पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026
4907 ..जीवन में ढलते रंग, जीवन को ढालते रंग
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
4906 ..नहीं छिटकन और विघटन, नहीं अब कुछ और क्षति हो
सादर अभिवादन
रविवार, 25 अक्टूबर 2026
4905...ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच+ रचनाएँ-
की गई छेड़-छाड़ क़ुदरत से,
यूँ ही थोड़ी बिफर गया मौसम।
खिल उठा दिल, जब उनकी यादों का-
सहने-दिल में उतर गया मौसम।
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'ट' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)
ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़कर, टाँग पसारकर सोते हैं,
समय निकलने पर फिर अपनी, किस्मत को वो
रोते हैं।
ऐसे स्वाभिमान-शून्यों को, टके को भी न पूछता कोई,
उनकी हस्ती बाज़ार में बिकती, जैसे टके सेर हो कोई।
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तब रोती हुई पोती को समझाते हुए दादी बोली - न तो भारत की सरकार फेल है ना ही
विपक्ष फेल है. फेल केवल भारत की जनता है, जिसमें इस समय नेतृत्व चयन की समझ ही खत्म हो गई है.
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पापा! मुझे क्यूँ नहीं?-एक लघुकथा
817
..भाई इधर तुम्हारे गार्डन में झूले पे बैठा हूँ
"शराबी भी इंसान होते है, बेचारे ने बड़ी उम्मीद से बेल बजायी होगी...
उसे तुम्हारे रूप में भगवान नजर आ रहे होंगे..
उसके बीवी बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे होंगे,
तुम्हें उसकी मदद करनी चाहिये" पत्नी ने समझाया..
पत्नी के समझाने पर पति दोबारा बाहर गया..
तब तक अंधेरा और गहरा हो गया था, बारिश और तेज हो चुकी थी,
कुछ नजर नहीं आ रहा था ..
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 24 अक्टूबर 2026
4904...जब भी मिला, बिखरे हुए हालात में मिला...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना शर्मा जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए…
मिलकर
भी तू कहाँ मिला,
पूरा
किसी जनम !
जब भी
मिला, बिखरे हुए
हालात
में मिला!
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स्वर्ग से पृथ्वी
स्वर्ग से बेहतर दिखती थी
मगर पृथ्वी से स्वर्ग
कैसा भी नहीं दिखता था
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राम की सरलता और सादगी के समक्ष
रावण अपनी विराट अनैतिकता के साथ
कद में बड़ा होने लगा है!
और हम...
सत्य को सिकुड़ते और
अहंकार को छलाँग लगाते देखते हुए,
मूकदर्शक बनने को मजबूर हैं।
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“आपका टेलर कौन सा है नलिनी। फिटिंग बहुत बढ़िया होती है आपके कपड़ों की।”
सारे शरीर पर रेंगती बॉस की ललचाई नज़रें उसे कचोट रही थीं। रोज़ रोज़ की इस बदनीयती को कब तक नज़रअंदाज़ करती रहे वह!नलिनी ने कठोर दृष्टि से बॉस को घूरा! कुछ सकपका कर बॉस ने जोड़ा, “वो मेरी बेटी दीपा कह रही थी एक दिन! किसी दिन उसे भी ले जाइयेगा अपने साथ अपने टेलर के पास!”
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इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे
सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी
भारी माहौल रहा हो, किसी
कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ
मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि
दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा
कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे
! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता
तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो
जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
4903... बदलते हुए दिन
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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धर्म हो या अधर्म,
कोई भी विचार जब तक स्वविवेक से
न उत्पन्न हुआ हो, तबतक धूलकणों की
आँधी मात्र होती है
जिसमें कुछ भी सुस्पष्ट नहीं होता है।
उधार का ज्ञान किसी भी विषय के अज्ञान को ढक
सकता है समाप्त नहीं कर सकता।
अंधश्रद्धा, कल्पना,आडंबर और ढोंंग का
आवरण जब कठोर हो जाता है
तो आत्मा की कोमलता और
लचीलेपन को सोखकर पूरी तरह
अमानुषिक और कट्टर
बना देता है और अगर धर्म की "कट्टरता"
मानवता से बड़ी हो जाती है तो
उस व्यक्ति के लिए परिवार, समाज या देश से
बढ़कर स्व का अहं हो जाता है और वह
लोककल्याण,परोपकार जैसे मानवीय गुण को
अनदेखा कर,
अपने लोग,अपनी जाति का चश्मा पहनकर
सबकुछ देखने लगता है।
धर्म का अधकचरा ज्ञान
ऐसे विचार जिसमें उदारता न हो, उसमें हम अपनी आत्मा की नहीं, छद्म ज्ञानियों के उपदेश से प्रभावित होकर
उनके स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र रह जाते हैं।
काश! कि हम समझ पाते
कि हम अन्य मनुष्यों की भाँति ही
एक मनुष्य सबसे पहले हैं,
किसी भी जाति या धर्म के अंश उसके बाद।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
4902 ..एक अधूरी आशा बार-बार देती थी दुःख
सादर अभिवादन
दीपमालिका
पर्व को बस कुछ ही दिन शेष



































