निवेदन।


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शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

4911 पाश्चात्य देशों में भूतोत्सव (हैलोवीन फेस्टिवल)

सादर अभिवादन


बुराई की झांकियां पेश कर जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता बढ़ाने का त्योहार हैलोवीन
हर साल 31 अक्टूबर को हैलोवीन फेस्टिवल हैलोवीन डे के रूप में मनाया जाता है। इसे अमेरिका और लंदन में भी एक सेलिब्रेशन की तरह मनाया जाने लगा है। इस उत्सव के दौरान बुराई की झांकियां पेश की जाती हैं और बड़े व बच्चे भूत, प्रेत, पिशाच की वेशभूषा में तैयार होते हैं। इस त्योहार को मनाने वाले लोग मानते हैं इससे बुराई दूर होती है और सकारात्मकता बढ़ती है। 


तैयार करते हैं एक हॉन्टेड हाउस 
इस उत्सव को मनाने के लिए किसी खास जगह को चुना जाता है और कद्दू को सुखाकर इसके ढांचे को भूत के सिर का आकार देकर सजाया जाता है।जो कि भूतों का एक प्रतीक माना जाता है। 


 खास तरह के फूड तैयार किए जाते हैं: 
 हैलोवीन के मौके पर लोग सिर्फ सजावट, कपड़ों और एक-दूसरे को डराने तक ही नहीं सीमित है बल्कि इस उत्सव के सेलिब्रेशन में चार चांद लगाने के लिए विशेष फूड भी तैयार किए जाते हैं। खास बात है कि जैसी हैलोवीन की थीम है खाना भी बिल्कुल वैसा होता है। जैसे भूत की शक्ल सी दिखने वाली कद्दू से बनी डिश व कैंडी, जानवरों के आकार वाले केक और पेस्टी।
  

भूत और भी हुए डरावने 
अब ये उत्सव सिर्फ परंपरा का हिस्सा ही नहीं बल्कि आधुनिकता का एक उदाहरण भी बन गया है। जिसे अब हर प्रजाति के लोग मना रहे हैं। इनमें युवाओं की तादात अधिक है। इस उत्सव को अब पार्टी का रंग दिया जाने लगा है। जिसमें भूतों के रंग रूप को नया रूप दिया जा रहा है। यानी ये अब और भी डरावने नजर आ रहे हैं। तो अगर आप भी अपनी पार्टी को अलग तरह से सेलिब्रेट करना चाहते हैं तो हैलोवीन थीम अपना सकते हैं।  
साभार दैनिक भास्कर

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मोटी खाकी वर्दी में
सीलन लगी दीवारों के बीच
चोरों खूनी ,मक्कारों के बीच
हर 15 मिनट में एक सिगरेट सुलगाता है
लगातार बजती टेलीफोन की घंटी
किसी की शिकायत, कभी अफसर की डांट
गाली गलौज, चिल्लम चिल्ली
लावारिस लाश का पंचनामा





जाड़ों की गुनगुनी दोपहर। सड़क किनारे चाय-बिस्कुट का एक खस्ता-हाल खोखा। मैले-से गेरुए वस्त्र पहने, संन्यासी-सा दिखने वाले एक अधेड़ ने सामने वाली बेंचों में से एक पर बैठते हुए चाय ऑर्डर की। चाय वाले ने केतली से उँड़ेलकर जैसे ही चाय का कुल्हड़ उसके हाथ में थमाया, दूसरी बेंच पर बैठ पहले से ही चाय पी रहे नरोत्तम ने चायवाले से कहा, “यह चाय मेरे खाते में डाल देना सुरेश।” फिर उस व्यक्ति से कहा, “आपसे कुछ पूछने की धृष्टता कर सकता हूँ महाराज?” “मेरे लत्तों पै ना जा भाई,” अधेड़ ने कहा, “मैं कोई संन्यासी ना हूँ।” “जो भी हैं, हम-जैसे सामान्य लोगों से तो अलग ही हैं।” 




शरीर की अस्वस्थता की तुलना उस दरवाजे या खिड़की से की जा सकती है, जिस पर रंग-रोगन और सफाई तो खूब की जाती है पर उसे ज्यादतर बंद या जरा सा खोल कर काम चला लिया जाता है ! अब वह दिखने में तो बेहद साफ-सुथरा और चमकदार लगेगा, पर जब उसे पूरा खोलने की आवश्यकता आन पड़ेगी तो उसके कब्जे (Hinge) उसे हिलने-डुलने नहीं देंगें। वह नखरे करेगा, जाम हो जाएगा। चिंचिंयाने लगेगा ! ठीक यही हालत शरीर की भी होती है, दिखने में नहाया-धोया, साफ-सुथरा, चमकदार, पर दस कदम पर ही हांफने और कराहने लगता है। इसीलिए हल्की-फुल्की सक्रियता की आवश्यकता बनी रहती है। 





ऐसे ही मन-मंथन भी
सकारात्मक हो तो बढ़ती है
नव-सृजन की क्षमता।

वरना ऐसे बवंडर
भयंकर तूफान बनकर अस्त-व्यस्त कर देते ह
घर-आँगन और मन-आँगन भी!





फिर संगीत बजता है।
फिर दौड़।

फिर उम्मीद।
फिर वही कुर्सी।

और हर बार
खेल बदलता है,
खिलाड़ी बदलते हैं—
पर
कुर्सी पर बैठने वाले नहीं।



सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

4910...छोड़ जगत यह वापस जाते मधुर याद बनकर रह जाते...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अनीता जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मधुर याद बनकर रह जाते

छोड़ जगत यह वापस जाते

मधुर याद बनकर रह जाते!


जग मेले में आकर मिलते

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते,

इक दूजे का स्नेह पात्र बन

बढ़ते, पलते, और पनपते!

*****

दो रचनाएँ करवा चौथ

ये सुहागिन

औरतों का व्रत
निर्जला, पति की उमर की कामना
थाल पूजा की
सजा कर कर रहीं
पार्वती शिव की सघन आराधना,
आज इनके
पुण्य के फल से
हम मृत्यु से भी नहीं हारेंगे।

*****

1538-ओ मेरे छायादार वृक्ष!

तपती दुपहरी के ताप से तुम्हें बचा सकूँ

प्यार से दुलार से तुम्हारा माथा सहला सकूँ

अनगिनत  झंझावातों  से  लड़  सकूँ

सुख दु:ख  को  सम  हो  सह  सकूँ।

*****

फ़िल्म जो भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले कोई यथार्थपरक या स्वाभाविक फ़िल्म नहीं है। यह एक फ़ैंटेसी है। एक ऐसी फ़ैंटेसी जिसकी ख़ासियत यह है कि वह फ़ैंटेसी लगती नहीं है। अपने आप में कई  किस्सों को समेटे हुए एक दिलचस्प किस्सा है यह फ़िल्म। प्रारंभ से अंत तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखने वाली इस फ़िल्म की तुलना एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन से की जा सकती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले सही अनुपात में मिल गए हों जिसके कारण उसका स्वाद ऐसा हो गया हो जो खाने वाले को बार-बार अपनी ओर खींचे। फ़िल्म के केवल दो गीत याद रखने लायक़ हैं - होली गीत तथा जय एवं वीरू की दोस्ती का गीत। सभी कलाकारों ने यादगार अभिनय किया है चाहे वे प्रमुख चरित्र हों या सहायक चरित्र।

*****

हमारे बारे में (About us)

इसकी मुख्य कैटगरी में यात्रा वृत्तांत, जैसे अंडमान, सिक्किम, भूटान इत्यादि जगहों की यात्रा के संस्मरण ! कुछ कम ज्ञात स्थानों का विस्तृत विवरण, जैसे दिल्ली की भूली भटियारी, कोटा का विभीषण मंदिर, जिनके बारे में वहां के रहने वाले भी बहुत कम जानते हैं! पुरानी कथाओं में उपेक्षित चरित्रों का एक अलग सकारात्मक आंकलन जैसे संपाति का सूर्य अभियान या होलिका के मंगेतर इलोजी की कथा! समकालीन विषयों और व्यक्तियों पर चर्चा, जो चर्चित हो रहे हों!

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

4909 ..तेरा ओ चुपके से सपना मा आणा

 सादर अभिवादन


करवा चौथ की शुभकामनाएं

मज़हबों में आग लगाने के बजाय,
अरे! आग उनके चूल्हों में लगाओ,
जिनके चूल्हे बुझे हुए हैं।

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याद दिलानी है
एक कहानी है
आज जो तुमको याद नहीं है
या शायद नहीं भूले
हो तुम कैसे जीते
वोट दिलाएं हमने तुमको
फिर भी हाल बुरा सा
कर दो काम ज़रा सा




अपने अतीत की गलियों 
के राग सुनाया करती है
कभी बालों का चुन्नटों 
तो कभी माथे का शिकन को
अपने पंखों से सहला कर




प्राची ने भी बोल दिया," मुझे पहलवानी करने का कोई शौक नहीं है, देवर जी कुछ करते नहीं, माँ जी बस आर्डर देती रहती हैं, मैं क्या करूँ?" "अरे बाबा तुम नाराज़ मत हो, आज शादी फाइनल करवा दूँगा" इतना कहकर संजय मेहमानों के पास गया और बोला, "हमें दहेज नहीं चाहिए, लड़की पसन्द है। आप लोग शादी की डेट तय कीजिए।" लड़की वाले खुश हो गए। राहुल भौचक्का रह गया क्योंकि उसने अभी तक लड़की भी नहीं देखी थी, बस फोटो देखा था। मम्मी भी कुछ खास खुश नहीं थी। पर फैसला संजय को लेना था क्योंकि पिताजी नहीं थे।




ज़िंदगी भर हममें से कोई हिंदू बना रहा
तो कोई सिक्ख या इसाई तो कोई मुसलमान बना रहा.
विशुद्ध इंसान कब बना, मालूम नहीं
मरा तो कोई श्मशान,तो कोई कब्रिस्तान चला गया
क्यों न मर कर,हम सभी महज़ इंसान बने





यूँ दुनिया मा चमकण छन जुगनुओं का उजाला,
कत्गा रूप धरि छन दुनिया का प्याला!
पर फ्योंली फूल ज्यूँ पींवलि अर निर्मल,
चाँद कु ज्यूँ च्योंणै, तू दिखदी हर पल!
तेरा ओ चुपके से सपना मा आणा,
न ह्वेणु त कनु ह्वेद मिलणा?




हर रात बस्ती में  शुरू होती थी 
लड़ाई और गालियों की बौछारें 

तब तुम रख देती थी मेरे कान पर हाथ 
और बंद करती थी यहां तक 
दरवाजे के भी कान 

सादर समर्पित
वंदन

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

4908..उँगलियों पर पुराना स्पर्श..

 भोर वंदन 

तिमिर को भेद कर अब

      जगमगाने कौन आया है?

बहुत लम्बी निशा बीती

अंधेरी कालिमा वाली

        बहुत ही दूर लगती थी

        उषा वह लालिमा वाली

मगर अब प्राची को अरुणिम

बनाने कौन आया है?

उर्मिल सत्यभूषण

बुधवार भोर की अभ्यर्थना और हम हाजिर है..

पीठ पर दरवाज़ा


मैंने

स्मृति की तह में हाथ डाला,

उँगलियों पर

एक पुराना स्पर्श लगा रह गया।

उसे धोने के लिए

मैं कुएँ तक गई,

✨️

जहाँ पहुँच जाएँ मतवाली

हर सोसाइटी में महिलाओं का एक न एक ऐसा समूह होता है जो भजन, जाप आदि में रुचि लेता है और उत्सव के दिनों में अधिक सक्रिय हो जाता है। ऐसे ही एक समूह की ...

✨️

तैरती हुई रोटियाँ / बलराम अग्रवाल

  ✨️


पति निकम्मा नहीं था, लेकिन कोरोना के चलते सभी तरह के निर्माण-कार्य बन्द थे। इसलिए घर में ही पड़े रहने को विवश था।

“सुनो,” भूख से विह्वल बच्चों को देखकर एक दोपहर पत्नी ने उससे कहा, “नहर पार वाले खेतों में खीरा, ककड़ी और टमाटर..

✨️

एक गीत -शरद पूर्णिमा पर

ओ शरद की 

पूर्णिमा 

स्वागत तुम्हारा है.

आज का 

मौसम अलौकिक 

और प्यारा है.

खीर के 

सुंदर कटोरे 

छतों पर रखना,..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्ति '


मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

4907 ..जीवन में ढलते रंग, जीवन को ढालते रंग

सादर अभिवादन  

श्वेता  जी अवकाश पर
कारण अपरिहार्य
सादर वंदन
      
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तुम्हारे दमन ने
मृत्युदंड के आदेश पर
हस्ताक्षर करके
निब तोड़ने की
परम्परा का
निर्वहन किया।




अंतस  के  हिंडोले  हृदय  की  हारिल
प्रदक्षिणा  के  फेरे  सब कुछ  को  लुटा के
लय  का  रुप  सिरजता  है
नृत्य , गीत , संगीत
पुलक  नव - नव  रुप  धरे



बोलते रंग, 
फूलों से खलते रंग,
पत्तों में डोलते रंग। 

इंद्रधनुष में लिपटे रंग,
सूर्यकिरण में सिमटे रंग । 



शिशिर  ऋतु में, 
माँ के कहने पर, 
रखी थी खीर शरद पूर्णिमा 
की चाँदनी में, 
खीर में चाँद का पीलापन 
बचा रहा, 





खीर के 
सुंदर कटोरे 
छतों पर रखना,
ओ गगन की 
चाँदनी 
आकर इन्हें चखना,
आज 
निधिवन 
रास का सुंदर नज़ारा है.




वो जो कहते हैं
वक्त हर ज़ख्म भर देता है

उन्होंने उन सब निशानों को शायद
कभी गौर से देखा ही नहीं



सादर समर्पित
वंदन  

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

4906 ..नहीं छिटकन और विघटन, नहीं अब कुछ और क्षति हो

 सादर अभिवादन


अक्टूबर इजाजत मांग रहा है
मांगने वाले को देना ही पड़ता है
आने वाला शोर-शराबे के साथ जो आ रहा है
स्वागत है दीपमालिका पर्व का


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(आपका कॉमन सेंस CJP के प्रोटेस्ट में गया है जो मुझे ये बात लिखनी पड़ रही है।) मैंने ड्राइवर से पूछा कि अचानक ब्रेक क्यों मारा? उसने कहा कि कुत्ता सामने आ गया था। मैंने कहा चढ़ा देता, बोला मैं शाकाहारी हूँ। थोड़ी देर बाद मेरा गंतव्य आ गया। मैंने 15 की जगह 10 रुपया दिया क्योंकि बस इस मुझे 5 मिनट लेट पहुँचाया। ड्राइवर गुस्सा हो गया, बोला 5 रुपये और दो। मैन कहा, कुत्ते से माँग लो।





बच्चा नमक से 
रोटी खा रहा है
नेता विकास के फर्जी आंकड़े बता रहा है 

नेता ने अभी अभी छीनी है
एक बच्चे के हाथ से मेलोडी 
उड़ रहा है जहाज में 
नेविगेशन डेटा कर रहा चुगली 
वह उतर रहा है इटली में 
वहीं बनेगी नई रील
मेलोडी इतनी चाकलेटी क्यों है?




नहीं छिटकन और विघटन,  
नहीं अब कुछ और क्षति हो,
एक धड़कन, एक जीवन, 
बन चले सम्मिलित प्रगति हो,

गर्व, बल अग्रज सहित सब,  
प्रेम, करुणा अनुज प्रति हो,
बस यही आग्रह सभी से, 
एक गति हो, एक मति हो।





क्रूज की उस छत पर सब हैरान परेशान घूम रहे थे कि सूरज किधर से निकलेगा। रात में हमारे कैप्टन ने क्रूज को किस दिशा में मोड़ा है कोई नहीं जानता। बस सब इंतज़ार में थे। मैं भी। लेकिन मन में यह बात भी चल रही थी कि रोशनी के लिए यह तलब हम सबके भीतर है। अंधेरा किसको चाहिए, रोशनी ही सबको चाहिए। लेकिन क्या सूरज निकलने से सबके अंधेरे दूर हो जाते हैं? काश कि हो जाते!





लगता नहीं है दिल
लहरें पाती नहीं साहिल
गम के समंदर में तूफान उठाने
हो जाती है अब तन्हाई भी शामिल .


सादर समर्पित
वंदन 

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

4905...ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-

कविता के माध्यम से संवाद

की    गई    छेड़-छाड़    क़ुदरत   से,

यूँ   ही  थोड़ी   बिफर   गया  मौसम।

खिल उठा दिल, जब उनकी यादों का-

सहने-दिल   में   उतर   गया  मौसम।

*****

'ट' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)

ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़कर, टाँग पसारकर सोते हैं,

समय निकलने पर फिर अपनी, किस्मत को वो रोते हैं।

ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई,

उनकी हस्ती बाज़ार में बिकती, जैसे टके सेर हो कोई।

*****

फेल केवल भारत की जनता

तब रोती हुई पोती को समझाते हुए दादी बोली - न तो भारत की सरकार फेल है ना ही विपक्ष फेल है. फेल केवल भारत की जनता है, जिसमें इस समय नेतृत्व चयन की समझ ही खत्म हो गई है.

*****

पापा! मुझे क्यूँ नहीं?-एक लघुकथा

तब ही लाला जी का बेटा निक्कर टी शर्ट पहने आया और बोला - पापा हर जगह आपको और मेरे बेटे को ही बुलाते हैं, मुझे क्यूँ नहीं?

*****

817 ..भाई इधर तुम्हारे गार्डन में झूले पे बैठा हूँ

"शराबी भी इंसान होते है, बेचारे ने बड़ी उम्मीद से बेल बजायी होगी...

उसे तुम्हारे रूप में भगवान नजर आ रहे होंगे..

उसके बीवी बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे होंगे,

तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिये" पत्नी ने समझाया..

पत्नी के समझाने पर पति दोबारा बाहर गया..

तब तक अंधेरा और गहरा हो गया था, बारिश और तेज हो चुकी थी,

कुछ नजर नहीं आ रहा था ..

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

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