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सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

1676 हम-क़दम 107 वाँ अंक कलम/लेखनी

स्नेहिल अभिवादन
कलम और क़लम में फर्क है
मायने में...सोचिए

क़लम अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। अज्ञानता से ज्ञान के गलियारों की यात्रा में
क़लम उजाले की किरण है जो सही राह चुनने में
मदद करती है।
क़लम बुद्धिजीवी है, क़लम की ताकत  
ही है जो किसी भी समाज और देश 
को सकारात्मक दिशा देकर 
बेहतरीन भविष्य गढ़ने में सहायक बन सकती है।

“मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ
चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात”
कबीर जी का ये दोहा बड़ी गहरी बात बताता है |
इसका शाब्दिक अर्थ है कि : 
मैंने कागज और स्याही छुआ नहीं और न ही कलम पकड़ी है | 
मैं चारो युगों के महात्मय की बात मुहजबानी बताताहूँ|


इस दोहे की पहली पंक्ति से ये आभास होता है कि 
वो “पढ़े लिखे नहीं हैं” अर्थात वो कहते हैं की वो निरक्षर हैं| 
और यही मतलब हर जगह प्रचलित है |
......
कालजयी रचनाएँ


क़लम या कि तलवार.....रामधारी सिंह दिनकर
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे


वेदना और कलम ....योगेश सुहागवती गोयल
जब सारे रास्ते बंद हो जायें, कोई राह नहीं सूझे
मन में दबी वेदना, कलम से, आंसू छलकाती है

कभी रिश्तों की मजबूरी,कभी उमर के बीच दूरी
अपनी जुबान बंद रखने को, मजबूर हो जाते है
अदब की मांग और कभी, तहज़ीब झुका देती है
कभी वक़्त गलत मान, खुद ही चुप रह जाते हैं


'कलम' ...ओम प्रकाश अत्रि
हर गरीब
बेबस जनता के
बहते हुए
आँसुओं को
पोछती कलम,

बेजुबान की
जुबान बनकर
उसके हकों को
दिलाती कलम।



...........
नियमित रचनाएँ
आदरणीय मीना शर्मा
मत लिख अब बंसी की धुन,
मत लिख भौंरों की गुनगुन,
अब झूठा विश्वास ना बुन,
लिख, फूलों से काँटे चुन !
बहुत हुआ, अब कटु सत्य
स्वीकार, लिख मेरी कलम !

माफ करना वीर मेरे !
हाँ, उसी पल से...तभी से...
रुह मेरी सुन्न है और 
काँपते हैं हाथ मेरे !
शब्द मेरे रो पड़े और 
रुक गई मेरी कलम भी !
वीर मेरे ! अश्रुधारा बह चली...




आदरणीय आशा सक्सेना
है दिल  छोटा सा फिर भी
रिक्त अभी भी हैं पर्ण   पुस्तिका में
बीते कल की  यादों को
सहेजा जा सकता है जिनमें  |
लेखनी भी थकी नहीं है
यादों को लिपिबद्ध करने में फिर भी
उम्र दिखाई देने लगी है
उस की रवानी में |

एक समय था ऐसा जब केवल खेल सूझता था
किताब छूने का मन न होता था
है कठिन बहुत लिखना पढ़ना
लिखने  से कोसों दूर भागती थी |
जब से  दुनिया देखी बाहर की
महत्व समझ में आया लिखने पढ़ने का
लगा  अभी भी देर नहीं हुई है


आदरणीय रोहिताश्व घोड़ेला
माना मैंने हर बात को क्रूर
बेढंग करके परोसा है
उसी कलम को विनती पर भी भरोसा है
ये कुछ ऐसा है जो समझ में आये
ये कुछ ऐसा है जो जहन में बसे
एक पक्षीय लिखने से पहले आपको सोचना पड़े



आदरणीय अनुराधा चौहान
कलम का प्रहार हो,
दो धारी तलवार हो,
मन मजबूत कर,
आवाज उठाइए।

बड़े-बड़े यहाँ चोर,
मंहगाई करे शोर,
जनता का लिखें दर्द,
लेखनी चलाइए।


आदरणीय कुसुम कोठारी
रश्मियों की कलम से
रश्मियों की क़लम
नव प्रभात रच दूं,
मन झरोखा खोल कर
तमस से मुक्ति दूं।

आदरणीय ऋतु आसूजा
लेखनी भाव सूचक ...
लेखनी का रंग
जब एहसासो के रूप में
भावनाओं के माध्यम से
काग़ज़ पर संवरता है
और जन-मानस के हृदय को
झकझोर कर मन पर अपनी छाप छोड़ता है ,
तब समझो एक लेखक की 
लेखनी का रंग अमिट होता है 
अमर होता है ।


आदरणीय श्वेता सिन्हा
मत लिखो प्रेम कविताएँ ....

अगर कहलाना है तुम्हें
अच्छा कवि 
तो प्रेम और प्रकृति जैसे
हल्के विषयों पर
क़लम से नक्क़ाशी करना छोड़ो
मर्यादित रहो,
गंभीरता का लबादा ओढ़ो,
समाज की दुर्दशा पर लिखो,
गिरते सामाजिक मूल्यों पर लिखो,

आदरणीय सुबोध सिन्हा
ऋचाओं-सी ...

फिर बोलो
ना जरा ..
दरकार भला
पड़ेगी क्यों
कलम की सनम
प्रेम-कहानी लिखने में

ऋचाओं-सी
मुझे याद ज़ुबानी
तुम कर लेना
तराशुंगा मैं तुमको
अपने सोंचों की
कंदराओं में

फिर तलाशेंगे प्रेम ग्रंथ
मिलकर हमदोनों
उम्र-तूलिका से
क़ुदरत की उकेरी
एक-दूसरे के
बदन की लकीरों में


..........
इतनी ही रचनाए प्राप्त हुई
कल भाई रवीन्द्र जी आ रहे है
नए विषय के साथ
सादर



रविवार, 16 फ़रवरी 2020

1675....रिफाइंड तेल खाओ और जल्दी उपर जाओ...!!!

जय मां हाटेशवरी.....
प्यार नि:शब्द है। प्यार अव्यक्त है। प्रेम का गुणगान संत-महात्मा, विद्वान सभी ने किया है। मीरा ने तो प्रेम में हंसते-हंसते ज़हर भी पी लिया। प्यार सुगंध है
और प्यार में ही दुनिया के सारे रंग है।
सादर अभिवादन.....
देखिये मेरी पसंद.....


बेटी का सम्मान
बेटी से है करते इतनी नफरत,
क्या बेटी आपका परिवार नहीं?
बेटी से ही चलती दुनिया,
यहां बेटी का सम्मान नहीं,
बेटा घर की जान है,
तो क्या बेटी है अपमान,
बेटी-बेटा भेद कर,
बेटी का सम्मान
बेटी का सम्मान
बेटी का करते हैं तिरस्कार,
बेटी बिन बेटा कहां से लाएगा संसार ,




अंबर तले
डूबती शैय्या~
आहत परिजन
जन सैलाब!
रहे सोचते~
अब चलें या रुके
अंबर तले!

रिफाइंड तेल खाओ और जल्दी उपर जाओ...!!!
आम धारणा यहीं हैं कि शरीर के लिए तेल याने की चिकनाहट ख़राब होती हैं। लेकिन सच्चाई यह हैं कि शरीर के लिए अच्छी चिकनाहट जरुरी हैं। हां, दोस्तों, चिकनाहट दो
तरह की होती हैं, अच्छी और बुरी। हमारे घुटने मुडते हैं, हमारे हाथ की उंगलियाँ मुड़ती हैं, ये सब अच्छी चिकनाहट के कारण ही हो पाता हैं। तेल के माध्यम से जो
चिकनाहट हमें मिलनी चाहिए वो रिफाइंड तेल से नहीं मिलती हैं। यदि हम कोलेस्ट्रॉल चेक करवाते हैं तो रिपोर्ट देख कर डॉक्टर कहते हैं कि हमारा HDL (High Density
Lipoprotein) बढ़ना चाहिए और LDL (LOW Density Lipoprotein) कम होना चाहिए। सरल भाषा में HDL अर्थात अच्छी वाली चिकनाहट और LDL अर्थात बुरी वाली चिकनाहट जो heart
मे blockage करती हैं!

बिछड़े सभी बारी-बारी
कमलादेवी – तूने मेरी हिम्मत बढ़ा दी केसू ! इन्होंने मेरी कभी परवाह नहीं की. अब मैं ऐसे हरजाई की नहीं, बल्कि अपने दिल की मानूँगी.
चल केसू !  चलते हैं तेरे बेनी भैया के जुलूस में !
केसू और कमलादेवी एक साथ –



मोहब्बत की बात भले ही करता हो जमाना मगर प्यार आज भी माँ से शुरू होता है।
ये कहकर मंदिर से फल की पोटली चुरा ली माँ ने…. तुम्हे खिलाने वाले तो और बहुत आ जायगे गोपाल… मगर मैने ये चोरी का पाप ना किया तो भूख से मर जायेगा मेरा लाल
भूल जाता हूँ परेशानियां ज़िंदगी की सारी, माँ अपनी गोद में जब मेरा सर रख लेती है।
हालात बुरे थे मगर रखती थी अमीर बनाकर,,हम गरीब थे,ये बस हमारी माँ जानती थी।
नींद अपनी भुला कर सुलाया हमको आंसू अपने गिरा के हंसाया हमको दर्द कभी न देना उन हस्तियों को ऊपर वाले ने माॅ-बाप बनाया जिनको!!


जीवन
यही तो है
अपने जीवन का सार
इसी से उदय
इसी में अस्त
जीवन तो जीवन है
हर पल वो मस्त है
कभी उदय
तो कभी अस्त है।

पता ना अगले जनम में क्या बनूगा ?
दुनिया के भौतिक सुखों में लीन हो ,
भुला बैठा मैं सभी सदआचरण
नहीं है सद्कर्म संचित कोष में ,
पार बेतरणी भला  कैसे करूंगा
इस जनम में तो नहीं कुछ बन सका
पता ना अगले जनम में क्या बनूंगा

कुछ रिश्ते !!
कुछ रिश्ते
होते हैं सुबह की चाय जैसे
बिना उनकी आहट के
बिना उनके साथ के
मन में ताज़गी नहीं आती !!

बस आज इतना ही
धन्यवाद









शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

1674... सवाल जेब का...



PRIYANKAR

यह कुसूर सिर्फ़ उनके पहनावे से जुड़ा हुआ नहीं है
न ही इतना भर कहने से काम चलने वाला कि क्योंकि वे औरतें हैं
जवाब भले दिखता किसी के पास न हो मगर
इस बारे में सोचना ज़रूरी है

जल्दी सोचो!
क्या किया जाए
दिनों-दिन बदलते ज़माने की तेज़ रफ़्तार के दौर में
जब पेन मोबाइल आई-कार्ड  लाइसेंस  और पर्स रखने की ज़रूरत आ पड़ी है



विश्वनाथ सचदेव

इस कविता के सवालों का कोई जवाब मेरे पास नहीं है.
पर मुझे लगता है, जब भी मैं तितली को उड़ते हुए देखता हूं,
शायद कोई जवाब मेरे आस-पास मंडराने लगता है.
पकड़ने की कोशिश करता हूं उसे,
पर तितली की तरह हाथ से फिसल-फिसल जाता है...


शशिभूषण

मेरे सब की धुरी हो तुम
मैं दूसरों की शिक़ायतें तुम्हीं से करना चाहता हूँ... 
कि यह दुनिया मेरे इशारों पर नाचे तो 
अकेला छोड़ दिए जाने पर 
मैं तुम्हारी सुंदर आँखों और प्यारे चेहरे को याद करता हूँ...



भिखारी देखे मुझे गिरा जहाँ, था वोह कोई एक गाँधी रोड.
मुझे उठाने की चाहत में, लगाये वोह एक अंतिम दौड़.

हाय हाय रे ट्रक ने उड़ाया, खायी उसने गहरी चोट.
ढेर हो गया वोह भिखारी, मिला न उसको सौ का नोट.



और तो और पढ़ तो लेते हैं पूरी कविता
पर जब टिप्‍पणी देनी हो तो यूं ही सरक जाते हैं
आपके चाहे हों दो की जगह चार हाथ
तब भी आप ताली नहीं बजा पायेंगे


><><
पुन: मिलेंगे...
><><
हम-क़दम के लिये इस बार का विषय है-
'क़लम'/'लेखनी'

संत कबीर दास जी कहते हैं- 
मसि कागद छुवो नहीं, क़लम गही नहिं हाथ।  

आज बस यहीं तक

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

1673...बिन गले मिले कशिश भरे प्यार की तरह...

सादर अभिवादन। 

          आज भारत में पिछले तीन दशक से एक आयातित पर्व 'वेलेंटाइन डे' की धूम है जो एक विशुद्ध बाज़ारवाद की उपज है। नयी पीढ़ी ने ख़ुश होने के बहाने इसे हाथों-हाथ अपना लिया है। हम भी ख़ुश हो लेते हैं ऐसे मौक़ों पर लोगों को ख़ुश देखकर। कट्टरवादी ऐसे पर्वों का विरोध करते हैं जो एक संकुचित सोच हो सकती है। महँगे उपहारों के आदान-प्रदान और समय की बर्बादी पर चिंतन करते हुए इसका सिर्फ़ मूल्याधारित वैचारिक स्वरुप अपनाया जाय तो परिणाम रचनात्मक हो सकते हैं। 

       बहरहाल आज गत वर्ष पुलवामा में शहीद हुए सैनिकों का शहीदी दिवस है। 'पाँच लिंकों का आनन्दपरिवार देश के लिये बलिदान हुए शहीद सैनिकों को याद करते हुए श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है। 

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-   


लगी सजाने रजनी आँचल
तारक चंद्र लगाए,
जगमग जुगनू भर मुट्ठी में
धरती पर बिखराए।


 
आधा-अधूरा
फीका भी
पर आँखों को
भाता .. सुहाता
सुहाना-सा
अधखिले फूल या
आधे-अधूरे
बिन गले मिले
कशिश भरे
प्यार की तरह ...


मेरी फ़ोटो 
जब वो गुजरता है गली के कोने से,
तो छत के किसी कोने में खड़े होकर उसे देखते हैं
तब तक जब तक की वह नजरों से ओझल ना हो जाए। 
उसकी हर अच्छी-बुरी बातों को 
हम सही मानते हैं


 
"आज तुम्हारा जन्मदिवस है न। तुम्हारे दोस्तों ने तुम्हें एक सबक़ सिखाया है तुम्हें परख करनी है,दोस्तों की... हूँ "
दोनों माँ बेटे की आँखें भर आती हैं। माँ सौरभ को अपने सीने से लगा लेती है।
"परन्तु मम्मी सर को मेरा भी पक्ष सुनना चाहिए था। वो मुझे ऐसी...."
सौरभ अपनी घुटन जताता हुआ।
"कभी-कभी कुछ सुनना ही सब बयान कर जाता है,शायद वे आपको इस ज़िम्मेदारी के लायक नहीं समझते,आप ग़लत नहीं हो,सही बन कर दिखाओ।"


Sujata Priye 
यह त्योहार भारतीय संस्कृति के परिचायक के रूप में भारत देश के सम्पूर्ण हिस्से में मनाया जाता है।इस दिन सभी लोग अपने गिले-शिकवे,वैर-भाव,मनमुटाव-नाराजगी,कपट-कटुताओं को भूलकर तथा उसे दूर करने के उद्वेश्य से मित्रों एवं परिजनों के घर जाकर उनके गले मिलते हैं और मन से उनको दूर कर आपसी भाईचारा,प्यार तथा मेल- मिलाप बढ़ाते हैं।आज के दिन लोग सामाजिक भेद-भाव को निराकरण कर परस्पर प्रेम भाव संभाव स्थापित करते हैं।यह पर्व होलिका दहन के दूसरे दिन अर्थात् चैत्र मास के कृष्ण प्रतिपदा यानी साल के प्रथम दिवस को मनाया जाता है।इसी दिन से हमारा नववर्ष प्रारम्भ होता है।

इस सप्ताह का विषय
हम-क़दम का नया विषय

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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