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सोमवार, 16 दिसंबर 2019

1613..हम-क़दम का 99 वां अंक .....अलाव

सोमवारीय विशेषांक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
------
अलाव हमक़दम का पहला विषय था-
चलिये कुछ स्मृतियों को ताज़ा करते हैं कुछ नयी संजोते हैं-
अलाव
सर्दी के मौसम में तापने के लिए किसी स्थान विशेष पर जलाई गयी आग। 
परंपरागत रूप से हम अलाव को ग्रामीण जीवन का अंग मानते आये हैं जहाँ ग्रामीण सुबह-शाम जलते-सुलगते अलाव के पास एकत्र होते हैं और वहाँ विभिन्न प्रकार की चर्चाओं में समय गुज़ारते हैं।अनेक शंकाओं का समाधान, प्रश्नों का हल,चुहलबाज़ी, ताज़ा समाचार 
आदि सब अलाव पर मिलते हैं लोगों को। आग जलाने के लिए अनुपयोगी लकड़ी,कंडे, फूस, फ़सल का खरपतवार आदि इस्तेमाल किये जाते  हैं।  किन्तु अब अख़बारों में भी यह शब्द हमारा ध्यान खींचता है जब शीत ऋतु की प्रचंडता होने पर नगरीय निकाय बेसहारा लोगों के लिए अलाव का प्रबंध करते हैं। अब तो शहरी जीवन में 
भी अत्याधुनिक अलाव अस्तित्व में हैं। 

#रवींद्र सिंह यादव
 ★★★★★★

जीवन एक अलाव से कम नहीं
धीमी-धीमी सुगबुगाहट की
हल्की मीठी आँच
मासूम बचपने-सा सुकून देती है
फिर तेजी से दहकती है आग
पूरी जवानी के जोश-सा
फिर धीरे-धीरे मद्धिम पड़ जाती
है आँच
बढ़ते बुढ़ापे की तरह
और अंत में बुझ जाता है अलाव
बच जाती है राख़ मुट्टीभर
अनंत सागर में प्रवाहित होने को।
#श्वेता


सर्वप्रथम दो
दो कालजयी रचना पढ़ते हैंं-

माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन
अलाव के ताव के घेरे के पार
सियार की आँखों में जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है : मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन !
अज्ञेय

-------///------

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकीं
तुमने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दी
रात भर जो मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

गुलज़ार

★★★★★

आदरणीय साधना वैद
ठण्ड की रात
भारी अलाव पर
छाया कोहरा !

सीली लकड़ी
बुझता सा अलाव
जला नसीब !

★★★★★★

सर्दी की रात 
ठिठका सा कोहरा 
ठिठुरा गात ! 

मंदा अलाव 
कँपकँपाता तन 
झीने से वस्त्र !

तान के सोया 
कोहरे की चादर 
पागल चाँद ! 

★★★★★

आदरणीय अनुराधा चौहान
घर-आँगन चौबारे में 
अलाव के सामने
हाथों को सेंकते 
लोगों की टोली बैठ जाती
सुबह की चाय की चुस्की के साथ
गपशप करते
बातों से सर्दी के अहसास
बांटने में लगे रहते

★★★★★★★

आदरणीय कुसुम कोठारी
अच्छा लगता है ना जाडे में अलाव सेकना,
खुले आसमान के नीचे बैठ सर्दियों से लडना,
हां कुछ देर गर्माहट का एहसास
तन मन को अच्छा ही लगता है,

★★★★★★★

आदरणीय शुभा मेहता
पूस की ठिठुरती रात में 
बैठ जाते अलाव जलाकर 
जिनका न कोई ,ठौर -ठिकाना 
ना बिस्तर ,ना कंबल 
आग सेकते..
कुछ कुत्ते -बिल्ली भी साथ में
ठंडी हवाएं ,ठरता अलाव  

★★★★★★★

आदरणीय सुजाता प्रिय
अलाव के निकट ...

.
निकट बगीचे से मंगली चाची,
सुखी लकड़ियाँ बीनकर
लायी।शाम ढली तो
वह घर के आगे,
उसे जोड़कर
अलाव
जलायी।
अलाव देखकर लक्ष्मी दादी,
लाठी टेक लपकती आई।

★★★★★★

आदरणीय अनीता श्रीवास्तव
अलाव

देखो ये कैसी विडंबना है
कोई पहाड़ों पर घूमने जाये
कोई ठंड में जान गवाएं ।
अलाव,कंबल का करें इंतजाम 
सब मिल गरीबों की 
शीत भगाएं।
आओ शिशिर ऋतु को 
मोहक बनायें।

★★★★★★


आदरणीया उर्मिला सिंह
अलाव जलता

माघ की सर्दी 
फटा कंबल 
पिछले साल की रजाई 
जगह जगह से निकलती रुई 
बच्चे कुछ घास-फूस 
कुछ पतली लड़किया लाते 
अलाव जलाते..
उसे घेर के बैठ जाते सभी
सुखी लकड़ियां जलती
बदन में जब गर्मी आती 
तो भूख  का अलाव 
जलने लगता....... 

★★★★★★

आदरणीयाअभिलाषा चौहान
जलने लगे अलाव

दुनिया में कोई ठांव
चाय की हैं चुस्कियां

चर्चाओं के दौर
ऐसे भी कुछ लोग हैं
जिन्हें कहीं नहीं ठौर
दिन में धूप पहनते
रात को ओढ़े अलाव

★★★★★

आदरणीया रेणुजी
अपनेपन  के दावे उनके -
हकीक़त नहीं फ़साने थे  ,
सब अपनों को लिए थे साथ -
बस एक  हमीं बेगाने थे ;
पर जाने क्यों  वो  झांकने लगते   - 
मेरे मन के उजले दर्पण में  ?

★★★★★

आदरणीया मीना शर्मा 

पिता के झुकते कंधे,
माँ की उम्मीदभरी आँखें
कैसे करे वो सामना ?
आज भी ना मिली नौकरी !
तमाम डिग्रियाँ,आग में झोंककर
लगाया उसने जोरदार कहकहा,
सिसकता रहा अलाव !!!
★★☆★★

आदरणीय सुशील सर

धीमे धीमे
अन्दर कहीं
सुलगती
हुई आग
बाहर की
आग से जैसे
जान पहचान
लगवाना
चाहती हैं

आदरणीय सुबोध सिन्हा

लपलपाती लौ लिए चटकती चिता
या फिर ख़ुशी बटोरे आई होली के पहले
फ़ाल्गुनी पूर्णिमा की जलती होलिका
या फिर गाँव-शहर का हो रावणदहन
संग पहने आतिशबाज़ी का जामा
सेनाओं की उत्सवाग्नि हो या फिर ..
बलात्कार के बाद गला घोंटी हुई
या कराहती .. छटपटाती .. अधमरी-सी ज़िन्दा
सरे राह जलाई गई निरीह कोई बाला

★★★☆★★★

आज का हमक़दम आशा है आपको
पसंद आया होगा।
आपकी प्रतिक्रियायें
उत्साह बढ़ाती है।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।




क्यूँ नहीं बुझते शोलों से
चिंनगारियों के
एक-एक कतरे को उठाकर
अंधेरे जीवन की डगर पर
चल पड़ते है,
छीनने अपने हिस्से का सूरज
जिसकी रोशनी से
 उजाला भर जाये
कुहरे भरे जीवन में
और नरम धूप भरे
उनकी बर्फीली ठंडी रातों में...।

#श्वेता


19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति।सभी रचनाएँ काफी प्रभावशाली एवं आकर्षक।सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।मेरी रचना को साझा करने के लिए हार्दिक धन्यबाद एवं आभार।

    जवाब देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात...
    बढ़िया लेखन.
    आज के अलाव से..
    आने वाली ठण्ड भाग गई..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. 100वें अंक के लिये शुभकामनाएं। आभार श्वेता जी आज के लाजवाब अंक में जगह देने के लिये।

    जवाब देंहटाएं
  4. अति सुंदर प्रस्तुति ,अलाव के कई रंग ,एक से बढ़ कर एक
    मेरी रचना को साझा करने के लिए आभार

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह !श्वेता सुंदर , गरमाहट देती हुई प्रस्तुति । मेरी रचना साँझा करने हेतु धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्वेता जी।

    जवाब देंहटाएं
  7. रचनाओं के माध्यम से कड़कती ठंढ में अलाव की गर्मी महसूस की जा सकती है शानदार प्रस्तुति मेरी रचना को शामिल करने के लिये तहेदिल से आभार!

    जवाब देंहटाएं
  8. आज के हमक़दम इस अंक में मेरी रचना को शरीक करने के लिए आपका आभार और नमन .. साथ ही आपकी शुरूआती पंक्तियों -
    जीवन एक अलाव से कम नहीं
    धीमी-धीमी सुगबुगाहट की
    हल्की मीठी आँच
    मासूम बचपने-सा सुकून देती है
    फिर तेजी से दहकती है आग
    पूरी जवानी के जोश-सा
    फिर धीरे-धीरे मद्धिम पड़ जाती
    है आँच
    बढ़ते बुढ़ापे की तरह
    और अंत में बुझ जाता है अलाव
    बच जाती है राख़ मुट्टीभर
    अनंत सागर में प्रवाहित होने को।
    को पुनः नमन .. इस के एक मानव ही नहीं ब्रह्माण्ड के हर प्राणियों के जीवन-सार को और मर्म को शब्द-चित्र की तरह चित्रण के लिए ..
    सभी रचनायें एक से बढ़ कर एक .. सभी को नमन

    जवाब देंहटाएं
  9. बेहतरीन प्रस्तुति , सभी ने अपनी अपनी लेखनी से भावनाओं का जो आलावा जलाया हैं उस की गर्माहट बिलकुल उस सुनहरी धुप की तरह हैं जो कड़ाके की ठण्ड में गुनगुनी गर्माहट दे जाती हैं।श्वेता जी की लिखी चंद पंक्तियों ने तो अलावे के माध्यम से जीवन के तीन चरणों का बहुत ही सार्थक उदाहरण पेश किया हैं। सभी रचनाकारों को ढेरो शुभकामनाएं एवं सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत ही खूबसूरत भूमिका रवीन्द्र जी ! सर्दी और अलाव का साथ शाश्वत है और आदिकाल से चला आ रहा है ! आँच की ज़रुरत सभी को होती है सर्दी दूर भगाने के लिए ! आधुनिक लोग रूम हीटर के रूप में अलाव का आनंद लेते हैं तो कुछ लोग कोयले की अंगीठियों से अलाव का काम लेते हैं लेकिन जो मज़ा और रौनक लकड़ियों वाले अलाव में होती है उसकी बात ही कुछ और है ! सूखी लकड़ियों से जब ऊँची ऊँची लपटें उठाती हैं तो अलाव का मज़ा दोगुना हो जाता है ! बहुत सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज का हमकदम ! मेरी दोनों रचनाओं को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

    जवाब देंहटाएं
  11. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार सखी सादर

    जवाब देंहटाएं
  12. सौवें कदम पर सजे अलाव की गुनगुनी ऊष्मा में गरमाते सभी हमकदमों को बधाई!!!

    जवाब देंहटाएं
  13. सौवें कदम पर सजे अलाव की गुनगुनी ऊष्मा में गरमाते सभी हमकदमों को बधाई!!!

    जवाब देंहटाएं
  14. स्तब्ध रहती हूँ सदा नवीन प्रस्तुतीकरण पर

    जवाब देंहटाएं
  15. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  16. प्रिय श्वेता,सार्थक भूमिका जिसमें रविंद्र जी की वो अनमोल टिप्पणी भी है, जिसने हमकदम जैसे सार्थक सृजन की शृंखला की शुरुआत की थी, को आज देखकर अपार खुशी हुई। सांझी संस्कृति का प्रतीक है अलाव , जिसे जीने
    वालों ने सर्दी मे गर्माहट के साथ किस्सागोई और कहानियों का खूबआनंद लिया। आज की सभी रचनाएँ शानदार हैं, पर सुबोध जी की रचना विशेष उल्लेखनीय है।हमकदम के सौंवे कदम की आहट है और आज सभी 99वां अंक मुबारक हो । हमकदम जी बहाने बहुत उम्दा सृजन हुआ है। मैंने भी कई रचनाएँ इसके बहाने लिखी, जो मेरे ब्लॉग पर अत्यंत लोकप्रिय रचनाओ में शामिल हैं। उन्ही में से एक हमकदम के पहले विषय अलाव पर लिखी गयी थी, उसी रचना को मंच ने आज के लिए फिर से चुना, जिसे लिए कोटि आभार। सभी सहभागियों ने सुंदर सृजन किया है । सभी को बधाई और शुभकामनायें । तुम्हें भी आभार भावपूर्ण भूमिका और कालजयी रचनाओ का स्मरण करने के लिए मंच को प्रणाम और आभार 🙏🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  17. 'हमक़दम'का सौवां अंक ही क्या, हज़ारवां अंक भी निकलेगा. जब सहृदय बुद्धिजीवी साहित्य-सृजन हेतु समर्पित हों तो सब शुभ ही शुभ होता है और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा. मेरी ढेरों शुभकामनाएँ.

    जवाब देंहटाएं
  18. अलाव हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा है, और सदियों से इसे खुशियों का प्रतीक मान "केम्प फायर" "बोन फायर" के रूप में सर्दियों मे सांस्कृतिक उत्सवों के साथ जोड कर सारे संसारिक प्रारब्द्धो से कुछ समय दूर हो, एक गहरा सुकून और पुनः तरोताजा सा महसूस कर, नई सांसारिक भुल भुलैया में स्वयं को बेहतर तरीके से फिर से स्थापित कर जीवन युद्ध में चल पडने की नव उर्जा है।
    पर गरीब और भुख के लिये अलाव गर्मी देने का या भोजन पकाने का साधन मात्र बन कर रह जाता है, रद्दी कागज और जलाने लायक कुछ भी जलाकर ठिठुरती ठंड से निजात का भ्रम है, और एक पंथ दो काम उसी मे रोटी खिचड़ी शकरकंद आलु और मुंगफली भुन कर अपनी-अपनी पहुंच के हिसाब से आनंद लेते है, और साथ ही समूह में बैठ गर्मा गरम गपशप और नोकझोंक का मजा, सब विस्मृत करके।

    बहुत सुंदर सार्थक भुमिका पहले अंक की याद को ताजा करती कुछ पुरानी और ज्यादा नयी रचनाओं का सुंदर संगम ।
    सभी रचनाएं बहुत सुंदर सार्थक।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय से आभार।

    जवाब देंहटाएं

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