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सोमवार, 20 जनवरी 2020

1648....हम-क़दम का १०४वाँ अंक.. अंधा बाँटे

सोमवारीय विशेषांक में
आप सभी का स्नेहिल
अभिवादन
---///---

"अंधा बाँटें रेवड़ी पुनि-पुनि अपने को देवे"
एक लोकोक्ति जिसमें निहित अर्थ स्वार्थी और भ्रष्टाचारी परिदृश्य को उजागर करता है।

अंधा बनकर रेवड़ियाँ बाँटने की परंपरा का कोई सटीक इतिहास तो ज्ञात नहीं है किंतु मेरा ऐसा अनुमान है कि जबसे समाजिक व्यवस्था विकसित हुई होगी तबसे
रेवड़ियों की बंदरबाँट भी।
मनुष्य के मन के स्वार्थी और लोलुप भावनाओं का भले ही 
आज के दौर की विकृति और बिगड़ती सामाजिक दशा मानकर बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया जाता है
परंतु यह तो अकाट्य सत्य है कि आँख होते हुये भी अंधा होना
कोई नयी बात नहीं।
राजा हो या रंक शक्ति,संपदा या अधिकार पाकर 
अपने प्रियजनों को लाभान्वित करते ही रहे हैंं।
खैर
मुझे लगता है हम इस लोकोक्ति को नया रुप दे सकते हैं
अंधा बनकर क्यों न हम थोड़ी सी इंसानियत की रेवड़ी बाँटें,समाज को शर्मसार करते असंवेदनशील रिश्तों,संबंधों में थोड़ी-सी संवेदना की मीठी रेवड़ी बाँटें।
जाति और धर्म से बनी भरी नफ़रतों की खाई को
  सौहाद्र की रेवड़ी से पाटें।
क्यों ऐसा नहीं हो सकता कि हम
निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर 
देशप्रेम में अंधे होकर
जन-जन में भाईचारे और अपनेपन की रेवड़ी बाँटें।
अपनी भावी पीढ़ियोंं के उज्जवल भविष्य के लिए
अंधविश्वास मुक्त, अमीर गरीब का भेद  किये बिना 
शिक्षा और संस्कार की रेवड़ी बाँटें। ऐसी रेवड़ियाँ हम क्यों नहीं बाँट सकते जिससे संपूर्ण मानवता लाभान्वित हो सके।

★★★★★

हमक़दम का विषय इस बार ज़रा अलग था पर हमारे प्रिय रचनाकारों की अद्भुत लेखनी और बुद्धिमत्ता नमन योग्य है।
आप सभी की रचनात्मकता को सादर
प्रणाम।
आप सभी साहित्यजगत के
झिलमिल सितारें हैं जिसकी शीतल रोशनी
हमारे मंच की शोभा द्विगुणित कर रही है।
आप का सहयोग अतुलनीय है।
आप सभी की रचनाएँ बहुमूल्य है।

एक से बढ़कर एक रचना है आज की अवश्य पढ़ियेगा सभी रचनाएँ जो किसी भी कालजयी रचना से बढ़कर है।

★★★★★

अंधा बाँटें रेवड़ी...साधना वैद

वैसे कहने सुनने में यह मुहावरा अच्छा लगता है ! इससे जुड़ा कोई रोचक किस्सा भी ज़रूर रहा होगा इस बात का भी आभास होता है ! लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए कि कभी किसीने एक ग़लती की और उस पर यह मुहावरा गढ़ लिया गया तो हमें इसे जीवन भर दोहरा दोहरा कर इसे अजर अमर बनाना होगा ? माना कि मुहावरा आकर्षक है ! इसमें कुछ हास्य है, कुछ मज़ा है, और ढेर सारी नाटकीयता है लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि हम हमेशा ही यह गलती दोहराते रहें !



अंधा बाँटें...आशालता सक्सेना

सपनों में जीते लोग अपनों को बोट देने का मन बनाने लगे |
पर जब नई सरकार का गठन हुआ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ |
चन्द लोग ही बंदरबाट का आनंद उठा पाए |जिस लाभ की बात होती उन तक ही पहुँच कर रुक जाता |मानो अंधा बांटे रेबडी फिर फिर अपनों को देने की बात की सच्चाई पर मोहर लग रही हो |



आखिर उनकी लगन रंग लाई।ऊपर से आदेश आ गये कि 25 अर्जी स्वीकारी जाएगी ,सभी जरूरत मंद  गवाह के हस्ताक्षर के 
साथ अपनी अर्जियां डाल दें।
सर्वेश्वर जी ने बढ़ चढ़ कर सभी को अर्जी लिखने में मदद की ।
आज गाँव में कई पक्के मकान दिखने लगे ,कुछ छोटे मकान बड़े हो गये ,छोटे खेत बड़े हो गये ,
आज सर्वेश्वर दयाल का सारा कुनबा गाँव में सबसे प्रतिष्ठित और सबसे स्थापित है ।



"अरे बुआ! वह कहावत तो सुनी होगी आपने,अंधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह के देय। देश की यह हालत हो रही है,मिल गये जिसको मिलना था और ऐसी जगह मिले है जहाँ कोई आता-जाता ही नहीं है,ये बताओ इधर पेंट्रोल पंप लेने आती हो क्या महीने में एक बार ?" वह अट्टहास करता हुआ वहाँ से चला जाता है।


अंधा बाँटें रेवड़ी....शुभा मेहता

चलो अब सो जाओ थोडी देर । मैं भी थकी हुई थी जल्दी ही आँख लग गई । तभी सपने में क्या देखती हूँ एक अंधा बडे से झोले में रेवडिय़ां लेकर आ रहा है ,दूसरे हाथ में डंडा है । जब भी मैं रेवडी लेने आगे बढती वो जोर से डंडा पछाडता ..सपने में भी रेवडी न मिली ।  
बडी़ हुई ,अच्छी शिक्षा प्राप्त करली , खूब अच्छा रिजल्ट ढेरों सार्टिफिकेट सब कुछ है मेरे पास ,बस सिफारिश नहीं । कल एक कंपनी में इन्टरव्यू है । थोडी चिंता में हूँ । 


अंधों के आगे नैना वाले हार मान बैठे हैं।
रोते-रोते अंधों के तलवे ही चाट बैठे हैं।
अंधों के राज्य में आँखों का काम है।
लाठी जिसके हाथ बस उसका ही नाम है।



आजादी की छाँव में धूप से तन सेंके हैं।
जिंदगी की नाव को बिन पानी खींचें हैं।
बँटती जो रेवड़ियाँ , नंबर कहाँ आता है।
बैठै-बैठे अंधों का बस मुँह देखा जाता है।


भाषा "स्पर्श"की....सुबोध सिन्हा

परिभाषा सुन्दरता की तुम सब समझो साहिब
जन्मजात सूर हम केवल भाषा "स्पर्श" की जाने
अंधा बांटे भी तो भला जग में क्योंकर बांटे
अंतर मापदण्ड के सुन्दरता वाले सारे के सारे ...

★★★★★★

आज का यह विशेष हमक़दम का अंक
आशा है आपको अच्छा लगा होगा।
आपकी प्रतिक्रिया नवीन ऊर्जा का
संचरण करती है।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूले।

#श्वेता

रविवार, 19 जनवरी 2020

1647.....फिजाँ कैसी मीठी मीठी हो रही है मक्खियाँ ही मक्खियाँ हर तरफ हो रही हैं मधुमक्खियाँ नजर अब आती नहीं हैं ना जाने कहाँ सब लापता हो रही हैं

जय मां हाटेशवरी......
मेरी प्रस्तुती का दिन आते-आते.....
मौसम फिर बरफीला हो जाता है.....
आज भी बर्फ की संभावना है.....
लाइट तो कल से ही गुल है......
कुछ बैकप से ही काम चलाते हुए....
पेश है....मेरी पसंद.....

विरोध का चेहरा या महिलाएं बनीं मोहरा ?दिलों में विरोध की आग गली -गली शाहीन बाग़ ?अधिकार तो चाहिए लेकिन कर्तव्य कौन निभाएगा ?
इसी के परिणाम स्वरूप हिन्दुओं की कुलाबादी जहां १९५१ में पाकिस्तान की कुलाबादी का मात्र तीन आशारीया चार चार (३. ४ ४ फीसद )वह वर्तमान में घट के १. ५ फीसद
रह गई है।  मुस्लिम बहुल पाक ने तो इसके बाद अहमदिया सम्प्रदाय के साथ साथ शियाओं को भी मुसलमान मानने से इंकार कर दिया। अहमदिया और शियाओं को पनाह  देने की
तरफ़दारी  कथित शाहीन बाग़  ने भी नहीं की है।
भारत ने सोच के धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हो।तमिल  टाइगर्स के २००९ में सफाये के बाद से ही हालात सामान्य हैं वहां
से भारत चले आये तमिल भाई वहां स्थिति सामान्य होने के कारणलौट जाना चाहता है वापस

फिजाँ कैसी मीठी मीठी हो रही है मक्खियाँ ही मक्खियाँ हर तरफ हो रही हैं मधुमक्खियाँ नजर अब आती नहीं हैं ना जाने कहाँ सब लापता हो रही हैं
 इधर
कुछ
सालों से
क्यों
लापता
सी
हो रही हैं
लिखने लिखाने
की
जगह सारी
भरी भरी
सी
हो रही हैंं
कैसे लिखे
कोई
कुछ
पता ही
नहीं
चल रहा है

एहसास का चादर
एहसास का चादर
जीवन को अगर समझना था तो,
इसमें उलझना शायद
बहुत जरूरी था।

तुम आईना फेंक कर..
तो देखो,
तुम्हें दिल के टूकड़े
गिनने नही पड़ेगे।

कमाल है ...
तो क्या अब हमें यह गद्दार काटेंगे नहीं?
नहीं, अब आपस में ही काटम काट चल रहा है ...
पर इनके फ़ितरत की फिक्र है, बंधु !!
बाकमाल यह,
कभी भी किसी करवट बैठ सकतें हैं, बंधु !!!

दोहा गीत
  जगत करम का खेत है , जो बोए सो पाय,
 प्रेम भाव से सींच ले , नाही तो पछताय।
अपनेपन का लोप है , रिश्ते कहाँ पुनीत।
कहता मन भौरा बनूं , गाऊँ मीठे गीत ।

प्रेम
दूसरे को प्रीतिकर हों ऐसे वचन ही मुख से निकलें
इस सजगता का नाम ही प्रेम है
सब कुछ साझा है इस जहाँ में
हर कोई जुड़ा है अनजान धागों से,
धरा, गगन, पवन, अनल और सलिल के साथ
जुड़ाव महसूस करने का नाम ही प्रेम है
रक्त पिपासा
 वो देखो बैठा है रक्त-पिपासायुक्त मानव चारों ओर
जो रक्त की तेज़ धार देखकर
मन ही मन में शैतानी हँसी  हँसता है
और अपने ही भ्रमजाल में खुद को लपेटे सोचता है
इंसान नहीं दानव बन रहा हूँ

एक व्यक्ति का रक्त नहीं रक्त की नदियाँ बहाने को तैयार हूँ
इस बदलते दौर में
मनुष्य होने के लिये शर्मिंदा हूँ

धन्यवाद।

शनिवार, 18 जनवरी 2020

1646.. बोलती कहानियां

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में पांडेय बेचन शर्मा उग्र की कथा मूर्खा का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं बसंत त्रिपाठी की कथा "अंतिम चित्र", जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रकाशकों की व्‍यावसायिक बुद्धि के कारण
कृति के मुखपृष्‍ठ पर सुराही लिए बाला का चित्र बनाया गया है
जो कृति के प्रति भ्रांति उत्‍पन्‍न करता है।
उन्‍होंने उक्‍त कृति को बनाए जाने पर
प्रदर्शनी लगाए जाने की बात कही।

किसी रसवन्ती को देखा
बदली अपनी वेशभूषा
मड़डाने लगे, भिनभिनाने लगे
बातों के गीत अलपाने लगे
मीठे मीठे ख्वाब सजाने लगे
हरियाली के गीत सुनाने लगे
पेड़ों के धुन पर लहराने लगे


हल्की सी मुस्कुरा कर जैसे वो कह रही हो कि उसकी दोनों आंखों की एक कहानी ज़िंदा है... हल्की सी नज़र घुमाई तो एक काली सफेद फोटो पर नज़र पड़ी.. अचानक अकेले घर में जैसे भीड़ लग गई। “ देखना गुड़िया ही होगी... लेकिन तुम्हारे जैसी नहीं मेरे जैसी दिखेगी...” संदेश ने कहा तो आठ साल पहले था लेकिन जैसे आज वो उसे दोहरा रहा था। “ ऐसा कैसे... मैं तुम्हारे जैसा दिखने ही नहीं दूंगा...” चहक कर उसने जवाब दिया... “ये फोटो देखो... मैं ऐसा लकड़ी का घोड़ा लाउंगा, बड़े बाज़ार से खरीद लाते हैं... बाद में भी तो लाना है... आज ही ले आते हैं... फिर कर से तुम्हारा चलना फिरना बंद और तुम सिर्फ आराम करना...


><>< 
फिर मिलेंगे...
><><
103 सप्ताह से आप कविता ही लिख रहे हैें
इस बार आप व्यंग्य, आलेख आदि 
लिखने की कोशिश कीजिए
अब विषय क्रमांक 104विषय है
अंधा बांटे ???
उदाहरण की कोशिश है
अरविंद कुमार खेड़े दी का एक व्यंग्य आलेख है
जो डेली हंट मे छपा है
'सुनकर बापूजी का माथा ठनका। खोजबीन की तो पता चला, अवाम ठीक कह रही है। फिर उन्होंने इस भेदभाव को दूर करने के लिए युक्ति निकाली। क्यों न यह बाँटने का काम किसी अंधे को सौंपा जावे? वह देख ही नहीं पाएगा तो इस प्रकार के भेदभाव की संभावनाएँ ही खत्म हो जाएगी। ' बापूजी के स्वर्ग सिधारने के बाद 'सुराज' का यह कार्य आज भी अनवरत जारी है। बदला है तो सिर्फ इतना कि सारे समर्थ लोगों ने देश के सारे जरूरतमंदों को खदेड़ दिया है। और वे सब अपने-अपने सगे-संबंधियों के साथ रेवड़ी पाने अंधों के सामने खड़े हैं। दुर्भाग्य यह है कि अंधों को इसका इल्म नहीं है।वे बापूजी के सौंपे गए इस पुनीत कार्य को अपना कर्तव्य समझ निष्ठापूर्वक आज भी निर्वाह कर रहे हैं। और अवाम के लिए सुराज का यह सपना आज भी एक सपना ही बना हुआ है।' कहते-कहते दादा का दिल बैठ गया था।गला भर आया था। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, आस्तीन से अपनी आँखें पोंछी, फिर अपना चश्मा साफ किया। रुँधे गले से कहा,'आज भी अपना बूढ़ा और अंधा गणतंत्र समझ रहा है कि,वह भेदभाव किए बिना रेवड़ी बाँट रहा है।'

प्रेषित करने की अंतिम तिथि : आज शनिवार 18 जनवरी 2020
मेल द्वारा शाम 3.00 बजे तक


शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

1645..क्योंकि जी रहा हूँ मैं अब तक प्यार-भरों के प्यार में

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
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रांगेय राघव

17जनवरी 1923 - 12 सितंबर1962
---------
हिंदी,अंग्रेजी,ब्रज और संस्कृत के ज्ञाता 
"तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य।"
कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, रिपोर्ताज जैसी विधाओं के ज्ञाता, हिंदी साहित्य को  समृद्ध करने वाले, हिंदी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले लेखक  रांगेय राघव मूल रुप से तमिल भाषी थे।

जिन्हें निम्नलिखित 
हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, डालमिया पुरस्कार, 
उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी 
पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनका यह विपुल साहित्य उनकी अभूतपूर्व लेखन
 क्षमता को दर्शाता है। जिसके संदर्भ में कहा जाता रहा है कि ‘जितने समय में कोई पुस्तक 
पढ़ेगा उतने में वे लिख सकते थे। वस्तुतः उन्हें कृति की रूपरेखा बनाने में समय लगता था
लिखने में नहीं।‘ रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे
रचनाकार हैं जो प्रगतिवाद का लेबल चिपकाकर 
सामान्य जन का दूर बैठे चित्रण नहीं करते
बल्कि उनमें बसकर करते हैं। समाज और इतिहास की यात्रा में वे स्वयं सामान्य जन बन जाते हैं। रांगेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही
 मायने में प्रगितशील रवैया अपनाते हुए अपनी 
रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान 
करवाई।  उन्होंने केवल इतिहास कोजीवन कोमनुष्य की 
पीड़ा को और मनुष्य की उस चेतना कोजो अंधकार से जूझने की शक्ति रखती हैउसे ही 
सत्य माना।

उनकी लिखी एक कविता-
-----
ओ ज्योतिर्मयि ! क्यों फेंका है,
मुझको इस संसार में ।
जलते रहने को कहते हैं,
इस गीली मँझधार में ।

मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ
निरीह पग पर काल झुके हैं,
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में...



★★★★★

आइये आज क रचनाएँ पढ़ते

 मन

मिट कर चैन मिले न जाने किरणों संग यदि उड़ जाये, उसी एक से एक हुआ तब नजर नहीं किसी को आये ! किन्तु उसे दूर जाना है लक्ष्य कई मन में पाले हैं, पाहन, जंगल, विजन, शहर भी उसके रस्ते में आने हैं !


एक सत्य - सत्य से परे

लड़की बदनसीब नहीं 
बदनसीब तुम हो 
जो उसके साथ हुए दुर्व्यवहार से नहीं दहलते 
नहीं पसीजते 
उसे मारनेवाले से कहीं अधिक हिंसक तुम हो 
जो हर बार आगे बढ़ जाते हो 
लानत है तुम पर  !!!

नदी और समंदर

मैं समंदर में मिलूँ,
खारी हो जाऊं,
इससे अच्छा है 
कि रास्ते में ही सूख जाऊं,
मीठी बनी रहूँ.



सफ़ेदपोशी

मूक-बधिर बनी सब साँसें, 
 सफ़ेदपोशी नींव पूँजीवाद की रखने लगी,  
आँखों में झोंकते सुन्दर भविष्य की धूल, 
अर्जुन-वृक्ष-सा होगा परिवेश स्वप्न समाज को दिखाने लगे |



बेचारी बुधिया को समझ नही आ रहा था कि वो कल्लू से क्या कहे, कैसे उसको समझाये। चूल्हे पर सेक रही रोटी को चूल्हे से निकाल कर, कल्लू को गोद में बिठाल ली, बालो में हाथ फिराते हुये अपनी पूरी ममता उडेलते हुये बोली- तुने कैसे समझा रे कि मै तुमको जूठा खिलाती हूँ, देख ये रोटी तेरे लिये गरमागरम बना रही हूँ न। मेरा लाल भी काहे खाये किसी का जूठा।

★★★★★★

आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आप सभी की प्रतिक्रिया उत्साहित करती है।
हमक़दम का विषय

यहाँ देखिए


कल आ रही हैं विभा दी एक विशेष

अंक लेकर कल का अंक पढ़ना न भूले।
★★★★★

विचार नभ पर कल्पनाओं के
इंद्रधनुष टाँकना ही पर्याप्त नहीं
सत्ता,संपदा,धर्म-जाति अस्वीकारो
मानवीय मूल्य सर्वव्याप्त करो

सही आकार देकर समाज को
उन्नत भविष्य का परवाज़ दो
 दावानल बन न  विनाश करो
दीपक-सा जल तमस हरो

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