पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

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रविवार, 21 जनवरी 2018

919,....."बावला हो गया के....पिच्छे न लग बवाल हो जावेगा"

बवाली बवाल ने ऐसा बलवा मचाया
कि चिट्ठा जगत बावला हो गया है
............................
बिना बवाल के कोई रचना ही नही है
ऐसा नशा बवाल का कि लोग वसंत और
वसंत पंचमी को भुला बैठे.....
हमारे शहर के एक ऑटो के पीछे लिखा देखा
"बावला हो गया के....पिच्छे न लग बवाल हो जावेगा
"
बताइए किया क्या जाए....
बहरहाल पेशे खिदमत है बिना बवाल की रचनाएँ....

जरूरत होती है इंसान को,
सदा ही दूसरे इंसान की।
सोचता हूं क्या होता,
अगर मैं आने ही न देता,
किसी को जीवन में अपने।
पर संभव ही न था ऐसा हो पाना,



फूल खुशबू चमक तितलियां आ गईं
माँ के घर जब सभी बेटियाँ आ गईं

जा के अंदाज़ ताकत का फिर लग गया 
जब बगावत में सब लड़कियां आ गईं

मुझको उस पार जाना कठिन जब लगा 
फिर दुआ माँ ने की कश्तियाँ आ गईं

आवो सखी आई बहार बसंत 
चहूं और नव पल्लव फूले 
कलियां चटकी 
मौसम मे मधुमास सखी री 
तन बसंती मन बसंती 
और बसंती बयार सखी री


वीणावादिनी.... मीना शर्मा
वीणावादिनी ! वरदहस्त तुम
मेरे सिर पर धर देना...
अपनी कृपा के सुमनों से माँ,
आँचल मेरा भर देना !
ठगी...विभारानी श्रीवास्तव
दस मिनट के शोर में मोल तोल(बार्गेनिंग) के बाद 10-10₹ में पटा और श्रीमती की मंडली 10-10 माला खरीद कर गाड़ी में बैठीं
एक ने पूछा क्या करेंगी इतनी मालाएँ
-अरे सौ रुपये की ही तो ली है... किसी को देने लेने में काम आ जायेंगे
-दस रुपये की माला पहनेगा कौन
-कन्याओं को पूजन में देने के काम आ जाएंगी..
-काम वाली को देने से बाहर का तौहफा हो जाएगा



शहर में कोई हिन्दू मरा
मैं इसके खिलाफ हूं
कोई मुस्लिम
दंगों का शिकार हुआ
मैं उसके खिलाफ हूं
किसी सिक्ख के धर्म का अपमान हुआ
मैं उसके भी खिलाफ हूं
किसी ईसाई को अपने ही देश में
विदेशी कह कर मारा जाए
मैं इसके भी खिलाफ हूं
न मोहताज़ हो तुम किसी के,
न मोहताज़ हम हैं किसी के,
पर खाई थी हमने कसमें,
ये जीवन साथ बिताने का। 

सूना हो जाता है आँगन सारा,
जब-जब चली जाती है बिटिया ।  
कोई नहीं रखता ध्यान इतना,
बिना कहे जितना करती हैं बेटियां ।

आज .
अब. .
बस..
दिग्विजय

अजी छोड़ो बिना बात बातें बवाली
ये बवाल अब बड़ा मनचला हो गया है 
...............
नोटः ऊपर व नीचे की पंक्तिया सुधा दी की रचना से ली गई है 

शनिवार, 20 जनवरी 2018

918... क्षणभंगुर


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आपसभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
कुशलता से सब कुशल है
VRS
मेरा है , मेरा है , सब है मेरा
इसको निकालो उसको बसाओ
धरा रहा सब धरा पै बंद हुई पलकें
अनेकानेक कहानियाँ इति हुई
लील जाती रश्मियाँ पत्तों पै बूँदें 
तब भी न  क्षणभंगुर संसार झलके
VRS
माया लोभ मोह छोह लीला
उजड़ा बियावान में जा मिला
दम्भ आवरण सीरत के मूरत
अब खंडहर देख रोना आया
लीपते पोतते घर तो सँवरता
चमकाते रहे क्षणभंगुर सुरत
VRS

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यह नाव जीवन की क्षणभंगुर,
यात्री जाना पर तुझको बहुत दूर,
ठहरेगा तू तट जीवन के थोड़ी देर,
दामन मत छोड़ना कभी धीरज का,
मंजिल अपने नगर की तू पाएगा जरूर।
02.
सोच कर देखिये कि हम कितने क्षणभंगुर
 हैं और हमारे हिस्से में इस ब्रह्मांण्ड का 
कुछ भी नहीं आता। जो कुछ मिला है 
क्या उसे जी लेना उचित नहीं? 
कृतज्ञता हमें भूलनी नहीं चाहिये।









नहीं बाँधूँगी बन्धन क्षणभंगुर
मगर उम्र भर की ख़ातिर,
करते हो अंगीकार अगर मुझको
          तो फिर कहना होगा।
02.
हरी  नाम की जप ले माला -
कटुक वचन मत बोल -
बीत रहा है पल-पल तेरा -
क्षणभंगुर जीवन अनमोल ...!!

फिर मिलेंगे...VRS

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

917..आग लगा दीजिये शराफत को समझ में आ गये हैं बहुत शरीफ हैं बहुत सारे हैं हैं शरीफ लोग

||सादर नमस्कार||

बाज़ार से घर लौटते वक़्त बिना हेलमेट पहने आठ-दस, 
नौंवी-दशमीं कक्षा के स्कूली बच्चों को एक-दूसरे से होड़ करते, 
गति की परवाह किये बिना रफ़्तार से स्कूटी और बाईक चलाते,हुल्लड़ मचाते देखकर मन विचलित हो गया। जाने किस प्रेम से वशीभूत होकर अभिभावक बच्चों को ऐसी दुर्घटना का सामान पकड़ा देते है, फिर अनहोनी होने पर ज़िंदगीभर रोते हैं। प्रशासन और नियति को दोष देने से अच्छा है क्यूँ न पहले सी सतर्क हो जायें।देशभर में प्रतिदिन होनेवाली सड़क दुर्घटनाओं में नाबालिग चालकों का योगदान भी करीब 4% है। सभी अभिभावकों से विनम्र अनुरोध है कृपया ऐसी जरुरी बातों पर जागरुक रहें।

चलिए अब आज की रचनाओं का आस्वादन करते हैं

 आस्था के परदे में छुपे मलिन सत्य को उकेरती मर्मस्पर्शी रचना आदरणीय ज्योति खरे जी की लेखनी से
गंगा
पापियों के पाप नहीं
पापियों को बहा ले जाओ
एकाध बार अपने में ही डूबकर
स्वयं पवित्र हो जाओ---


●●●●●●●●●

कुछ खूबसूरत याद हृदय के कभी नहीं मिटते एक बेहद सुंदर उद्गार आदरणीया अनुपमा त्रिपाठी जी की कलम से

खिलखिलाती है ज़िन्दगी 
गुनकर जो रंग ,
बुनकर सा हृदय आज भी 


बुन लेता है

अभिरामिक शब्दों को

आमंजु अभिधा में ऐसे ,
जैसे तुम्हारी कविता

●●●●●●●●●

ज़िंदगी के हर रंग को अपने लाजवाब शब्द देकर बेहतरीन ग़ज़ल गढ़ते आदरणीय राजेश कुमार राय सर की कलम से

बरसती है जो रहमत आसमां से उपर वाले की

कहीं पर द़िल पिघलता है कहीं पत्थर पिघलता है



हुई जब शाम शम्मा जल गयी अब देख लो मंज़र

हजारों आशिकों का कारवाँ उस पर मचलता है



●●●●●●●●

सधे लफ़्ज़ों में कुछ अलग अंदाज़े बयां करती ग़ज़ल 
आदरणीय चंद्रभूषण मिश्र गाफ़िल जी की कलम से
है रास्ता बुरा या मैं चला देर से

इशारे के बाबत मुझे अब लगा
किया तो उसे पर किया देर से

वो दिल तक मेरे क्यूँ न पहुँचा अभी
है रस्ता बुरा या चला देर से

●●●●●●●●


एक बेहद सुंदर सारगर्भित कविता पढ़िये 
आदरणीय अशोक व्यास जी की कलम से

आहटों की टोह लेता
राह में
कब से डटा हूँ
रुक गया था
बढ़ते बढ़ते
रुकते रुकते
गंगा हूँ
शिव की जटा हूँ

●●●●●●●●

चलते- चलते मुँह में राम बगल में छुरी की कहावत को सुंदर शब्द में उकेरती आदरणीया कुसुम दी की रचना यशोदा दी की धरोहर से
सवाल बेशुमार लिये बैठें है...
हंसते हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी जवाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 

टूटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठे हैं।

डॉ. सुशील कुमार जी जोशी
ताजी खबरें....


चेहरे कभी 
नहीं बताते 
हैं शराफत 
बहुत ज्यादा 
शरीफ होते हैं 
बहुत से लोग 

दिमाग घूम 
जाता है 
‘उलूक’ का 
कई बार 

उसकी पकाई 
हुई रोटियाँ 
अपने नाम से 
शराफत के 
साथ जब 
उस के सामने 
से ही सेंक 

लेते  हैं लोग । 

आज के लिए बस इतना ही कल मिलिए विभा दी से

और बवाल पर बवाल जारी है
चार पंक्तियाँ मेरी भी गौर फ़रमाइयेगा
खुल के कह दी बात दिल की तो बवाल
लिख दिये जो ख़्वाब दिल के तो बवाल
इधर-उधर से ढ़ूँढते हो रोज़ क़िस्से इश्क़ के
हमने लफ़्ज़ों में बयां की मोहब्बत तो बवाल


आपसभी के सुझावों की अभिलाषा में

श्वेता

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

916...ये कैसी युवा पीढ़ी तैयार हो रही है....

सादर अभिवादन। 
देश में इस समय न्याय-व्यवस्था में वबाल चल रहा है। 
तकलीफ़ दायक ख़ेमेबंदी से आहत है आम नागरिक ।  
 देश में न्याय के लिए अंतिम दरवाज़े पर चल रही उठापटक ने न्याय -व्यवस्था में समाहित पूर्वाग्रहों की ओर हमारा ध्यान खींचा है।  
इस बीच  आपका ध्यान ग्रामीण भारत में शिक्षा के स्तर  की पड़ताल करती एक और ख़बर पर आकृष्ट करना चाहूँगा -

14 से 18 साल के 36% किशोरों को नहीं पता 

भारत की राजधानी का नाम



चलिए अब चलते हैं चिंतन के धरातल पर जहाँ आपकी प्रतीक्षा में हैं 
कुछ पसंदीदा रचनाऐं -
आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना में 
बसंतोत्सव का आनंद लीजिये - 





एक गीत-यह बसंत भी प्रिये! 

तुम्हारे होठों का अनुवाद है...जयकृष्ण राय तुषार 


तुम्हें परखने 
और निरखने में 
सूखी कलमों की स्याही ,
कालिदास ने 
लिखा अनुपमा 
हम तो एक अकिंचन राही ,
तू बच्चों की 
लोरी ,सुखदा 
प्रियतम का आह्लाद है |

ज़िन्दगी की पेचीदगियों को उभारती आदरणीया अलका गुप्ता जी की विविधा पर प्रकाशित एक बेहतरीन ग़ज़ल मुलाहिज़ा कीजिये-


जिंदगी भारी बहुत है...अलका गुप्ता

आइना तो झूठ बोला ही नहीं था !
उस दिखावे में अदाकारी बहुत है!!

शोखियाँ जर-जर हुईं हैं भारती क्यूँ ?
नोचता अब फ़कत फुलवारी बहुत है !!

हम "पाँच लिंकों का आनन्द" परिवार की ओर से "उलूक टाइम्स" को अशेष शुभकामनाऐं प्रेषित करते हैं 1300 वीं पोस्ट के प्रकाशन पर। पढ़िए कुछ अलग ढंग की आम और ख़ास बातें 
आदरणीय डॉ. सुशील सर की इस रचना में -  

तेरह सौ वीं बकवास हमेशा की तरह कुछ नहीं खास 

कुछ नजर आये तो बताइये .... प्रोफ़ेसर डॉ. सुशील कुमार जोशी  



हिन्दी और 
उर्दू से मिलिये 
इस गली की 

इस गली में 


उस गली की 
अंगरेजी 
उस गली में 
रख कर आइये 

समय परिवर्तनशील है। आदरणीय दिगंबर नासवा जी समय के 
साथ अपनी स्मृति को कोमल भावों में सहेजकर प्रस्तुत कर रहे हैं 
अपनी ताज़ा रचना में -


ओर याद है वो “रिस्ट-वाच” 
“बुर्ज खलीफा” की बुलंदी पे तुमने उपहार में दी थी
कलाई में बंधने के बाजजूद
कभी बैटरी नहीं डली थी उसमें मैंने  
वक्त की सूइयां
रोक के रखना चाहता था मैं उन दिनों 

भाषा के प्रति विशेष सतर्कता आदरणीय विश्व मोहन जी 
ख़ासियत है। अपनी विशिष्ट शैली एवं विद्वता के साथ उपस्थित हैं अपनी इस रचना में -
देवालय.... विश्वमोहन


My photo
 “अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम
       उदार चरितानांतु  वसुधैव   कुटुम्बकम.”
इसके मूल में यह सार्वभौमिक मान्यता है किआत्मवतसर्वभुतेषु यः पश्यति सः पण्डितः’. हिंदु दर्शन का आधार है प्रकृति के समस्त परमाणु में परम पिता परमेश्वर का वास होता है. तो फिर, उसके आवास यानि देवालयों में भी प्रत्येक परमाणु समान हैं. वहां कोई भेदभाव क्यों? चर-अचर, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव सभी वस्तुएं उसकी नैसर्गिक आभा के विस्तार हैं. तो फिर शिव निवास में शरणागत को किसी धर्म या सम्प्रदाय की संज्ञा के उच्छृंखल बंधन में क्यों बांधे! 

आइये अब करते हैं चर्चा अपने नए कार्यक्रम "हम-क़दम" की - 
एक क़दम आप.....एक क़दम हम
हम-क़दम का दूसरा कदम 
इस सप्ताह का बिषय है
"बवाल "
वबाल शब्द पर 
प्रख्यात शायर मिर्ज़ा ग़ालिब 
का एक शेर आपकी नज़र-
फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ

इस बिषय को अपनी टिप्पणियों (16 जनवरी अंक  914)  से रोचक बना दिया है इस मंच की वरिष्ठ चर्चाकार आदरणीया विभा दीदी ने -
विभारानी श्रीवास्तव
16 जनवरी 2018




  • vabaal
    वबाल
    وبال
    calamity, ruin
    बोझ, मुसीबत
    बवाल meaning in hindi
    [सं-पु.] - 1. तमाशा खड़ा करना 2. बखेड़ा; फ़साद।

    तुम्हरा रेत पर भी नाम अब लिखूँ कैसे
    मैं जानता हूँ समंदर बवाल करता है

    - अस्तित्व अंकुर
    हद की सीमांत ना करो सवाल उठ जाएगा
    गिले शिकवे लाँछनों के अट्टाल उठ जाएगा
    लहरों से औकात तौलती स्त्री सम्भाल पर को

    मौकापरस्त शिकारियों में बवाल उठ जाएगा

    इस बिषय पर आप अपनी रचनाऐं शनिवार 
    (20  जनवरी 2018 ) शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। 
    चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी 
    सोमवारीय अंक (22 जनवरी 2018 ) में प्रकाशित होंगीं। 
    इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछला गुरुवारीय अंक 
    (11 जनवरी 2018 ) देखें या नीचे दिए लिंक को क्लिक करें- 

    909...एक क़दम आप.....एक क़दम हम बन जाएँ हम-क़दम
    चलते-चलते - 
    कल अपनी प्रस्तुति के साथ आ रही हैं 
    आदरणीया श्वेता सिन्हा जी।
    रवीन्द्र सिंह यादव

    बुधवार, 17 जनवरी 2018

    915..अभी शेष है समानता का संघर्ष ...



    🙏
    अभी शेष है समानता का संघर्ष 
    नहीं थम रहा बच्चियों के साथ हैवानियत(हरियाणा में घटित घटना)
    आखिर ये किस मिट्टी के बने इतनी क्रूरता धृणित कुकृत्य कर आराम से चल पड़ते.. उफ..
    क्या संयम, संवेदना, मानवीय भावनाएँ जैसे शब्द विलुप्त होते जा रहे है?
    चलो..एक और कानून भी बना ले पर वो संवेदनशील सोच कहाँ से लाए..
    बताओं कितने सालों में 
    हमारा अब हाल बदलेगा..
    जरा आप बताएंगे..✍


    चलिए अब रौशनी डालते हैं आज की लिंकों पर...
    रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें
    आदरणीय राजेश कुमार राय जी, 
    आदरणीय देवेन्द्र पाण्डेय जी,
    आदरणीय रवीन्द्र कुमार यादव जी,
    आदरणीय अरुण साथी जी
    एवम्
    आदरणीया नीतू ठाकुर जी



                        (1)
    इंसान हूँ मगर मैं मुकम्मल न हो सका
    शायद मेरे रक़ीब की कुछ बद्दुआ भी है।

                        (2)
    दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो
    शाम जब ढली तो मैकद़े पहुँच गया।

                        (3)
    तेरा एहसान मुझ पर है इसे मैं भी समझता हूँ


    एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक 


    चलते-चलते 
    आज यकायक 
    दिल में 
    धक्क-सा हुआ 
    शायद आज फिर 
    बज़्म में आपकी 
    बयां मेरा अफ़साना हुआ


    चार माननीयों ने जब लोकतंत्र के लिए खतरे की बात कही तो स्वघोषित कट्टरपंथी और देशद्रोही साबित करो गैंग सक्रिय हो गई है। सोशल मीडिया पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। वह भी तब जबकि सुब्रमण्यम स्वामी जैसे स्पष्टवादी व्यक्ति ने भी कह दिया है कि 

    मंगलवार, 16 जनवरी 2018

    914....हम तुझे याद करके पछताए

    एक क़दम आप.....एक क़दम हम
    हम-क़दम का दूसरा कदम 
    इस सप्ताह का बिषय है
    "बवाल"
    उदाहरणः
    समंदर सारे 
    शराब के होते तो 
    सोचो कितना 
    बवाल होता,. 
    हक़ीक़त सारे 
    ख़्वाब होते तो 
    सोचो कितना 

    बवाल होता.. 
    आप अपनी रचनाऐं शनिवार (20  जनवरी 2018 ) 
    शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक (22 जनवरी 2018 ) में प्रकाशित होंगीं। 
    इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछले गुरुवारीय अंक 
    (11 जनवरी 2018 ) को देखें या नीचे दिए लिंक को क्लिक करें 

    909...एक क़दम आप.....एक क़दम हम बन जाएँ हम-क़दम

    ..............................................
    .......................................
    ...............................


    सादर अभिवादन
    आज हिमांचल के उस हिस्से में बिजली गुल है
    जिस हिस्से में भाई कुलदीप जी रहते हैं
    सो ये जिम्मेदारी मुझ पर
    कल का बेहतरीन अंक...
    याद रहेगा रचनाकारों को...
    तीन दिमाग लगे थे उसे बनाने में
    चलिए आज की पसंद पर एक नज़र....

    खिलते  फूल  महकती कलियां, न भायें
    पुरवा   बैरन  आग  लगाये ,सावन   में

    इतना  हरजाई  निकलेगा,  सनम मेरा
    इश्क  किया  करके  पछताये, सावन में

    झुरमुटों की ओट से झाँकता
    चिड़ियों के परों पर फुदकता
    सरित धाराओं के संग बहकर
    लिपट लहरों से मुस्काता सूरज

    तपती रेत के टीलों से उठती आग
    समुन्दर का गहरा नीला पानी
    सांप सी बलखाती “शेख जायद रोड़”
    कंक्रीट का इठलाता जंगल

    ये उदासी ये फैलते साए 
    हम तुझे याद करके पछताए 

    मिल गया सुकूँ निगाहों को 
    की तमन्ना तो अश्क भर आये 

    हम जो पहुंचे तो रहगुज़र ही न थी 
    तुम जो आये तो मंज़िलें लाये 

    देखा सिकुड़ते तन को
    ठिठुरते जीवन को
    मन में ख्याल आया...
    थोड़ा ठिठुरने का ,
    थोड़ा सिकुड़ने का,
    शॉल हटा लिया....

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    जब से गए तुम रहबर,
    न ली सुधि मेरी,
    न भेजी तूने कोई भी खबर,
    हुए तुम क्यूँ बेखबर?

    तन्हा सजी ये महफिल,
    विरान हुई राहें,
    सजल ये नैन हुए,
    तुम नैन क्यूँ फेर गए?

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    लो संभालो नेह के बंधन रसीले
    हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से
    ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम
    थक गया हूँ मैं बहुत अब थम लो तुम.

    आज..
    अब...
    बस....
    दिग्विजय







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