सादर अभिवादन
मोक्ष यहाँ चाट की दुकान पर पत्तल बिछाए खड़ा है...
संकलित रचना कभी प्रकाशित होगी
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-
मन में राम अब क्या है इच्छा,
अब शीघ्र मांगो दूजा वरदान।
मातु बिना जग सूना लागहि,
अब कौन बुलाये मुझको लाल।।
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पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना
जाने कब, कहाँ, किस राह से तुम गुजरो
हर राह में बेसब्र बिखरने लगा है आईना
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उकेरता नहीं किसी और का प्रतिबिम्ब यह
रात ढलते ही देखिये कहरने लगा है आईना
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'ख' वर्ण के मुहावरों की कविता (5) | हिंदी मुहावरा-माला।
युद्ध में खून की नदी बहाना और खून-खच्चर होना तबाही लाता है,
मासूमों का खून जिसकी गर्दन पर हो, वह नरक का भागी
कहलाता है।
ज़ालिम किसी का खून पीता है, गरीबों का खून चूसता है जो,
उसका खून ठण्डा/सर्द होना तय है, चाहे जितना भी
उबलता हो।
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कोई कर्ज में डूबा किसान
या,डिप्रेशन से जूझता कोई विद्यार्थी
लेता है जब खुदकुशी का निर्णय
आसान तो नहीं होता .......
खुदकुशी थी वो,या मार डाला गया
समाज के झूठे दंभ या गरीबी ने,
दर्द बूढे़ बरगद का समझे क्या कोई
वो तो खडा बस यहाँ एक साए-सा।
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शारीरिक प्रतिरक्षा शक्ति को पहचानो: सतीश सक्सेना
यानी लड़ाई वैक्सीन ने नहीं, बल्कि शरीर ने लड़ी, कोरोना
संक्रमण हुआ, और शरीर के अंदर की सेना टी सेल,
बी सेल, एंटीबॉडी और मेमोरी सेल इन सबने मिलकर वायरस को पहचानकर
खत्म किया।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
जल से है पृथ्वी पर जीवन
हरदम इसका ध्यान धरें
डिटर्जेंट डाल डाल सरि को
कभी न लहूलुहान करें।
प्राणवायु देता है पीपल
बरगद से मिलती है छाया
मेट्रो के खम्भे ने छीना
उनसे उनकी विस्तृत काया
सादर अभिवादन
भोर वंदन
"रश्मियों की कनक धारा में नहा,
मुकुल हँसते मोतियों का अर्घ्य दे;
स्वप्न शाला में यवनिका डाल जो
तब दृगों को खोलता वह कौन है?
सुरभि वन जो थपकियां देता मुझे,
नींद के उच्छवास सा, वह कौन है?"
महादेवी वर्मा
सुप्रभाती के साथ बुधवारिय अंक के क्रम को बढाते हुए ..
वह नज़र झुकाकर चलती थी,
और शोहदे उसके पीछे-पीछे चलते थे।
उसके लिये
रास्ता अक्सर अपमान में बदल जाता था।
उसने हिम्मत की,
एक दूसरी राह चुनी—
कुछ अनकही सी बातें हैं,
जो शब्दों तक आकर लौट जाती हैं,
आँखों की दहलीज़ पर ठहरकर
चुप्पियों में कहीं खो जाती हैं।
कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं,..
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व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग।
लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग ।
लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल...
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"क्या हुआ, प्रिय? तुम इतने अशांत और उदास ! तुम्हारी नील प्रभा पर कोहरे की परछाई!?"
नीलांबर ने एक गहरी आह भरी। "क्या कहूँ, धरा! मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे सौंदर्य को निहारने में है। तुम्हारा हरित आवरण, तुम्हारे गिरि-शिखरों पर बिछी हिम की चादर, तुम्हारे सागरों की असीम गहराइयां - यही तो मेरे जीवन का सार है। परंतु पिछले कुछ दिनों से यह कोहरा मेरे और तुम्हारे बीच एक..
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गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l
सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll..
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इति शम
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
माया स्वर्ण-मृगों की टोली, वन-वन मन को दौड़ाती
सत्य हिमालय-सा अडिग खड़ा, हर भ्रम-रेखा मिटवाती
सुख चंपा की गंध सलोनी, दुःख धधकता पलाश बना
दोनों के संग-संग चलकर ही, जीवन पूर्ण प्रकाश घना
कर्मों के कर से बुनती है, हर दिन नई चदरिया काल
एक सिरा उत्सव में भीगा, दूजा भीगा अश्रु-जाल।
पर मैं उसके कंधों पर
बेफ़िक्र बैठा रहता था,
जानता था कि वह
गिरने नहीं देगा मुझे ।
बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l
जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll
इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l
खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन रचनाएँ-
गाथा कहें माँ भारती की हम सदा।
हर ओर गौरव गान हो अभिमान से।।
रख स्वावलंबी आज अपना ध्येय
भी।
पूरा न हो कोई प्रयोजन दान से।।
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छिपी है हरेक मन
में
उसे हवा देकर पल
भर को सुलगाती हैं
या कोई मन
छिपाये हो भीतर
प्यार की सुवास
वह बिखर जाती है
किसी अनजान पल
में
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बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l
जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी
थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll
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पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !
कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की
बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़
नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के
लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग
एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग
को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।
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मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!