निवेदन।


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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

4859...दायरा समझ गये

मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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​प्रकृति कभी स्वार्थी नहीं रही; उसने हमेशा जीवन का पोषण किया है। लेकिन जब मनुष्य उसके धैर्य की सीमा लांघ जाता है, तो संतुलन बनाने के लिए प्रकृति अपना रूप बदलती है। ये प्रलयंकारी आपदाएँ वास्तव में मानव सभ्यता के लिए एक अंतिम चेतावनी हैं। यदि हमने अब भी अपनी जीवनशैली, लालच और प्रकृति के प्रति अपने रवैये को नहीं बदला, तो आने वाली नस्लों के लिए अस्तित्व का संकट और गहराता जाएगा।

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आज की रचनाऍं मेरे अंदाज़ में-




भोर की किरणें 

मद्धम और शांत संगीत की तरह है

जिसकी स्वर्णिम आभा में बहती गुनगुनाहट को

केवल एकाग्र और शांत मन से ही

महसूस किया जा सकता है।

​परंतु, दिन की आपाधापी,

दौड़-भाग और कोलाहल में

आत्मा को तृप्त करने वाली  मधुर ध्वनि

कहीं लुप्त हो जाती है।

​फिर जब ढलती शाम के धुंधलके में

सृष्टि का कोलाहल शांत होने लगता है,

तब वही नीरवता चुपके से पास आकर

जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—

​कि कुछ पाने और हासिल करने की लालसा में

हम निरंतर भागते तो रहते हैं,

किंतु जीवन का वास्तविक आनंद, सत्य और सार

केवल भागने में नहीं,

बल्कि अंततः ठहर जाने और शांत हो जाने में ही है।

​ज्ञान की पहली सीढ़ी यही है कि 

हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर लें,

 जो बीत गया वह विधि का विधान था,

किंतु आने वाला कल अब भी हमारे संकल्पों के अधीन है।

​यदि मन में जानने की सच्ची तड़प हो

और जीवन में त्याग का भाव समाहित हो,

तो समय का हर क्षण एक नया मार्गदर्शक बन जाता है।

​बहती नदी की भांति निरंतरता ही

मन और चरित्र को निर्मल बनाए रखती है;

जहाँ निष्काम भाव से कर्म करते हुए

परिणामों को ईश्वर अथवा समय के

 चरणों में सौंप दिया जाता है।

इस निष्काम कर्म तथा निस्वार्थ समर्पण की नींव

केवल और केवल 'प्रेम' ही हो सकती है,

क्योंकि प्रेम के बिना सच्चा समर्पण संभव ही नहीं।

हमारी खामोशी को गलती मान लिया गया,

असल में हम इस दुनिया का दस्तूर और चालाकी बहुत जल्दी समझ गए।

​जब महफिल में हमारा परिचय हो रहा था,

तब किसी खास की  चुप्पी  

असलियत बयान कर गई।

​हमने हमेशा अपनी सीमाओं को स्वीकार किया ,

क्योंकि हम खुद को असीम दरिया नहीं,

बल्कि एक सीमित दायरा में रहने वाला इंसान मानते हैं।

​सिर्फ़ वाह-वाही और तारीफ पाने के लिए नहीं लिखी 

कभी हमने दास्तां अपनी 

आपने हमारी आत्मा की पुकार को महज एक मुशायरे की नुमाइश समझ लिया।

​हम तो बस कुछ पल के लिए क़लम बदलने ओझल हुए थे,

और आपने इतनी ही देर में हमें हमेशा के लिए लापता मान लिया।

अक्सर परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव या समय की विपरीत चाल में जो लोग लापरवाह होते हैं, वे संयोगवश सफल और सही दिखाई देने लगते हैं, जबकि अपनी जिम्मेदारी और नियमों का ईमानदारी से पालन करने वाले लोग असमंजस में पड़कर असफल या बेवक्त साबित हो जाते हैं।

​किंतु दुनिया का यह अन्याय या अनिश्चितता हमारे सिद्धांतों को बदलने का आधार नहीं बननी चाहिए। बाहरी परिणाम और दुनिया की सराहना चाहे जैसी भी हो, व्यक्ति को समय की कद्र, अपनी जिम्मेदारी और अपने नैतिक मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए। सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर बने रहना ही जीवन का वास्तविक धर्म है।

मिट्टी की सोंधी महक महसूस करना

अपनी जड़ों की ओर लौटते मन की एक पुकार है,

जहाँ प्रकृति के आंगन में खिलते जीवन की रंगत

और समाज की विविध परतों का सच सिमटा हुआ है।

​इंसानी रिश्तों के अनसुलझे ताने-बाने,

दिलों में पनपते प्रेम, करुणा और संघर्ष के भाव,

और बदलती दुनिया के बीच

मेरी माटी तेरा मोह न छूटे वाली

अनवरत तड़प

​इस जीवन का हर एक पृष्ठ

मनुष्य के व्यवहार और स्वभाव का दर्पण है,

जो यह याद दिलाता है कि इंसान

चाहे कितना भी उड़ ले,

उसकी आत्मा का अंतिम विश्राम

अपनी ही माटी के आँचल में है।


-श्वेता



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

4858...इतनी बजे बाद यह मत किया करो...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में आज पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

भार्गव राम खण्डकाव्य - 56

आ गईं दिवस इक देवि  गंगा,

था साथ में उनका पुत्र देवव्रत।

कर रही प्रार्थना अब  गंगा थी,

भगवन! शिष्य बना लो देवव्रत।।

*****

वफ़ादारी

पर इतना ज़रूर है

कि वफ़ादार

एक किरायेदार है

जिसे मकान मालिक

कभी भी निकाल सकता है

किराया बढ़ा सकता है

यहाँ यह मत करो

वहाँ ये मत करो

इतनी बजे बाद यह मत किया करो

50 प्रतिबंध लगा सकता है

*****

शिक्षक दिवस पर शुभकामनाएँ

परम कृपा के हम अभिलाषी

वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये,

भाषा का विकास हो प्रतिपल

शब्दों में भी मौन समाये!

*****

राष्ट्र निर्माता और संस्कृति संरक्षक होता है शिक्षक

 'मालविकाग्रिमित्रम' नाटक में महाकवि कालिदास ने कहा हैं-
लब्धास्पदोऽस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।

यस्यागमः केवल जीविकायां तं ज्ञानपण्यं वाणिजं वदन्ति।। "

- अर्थात जो अध्यापक नौकरी पा लेने पर शास्त्रार्थ से भागता है, दूसरों के अंगुली उठाने पर चुप रह जाता है और केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ाता है, ऐसा व्यक्ति पंडित (शिक्षक) नहीं वरन् ज्ञान बेचने वाला बनिया कहलाता है। लेकिन दुःखद पहलू है कि आज ज्ञान से पेट भरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा नजर आती है। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तीव्र गति से विद्यालयों की संख्या बढ़ी उस अनुपात में शिक्षा का स्तर ऊँचा होने के बजाय नीचे गिरना गंभीर चिन्ता का विषय है।

*****

 असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि..

इसलिए जीवन में न तो अपनी तारीफ सुनकर घमंड करना चाहिए और न ही किसी को इतना सिर पर चढ़ाना चाहिए कि वह दूसरों को छोटा समझने लगे। असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, संयम और विनम्रता में होती है। जो लोग खुद को साबित करने के लिए शोर नहीं मचाते, उनका खामोश आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनता है।

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 6 सितंबर 2026

4857 ..जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,

 सादर अभिवादन 

शिक्षक और गुरु में क्या अंतर है ?
आज सर्वश्रेष्ठ शिक्षक कलाम साहब को नमन करते हैं...विद्यालय और विश्वविद्यालय के
सभी शिक्षकों को नमन करते हैं जिनकी वजह से हमें पढ़े-लिखे का दर्जा मिला है।
स्वामी परमहंस जी महाराज को गुरु पूर्णिमा के दिन याद करते हुए नमन करेंगे।


माता को प्रथम गुरु कह सकते हैं...
प्रथम शिक्षक नहीं।

पसंदीदा रचनाएं



अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.

जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हुकूमत मेरे गोपाल की है.






नेहा ने जाकर दरवाजा खोला। सामने पड़ोस में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला खड़ी थीं। चेहरे पर अपनापन था, लेकिन थोड़ी झिझक भी। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटी, नमस्ते… आज घर में मेहमान आ गए हैं। चाय बनाने लगी तो पता चला चीनी खत्म हो गई। अगर थोड़ा सा मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”




अवसाद , सन्नाटा .. 
अधजगी रातें

कान में बजती अनगिनत बेगैरत आवाज़ें
और टूटता तिलिस्म

कविता 
हमेशा कविता नहीं होती है




माखन  मटकी
देख यशोदा
असली-नकली पहचाने
मिलावटी जब
दूध दही हो
लल्ला को क्या दे  खाने
छींके पर 
भूख टंगी कहती
स्विगी से ऑर्डर कर आए




नंद-यशोदा का वो आँगन 
कुंज गली, यमुना तट, पनघट, 
वृक्ष कदंब का, व्रज की भूमि 
अब सुनते भी तेरी आहट ! 




आज शिक्षक दिवस के पुनीत  अवसर पर हमारे मन में हमारे दो राष्ट्रपति सजीव हो उठते हैं। एक तो राधाकृष्णन और दूसरे अब्दुल कलाम। पहले ने  अपनी  जन्मतिथि को शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया, तो दूसरे ने अपने जीवन की अन्तिम साँस भी शिक्षक की भूमिका निबाहते हुए ही ली। ज्ञातव्य है कि एक कक्षा में पढ़ाते समय ही कलाम साहब का देहावसान हो गया था। पता नहीं भारत के भविष्य को ऐसे महिमामय महापुरुष और भारत के सत्ता शिखर को ऐसे सुखद संयोग फिर कभी नसीब हो या न हो! परन्तु यह  बात तो तय है जो जीवन के कुरुक्षेत्र में योग का अमृत बाँचते हुए आध्यात्मिक गुरु योगेश्वर श्री कृष्ण ने किंकर्त्तव्यविमुढ और आत्मिक उलझनों में उलझे अवसन्न अर्जुन को ये शाश्वत वचन सुनाए थे कि  ‘कर्म के बीज का नाश नहीं होता’। 

सादर समर्पित
वंदन

शनिवार, 5 सितंबर 2026

4856...हराम की नहीं खाता वो...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया रोली अभिलाषा जी की रचना से।

सादर अभिवादन। 

चित्र साभार:गूगल 

आज शिक्षक दिवस है। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति(1952-62) व दूसरे राष्ट्रपति(1962-67) रहे डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन मूलतः एक शिक्षक थे,दुनिया उन्हें एक महान दार्शनिक,शिक्षाविद,लेखक और चिंतक के रूप में जानती है। उन्होंने हिंदू-धर्म(Hinduism) की महान शिक्षाओं और मर्म को दुनिया के समक्ष प्रचारित और प्रसारित किया। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के एक गाँव में हुआ था। उन्होंने अपना जन्मदिवस शिक्षकों को समर्पित किया था।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का यादगार कथन-

यदि मानव दानव बन जाता है तो यह उसकी हार है, यदि मानव महामानव बन जाता है तो यह उसका चमत्कार है। यदि मनुष्य मानव बन जाता है, तो यह उसकी जीत है।

'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से शिक्षक-वर्ग को हार्दिक शुभकामनाएँ।     

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

 एक टूटा सपना

तेरा तसव्वुर था

या मेरी खामखयाली थी

नहीं जानती

बस जानती हूँ तो सिर्फ यह

कि मुद्दतों बाद एक आस जगी थी

*****

कविता | सुबह की चाय संग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भीगते हैं

इस क़दर वे

कि जैसे आंसुओं से

भीगते है शब्द अकसर

वे आंसू भी कभी

ग़म के, ख़ुशी के

कि बारिश से हुए तर

नीम पर

*****

गालीबाज

न हीं इस फिराक में रहता है

कि कोई दुम हिलाए उसके सामने

या फिर मांगे माफ़ी

जो होता है बस वही दिखता है

घिनौना, वाहियात, लिजलिजा

हराम की नहीं खाता वो

*****

कसकें

एक

बड़ा ही

वजनी पत्थर,

रखा है सीने के ऊपर

पूछो न मुझसे ऐ दोस्तों

कसकें दबीं हुईं हैं

कितनी  सारी

इस सिला

तले

*****

नटखट बकरी

चेतना सदा पदार्थ से अलग है पर उसका अनुभव पदार्थ में जाकर ही हो सकता है। यदि पानी ही पानी हो तो पानी को अपनी खबर नहीं होगी, थोड़ी सी भूमि आ जाये तो जल स्वयं को भूमि से पृथक मानेगा और अपने पर भी नज़र जाएगी। उनका भी यही हाल है, वे जो नहीं हैं, जब वह देखते हैं तो ख़ुद पर भी नज़र जाती है।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

प्रार्थना: समस्त चयनित रचनाकारों से क्षमा याचना कि तकनीकी कारणों से आमंत्रण सूचना संबंधित रचनाकार के ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं हो पा रही है, असुविधा के लिए खेद है। 


शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

4855.....जीवन क्षणभंगुर है

शुक्रवारवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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राधे-राधे


पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥

अर्थात्

मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ, अग्नि में उष्मा हूँ, समस्त प्राणियों में वायु रूप में प्राण हूँ और तपस्वियों में तपस्या भी मैं ही हूँ। 

गीता में कृष्ण ने स्वयं कहा है कि

संसार के समस्त प्राणियों में उनका अंश है फिर

क्यूँ रह-रह कर पुकारते हो ,बाट जोहते हो, रोते-कलपते हो, शिकायतें ,उलाहना और उनके अस्तित्व पर प्रश्न क्यों?
 उनके दिये ज्ञान को आत्मसात करो,अपने कर्मों का विश्लेषण करो, अपने अंतर के
कृष्ण को पहचानो तभी अंधकार मिट पायेगा।

जीवन में कर्म ही प्रधान है,सर्वोपरि है।

श्री कृष्ण एक ऐसा चरित्र है जो बाल,युवा,वृद्ध,स्त्री पुरुष सभी के लिए आनंदकारक हैं।

कृष्ण का अवतरण अंतःकरण के ज्ञान चक्षुओं को खोलकर प्रकाश फैलाने के लिए हुआ है।

भगवत गीता में निहित उपदेश ज्ञान,भक्ति,अध्यात्म,सामाजिक,वैज्ञानिक,राजनीति और दर्शन का निचोड़ है जो जीवन में निराशा और नकारात्मकता को दूर कर सद्कर्म और सकारात्मकता की ज्योति जगाता है।

*बिना फल की इच्छा किये कर्म किये जा।

*मानव तन एक वस्त्र मात्र है आत्मा अजर-अमर है।

*क्रोध सही गलत सब भुलाकर बस भ्रम पैदा करता है। हमें क्रोध से बचना चाहिए।

*जीवन में किसी भी प्रकार की अति से बचना चाहिए।

*स्वार्थ शीशे में पड़ी धूल की तरह जिसमें व्यक्ति अपना प्रतिबिंब नहीं देख पाता।

 *आज या कल की चिंता किये बिना परमात्मा पर को सर्वस्व समर्पित कर चिंता मुक्त हो जायें।

 *मृत्यु का भय न करें। 


 और भी ऐसे अनगिनत प्रेरक और सार्थक संदेश है 

कर्म के संबंध में श्रीकृष्ण के बेजोड़ विचार अनुकरणीय है। भटकों को राह दिखाता उनका जीवन चरित्र उस दीपक के समान है जिसकी रोशनी से सामाजिक चरित्र के दशा और दिशा में कल्याणकारी परिवर्तन लाया जा सकता है।

एकमात्र सत्य यही है कि

कृष्ण को शब्दों में बाँध पाना असंभव है।


आज की रचनाएँ-
























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अधुरम मधुरम


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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