निवेदन।


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सोमवार, 10 अगस्त 2026

4830 ..कभी उसी स्याही ने "वंदे मातरम्" लिखा था,

 सादर अभिवादन 


अब सिर्फ कहानी ही नहीं कविता भी
सादर आमंत्रित है
अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है आजादी, स्वतंत्रता, उड़ान
पिछला अंक देखिए



पसंदीदा रचनाएं




सज़ा इस ज़िन्दगी में क्या कोई इस से बड़ी होगी,
जिसे हो भूलना उस बेवफा से प्यार हो जाना.

में अपनों से तुम अपनों से लड़ो मिलना है तब मुमकिन,
मगर मुश्किल है रांझा-हीर का किरदार हो जाना.





धवल कागज़ पर
स्याही
धब्बा नहीं होती,
वह
कागज़ का श्रृंगार होती है।

कभी
उसी स्याही ने
"वंदे मातरम्" लिखा था,




दमयन्ती ने प्रसाद के पैसे उसकी ओर बढ़ा दिए-
"जा कुछ लेकर तुम और बेटी खा ले और बचे हुए पैसे से बच्चे के  लिये दूध.....l"
फिर प्रसाद के सारे पैसे भी ........
"जा इसके पिता का इलाज.....
उसने मंदिर में प्रवेश कर दुर्गा माता और हनुमानजी को प्रणाम किया और घर की ओर....





सबसे कठिन है
उन स्त्रियों को पढ़ पाना
जिन्हें
लिखना नहीं आता।



उनकी ओढ़नी पर नहीं,
आँखों में
रेत की महीन किरच-सा
अटका रहता है।

समुद्र-तट पर मैंने जाना
समुद्र-तट पर मैंने जाना 
कि जहां लिखना आसान होता है, 
वहाँ मिट जाने का ख़तरा 
बहुत ज़्यादा होता है। 



सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 9 अगस्त 2026

4829...व्योम से विशाल नयनों में जगत के दुख समा जाते ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरं जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में चुनिंदा रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

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स्याही में खोया संघर्ष

सोच रही हूॅं ...

मुझे नहीं समझ राजनीति की,

मैं खोना नहीं चाहती तर्क के ज़ाल फेंकते

वामपंथी,दक्षिणपंथी या विचारधाराओं की आड़ में 

विष वमन करते क़लमधारियों की

मन में ​सवाल तैर रहे हैं—

क्या पढ़ाई की परिभाषा केवल कुछ नामों तक सीमित है?

या फिर उन हज़ारों बेटियों के पसीने में भी

वही मशाल जल रही है?

*****

जीने की कला

धन मिला, पर बुझ गया मन

यश मिला, पर ढल गया तन

घर बनाया एक सुंदर

किंतु छायी ग़र थकन!

पूर्ण होकर भी,

अधूरे ही रहेंगे

वे सपन!

*****

मैं अनभिज्ञ

मै हतप्रभ, सुनता रहा शब्दों का झुनझुना,

व्यथा गढ़े, ‌‌शब्दोऺऺऺ की अभिव्यजना,

ना-समझी की, हद थी,

रहा शेष, कितना कुछ सुनना!

कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?

*****

यात्रा में हैं सभी

व्योम से विशाल नयनों में

जगत के दुख समा जाते ।

स्वच्छ मन स्फटिक जैसे

बरबस आनंद मग्न हो जाते ।

*****

रस का सबंध विचार से /रमेशराज

जब आचार्य शुक्ल, डॉ. नामवर, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. राकेश गुप्त, डॉ. नगेन्द्र 'रसनिर्णय' में अर्थनिर्णय की भूमिका को जानते, पहचानते थे तो होना तो यह चाहिए था कि वे इसे आधार मानकर रस में विचार की भूमिका का समावेश कराते। अगर ऐसा हो जाता तो आधुनिक कविता रसाभास, रसहीनता जैसी स्थितियों से अवश्य उबर जाती और इसका परिणाम यह होता है कि काव्य में विचार-प्रधान कविता के लिए 'बुद्धि रस' जैसे शिगूफे भी सामने न आते। हां, इसके लिए कुछ नए रसों की खोज अवश्य करनी पड़ती। यह कार्य भी कोई अटपटा अशास्त्रीय नहीं होता क्योंकि रस परंपरा में रसाचार्यों ने आगे चलकर कई नए रसों को जोड़ा है। रस तालिका पहले भी अधूरी धी और आज भी अधूरी है।

*****

मोहन राकेश की कहानी-दृष्टि

मोहन राकेश ने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि में यशपाल जैसे वरिष्ठ कथाकारों की सीमाओं को भी रेखांकित किया। उन्होंने माना कि यशपाल ने मध्यवर्ग की विसंगतियों पर प्रहार तो किए, परन्तु उनका यथार्थ 'एकांगी' था। यशपाल को नग्नता के चित्रण का इतना आग्रह रहा कि वह कई बार एक 'फोबिया' सा प्रतीत होता था। राकेश का मत था कि केवल कुत्सित ही यथार्थ नहीं है। जिस मनुष्य से उसकी मनुष्यता का विश्वास ही छीन लिया जाएगा, उसे बदला कैसे जा सकेगा? राकेश की दृष्टि में, मध्यवर्ग की स्त्रियाँ केवल देह की भूख या 'प्रतिष्ठा के बोझ' की मारी हुई पात्र नहीं हैं, वरन् वे माताएँ भी हैं जो अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए आँखें फोड़कर काम करती हैं। राकेश चाहते थे कि कटाक्ष और व्यंग्य के साथ सहानुभूति का भी मेल हो, तभी रचना का महत्त्व स्थाई हो सकता है। यह संतुलन ही राकेश की कहानी-दृष्टि को विशिष्ट बनाता है, जहाँ वे यथार्थ की कड़वाहट को स्वीकारते हुए भी मानवीय संभावनाओं का दामन नहीं छोड़ते।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 8 अगस्त 2026

4828 ....लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं

 सादर अभिवादन 


अब सिर्फ कहानी ही नहीं अब कविताएं भी
सादर आमंत्रित है
अगला अंक 16 अगस्त 26 को
इसके लिए रचना प्रेषण तिथि 14 अगस्त 26 तक
नया विषय है

आजादी, स्वतंत्रता, उड़ान


पिछला अंक देखिए
https://halchalwith5links.blogspot.com/2026/08/4823.html

पसंदीदा रचनाएं


मैंने उसे बहुत तलाशा। जैसे पति-पत्नी के बीच की तीसरी औरत। उसके होने का पूरा अंदेशा है, लेकिन…लेकिन वो मिलती ही नहीं। हर बार उसकी तलाश में जाती हूँ और उसकी जगह ख़ुद को वहाँ पाती हूँ। क्या मैं ही वो औरत हूँ जिसके साथ मेरे पति का विवाहेतर संबंध है? वो मुझे घर पर छोड़ कर, मुझसे ही मिलने घर से बाहर जाता है।






उन्होंने कहा, दिन है
तुम दिन कहो
ये मत कहो कि सूरज नहीं निकला
सूरज तो बादल में भी नहीं दिखता
क्या उसे रात कह देते हो?
खारिज हो गयी न दलील?





उसने
एक लिफाफा
थमाया था मुझे।

कहा—
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"






क्योंकि आधा प्रेम
ख़ुदा तक नहीं पहुँचता,
वो बस दिल को
थका देता है।




डालियों  पर फूल अटके 
शूल भी आँखों को खटके 
नर्म कोमल सी हथेली 
टहनियो को यहा चुभोई




बिन रूह जिस्म को भा गयी तंग गलियाँ इसके आँगन को l
दागों अनगिनत पैबंद कढ़ी इसके एकांकी एकांत साये को ll

किनारा कर आसमाँ आँचल बाँध दिया रोती बारिश यादों तन्हाई को l
टकरा काँच दीवारों से थम गया शोर इसका उफनते बारिश पानी को ll




झूठ की दुनिया जीते हम 
लोग होता है जब साबका यथार्थ से 
सारे पर्दे हट जाते हैं 
सारी धुंध छंट जाती है 
हर नकाब उतर जाता है 
अपनेपन और परायेपन का 
दोस्तियों का 
दुश्मनी का

आज रचनाएंं अधिक है
झेल लीजिएगा

सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

4827....गधा आगे क्यों निकला?

शुक्रवारवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
विरोध की भाषा मात्र इक हुॅंकार नहीं होती,
यह महज़ चीख-पुकार या तीखी धार नहीं होती।
यह तो उस गहरी खामोशी का बहता हुआ ज़ोर है,
दमघोंटू सन्नाटे की छाती को चीरता शोर  है।
​जब-जब अन्याय की दीवारें बहुत ऊँची उठती हैं,
तब-तब इस भाषा की गूँज हवाओं में उठती हैं।
यह नफ़रत का पैगाम नहीं, बस हक की एक पुकार है,
झुकने से साफ़ इंकार करती, सच की अपनी ढाल है।
​ कभी सड़कों पर उमड़े जनसैलाब की ललकार बनती है,
कभी बंद कमरों में उकेरी गई कलम की धार बनती है।
यह उबलता हुआ रोष भी है, और सब्र का बाँध भी,
अँधेरे को आँख दिखाने वाला, विचारों का आफ़ताब भी।

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आज की रचनाऍं- 

मंगल-गीत


पंछी कहते नभ छोटा है,
यदि विश्वास तुम्हारे संग।
साहस के दो पंख लगाओ,
जीत सुनिश्चित हर एक जंग।

धरती कहती बीज बनो तुम,
जिससे हरियाली मुस्काए।
प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,
हर मानव के मन उपजाए।


दर्द 


किस दर्द में कितना दहाड़ना है 

दर्द कौन सा वाला है 

दर्द फायदा देगा या नुकसान 

ये समझ पाना आसान नहीं।

यही हम अलग हो जाते हैं। 

हमारी जात भी 




नम ऑंखों के प्रश्न 


झाँका नम आँखों में
वे एक पत्नी की आँखें थी 
करके समर्पित जीवन अपना 
धारण कर कुछ चिह्न 
बनी थी कन्या से वो नारी 
बदले में जो कुछ पाया, 
अपने घर के तानों से वो 
कभी मुक्त न हो पाई 
फिर भी 
तन मन से रही समर्पित 
नम आँखें कहती  हैं 
मुझे बता दो कोई 
मेरा अपना अस्तित्व कहाँ हैं?

 


 मॉं और मानव


ओर हो अपना प्रयाण 

जानें उन्हें और पाएँ वरदान 

मानव ह्रदय की 

यही तो उपलब्धि है 

अंतर में अभाव नहीं 

पूर्ण समृद्धि है !



गधा आगे क्यों निकला?


लोग हैरान थे— "भला गधा घोड़ों से कैसे जीत पाएगा?"


रेस शुरू हुई और कुछ देर बाद समाप्त भी हो गई।


नतीजा आया तो सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सबसे आगे गधा था।


लोगों ने उत्सुकता से पूछा, "इतने तेज़-तर्रार घोड़ों के बीच तुम जीत कैसे गए?"


गधा मुस्कुराया और बोला



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आज के लिए इतना ही

मिलते हैं अगले अंक में।

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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

4826...जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

भार्गव राम खण्डकाव्य - 45

एक सखी  कह रही सखी से,

जनक  लली  कर्पूर  सी  गौर।

राम दिख रहे कुछ काले काले,

दूजी सखी राम  केश  घुँघराले।।

*****

रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं ...

आँखों में आंसुओं का जो सैलाब है जमा,
लोगों पे आज़माना इन्हें मेरे पर नहीं,

महसूस कर सकोगे जो बैठोगे आस-पास,
शबनम की बूँद हूँ मैं दहकता शरर नहीं,

'' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)

जब उम्मीदों पर झाड़ू फिरती, तब होश ठिकाने आता है,
जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है।

तब अपनी ही नादानी पर, मन ही मन झख मारते हैं,

जो बैठे थे भाग्य भरोसे, वो झक मारकर हारते हैं।

*****

कांधला के विश्व विख्यात पंडित व्यक्तित्व

5-डा. शिखा कौशिक "नूतन" - प्रसिद्ध साहित्यकार, क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती - लघु कथा संग्रह पर उत्तर प्रदेश सरकार के पंडित बद्री प्रसाद "शिंगलू" सम्मान से सम्मानित.

6-शालिनी कौशिक एडवोकेट - बार एसोसिएशन कैराना की दो बार प्रथम कनिष्ठ महिला उपाध्यक्ष और साइबर क्राइम पर "क्राइम का चक्रव्यूह-साइबर क्राइम-एक समग्र अध्ययन" हिन्दी में पुस्तक लिखने वाली कांधला सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रथम लेखिका.

*****

 जब जिद ठान ली (संस्मरण)

खेतों में ट्रैक्टर चलते देख हमने उसपर चढ़ाने की जिद की।चाचा ने कहा जाओ अंदर टेबल पर स्वीच बोर्ड है उसका हरा बटन दबा दो तब ट्रैक्टर पर चढ़ाएंगे।जब हमने हरा बटन दबाया तो मोटर चलने की बड़ी तेज आवाज हुई। घबराकर दोनों बहनें जोर से चीखती हुई एक-दूसरे से लिपट गई।दादाजी ने सोचा हमें करेंट लग गया। चाचा से गुस्से से कहा-मार दिया न दोनों को? चाचा ने जाकर जब हमें सही -सलामत देखा तो मन बहलाने के लिए  खेतों की ओर ले चले।एक खेत में घूसते ही हमें भूतों के दर्शन होने लगे। बिना सिर बारे भूत, खेतों में बोझ ढोते सिर्फ दो पैरों वाले भूत,खेतों में कीचड़ से नहाये, पौधे उखाड़ते भूत। पेड़ों पर झूलते और उछल-उछल कर चढते-उतरते हुए भूत।एक बूढ़ी खेत की क्यारी पर बैठी दो बच्चों को अपने पास पकड़कर बैठाई थी,उनके बाहर निकले बड़े-बड़े दातों को देख हमने उन्हें किचिन मान लिया।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


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