निवेदन।


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मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

4105...मौन की भाषा

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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पृथ्वी सोच रही है...,
किसी दीवार पर
मौका पाते ही पसरे
ढीठ पीपल की तरह,
खोखला करता नींव को,
बेशर्मी से खींसे निपोरता, 
क्यों नहीं है चिंतित मनुष्य
अपने क्रियाकलापों से ...?

मनुष्यों के स्वार्थपरता से
चिंतित ,त्रस्त, प्रकृति के
प्रति निष्ठुर व्यवहार  से आहत
विलाप करती
पृथ्वी का दुःख
 सृष्टि में
प्रलय का संकेत है।


अब आज की रचनाएँ


कबीर का प्रेम..

निर्गुण ब्रह्म में सब कुछ देखता है 

सूर का प्रेम ..,

शिशु  मुस्कुराहट में खेलता है  

गृहस्थी के सार में साँसें लेता है 

तुलसी का प्रेम 

तो अरावली की उपत्यकाओं में 

गूँजता है मीरां का प्रेम




सुन लेते हैं जो मौन की भाषा 

 जहां छाया है 

अटूट निस्तब्धता और सन्नाटा

वहीं गूंजता है 

अम्बर के लाखों नक्षत्रों का मौन हास्य 

और चन्द्रमा का स्पंदन  

मिट जाती हैं दूरियाँ

हर अलगाव हर अकेलापन



गंगा, जमुना, 
सरयू, नर्मदा 
सतुपड़ा, हिमालय नवगीत का,
छंद का हितैषी 
यायावर 
गीत लिखा मन के जगजीत का.
गीतों की
गन्ध रहे बाँटते 
रेत, नदी, धूप में कछार में.


उड़ती हैं महाकाय रंगीन परों की तितलियाँ, हर
कोई बढ़ चला है अनजान सफ़र में, हाथों
में थामे हुए अनेक रहस्यमयी तख्तियां ।
वो सभी चेहरे हैं भाषा विहीन, मूक
कदाचित बधिर भी, उनकी
आँखे हैं पथराई सी,
मशीन मानव की
तरह वो बढ़े
जा रहे हैं
नंगे






''बहुते है ! पर सबसे बड़का अचरज तो अपना दिल्ली में ही है ! चा का टपरी पर उसी का बात हो रहा था ! देखिए, देश का सबसे बलशाली कुनबा ! जहां का तीन-तीन, चार-चार परधान मंत्री बना ! देश का दूसरा सबसे बड़ा पाटी ! अभी भी सबसे जोरावर परिवार ! पर दिल्ली का जउन सा निर्वाचन छेत्र का सीट का लिस्ट में इन लोगन का नाम है, जहां इ लोग वोट देगा, ऊ छेत्र का वोटिंग मशीन पर इनका पाटी का निशाने ही नहीं है ! तो ई लोग कउन चिन्ह का बटन दबाएगा ? इसी पर सब बहिसिया रहे थे ! 


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आज के लिए बस इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 22 अप्रैल 2024

4104 ...खबरची की खबर पर वाह कह के मगर जरूर आता है

सादर अभिवादन

कल हनुमान जी का जन्म दिन है



पढ़िए आज की चुनिंदा रचनाएं



वाह रे ‘उलूक’
तेरे घर तेरे शहर में हो रहे को तू देखता है
और अपना मुंह छुपाता है

शाबाश है खबरचियों की ओर से
खबरची की खबर पर
वाह कह के मगर जरूर आता है




पापा आप दीर्घायु हो यही है मेरा अरमान
आपसे ही तो है ये छत ये दीवारें ये मकान।

मम्मी के श्रृंगार आप ही से सलामत है पापा ।
आप से ही है मम्मी के चेहरे की मुस्कान ।




‘अरे बंधु,यही मेरी जीत का टीका है।रक्त की एक-एक बूँद से जनता इसका जवाब देगी
अगले दिन सभी अख़बारों के मुखपृष्ठ पर सचित्र खबर छपी, ‘नेताजी ने अपने क्षेत्र में श्रमदान में भाग लिया और रक्तदान का शुभारंभ किया।उनसे मिलकर किसान खूब रोए !’





प्रिये पराये धन को अपना कहूँ,
यह ब्राह्मण धर्म का अंग नहीं।
हम हैं स्वाभिमानी ब्राह्मण प्रिये,
उपकृत महल हमें स्वीकार नहीं।।




कहीं पर नहीं है खाने के निवाले,
तो कहीं पर नहीं हैं खाने वाले।
अमीर देश के अमीर लोग बच्चे नहीं जनते,
गरीब देश के गरीब लोग जनने से नहीं थमते।
विश्व का संतुलन बिगड़ता जा रहा है,
इसीलिए इंसान का सकून छिनता जा रहा है।

आज बस. ...
कल मिलिये सखी से
सादर वंदन

रविवार, 21 अप्रैल 2024

4103 ..कल शाम तुम्हारे पानी में जो सूरज डूबा था

 सादर अभिवादन

आज महावीर स्वामी जी का जन्म कल्याणक महोत्सव है


भगवान महावीर का जन्म ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में भारत के बिहार नामक राज्य में एक श्रेष्ठ परिवार में हुआ था। अपने जीवनकाल के दौरान, भगवान महावीर को वर्धमान के रूप में जाना जाता था। वर्धमान, कई तरीकों से, बौद्ध धर्म के सिद्धार्थ गौतम के समान हैं। सिद्धार्थ के समान, वर्धमान ने भी सांसारिक कष्टों को देखने के बाद सत्य की खोज करने के लिए अपना आरामदायक घर छोड़ दिया था। विभिन्न संस्कृतियों और पृष्ठभूमियों के लोगों से मिलने के बाद, वर्धमान को संसार और पीड़ा के स्त्रोतों का काफी ज्ञान हुआ। अंत में, वर्धमान ने अपने प्रयासों को उपवास और ध्यान पर केंद्रित कर दिया।

इस प्रक्रिया के माध्यम से, वर्धमान को मोक्ष की प्राप्ति हुई। उन्होंने पाया कि अपनी असीमित इच्छाओं को समाप्त करने के लिए मनुष्यों के लिए लालच और सांसारिक चीजों से अपना संबंध तोड़ना जरुरी होता है। इस ज्ञान के साथ, जैन धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए वर्धमान ने भारत और एशिया के अन्य क्षेत्रों की यात्रा की। इस समय के दौरान, वर्धमान का साम्राज्य बहुत अधिक समृद्ध हो गया था। कई लोगों ने इस आशा के साथ जैन धर्म अपना लिया कि उन्हें भी प्रसन्नता की समान स्थिति का अनुभव हो जायेगा। मोक्ष पाने के पश्चात वर्धमान की मृत्यु हो गयी। 425 ईसा पूर्व में वर्धमान को भगवान महावीर, धर्म के अंतिम तीर्थंकर और सर्वज्ञ गुरु के रूप में जाना जाने लगा। कई लोग अपने कर्मों और भगवान महावीर की शिक्षाओं पर विचार करने के लिए महावीर जयंती मनाते हैं।

आज की चुनिंदा रचनाएं




सींचनें से पेड में फल आये जरूरी तो नही
हम चाहें जिसे, वो हमें चाहे जरूरी तो नही

चमन से गुजरे तो खुशबू भी जरूर आयेंगी
महके हर फूल बागीचे का जरूरी तो नही





मुझे तुम ख़ुद से बाहर निकाल देना,
उस बरस जैसे निकाल फेंका था वह पूरा महीना;
जो हमने एक दूसरे से दूर गुजारा था,
याद तो जरूर होगा तुम्हे!






शायद कभी
आये कोई ,
मन की पाती
बांचे कोई ,
बात अनकही
समझ जाये कोई.
अपनाये,
नयी ज़िन्दगी दे जाये .
अपने आंसुओं से
मुरझाई
मन की मिटटी
सींच जाये कोई .




हमारी ज़िन्दगी में
“शब्द”
बहुत मायने रखते हैं।
दोनों ही दिन चीता तो वही था,
उसमें वही फूर्ति और वही ताकत थी
पर जिस दिन
उसे हतोत्साहित किया गया
वो असफल हो गया
और जिस दिन प्रोत्साहित किया गया
वो सफल हो गया।





ब्रह्मपुत्र,
कभी ध्यान से देखो,
डूबते हुए सूरज से
कहीं ज़्यादा अच्छा लगता है
उगता हुआ सूरज.


आज बस. ...
कल फिर से मैं
सादर वंदन

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

4102 ..ब्लॉग हमारा घर है। लौट के हमें यहीं आना था

 सादर अभिवादन


मधुर तुम इतना ही कर दो !

यदि यह कहते हो मैं गाऊँ,
जलकर भी आनन्द मनाऊँ
इस मिट्टी के पँजर में मत छोटा-सा उर दो !

मधुर तुम इतना ही कर दो!
 
तेरी मधुशाला के भीतर,
मैं ही ख़ाली प्याला लेकर,
बैठा हूँ लज्जा से दबकर,
मैं पी लूँ, मधु न सही, इसमें विष ही भर दो !

मधुर, तुम इतना ही कर दो !
 -गोपाल दास नीरज

आइए देखें कुछ रचनाएं ....



चलन  को पता है
समय की गोद में तपी औरतें
चूड़ी बिछिया पायल टूटने से
खँडहर नहीं बनती




जिस जगह से मैं  गुजरूं ,
वह जगह अपवित्र हो जाता |
जिस कुंआ का पानी मैं पिया ,
वह कुआं का पानी अपवित्र हो जाता |
हर कदम और हर जगह पर ,
छुवा -छूत से लड़ना पड़ता |






दर्द  सारा साथ ले कर सो गए।
नैन में बरसात ले कर सो गए।।

छूट जाये ना तिरी नजदीकियां।
हाथ में हम हाथ ले कर सो गए।।

साथ हमने शब  गुज़ारी जाग के ।
ऊँघती फिर रात ले कर सो गए।।





हम सबको भी हमेशा स्वयं का प्रतियोगी होना चाहिये। 
दूसरों के साथ की गयी तुलना वास्तविक नही है। 
और कई बार यही तुलना हमारे लिये ईर्ष्या बन जाती है। 
स्वयं से की गयी प्रतियोगिता सदैव सकारात्मक परिणाम ही देती है।






लिखना सिर्फ़ ये दिलासा है कि हम अकेले नहीं हैं। 
हम लिखते हैं लेखकों/कवियों का हमें जिलाये रखने का जो क़र्ज़ है, 
उसको थोड़ा-बहुत उतारने के ख़ातिर।

और अपनी कहानियाँ जो सुनाने का मन करता है, सो है ही।

इतने दिन में यही लगता है कि ब्लॉग हमारा घर है। 
लौट के हमें यहीं आना था।

सो, हम आ गए हैं।



आज बस. ...
कल फिर से मैं
सादर वंदन

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

4101....हृदय की मौन.भाषा

 शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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 एक ही बात निश्चित है,
इस संसार में सब कुछ अनिश्चित है।

कोयल की मीठी तान और पुरवाई की गुनगुनाहट के साथ क्षितिज  पर लाल,पीले,सुनहरे छींटों के साथ सूरज का उगना, गरम थपेड़ों से परेशान दिन का अलसाना, धूप के कर्फ्यू में दोपहरीभर सोना, शाम को छतों पर चाँद का बादलों के साथ लुका-छिपी निहारना,चमकीले फीके तारों को गिनना, बेली और रातरानी की महक को फ़िज़ाओं में महसूस करना,विभिन्न प्रकार के आम की भीनी खुशबू, ठंडी लस्सी,कुल्फी,आइस्क्रीम,नींबू पानी की लज़्जत, आँधियों और हवाओं के साथ उड़ते बादलों के साथ  बारिश का इंतज़ार करना,
कौन कहता है गर्मियाँ खूबसूरत नहीं होती?

पर सच्चाई तो ये है न......
पर्यावरण के असंतुलन से बिगड़ता तापमान,तेजी से सूखते पीने के पानी के सोते, बीमारियों का बढ़ता प्रकोप, असहनीय,जर्जर लाइट की अव्यस्था से छटपटाते ए.सी,फ्रिज, कूलर और पंखें के उपभोक्ता। पसीने से तरबतर, बार-बार सूखे होंठों पर जीभ फेरते लोग, सच ये गर्मियाँ 
कितनी बुरी होती है न?

अब तो गर्मी हर मौसम के पृष्ठभूमि में होने लगी है। ठंड कम हो तो गरमी,बारिश ठीक से न हो तो गरमी। मतलब स्थायी ऋतु गरमी है 
बाकी मौसम का आना-जाना लगा हुआ है। 

आपने सोचा नहीं था न?....
पर इस असंतुलन के लिए हम ही जिम्मेदार है,
सुविधायुक्त जीवन जीने की लालसा में।


आइये आज की रचनाओं की ओर


ज़रूरत तो इक दलदल गहरा सा है।
फंसे तो बाहर निकलना नहीं आसाँ।।
भरे बाज़ार हैं मौका-परस्तों से ।
यहां ईमान पे पलना नहीं आसाँ ।।
कभी तो वक़्त बदलेगा है उम्मीद।
हमेशा हसरत कुचलना नहीं आसाँ।।




समाधिस्थ अनुराग

पाता है हृदय की मौन भाषा, कुछ कविताएं
अमूल्य अंगूठी की तरह खो जाती हैं
समय के गर्त में, जिसे उम्र भर
हम खोजते रह जाते हैं बस
स्मृति कुंज में पड़े रहते हैं
कुछ टूटे हुए अक्षर के
कंकाल, कोहरे में
भटकती रह
जाती है
प्रणय



वो ज़ालिम एकदिन बेनकाब होगा


उसीके साथ दफन हैं जुल्म की सारी सच्चाई ,
पंचनामे में तो वही घिसा- पिटा जवाब होगा,

दिन भर इधर उधर जो मज़लूम को टहलाते रहे,
रामदीन की जेब में बाबूओं के ज़ुल्म का महराब होगा,



छतरी का चलनी

उन्नति के कार्यक्रम में नौ-दस लाख का बिल दिखलाया गया।और इस बिल का भुगतान तीन-चार जगहों से करवाया गया! यानी मुश्किल से लगभग तीन-चार लाख का खर्चा हुआ मिला लगभग तीस-चालीस लाख मिला!”


गधों की ज़िंदगी पर आई आफ़त


ई-जियाओ को गधे की खाल से निकाले गए कोलेजन का उपयोग करके बनाया जाता है। इसी खाल को पाने के लिए गधों को मारा जाता है। इसकी मांग इतनी ज्यादा है कि सिर्फ दो साल में चीन में गधों की आबादी 2022 में 90 लाख से घटकर 18 लाख पर पहुंच गई। हालत ये हो गई है कि अब चीन के कई इलाकों में गधों की आपूर्ति में दिक्कत हो रही है, जिसके चलते गधों को दूसरे देशों से मंगाया जा रहा है। इनमें अफ्रीका विशेष रूप से है, जहां से बड़ी मात्रा में गधे चीन सप्लाई किए जा रहे हैं। 




आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में ।
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गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

4100...आहद अनहद सब में हो तुम...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनिता सुधीर जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।  

चित्र साभार: गूगल 

मर्यादाओं की स्थापना करते हुए उन्हें चरितार्थ करते हुए, आदर्श स्थापित करते हुए राम अपनी भूमिका में व्यक्ति के रूप में सफल रहे और मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। राम के आदर्श आज व्यावहारिक जीवन में आत्मसात करना स्वप्न-सा लगता है। सामाजिक मूल्यों का वर्तमान जीवन से पलायन पुनि-पुनि राम का स्मरण कराता है। 

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

1409- पता ही खो गया

सूख गए सब रस

कविता खो गई

पथ भीगा मिला

यूँ साँझ हो गई ।

सूर्य तिलक

सूर्य रश्मि ने किया वंदन

भाल पर रघुवीर के सूर्य तिलक!

पा कर स्पर्श प्रभु राम का

धूप हुई संजीवनी बूटी सम।

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं

आहद अनहद सब में हो तुम

निराकार साकार रूप तुम

विद्यमान हो कण कण में तुम

ऊर्जा का इक अनुभव हो तुम

झांका जब अपने अंतस में,

वरद हस्त अनमोल रहा है

बसी राम की उर में मूरत ,

मन अम्बर कुछ डोल रहा है।

सफलता जोश से मिलती है, रोष से नहीं

जहां परिस्थितियों ने राजेश रवानी को आजीविका के लिए ट्रक चलाने के लिए मजबूर किया, वहीं खाना पकाने के प्रति उनके जुनून और उस प्यार को दुनिया के साथ साझा करने की उनकी इच्छा ने उन्हें एक ब्रेकआउट स्टार बना दिया है। दूसरी ओर वह नवयुवक अपनी असफलता का जिम्मेदार समाज व सरकार को समझता है ! यह भी तो हो सकता है उसने किसी ऐसी जगह से डिग्री हासिल की हो जिसकी मान्यता  ही ना हो ! या फिर किसी तरह सिर्फ डिग्री हासिल कर ली हो और काम की कसौटी पर खरा ही ना उतर पा रहा हो ! जो भी हो यह विज्ञापन अपने निर्माता की ओछी सोच को बेपर्दा कर रहा है !   

छोटे प्रकाशक की व्यथा...

रखे रखे बिन बांटे मिठाइयां कसैली हो गईं हैं,

विमोचन करते करते किताबें भी मैली हो गईं हैं।

पुस्तक मेले में छोटे प्रकाशक की बड़ी दुर्गति होती है,

अज़ी हम से ज्यादा तो चाय वाले की बिक्री होती है।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


बुधवार, 17 अप्रैल 2024

4099..भाल पे मोती जड़ा...


।।प्रातःवंदन ।।

"जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।

चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥"

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अवतरण के अति पावन दिवस श्रीरामनवमी की आप सभी को हार्दिक बधाई..प्रस्तुतिकरण को आगे बढ़ते हुए लिजिए आज 

सुबह-सुबह लो राम का नाम,✍️
पूरे होंगे बिगड़े अधूरे काम
राम जिनका नाम है, अयोध्या जिनका धाम है,
ऐसे रघुनंदन को हमारा प्रणाम है।

रामनवमी 2024 (Ram Navami 2024)

✨️


ये मृदुल ऋतु का समय है

एक तरुवर हँस रहा था 

मंजरी के बौर से हर

एक टहनी कस रहा था

भाल पे मोती जड़ा 

जगमग टिकोरों का मुकुट

✨️

चलते- चलते

 सुनिये, सम्भल के बोलिए

वरना नहीं दिक्कत कोई   

बात करना छोड़िये।

आज की तारीख में मँहगा सलीका हो गया

जानते हैं हम, 

✨️

नाॅट फार यूज

 हर प्लीज का, मतलब रिस्पेक्ट नहीं होता

कुछ प्लीज किसी को मजबूर करने के लिए भी

'यूज़ किए जाते..

✨️

पुरस्कार--महात्म्य

अगर मुझसे को पुरस्कार की परिभाषा लिखने को कहे तो वह कुछ इस तरह होगी--"पुरस्कार ऐसा पारस है जो लोहे को भी सोने का रूप देकर चमका देता है . ” पुरस्कार पाकर गुमनामी के पाताललोक में पड़ा नाम अचानक अखबारों में ..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️


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