।।प्रातःवंदन।।
"शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ।"
त्रिलोचन
बुधवारिय प्रस्तुतीकरण के क्रम को बढाते हुए आज इन लिंको पर पड़ी ..जो इस प्रकार से है
बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना..
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नाम...
तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ
जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…
चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई..
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वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है |
मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने
उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला
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हवा की बरजोरी,
शाखा का सिहरना।
टहनी की गलबाँही,
पलक मिलमिलाना
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️






