सही मगर
तेरा जीवन निर्भर है हम पर
तू भूल गया अपनी ही जरूरत
हम बिन तेरा जीवन नश्वर

इसके साथ ही प्रदूषण पर एक अत्यंत  प्रभावी रचना पढवाने जा रही हूँ ..... .. विश्व मोहन जी के लेखन से आज हम  सभी परिचित हैं ...... और उनकी रचना का विश्लेषण कम से कम मैं तो नही ही कर सकती ..... आप पाठक स्वयं  ही लेखन की गहराई तक पहुँचें.. 

बैक-वाटर



समंदर!
उसे बाँहों में भरता।
लोट लोट मरता।
लहरों से सजाता।
सांय सांय की शहनाई बजाता
अधरों को अघाता
और रग रग पीता।
फिर दुत्कार देता
वापस ‘ बैक-वाटर’ में।

नदी को सीता की उपमा दे कर सोचने पर विवश कर रही है यह रचना ....... प्रदूषण तो  प्रदूष्ण  ही है ...... चाहे जल का हो या वायु का  या फिर शोर का लेकिन यहाँ मीना जी मोबाईल  के  प्रदूषण  की बात कर रही हैं और आग्रह कर रही हैं  कि एक दिन मोबाईल की छुट्टी कर दो ..... 


फिर से किताबों को,
भोले से ख्वाबों को,
लट्टू पतंगों को,
रिश्तों के रंगों को,
ढूँढ़ने चलो, या फिर
चिट्ठी लिख लो...

लेकिन मैं तो आज के दिन बिलकुल नहीं  चाहूँगी कि आप मोबाईल  की छुट्टी करें ..... क्यों कि फिर आप मेरे दिए गए लिंक्स तक पहुंचेंगे कैसे ?   तो कम से कम आज की छुट्टी नहीं ..... और आज अंत में  जो मुझको हो पसंद वही बात हम करेंगे  ........... एक अप्रतिम रचना ...... 



ये स्नेह स्वर कितना अनुरागी है
कि भीतर पूर नत् श्रद्धा जागी है
भ्रमासक्ति थी कि मन वित्तरागी है
औचक उचक हृदय थिरक उठा 
आह्लादित रोम-रोम अहोभागी है
कैसा अछूता छुअन ने है पुचकारा?

अब इसके बाद कुछ नहीं रह जाता लिखने को .......  इस काव्य रचना को पढ़ एक गीत याद आया उसका विडिओ  नीचे दिया है ...... 

 आप सब आज के लिंक्स का आनंद लें ....... और  बताएँ  कि आज की प्रस्तुति कैसी लगी ?  कमियाँ बताएँगे तो  सुधारने  में आसानी होगी ....... 

फिर जल्दी ही मिलने की कोशिश करुँगी .........  तब तक के लिए ....... नमस्कार 

संगीतास्वरूप  
















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