निवेदन।


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रविवार, 1 नवंबर 2026

4912...आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है।

सादर अभिवादन

आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है। 

'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से 

ढेरों शुभकामनाएँ!

लंबे आंदोलनों और संघर्ष के उपरांत मध्य प्रदेश राज्य से विभक्त होकर एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बनाये जाने की घोषणा तत्कालीन अटल बिहारी बाजपेयी सरकार द्वारा की गयी जिसे छत्तीसगढ़ निवासियों ने तहेदिल से स्वीकार करते हुए केन्द्र सरकार का धन्यवाद किया था। छतीसगढ़ केवल अपनी प्राकृतिक संपदा के लिये ही नहीं जाना जाता बल्कि आदिवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी बोली के साथ-साथ अनेक सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिये विख्यात है। हिंदी भाषा के स्वनामधन्य श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल जी ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवांवित किया है। खनिज संपदा से समृद्ध यह प्रदेश अपनी अनुपम हरीतिमा के लिये सुविख्यात है। नक्सल समस्या का अंत भी सन् 2025-26 मे समूल उन्मूलन हो चुका है

*****   

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

पत्रिका सी तुम

किसी रोचक कहानी की तरह

मेरी कल्पनाओं को, मेरे सपनों को

कल्पना के पंख देकर

उड़ान भरने के लिए

आसमान में पहुँचा देती हो!

*****

1539 गीत / लिली मित्रा 

गुंजित मउमाछी की गुनगुन

पुष्प- पुष्प के कर्णों में

जैसे तुम खुसफुस हो करते

मधु मिश्रित से वर्णो में

झंकृत सुर में होकर गुम

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम

*****

अभिलाषा उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए

शहीदों की शहादत का, क़र्ज़ उतारने के लिए

वीर प्रसूता वसुधा का, फ़र्ज़ निबाहने के लिए ,

सुख-शान्ति अमन रहे चमन में वतन के लिए

अभिलाषा उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए ।

*****

824 ..यादों का बैंक

“मुझे अपनी जमा की हुई याद वापस चाहिए।” उसने कहा।

“लेकिन क्यों? आपने तो दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसे जमा किया था।”

अजित की आँखें भर आईं। “दर्द चला गया, पर उसके साथ मेरा बेटा भी चला गया।

अब मैं रोता नहीं, लेकिन मुस्कुराता भी नहीं। समझ आया कि कुछ दु:ख बोझ नहीं होते, वे हमारे अपनों के आखिरी निशान होते हैं।”बैंक ने उसकी याद लौटा दी।

*****

 नवगीत समीक्षा -सुप्रसिद्ध लेखक समीक्षक श्री रविनंदन सिंह

इस संग्रह में प्रकृति के साथ लोकजीवन का संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘मेड़ों पर वसंत’ में लोक केवल ग्रामीण परिवेश का पर्याय नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम, भाषा, संगीत, ऋतुचक्र, घरेलू संबंध और सामूहिक स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। लोक का अर्थ किसी काल्पनिक निष्कलुष संसार से भी नहीं है। गाँव में सौंदर्य है तो संघर्ष भी है; आत्मीयता है तो विषमता भी; सामुदायिकता है तो स्वार्थ और वर्चस्व के रूप भी। तुषार के गीतों में लोक का उज्ज्वल पक्ष अधिक प्रमुख है, लेकिन जहाँ वे श्रमिकों, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट की चर्चा करते हैं, वहाँ लोकजीवन की कठिन वास्तविकताओं की ओर भी संकेत मिलता है। ‘श्रमिकों के लिए’ इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय सामाजिक रचनाओं में से एक है। कवि लिखता है—

“अभी शहर से गाँव जा रहे

हर मुश्किल से लड़ने बाबू !

ख़त लिखना फिर आ जाएंगे

देश की मूरत गढ़ने बाबू !”

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

4911 पाश्चात्य देशों में भूतोत्सव (हैलोवीन फेस्टिवल)

सादर अभिवादन


बुराई की झांकियां पेश कर जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता बढ़ाने का त्योहार हैलोवीन
हर साल 31 अक्टूबर को हैलोवीन फेस्टिवल हैलोवीन डे के रूप में मनाया जाता है। इसे अमेरिका और लंदन में भी एक सेलिब्रेशन की तरह मनाया जाने लगा है। इस उत्सव के दौरान बुराई की झांकियां पेश की जाती हैं और बड़े व बच्चे भूत, प्रेत, पिशाच की वेशभूषा में तैयार होते हैं। इस त्योहार को मनाने वाले लोग मानते हैं इससे बुराई दूर होती है और सकारात्मकता बढ़ती है। 


तैयार करते हैं एक हॉन्टेड हाउस 
इस उत्सव को मनाने के लिए किसी खास जगह को चुना जाता है और कद्दू को सुखाकर इसके ढांचे को भूत के सिर का आकार देकर सजाया जाता है।जो कि भूतों का एक प्रतीक माना जाता है। 


 खास तरह के फूड तैयार किए जाते हैं: 
 हैलोवीन के मौके पर लोग सिर्फ सजावट, कपड़ों और एक-दूसरे को डराने तक ही नहीं सीमित है बल्कि इस उत्सव के सेलिब्रेशन में चार चांद लगाने के लिए विशेष फूड भी तैयार किए जाते हैं। खास बात है कि जैसी हैलोवीन की थीम है खाना भी बिल्कुल वैसा होता है। जैसे भूत की शक्ल सी दिखने वाली कद्दू से बनी डिश व कैंडी, जानवरों के आकार वाले केक और पेस्टी।
  

भूत और भी हुए डरावने 
अब ये उत्सव सिर्फ परंपरा का हिस्सा ही नहीं बल्कि आधुनिकता का एक उदाहरण भी बन गया है। जिसे अब हर प्रजाति के लोग मना रहे हैं। इनमें युवाओं की तादात अधिक है। इस उत्सव को अब पार्टी का रंग दिया जाने लगा है। जिसमें भूतों के रंग रूप को नया रूप दिया जा रहा है। यानी ये अब और भी डरावने नजर आ रहे हैं। तो अगर आप भी अपनी पार्टी को अलग तरह से सेलिब्रेट करना चाहते हैं तो हैलोवीन थीम अपना सकते हैं।  
साभार दैनिक भास्कर

रचनाएं देखें



मोटी खाकी वर्दी में
सीलन लगी दीवारों के बीच
चोरों खूनी ,मक्कारों के बीच
हर 15 मिनट में एक सिगरेट सुलगाता है
लगातार बजती टेलीफोन की घंटी
किसी की शिकायत, कभी अफसर की डांट
गाली गलौज, चिल्लम चिल्ली
लावारिस लाश का पंचनामा





जाड़ों की गुनगुनी दोपहर। सड़क किनारे चाय-बिस्कुट का एक खस्ता-हाल खोखा। मैले-से गेरुए वस्त्र पहने, संन्यासी-सा दिखने वाले एक अधेड़ ने सामने वाली बेंचों में से एक पर बैठते हुए चाय ऑर्डर की। चाय वाले ने केतली से उँड़ेलकर जैसे ही चाय का कुल्हड़ उसके हाथ में थमाया, दूसरी बेंच पर बैठ पहले से ही चाय पी रहे नरोत्तम ने चायवाले से कहा, “यह चाय मेरे खाते में डाल देना सुरेश।” फिर उस व्यक्ति से कहा, “आपसे कुछ पूछने की धृष्टता कर सकता हूँ महाराज?” “मेरे लत्तों पै ना जा भाई,” अधेड़ ने कहा, “मैं कोई संन्यासी ना हूँ।” “जो भी हैं, हम-जैसे सामान्य लोगों से तो अलग ही हैं।” 




शरीर की अस्वस्थता की तुलना उस दरवाजे या खिड़की से की जा सकती है, जिस पर रंग-रोगन और सफाई तो खूब की जाती है पर उसे ज्यादतर बंद या जरा सा खोल कर काम चला लिया जाता है ! अब वह दिखने में तो बेहद साफ-सुथरा और चमकदार लगेगा, पर जब उसे पूरा खोलने की आवश्यकता आन पड़ेगी तो उसके कब्जे (Hinge) उसे हिलने-डुलने नहीं देंगें। वह नखरे करेगा, जाम हो जाएगा। चिंचिंयाने लगेगा ! ठीक यही हालत शरीर की भी होती है, दिखने में नहाया-धोया, साफ-सुथरा, चमकदार, पर दस कदम पर ही हांफने और कराहने लगता है। इसीलिए हल्की-फुल्की सक्रियता की आवश्यकता बनी रहती है। 





ऐसे ही मन-मंथन भी
सकारात्मक हो तो बढ़ती है
नव-सृजन की क्षमता।

वरना ऐसे बवंडर
भयंकर तूफान बनकर अस्त-व्यस्त कर देते ह
घर-आँगन और मन-आँगन भी!





फिर संगीत बजता है।
फिर दौड़।

फिर उम्मीद।
फिर वही कुर्सी।

और हर बार
खेल बदलता है,
खिलाड़ी बदलते हैं—
पर
कुर्सी पर बैठने वाले नहीं।



सादर समर्पित
वंदन

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

4910...छोड़ जगत यह वापस जाते मधुर याद बनकर रह जाते...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अनीता जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मधुर याद बनकर रह जाते

छोड़ जगत यह वापस जाते

मधुर याद बनकर रह जाते!


जग मेले में आकर मिलते

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते,

इक दूजे का स्नेह पात्र बन

बढ़ते, पलते, और पनपते!

*****

दो रचनाएँ करवा चौथ

ये सुहागिन

औरतों का व्रत
निर्जला, पति की उमर की कामना
थाल पूजा की
सजा कर कर रहीं
पार्वती शिव की सघन आराधना,
आज इनके
पुण्य के फल से
हम मृत्यु से भी नहीं हारेंगे।

*****

1538-ओ मेरे छायादार वृक्ष!

तपती दुपहरी के ताप से तुम्हें बचा सकूँ

प्यार से दुलार से तुम्हारा माथा सहला सकूँ

अनगिनत  झंझावातों  से  लड़  सकूँ

सुख दु:ख  को  सम  हो  सह  सकूँ।

*****

फ़िल्म जो भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले कोई यथार्थपरक या स्वाभाविक फ़िल्म नहीं है। यह एक फ़ैंटेसी है। एक ऐसी फ़ैंटेसी जिसकी ख़ासियत यह है कि वह फ़ैंटेसी लगती नहीं है। अपने आप में कई  किस्सों को समेटे हुए एक दिलचस्प किस्सा है यह फ़िल्म। प्रारंभ से अंत तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखने वाली इस फ़िल्म की तुलना एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन से की जा सकती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले सही अनुपात में मिल गए हों जिसके कारण उसका स्वाद ऐसा हो गया हो जो खाने वाले को बार-बार अपनी ओर खींचे। फ़िल्म के केवल दो गीत याद रखने लायक़ हैं - होली गीत तथा जय एवं वीरू की दोस्ती का गीत। सभी कलाकारों ने यादगार अभिनय किया है चाहे वे प्रमुख चरित्र हों या सहायक चरित्र।

*****

हमारे बारे में (About us)

इसकी मुख्य कैटगरी में यात्रा वृत्तांत, जैसे अंडमान, सिक्किम, भूटान इत्यादि जगहों की यात्रा के संस्मरण ! कुछ कम ज्ञात स्थानों का विस्तृत विवरण, जैसे दिल्ली की भूली भटियारी, कोटा का विभीषण मंदिर, जिनके बारे में वहां के रहने वाले भी बहुत कम जानते हैं! पुरानी कथाओं में उपेक्षित चरित्रों का एक अलग सकारात्मक आंकलन जैसे संपाति का सूर्य अभियान या होलिका के मंगेतर इलोजी की कथा! समकालीन विषयों और व्यक्तियों पर चर्चा, जो चर्चित हो रहे हों!

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

4909 ..तेरा ओ चुपके से सपना मा आणा

 सादर अभिवादन


करवा चौथ की शुभकामनाएं

मज़हबों में आग लगाने के बजाय,
अरे! आग उनके चूल्हों में लगाओ,
जिनके चूल्हे बुझे हुए हैं।

रचनाएं देखें




याद दिलानी है
एक कहानी है
आज जो तुमको याद नहीं है
या शायद नहीं भूले
हो तुम कैसे जीते
वोट दिलाएं हमने तुमको
फिर भी हाल बुरा सा
कर दो काम ज़रा सा




अपने अतीत की गलियों 
के राग सुनाया करती है
कभी बालों का चुन्नटों 
तो कभी माथे का शिकन को
अपने पंखों से सहला कर




प्राची ने भी बोल दिया," मुझे पहलवानी करने का कोई शौक नहीं है, देवर जी कुछ करते नहीं, माँ जी बस आर्डर देती रहती हैं, मैं क्या करूँ?" "अरे बाबा तुम नाराज़ मत हो, आज शादी फाइनल करवा दूँगा" इतना कहकर संजय मेहमानों के पास गया और बोला, "हमें दहेज नहीं चाहिए, लड़की पसन्द है। आप लोग शादी की डेट तय कीजिए।" लड़की वाले खुश हो गए। राहुल भौचक्का रह गया क्योंकि उसने अभी तक लड़की भी नहीं देखी थी, बस फोटो देखा था। मम्मी भी कुछ खास खुश नहीं थी। पर फैसला संजय को लेना था क्योंकि पिताजी नहीं थे।




ज़िंदगी भर हममें से कोई हिंदू बना रहा
तो कोई सिक्ख या इसाई तो कोई मुसलमान बना रहा.
विशुद्ध इंसान कब बना, मालूम नहीं
मरा तो कोई श्मशान,तो कोई कब्रिस्तान चला गया
क्यों न मर कर,हम सभी महज़ इंसान बने





यूँ दुनिया मा चमकण छन जुगनुओं का उजाला,
कत्गा रूप धरि छन दुनिया का प्याला!
पर फ्योंली फूल ज्यूँ पींवलि अर निर्मल,
चाँद कु ज्यूँ च्योंणै, तू दिखदी हर पल!
तेरा ओ चुपके से सपना मा आणा,
न ह्वेणु त कनु ह्वेद मिलणा?




हर रात बस्ती में  शुरू होती थी 
लड़ाई और गालियों की बौछारें 

तब तुम रख देती थी मेरे कान पर हाथ 
और बंद करती थी यहां तक 
दरवाजे के भी कान 

सादर समर्पित
वंदन
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