निवेदन।


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गुरुवार, 25 जून 2026

4784 मुझे थोड़ा पढ़ो, ज़्यादा समझो,

 सादर अभिवादन 

मुझे थोड़ा पढ़ो,
ज़्यादा समझो,
मुझे अनपढ़ों की तरह पढ़ो,
पढ़े-लिखों की तरह समझो। 
-ओंकार केडिया






सच्ची बात बताता हूँ 
आज तुम्हें समझाता हूँ 
हर पल खुशियों को चाहो 
गम को पास न आने दो 
जीत हमेशा पाओगे 
भय को जीत जो जाओगे 
गर्व सदा खुद पर रखना 
हर मुश्किल से डटकर लड़ना 


क्या तुमने सुना


पत्तों की सरसराहट
हवाओं का अस्फुट स्वर
बूँदों का छनकना
जल का कल-कल बहना
बैलों के गले में घंटी का
रह-रह कर हिलना,
कोयल की कुहू-कुहू
चप्पू का चलना
सायरन का बजना
टाइपराइटर का टकटकाना
कीबोर्ड का सरपट दौड़ना







कालिदास के 
मेघदूत की 
आँखों में भी पानी कम है,
कड़ी धूप में 
उजले बादल 
देख देख जंगल बेदम है,
टूटी रीलों वाले 
कैसेट में 
गाता जगजीत कहाँ है?




शायद उस पार
जहाँ सांसारिक बन्धन रहित नाव तो है 
मगर खिवैया अब भी अदृश्य है,
वहीं कहीं अनंत में कोई शांतिपूर्ण तट भी होगा
जहाँ पहुँच कर सभी प्रश्न स्वतः मौन हो जाएँगे 





योग ने जब मन के भीतर दीप जलाया,
पिता का चेहरा उसी उजाले में नजर आया।

पिता ने उंगली थाम कर चलना सिखाया है,
योग ने गिरकर भी संभलना सिखाया है।

योग तन को साधता है, पिता मन को गढ़ते हैं,
वही दोनों मिलकर जीवन को वहीं ऊँचाई देते हैं।




सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 24 जून 2026

4783..चुना हुआ मौन


।।प्रातःवंदन।।

"जीवन की सुन्दर बगिया में आशा

की कलियाँ महकाती

रैन अँधेरे भागे भागे

सोनेवाले जागे जागे

उषा आई, उषा आई "

ज़िया फतेहाबादी 

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए ✍️

एक ही मौसम हरदम नहीं रहता

 एक ही मौसम हरदम नहीं रहता


हमदम हमेशा हमदम नहीं रहता।

✨️

अफ़सोस, राम लल्ला के नाम पर सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है

 अफ़सोस, सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है। राम लल्ला के नाम पर एक स्कैम हो रहा है। और यहाँ बताया गया है कि यह सिर्फ़ क्रिमिनल गड़बड़ी से कहीं ज़्यादा क्यों है।

ताज़ा खबर यह है कि SIT राम मंदिर डोनेशन चोरी की जांच में चंपत राय के सा..

✨️

चुना हुआ मौन



आदमी

देख नहीं सकता,

यदि आँखें न हों।


सुन नहीं सकता,

यदि कान न हों।

बोल नहीं सकता,

✨️

ऐसे पढ़ो मुझे

मैं गीता हूँ,

बाइबल हूँ,

क़ुरान हूँ। ..

✨️

अभिलाषा:

ए ज़िंदगी,

ज़रा आहिस्ता चल।

क्यों बेतहाशा भागती है,

बदहवास दौड़े जाती है।..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 23 जून 2026

4782...एक मौन शिल्पकार है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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बारिश का इंतजार करती चिड़िया

​तपती दोपहर, सूखा शजर,
आसमान पर टिकी नजर।
पंख समेटे, आस लगाए,
ताक रही है सूनी डगर।

​सूख गई हैं नदियां-नहरें,
धूल भरी हैं ठंडी लहरें।
प्यासी चोंच, उदास है मन,
बीत रहे हैं मुश्किल पहरें।

​कब गूंजेगी मेघों की मल्हार,
कब थमेगा यह अंगार?
प्यासे कंठ से पुकारती वो—
"बरसाओ न मेघ थोड़ी-सी फुहार।"
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आज की रचनाऍं- 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 
लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 
आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 
सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.



वह तूफ़ान नहीं
जो पेड़ को गिरा दे।
वह तो जड़ के पास बैठा हुआ
एक मौन शिल्पकार है,
जो हर चोट के साथ
मनुष्य के भीतर से
अनावश्यक पत्थर हटाता रहता है।
कई बार परिणामों की धूप
हमारे हिस्से नहीं आती,
कई बार
मेहनत का पूरा आकाश
बादलों में घिर जाता है।



समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।





बेवजह का यात्री
वर्तमान की  सच्चाईयाँ - वह 
फिर भी तो नहीं है  मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं ,  मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की  जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल 
खुदा से मिलने का अशराना  लिये  हुए  पथ पर बढ़ते जाना ।



कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 22 जून 2026

4781 ...कबूतरोंं ने सत्ता संभाली वे भी कांव कांव करने लगे हैं।

 सादर अभिवादन 


कल फादर्स डे था
थोड़ी सी महक बाकी है


पिता कोई नाम नहीं, एक एहसास है,
जो परछाईं बन हर पल मेरे पास है।

बचपन में जब पाँव लड़खड़ाए थे,
वो थाम के उँगली चलाते थे।
मैं हँसूं यही कामना लेकर,
ज़ख़्म अपने मन में छुपाते थे।।

 अब देखिए रचनाएं



प्र कृति अपने-आप में एक अबूझ पहेली है ! इसके खेल बड़े निराले होते हैं, जिसमें आँखों से दिखाई ना देने वाले सूक्षतम जीवाणु से लेकर पर्वताकार प्राणियों तक हजारों-लाखों खिलाड़ी शामिल हैं ! उन्हीं में से एक, छिपकलियों के पूर्वज, लुप्त डायनासोर प्रजाति के अजूबे टायरानोसौरस, जिसे टायरानोसौरस रेक्स या टी-रेक्स भी कहा जाता है, भी शामिल हैं ! फिल्मों से लगाव रखने वाले देसी-विदेशी दर्शकों ने इनका आभासी रूप जुरासिक पार्क जैसी फिल्मों में देखा होगा, जिनमें ये अपने पूरे जलवे के साथ उपस्थित थे !  




गधे को बाप बनाना छोड़ो, 
क्यों गिरगिट सा रंग बदलते हो?
गुरू घंटालों की संगत में, 
क्यों गुलछर्रे उड़ा फिसलते हो?




वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है.

है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.




बहता है जो मन साफ है मान प्रतिष्ठा साख है
संयमित प्रवाह से संचालित अप्रयोज्य साफ है
अपनी लय में चलता, बढ़ता है अघोषित उम्मीद
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत




कबूतरोंं ने सत्ता संभाली
और अब 
वे भी बहुत अच्छा 
कांव कांव करने लगे हैं।
***
सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 21 जून 2026

4780...समय मनुष्य को खर्च करता रहता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन। 

आज पितृ-दिवस(Father's Day) पर अपने पिताश्री का स्मरण करते हुए भूमिका में अपनी एक रचना  'पिता की स्मृति' प्रस्तुत कर रहा हूँ-

6 फरवरी 2008 से 

अब तक 

एक अधूरापन 

मेरे भीतर 

घर कर गया है 

करते होंगे लोग 

बरसी पर स्मरण पिता को

मेरी स्मृति से 

वह पल जाता ही नहीं 

जब मुखाग्नि दी थी 

बड़े भैया ने चिता को

एक काया 

अपना सफ़र 

मुकम्मल कर रही थी   

देखते-देखते 

पिता जी की पार्थिव-देह 

पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी

उन्हें लेकर गए थे 

सजी हुई उदास अर्थी पर  

श्मशान-घाट

लौट आए थे 

उनकी स्मृतियों के साथ

बेबस बस ख़ाली हाथ

संस्कारों की फ़सल 

मूल्यों की अक्षय पूँजी

कुल के दायित्त्व

विश्वास का घनत्त्व  

इच्छाओं की गठरी 

बोध-कथाओं की लायब्रेरी

जीने की कलाओं का विस्तार 

देकर छोड़ गए हो संसार!  

आपकी स्मृति 

सघन परछाइयों में 

शून्य लिख जाती है

जिसके अर्थ तलाशता हुआ 

अपने पिता होने के 

अर्थ तलाशता हूँ

तस्वीर हो जाने के ख़याल में  

ख़ुद को खँगालता हूँ

नब्बे वर्ष की आयु 

निरोग जीवन जीकर

आपका महाप्रस्थान 

आपका साथी बूढ़ा नीम 

है अब मेरा मित्र महान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवारीय अंक में पढ़िए चुनिंदा रचनाएँ (पीछे मुड़कर देखी एक झलक)-

अश्रुधारा मुक्तक 

धारा   में   पिता  भी  बहे,
तो     बहते      ही     गये ,
बहते        ही           गये।
भ्राता भी बिन बहे न रहा ,

भगिनी     भी     बही,
वह        ऐसी      बही।
वह  तो  फूट  ही  पड़ी ,
बहना हम को क्यों तुम छोड़ चलीं।

*****

अनुत्तरित प्रश्न 

सुबह से शाम तक

समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,

और मनुष्य..,

जेब में पड़े  सिक्कों की तरह

धीरे-धीरे खर्च होता जाता है

निरन्तर अपनी जिजीविषा को

क्षीण होते देखता रहता है

छोटी-छोटी ज़रूरतों में

उसके दिन बँट कर रह जाते हैं

*****

बेटियाँ 

पाल-पोस कर बड़ा करना,
और दूसरे घर भेज देना ।
अपने कलेजे का टुकड़ा ,
किसी और को सौंप देना ।

अच्छे संस्कार अपनी बिटिया को देना ।
उसे इसी पूँजी से घर बसाते देखना ।
या एकाकी दीपशिखा-सी स्वावलंबी बनते देखना ।
पिता के आशीर्वाद का सम्मान है ना ?
पिता की नम आँखों का स्वाभिमान है ना ?

*****

वृद्धाश्रम-मुक्त समाज और सामंजस्य की आवश्यकता 

आज वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को स्वास्थ्य और रहन-सहन की सभी भौतिक सुविधाएँ मिल रही हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता बनी हुई है। जो संतान आज अपने माता-पिता को संस्थाओं के हवाले कर रही है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि 'समय का चक्र घूमकर वापस आता है।' भविष्य में उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार होने की प्रबल संभावना है, जैसा वे आज अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं।

*****

सपनों का संसार 

बोध हो गया है

पर चलती रहती है साधना

संतोष नहीं होता

साधकों को

खोज ईश्वर की चलती रहती है

जहाँ नदी पार करके नाव छोड़ दी जाती है

उसी परिपक्व बुद्धि को सिद्धि दी जाती है!

*****

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान ।

शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।

 है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली ।

सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली ।

कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे ।

भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 20 जून 2026

4779 ..पितृ दिवस की पूर्व संध्या पर

सादर अभिवादन 

कल फादर्स डे है
देवी यशोदा की एक रचना


कल किसने देखा..
और देखेगा भी कौन..
कि पिता किस हाल में हैं...
खाना गरम मिला या नहीं
... दवा समय पर मिली या नहीं
रात बिछौना का चादर बदला था या नहीं
ये तो अच्छा है कि मेरे पिता की अब स्मृति शेष है..
मैं अपने भाई-भाभियों को जानती-पहचानती हूँ
वे होते तो क्या हाल होता उनका
मेरा प्रणाम उनको......
अब सुखी तो हैं वो

 अब देखिए रचनाएं



जिसने जाना, जो भी जाना 
वह कहा नहीं जा सकता 
जो कहा गया है 
वह मार्ग की खबर देता है 
मंज़िल की नहीं 
वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है 





एक बार चोर तिजोरी लाल अपने प्रतिष्ठित रात्रिकालीन कार्य पर निकला। उसका निशाना था—सेठ सुखविंदर का घर। पूरी पड़ताल के बाद उसे यह विश्वास हो चुका था कि सेठ अपने परिवार सहित कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ है।

तिजोरी लाल ने पूरे इत्मीनान से अपना काम अंजाम दिया। ताले खुले, अलमारियाँ टटोली गईं, तिजोरियाँ हल्की हुईं। इस श्रमसाध्य प्रक्रिया में उसे लगभग तीन घंटे लगे। संतुष्ट मन से वह अपनी बरसों की साधना का फल समेटे घर लौटा।





“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.

“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”

“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”





वृक्ष यह सब देखता था,
लेकिन भीतर कहीं
उसे स्वीकार करना आसान नहीं था।
कभी-कभी
उसकी शरण में आए पक्षी
खुद ही उड़ जाते,
और हिरनियाँ
धूप में ठिठककर रह जाती
जैसे रेत से बातें कर रही हों।


सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 19 जून 2026

4778...हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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आज सड़क पर कोई दुर्घटना हो जाए, तो कई बार लोग पीड़ित की मदद करने के बजाय अपने फोन से वीडियो बनाने या तस्वीरें खींचने में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि स्क्रीन के पीछे छिपे इंसान के लिए दूसरों का दर्द महज एक 'कंटेंट' बनकर रह गया है। सोशल मीडिया पर हम हजारों लोगों से जुड़े हैं, किसी की दुखद खबर पर 'Sad' का इमोजी भी छोड़ देते हैं, लेकिन असल जिंदगी में पड़ोस के घर में क्या चल रहा है, उससे हम बेखबर हैं। आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ ने इंसान को इतना थका और डरा दिया है कि वह सिर्फ अपने और अपने परिवार के दायरे तक सिमट गया है। "मुझे क्या लेना-देना" वाली सोच हावी होने लगी है।
प्रश्न मन कचोटने लगा है कि
क्या हम सचमुच संवेदनहीनता की खतरनाक
ढलान पर है?
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आज की रचनाऍं-


और हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं।
लेकिन सच तो यही है कि
सांप-सीढ़ी के खेल में जीत
अधिकतर अंक और अवसर का परिणाम होती है।
वहां न बुद्धि की विशेष भूमिका होती है,
न कौशल की, न रणनीति की,
जितना अंक आया,
उतना ही चलना होता है।

 
बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,
चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,
तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।
कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।
पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम



चलो अच्छा हुआ तुम लोग आए साथ मिलकर 
ज़मीनों आसमां सागर सभी को शाद़ कर दो 

अगर अपना पड़ोसी है मुसीबत में कहीं भी 
जरूरत में जरुरत भर उसे इमदाद कर दो 





निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”




वह टिनी को परीमहल के पीछे बने एक सुंदर बगीचे में ले गई। वहाँ चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। सूरज की सुनहरी किरणें पत्तों के बीच से छनकर धरती पर बिखर रही थीं। तितली ने टिनी को वह फूल दिखाया जिस पर वह सोती थी, वह फूल भी दिखाया जिसका पराग वह खाती थी और वह भी, जिस पर बैठकर वह हवा का आनंद लेती थी।



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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