निवेदन।


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गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

1903...निगाहे मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं...

शीर्षक पंंक्ति: फ़िराक़ गोरखपुरी 
सादर अभिवादन। 

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।

मेरी नजरें भी ऐसे काफ़िरों की जान ओ ईमाँ हैं
निगाहे मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं।
-फ़िराक़ गोरखपुरी

हद तो जब हुई जब उसकी भाभी के कदम पड़े  
मैं बेचारा यूँ ही खण्डों  में बंटा
 हम इस गाँव वे रहे वहीं जहां पहले रहते थे
है  जिम्मेदारी मेरी दोनों घरों की किसी और की नहीं |

जाग री तू विभावरी... मालती मिश्रा 

चंचल चपला नवयौवना 
तू रूप श्यामल निखार री
मस्तक पर मयंक शोभता
धरती पर कर उजियार री
अंबर थाल तारक भर लाइ
कर आरती तू विभावरी

कोरोना काव्य और क्रोचे ...प्रतिभा सक्सेना

इन कोरोनाकुल दिनों में, में मुझे क्रोचे की बड़ी याद आ रही है. कितने हल्के-फुल्के लिया था हमने इस महान् आत्मवादी दार्शनिक को! पर अब पग-पग पर इसके अभिव्यंजनावाद की महिमा देख रही हूँ.यों भी इस कोरोना-काल जब व्यक्ति अपने आप में सिमट-सा गया है, उसकी आत्मानुभूति प्रखर होती जा रही है परिणामतः उसके भीतर कलात्मक विस्फोट होने लगे हैं.कविता हर आत्मा में कौंधने लगी है


जिस पौधे की सेवा 
बहुत की थी,
फिर छोड़ दी थी
सारी उम्मीद ।


हिज़्र की फिक्र तब नहीं थी 
जब वस्ल ने दामन थामा था,
अब जो कारवाँ उजड़ गया तो 
ज़िन्दगी कहाँ रह जाती है।

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले मंगलवार।
 
#रवीन्द्र_सिंह_यादव 


बुधवार, 30 सितंबर 2020

1902..नाचती एक उर्जा ही..

 ।।उषा स्वस्ति।।

आगे बढ़ो...
सूर्योदय रुका हुआ है!
सूरज को मुक्त करो ताकि संसार में प्रकाश हो,
देखो उसके रथ का चक्र कीचड़ में फँस गया है
आगे बढ़ो साथियो!
सूरज के लिए यह संभव नहीं कि वो अकेले उदित हो सके..!!
('सूरज का सातवां घोड़ा')
धर्मवीर भारती

-*-*-*-*-

सच में अकेले उदित होना असंभव ही है..
तो फिर साथ बढिए साधें लक्ष्य की ओर
और नज़र डालें चुनिंदा रचनाओं पर.. 

वर्ल्ड हार्ट डे पर - डॉ. शरद सिंह

खोल दें हम अपने दिल की डायरी।
फिर करें कुछ कच्ची-पक्की शायरी।

बोझ लें हम क्यूं भला, हर बात का
ज़िंदगी झिलमिल करें ज्यों फुलझरी।


कमल उपाध्याय की अफ़वाह...कट्टर सोच

मुम्बई के मोहम्मद अली रोड से नागपाड़ा जाने वाले रस्ते पर मोटर सवार लडको को पुलिस को गरियाते - निकलते हुए आप देख सकते है। इन मनचलो कि कौम बता कर मै पुरे कौम का नाम ख़राब नहीं कर सकता, क्योंकी इस तरह के लोग हर कौम में मिल जाते है। बेचारा ट्रैफिक पुलिस वाला सिटी बजा कर ट्रैफिक मोड़ने कि कोशिश तो करता है परन्तु गाली खाने के अलावा बेचारा कुछ नहीं कर पाता। 

एक किरण जो मेरी खिड़की से उतर आती हैं 
मेरी खिड़की से उतरती हैं
मेरे फर्श पर छा जाती हैं
एक किरण रोज़
मेरे अँधेरे खा जाती हैं....
आसमान जब बाहें फैलता हैं
घना बादल जब आँखे दिखता हैं


‘कौवा कान ले गया’ जैसा है किसान आंदोलन का सच
कुछ नासूर ऐसे होते हैं जो किसी एक व्यक्त‍ि नहीं बल्क‍ि पूरे समाज को अराजक स्थ‍िति में झोंक देते हैं, ऐसा ही एक नासूर है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र बचाने के नाम पर ''आंदोलन'' की बात करना, फि‍र चाहे इसके लिए कोई भी अराजक तरीका क्यों ना अपनाया जाये। हाल ही में किया जा रहा किसान आंदोलन इसी अराजकता और भ्रम की परिणीति है।

एक किरण ...
मेरी खिड़की से उतरती हैं
मेरे फर्श पर छा जाती हैं
एक किरण रोज़
मेरे अँधेरे खा जाती हैं....
आसमान जब बाहे फैलता हैं
घना बादल जब आँखे दिखता हैं

-*-*-*-

नाचती एक उर्जा ही ..
नित नवीन निपट अछूती
इक मनोहरी ज्योत्स्ना है,
सुन सको तो सुनो उसकी 

आहट ! यह न  कल्पना है !
गूँज कोई नाद अभिनव 
हर शिरा में बह रहा है,
वह अदेखा, जानता सब

-*-*-*-
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’...✍️

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

1901...आँखों के सामने चरमरा के टूटता अंतर्मन

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय शांतनु सान्याल जी की रचना से

सादर अभिनन्दन।
पिछले दो सप्ताह से हम भूल रहे थे
आज हम एकदम चौकस हैं कोई ग़लती नहीं।

प्रस्तुत हैं आज की रचनाएँ-

आदरणीया उर्मिला सिंह जी चिंतित हैं
और उनकी चिंता स्वाभाविक है-
मानवता आज खतरे में पड़ी है
प्रकृति अपने तेवर दिखा रही है
शोक संतप्त माँ भारती भी...
अपने नॉनिहालों को निहार रही है!

-*-*-

" बड़े जिद्दी ख़्वाब तेरे "... शैल सिंह 
दीदार की ख़्वाहिशों का भी है अजीब सा नशा
मिले फुर्सत कभी तो देख जाना आ कैसी दशा
क्या तेरी आँखों में मेरे ख़्वाब आ पूछते सवाल
तुम्हें भी हैं याद क्या वो शामें सलोनी कहकशाँ । 


मैंने सबकी राहों से,
हरदम बीना है काँटों को ।
मेरे पाँव हुए जब घायल
पीड़ा सहना है एकाकी !!! 


रात में
हिमनद का अदृश्य गहराई में विगलन, -
आँखों के सामने चरमरा के टूटता
अंतर्मन का दर्पण ! इन्हीं
टूट - फूट के मध्य
छुपा होता है
उद्भासित
रहस्य 



मन की वीणा बाज रही है
धर की दीवारें गूँज रहीं
मीठे मधुर संगीत से मन खुशी से डोले
है ऐसा क्या विशेष तुम्हारी सीरत में |
कुछ तो है तुममें ख़ास
मुझे तुम्हारी ओर खीच रहा है

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी गुरुवार। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव  

सोमवार, 28 सितंबर 2020

1900 कुत्ते का आदमी वफादार होता है ।

 संसार में पागलो की श्रेणी में
हम पहले नम्बर पर हैं
दो मत नहीं....
जाएंगे रांची किसी दिन
वहाँ भोजन तो घर का मिलेगा

पसंदीदा रचनाएँ कुछ यूँ है....

या अल्लाह ! 

कोरोना के कहर से बचा अल्लाह

अज़ान के आखिर में एक दुआ हमेशा सुनाई देती है।  

" या अल्लाह ! कोरोना के कहर से बचा अल्लाह, 

सब पर अपना करम बरसा अल्लाह "  

नमाज़ अदा  करने के  बाद मौलवी  

मोहल्ले की गालियों में निकल जाता 

और बिना मास्क पहने हर किसी को 

मास्क पहनने को कहता।  

ये रोज़ की दिनचर्या है उसकी।



ऐ ज़िंदगी ...

कल बहुत देर तलक सोचती रही

फिर सोचा बात कर ही लूं  

फिर मैंने ज़िंदगी को फ़ोन लगाया 

मैंने कहा आओ बैठो किसी दिन 

दो चार बातें करते हैं 

एक एक कप गर्म चाय की प्याली

एक दूसरे को सर्व करते हैं 


आस ....

कब तक कोई आस लगाये ,

अपना आकुल मन बहलाए |

घर सूना है , आंगन सूना ,

जीवन का वृन्दावन सूना |

सुधियों की राधिका हठीली ,

और कर रही दुःख को दूना |


उत्तरायण का इंतज़ार - -

धुंधभरे जिल्द की किताब को रख दो

कहीं कांच की अलमारी में बंद,

जीवन की वास्तविकता

ग़र जानना हो

तो मिलो

उस

अंधकार गली के किसी मोड़ पर जहाँ

शैशव एक ही रात में पहुँच जाता


हमारे सुशील भैय्या का
उलूक टाइम्स
बारह वर्ष का हो गया
प्रस्तुत है उनकी पहली प्रस्तुति

परिचय

बतायें

कुत्ता हिन्दू

नहीं होता है

कुत्ता मुस्लिम

नहीं होता है

कुत्ता क्षत्रिय

नहीं होता है

कुत्ता ब्राह्मिन

नहीं होता है

और तो और

कुत्ते का

रिसरवेशन

नहीं होता है

काश !

कुत्ता होता मैं

और

मुहावरा होता

कुत्ते का आदमी

वफादार होता है ।

उनको ढेर सारी शुभकामनाएँ
सादर



रविवार, 27 सितंबर 2020

1899 ...सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम

नमस्कार..
भाई कुलदीप जी आज
नहीं है...सुबह बात हुई उनसे
वो सामान्य हैं....
हमारी पसंद कुछ यूँ है....

सहारा ना मिला तो ना सही , उठ बैठे हम 
घाव रिसते रहें, ना पा सके कोई मलहम
जमाना ये न समझे, हम गिरे भी राहों में
होंठ भींचे, मुस्कराये पी गये झट सारे गम

सुनो, महामारी के दौर में 
ख़ुद से ज़रा बाहर निकल जाना,
थोड़ी दूर रहकर 
ध्यान से देखना
कि क्या कुछ बचा है तुममें,


मेरी बेटी मन मोहनी
बहुत प्यारी  सबकी  दुलारी
मुझे बहुत भाग्य से मिली है
उस जैसा कोई गुणी नहीं है |


चौराहों  की रौनक छीन ली गई 
गलियों को उनकी हैसियत बताई गई 
पत्त्थर पर पैर पल-पल जीवन को 
मारने के लिए मजबूर किया गया 
सफ़ेद चील ने तजुर्बे के कान छिदवाए 
संस्कार कह रस्मों की माला पहनाई गई।



रक्तिम हुई क्षितिज सिंदूरी
आज साँझ ने माँग सजाई
तन-मन श्वेत वसन में लिपटे 
रंग देख कर आए रूलाई
रून-झुन,लक-दक फिरती 'वो',
ब्याहता अब 'विधवा' कहलाई

आज भी .
आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने 
अभिनव मन  के कपाट खोले  ,
देकर ओजस्विता
किरणें चहुँ दिस  ,
रस अमृत घोलें  ..!!
आज भी चढ़ती धूप  सुनहरी ,
भेद जिया के खोले ,
....
आज बस..
कल की कल
सादर

शनिवार, 26 सितंबर 2020

1898.. उड़ान

इंसान चाहता है कि
उसे उड़ने को पर मिले
परिन्दा चाहता है कि
उसे रहने को घर मिले

यथायोग्य सभी को
प्रणामाशीष
क्षमता तुम में हर समाधान की
आज़मा लो जीवन गतिमान की






“किसी के काम आ जाऊँ यही ईमान रखता हूँ ,
बिखरूँ फिर सिमट जाऊँ यही उन्वान रखता हूँ ।
सदा ही साथ चलने की कसम खाई जो हमने है,
तेरी किस्मत बदल जाऊँ यही अरमान रखता हूँ।”
– डॉ. आरके राय “अभिज्ञ”


“ए परिंदे तेरे हौसले की क्या दाद दूँ,
उड़ ले तेरा पूरा आसमान है।
मगर सुन ले मुझमें पर नहीं हौसले हैं,
उड़नें के लिए पूरा हिन्दुस्तान है।”
– सौम्या यादव



“हौसलों में उड़ान रखते हैं।
हम भी इक आसमान रखते हैं।
हमको माज़ूर न समझा जाए।
हम भी अपना जहान रखते हैं।”
– लाएब नूर



यथार्थ पर धरातल

साहित्य सदैव अपनी विपुल सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण-संवर्धन और अपने परिवेश,समाज और देश के मानसिक विकास की धारा को उन्नत बनाने की दिशा में अग्रसर रहा है । मगर हाल के वर्षों में पाठकों की उदासीनता हमें काफी हैरान और बेचैन करती है । कुछ तो कारण है ? लेखकों और पाठकों के बीच पारदर्शिता का अभाव या लेखकों की संवादहीनता । जिस कारण लेखकों और पाठकों के सम्बन्धों में तनाव पैदा हो रहे हैं । अगर यही स्थिति रही तो इसके अंजाम क्या होंगे,कोई नहीं जानता।

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पुन: भेंट होगी
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

1897..एक सूखा पत्ता गिरा नदिया के पानी में

 शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।

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हम मनुष्य सदैव अनुसरण करते हैं,स्वयं के विचारों और जीवन को बेहतर बनाने के लिए ऐसे व्यक्तित्व का चुनाव करते हैं जो समाज के आईने में झिलमिलाते हैं, पारदर्शी, देखने,सुनने या समझने में उच्च आदर्श और मापदंड स्थापित करते हैं हम भावनात्मक रूप से स्वयं को उनसे जोड़ लेते हैं किंतु  अनुकरण करने के लिए अपने बुद्धि, विवेक और तर्क की आँखें मूँदना सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं शायद...।

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अपनी-अपनी तृष्णाओं के रेगिस्तान में

भटकते ताउम्र इच्छाओं के बियाबान में,

चकाचौंध के अंधानुकरण में गुम किरदार

वैचारिकी साँसें धुकधुका रही अनुदान में,

अच्छेपन का अभिनय करते बीता जीवन

ख़ुद का चेहरा भूल गये समय के श्मशान में।

-श्वेता

आज की रचनाएँ


हथेलियों में बंद धूप का वृत्त

सोए इस तरह की उम्र भर न -

जगे, कभी सजल लम्हों

में उतरती रही रोशनी

तेरी निगाह से,

कभी तेरी

आंखों

में बहुत धुंधला सा आसमां लगे,

मैंने पूछा है तेरा पता डूबते

तारों से, उभरते सुबह

के उजालों से,

कभी तू

दो पल विश्राम के लिए ...

जल-दर्पण में मधुर मुस्कान का जादू नयनाभिराम

पुरवाई फिर बही सरसराती 

अनमने शजर की उनींदी शाख़ का 

एक सूखा पत्ता गिरा नदिया के पानी में

बेचारा अभागा अनाथ हो गया

पलभर में दृश्य बिखरा हुआ पाया 

प्रीत खो गयी कहीं

समय से पिछड़ी तब महत्त्वाकाँक्षा ने दाग़ी 

भावों का अभाव विवेक ने न लाज रखी 

ज़िंदगी के ज्वर से जूझती ज़िंदा है कहीं 

संयम सहारा कहता!  प्रीत खो गई कहीं।


चोर कौन? ...

कल बाजार में एक चोर को पीटते देखा

घेरी थी दर्जनों की भीड़, मारो साले को...

पूछा मैंने सामान इसने क्या हाथ लगाया है

झट बोले, चुराए मोबाइल के साथ धराया है

मुखौटा

रजत ने बात अनन्या की तरफ मोड़  दी थी उसे पता था अनन्या  निर्णय लेने में हमेशा दूसरों की सलाह पर निर्भर रहती हैं इस लंबी होती बहस में अगर किसी का नुकसान हो रहा था वो टेबल पर रखी आइसक्रीम का जो पिघल रही थी और अपना स्वाद खोती जा रही थी,पहले आइसक्रीम तो खत्म कर लो और कूल हो जाओ अनन्या  ने रजत से कहा दोनों आइसक्रीम खा ही रहे थे तभी अनन्या ने अपना सेल फोन निकला अरे ये तो प्रीति की कॉल है 
"प्रीति रजत की छोटी बहन थी"

....
कल मिलिए विभा दीदी से
उनकी अनोखी रचना के साथ
-श्वेता



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