शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
निराश कर्ण अब जा पहुँचा,
गिरि महेंद्र विप्र राम के पास।
वेश बनाये था सरल विप्र का,
जँह पाया ज्ञान दिव्यास्त्र का।।
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1533 आज की स्त्री / डॉ. कनक लता
पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,
सृजित करती है,
सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,
उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती
है,
और लौटा देती है
आपको,
आपके समाज को।
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मिट्टी को छू उस चुनर का
श्रृंगार बन गया साँझ का गुलाब l
अँगीठी की राख लिख रही कच्चे घड़े उस चाँद का ही
नाम ll
मोरनी सी पायलों की झंकार बज
रही उड़ते पतंगों के साथ l
गुल गुलमोहर दरख्तों कर रही
आसमाँ चाँदनी की ही बात ll
किशोर जी के अट्ठाईस बाल गीतों का यह
संग्रह सम्वेदना के इसी बीज तत्व को शिशु मन में अँखुआने, उगाने और अगोरने का अनोखा
यज्ञ है –
‘हर शब्द में जैसे नयी कहानी,
हर पंक्ति में रंग।
मोही के संग पढ़ते दद्दू,
होकर उसके संग।
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"यही समय है निज निर्णय का
गॉठे ढ़ीली करनी हैं
ले संकल्प सकल कर अर्पित
लंम्बित राह पकड़नी है"
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