पाँच लिंकों का आनन्द
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
4792....जहॉं भूख पर लंबी-लंबी चर्चाऍं होती हैं....
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
4791 ..प्रेम का चोली-दामन सा साथ हो, तो जीवन महक उठता है
सादर अभिवादन
"वाह! एकदम प्योर शुगर-फ्री है, गन्ने का स्वाद भी आ रहा है और कैलोरी भी नहीं है!"
बुधवार, 1 जुलाई 2026
4790..धूप का लिबास
।।प्रातःवंदन। ।
रात की अब तह बना दो, विगत को चादर उढ़ा दो,
प्रात की गाओ प्रभाती, उदित रवि को जल चढ़ा दो।
अब उठो कुण्ठा बुहारो !
~ डॉ मृदुल कीर्ति
चलिये चंद वैचारिक,अलंकृत शब्दों से रूबरू हो, अब नज़र डालते हैं लिंको पर..✍️
दुनिया का चलन
लगे सीखने सबक
बहुत नादान थे हम
समझ न पाये सबब।
छल प्रपंच से भरी..
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दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...
तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.
मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.
कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,
हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे...
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एहसान मानेंगे जनम सात .
तुम आओ न मेरे दिल को याद
एहसान मानेंगे जनम सात ..
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मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं
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रे मन !
मानसून का जोर,
मूसलाधार बारिश,
आंधी और तूफान बहुत हैं,..
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इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
मंगलवार, 30 जून 2026
4789...एक मुट्ठी राख...
गुड़गांव के रईसजादों का व्यवहार,
और रोड़ रेज में तू तू मैं मैं के आसार,
आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं।
हे सूर्य देव!
ज़रा रहम करो
धरती को बचाओ
मेघ को भेजो
तपते जीव-जन्तु
करुणा दिखलाओ।
इस दुनिया में करीब डेढ़ लाख नदियां बहती हैं, जिनमें छोटी-बड़ी मिला कर तकरीबन दो सौ प्रमुख नदियां हमारे देश में लोगों को जीवन प्रदान करती हैं ! मायके से निकलने के बाद जनहित में ये कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखतीं ! ऐसी जीवन दायिनी, प्रभु की अमूल्य भेंट के प्रति हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम इनका ख्याल रखें ! इनका सम्मान करें ! यदि कुछ ना भी कर सकें तो कम से कम इन्हें ''व्यथित'' तो ना करें !
सोमवार, 29 जून 2026
4788 ... पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे
सादर अभिवादन
रविवार, 28 जून 2026
4787 ..यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
सादर अभिवादन
शनिवार, 27 जून 2026
4786 और वही इसका पहला अपराध था।
अक्सर मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।
फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।
सादर वंदन
























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