निवेदन।


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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

4715 ..आज बारिश बरसते हुए मेरे साथ मुस्कुराई

 सादर अभिवादन

आज श्वेता जी नहीं है
शायद कल मिलेंगी

रचनाएं ....




“हाँ माँ… वो तितली बन गई।” राधिका ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा—

थोड़ी देर रुकी, फिर धीमे से पूछा-

“और मैं…! मेरे लिए माँ तुम कब कहोगी, बनना तितली! देखना मेरे पंखों के रंग किसी अन्य की हथेलियों में नहीं दिखेंगे!” उस दिन पहली बार, उसने खिड़की बन्द नहीं की।





आज बारिश बरसते हुए 
मेरे साथ मुस्कुराई 
उसने कहा, आज मैं 
आँखों के पानी की तरह 
नहीं बरसूँगी 
मुस्कुराहट के मोतियों सी 
बिखरुंगी 
कुछ ग़ज़ल सी गुनगुनाऊँगी 
खिड़की के शीशे पर 






इतिहास कह रहा है ज़रा सी न भूल हो
स्वार्थ की तनिक सी भी मन पर न धूल हो
शृंगार करें मिलके सभी राष्ट्र-धर्म का
हाथ में सद्भाव का सुन्दर-सा फूल हो ।।







मैं मुखड़ा गाता,
तुम अंतरा गातीं
या गीत के सम पर किसी
वाद्य यंत्रों की जुगलबंदी-सी
थाप अपनी हथेलियों की,
लिए खनखनाहट अपनी चूड़ियों की,
पीठ पर मेरी थपथपाती कभी।
या फिर .. 
बतकही पर मेरी किसी, 
"वाह-वाह" ना सही,
निकालती कोई मीन-मेख ही तुम कभी .. बस यूँ ही ...





समंदर के देश में मछलियां मरती नहीं है
उनकी सामूहिक हत्या की जाती हैं
मेरे देश की तरह उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है
हां मेरे देश की तरह वहां हत्यारे
पुनः पुनः आ जाते हैं बेखौफ



सादर समर्पित
सादर वंदन

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

4714 ...पेड़ ! सावधान रहना राजमार्ग से सटा जंगल अब सबकी निगाह में है।

 सादर अभिवादन

किताबें और माँ बाप की बातें 
जिंदगी में  कभी धोखा नहीं देती


रिश्तों को रिश्तेदारों पर मत छोड़ो, 
खुद अपने निर्णय लें 
आपस मे बात करें, अगर
अपनी गलती हो तो स्वीकार करें।

रचनाएं ....



हमने तुम्हें
हमेशा शक की नज़र से देखा

तुम हँस दो तो
“इशारा”
तुम चुप रहो तो
“घमंड”

तुम किसी से बात कर लो तो
“चरित्र”
और न करो तो
“रहस्य”

तुम्हारे जीवन का हर रंग
हमने
अपनी सुविधा से तय किया।




लिख डाले कितने खत
जोश में हमने
तुम्हारे लिए

कितने ही कोरे कागज
रंग डाले हमने
तुम्हारे लिए




कविता सिर्फ शुरुआत है—
और वही कविता सबसे पूरी है
जो अधूरी रह जाती है,
क्योंकि
कविता कभी पूरी नहीं होती।




पेड़ !
सावधान रहना
राजमार्ग से सटा जंगल
अब सबकी निगाह में है।
फ्लाईओवर, मोबाइल टावर, सिगरेट, आरियां, 
सब दिन दहाड़े घात लगाए बैठे हैं...





इनके बचपन के संग - संग में 
अपना बचपन जी लेती हूँ 
मेरे आँगन हर दिन आये 
ऐसे ही बचपन का झोंका 
जिनमे झूम के मैं गाऊँ 
हर दिन खुशियों से भर जाऊँ ।





काफी दिनों बाद पति का स्पर्श कलाई पर महसूस हुआ तो वह भावुक हो गई। पति बोला " चलो अपने घर चलते हैं। " इतना सुनते ही रौनक बोली " तलाक के कागजों का क्या होगा..??? " पति बोला " फाड़ देंगे। इतना सुनते ही वह दहाड़ मार कर पति के गले से चिपट गई। 




तन्मयता से अभ्यास वह,कर रहा था तीर चलाने का ।
अलग-अलग अंदाज में ,निशाना वह वहांँ लगाने का।
ध्यान भंग कर गुरुवर ने पूछा,कौन तुम्हारे गुरु है तात। 
कौन तुमको तीर चलाने की,यह  विद्या देते हैं सौगात।
कहा एकलव्य ने विनीत भाव से,मैंने गुरु आपको माना। 


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

4713..नूतन वर्ष फले-फूले

।।भोर वंदन।।
बुधवारिय प्रस्तुति कुछ इस तरह से है आप सभी जरूर नजर डाले 
इन पंक्तियो के साथ 
ओ आस्था के अरुण!
हाँक ला
उस ज्वलन्त के घोड़े।
खूँद डालने दे
तीखी आलोक-कशा के तले तिलमिलाते पैरों को
नभ का कच्चा आंगन!

बढ़ आ, जयी!
सम्भाल चक्रमण्डल यह अपना..!!
अज्ञेय
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फसल कटी है !

खुशी की घङी है !

बहुत दिनों बाद

भूले सुर आए याद..
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कल दोपहर नन्हा और सोनू असम की यात्रा समाप्त होने से तीन दिन पहले ही वापस आ गये। कल शाम सोनू की कोविड की रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी है, नन्हे को भी सिर में दर्द था। पूरी दुनिया में कोरोना का नया वेरियेंट ओमिक्रॉन बुरी तरह फैल रहा है। प्रतिदिन लाखों लोग इससे संक्रमित हो रहे हैं। अब दस दिन तक पुन: उन्हें बिना मेड और कुक के रहना होगा। आज सुबह नींद देर से खुली।सुबह पानी पीकर, तैयार होने के लिए जल्दी में सीढ़ियों से ऊपर आते समय नूना की चप्पल अटक गई और बायें घुटने में हल्की चोट लग गई। जून ने बहुत ..

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व्यक्ति


इतना भरा भी नहीं कि..
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एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की 

नर्म देह पर..

टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच


घुटनों के बल झुककर

मैंने तुम्हारा नाम लिखा था

अपनी तर्जनी की नोक से..
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और मैं उसे ही भूल जाता हूँ।

उसे रहता है 

किस फ़ंक्शन में

मैंने किस रंग की शर्ट पहनी थी,

किस पल

मैंने भीड़ में

किस लड़की को ज़रा ज़्यादा ..
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।।इति शम ।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

4712...प्रेम में व्याकुल हुआ मन

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
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*जो झुक सकता है वो झुका भी सकता है।
 जीवन लंबा होने की बजाए महान होना चाहिए। 
* कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।
 * एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।
 * धर्म मनुष्य के लिए बना है न कि मनुष्य धर्म के लिए।

*देश के विकास से पहले हमें अपनी बुद्धि के विकास की आवश्यकता है।
आज
स्वतंत्र भारत के महान संविधान के रचयिता 
बाबा भीमराव अंबेडकर जी की जयंती पर 
पूरा भारत उन्हें याद कर रहा है।

किसान और फसल भारतीय संस्कृति में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। फसल के हर मौसम को देश के 
विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से उत्सव की तरह
मनाया जाने की परंपरा अनेकता में एकता का बेजोड़ उदाहरण है। इसी समृद्ध कड़ी में हर वर्ष 14-15 अप्रैल को 
विशेष रूप किस रूप में मनाते है आइये जानते हैं-
 पंजाब और हरियाणा में बैसाखी, असम में बोहाग बिहू,बंगाली समुदाय का पोइला बोइशाख, केरल में
 विशु कानी,तमिल में पुथंडु, बिहार,मिथिलांचल में सतुआनी... मुझे इतनी ही जानकारी थी अगर आपको 
 इस संबंध में कुछ और पता है तो कृपया जरूर साझा करें।
क्षमा चाहेंगे
 आज भूमिका काफी लंबी हो गयी है।
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आज की रचनाऍं- 


लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।


 मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 


प्रेम  की  सूक्ति  रही   ,क्यों  प्रेम  से  भयभीत  है 
प्रेम  निर्मल  भावना  है , ईश की  यह  प्रीत  है 

प्रेम  न  उन्माद  होता , न  हार  होता  जीत  है 
प्रेम  में  व्याकुल  हुआ  मन, प्रेम  आकुल चित है 

प्रेम  से  रहना  पड़ेगा,  प्रेम  से  बढ़ना  पड़ेगा 
प्रेम  की  ताकत मिली तो ,जीत  हुई  निश्चित  है 


ब्रह्म कमल की खुशबू इसमें 
गंगा निर्मल बहती है,
भक्ति भाव से सरयू माता 
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ 
निधि वन में रास रचाते हैं.






अपने इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह बोले कि बताओ तो जरा- बनारस से चुनाव जीते हैं और दिन रात योगा दिवस की रट लगाते हैं। यह बनारस का और बनारसी पान का सरासर अपमान है। इतना कहते हुए उनके भीतर का नेता जागा और वो कहने लगे कि या तो बनारस से इस्तीफा दो या योगा बैन करो। घँसु ने भी सदा की तरह हाँ मे हाँ मिलाई। तिवारी जी ने तब तक सुबह सुबह हुए पान के नुकसान और कुर्ता खराब हो जाने के लिए योगा को गरियाते हुए नया पान मुंह में भर लिया। अब वे कुछ घंटे मुंह में पान घुलाएंगे और मौन चिंतन में डूबे रहेंगे।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

4711...झूमर से झूमते अमलतास फूले...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नूपुरं जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 


भारतीय फ़िल्म संगीत का चमकदार सितारा रहीं आशा भोंसले जी अब दूसरी दुनिया के सफ़र पर चली गयी हैं. संगीत जगत में एक युग जैसे समाप्त हो गया!
विनम्र श्रद्धांजलि!
अपने स्वर से दुनिया को विविधतापूर्ण मनोरंजन देनेवाली आशा जी अपने पीछे संगीत का समृद्ध ख़ज़ाना छोड़ गयीं. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.
उनके कुछ नग़्मे जो मेरे दिल को छू गये-
          1.नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है.
          2.उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरीं  
          3.ओ मेरे सोना रे 
          4.जहाँ तक महक है मेरे गेसुओं की, चले आइए 
          5.कोई आया, धड़कन कहती है 
          6.मेरे भैया, मेरे अनमोल रतन, तेरे बदले में  ज़माने की कोई चीज़ न लूँ 
          7.यार बादशाह, यार दिलरुबा
          8. इक परदेसी मेरा दिल ले गया 
          9. झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में 
         10. अभी न जाओ छोड़कर  
              आदि -आदि...।


सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

झूमर तले

झूमर से झूमते अमलतास फूले
रास्तों के किनारे सोनमोहर बिछे

छज्जे-छज्जे पर बोगनवेलिया लगे

मजाल है कि कोई भी रंग छूट जाए 

***** 

“गम वॉल”

धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई,
बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई।
जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा,
लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा।

*****

हल्का होकर उड़े गगन में

कितनी चट्टानें थीं भारी 

रस्तों में पावन सलिला के,

राह बनाती उन्हें तोड़ती 

ठुक-ठुक चलती थी अंतर में!

*****

जज़्बा

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

*****

आज पढ़‍िए...'पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना'

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव


रविवार, 12 अप्रैल 2026

4710 ..ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।

 सादर अभिवादन


अब खुद ही गिर जाओ तुम, 
टूट कर जमीन पर 
पत्थर मारने वाला बचपन, 
मोबाइल मे व्यस्त है।।


रचनाएं ....


इ तना ही नहीं नेहरू ने अरुण की आर्थिक सहायता की और उसे फिर से पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया ! काम के बोझ के बावजूद अरुण ने मेहनत की और 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा सफलतापूर्वक पास की ! 
आज वह कंटेंट क्रिएटर बन चुका है। 
उसकी एक पहचान बन चुकी है ! अगर नीयत साफ हो और साथ देने वाला, सच्चा मित्र हो, 
तो मंजिल मिल ही जाती है। गरीबी के कारण जिन हाथों ने कलम छोड़ सफाई का कपड़ा थामा था, 
आज उन्हीं हाथों में कामयाबी की चाबी है। 
आज वो लाखों दिलों पर राज कर रहा है ! यह उपलब्धि अरुण जैसे
 हजारों बालक-बालिकाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है 




किराए की हँसी चेहरे पे पहने रहे उम्र भर,
आँख क्या छलकी कि मुस्कुराना भूल गए हम।

बेच डाली मुस्कुराहट इक खिलौने के लिए,
ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।





AIIMS अधिनियम, 1956
नेहरू की तत्परता से नहीं,
अमृत कौर के लगातार दबाव से पास हुआ।
उन्होंने लड़ाई लड़ी:
अफसरशाही की सुस्ती से
मंत्रिमंडल की उदासीनता से
कांग्रेस की ढिलाई से
फाइलें चली क्योंकि उन्होंने जबरदस्ती चलवाईं।
(स्वतंत्र भारत की प्रथम स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को
AIIMS के लिए पूरा श्रेय मिलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं।
)


तुम्हारी हथेली


काश! कि ये दुनियारी हथेली
कोमल होती
तुम्हारी हथेली की तरह
मैं रख देती चुपके से
इच्छाओं के फूल
और गहरी साँसें
पतझड़ की टूटन
अब सँभलती नहीं
उदासियाँ दफ़न हो रही हैं
साँसों में
साँसें कितनी उथली चलती हैं
इन दिनों।




कच्चा चिट्ठा



अचानक प्रशांत बाबू बोल उठे. "कॉमरेडों, तुमने जबर्दस्त काम किया है. फैक्ट्री प्रबंधन के लिए डेथ वारंट तैयार कर दिया है.. हमने साबित कर दिया है कि फैक्ट्री मुनाफे में चल सकती है, बस मालिक की नीयत खोटी है."
उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी. "शानदार! यह काम एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की टीम हफ़्तों में करती. अब हमारे पास आम सभा में मज़दूरों को देने के लिए केवल ही भाषण नहीं, बल्कि ठोस सुबूत हैं."


सादर समर्पित
सादर वंदन



सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

4709 ..हठ कर बैठ गया आमरण अनशन पर और मैं बन जाऊँगा धरती का भगवान।

 सादर अभिवादन


हो गए चूर सपने बच्चों के
खा गई बाप को ये बोतल क्या

सच ओ ईमाँ की बात करता है
उसको कहता जहां ये पागल क्या
 
ढूंढ ही लेते हैं मुझे ये ज़ख़्म
ज़ख़्म  भी बन गए है गूगल क्या
 
गुमनाम पिथौरागढ़ी  


रचनाएं ....




वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं—
पूरी व्यवस्था की है,
जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।





प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मैन्युफैक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों 
को अपने साथ ले जा सकते हैं?”




प्यार का ये सिलसिला शायद 
यूँ ही चलता रहेगा,
कोई चाँद से, कोई धरती से, 
यूँ ही दिल लगाता रहेगा।




हठ कर बैठ गया
आमरण अनशन पर
और मैं बन जाऊँगा
धरती का भगवान।
पर कोई नहीं आया
तब मैंने
इससे कहा
उससे कहा
कोई तो आओ
मुझे संतरे का रस पिलाओ
एक भिक्षु ने देखा
तो दौड़ा आया
मुझे रस पिलाया
पात्र अपनी झोली में रख लिया।
अनशन से मुक्ति मिली
नृत्य गया भाड़ में
मेंने तो पहले ही कह दिया था
ना मैं हारा
ना तू जीता
चलो अब फिर से
तेल निकालें
अपने-अपने कुयें से।




दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा, वाह रे अधर्मी ! 
मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई। और मैं प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती हूँ, 
तो तू हिन्दू कैसे नहीं हुआ रे नमक हराम ? 
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु, जल लेता है 
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए।
अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली 





खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल।
मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।।

जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे,
वह स्वयं की मुश्किलों को ही बढ़ाते आजकल।।

सादर समर्पित
सादर वंदन
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