निवेदन।


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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

1141....गाँधी तेरे बन्दर अब भी, अन्धे-गूँगे-बहरे हैं

एक साहित्यकार की क़लम में युगचेतना का ओज भरा होता है। 
साहित्य के बिना समाज की सांस्कृतिक और देश की सभ्यता मात्र 
एक भ्रम के सिवा कुछ नहीं। राष्ट्र का सर्वांगीण विकास साहित्य 
के साथ के बिना सार्थक नहीं हो सकती।

साहित्यिक संवेदना, अनुभूति, प्रेरणा समाज को चिंतनशीलता 
प्रदान करती है। साहित्य विचारों की सूक्ष्मता और व्यापकता 
को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है।

मैं इस मंच के माध्यम से नियमित प्रस्तुति के साथ साहित्य के दैदीप्यमान, कालजयी, सितारोंं  की कुछ रचनाओं को 
आप से साझा करने का प्रयास करुँगी।  इस कड़ी में 
आज पढ़िए आदरणीय हरिवंश राय बच्चन की रचनाएँ-

रचता मुख जिससे निकली हो
वेद-उपनिषद की वर वाणी,
काव्य-माधुरी, राग-रागिनी
जग-जीवन के हित कल्याणी,

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो

कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

बाल कविता
उजला-उजला हंस एक दिन
उड़ते-उड़ते आया,
हंस देखकर काला कौआ
मन ही मन शरमाया।

मधुशाला/भाग-१
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।
सादर नमस्कार

अब चलिए आज की  नियमित रचनाओं के संसार


"अपनी हिन्दी"..... आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
अंग्रेजी भाषा के हम तो, 
खाने लगे निवाले हैं

खान-पान-परिधान विदेशी, 
फिर भी हिन्दी वाले हैं

अपनी गठरी कभी न खोली, 
उनके थाल खँगाल रहे

आदरणीया कुसुम जी की लिखी वर्ण पिरामिड


ये
स्वर्ण
आलोक
चोटी पर
बिखर गया
पर्वतों के पीछे
भास्कर मुसकाया।
★★★★★
आदरणीय अमित निश्छल की लेखनी से


मानवता का मोल नहीं है

अन्यायों का आधार नहीं?

पिघल रहा हिमगिरि भी देखो

तप्त, उनके अश्रु प्रवाहों से,
धरती पानी में डूबी है
किंचित अनिष्ट आगाहों से।
★★★★★


आदरणीय दिलबाग सिंह विर्क जी की लिखी प्रभावी ग़ज़ल

किसी को पूजने की ग़लती न करो लोगो 
जिसको भी पूजा गया, वही ख़ुदा हो गया। 

तमन्ना रखे है कि मिले इसे कुछ क़ीमत 
हैरां हूँ, मेरी वफ़ा को ये क्या हो गया।
 ★★★★★
आदरणीया प्रतिभा जी की
ओजपूर्ण लेखनी से
खेल


कुछ सड़क पर उतरकर खेल रहे हैं

कुछ न्यूज़ रूम में बैठकर

कुछ चौराहों पर,

कुछ चाय की गुमटियों पर
कुछ कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए खेल रहे हैं
कुछ दांत भींचते हुए खेल रहे हैं स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर
फेसबुक पर भी हैं बहुत से खिलाड़ी

★★★★★
और चलते-चलते पढ़िए
आदरणीय रवींद्र जी की समसामयिक सारगर्भित रचना
संघर्ष


हमारी क़लम तेरे लिये
 चमचमाती शमशीर है 
जिगर फ़ौलादी हो गया है 
हालात से लड़ते-लड़ते 
नहीं जीना हमें गवारा 
अब मौत से डरते-डरते 
★★★★★
आज  की प्रस्तुति आपको कैसी लगी?
कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया अवश्य 
दीजिएगा।

इस सप्ताह के हमक़दम का विषय
जानने के लिए


कल आ रही अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ
आदरणीय विभा दी

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

1140...ख़ुशनुमा बयार की सौग़ात का मौसम ....

सादर अभिवादन। 
बरसात का मौसम 
मख़मली एहसासात का मौसम 
ख़ुशनुमा बयार की सौग़ात का मौसम 
आपदा-विपदा की बात का मौसम
मौसमी बीमारियों की बरसात का मौसम। 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं -  


फासले ऐसे नदारद हुए जिन्दगी से 
खुशनुमा-खुशनुमा हर पल आज है
जबसे आए हो इस वीरां ज़िन्दगी में
तब से सारा शहर लगता आबाद है,




मेरी फ़ोटो

कम्फर्ट जोन से बाहर   
अथाह परेशानियाँ   
मगर असीम संभावनाएँ   
अनेक पराजय   
मगर स्व-अनुभव   
अबूझ डगर   
मगर रंगीन मौसम    



जहां से तुझे यूँ जुदा करके देखा
तू पत्थर था तुझको खुदा करके देखा !
ये अहसास था, या थी कोई हकीकत
चमकते सितारों को पाने की चाहत !
यही चाह मेरी, मेरा जुर्म है अब !
यही राह मेरी, मेरा जुर्म है अब !





इश्क़ के बारे में कुछ मत पूछ ये ही जान ले
इश्क़ जिस पत्थर को छू ले वो खुदा बन जायेगा
तोड़ने वाले मेरा दिल, सोच ले पहले जरा
दिल नहीं है कोई बूत जो दूसरा बन जायेगा



बे-परवाही शौक है या हो आदत
कर देती स्वाभिमान को आहत
अनवधान इतने तो नहीं नादान
कैसे बना जा सकता था आखत

चलते-चलते उलूक टाइम्स की ख़ास प्रस्तुति पर एक नज़र..... 



बिना 
निशान लगाये 
दरवाजों को भी 

कभी कभी 
खटखटायें 


हम-क़दम के चौतीसवें क़दम
का विषय...

यहाँ देखिए..

🌹

आज बस यहीं तक। 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा 
रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 29 अगस्त 2018

1139..बारिशों में अहसान तो दोनों का रहता


।।प्रातः वंदन।।
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने

किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

निदा फ़ाज़ली



पर बारिशों में अहसान तो दोनों का रहता है मकान पे
बस जरा सा छत ने जता दिया तो नींव ने छुपा लिया..
 तो समय को जाया न करते हुए रूख करते है इन गूढ़ रूपी शब्दों के नींव की यानि कि मर्म की..
रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें...
आदरणीय दिगंबर नासवा जी
आदरणीय विश्वमोहन जी
आदरणीया कुसुम कोठरी जी
आदरणीया अपर्णा वाजपेयी जी और
आदरणीय जयन्ती  प्रसाद शर्मा जी.✍
🌹





बिगाड़ देता हूँ ज़ुल्फ़ तेरी

नहीं चाहता हवा के सर कोई इलज़ाम 

रखना चाहता हूँ तुझपे 

बस अपना ही इख़्तियार 

क़बूल है क़बूल है

आवारा-पन का जुर्म सो सो बार मुझे

🌹


मीत मेरे मन के

सौगात मेरे तन के!

जनमते ही चला

मिलने को तुमसे।

'प्रेय' पथ की मेरी

प्रेयसी हो तुम

🌹


मुस्ल्सल  बह गया तो फिर बस समंदर होगा ।

दिन ढलते ही आंचल आसमां का सूर्खरू होगा

रात का सागर लहराया न जाने कब सवेरा होगा।

तारों ने बिसात उठा ली असर अब  गहरा होगा
🌹


मैं इस बार मिलूँगी

भीड़ में निर्वस्त्र,

नींद जब भाग खड़ी होगी दूर

आँख बंद होने पर दिखेगी सिर्फ भीड़,

बाहें पसारते ही सिमट जायेगा तुम्हारा पौरुष,

तब, झांकना अपने भीतर

एक लौ जलती मिलेगी

वंही;
🌹


अभी कली है नहीं खिली है,

नहीं कर उनसे छेड़।

वे अबोध हैं तू निर्बोध है,

प्रीत की रीत का नहीं प्रबोध है।

समझेंगी वे चलन प्रेम का,

रे भ्रमर देर सवेर.....................मधुकर मत.......

🌹

हम-क़दम के चौतीसवें क़दम
का विषय...

यहाँ देखिए..
🌹



।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'✍


मंगलवार, 28 अगस्त 2018

1138....वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं.....


जय मां हाटेशवरी......

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं.....
स्वागत है आप सभी का.....
पेश है मेरी पसंद के कुछ चुने हुए लिंक.....

My Photo
भूख ने रुप बदल लिया
चांद को वे समझाने में लगे
कि रोटी गोल है
इस तरह कुछ
सुबहें , भी थकी मिली
कही हाथ, तो कही पैर
न जाने कितनों के घरों में
बिखरा पडा था 'मैं॑॑॑ '!!!


ये मौसम क्यों नही बदल जाता ...!!!
दूर से ही सही कोई साथ होता ,
रगों मैं खुश एहसास होता .
डरी -डरी अंगुलिया हिम्मत जुटाती ,
जुबा कहते कहते लड़खड़ाती .
गर्म साँसे फिर भारी हो जाती .
हाय फिर कोई दामन बचाता,
ये मौसम क्यों नही बदल जाता .......



बहन का धागा भाई का विश्वास
भाई सरहद पर लड़े ,रख कर देश की आन।
बहिना की राखी मिली ,बांध कलाई शान।
सूना सूना सा लगे ,बिन बहना के पर्व।
काश बहिन होती यदि ,मैं भी करता गर्व।  


एक वसीयत मेरी भी ....... निवेदिता
फूलों के अथाह रंग हों
खुशबू से मदहोश हो जाऊँ
किताबों से घिरे इस घने से
जंगल में बस गुम हो जाऊँ
एक वसीयत मेरी भी .......


हुजूम ...
मेरे बाप की जागीर है, पैसा है
अब, मैं उससे ..

आसमान में मोबाइल उड़ाऊँ
या साईकल से व्हाट्सअप-व्हाट्सअप करूँ
तुम्हें क्या ?

मेरी फ़ोटो
आशाएँँ " (लघु कविताएँ)
डाल से विलग पत्ती
ब्याह के बाद  बेटी

अपनों से बिछड़
गैर सी आंगन में खड़ी
 
दिल में कसक
लबों पे मुस्कुराहट
   
दृगों में नमी  और
गुम वजूद की चाहत



दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण
वोट बैंक की राजनीति देखिए कि जब सुप्रीम कोर्ट अपने अनुभव से कहता है कि दलित एक्ट का 95% दुरुपयोग हो रहा है और निर्दोष क्यों लोग सताए जा रहे हैं और इस में जांच कर गिरफ्तारी हो तो वोट के लिए सत्ताधीश विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल देते हैं! अब जब सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि आखिर यह आरक्षण कब तक रहेगा और एक IAS के बेटे और पोते को आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए तब इस पर भी वोट बैंक की राजनीति शुरु हो गई है!

तब इस गैर बराबरी का परिणाम अंबेडकर की जताई आशंका के अनुरूप एक दिन क्यों उत्पन्न नहीं होगा? एक दिन ऐसा आएगा जब इस गैर बराबरी की वजह से भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ेगा...?


इंसान
उदासी को समेट कर
रख दो ऐसी जगह
जहां से वो दिखे ही न
और आंसुओं को
खुशी से वाश्प
बना उड़ा दो
और लग जाओ
जीवन को जीने में

अब बारी है हम-क़दम की
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का चौंतीसवाँ क़दम
इस सप्ताह का विषय है
'बैरी'
...उदाहरण...
बह गया
रिम-झिम, रिम-झिम,
गहन घन-संताप
सजल हुआ बैरी उर फिर
सुनकर क्‍यूँ मेघ मल्‍हार  ?
-दीपा जोशी

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है

अंतिम तिथिः शनिवार 01 सितम्बर 2018
प्रकाशन तिथि 03 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें


धन्यवाद।




सोमवार, 27 अगस्त 2018

1137...हम-क़दम का तैंतीसवा क़दम..आँखें

सादर नमस्कार
सर्वशक्तिमान ने सुंदर संसार का निर्माण किया और सृजन के चमकात्कारिक स्वरुप को प्रत्येक जीव देख पाये, इसके लिए जीव 
देह को सबसे अनमोल कृति आँख का उपहार दिया।
कहते है आँखें मन का दर्पण होती हैं।
नेत्र,दृष्टि,नयन,लोचन जैसे नामों से सुशोभित आँखों का काम बाहरी वस्तुओं का अवलोकन कर मस्तिष्क तक संदेश पहुँचाना है। शरीर 
का सबसे संवेदनशील और कोमल अंग आँख होता है।
बिना आँख के जीवन अंधकारमय है।

साहित्य में लगभग हर विधा, सभी भाषा और लिखने वाले हर 
रचनाकारों के द्वारा आँख पर अनगिनत शब्द-शिल्प गढ़े गये हैं।
हमक़दम के हमारे विषय "आँखें" पर हमारे रचनाकारों की क़लम से बेहद सारगर्भित और सुंदर रचनाओं का प्रस्फुटन हुआ है।

तो चलिए आपके द्वारा सृजित रचनाओं के संसार में 
★◆◆◆★★◆◆◆★
सर्वप्रथम पढ़िए आदरणीय कुलदीप जी की रचना
उसकी आँखों से देख रहा हूँ

मेरी बुझी हुई
आंखे देखी
छोड़ दिया मंझधार में मुझे.....
एक की आंखों ने
बुझी हुई आंखों में भी 
अपने लिये प्यार देखा,
.... कहा, मेरी आंखे हैं तुम्हारे लिये.....


★★★★★
आदरणीय लोकेश नदीश जी 


ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम
मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें

ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

★★★★★

आदरणीया उर्मिला सिंह जी

कई पोशीदा राज छुपाती हैं आँखे..
कई सवालों का जबाब देती हैं आंखे!
अनगिनत ख्वाब तैरते इन आँखों में..
मय के छलकते प्याले होती है आंखे !!

★★★★★

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता जी
एक गजब की बात सुनो 
इस जग  की रीत बताये 
आँख के अंधे नाम नयन सुख 
क्या क्या गुण गिनवाये !

पल में तोला पल में माशा 
दादुर सी कूद लगाये 
बैठ हिंडोला दूर देश की 
सैर खूब करि आये !

★★★★★

आदरणीया शकुंतला राज जी

कोई पूछे उनसे जिनके होती नहीं हैं
आँखे...........
जन्म लिया बिटिया का मैंने
सबने देखा मुझे.....
तो कहा चाँद का टुकड़ा हैं
इसकी आंखे तो समुद्र जैसी गहरी हैं
मृगनयनी, कजरारी आंखे
चंचलता से भरी हुई आंखे

★★★★★

आदरणीया ऋतु आसूजा जी

“ आँखें ही तो हैं , जो सुन्दरता को
       पढ़ती हैं , सुन्दर - सुन्दर विचारों को
       गढ़ती हैं “
        “कवि, लेखकों की आँखें
       प्रकृति की सुन्दरता को निहारती हैं
       मन मंदिर में पनपते सुन्दर विचारों को
       सुन्दर ,प्रेरक कहानियों
       कविताओं के रूप में रचती हैं “

★★★★★

आदरणीया नीतू ठाकुर जी

आँखों में अश्क़ भरकर रूखसत वो हो गए
उम्मीद हसरतों को तेरे  बाद भी रही

हमको पराया कर गए शब्दों के तीर से
हर बात तेरी याद तेरे बाद भी रही

आँखों में नमी दिल में बसती उदासियाँ
सौगात तेरी साथ तेरे बाद भी रही

★★★★★

आदरणीया कुसुम कोठारी जी

आंखें बेजुबान कितना बोलती है
कभी रस कभी जहर घोलती है
बिन तराजु ये तो मन तोलती है
कभी छुपाती कभी राज खोलती है। 

इन आंखों के कितने अफसाने हैं
इन आंखों के कितने दीवानें है
इन आंखों में कितने बहाने हैं
इन आंखों के चर्चे सदियों पुराने हैं। 

★★★★★

आदरणीया आशा सक्सेना जी

झील सी गहरी नीली आँखें
खोज रहीं खुद को ही
नीलाम्बर में धरा पर
रात में आकाश गंगा में |
उन पर नजर नहीं टिकती
कोई उपमा नहीं मिलती
पर झुकी हुई निगाहें 
कई सवाल करतीं |

★★★★★

आदरणीया साधना वैद जी

मुझे छेड़तीं, मुझे लुभातीं,
सखियों संग उपहास उड़ातीं,
नटखट, भोली, कमसिन आँखें !

हर पल मेरा पीछा करतीं,
नैनों में ही बाँधे रहतीं,
चंचल, चपल, विहँसती आँखें ! 

★★★★★
आदरणीय पंकज प्रियम् जी

कारी कजरारी तेरी आँखों में
मादकता भारी तेरी आँखों में
डूबता उतराता हूँ अंदर बाहर
अजब खुमारी तेरी आँखों में।

★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान जी

जवानी की आंखें
चंचल अल्हड़ रूमानियत से
भरी ये आंखें
मानो कोई झील हिलोरें लेती
डुबाने को तत्पर
जमाने को
बदल जाती है पल में इनकी
तासीर
लहराता जोश का समंदर

★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान जी

वो आंखें सूनी सपाट  खुली हुई
दुनिया का अथाह दर्द समेटे
कुछ भोगा हुआ
कुछ अपनों का दिया
भावना विहीन पथराई सी
देख जिन्हें रूह कांप उठी
समझ कर भी नहीं समझ पाए

★★★★★

आदरणीया अनुराधा चौहान जी

रेत के घरोंदों से
बिखर जाते हैं
सपने मेरे
जब तुम
पास होकर भी
पास नहीं होते हो
कभी आंखों ही आंखों में
समझ लेते थे

★★★★★

आदरणीय पुरुषोत्तम जी जी

खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें!
कभी चुपचाप युँ ही मचाती है शोर ये,
जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में,
कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें....
★★★★★
और.चलते-चलते पढ़िये मेरी लिखी एक रचना
आँखों में
मुस्कुराता हुआ ख़्वाब है आँखों में
महकता हुआ गुलाब है आँखों में

बूँद-बूँद उतर रहा है मन आँगन
एक कतरा माहताब  है आँखों में

उनकी बातें,उनका ही ख़्याल बस
रोमानियत भरी किताब है आँखों में

★★★★★

एक सुंदर गीत सुनिये

आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।



अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ







रविवार, 26 अगस्त 2018

1136,,,,एक छुट्टी मारी गई...राखी आज है रविवार के दिन....

सादर नमस्कार...
श्रावणी पूर्णिमा..
उत्सव लेन-देन का
प्यार-प्रतिकार-प्रतिज्ञा
यही सब तो विनिमय करते हैं आज..
चलिए सबसे पहले एक गीत सुनते हैं...




अब चलें रचनाओं की ओर......

एक नया ब्लॉग
ऐतिहासिक सामाजिक युद्ध और राजनैतिक जोंबी...
जोंबी
आने वाले चुनाव के मद्देनजर यह तय है कि सोशल मीडिया में ऐतिहासिक सामाजिक युद्ध छिड़ने वाला है, जिसके साक्षी हम सभी होंगे और लगभग सभी को जाने अनजाने ही इसमें भाग लेना होगा। सोशल मीडिया में जितने भी जाने पहचाने दोस्त हैं उनमें से अधिकतर का पता है कि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी और कितनी तल्ख होगी। परंतु कई लोग जो बीच बीच में छुपकर घुस आये हैं, वे इस युद्ध के विभीषण होंगे, वे यहाँ से वहाँ तक सारे रिश्तों की बखिया उधेड़ेंगे।


अधूरा संवाद...पुरुषोत्म सिन्हा

बिन बोले तुम सो मत जाना,
रिक्त कभी ना, ये झूला कर जाना,
इन बाहों का हो ना रिक्त श्रृंगार,
रिक्त ना रह जाए, आलिंगन की बात,
अभी अधूरा है इक संवाद......

अनछुआ मन...श्वेता सिन्हा

झुलसता है,
तन की वेदना में,
मौन दुपहरी की तपती
पगलाई गर्म रेत की अंधड़
से घबराया मन छौना
छिप जाना चाहता है
बबूल की परछाई की ओट में


मन की पीड़ा....अनुराधा चौहान

जब अंतर्मन में
खुलती है
पुरानी यादों की
परतें तब मन में
एक अजीब बैचेनी
जन्म लेने लगती है
कुछ अच्छी यादें
सुकून देती

ये मौसम क्यों नही बदल जाता ...!!!...ज़फ़र

यादो के साये मंडराते ,
बेबसी मे हमको डुबाते.
ये जो हैं वो काश नही होता ,
ना तू परेशा,न मैं रोता .
एक दुसरे में हम खो जाते ,
वो शुरुवाती लम्हे क्यों नही लौट आते ...

ग़म की रेत पे....लोकेश नदीश

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता है
आंसू अपनी आँख में लाया जा सकता है

ख़ुद को अलग करोगे कैसे दर्द से, बोलो
दाग़, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता है

कभी तो मिलेंगे....अभिलाषा चौहान

वो ढलती हुई सुरमई शाम में
तुम्हारी पहली झलक
जैसे उतर आया हो
कोई चांद जमीं पर
बिखर गई सर्वत्र
तुम्हारे रूप की चांदनी

लोग आते हैं, पढ़ते हैं
हैरत है इस अंक की 
एक भी प्रति नहीं बिकी..
उलूक टाईम्स..

रविवारीय मुद्दा...डॉ. सुशील जोशी
शिक्षक संघर्ष समिति खफा सुन राज्य सरकार
वादाखिलाफी का लगाया आरोप किया खबरदार।

खबर है "बेरोजगार और शिक्षक सरकार से खफा"
"बेरोजगार शिक्षक" होती तो ज्यादा आता मजा।

चलते-चलते एक ग़ज़ल सुनिए.. 
ब्रिटिश सिंगर तान्या विल्स...


फिर मिलेंगे दिग्विजय...















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