निवेदन।


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रविवार, 30 जून 2019

1444....पाँच लिंक के चर्चाकार.... परिचय

स्नेहिल नमस्कार
--------
४ जुलाई २०१९ को रथ यात्रा के दिन
 "पाँच लिंकों के आनंद" 
का चौथा जन्मदिवस है।
आप पाठकों को पाँच लिंक मंच से जोड़ने वाले  चर्चाकारों 
को सादर नमन करते हुये उनका अभिनंदन करते हैं। 
इनके बहुमूल्य साथ के लिए  आभार का हर शब्द 
तुच्छ है। आपकी सृजनशीलता ज्यादा से ज्यादा 
साहित्य सुधियों तक पहुँचाने वाले 
हमारे बेशकीमती चर्चाकारों के सम्मान मेंं आज
इनके ब्लॉग से रचनाएँ
तो चलिए आप पाठकों एक माला में पिरोनेवाले 
हमारे चर्चाकारों के संदर्भ में आप भी जानिये।
★★★★★

आदरणीया विभारानी श्रीवास्तव जी

साहित्य जगत में क्रियाशील रहने वाली धीर,गंभीर हमारी विभा दी अपनी लघु कथाओं,हायकु और वर्णमाला पिरामिड के द्वारा समाज को व्यापक एवं सारगर्भित संदेश देती है। प्रत्येक शनिवार को एक ही विषय पर लायी गयी विविधतापूर्ण प्रस्तुति का हम सभी 
बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।
उनके ब्लॉग
 से रचनाएँ. पढ़िये।
★★★★★

आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी

 पाँच लिंक के मजबूत स्तंभ की तरह है जिसके कंधों पर 
निश्चंत होकर यह वृक्ष प्रतिदिन पुष्पित और पल्लवित है।
काम की व्यस्तता की वजह से इनकी उपस्थिति कम ही हो पाती है परंतु कम शब्दों में  बेबाकी से कहने का अंदाज़ इस कभी-कभार को भी जीवंतता से भर देता है। उनके द्वारा संकलित सभी 
रचनाएँ उद्देश्य परक हैं।
उनके ब्लॉग 
 से संगृहित बहुमूल्य  रचनाएँ
★★★★★★
आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी

किसी परिचय का मोहताज़ नहीं।
पाँच लिंक का बीजारोपण करने वाली
स्नेही, सहृदय,पारखी दृष्टि और धैर्य की मूर्ति हैं 
हमारी यशोदा दी।
वर्तमान में ब्लॉगजगत में साहित्यिक अभिरुचि रखने वाली, स्वयं का परिचय एक पाठक के रुप में देती, 
सबसे चिरपरिचित चेहरा है यशोदा दी का। 
जीवन के संघर्षों का जीवटता से सामना करती रही हैं।
 साहित्य के सागर से बेशकीमती मोती चुनकर उनको 
प्रोत्साहित करती हुई सच्ची साहित्य साधना में 
लीन रहती हैं। 
सुगढ़ प्रस्तुति में सदैव नया का प्रयास करती है 
रचनाकारों का खुले हृदय से स्वागत करती है।
उनकी कलम जब भी चलती है प्रभावशाली 
रचनाओं का प्रादुर्भाव होता हैं।
उनके ब्लॉग 
 से मेरी पसंद की रचनाएँ
★★★★★★
आदरणीय रवींद्र सिंह यादव जी

सहज,सरल और सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी रवींद्र जी के 
पास ज्ञानवर्द्धक एवं रोचक जानकारियों का ख़ज़ाना है। 
बात चाहे राजनीति की हो , ऐतिहासिक हो, 
साहित्यिक हो या किसी समसामयिक संदर्भों में हो 
उनकी विलक्षणता सदैव प्रभावित करती है।
रवींद्र जी की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया 
सदैव मार्गदर्शन करती है। 
उनकी रचनाएँ समाज का दर्पण है। उनकी समसामयिक हलचलों को समाचार-काव्य में उकेरनी की विधा 
अपने आप में अनूठी है।
एक संवेदनशील कवि के मनोभावों की 
अनमोल कृतियों के संकलन उनके ब्लॉग  
"हिन्दी आभा*भारत"
से पढ़िये विचारणीय रचनाएँ
★★★★★★
आदरणीया पम्मी सिंह जी

गंभीर छवि रखने वाली पम्मी जी बेहद हंसमुख,परिष्कृत 
विचारों से युक्त और आत्मीय व्यक्तित्व की हैं।
उनकी सुरुचिपूर्ण प्रस्तुति का पाठकों को पूरे 
सप्ताह इंतज़ार रहता है। 
 पम्मी जी कम शब्दों में भावों की गरिमा का 
ख़्याल रखते हुये 
रचनाओं में गूढ़ अर्थ गूँथती हैं।
उनकी रचनाएँ अलग से पहचानी जा सकती है। 
रचनाओं के ज़ज़्बातों को उभारने में उनके पास  
उर्दू शब्दावली का समृद्ध भंडार है।
उनके ब्लॉग
 से रचनाएँ पढ़िये।
★★★★★★

आदरणीय कुलदीप सिंह ठाकुर 

हमारे परिवार के अति विशिष्ट व्यक्तित्व,बेहद सौम्य 
कुलीन विचारों से सुशोभित कुलदीप जी की 
प्रतिभा संपन्नता अचंभित करती है। 
समाज के ज्वलंत मुद्दों पर कुलदीप जी का  
गंभीर और सटीक चिंतन सदैव उद्देश्य पूर्ण है।
उनकी प्रस्तुति सदैव समसामयिक और प्रासंगिक 
होती है। उनके विचार ऐतिहासिक और 
सांस्कृतिक विषयों पर प्रभावित करते हैं।
कुलदीप जी के ब्लॉग 
 की रचनाएँ।
★★★★★
और अब हमारी नयी चर्चाकारा
आदरणीया मीना भारद्वाज 

"मीना भारद्वाज" जी की लेखनी
ब्लॉग जगत में अपनी अलग पहचान रखती है।
सहज,सरल,सुंदर और
सारगर्भित, सुरुचिपूर्ण शब्द संयोजन,
नपा-तुला भाव
उनकी रचनाओं की खासियत है जो 
पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ जाती हैं।
अनुशासनबद्ध विचारों को मोतियों की तरह
पिरोकर मनमोहक माला के रुप 
में पाठकों के समक्ष समर्पित करती हैं।
साहित्यिक कोई भी विधा सहजता से ग्रहण कर
इनकी लेखनी जादू बिखेरने में पूर्णतया
सक्षम है।
पढ़िये उनका ब्लॉग

★★★★★★

हमारे आदरणीय/आदरणीया चर्चा कारों के सम्मान में कहे गये 
मेरे भावों में कुछ त्रुटि रह गयी हो तो मैं करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ।
सादर आभार

शनिवार, 29 जून 2019

1443...डॉ. सतीश राज पुष्करणा


चित्र में ये शामिल हो सकता है: Satish Raj Pushkarna, पाठ

 कुछ समय से अस्वस्थ्य चल रहे हैं... शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हेतु कामना
जन्म : 05/10/1946, लाहौर (पंजाब) अब पाकिस्तान में... 73 साल के 
 स्वत्व समाचार डॉट कॉम के लिए अभिलाष दत्त जी द्वारा August 20, 2018 को लिया गया डॉ. सतीश राज पुष्करणा जी का महत्वपूर्ण साक्षात्कार के अंश
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, Satish Raj Pushkarna सहित, लोग खड़े हैं लाहौर से पटना आकर बसे सतीश राज पुष्करणा पिछले 45 साल से लघुकथा लिख रहे हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से लघुकथा सम्मान से सम्मानित पुष्करणा लघुकथा विधा की पहली समीक्षात्मक किताब “लघुकथा: बहस के चौराहे पर” लिख चुके हैं। स्वत्व समाचार डॉट कॉम के लिए अभिलाष दत्त ने उनसे बातचीत की।

1. आपका जन्म लाहौर (पाकिस्तान) में हुआ, वर्तमान में आप पटना में रह रहे हैं। इस सफ़र के बारे में बताइए।

उत्तर:- मेरे दादा परदादा लाहौर में मॉडर्न टाउन में 51 नंबर की कोठी में रहते थे। मेरे दादा जमींदार थे। उस समय भारत पाकिस्तान एक ही था। पिताजी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में रेलवे इंजीनियर थे। उसके बाद सन 47 में देश आजाद होते ही देश का बंटवारा हो गया। हमारा पूरा परिवार बग्घी पर बैठ कर मामा के साथ अमृतसर चले आए। उसके बाद हम लोग पिताजी के पास सहारनपुर चले गए। वहीं से मैंने मैट्रिक किया। इलाहाबाद के के.पी.इंटर कॉलेज से इंटर पास किया। आगे बी.एस.सी के पढ़ाई के लिए देहरादून के डी.बी.एस कॉलेज में दाखिला लिया। 1964 के जनवरी में शादी हो गयी। उसी साल नवंबर में पिता बनने का सुख प्राप्त हुआ।
श्रीमती जी के कहने पर नौकरी की तलाश शुरू की। मामा ने कहा उनके बिज़नेस में हाथ बटाऊँ। मेरा मन रिश्तेदारी में काम करने का बिल्कुल भी नहीं था। नौकरी की तलाश में पटना चला आया। पटना में यूनाइटेड स्पोर्ट्स वर्क में काम मिला 125 रुपये वेतन पर। छः महीने के बाद वह काम छूट गया। उसके बाद मखनिया में पटना जूनियर स्कूल में गया काम मांगने के लिए , वहाँ से उन्होंने मुझे सेंट्रल इंग्लिश स्कूल भेज दिया। इस स्कूल में केवल महिला शिक्षक को ही नौकरी पर रखा जाता था। मेरी श्रीमती जी को वहाँ नौकरी मिल गयी। स्कूल के बच्चे हमारे यहाँ ट्यूशन पढ़ने आने लगे। मैं खुद गणित और अंग्रेजी पढ़ाया करता था। उसके बाद अपना स्कूल खोला विवेकानंद बाल बालिका विद्यालय। 76 में अपना खुद का प्रेस , ‘बिहार सेवक प्रेस’ शुरू किया। 2001 में आधुनिकरण के अभाव के कारण प्रेस बन्द हो गया। प्रेस बन्द होने के बाद भी काम चलता रहा।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
हिन्दी लघुकथा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं और बाहर
लघुकथा का शीर्षक
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 7 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं
हिन्दी लघुकथा में जानकी वल्लभ शास्त्री का योगदान
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं, खड़े रहना, भोजन और अंदर
डॉ. सतीश राज पुष्करणा
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Satish Raj Pushkarna
संस्कार
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, Satish Raj Pushkarna सहित, लोग खड़े हैं


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, Satish Raj Pushkarna सहित, लोग खड़े हैं
><
अब बारी है विषय की
बड़ा ही क्लिष्ट काम है ये
सतहत्तरवाँ विषय

है

बारिश

उदाहरण कुछ भी नहीं
अपने मन से लिखिए
और एक खास बात 
आप चाहे तो अपनी पसंद के
फिल्मी या गैर फिल्मी बारिश के गीत का
 का ऑडियो या वीडियो भी
भेज सकते हैं।

अंतिम तिथि- 29 जून 2019
प्रलाशन तिथि- 01 जुलाई 2019
मजा है आज लिखिए
छपेगी अगले महीने
पर भेजिएगा ब्लाग सम्पर्क फार्म पर ही

शुक्रवार, 28 जून 2019

1442....मेरे राम को तुम बदनाम न करो

स्नेहिल नमस्कार
----------
कहते हैं भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
सोच नहीं होती,सोच पर पहरा नहीं होता
 खीर-सेवईयाँ,गलबहियाँ भूला बैठे, अब
बिना आतिश के कोई ईद दशहरा नहीं होता

★★★★★★

बेनाम चेहरोंं की भीड़ सुनो
मेरे राम को तुम बदनाम न करो
धर्मांधता की तख़्ती पकड़ने वालों
मेरे राम का ऐसा नाम न करो
हैंं करुणानिधि करुणाकरण जो
उनके नाम पे क़त्लेआम न करो
#श्वेता

चलिए आज की रचनाएँ पढ़ते हैं 
★★★★★

आदरणीय विश्वमोहन जी
कुटिल कौम!कैसी फितरत!!


प्राण वायु निष्प्राण जान-सी,
मारे- मारे फिरती है।

वसुधा के वल्कल-वक्ष पर,

किरण आग-सी गिरती है।


पेड़ों की सूखी टहनी का,
डाल-डाल मुरझाता है।
और फुनगी का पात-पात,
मरघट मातम सुर गाता है।

★★★★★

आदरणीया सु-मन जी


वक़्त के हाशिये पर देता रहा दस्तक

अनचिन्हा कोई प्रश्न, उत्तर की तलाश में

कागज़ फड़फड़ाता रहा देर तक

बाद उसके, थोड़ा फट कर चुप हो गया


आठ पहरों में बँटकर चूर हुआ दिन
टोहता अपना ही कुछ हिस्सा वजूद की तलाश में

★★★★★★

आदरणीया मीना भारद्धाज जी

चातक जैसी  तृष्णा ले कर
बूंदों से घट भरना कब तक

बढ़ आगे हक अपना पा ले
छुईमुई सा बनना कब तक
★★★★★★
आदरणीया उर्मिला जी

हर तार दिल का जख्मी है यहाँ ,वीणा वादनी 
ताल सुर में गीत कैसे निकले,ख़ुदा जाने।

हर रोज सूरज निकलता कोरे पन्नों के संग है
नफ़रतों के दौर में मोहब्बत कैसे लिखे ख़ुदा जाने।

★★★★★
और चलते-चलते प्रियंका श्री

पर ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि स्त्री चुप रहती है उसे कमजोर समझ कर उसका हनन आसान समझ लिया जाता है पर अब नही अबकी न स्त्री कमजोर है न वासना की वस्तु उसका स्वयं का अस्तित्व है जिसको अब बनाये रखने का जिम्मा उसने खुद उठाया है बस अब समझने की बारी उस समाज के लोगो की है जो स्त्री की न में हाँ समझ लेते है जबकि उसकी न का मतलब ही न होता है।
★★★★★★
आज का यह अंक आपको
कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।

हमक़दम के विषय में


कल का अंक पढ़ना न भूले कल आ रही हैं
आदरणीया विभा दी अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता सिन्हा

गुरुवार, 27 जून 2019

1441....धरा से नभ तक... पिघला सोना..

सादर अभिवादन,
समय का पहिया निरन्तर गतिमान है अपनी धुरी पर…
दिन के बाद रात और रात के बाद दिन…
"पाँच लिंकों का आनन्द" की प्रस्तुति हर दिन की तरह आज
भी आपके सम्मुख पेश है अपने चयनित लिंकों के साथ..


"दीदी पापा की मौत , तुम्हारी शादी और मेरे हॉस्टल जाने के बाद अब माँ अकेली ही तो रह गयी हैं। पिछली बार छुट्टियों में घर आया तो कामवाली आंटी ने बताया की वो किसी- किसी दिन कुछ भी नहीं बनाती। चाय के साथ ब्रेड खा लेती हैं या बस खिचड़ी। पूरे दिन अकेले उदास बैठी रहती हैं। तब उन्हें रोज ढंग का खाना खिलवाने का यही तरीका सूझा। मुझे फोटो भेजने के चक्कर में दो टाइम अच्छा खाना बनाती हैं। फिर खा भी लेती हैं और इस व्यस्तता के चलते ज्यादा उदास भी नहीं होती। "


नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता !


मेरी अम्मा तो (मैं नानी को अम्मा कहती थी ) मुझसे नाराज नहीं हो सकतीं ,जैसे कि गुड्डन और नीरू के घरवाले उन पर होते रहते हैं ,' मुझे यकीन था .मेरा यकीन निराधार भी नही था . जहाँ तक मुझे याद है, पहले नाराज होना तो दूर मैंने अम्मा  की आँखों में हल्की सी
रुखाई तक न देखी थी . ऐसे कितने ही मौके आए जब वे नाराज हो सकतीं थीं बल्कि उन्हें नाराज होना ही चाहिये था , पर नहीं हुई . मिसाल के तौर पर एक घटना बताना काफी होगा क्योंकि वह मेरी सचमुच बहुत बड़ी गलती थी ।

डूबा जल में
सुलगता भास्कर
दहकी झील !

फैला चार सूँ
धरा से नभ तक
पिघला सोना !

काश कि उस अँधेरे में
मैं यह समझ पाता
हर दुख के बाद
सुख अवश्य आता।
सुख का प्रकाश
सबको है लुभाता।
पर सच यह है -
सुख- दुख का परचम
सिक्कों के दो
पहलू  सा लहराता।

हम-क़दम का नया विषय

************
आप सब का दिन मंगलमय हो…
मीना भारद्वाज

बुधवार, 26 जून 2019

1440..व्यस्तताओं के जाल में..

।।प्रातः वंदन।।
हो प्रकृतस्थ : तनो मत
कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अंतःस्मित, अंत-संयत हरी घास-सी।
क्षण भर भुला सकें हम
नगर की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट
और न मानें उसे पलायन
और न सहसा चोर कह उठे मन में -
प्रकृतिवाद है स्खलन !
-अज्ञेय
〰️〰️
आज की लिंकों मेंं शामिल ब्लॉग के नाम क्रमानुसार पढे..✍
〰️〰️

कुछ बात करें !
शब्दों की मुस्कुराहट :)
सागर लहरें
राजीव उपाध्याय
विश्वमोहन उवाच
〰️〰️

 ऐसा हुआ है कि एक साथ कई तरह की बातें दिमाग से तेज़ी से होकर गुज़र जाएं और तुम उनकी रफ़्तार का पीछा ही न कर सको ! हफ्तों पुरानी चादर पर आलस में लिपटा धप्प से पड़ा हुआ मेरा शरीर मेरे दिमाग से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। ..
〰️〰️


अक्सर हो जाती है
इकट्ठी
ढेर सारी व्यस्तताएँ
और आदमी
फस जाता है इन व्यस्तताओं
के जाल में ..
〰️〰️

भावों के कलम से पीर नीर की लिखती हूँ
तपता सूरज तप्त धरा की पीर लिखती हूँ!
काट रहे उन वृक्षों को तुम ,जो छाया देते  हैं,
घिर घिर आते काले बादल लौट के जातें हैं

〰️〰️

मेरे घर का मेरा वो कोना
जो अब तुम्हारा हो चुका है
मुझमें तेरे होने की
वही कहानी कहता है
जो कभी माँ
〰️〰️
मेरे कण-कण को सींचते,
सरस सुधा-रस से।
श्रृंगार और अभिसार के,
मेरे वे तीन प्रेम-पथिक।

एक वह था जो तर्कों से परे,
निहारता मुझे अपलक।
छुप-छुपकर, अपने को भी छुपाये,
मेरे अंतस में, अपने चक्षु गड़ाए
〰️〰️
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
〰️〰️
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

मंगलवार, 25 जून 2019

1439 ...कभी कुछ अच्छा सुनाई दे तो अच्छा कहा जाये

ऊट-पटांग दिवस पर 
आप सभी को 
सादर अभिवादन...
आज हम हैं....
प्रस्तुति भी हम ही देंगे...
चलिए चलें आज की ताबड़-तोड़ प्रस्तुति देखें....


अभी जगजीत की गजलें सुनेंगे ...
अंधेरों को मिलेंगे आज ठेंगे
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे 

जो तोड़े पेड़ से अमरुद मिल कर 
दरख्तों से कई लम्हे गिरेंगे

किसी के होंठ को तितली ने चूमा
किसी के गाल अब यूँ ही खिलेंगे

घन .....

पवन की पालकी
सवार होके घन,
निकले शान से।

काले कजरारे
नीर भार भरे घन,
नेह करे, दामिनी से।

मुहब्बत का श्री गणेश ....

हुस्न का बेहतर नज़ारा चाहिए ।
कुछ तो जीने का सहारा चाहिए ।।

हो मुहब्बत का यहां पर श्री गणेश ।
आप का बस इक इशारा चाहिए ।।

हैं टिके रिश्ते सभी दौलत पे जब ।
आपको भी क्या गुजारा चाहिए ।।

शौक .....
कुछ पूरे होते गए कुछ बिखरते गए
कुछ को तो मैने चुपके से जी लिया।
गीली मिट्टी की सौंधी सी खुशबू  लेने का शौक बहुत था 
बचपन मे आज वो शौक अपने घर मे लगे 
चार गमले मे पानी डालते वक्त पूरा कर लेती हूं,

रिक्शे वाला ....

मैं न प्रेमी हूं 
न आशिक हूं 
न मंजनू हूं 
न दीवाना हूं
मेरा काम है 
सुबह से सड़कोँ पर 
मनुष्य की मनुष्यता को ढ़ोना 
रोज कमाना
रोज खाना

इच्छाएँ ....
Fall, Autumn, Red, Season, Woods, Nature
इच्छाएँ घुमावदार जंगल जैसी हैं,
पहले थोड़ी सी दिखती हैं,
जब वहां पहुँच जाओ,
तो थोड़ी और दिखने लगती हैं,

चलते -चलते
एक जूनी खबर..

मान भी लेते हैं 
लिख लेगा दो चार 
बेकार की बातों 
के कुछ पुलिंदे 
पढ़ने को कौन 
आयेगा क्यों आयेगा 
और आखिर कब 
तक आ पायेगा 

लिखना पढ़ना तो 
बौद्धिक भूख 
मिटाने के लिये 
किया जाता है 
-*-*-

अब बारी है विषय की
बड़ा ही क्लिष्ट काम है ये
सतहत्तरवाँ विषय

है

बारिश

उदाहरण कुछ भी नहीं
अपने मन से लिखिए
और एक खास बात 
आप चाहे तो अपनी पसंद के
फिल्मी या गैर फिल्मी बारिश के गीत का
 का ऑडियो या वीडियो भी
भेज सकते हैं।

अंतिम तिथि- 29 जून 2019
प्रलाशन तिथि- 01 जुलाई 2019
मजा है आज लिखिए
छपेगी अगले महिने
पर भेजिएगा ब्लाग सम्पर्क फार्म पर ही
......
आदेश दें
दिग्विजय


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