सादर अभिवादन
शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं
और मनाते रहेंगे
दूर कहीं तब नज़र आएगा
अंतरिक्ष में दिशाहारा पखेरू
जाने -किधर जाएगा,
गिर कर बिखर
सोचने में भी मुझे अब शर्म आती थी.
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनीता जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए कुछ लघुकथाएँ,
कुछ कविताएँ-
“छड़ी तो सिर्फ़
ज़मीन का सहारा देती है, मालती… तुम्हारा हाथ
थामता हूँ तो मन को सहारा मिलता है।”दीनानाथ जी ने
उनकी आँखों में देखते हुए कहा,
वे कुछ पल रुके
“पचास साल पहले
जब इस हाथ को थामा था न, तब से आज तक कभी लगा ही नहीं कि मैं अकेला चल
रहा हूँ।” दीनानाथ जी ने कहा।
*****
सीमा भी अपने घर में अकेली
थी और उसका पति राजेश भी, इसलिए कोई चचेरा, ममेरा भाई या बहन भी नहीं
थे।इसके पहले वे लोग जिस शहर में रहते थे, मकान मालिक के छोटे बेटे को राखी बाँधकर आशा कितनी खुश हुई थी। इस शहर में वे
नये-नये आये थे। माँ को चुप देखकर आशा ने उसकी बाँह पकड़ कर हिलाई, तो अचानक जैसे उसे कोई
अनोखा हल मिल गया।
*****
रक्षाबंधन पर
हार्दिक शुभकामनाएँ
कभी समरभूमि में बहन ने, जय-तिलक संग राखी बाँधी
कभी संकट में इक पुकार पर, रिश्तों ने मर्यादा साधी !
इतिहास के पन्नों में मिलती, त्याग और साहस की कथाएँ
राखी की कच्ची डोरी ने, गढ़ डालीं कितनी गाथाएँ !
*****
पूरा डिब्बा वात्सल्य रस से सराबोर था
माँ ने सामने वाले माँ और
जिद करते बच्चे को देखा,
भूख से वह भी रो रहा था, कोई डांट-फटकार उसे चुप
नहीं करा पा रही थी,
भूखा है बच्चा तुम्हारा। कब
से देख रही हूं, ...
बुरा न मानो तो ये बचा दूध
उसे पिला दो,
दूसरी मां ने बिना ना-नुकुर
किए बच्चे के मुख में बोतल दे दी।
बच्चे की क्या जात?
*****
जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें
आधी रातें, कथा- कहानी
खाट, दरी, बस चादर, तकिया
माटी-रची सुराही –पानी
*****
उसने
पूछा-मैं क्या हूँ तुम्हारी?
चुप होना ! -
उसका चुप होना
लगता है मानो
धरती का रुक जाना !
रंग सी है -
वह ज़िन्दगी के
कैनवास में
ख़ुशी के एक रंग सी है !
*****
नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से इन्होंनें खरीदी थी।
उसी क्षण समझ में आया दादी इत्र नहीं बचा रही थी,
उस दिन की खुशबू बचा रही थी,
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना
शुरू किया था।
*****
रवीन्द्र सिंह यादव
सादर अभिवादन
आज रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जा रहा।
कहते हैं, कच्चे सूत के धागों में जो ताकत होती है, वो दुनिया की बड़ी से बड़ी फौलादी जंजीरों में भी नहीं होती। रक्षाबंधन सिर्फ एक पर्व नहीं है; यह तो भाई की आँखों में बहन के लिए छिपी फिक्र है, और बहन की दुआओं में भाई की तरक्की का अटूट विश्वास है।
आज का दौर बदलाव का दौर है। हमारी जीवनशैली, हमारी प्राथमिकताएं और यहाँ तक कि हमारे त्योहार मनाने के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। ऐसे में जब 'रक्षा बंधन' का पावन पर्व हमारे सामने आता है, तो यह केवल एक पारंपरिक रीत मात्र नहीं रह जाता, बल्कि समकालीन समाज की प्राथमिकताओं को टटोलने का एक आईना बन जाता है।
इतिहास गवाह है कि रक्षा बंधन का उद्गम सुरक्षा के एक मूक आश्वासन से हुआ था। एक ऐसा दौर जहाँ कलाई पर बंधा सूत का धागा जीवन भर की रक्षा का दायित्व सौंप देता था। लेकिन आज, जब देश की बेटियाँ अंतरिक्ष से लेकर कॉरपोरेट जगत तक और खेल के मैदानों से लेकर सीमाओं तक अपनी योग्यता का परचम लहरा रही हैं, तब 'सुरक्षा' के इस पारंपरिक नजरिए को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। आज की बहन सिर्फ रक्षा की याचक नहीं है, वह खुद में इतनी सशक्त है कि संकट के समय अपने भाई की ढाल बन सके। आज का रक्षा बंधन भाई-बहन के बीच 'निर्भरता' का नहीं, बल्कि 'सह-अस्तित्व और समानता' का उत्सव है।
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन।।
"सत्य का एक चेहरा होता है
रंगहीन भी नहीं होता सत्य !
लेकिन झूठ की तरह
हर कहीं नहीं होता सत्य
न ही झूठ में घुल पाता है
अगर होता है कहीं तो
अलग से दिव्या आलोक लिए
दमकता रहता है सत्य !"
गोविंद माथुर
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ आज शामिल रचनाए को देखिए ..✍️
शहर त्रस्त था
अँधेरों से।
उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया..
✨️
सावन में भगवान शिव की महिमा पर रोला छंद
परिचय
सावन आते ही मन भोलेनाथ की भक्ति में रम जाता है। चारों ओर बम-बम भोले की गूँज और शिव ..
✨️
बदल जायेंगे मन के मौसम , बेवजह यूँ ही मुस्कुराइए
छँट जाएँगे ग़म के सारे बादल
हर रात लाती है सुबह ये जान जाइए ..
✨️
नियति की
हर क्रिया में
कर्म की प्रतिक्रिया सा
निर्बाध निर्विरोध
लेता हूं अवश्य ही
प्रतिशोध..
✨️
सरगोशियों के स्वर
‘या निशा सर्व भूतानां तस्यां जाग्रति संयमी’ – अर्थात जो सब जीवों के लिये रात्रि है, वह आत्मविश्लेषी मुनियों के लिए दिन है। प्रोफ़ेसर (डॉक्टर) सुशील कुमार जोशी एक ऐसे ही साहित्यिक मनीषी हैं जो अपने ‘उलूक’ के साथ अपनी ‘सरगोशियों के स्वर’ में समकालीन समाज के विश्लेषण को अभिव्यक्ति देते हैं। उलूक अर्थात उल्लू एक निशाचर पक्षी है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अत्यन्त सतर्क निगाहों से बिना किसी आहट के अपना आखेट ढूँढ लेता है। ज़ाहिर है, अपने ‘उलूक’ के साथ विचरण और कानाफूसी करते डॉक्टर जोशी आज के समाज की उन तमाम विसंगतियों को बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं और अत्यन्त सूक्ष्मता से उसका तार-तार उधेड़ देते हैं। कवि डॉक्टर जोशी का प्रस्तुत कविता संग्रह ‘सरगोशियों के स्वर’ उसी तार-तार हुए समाज के सच का बड़ा मर्मस्पर्शी उद्गार है। सत्तर कविताओं का यह संग्रह अपने आस-पास के जीव..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
मंगलवारीय अंक में
संक्रमित पेड़ के
एक डाल के कीड़ों
पर कीटनाशक छिड़ककर
ख़ुश होना कि पेड़
संक्रमण मुक्त हुआ
जबकि सच तो जड़
को खोखला कर रहा
भ्रम में जीना
अच्छा लगता है हमें।
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