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रविवार, 31 दिसंबर 2017

898.....इंसान को इंसान बनाया जाए

आज आंग्ल वर्ष के अन्तिम दिवस पर
सादर अभिवादन स्वीकार करें.... 
साल तो आते-जाते रहते हैं...
पर हम वहां के वहीं रहते हैं...
कभी आईना नहीं देखते न...
और नहीं देखते सड़क की ओर...
याद आ रहा है एक किस्सा....

मारो गोली किस्से को....
चलें रचनाओं की ओर......

    नव प्रवेश...  


इंसान को इंसान बनाया जाए....गोपालदास "नीरज"
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। 

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। 



नन्ही ख़्वाहिश...श्वेता सिन्हा
पत्तियों की ओट में मद्धिम
फीका सा चाँद
अपने अस्तित्व के लिए लड़ता
तन्हा रातभर भटकेगा 
कंपकपाती नरम रेशमी दुशाला 
तन पर लिपटाये



सुख का सूर्य...सुधा इन साईट
सुख का सूर्य है कहाँ, कोई बताए ठौर!
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण देख लिया चहुँ ओर!!
देख लिया चहुँ ओर कि बरसों बीत गए हैं!
चूते चूते घट भी अब तो रीत गए हैं!!


नए साल से...ओंकार केडिया
फैसला कर लिया है 
कि दिसंबर की सर्दी में
आधी रात तक जागकर
तुम्हारे आने का इंतज़ार करूंगा ;
ख़ुशी से चीखूंगा,
नाचूँगा, सीटियाँ बजाऊँगा,
जैसे ही तुम पहुँचोगे.


पोल-खोलक यंत्र - अशोक चक्रधर
ठोकर खाकर हमने
जैसे ही यंत्र को उठाया,
मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुई
कुछ घरघराया।
झटके से गरदन घुमाई,
पत्नी को देखा
अब यंत्र से
पत्नी की आवाज़ आई-
मैं तो भर पाई!


उनके बालों से गिर रही बूँदें...रामबाबू रस्तोगी
घर में बैठे रहें तो भीगें कब।
बारिशों से बचें तो भीगें कब॥

पत्थरों का मिज़ाज रख के हम।
यूँ ही ऐंठे रहें तो भीगें कब॥


अब न होगा....ये तेरा घर....#Ye Mohabbatein
ये दुनिया बदलती ही रहती है
हर पल
हमारी पृथ्वी,
इसे गोल-गोल घूमते उपग्रह
और वो भी
जिसके परितः हम घूमते हैं
पृथ्वी के संग;
अगर सृष्टि परिवर्तित होती है

आज..
अब....
बस....

दिग्विजय ..

















शनिवार, 30 दिसंबर 2017

897... छत



चलो साल पूरे हो गये


चार खंभे
लगे अपने-अपने
क्षेत्रफल बढ़ाने
क्या करे बेचारी


गाँव के अनेक
चित्र उभार देता है
गुलाब
खेतों खलिहानों के
और ‘उसके’
जब उसे पहली बार देखा था
कुएँ पर
हथेलियों के बीच
अपना मुँह छिपाए-मगन।
माँ का चेहरा
जैसे पंखुड्रियों के किनारे सूख गए हों
फिर भी बाकी हो
उनमें तेज
और सुगंध भी।


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ये चाँद भी देख सरमाया
कभी छुपा कभी दिखा
तो कभी उसे रोना आया
जब वो छत पर आया
तो दिल को सुकून आया
उस चंद लब्जो में ही
फूलों को हे बरसाया



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
जिन्दगी ना जाने कब पूरी हो
कौन सोचे क्यों सोचे जब हो पास


साँझ परैत सब दिन छत पर 
हम अहाँ के तकैत छी 
कहिओ जल्दी कहिओ देरी 
अहाँ छत पर आबैत छी 
कहिओ छोट कहिओ नम्हर 
अहाँ किया रूप बनाबै छी 
कहिओ किया हमरा सँ दुर 
मेघ में किया नुकैत छी


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याद करना चाहता हूँ 
उन अँधेरी रातों को जब छत पर सोते बेसुध
और टिमटिमाता तारा सुनाता परी कथा 
याद करना चाहता हूँ 
उन पगडंडियों की महक को
जब भेड़ें लादे पीठ पर अपनी
नमक और कणक लाती

><

फिर मिलेंगे ले निराले ढ़ंग
नये साल में नई बातों के संग


शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

896....अच्छा हुआ गालिब उस जमाने में हुआ और कोई गालिब हुआ

सादर अभिवादन
यूँ तो हर दिन नया,  हर पल नवीन है। समय के घूमते पहिये में तारीखों के हिसाब से फिर एक साल जा रहा है और नववर्ष दस्तक दे रहा है। लोग आने वाले भविष्य के लिए नये संकल्प लेते हैं। चलिये हम और आप भी 'अंगदान' के सार्थक महत्त्व पर विचार करते है मानवता के नाम। मृत्यु के बाद 
ये नश्वर देह अगर किसी को जीवन दे पाये इससे बढ़कर 
मनुष्यता और पुण्य कुछ नहीं।
  हमारी आँखें किसी के अंधेरे जीवन में उजाला भर सकती है। शरीर के अन्य उपयोगी अंग लीवर,दिल,गुर्दे त्वचा,टिशू(उत्तक), फेफड़ा इत्यादि हमारी मृत्यु के उपरांत किसी के काम आकर उनके जीवन में खुशियाँ भर सकती है। हर प्रकार की भ्रांति से परे मानवता के लिए क्या आप ऐसे उदार संकल्प के महत्व पर इस नववर्ष पर सोच सकते है? एक बार विचार अवश्य करियेगा।

चलिए अब पढ़ते है आज की रचनाएँ....

आदरणीया यशोदा दी की कलम से प्रसवित विचारणीय रचना

जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तू सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा

आदरणीय अयंगर सर जी की कलम से निकली भावपूर्ण,
स्नेहयुक्त, पवित्र अभिव्यक्ति
अब चिड़िया को होश नहीं,
पहले जैसा जोश नहीं,
पर फिर भी खामोश नहीं,
फुदक नहीं वह पाती है,
बस चींचींचींचीं गाती है.

आदरणीया रेणुबाला जी की हृदय के भावों को गूँथकर 
तैयार की गयी सुंदर रचना
आत्मा की  अतल गहराइयों में -
जो  भरेगा उजास  नित नित  ,
दिन महीने गुजर जायेगे  -
 आँखों से ओझल न होगा किंचित ;
हो ना जाऊं तनिक मैं विचलित 
प्राणों में  अनत धीरज  भर देना तुम !!


आदरणीय पुरुषोत्तम जी की सुंदर कृति
आपके ही ख्वाब में......
ये आ गया हूँ मैं कहाँ, पतवार थामे हाथ में,
हसरतों के आब में,
खाली से किसी दोआब में,
या आपकी यादों के किसी अछूते महराब में.


आदरणीया अपर्णा जी की नये साल के खूबसूरत ख़्वाब बुनती 
उम्मीद से भरी रचना
नए साल में,
सरहद पर खून के छींटे
शायद कम गिरे,
छोड़ दिए जांय बेक़सूर कैदी,
सरकारी कार्यालयों में
धूल फांकती फाइलें
ले ही आयें घरों में उजास,


आदरणीया राधा जी का हमारे मंच पर स्वागत है उनकी  कलम से 
प्रसवित सर्वधर्म समभाव का सार्थक संदेश देती बहुत सुंदर रचना
नफरत की दीवारें तोड़ो
शॉल शराफत का ही ओढ़ो
इंसानों के दिल को जोड़ो
कभी न पूजाघर को तोड़ो  
धर्म हमेशा यही सिखाता
जीने की है कला बताता

आदरणीया विभा दी की कलम से  निकली सुंदर  संदेशात्मक  रचना

"किसी का हक़ नहीं कि आपकी खुशियाँ छीने... अगर आपको पसंद नहीं तो अब , जब वे बुलाएँ तो आप तब बोलिए... देखते हैं... देखेंगे... इनसे पूछते हैं... खुद जाने का निर्णय आप कर सकती हैं... ऐसा ऊँगली क्यूँ पकड़ाईं आप ? दोषी आप भी हैं... !

और अंत में आदरणीय सुशील सर जी के उलूक टाइम्स से 
चचा ग़ालिब के लिये अलग अंदाज़ में


अब तो एक ही
गालिब रह गया है

जमाने में गालिब

कुछ भी कहना

उसी का

शेरे गालिब हुआ



फिर मिलेंगे नये साल में तब तक के लिए
आप सभी की बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में

वक्त के पहियों में बदलता हुआ साल
जीवन की राहों में मचलता हुआ साल
चुन लीजिए लम्हें ख़ुशियों के आप भी
ठिठका है कुछ पल टहलता हुआ साल


गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

895....और तीन दिन शेष हैं...

सादर अभिवादन।
पाकिस्तान की जेल में क़ैद भारतीय नौ सेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव जिनका  कथित तौर पर नक़ली नाम इलियास हुसैन मुबारक़ पटेल भी चर्चा में है। मार्च 2016 में पाकिस्तान ने अपने एक प्रान्त 
बलूचिस्तान से  जहां आज़ादी के लिए आंदोलन उग्र है जासूसी और आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाकर गिरफ़्तार 
किया। पाकिस्तान का दावा है कि कुलभूषण जाधव  व्यक्ति 
भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी RAW के  एजेंट हैं। पाकिस्तान ने 
इनका क़बूलनामा भी ज़ारी किया.
पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट ने 10 अप्रैल 2017 को इन्हें फांसी की सज़ा सुनाई तब भारत की ओर से इस फ़ैसले  पर सख़्त आपत्ति जताते हुए ICJ (अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ) में  अपील की गयी और बताया गया कि इनका ईरान में कारोबार है और ये भारतीय नागरिक हैं ( भारत सरकार की ओर से इनकी पहचान के दस्तावेज़ पेश किये गये जबकि जासूसों की पहचान के दस्तावेज़ नहीं होते हैं ) . भारत का दावा है कि कुलभूषण जाधव को ईरान से अपहरण कर गिरफ़्तार किया गया है।
            एक माह बाद 10 मई 2017 को भारत की अपील पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने इस फांसी पर रोक लगा दी। भारत अपने प्रयासों में संलग्न है ताकि कुलभूषण जाधव को बचाया जा सके।
भारत में ऐसी आशंकाऐं व्यक्त की जा रही थीं कि पाकिस्तान के रबैये से लगता है जैसे कुलभूषण जाधव को टॉर्चर के दौरान मार डाला गया हो ... शुक्र है कि वे ज़िंदा हैं।
            विगत 25 दिसंबर  2017 को पाकिस्तान ने अपना दरियादिल रूप दिखाने के फेर में कुलभूषण जाधव की माँ और पत्नी से अपने विदेश मंत्रालय के कार्यालय में मुलाक़ात का  इंतज़ाम किया।
इस मुलाक़ात के दौरान कुलभूषण जाधव और उनकी माँ व पत्नी के  बीच काँच की दीवार रखी गयी और उन्हें मराठी भाषा में बात नहीं करने दी , साथ ही दोनों महिलाओं के कपड़े बदलवाये  गये , चूड़ी ,बिंदी और मंगल -सूत्र तक निकलवा दिये गये। मुलाक़ात के बाद पाकिस्तानी मीडिया ने तल्ख़ सवाल पूछे इन महिलाओं से। कुलभूषण जाधव की पत्नी की जूतियां  किसी धातु की उपस्थिति ( गुप्त कैमरा या रिकॉर्डर) के शक़ में ज़ब्त कर लीं  गयीं  बदले में दूसरी जूतियां दी गयीं।  कल ये जूतियां जांच के बाद लौटा दी गयीं।

इस प्रकरण ने भारतीय जनमानस में ख़ासी चर्चा बटोरी है। आक्रोश का ज्वार चरम पर है। पाकिस्तान का यह व्यवहार बेशक घोर निंदा का बिषय है। पाकिस्तान और भारत का साझा इतिहास है अतः तल्ख़ी का पैमाना हद तक अपना असर दिखाता रहता है।  पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों के मृत शरीर के साथ भी अमानवीयता की निम्नतम स्तर की निंदनीय  अक्षम्य हरक़तें की हैं। अंतर्राष्ट्रीय जनमत भारत के पक्ष में है।
 संक्षेप में यह ज़िक्र यहां  इसलिए किया गया  ताकि लोग इस मुद्दे को सही रूप में समझ सकें।

चलिए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कवि एवं चिंतक प्रोफ़ेसर अशोक चक्रधर जी की नव वर्ष के स्वागत में एक रचना  पढ़िए-  
 यारा दस्तक देत अठाराअशोक चक्रधर
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चित्र साभार : गूगल 
यारा
   दस्तक देत अठारा

दिल-दिमाग़ की खोल खिड़कियां
    आने दे उजियारा। 

यारा

  दस्तक देत अठारा!


आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी द्वारा संकलित ब्लॉग "मेरी धरोहर" पर  आदरणीया कुसुम कोठारी जी की एक गंभीर रचना जोकि अनेक  अर्थों का भंडार है फिलहाल हम इसे जाते साल को पीला पत्ता समझकर पेश कर रहे हैं -




संग हवाओं के बह चला 
मै पीला पत्ता 
अब रखा ही क्या है मेरे लिये 
आगे की नियति का पता
ना किसी गंतव्य का
मै पीला पत्ता।। 

आदरणीया श्वेता सिन्हा जी ने ब्लॉग जगत में अपनी मख़मली एहसासों से सजी प्रकृति के अनुपम सौंदर्य की छटा बिखेरती रचनाओं से ख़ास मक़ाम हासिल किया है। पेश-ए-नज़र है उनकी नव वर्ष पर एक रचना - 

बदलते साल में.... श्वेता सिन्हा 


 
लौटकर पक्षी  को 
अपने नीड़ में
आना होगा,
अपना मानकर बैठा है   
कैसे वो डाल बदल जाएगा।

नर्म एहसासों को  हमारे दिलों में उतारती ख़ूबसूरत नज़ाकतभरी शब्दावली में रचनाऐं क़रीने से गढ़ती हैं आदरणीया पम्मी जी।  उनकी एक रचना का  रसानंद लीजिये-
         



 अब सदाकत के दायरे भी सिमटे 

तभी तो झूठ में  सच के नजारें हैं,

जख्म मिले हैं अजीजों से

निस्बत रिश्तों से कुछ दूरी बनाए खे हैं,

छोड़िए इन बातों को..

जिन्दगी ख्वाबों ,ख्यालातों और ख्वाहिशों 

से कहाँ गुज़रती है,


आज हम बे-फ़िक्र  सोते हैं अपने घरों में क्योंकि हमारी सीमाऐं जांबाज़ 


 सैनिकों की सजग पहरेदारी से सुरक्षित हैं।  पेश है आपकी सेवा में  


आदरणीय गौतम राजऋषि जी की एक सारगर्भित प्रस्तुति -

   


My photo 

ठिठुरी रातें, पतला कम्बल, दीवारों की सीलन...उफ़
और दिसम्बर जालिम उस पर फुफकारे है सन-सन ...उफ़

बूढ़े सूरज की बरछी में ज़ंग लगा है अरसे से
कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन...उफ़

हाँफ रही है धूप दिनों से बादल में अटकी-फटकी

शोख़ हवा ऐ ! तू ही उसमें डाल ज़रा अब ईंधन...उफ़

ब्लॉग जगत में आदरणीया सुधा सिंह जी अपनी विशिष्ट रचना शैली के साथ चर्चित हैं।  इनकी रचनाओं में अक्सर समाज से जुड़े गंभीर बिषय हमसे संवाद करते नज़र आते हैं। आज हम पेश कर रहे हैं उनकी एक अलग रंग की रचना -

अब लौट आओ प्रियवर..... सुधा सिंह 

 

अब लौट आओ प्रियवर


कि रात के शामियाने से..

कुछ नशा चुराया है तुम्हारे लिए..

थोड़े से जुगनू समेटे हैं तुम्हारे लिए...

तारों की झालर सजाकर

सागर से रवानी भी ले आई हूँ तुम्हारे लिए


आज बस इतना ही। 
आपकी स्नेहभरी प्रतिक्रियाओं और 
सारगर्भित सुझावों की प्रतीक्षा में। 
फिर मिलेंगे.... 
रवींद्र सिंह यादव 

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

894..कुछ दिनों की ''जश्ने बहारं '' से कब तक ..

२७दिसंबर२०१७
।।शुभ प्रातः वंदन।।
🙏
सफाई अभियान के तहत सभी अधिकारी, खिलाड़ी, नेता, अभिनेता ,संत सभी जनसेवक
के पात्र निभा रहे हैं पर 
समान्य जनो की प्रवृत्तियों का क्या.. 
जो गलियों, गलियारों ,रास्तों का श्रृंगार करने से बाज नहीं आतें।
कुछ दिनों की ''जश्ने बहारं '' से 
कब तक स्वक्षता अभियान..
इससे अच्छा हो ..आदमीयत के सारे
 रस्म ही पूरे कर लें..✍

चलिए अब रुख करते हैं लिंकों पर
प्रथम प्रस्तुति के अंतर्गत 
ब्लॉग  फ़िज़ूल टाइम्स से..


वक़्त बदले तो रिश्ते बदल जाते हैं
ख्वाहिशें बढ़ी तो अपने बदल जाते हैं
जरूरत के मुताबिक कहाँ सभी को मिलता है
ज़मीं कम पड़े तो नक्शे बदल जाते हैं



द्बितीय लिंक ब्लॉग स्वप्न मेरे ...से
जो जैसा है वैसा ही बनना पड़ेगा
ये जद्दोजहद ज़िन्दगी की कठिन है
यहाँ अपने लोगों को डसना पड़ेगा


तृतीय लिंक है ब्लॉग चौथाखंभा से..
चारा घोटाला फैसला- बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड
चारा घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा के बरी होने और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के दोषी करार होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे जातीय आधार से जोड़कर न्याय व्यवस्था पर सवाल किए जा रहे हैं।
पार्टी समर्थक अथवा साधारण लोगों के द्वारा ऐसे सवाल किए जाते है तो यह मायने नहीं रखता पर बहुत सारे काबिल और विद्वान लोगों की जातीय टिप्पणी आहत करने वाली है।


चतुर्थी साधना वैद जी की कलम से..

कड़कड़ाती ठण्ड थी
घना कोहरा था
बुझा बुझा सा अलाव था
सीली लकड़ियों से फैला
धुआँ ही धुआँ था चहुँ ओर
और थीं कडुआती आँखें !


पंचम लिंक में आन्नंद उठाए
 ब्लॉग  अब छोड़ो भी से..

पांवों में चप्‍पलों का न होना एक बात है 
और पुरुषों द्वारा अपनी छाती चौड़ी करने को महिलाओं से चप्‍पलें उतरवा देना दूसरी बात 
बल्‍कि यूं कहें कि यह तो फेमिनिज्‍म से आगे की बात है तो गलत ना होगा।

और अब चलते चलते ये दो लाइनें इसी जद्दोजहद पर पढ़िए- 

तूने अखबार में उड़ानों का इश्तिहार देकर,
तराशे गए मेरे बाजुओं का सच बेपर्दा कर दिया।


षष्ठी लिंक में  जीवन के तीनों सोपानों का  वर्णन
दिल तो अभी बच्चा है जी। 
जो काम कभी नहीं किये ,
उन्हें करने की इच्छा है जी। 


और...अब आनंद ले..ब्लॉग जीवनकलश से

दो छंदों का यह कैसा राग?
न आरोह, न अनुतान, न आलाप,
बस आँसू और विलाप.....
ज्यूँ तपती धरती पर,
छन से उड़ जाती हों बूंदें बनकर भाफ,
बस तपन और संताप....
यह कैसा राग-विहाग, यह कैसा अनुराग?



इसी के साथ अब मैं विराम लेती हूँ..
कल फिर एक नए रचनाकार के साथ यहीं पर
।।इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍ 
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