निवेदन।


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मंगलवार, 9 जून 2026

4768... ईश्वर के करघे पर बुना हुआ आदमी

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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"रोटी" के रोटी बनकर उदरस्थ होने तक के सफ़र में कितने पड़ाव आते है न। माटी में मिले बीज के अंकुरण,प्रस्फुटन,निराई,गुड़ाई,कटाई से लेकर 
बाज़ार से चक्की और फिर घर आने तक किन-किन हाथों का स्पर्श मिला यह कितने लोग सोचते होंगे..?
सभी माँ या पत्नी के अपनेपन के स्नेहिल स्पर्श का स्वाद महसूस करते है।
पेट भरने वाले गेहूँ के दानों का कोई धर्म नहीं होता है।
इन दानों को पैदा करने वाले किसान कभी नहीं सोचते कि ये अनाज किस जात के लोगों का पेट भरेगा।
जो भूखे इसे खायेंगे वो किस संप्रदाय के होंगे।
फिर,
विकृत सोच के लोग समाज में क्यों हैं
जो रोटी का धर्म भी बाँटना चाहते है?


इंसान बँटे,भगवान बँटे,
जाति,धर्म के नाम बँटे
सरहद में संस्कृतियों की
हृदय के सम्मान बँटे 
और क्या-क्या बाँटोगे?
बाँट चुके टुकड़ों में मन
रहम करो ऐ इंसानों
न भूखों का कोई धर्म बने
जब हाथ उठे तो पेट भरे
कोई न फिर मज़हब पूछे 
सबमें रोटी और नान बँटे।
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आज की रचनाऍं- 


वैसे भी
वह व्यस्त रहती है
चुनावी मंचों पर,

जहाँ हर हाल में
मुस्कुराना पड़ता है;

वहाँ आँकड़ों की जगह है,
आँसुओं की नहीं,

और रूदन
किसी भी विजय-गीत के साथ
अच्छा नहीं लगता।



माया स्वर्ण-मृगों की टोली, वन-वन मन को दौड़ाती

सत्य हिमालय-सा अडिग खड़ा, हर भ्रम-रेखा मिटवाती

सुख चंपा की गंध सलोनी, दुःख धधकता पलाश बना

दोनों के संग-संग चलकर ही, जीवन पूर्ण प्रकाश घना

कर्मों के कर से बुनती है, हर दिन नई चदरिया काल

एक सिरा उत्सव में भीगा, दूजा भीगा अश्रु-जाल।





लड़खड़ा जाता था कभी-कभी,

पर मैं उसके कंधों पर 

बेफ़िक्र बैठा रहता था,

जानता था कि वह 

गिरने नहीं देगा मुझे । 




बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll

इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l

खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll


पूनम की रात

लेकिन इस लेख में मेरा विषय पूनम के चाँद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि जो मनुष्य कुछ असामान्य मानसिकता वाले हों, उन पर पूरे चाँद का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उनकी असामान्यता बढ़ जाती है। यदि ऐसे व्यक्ति को नींद में चलने की बीमारी है तो पूनम की रात को ऐसा अवश्य होता है अर्थात् वह व्यक्ति नींद में चलता है (या चलती है) तथा ऐसी अवस्था में उसे अपने द्वारा किए गए किसी भी काम का आभास नहीं होता। 




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 8 जून 2026

4767...गाथा कहें माँ भारती की हम सदा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन रचनाएँ-

माँ भारती

गाथा कहें माँ भारती की हम सदा।

हर ओर गौरव गान हो अभिमान से।।

रख स्वावलंबी आज अपना ध्येय भी।

पूरा न हो कोई प्रयोजन दान से।।

*****

चिंगारी प्रेम की

छिपी है हरेक मन में

उसे हवा देकर पल भर को सुलगाती हैं

या कोई मन छिपाये हो भीतर

प्यार की सुवास

वह बिखर जाती है

किसी अनजान पल में

*****

गुजारिश

बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll

*****

पंचम वेद ... (६)_, , ग से BPL कार्ड तक ... !

कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़ नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।

*****

मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!

ज‍िस जीव का नाम लेते ही मेरे शरीर में एक अजीब सा घ‍िनौना अहसास जागने लगे ऐसे में जब चारों ओर इन्हीं कॉकरोची च‍ित्रों से भरा ऐसा नजारा द‍िखे तो सोच‍िए मन क‍ितने भीतर तक घ‍िन से भर गया होगा...जी हां, आज कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर प्रदर्शन था... ''था''  इसल‍िए ल‍िखा, क्योंक‍ि यह प्रयास बुरी तरह फेल हुआ। स्वयं इस पार्टी को जन्म देने वाला द‍िल्ली की गर्मी से घबराकर भाग खड़ा हुआ। 

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 7 जून 2026

4766 ..सीमेंट की दीवारों ने आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।

 सादर अभिवादन 
नौतपा खत्म 


काले मेघा, काले मेघा, 
पानी तो बरसाओ
बिजुरी की तलवार नहीं,
 बूँदों के बान चलाओ
मेघा छाये, बरखा लाये
घिर-घिर आये, घिर के आये




याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं
ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे





धरती के दोनों ध्रुवों पर पर बसने वाले 
छोटे-छोटे मुल्कों को 
झेलनी पड़ रही है सजा 
उस जुर्म की, जो उन्होंने किया ही नहीं 
हर रोज़ मरते हैं हरित वन 
और जन्मते हैं कंक्रीट के जंगल 
हर रोज़ उगलते हैं करोड़ों वाहन, धुआँ 




मात यशोदा के घर आये
वहाँ नंद के लाल कहाये।
मोर पंख से सजता कुंतल
कानों में झूला था कुंडल।
जब जब मुख पर दधि लपटाए
नटखट बन अँखियाँ मटकाए।
खूब चराते हो तुम गैया
किये सर्प पर ता ता थैया।




ए ज़िंदगी,
ज़रा आहिस्ता चल।
क्यों बेतहाशा भागती है,
बदहवास दौड़े जाती है।
ज़रा रुक, दम भर तो ठहर,
ऐसी भी क्या जल्दी है।





पत्थर की छतों पर
अब धूप नहीं उतरती,
सीमेंट की दीवारों ने
आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।
जहाँ कभी
काफल की डालियों पर
बचपन झूलता था,
वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं
और पक्षियों की जगह
नेटवर्क के सिग्नल चहकते हैं।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 6 जून 2026

4765 ..हिंदू-मुस्लिम पुड़िया लेकर, भानुमती ये खोले पिटारा।

सादर अभिवादन 




चुपचाप बैठना पड़ता है
इतना चुप
कि भीतर गिरती
एक स्मृति की आवाज़ भी
अलग से सुनाई देने लगे।





तनाव चाहे जितना गहरा हो,
जीवन का सूरज डूबता नहीं,
एक नई सुबह की आस में
जीवन चलता रहता है।




कबीर की नज़र अचानक फ्लाईओवर की एक दरार पर पड़ी। मलबे और जहरीली मिट्टी के बीच एक नन्हा-सा हरा अंकुर सिर उठाए खड़ा था। कंक्रीट के उस मरुस्थल में वह जीवन की पहली दस्तक था।

“सर! देखिए!” कबीर उत्साह से चिल्लाया।

कमलजीत झुककर उस अंकुर को देखने लगे। उनकी आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। उन्होंने अपने वॉटर-पैक से कुछ बूँदें उसकी जड़ों में टपका दीं।

“इंसान के युद्ध ने शहर मिटा दिया, कबीर,” वे धीमे से बोले, “लेकिन प्रकृति हार मानना नहीं जानती। यदि हम अपनी बंदूकें हमेशा के लिए रख दें, तो यह खोया हुआ शहर फिर साँस लेना सीख सकता है।”





एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।



हिंदू-मुस्लिम  पुड़िया लेकर,
भानुमती  ये खोले पिटारा।
आगे नाथ और पीछे पगहा,
गड़बड़झाला, गड़बड़झाला।

हाय! कितनी बदल गयी यह,
संवादों की अपने दुनिया।
कल से आते- आते ‘आज तक’,
ख़बरनवीस बाजीगर बनिया! 


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 5 जून 2026

4764...प्रेम वह नहीं जो आपको किसी का गुलाम बना दे

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
मैं नीर भरी दुख की बदली
        ------------- महादेवी वर्मा 

इन पंक्तियों में छुपा सार संपूर्ण जीवन दर्शन है।
जीवन से मनुष्य का परिचय शिशु के रुप में होता है, उस शिशु का सर्वप्रथम परिचय माँ की गंध से 
होता है। धीरे-धीरे जीव सासांरिक स्वरुप से गंध और स्पर्श द्वारा,अचेतन से चेतनावस्था में 
प्रवेश करते समय  परिचित होता है।

बतायी गयी,समझायी गयी और स्वयं की तार्किक बुद्धि द्वारा मन का, किसी जीव के 
बाह्य स्वरूप को पहचानना परिचय कहलाता है। किसी व्यक्तित्व के अच्छे-बुरे स्वरूप 
को जानना उस जीव के आंतरिक रुप से परिचित होना कहलाता है।
परिचित वह है जिसके अंतर्मन के भावों को आप पहचानते है।
छोड़िये मेरी दार्शनिक परिभाषा को।
साधारण शब्दों में कहूँ तो
चिर-परिचित व्यक्तित्व 
परिचित कहलाते हैं शायद हैं न...?

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आज की रचनाऍं-

विश्व पर्यावरण दिवस पर एक 
विशेष रचना पढ़िए 


कौन जानता है

कि मौन भी एक भाषा होता है—

जिसकी वर्णमाला में

पत्तों की थरथराहट,

धूप की धीमी चाल

और जल की अनकही स्मृतियाँ लिखी होती हैं।

मैंने देखा है—





नन्हे सुकोमल हाथों ने 
बनाई थी जो पेंटिंग 
बच्चों के अनमोल रत्न खिलौने 
पढ़ने-लिखने के लिये किताबें-क़लम 
माँ के बनाये हुए स्वेटर
पिता ने सजायी थीं जो ईंटें  
सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी
सहेजे गये भोज्य-पदार्थ और दवाई 
आधुनिकता का साज़-ओ-सामान 
संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान 
यादें-रिश्ते-सपने सब धमाके में ख़ाक हुए जलकर



आख़िर
आत्महत्याएँ हुई ही कितनी हैं?
कुछ गिनी-चुनी।

जो कि उम्मीद से कम है
लोकतंत्र के गणित में
ये संख्याएँ हैं बेकार

आख़िर क्या-क्या देखेगी

बेचारी सरकार।

 



बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम



सत्ता के लोभी 
शकुनि सभी 
दुश्मन से हाथ मिलाते हैं,
भारत की मिट्टी में 
जन्मे गद्दार 
हमें धमकाते हैं,
हे कल्कि 
अवतरण लो जल्दी 
इस धरती का उद्धार करो.



बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता






"प्रेम वह नहीं है जो आपको किसी का गुलाम बना दे। प्रेम वह है जो आपको एक बेहतर इंसान बना दे। अगर किसी से जुड़कर आप खुद से और इस दुनिया से नफरत करने लगें, तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो वह है जो आपके भीतर की करुणा को जगा दे।"

और फिर वह रात आई, जब आरव के जीवन का सफर पूरा होने को था। वह अपने बिस्तर पर लेटा था, सांसें उखड़ रही थीं। कमरा अंधेरे में डूबा था। लेकिन तभी आरव को लगा कि उस अंधेरे में एक जानी-पहचानी चमक पैदा हुई है।




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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