।।प्रातःवंदन।।
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..✍️
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
।।प्रातःवंदन।।
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..✍️
इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय दिगंबर नासवा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा चयनित रचनाएँ-
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए ...
मिट्टी कटी किनारों की - राहुल शिवाय
उसी भाव से टाँके तुमने टूटे बटन कमीज के
जैसे मेरी उम्र माँगने करती हो व्रत तीज के।
या
या फिर
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मासिक बाल पत्रिका किलोल में प्रकाशित बाल कविताएं -आकिब जावेद
सादर अभिवादन
शुक्रवारीय अंक में
आज महात्मा गाँधी जी की
पुण्यतिथि है।
वैचारिक मतभेदों को
किनारे रखकर,
फालतू के तर्क-वितर्क में
पड़े बिना
आइये सच्चे मन से बापू को कुछ
श्रद्धा सुमन अर्पित करें।
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दुख से दूर पहुँचकर गाँधी।
सुख से मौन खड़े हो
मरते-खपते इंसानों के
इस भारत में तुम्हीं बड़े हो
- केदारनाथ अग्रवाल
एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्म गाँधी को दिया था,
जिस समय अधिकार, शोषण, स्वार्थ
हो निर्लज्ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्द्व
सद्य: जगे, संभले राष्ट्र में घुन-से लगे
जर्जर उसे करते रहे थे,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्या किया था?
- हरिवंशराय बच्चन
गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाजों के भी बाज थे ।
क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।
-रामधारी सिंह "दिनकर"
तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन;
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन!
- सुमित्रानंदन पंत
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख
-सोहनलाल द्विवेदी
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गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं
जम्हूरी, जलालत ललाट,
नई सरकार, वही ' सम्राट'।
जो नैतिकता को काट- काट,
और मर्यादा छांट- छांट।
इज्जत आबरू चाट- चाट,
नराधमों में बांट- बांट।नई सरकार, वही बांट- बांट।
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वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई..
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वो लम्हा तुम जरा बताओ,
जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,
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अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था।
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शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंस
सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे
एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,
सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।
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पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️