निवेदन।


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रविवार, 21 जुलाई 2019

1465...मैने वक़्त की जेब से ‘सावन’ चुरा लिया

जय मां हाटेशवरी......
पतझड़ दिया था वक़्त ने सौगात में मुझे
मैने वक़्त की जेब से ‘सावन’ चुरा लिया
सादर अभिवादन.....
अब पेश है.....
मेरी पसंद के कुछ लिंक.....

मुक्तक : - फाड़कर

कुछ आपके वहाँ का ,
कुछ मेरे भी यहाँ का ,
जानूँ न कैसा-कैसा ,
जाने कहाँ-कहाँ का ?
आँखों से अपनी चुन-चुन
देखो मैं बेच घोड़े ,

महात्मा गांधी के जीवन के 41 रोचक तथ्य ( interesting facts about Mahatma Gandhi)

15) गांधी जी को 1948 में नोबल पुरष्कार के लिए चुना गया था किन्तु पुरस्कार मिलने से पहले ही उनकी हत्या हो गई। फलस्वरूप नोबल कमिटी ने पुरस्कार उस साल किसी
को भी नहीं दिया। हालांकि उन्हें कुल 5 बार नोबल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था।
16) गांधी जी समय के इतने पाबंद थे कि उन्हें ‘मिनटों का दास’ कहा जाता था।
17) उन्हें ''महात्मा'' की उपाधि रवींद्र नाथ टैगोर ने दी थी।
18) उन्हें ''राष्ट्रपिता'' की उपाधि सुभाषचंद्र बोस ने दी थी। जब नेताजी के समर्थकों ने इस बात पर नाराजगी जताई तब नेताजी ने कहा था कि मेरे गांधी जी से मतभेद
हैं मनभेद नहीं हैं। मैं उस आदमी को महात्मा इसलिए कहता हूं कि उस आदमी की उपस्थिति मात्र से मन में नैतिकता का संचार होने लगता हैं। न जाने इस व्यक्ति में
कैसा आकर्षण हैं कि कितना भी हिंसक आदमी उसके सामने आकर बैठे वो अहिंसक हो जाता हैं।

दुःख का अंधकार ठहरा ही रहेगा!
मेरी फ़ोटो
दीप जलाने को उद्धत
अबोध मन

नहीं जानता मन 

कि
हर हलचल
हर खलल के बाद

फिर वही ठहराव होगा पानी की सतह पर
वैसे ही जैसे दुःख ठहर जाएगा फिर फिर


ज़रा पढ़ना दिल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता

अब विदा लेती हूं दोस्त विदाई के इन पलों के शुक्रिया करना चाहती हूँ शुक्रिया करना चाहती हूँ उस आहट का जिसके आने से जीने की उमंग आती थी, जिंदगी में सलीका
आता था, आती थी रोहानी खुशबू और आता था अपने को शेष रखने का भाव।
यहां से सिर्फ मैं नही जाऊंगी दोस्त 'हम' जाएंगे कहां छोड़ा तुमने कभी अकेला न अलसाई सी सुबह में न भींगती रातों में न पूर्ण चांद में न अमावस में।अब हर पल तुम
मेरे साथ ही रहोगे ।

औरतें प्रेम में तैरने से प्यार करती हैं.....
ऐसा नही था कि
वह रोमांटिक नही थी..
पर दमन भी तो था उतना ही

तुम्हे देख
बह निकली थी अदम्य वेग से
समन्दर को लपकती है जैसे नदी



लाखामंडल का शिव मंदिर

अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं, जो पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है। मंदिर के अंदर एक चट्टान पर पैरों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें देवी पार्वती के पैरों के चिन्ह माना जाता है। मंदिर के अंदर भगवान कार्तिकेय, भगवान गणेश, भगवान विष्णु और हनुमान जी की मूर्तियां भी स्थापित हैं।   

‘ज़िंदगी’

‘ज़िंदगी’
जी भर कर तन्हा कर दे मुझे
वादा है..
तुझसे मोहब्बत करती रहूँगी ।

आज बस इतना ही.....
अगले सप्ताह फिर मुलाकात होगी....
पर कल आना मत भूलना......
कल होगा हम-क़दम का अस्सी नम्बर का अंक....

 धन्यवाद।





शनिवार, 20 जुलाई 2019

1864... अधजल गगरी छलकत जाय


:न ठहरने की है मियाद का पता
न जाने की इज़ाज़त जरुरी।
ज्योति स्पर्श
:हाय-तौबा मची जाने क्या-क्या ले जाएंगे
छीना-झपटा बटोरा यहाँ, वहाँ भी पायेंगे।
विभा रानी




आखिर कब तक चलेगा ये सिलसिला   ? बिना सिर पैर के कुछ भी बको  ? 
लल्लन जी आये दिन  नेताओ के उल्टे पुल्टे बयानों से  परेशान होकर कहने लगे
कि  गीता मे भी कहा गया है ।" न हि ज्ञानेन संदृशं पवित्र मिह विद्यते "
अर्थात् - ज्ञान से अधिक पवित्र संसार में कुछ भी नही है ।
कलयुगी गीता में  अज्ञानी  और ज्ञानी के बिच में 
तथाकथित महाज्ञानी का पाया  जाता है l

अधजल गगरी छलकत जाय पर कहानी के लिए इमेज परिणाम

अधजल गगरी छलकत जाए - दादी नानी की कहानियाँ

समस्या तब उत्पन्न हुई, जब वह नदी के किनारे पहुंचा। किसान को तैरना नहीं आता था।
वहां नावें भी नहीं थी। सो उसके पास एक ही रास्ता था कि वह नदी उन्हीं स्थानों से पैदल पार करे,
जहां पानी की गहराई बहुत कम थी। मगर उसके सामने एक दूसरी समस्या यह थी
कि उसे यह नहीं मालूम था कि नदी में किस स्थान पर पानी की गहराई कम है।

अधजल गगरी छलकत जाय

अधजल गगरी छलकत जाय पर कहानी के लिए इमेज परिणाम

अधजल गगरी छलकत जाय

आजकल अपने धन से लेकर दान-पुण्य, समाजसेवा, आध्यात्मिक व धार्मिक रुचि
एवं बौध्दिक क्षमता का बढ-चढक़र बखान करने वालों की कोई कमी नहीं है
बल्कि देखा जाए तो ऐसे लोगों की संख्या में इतनी तेजी से बढाेतरी हो रही है
कि कभी-कभी ऐसीर् ईष्या होने लगती है कि हमारे देश का विकास इस गति से
क्यों नहीं हो पाता। परंतु फिर एक संतोष भी होता है कि देश का
विकास इतना खोखला होने से तो धीमी गति से होना ज्यादा अच्छा है।
अधजल गगरी छलकत जाय

><
अब बारी है विषय की
हम समझते हैं कि 
यह विषय पहले भी दिया गया है
कॉपी नहीं चलेगी..
अस्सी नम्बर का विषय
अहसास
उदाहरणः
सुनो ना !
सोचा है आज
तुम तनिक अपने
मन की राई से
प्रेम का तेल
बहने दो ना जरा ...
रचनाकार सुबोध सिन्हा


अंतिम तिथि-20 जुलाई 2019(सायं 3 बजे तक)
प्रकाशन तिथि- 22 जुलाई
प्रविष्ठियाँ ब्लॉग सम्पर्क प्रारूप पर ही मान्य

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

1463...प्रश्न को उत्तर से निकलते देखा है...


सादर अभिवादन। 

प्रश्न को उत्तर से निकलते देखा है, 
कहाँ रहती आयी ग़रीबी की रेखा है,
अवसर की तलाश में बैठे मत रहना, 
गुज़रा हुआ कारवाँ किसने देखा है!  
-रवीन्द्र 


आइए आपको अब आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-


 

किन यादों को धरती के, आंचल में दबा कर तज दूँ
किन स्मॄतियों को हदय के, पन्नों में अंकित कर लूँ
क्या विरक्त हो जायेंगी, या नवप्रभा भोर की देखेंगी
क्या मेरी बचपन गाथा में, अनुरक्ति किसी की होगी
नवप्रभात का आगमन, कुछ संशय भी संग लाया है
कुछ दुविधा में मन मेरा, क्या छोडूं और क्या बांधू


My photo 

   दिल्ली की सडकों पर रोड़ रेज बहुत है
किन्तु सड़क पर यह समाजवाद देखकर ,
हमारी आँखों में कम्बख्त आंसू भर आये।  


 

एहसास है मुझे,

उन आंसुओं का..
जो तेरी आंख से बहे..
उस टूटे हृदय का..
उस वेदना का..
उस तड़प का..


 

रेशम की डोरी वो मखमल का आलना
कुहके तो मन के सब तारों का हालना
चुन-चुन के काँटें मैं अँचरा में भर लूँगी
बिटिया तू पाँव दूब राहों में डालना


बरगद का पेड़नीचे लोग बैठे हैं। रात में क्रांति के घर से मारपीट की आवाज आ रही थी उसका भाई उसे मार रहा था। वही जायदाद वाला कहानी । देखो कहानी कैसे खत्म हुई।  अच्छी लड़की थी। ......  वो।    नायरा तू इतना नमक क्यों डालती है खाने में ?    घर के सभी लोगों का बी पी बढ़ा देगी।  कम नमक डाला कर।
माँ….बिना नमक मजा नहीं आता खाने में।  ठीक है जल्दी से काम कर सारा दिन घर में बैठी रहती है। कभी कहीं बाहर भी जाया कर।

 दरवाजे पर आवाज आई नायरा है क्या?



हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

1462 ....माछी को जल- तुरई कहत हैं.’

स्नेहिल अभिवादन
--------
प्रकृति का असहज रुप,
अतिवृष्टि से बेहाल देश के पाँच राज्यों के 
निवासी बाढ़ की मार झेल रहे हैं।
हम रटा रटाया वही प्राकृतिक आपदा को दोष देकर सारा ठीकरा नियति के सर फोड़ देते हैं।
बाढ़ से पीड़ित जन-जीवन की व्यथा समझने 
का ढ़ोंंग करने के सिवा हम करते ही क्या है।
एक सामान्य बात की तरह बाढ़ की भयावहता को नज़रअदाज़ करने की आदत पड़ गयी है हमें। काश! कि उस विषम परिस्थितियों से जूझने को विवश लोगों की समस्या
जड़ से समाप्त करने की दिशा में कोई ठोस और सार्थक प्रयास कर पाते  वर्ल्डकप जीतने के हार जीत वाले उत्साह जैसा कुछ।

चलिए आज की रचनाएँँ पढ़ते हैं- 

वहम

सारे रास्ते गोलार्द्ध चाँद
आकाश के गोद से
नन्हे बच्चे-सा उचकता
मुलुर-मुलुर ताकता
एक सवाल मानो पूछता रहा
अनवरत .... कि ....
मेरे रौशन पक्ष केवल देखकर
एक वहम क्यों पाल लेते हो भला

★★★★★★
एक्वारजिया

ज़िंदगी की झील में
बुदबुदाते ग़म
और उसका प्रतिफल
जैसे सांद्र नाइट्रिक अम्ल और
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का ताजा मिश्रण
एक अनुपात तीन का समिश्रण
उफ़!धधकता बलबलाता हुआ
सब कुछ
कहीं स्वयं न पिघल जाएँ
दुःख दर्द को समेटते हुए

★★★★★★

मेघ है आकाश में कितने घने

चिर प्रतीक्षा बारिशों की हो रही   
बूँद अब तक बादलों में सो रही
हैं हवा में कागजों की कत-रने
मेघ हैं आकाश में ...

कुछ कमी सी है सुबह से धूप में
आसमां पीला हुआ है धूल में  
रेड़ियाँ लौटी घरों को अन-मने
मेघ हैं आकाश में ...

★★★★★★

बेटी सुख का सार

बेटी को इस जगत में, बेटा कहा पुकार।
जगदम्बा  का  रूप है, बेटी तो उपहार।।
--
बेटी बतलाती हमें,ख़ुशियों का सब सार।
बेटी के बिन मनुज का, जीवन है बेकार।।
--
★★★★★★

सत्यमेव जयते

आज भी मंदिरों में
देवी की मूर्ति के सामने
मिथ्या भक्ति का ढोंग रचाने वाले
पाखंडी 'सदाचारी' लोग 
निर्बल असहाय नारी को
अकेला देख उस पर
वहशी दरिंदों की तरह
टूट पड़ते हैं,

★★★★★★

भीग चले हैं, हृदय के कोर,
कोई खींच रहा है, विरहा के डोर,
समझाऊँ कैसे, इस मन को,
दूर कहाँ ले जाऊँ, इस बैरन को,
जिद करता, है ये जाने की,
हर पल, तेरी ही ओर!

★★★★★★
शाकाहार

बाबा अपना त्रिनेत्र खोलकर दहाड़े 
माछी-भाततू तो ख़ुद को भगत बता रहा था,अब ये माछी-भात कहाँ से आ गया?’
महाराज ने उन्हें समझाया 
साहेबमाछी में कौनों दोस नाहीं होत है. बंगाले में तो माछी को जल- तुरई कहत हैं.

★★★★★★

आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की
प्रतीक्षा रहती है।

हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए

कल का अंक पढ़ना न भूलै
कल आ रहे हैं रवींद्र जी
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता सिन्हा
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