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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

878..विचार मानव के मूलभूत स्तम्भ हैं

इस धरा पर 
हर प्राणी अपने अस्तित्व के साथ 
अपने जीवन का निर्वहन करता है। 
फलतः अस्तित्व है तो विचार होना स्वाभाविक है 
और बिना विचार के अस्तित्व की कल्पना बेईमानी सी प्रतीत होती है। ये विचार मानव के वे मूलभूत स्तम्भ हैं 
जो उसके जीवित होने का संकेत देते हैं। 
विचार विहीन मानव अपने अस्तित्व की तलाश में 
प्रतिक्षण दूसरे के बताये मार्ग पर गलत है या सही 
बिना विचारे एक भ्रमित रूपी मृग के समान विचरण करता है 
अंततः एक गहरे अंधकार का 
प्रारम्भ !
वर्तमान में ये परिस्थितियाँ 
आपको प्रत्येक क्षेत्र में देखने को मिल जायेंगी। 
अतः अपने अस्तित्व की तलाश समाप्त और विचारों पर अमल करें। 
तभी अपने अस्तित्व को स्थापित करने में हम मानव प्रजाति सफल होंगे। 
तो चलिए आज के कुछ विचारों की ओर 

आप सभी का स्वागत है। 










➤ आज के रचनाकार हैं।

  • आदरणीय शिवनाथ कुमार 
  • आदरणीया मीना भारद्वाज 
  • आदरणीय रविकर जी 
  • आदरणीया किरण मिश्रा 
  • आदरणीया वीणा सेठी 
  • आदरणीय अजीत जी 
  • आदरणीया कविता भट्ट 
  • आदरणीय दिलबाग सिंह विर्क 
  • आदरणीय मदन मोहन सक्सेना 
  • आदरणीया शशि पुरवार 
  • आदरणीया सविता मिश्रा 
  • आदरणीया अपर्णा त्रिपाठी 
  • आदरणीया रेणु बाला 
  • आदरणीया सुषमा वर्मा 










चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
 नश्वरता की प्रकृति  प्रकृति‎ को भी कहाँ भाती है ।।  












 दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा।
परिवार सह इक लंच में उतनी रकम दूँ मैं उड़ा।









चरखे से बनाती है सभ्यताओं के विकास के धागे
जिन का छोर पकड़










मुट्ठी में भरी रेत 
धीरे से फिसली 



दो बिंदुओं के संधिस्थल 
जैसा सूक्ष्म होता है 













 रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना









 परहेज़ ही काम करता है इस इश्क़ में यारो 
इस मर्ज़ के मरीज़ का इलाज नहीं होता। 









इधर तन्हा  मैं था उधर तुम अकेले
किस्मत ,समय ने क्या खेल खेले








जीवनभर करते रहे 
सुख की ख़ातिर काम 






  मुंह  मोड़ के   चल दिए साथी -
  तुम तो  नयी मंजिल -   नयी राहों पे  ; 






 चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं
मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है










देखा है
वक्त को
सावन सा बरसते
कभी बूँद बूँद रिसते हुये
देखा है



 तारीखे कहाँ बदलती है,
ये तो बदलते वक़्त के बार-बार,
खुद दोहराती है...





पांच लिंकों का आनंद ब्लॉग पर 
अपनी अंतिम प्रस्तुति के साथ आप सब से विदा लेता हूँ। 
आपके स्नेह व सहयोग का कृतज्ञ रहूँगा !

धन्यवाद। 

"एकलव्य" 

21 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई ध्रुव जी
    चिरस्मरणीय प्रस्तुति
    जब तक हम रहेंगे
    याद रखेंगे...
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आपका आभार आदरणीय ध्रुव जी आप आप ने यहां तक हमें सहयोग दिया इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार हम तो यही चाहते हैं कि आने वाले दिनों में भी आप हमें अपनी प्रस्तुतियां पढ़ाते रही इस आशा के साथ कुलदीप ठाकुर

    जवाब देंहटाएं
  3. एकलव्य जी बहुत ही उम्दा संकलन....हर रचना बहुत ही प्यारी हैं

    जवाब देंहटाएं
  4. सुप्रभात !!!!
    आदरणीय ध्रुव जी बहुत ही शानदार प्रस्तुति। ......
    देखकर ही मन प्रसन्न हो जाये इतना सुंदर संकलन।
    दिन प्रति दिन आप की प्रस्तुति निखरती जा रही है, सुप्रभा
    हर बार लगता है यह सबसे अच्छी है पर अगली बार आप हमें गलत साबित कर देते है !!!!!

    जवाब देंहटाएं
  5. विविधता लिये हुऐ एक शानदार प्रस्तुति के लिये साधुवाद ध्रुव जी।

    जवाब देंहटाएं
  6. उम्दा प्रस्तुति ध्रुव भाई, अफ़सोस है कि "पांच लिंकों का आनंद" ब्लॉग पर यह आपकी अंतिम प्रस्तुति है। इस चर्चा में सम्मलित सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत उत्कृष्ट रचनाओं को आज के मंच पर रखा है.सभी रचनायें एक से एक hain. . आपको सादर बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  8. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  9. प्रिय ध्रुव -- आज का लिंक पाकर बहुत संतोष हुआ | सभी रचनाओं को नजर भार्देख लिया अभी उन पर अपने भाव दे नहीं पायी पर सभी रचनाएँ एक से एक आला दर्जे की और भावपूर्ण हैं | भूमिका की क्या कहिये वैचारिक बोध के बिना मानव का अस्तित्व कहाँ ? ज्ञान और बुद्धि से उपजे इन विचारों की बदौलत ही तो मनाव को ईश्वर की अनुपम कृति और चौरासी लाख योनियों में श्रेष्टतम स्थान दिया गया है | वैचारिक शून्य व्यक्ति पशुवत है | अतः समाज के लिए सार्थक और मानवतापयोगी विचारों का बहुत महत्त्व है और समाज में इसकी अनिवार्यता प्रत्येक काल खंड में अपेक्षित है | आज के लिंक के सभी मित्र रचनाकारों को सादर सस्नेह बधाई और शुभकामनाये | मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपको सस्नेह आभार और नमन | आपका सहयोग अनमोल है |

    जवाब देंहटाएं
  10. वाह!!!धुव्र जी ,बहुत खूबसूरत संकलन।

    जवाब देंहटाएं
  11. उत्कृष्ट रचनाओं का संगम आज की प्रस्तुति..
    आपका सहयोग स्मरणीय रहेगा
    सभी चयनित रचनाओं को शुभकामनाएँ
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  12. सुसज्जित हलचल प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी

    जवाब देंहटाएं
  13. विविध‎तापूर्ण अनूठा प्रस्तुतिकरण .

    जवाब देंहटाएं
  14. प्रभावशाली रचनाओं की प्रस्तुति...!
    सभी एक से बढ़कर एक रचनाएं हैं..पर आपकी प्रस्तुता की भूमिका प्रभावित कर रही है।जैसा कि आपने कहा बिना विचार के अस्तित्व की कल्पना बेमानी है... मेरी सोच से भी ये कथन सटीक बैठता है, व्यक्तितव के विकास का आघार ही विचारों की अभिव्यक्ति है।और विचार से परिष्कृत होकर कुछ ऐसी अवधारणाएं अस्तित्व में आई है। जिन्होंने दुनिया को नई राह दिखाई है,ध्रुव जी आपने सही लिखा है विचार स्वय के ही होने चाहिए ...दुसरो के विचारों का अंधानुकरण हमें उसकी राह ले जायेगा ना कि हम वहां पहुंच पायेंगे जो हमारी मंजिल है। अंत में इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बधाई एवं सभी रचनाकारों भी बधाई एवं शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं
  15. आपका बहुत बहुत आभार ध्रुव भाई | प्रस्तुति लाजवाब | स्केच बहुत पसंद आयें कविताओ के साथ |
    भावों को हम शब्दों में पिरो देते हैं
    विचारों को वाक्यों में तिरो देते हैं
    मेरे भावों को भाव देता है जब कोई
    संबल मिलता जो लेखन में सिरो देते हैं | सविता :)

    जवाब देंहटाएं
  16. आपकी आमुख-पंक्तियों ने मुझे प्रसिद्द फ्रांसीसी सैनिक, गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी, शरीर विज्ञानी और दार्शनिक ' रेने देकार्ते '(फ्रांसीसी भाषा में - Rene Descrates) की कालजयी लैटिन पंक्तियाँ " कोगिटो एर्गो योग , अर्थात Cogito ergo sum " की याद दिला दी जिसका अर्थ होता है - " I think therefore I exist. अर्थात मै विचार करता हूँ इसीलिए मेरा अस्तित्व है." Cartesian co ordinate system और विश्लेष्णात्मक ज्यामिति के जनक 'देकार्ते' ने मूल रूप से फ़्रांसिसी भाषा में कहा था "je pense, donc je suis' जिसका मतलब होता है- 'मुझे लगता है इसीलिए मैं हूँ'. कहते हैं सैनिक जीवन से आजिज़ देकार्ते ने एक रात देखे एक सपने से प्रभावित होकर अपनी नौकरी छोड़ दी और फिर आने वाले दिन इस महान विचारक के विचारों की पृष्ठभूमि पर विनिर्मित विशाल वैज्ञानिक वितान बने जो मानव जीवन के लिये अभूतपूर्व वरदान साबित हुए. आज आपने अपने संकलन के प्राक्कथन में सोचने -विचारने की उस अपरिहार्य परंपरा को न केवल प्रमुखता से पुनर्रेखांकित किया है , प्रत्युत सुविचार प्रधान साहित्य सुधा को बखूबी बहाया भी है. बधाई और शुभकामनायें!!!

    जवाब देंहटाएं
  17. चर्चा में देर से भारी मन से शामिल हो रहा हूँ। ध्रुव जी आप इस मंच से अंतिम विदाई इस तरह लेंगे ......? अविस्मरणीय प्रस्तुति के साथ विच्छेद का समाचार अंतर्मन को हिला गया। मुझसे पहले आपने इस मंच पर अंतिम प्रस्तुति पेश करके सबको हैरत में डाल दिया है। आपकी ऊर्जावान प्रयोगधर्मी प्रस्तुतियों ने इस मंच की टीम से लेकर आदरणीय पाठकों के दिलों में विशिष्ट स्थान बनाया है। अगर आप अंतिम फैसला ले चुके हैं तो व्यक्तिगत रूप से अपने आपको क्षमा नहीं कर पाऊँगा।
    ज़िन्दगी में ऐसे अनेक पड़ाव आते रहते हैं। माला से अनमोल मोती बिखरते रहते हैं। इसमें न उस धागे का दोष होता जिसमें वे पिरोये जाते हैं और न ही उन मोतियों का जो धागे के कमज़ोर हिस्से पर इतना ज़ोर डालते हैं कि उसके रेशे टूटकर मोतिओं को बिखर जाने देते हैं। टूटना -बिखरना एक क्रम है ,नियति है ,परिस्थितियों का तांडव है। हम ब्लॉग जगत में जिन उद्देश्यों के लिए सक्रिय हैं उनकी समीक्षा ज़रूर करते रहें। आपको ढेर सारा स्नेह ही दे सकता हूँ। आपके उज्जवल भविष्य की कामनायेँ मेरी ओर से क़बूल करें।

    आपकी भूमिका पर आदरणीय विश्व मोहन जी ने जो कहा उसके बाद ज़्यादा कुछ बचता कहाँ है। मैं अपनी बात एक श्लोक के माध्यम से कहूँगा -
    "यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
    लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥"


    ब्लॉग के शीर्ष पर ब्लॉग वर्णन में अभी भी आप किसी विशेषांक के लिए अपने ईमेल पर रचनाऐं आमंत्रित करते नज़र आ रहे हैं। यह समाचार भ्रम उत्पन्न कर रहा होगा आदरणीय पाठकों के ज़ेहन में अतः सम्बंधित AUTHORITY कृपया इस ओर ध्यान देने का कष्ट करें।

    इस अंक में शामिल समस्त रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाऐं। आभार सादर।




    जवाब देंहटाएं
  18. प्रिय ध्रुव -- अंतिम प्रस्तुति से अभिप्राय क्या है ना जान पाई - पर मेरे लिए बहुत आघात पूर्ण है | फिर भी आपको मेरी ढेरों शुभकामनाएं | आप जहाँ भी रहेंगे आपकी लेखनी का ओजस्वी नाद चहुँ और गूंजता रहेगा | सधी रचनाएँ पढ़ी ओर उन पर अपने विचार दिए पर सविता जी और सुषमा जी के ब्लॉग पर टिपण्णी संभव ना हो पायी | मैंने लिखी भी पर दिखाई नहीं दी | उन्हें यहाँ से बधाई और शुभकामनाएं प्रेषित करती हूँ | और आपको सस्नेह शुभकामनायें |आप सदैव यशस्वी रहें |

    जवाब देंहटाएं
  19. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  20. आप सभी प्रबुद्धजनों का बहुत- बहुत आभार।

    जवाब देंहटाएं

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