निवेदन।


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बुधवार, 25 मार्च 2026

4692..मतभेद तो होते रहे हैं..

 "उषा सी स्वर्णोदय पर भोर

दिखा मुख कनक-किशोर;

प्रेम की प्रथम गदिरतम-कोर

दृगों में दुरा कठोर !

छा दिया यौवन-#शिखर अछोर

रूप किरणों में बोर;

सजा तुमने सुख-स्वर्ण-सुहाग,

लाज-लोहित-अनुराग..!!"

 सुमित्रानंदन पंत

 सुभाषितवाणी लिए आज फिर हाजिर हूँ बुधवारिय प्रस्तुतिकरण के साथ..

एक्सपायरी डेट का उजाला

 

अंधेरे के हिमायती

उजाले के लिए सुरक्षित खेतों में

चुपचाप अंधेरा बो गए।

जब फसल लहलहाई,

तो पहरे पर खड़े कर दिए गए

असंख्य प्रवक्ता—

✨️

इंसान आपस में लड़ते ही रहेंगे | 

तब तक , जब तक तीन टांगी वाले एलियंस धरती पर नहीं आ जाते और इंसानो को एक साझा दुश्मन नहीं मिल जाता | 

जैसे प्रेम है , भूख है , लालच है , वैसे ही इंसान के वजूद में नफरत भी है | 

✨️

छत्तीसगढ़ी गजल"

करथे अलकरहा बात कभू

दिन ला वो कहिथे रात कभू

जिनगी के पोनी उरकत हे

तँय सूत करम के कात कभू..

✨️

शब्द !

          अक्सर देखती हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों की शिकायत होती है कि लोग सुप्रभात, शुभ रात्रि भेजते रहते हैं और हमें इस बात से बहुत ही चिढ़ होती है। अगर इसे भेजने की जरूरत को समझा जाय तो इस जीवन की आपाधापी में हम न तो अपने बहुत करीबियों से ..

✨️

बधाई जीते जी इलाहाबाद!

हमारी सनातन संस्कृति ने विमर्श की परंपरा का पोषण किया है। विवादों के कलह से दूर शास्त्रीय परंपरा में समालोचना ही हमारी आलोचना-संस्कृति रही है। यहाँ परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष नहीं, अपितु समीक्षा का विधान रहा है। शास्त्रार्थ के बिंदु विचारधारा नहीं विचार रहे हैं। मतभेद होते रहे हैं, किंतु मनभेद किंचित नहीं। दर्शनों की धारा में विचार आस्तिक और ..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 24 मार्च 2026

4691... आरंभ हुआ नवीन अध्याय

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------
मानवता की सीख बचपन से ही
कंठस्थ करवाया जाता है
जब घर के बड़े समझाते हैं
"सबसे प्यार करो"
"पशुओं पर दया करो"
"भूखे को खाना खिलाओ"
"प्यासे को पानी पिलाओ"
"किसी को अपने फायदे के लिए मत सताओ"
और भी न जाने कितनी अनगिनत बातें होगी
जो हम सभी समझते और जानते हैं।
फिर भी समाज में अमानवीयता और बर्बरता 
की बहुलता,असंतुलन
क्या हमारी जड़ोंं के
खोखलेपन का संकेत है?
या फिर,
मानवता और दानवता के 
दो पाटों में पीसते मनुष्य मन
की कहानी
सृष्टि के विधान के अनुसार? 
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आज की रचनाऍं- 

 
आरंभ हुआ नवीन अध्याय
संघर्ष और विजय का पर्व
समय की समता का उत्सव
नव चेतना का शुभ पदार्पण 


मगर इश्क़—
मंज़िल नहीं पूछता,
वो बस चलाता है…

कभी किसी के साथ,
कभी बिल्कुल अकेले—
पर हर मोड़ पर
तुम्हें तुमसे मिलाता है।




खुशियों की दौलत बटोरी उन्होंने
गमों की सौगात मिरे नाम आई
 
ख़ुशी का है आलम, तुम संग में हो
बड़ी मुश्किलों से है ये शाम आई





एयरपोर्ट पर भी और फिर पूरे सफर में सभी लोग अपने अपने फोनों में घुसे मानो फोन नहीं देश चला रहे हों – सब एकदम धीर गंभीर। कान में इयरफोन और उँगलियाँ फोन की स्क्रीन पर घूमती। पति पत्नी भी आपस में बात करने की बजाय अपने अपने फोन में मशगूल दिखे। अच्छा लगा कि इसी बहाने उनका सफर बिना झगड़े और बहस के कट गया।




ऐसी तुकबन्दियाँ और भी हैं पर अभी मुझे इतनी ही याद हैं ।
कपड़ा, जेवर, शान-शौक और सुविधाओं से वंचित, जीवन की गाड़ी को मरुस्थल में भी हँस कर खींचने वाली ये ग्रामीणाएं जिस सहिष्णुता से जीवन की विसंगतियों से जूझती हैं ,सम्बन्धों का उत्सव भी उतने ही उल्लास से मनातीं है । स्नेह का ऐसा उदार और गहरा रूप अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । हालाँकि उनके स्नेह व उदारता की कभी कोई कहानी नही बनती ।
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 23 मार्च 2026

4690...छाये हैँ परमाणु के बादल, आज दहशत में मानवता...




शीर्षक पंक्ति:आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

दहशत में मानवता

छाये हैँ परमाणु के बादल,

आज दहशत में मानवता।

किस क्षण टकरायें बादल,

अरु हो जाये घनघोर वर्षा।।

*****

848. निश्चय

पानी के घूंट हलक से उतारती है, 

उठकर खिड़की तक जाती है, 

चुपके से गली में झाँकती है,

सब कुछ ठीक पाती है लड़की। 

*****

जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)

इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !*****1499-जल-दिवस

झील है सोई

कविमन खोजता

रूपक कोई।

7

खिली है धूप

स्वर्णमयी हो रहा

झील का रूप।

*****

यमुना किनारे

हरि बोलो ......
सब सखियन मिली वसन उतारे,
हरि बोलो  यमुना के जल में संग नहाबे हरि बोलो
हरि बोलो .......
देख गोपन की स्नान की रीति, 
हरि बोलो धीरे से जाकर कान्हा वसन चुराबें हरि बोलो।
*****
फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 22 मार्च 2026

4689 ...मेरे चारों ओर बिखर गया था प्रेम का लाल रंग

 सादर अभिवादन 


आज मेरे जीभ में छाले से जलन हो रही है
कल सिमई खा लिया था उसका तो नही

आज के इस अंक में दो रचनाएं 
साहित्यिक पत्रिका साहित्य कुंज से है

रचनाएं देखें  



ये बात और है कि वो बेवफ़ा हैं
बेगैरत हैं हम तो, उम्मीद तो रखेंगे

कहते हैं हमसे कि हम ना मिलेंगे 
मिल के भी हम तो मर ही मिटेंगे




अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…

और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।

ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।


वाणी अटकी, बोल न फूटे
अंतर का चैन कोई लूटे,
कविता दिल की भाषा जाने
कितने कूल-किनारे छूटे !

रागी मन बनता अनुरागी
भीतर कैसी पीड़ा जागी,
पलकों में पुतली सा सहेजे
भीतर लपट लगन की लागी !





अमित ने दस रुपये की चाय ली। सौ का नोट पकड़ा दिया।

वेंडर ने जल्दी में अपनी बरसाती जेब टटोली, खुले नोट निकाले और अमित को पकड़ा दिए, 
“गिन लीजिए साहब।”

अमित नोट गिनने लगा। तभी उसे पता लगा कि उसने दस-दस के तीन नोट और 
एक उसी का सौ का नोट वापस कर दिया था। शायद हड़बड़ी में पचास का नोट नहीं निकाल पाया और 
सौ का ही पकड़ा दिया।

“साहब, दस रुपये और नहीं हैं . . . 
आप एक चाय और ले लीजिए साहब। अभी ट्रेन चलने वाली है, 
नहीं तो मैं बाहर से ही खुल्ले कराकर ले आता . . .”




स्मरण हैं मुझे अब भी वो क्षण
जब समेट लिया था तुमने
मेरा प्रेम अपनी मुट्ठियों में
कुछ इसी प्रकार रक्ताभ हो उठी थीं ऋतुएँ
मेरे चारों ओर बिखर गया था
प्रेम का लाल रंग



सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 21 मार्च 2026

4688 इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है

 सादर अभिवादन 


ईद उल-फ़ित्र या ईद उल-फितर 
मुस्लमान रमज़ान उल-मुबारक के 
एक महीने के बाद एक 
मज़हबी ख़ुशी का त्यौहार मनाते हैं। 
जिसे ईद उल-फ़ित्र कहा जाता है। 
ये यक्म शवाल अल-मुकर्रम्म को मनाया जाता है।

रचनाएं देखें


करथे अलकरहा बात कभू
दिन ला वो कहिथे रात कभू

जिनगी के पोनी उरकत हे
तँय सूत करम के कात कभू

जिनगी मा तुम पानी राखव
बिन पानी चुरथे भात कभू



चोंच में तिनके सुतली,टहनी 
काग़ज़, पत्ते बटोर ले जाती,
घोंसला बना कर घर बसाती ।
सीधी-सादी सी मनभाती गौरैया 
मिलनसार किरायेदार बन जाती ।



"वीरता भी देखेगी जनता, पहले सुरक्षा आवश्यक है.
"महाराज एक वातानुकूलित अभेद्य बंकर की ओर भागे. जाते-जाते उन्होंने
चिल्लाकर वह अंतिम पाखंड किया, "मैं ध्यान मुद्रा में हूँ! सैनिकों की बलवृद्धि और
उनकी विजय के लिए साधना-रत हूँ."

भीड़ ने देखा कि उनका 'शेर' बंकर के लोहे के पीछे लुप्त हो गया है. सन्नाटा पसर गया. अब वहाँ केवल धूल थी, धुआँ था और था कोयलों का ढेर, जिसकी कालिख अब सबके चेहरों पर साफ दिखने लगी थी.

वृद्ध शिक्षक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखा: "यह कोयला युग है. यहाँ नायक के वेश में सियार और लोमड़ विचर रहे हैं. पर याद रहे, इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है."



शादी को तैयार न हों अब
बिन फेरों  के साथ रहें अब
रिश्ता चलता पर कुछ ही दिन
का सखि साजन? नहिं सखि ‘लिवइन’

*
पढ़- लिखकर बोलें  अंग्रेजी
मात- पिता पर रखते तेजी
भूल गए  सब अपनी  संस्कृति
का सखि साजन? नहिं सखि संतति




ये कैसा है मंजर 
के ग़ायब सिलेंडर 

सब कुछ है बाहर 
कुछ भी न अंदर
कब से खड़े हैं 
आया न नम्बर
*****
नम्बर वन के आतंकवादी हैे
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) अब सोते से जाग जाओ और
अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान युद्ध को रोकने के यत्न करो.
बहुत हो चुका विनाश,तबाही! अब दुनिया को चैन की सांस लेने दो दुष्टों!
हथियार टेस्टिंग के लिये युद्ध ज़बरन थोपे जाते हैं.
युद्ध भूख के साम्राज्य का विस्तार करते हैं और गिद्धों के लिये भोजन!
अफ़सोस!

सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

4687.... चुनौतियों से डिगता नहीं ध्रुव तारा

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
--------------
आदमी,आदमी में फर्क होता है। 
आदमी-आदमी में तर्क होता है।
आदमी जब आदमी को समझे न
आदमी, आदमियत के लिए नर्क होता है।

आज की रचनाऍं- 
 
यदि उस शुभ्र पुष्प पर मन अटका
तो बदल जाएगी सोच की धारा
हर नाव ढूँढती है सुरक्षित किनारा
चुनौतियों से डिगता नहीं ध्रुव तारा



दूर सघन वन अरुणाचल के 
जब मेहमानों को दिखाता, 
उनकी आँखों के विस्मय में 
मेरा अंतर भी मुस्काता !

हिमशिखरों पर रवि किरणों को 
अठखेली करते जब देखा,  
जमी हुई गहरी झीलों को 
निमिष भर में पिघलते देखा !



साँसें अब गहरी हो चली हैं,
उनकी आवाज़
छाती के भीतर से गूंजती है,
मानो कोई लहर
रीढ़ की हड्डी तक उतर रही हो।
हर कंपन, हर हलचल
अब ध्यान का विषय है
अंग-अंग अपनी ही गति में बोल रहा है।


हासिल


सूरज प्रकाश के घर में आज अंधकार छाया था ! रात को चूल्हा भी न जला था ! बच्चों को मन मसोस कर सुबह के बचे खाने से कुछ निवाले खिला दिए घरवाली ने और दोनों पति पत्नी दो घूँट पानी पीकर सोने का उपक्रम करते रहे ! बड़े भाई के घर के जश्न की आवाजें मन पर घन की सी टंकार करती रहीं !


जिस तस्वीर को लेकर भारत जाते हैं वो कभी नहीं मिलती, वो पुरानी हो चुकी होती है। नई तस्वीर अक्सर बेहतर ही होती है। शहर बदल चुके होते हैं। वो गालियां वो सड़कें जो याद में थी सब बदल चुकी होती हैं। उस तस्वीर में मौजूद बहुत से दोस्त और जानने वाले या तो खुद तस्वीर हो चुकते हैं या उम्र की चाल के चलते अब पुरानी तस्वीर से अलग से दिखने लगे होते हैं। पुरानी तस्वीर नई तस्वीर से बदल जाती है जिसे लेकर अगली बार जाएंगे। वो भी बदल जाएगी -जानते हुए भी तस्वीर तो सजा ही लेते हैं। मानव स्वभाव है।


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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
------------

गुरुवार, 19 मार्च 2026

4686 आज पहली बार टाला है मैंने अपने बालों का रंगा जाना

 सादर अभिवादन 

ईद कब है यह अनिश्चत सा है
बताइए सुबोध जी
क्या यह भी शोध का विषय है?

रचनाएं देखें



भारतीय वेद-पुराणों के आधार पर ब्रह्मा को नाट्यवेद का रचयिता माना जाता है, जबकि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर नाटक सदियों से क्रमवार विकसित होता आने वाला कला का एक स्वरूप है। जिसकी .. युगीन  आदिन युगीन मानव द्वारा हर्षोल्लास के अवसरों पर सामूहिक बेतरतीब थिरकन से लेकर लयबद्ध 
सामूहिक नृत्य तक की यात्रा और फिर नौटंकी, रासलीला व रामलीला से लेकर आधुनिक नाटक तक की  यात्रा भी चार्ल्स डार्विन के जैव-विकास सिद्धांत की तरह ही क्रमवार तय हुई होगी .. शायद ...




चिलबिल सी आतुर निडर
आजाद उन्मुक्त  उड़ान 
देर तक हवा में डोलती रही
किसी दिन देखा मैंने उसे




सबसे कष्टदायी है
सार्थक प्रश्नों को
किसी कुंवारी की कोख से जन्मे
नवजात-सा
कूड़े के ढेर में पड़ा देखना।

धृतराष्ट्र प्रसन्न हैं—
क्योंकि दरबार में
संजय अभी भी वही देख रहा है
जो उसे
दिखाने को कहा गया है। 



आज पहली बार
मुझे अफसोस नहीं
अपने सफेद होते बालों का
मुझे झिझक नहीं
किसी के इन्हें देख लेने पर
आज पहली बार टाला है मैंने
अपने बालों का रंगा जाना
आज पहली बार मैं
बहुत शाँत महसूस कर रही हूँ

****
आज पम्मी जी नहीं है
कृपया आप ही तलाशिए नए चर्चा कार को
अग्रिम आभार

सादर समर्पित
सादर वंदन
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