सादर अभिवादन
पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
सोमवार, 29 जून 2026
4788 ... पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे
रविवार, 28 जून 2026
4787 ..यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
सादर अभिवादन
शनिवार, 27 जून 2026
4786 और वही इसका पहला अपराध था।
अक्सर मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।
फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।
सादर वंदन
शुक्रवार, 26 जून 2026
4785...जिनकी नहीं क़लम से कभी दोस्ती हुई
एक और गंभीर प्रश्न है—
गुरुवार, 25 जून 2026
4784 मुझे थोड़ा पढ़ो, ज़्यादा समझो,
सादर अभिवादन
पढ़े-लिखों की तरह समझो।
-ओंकार केडिया
हवाओं का अस्फुट स्वर
बूँदों का छनकना
जल का कल-कल बहना
बैलों के गले में घंटी का
रह-रह कर हिलना,
कोयल की कुहू-कुहू
चप्पू का चलना
सायरन का बजना
टाइपराइटर का टकटकाना
कीबोर्ड का सरपट दौड़ना
बुधवार, 24 जून 2026
4783..चुना हुआ मौन
।।प्रातःवंदन।।
"जीवन की सुन्दर बगिया में आशा
की कलियाँ महकाती
रैन अँधेरे भागे भागे
सोनेवाले जागे जागे
उषा आई, उषा आई "
ज़िया फतेहाबादी
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए ✍️
एक ही मौसम हरदम नहीं रहता
हमदम हमेशा हमदम नहीं रहता।
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अफ़सोस, राम लल्ला के नाम पर सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है
अफ़सोस, सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है। राम लल्ला के नाम पर एक स्कैम हो रहा है। और यहाँ बताया गया है कि यह सिर्फ़ क्रिमिनल गड़बड़ी से कहीं ज़्यादा क्यों है।
ताज़ा खबर यह है कि SIT राम मंदिर डोनेशन चोरी की जांच में चंपत राय के सा..
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आदमी
देख नहीं सकता,
यदि आँखें न हों।
सुन नहीं सकता,
यदि कान न हों।
बोल नहीं सकता,
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मैं गीता हूँ,
बाइबल हूँ,
क़ुरान हूँ। ..
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ए ज़िंदगी,
ज़रा आहिस्ता चल।
क्यों बेतहाशा भागती है,
बदहवास दौड़े जाती है।..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 23 जून 2026
4782...एक मौन शिल्पकार है...
बारिश का इंतजार करती चिड़िया
आसमान पर टिकी नजर।
पंख समेटे, आस लगाए,
ताक रही है सूनी डगर।
सूख गई हैं नदियां-नहरें,
धूल भरी हैं ठंडी लहरें।
प्यासी चोंच, उदास है मन,
बीत रहे हैं मुश्किल पहरें।
कब गूंजेगी मेघों की मल्हार,
कब थमेगा यह अंगार?
प्यासे कंठ से पुकारती वो—
"बरसाओ न मेघ थोड़ी-सी फुहार।"
समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,
डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।
मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,
काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।
हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,
बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।
वर्तमान की सच्चाईयाँ - वह
फिर भी तो नहीं है मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं , मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल
खुदा से मिलने का अशराना लिये हुए पथ पर बढ़ते जाना ।









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