पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
4656... जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका...
सोमवार, 16 फ़रवरी 2026
4655..भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-
सूरज ढला है तो फिर सुबह भी आएगी ही
भटके हुए राही भी अक्सर थककर लौट आते हैं,
जब ठोकरों का दर्द उन्हें अपनी जड़ों की याद
दिलाता है।
दुआओं में असर रखना, यही अब तुम्हारा काम है,
भले
रास्ता आज कठिन और बदनाम है।
*****
देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच पाना,
जो ज़ख़्म पे मरहम हो, शफ़ा हो शुकून हो ये वो नहीं है घर, तू कहीं और चला जा। खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा।
" रिंग किसने चुरायी होगी ?....अभय रिचा को नुकसान पहुंचाना चाहता था....क्यों ? ....कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भी रिचा से प्यार करता
हो ?....और सौरभ ?....एक ऐसा शख्स , जिसे किताबों के अलावा किसी से कोई मतलब नहीं रहता , उसको रिचा की इतनी फिक्र क्यों थी ? "
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उनके
हिस्से चुपड़ी रोटी ------
र लुटाया है मौसम ने जी भरकर इस पर अपना,
ऐसे ही थोड़ी धरती की चूनर धानी-धानी है।
फ़स्ल हुई चौपट
बारिश से और धेला भी पास नहीं,
कैसे क़र्ज़ चुके बनिये का मुश्किल में रमज़ानी है।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 15 फ़रवरी 2026
4654 लोगों का बसियाया सा चेहरा मुझे हारे हुए जुआरी सा लगता है
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
4653 ...तुम्हारे अधरों की मिठास तृप्त कर जाती है
सादर अभिवादन
कुछ भारी हो गया है
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
4652....अंबर तक उड़ जायेंगे..
जीवन बिखरा है
प्रकृति का हास बनकर
आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान
या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से
अथवा तेज फूहड़ संगीत से
समंदर ने पानी उधार लिया है
नदियों से
नदियां जब सूख रही होती हैं
समंदर नहीं लौटता है
नदियों के हिस्से का जल !
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026
4651..चांदी की तरह..
।।भोर वंदन।।
आज गुरुवारिय प्रस्तुति में ब्लॉग 'लिखो यहां वहां' पर नजर डालिए..✍️
राजेश सकलानी जी की कविताएं
कपास से बनी नरम रातें.
हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें
उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,
हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं
बेईमानी से,
उनकी कई तहें बना कर
अपने काबू में कर लेते हैं
अश्लील शान्ति के साथ मुस्कराते हैं ,
और अश्लील स्वप्न देखते हैं
अपनी शर्मिन्दगी को छुटा कर
हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,
जिनका निर्दोष स्पर्श छत की तरह तन जाना चाहता हैं,
और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता हैं,
सारी रात अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें
उन्मत्त होतीं हैं,
वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,
और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर
हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,
इन्ही रातों के नीचे तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ
रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,
लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में छिपा कर चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं
हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से
मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं
पर डटी रहतीं हैं,
हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.
हमारी नौली चांद पर है.
(गांव में पानी का स्रोत )
हमारी नौली चांद पर है
वह जितनी सुन्दर है
उतना ही दुख देती है
छेनी से काट काट कर
उसे सजाया मैने
झर झर झर झर
उससे पानी गिरता है
चांदी की तरह..
✨️
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
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