निवेदन।


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शुक्रवार, 31 मई 2019

1414..हक़ीकत और ख़्वाब बुने जाते हैं...

स्नेहिल अभिवादन
-----------
 जनादेश के आधार पर आज से नवगठित 
पंचवर्षीय लोकतांत्रिक सरकार ने जनता के 
सपनों मेंरंग भरने के लिए कूची थाम ली है।
कुछ असंतोष,कुछ विरोध,हर छोटी से छोटी 
बातों की विस्तृत विवेचना के साथ, रंग बिरंगे 
मुखौटों में छुपे रोचक किरदारों के साथ जीवन 
की आवश्यकताओं को पाने  की जुगत के लिए
समय के साथ कर्म का सफ़र 
अनवरत जारी रहेगा।
हम भी नकारात्मक क्यों सोचे
क्यों न उम्मीद के बीज रोपे
माना की जंगल नहीं उगा सकते
पर कुछ वृक्ष तो छायादार होगें।
★★★
अब देर न करते हुये
चलिए आज की रचनाएँ
पढ़ते हैं-

इन्द्रधनुष

खेलने वाला सारा बचपन
कचकड़े की गुड़िया से
मचलता है अक़्सर
चाभी वाले या फिर
बैटरी वाले खिलौने की
कई अधूरी चाह लिए और ...
ना जाने कब लहसुन-अदरख़ की
गंध से गंधाती हथेलियों वाली
मटमैली साड़ी में लिपटी
गुड़िया से खेलने लगता है
★★★★★

ख़्यालों सफ़र में
हक़ीकत और ख़्वाब बुने जाते हैं
दिल चाहता कुछ और है
पर होता कुछ और है
★★★★★

तुम नहीं हो जो पास -
 तो सही याद  तुम्हारी ,
रहूं  मगन मन  बीच -
 चढी ये अजब खुमारी ;
बना प्यार मेरा अभिमान 
 गर्व  में रही फूल सी !!
मन कंटक वन में-
 याद  तुम्हारी  -

ना तेरे पौधों की कच्ची कली,
ना तेरी लगाई बेल रे !
ना तेरे मंदिर की ज्योति,
ना कोई तुझसे मेल रे !
मैं तो तेरे आँगन की तुलसां,
फूलूँ कातिक मास रे !
मैं तो तेरे फूलों की खुशबू,
कोमल सा आभास रे !!!

★★★★★
ये
गिरि
कानन
जलस्रोत
दुर्लभ भेंट
ईश-प्रकृति की
चैतन्य जगत को
★★★★★★
पत्रकारिता दिवस पर
यदि हमने निष्ठा, समर्थन और ईमानदारी से अपना काम किया है, तो लक्ष्मी की प्राप्ति हो न हो, पर इतना तो तय है कि समाज में सम्मान और पहचान मिलेगा। इसके लिये हमें  उतावलापन दिखलाने से बचना चाहिए, आज पत्रकारिता दिवस ने मुझे इस बात का पुनः एहसास कराया। जैसा कि मैंने कल ही बताया था कि वर्षों बाद मैं पत्रकारिता दिवस के मौके पर मौजूद रहूंगा। सो, अन्य सारे इधर-उधर के कार्यक्रम छोड़ जिला पंचायत सभाकक्ष में जा पहुंचा। हां, थोड़े देर के लिये इसी बीच पुलिस लाइन मनोरंजन कक्ष में एएसपी नक्सल के प्रेसवार्ता में जाना पड़ा था। दो मामलों का खुलासा पुलिस को जो करना था। अतः अखबार का काम सबसे पहले जरूरी है। बहरहाल, विंध्याचल प्रेस क्लब के इस कार्यक्रम में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, पूर्व विधान परिषद सदस्य आदि तमाम भद्रजन मौजूद रहें। 
★★★★★
आज का यह आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।


हमक़दम के विषय के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रहीं हैं विभा दी
अपनी विशेष
प्रस्तुति के साथ।


गुरुवार, 30 मई 2019

1413...फ़ज़ाएँ ख़ुशनुमा हैं चमन महका हुआ है...

सादर अभिवादन। 

फ़ज़ाएँ ख़ुशनुमा हैं 
चमन महका हुआ है,
वो कौन है रोको उसे 
क्यों  बहका हुआ है।
-रवीन्द्र 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-   



रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली।  
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली।।   
तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान।  
निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान।।




अम्बर से रस धार बह रही
भीगी वसुधा वार सह रही
श्रम का स्वेद बहाकर हमको
नव अंकुर हर बार खिलाना होगा !




मैं लिखना चाहती हूँ
कुछ पंक्तियाँ
खोए हुए वजूद वाली 
औरतों के लिए
पर सच तो ये है
कि
वजूद मिल भी जाए तो क्या?
उन्हें ओढ़ने के लिए
औरतें कहाँ मिलेंगी...? 



तब पढने के लिए
ये मोटा चश्मा ही होगा
अपना सहारा
आने वाले दिनों में
देखता हूँ यह स्वप्न
मैं कभी - कभी 
क्‍या आपको भी
ऐसा ही
ख्‍याल आता है कभी !!




समीक्षात्मक रूप से किसी के जीवन को आँकना किसी के लिए भी सहज नहीं होता. खुद हमारे शब्दों में यह न तो उस पुस्तक की समीक्षा है और न ही ललित की जीवन यात्रा का विश्लेषण, न उनके साथ-साथ दोस्ताना निभाते दर्द का चित्रण है. यह ललित के दर्द को समझने का प्रयास मात्र है, समाज की उस मानसिकता के साथ गुजरने का एहसास है, शरीर का अंग न होकर भी शरीर जैसी बनी उन बैसाखियों के साथ उड़ान भरने की प्रक्रिया मात्र है. उनके समर्पण कि यह पुस्तक उन्हें समर्पित है जो अलग हैं या भीड़ से अलग होना चाहते हैं, के साथ हम यह भी जोड़ना चाहते हैं कि यह पुस्तक उन सबके लिए भी एक विटामिन बने जो महज भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं. यह पुस्तक उनके लिए भी असाधारण महत्त्व रखे जो समाज की बंधी-बंधाई सोच के साथ चलते रहते हैं. आखिर हम सभी को याद रखना चाहिए कि विटामिन ज़िन्दगी उसी के हिस्से आया है जिसने ज़िन्दगी को जिया है, बिताया नहीं है. विटामिन ज़िन्दगी से ऊर्जा पाते ललित का जीवन सम्पूर्ण समाज को जीवन जीने की कला सिखाये, यही कामना है.
..............
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
........
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 29 मई 2019

1412.. जितना सुलझाना चाहो उतना ही उलझती जाती है..


।।भोर वंदन।।



प्रकृति की क्रीड़ा के सब छंद;
सृष्टि में सब कुछ है अभिराम,
सभी में हैं उन्नति या ह्रास।



बना लो अपना हृदय प्रशान्त,

तनिक तब देखो वह सौन्दर्य;

चन्द्रिका से उज्जवल आलोक,
मल्लिका-सा मोहन मृदुहास।
जयशंकर प्रसाद 
उपर्युक्त शस्यश्यामला प्रभाती के साथ नजर डालें लिंकों पर..✍

🌾🌾🌾




ज़िन्दगी से

उठापटक जारी है
साँस लेना भी
जैसे भारी है
संशयों के झुरमुट में
लम्हें बीत रहे हैं
हम बूँद-बूँद
पात्र से रीत रहे हैं

🌾🌾🌾




चुरा लाई हूँ तुम्हें

तुम्हारे दरख़्त से
रख दिया है सहेज के 
अपनी नज़्मों के पास
बहुत ख़्वाहिश थी 
बिताऊँ चन्द ल

🌾🌾🌾


कभी अपनी फिक्र नहीं होती उन्हें

दूसरों की चिंता में
अपने सुनहरे जीवन की
कुर्बानी देने से भी
कभी घबराते नहीं वे.
परायों को भी अपना
बना लेने का गुर
कोई इनसे सीखे..

🌾🌾🌾



पिछले दिनों उड़ीसा में तूफ़ान आने के बाद हिंदी की ख़बरों में भी 'मिलियन' शब्द कई बार दिखा। आजकल सोशल मीडिया में फ़ालोअर, व्यू इत्यादि की गणना भी मिलियन में ही होती हैं। ये एक छोटा उदहारण है कि पिछले कुछ सालों में भाषा कैसे बदली है।[वैसे ये भी हो सकता है कि हिंदी मीडिया वालों को मिलियन से लाख में बदलना ही नहीं आया हो और कौन रिक्स ले सोच कर वैसे ही टीप दिया हो अंग्रेजी 



एक पहेली के जैसी लगती है
 ज़िंदगी भी कभी-कभी
जितना सुलझाना चाहो
उतना ही उलझती जाती है
कभी मखमली अहसास देती
उड़ने लगती है आसमान में
खूबसूरत रंग भरने लगती 

🌾🌾🌾

हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए


🌾🌾🌾

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

मंगलवार, 28 मई 2019

1411...लेखक पाठक गिनता है पाठक लेखक की गिनती को गिनता है

सादर अभिवादन
कल हंसे कि सरकार आ गई
दूसरे दिन रोए फूट-फूट कर
हमारा भविष्य चला गया
एक दुःखद हादसा..
या सुनियोजित लापरवाही
आना-जाना तो लगा रहता है
पर इस तरह जाना...समझ से परे है
अश्रुपूरित श्रद्धा सुमन नौनिहालों को
पहली रचना पढ़िए....
वे   वापस  ना आयेंगे 
घर आँगन  में  नौनिहाल
अब ना खिलखिलाएंगे !

गर्म हवा से भी  न कभी 
छूने  दिया था जिन्हें 
सोच ना था  अव्यवस्था के
अग्नि   कुंड  उन्हें  भस्म  कर  जायेंगे !

बिना छुये सपनों को मेरे
जीवित तुम कर जाते हो
निर्धूम सुलगते मन पर
चंदन का लेप लगाते हो
शून्य मन मंदिर में रूनझुन बातें
पाजेब की झंकार
रसीली रसधार-सी मदमाती है।

चिर परिचित से जाने पहचाने चहरे
बेहद प्यारे बेहद अज़ीज़
कोई चन्दा कोई सूरज
तो कोई ध्रुव तारा
जैसे सारा आकाश हमारा
जब दिल भर आता
किसीके भी सामने
दुःख की गगरी खाली कर दी

शर्मा जी अपने काम में मस्त सुबह सुबह मिठाई की दुकान को साफ़ स्वच्छ करके करीने से सजा रहे थे । दुकान में बनते गरमा गरम पोहे जलेबी की खुशबु नथुने में भरकर जिह्वा को ललचा ललचा रही थी। अब खुशबु होती ही है ललचाने के लिए , फिर गरीब हो या अमीर खींचे चले आते है। खाने के शौक़ीन ग्राहकों का हुजूम सुबह सुबह उमड़ने लगता था। खाने के शौक़ीन लोगों के मिजाज भी कुछ अलग ही होते हैं।

साथ है इंसान का गर, हैं समर्पित वंदनायें;
और कलुषित के हनन को, स्वागतम, अभ्यर्थनायें।
लेखनी! संग्राम कर अब, यूँ भला कब तक गलेगी?

हों निरंकुश मूढ़ सारे, जब उनींदी साधना हो;
श्लोक, पन्नों पर नहीं जब, कागज़ों पर वासना हो।
“नाश हो अब सृष्टि का रब”, चीखकर यह कब कहेगी?

तेरी अना से टूट रहा है वह रिश्ता ।
जिसकी ख़ातिर एक ज़माना लगता है ।।

आग से मत खेला करिए चुपके चुपके ।
घर जलने में एक शरारा लगता है ।।

दर्द विसाले यार ने ख़त में है लिक्खा ।
उस पर सुबहो शाम का पहरा लगता है ।।

जितने पल, व्यतीत हुए इस जीवन के, 
उतने ही पल, तुम भी साथ रहे, 
शैशव था छाया, जाने कब ये पतझड़ आया, 
फिर, कैसे याद रहे? 
था श्रृंगार तुम्हारा, या चटकी कलियाँ? 
रंग तुम्हारा, या रंग-रंलियाँ? 
आँचल ही था तेरा, या थी बादल की गलियाँ, 
फिर, कैसे याद रहे? 

सागर की लहरों पर 
सवार होकर तरुवर के 
पर्णों के मध्य से, 
हौले हौले अपनी राह
बनाता चाँद तब , मंथर गति
से, उतर आया था मेरे 
मन के सूने आँगन में, 

तुम्हारी आशिकी शक के दायरे में है …

तुम्हारी आशिकी शक के दायरे में है
नाज़नीन से पिटकर आये नहीं, तो क्या किया?

शादीशुदा के लिए तो तोहफा है बेलन
बीबी से आजतक खाए नहीं, तो क्या किया?

सियासत का दंभ भरते हो, कच्चे हो पर
घोटालों के लिस्ट में आये नहीं, तो क्या किया?

एक खबर उलूकिस्तान से

लिखते लिखते 
कभी अचानक 
महसूस होता है 
लिखा ही नहीं 
जा रहा है 
अब लिखा 
नहीं जा रहा है 
तो किया क्या 
जा रहा है 
अपने ही ऊपर 
अपना ही शक 
गजब की बात 

आज अब बस...
अब बात तिहत्तरवें विषय की
विषय

प्रदूषण
उदाहरण
कोई किसीकी बात नहीं सुनता
अपने ही अंतर के शोर से जैसे
सबके कान सुन्न हो गए हैं !
प्रदूषण की मटियाली आँधी में
न चाँद दिखता है ना सूरज
ना कोई ध्रुव तारा
इसी अंक से
साधना दीदी की रचना

प्रेषण तिथि - 01 जून 2019 (शाम 5 बजे तक)
प्रकाशन तिथि - 03 जून 2019
प्रविष्ठियाँ ब्लॉग सम्पर्क फार्म द्वारा ही

................................
आज के रचनाकार
सखी रेणुबाला,सखी श्वेता सिन्हा, साधना दीदी, 
शशि पुरवार दीदी, भाई अमित निश्छल,
पण्डित नवीन मणि त्रिपाठी,
भाई पुरुषोत्तम सिन्हा, सखी सुधा सिंह, भाई एम.वर्मा
डॉ. सुशील कुमार जोशी...

हम आभारी हैं आपके...
सादर


सोमवार, 27 मई 2019

1410 हम-क़दम का बहत्तरवाँ अंक

हा हा। बेचारा गलीचा। 
सादर अभिवादन...
गलीचा..नाम से सभी वाकिफ हैं
अभी-अभी इस पर रोशनी पड़ी है..
फेसबुक,ट्विटर और इंस्टाग्राम में चर्चे बड़े हैं.

जमीन में बिछा नहीं इक गलीचा कि 
कितनी सुर्खियों में आ गया 
जन्म सफल हुआ चलता हुआ कोई 
उसपर जो गया औ' वही आ गया।
.......
उदाहरणार्थ दी गई रचना

गलीचा
पहली 
बार दिखा है 
मन्दिर के 
दरवाजे तक 
गलीचा 
बिछाया गया है 

कितना कुछ है 
लिखने के लिये 
हर तरफ 
हर किसी के 

अलग बात है 
अब सब कुछ 
साफ साफ 
लिखना मना है


दीदी साधना वैद
मैदान में प्रतियोगिता के लिए
हो चुके हैं सारे प्रबंध और
रास्तों पर बिछा दिए गए हैं
कुशल कारीगरों के हाथों बने हुए
बड़े ही खूबसूरत और कीमती खेस !
लक्ष्य तक पहुँचने के लिए  
सारे प्रत्याशी हैं बेकरार
और अपने अपने गलीचों पर खड़े
बेसब्री से कर रहे हैं
रेस के शुरू होने का इंतज़ार !


मौसी आशा सक्सेना
उसे बनाने में
चुन चुन कर धागे रंगवाए थे
मन पसंद रंगों से सजाए थे |
प्यारा सा नमूना चुना था
इतना विशाल  गलीचा बनाने को
नीले ,हरे रंग के ऊपर उठते चटक रंग
देखते ही मन उसे पाना चाहता 


भाई शशि गुप्ता
 ग़लीचे को उद्बोधन

ए ग़लीचा ! वहम ये रहने दो..

कर के बदरंग तुम अपनों को
ग़ैरों को क्यों रंग दिया करते हो ?

जन्मे कामगारों की बस्ती में
अब महलों में इठलाया करते हो !

उलझी थी दुनिया कच्चे धागे में
बन  काती  अश़्क बहाया करते थें ।



सखी कुसुम कोठारी।
प्रकृती के मोहक रंग...

बिछे गलीचे धानी
मिले न जिसकी सानी।

बांधा घेरा फूलों ने
पीले लाल बहु गुलों ने।


सखी अनुराधा चौहान(दो रचनाएँ)
अरमानों का गलीचा बिछाए
आशा की किरण मन में जलाए
झांकती रहीं बूढ़ी आँखें
अकेली खड़ी खिड़की से
मन में ढेरों सपने सजाए
पैरों की आहट चूड़ी की खनक
शायद खत में आए कोई खबर
मायूस होकर बैठ जाती


भोर का सुखद अहसास लिए
चहक उठा जीवन भी
निकल पड़े सब घर से
जीने अपनी-अपनी ज़िंदगी

बिछाए सुनहरा गलीचा
देते दिनकर जीवन की धूप
शाम को समेटकर उजाला
क्षितिज के छोर पर गए कहीं छुप


सखी अभिलाषा चौहान( दो रचनाएँ)
खुशियों का गलीचा

गलीचा
बिछा है आज।
पड़ने वाले हैं कदम
किसी खास के।
खुल गए हैं द्वार
वर्षों की आस के।
खुशियां छलकती हैं
बजती है शहनाई।
सजे तोरणद्वार
दीपमाला झिलमिलाई।


अनमोल गलीचा

वो गलीचा
जिसे देख
यादों की बारात
चली आई।
छूते ही जिसे
उस मां की याद आई।
जिसने बड़े प्रेम से
बनाया था गलीचा।
जिसके ताने-बाने में
उसका प्रेम बसा था।



सखी अनीता सैनी 
गलीचा अपने पन का

क्यों न हम बिछा  दें 
एक गलीचा अपनेपन का  
प्रखर धूप में 
जलते अशांत चित पर 
स्नेह, करूणा  और बंधुत्व  का 

यादों के रंग में डूबा 
मखमली एहसासों से सजा 
 सजाये  ग़लीचा 
मन  के  द्वार  पर 

भाई पुरुषोत्तम सिन्हा
परत दर परत .....
परत दर परत सिमटती ही चली गई समय, 
गलीचे वक्त की लम्हों के खुलते चले गए, 
कब दिन हुई, कब ढ़ली, कब रात के रार सुने, 
इक जैसा ही तो दिखता है सबकुछ अब भी , 
पर न अब वो दिन रहा, ना ही अब वो रात ढ़ले। 

इस बार इतनी ही रचनाएँ..
अब सारे बधाइयाँ देने में लगे हैं..
नए विषय के साथ हम फिर मिलेंगे कल
यशोदा ...

रविवार, 26 मई 2019

1409....सूरत हादसा .... भावभीनी श्रद्धांजलि...


जय मां हाटेशवरी......
सादर अभिवादन......
भारत  में हर तरफ कमल खिल गया.....
भारतीयों के दिलों में कब कमल खिलेगा?....
सूरत की घटना से मन बहुत आहत है.....


माता-पिता अपने बच्चों के लिये.....
क्या-क्या ख्वाब नहीं देखते.....
अपनी खुशियों का गला घोटकर....
अपने बच्चों की खुशियां  पूरी करते  हैं.....
सूरत की  जैसी घटनाओं में.......
जिनके लाल हमेशा के लिये सो जाते हैं.....
सोचो उन पर क्या गुजरती होगी.....

सूरत हादसा .... भावभीनी श्रद्धांजलि...
व्यवस्था की अनदेखी ने
बनने दिया था उनके लिए
लाक्षागृह जिसमें नहीं था कोई गुप्तद्वार
वे जलते रहे और मुंहचुराती रही व्यवस्था



गाँव पर कविता
वह छोड़ता ही नहीं मुझे,
या शायद मैं ही नहीं छोड़ता उसे.
अकसर ख़यालों में
मैं अपने गाँव पहुँच जाता हूँ,
शहर में बैठकर
मैं गाँव पर कविता लिखता हूँ.

बोनसाई
साथ ही
महंगाई और कमी की कैंचियाँ
कतरती रहती है
जिंदगी की खुशियाँ
बीतते समय व दिनों के साथ
ढूंढे रहे
कुछ कुछ
सब कुछ
आखिर कभी तो जियेंगे
बिना किसी हिदायतों के

अधूरे ख्वाब
यूँ ही रहे गर्दिशों में, बेरहम वक्त के रंजिशो में,
उभरते से रहे, वो ही तस्वीरों में,
एक अक्श है, वही निगाह है...

संसृति की मादकता
कण कण में स्वयं को
खोकर संसृति की मादकता
में झूमती हुई उनके अलौकिक
स्नेह बंधन में बंध घुल गई थी
जो चाँद मुझे भेंट कर गया था.

यह रिश्ता
यह रिश्ता है
आँख झपकते ही जुड़ जाएं
पलकों से आँसूं गिरे !

*
वक्त ...
मोबाइल टेबल पर रखते हुए मैं सोच रही थी -- उम्र भर के नेह और आठ बरस के बिछोह के हिस्से में केवल एक-आध दिन । ----  'आजकल वक्त बहुत कीमती हो गया
है शायद ।'
आज के लिये बस इतना ही.....
धन्यवाद।











शनिवार, 25 मई 2019

1408.. माँ


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

सबने कहा एक दिन कोई विशेष नहीं हो सकता
हर पल पुकारी जा सकती है
माँ
Image
लिखने बेठा तारीफ तो लफ्ज़ ही ना मिल पाये 
लिख सकू क़तरा भी खुद पर मुझे नाज़ हो जाये

ना इबादत से मिली है ना हसरत में खिली है 

जन्नत है कही तो बस माँ के कदमो में मिली है

माँ
By @_the._.shooter 
Mother's day post ❤
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मेरी सांस-सांस की हर महक
उसकी आत्मा से उठती है
वह देहरी पर सजी रंगोली सा
इन्द्रधनुषी प्यार है

माँ
Related image
मैं बाँधू सवालों के पुल,
एक एक कर तुम देना हल।
सवाल सरल ही होंगे देखो,
झटपट जवाब तैयार रखना ,
जो कुछ है तेरे मन में,
वैसे ही उत्तर देना।

माँ
Image result for माँ पर मार्मिक कविता
माँ



Related imageजैसे कि मैं
फिर मिलेंगे...
><
बहत्तरवें विषय के बारे में बता दें
विषय 
गलीचा
उदाहरण कुछ भी हो सकता है...
मसलन ...
पहली 
बार दिखा है 
मन्दिर के 
दरवाजे तक 
गलीचा 
बिछाया गया है 

कितना कुछ है 
लिखने के लिये 
हर तरफ 
हर किसी के 

अलग बात है 
अब सब कुछ 
साफ साफ 
लिखना मना है

रचनाकार
डॉ. सुशील जोशी
प्रेषण की अंतिम तिथि- 25 मई 2019
प्रकाशन तिथि- 27 मई 2019
प्रविष्ठियाँ ब्लॉग सम्पर्क प्रारूप द्वारा ही मान्य


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