निवेदन।


समर्थक

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

957..रंगीली रंगों का अब है बसर..


।।मांग्यलयम् सुप्रभात।।
🙏


होने लगा मौसम का असर

रंगीली रंगों का अब है बसर..

जी, हाँ..

 बातें रंगों की और होली की जिक्र भी न हो..तो फिर गौर फरमाइए इस शेर पे..

"गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले 

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले"

                                 फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रंगों के कारोबार को समेटते हुए नज़र डाले चुनिंदा लिंकों पर..✍

🔲

"मेरी बातें " से आनन्द ले..

मैं थोड़ी जल्दीबाज़ी में था
पर किसी दोस्त ने अविराम
ठहरने को कहा
उसकी बातों ने
मेरी बेचैनी शांत कर दी ,
अपने पिछले कदमों को
देखने लगा
अपनी अगली कदमों को

🔳


ब्लॉग वंदे मातरम् से ..


किसी शायर ने ठीक ही कहा है-

ज़िंदगी क्या है

फ़कत मौत का टलते रहना.

वक़्त कई बार इसका एहसास भी करा देता है. सांसे कब,  किसकी कितनी देर टिकी रहेंगी 
इसका अंदाज़ा न सांस लेने वाले को होता है न ही साथ रहने वाले को. 



🔲


ब्लॉग चौथाखंभा से व्यंग्य..



(डिस्क्लेमर:- यह एक व्यंग रचना है और यह पूरी तरह से काल्पनिक, मनगढ़ंत और एक गधा के द्वारा ही लिखा गया है। इसका किसी भी राजनीतिक व्यक्ति, पार्टी अथवा समर्थक से कोई सरोकार नहीं है। यदि किसी भक्तिभाव में डूबे व्यक्ति को इस पर आपत्ति हो तो हमें सूचित करें इसे तुरंत डिलीट कर दिया जाएगा)

सुनो केजरीवाल, तुम 
अभी भी गधा के गधा ही हो! पता नहीं आदमी कब बनोगे? जब तक आदमी नहीं 
बनोगे तब तक तुम को आदमी बनाने के लिए भरपूर कोशिश होती रहेगी। 
यदि तुम आदमी होते तो यह बात समझ में आ जाती कि आदमी होने के बहुत
 सारे फायदे हैं और गधा होना बहुत ही हानिकारक। तुम इतनी 
भी बात क्यों नहीं 

🔳

मन पाए विश्राम जहाँ से सुंंदर अभिव्यक्ति..





पा संदेसा इक अनजाना,

नयन टिके हैं श्वास थमी सी

एक पाहुना आने वाला !

रुकी दौड़ तलाश हुई पूर्ण

आनन देख लिया है किसका,

निकला अपना.. पहचाना सा

जाने कैसे बिछड़ गया था !

🔲


ब्लॉग बदलाव...से  




जिन्दगी को हमने यूँ मुख़्तसर कर लिया

चन्द सिक्कों में ही जीवन बसर कर लिया।

औरों की हंसी में ही छुपी है खुशी अपनी

गैरों के दर्द से आंखों में आंसू भर लिया।

फूल ही नही, कांटों से भी निबाह है अपनी


🔳


रंगों से निखरे ब्लॉग वीर बहुटी से..




सोये  भाव जगा गया आज ।

हुआ सिंदूरी क्षितिज का अंचरा

नीले नभ मैं फैल गया 

यादो की ठप्पे दार चुनरिया 

पवन उड़ा कर खोल गया ।


🔲




फाग-फुहारों की बधाइयां


मिलते है नई प्रस्तुति के साथ 

अगले सप्ताह तब तक के लिए..

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह..✍

हम-क़दम का आठवें क़दम
का विषय...
यहाँ देखें


मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

956....आपको आपसे बेहतर और कोई नहीं जानता


जय मां हाटेशवरी.....
आप सभी का स्वागत है.....
भीड़ हमेशा उस रास्ते पर चलती है जो रास्ता आसान लगता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की भीड़ हमेशा सही रास्ते पर चलती है| अपने रास्ते खुद चुनिए क्योंकि आपको आपसे बेहतर और कोई नहीं जानता|
अब पेश है आज के लिये मेरी पसंद....


दुआओं का असर होता दुआ से काम लेता हूँ
मुझे फुर्सत नहीं यारों कि माथा टेकुं दर दर पे
अगर कोई डगमगाता है उसे मैं थाम लेता हूँ
खुदा का नाम लेने में क्यों मुझसे देर हो जाती
खुदा का नाम से पहले ,मैं उनका नाम लेता हूँ


बड़ा सा कार्पेट
सुबह मृणाल ज्योति जाना था और दोपहर को एक और सदस्या के लिए उपहार लेने बाजार. दोपहर को लेखन कार्य. शाम को क्लब के काम से एक सदस्या के घर जाना था, वहाँ से  क्लब. लौटकर देर हो गयी थी, सो रात्रि भोजन में दिन के बचे मूली के साग का परांठा ही खाया. जून कल आ रहे हैं. कल शाम से फिर दिनचर्या नियमित हो जाएगी. आज उनका फोटो अख़बार में छपा, गोहाटी में जो कांफ्रेस हुई थी उसी सिलसिले में. सभी ने बधाई दी.
सितम्बर का अंतिम दिन ! सुबह एक सखी का फोन आया, उन्हें क्लब में एक कार्यक्रम का आयोजन करना है जिसमें विभिन्न स्थानीय फैशन डिजाइनर तथा महिला दुकानदार अपने वस्त्रों के स्टाल लगायेंगे. बड़े हॉल में लगभग बीस मेजें लगवानी हैं और वस्त्र टांगने के लिए स्टैंड आदि लगवाने हैं. इसका विज्ञापन भी देना है. परसों से योग कक्षा की शुरूआत भी करनी है. अभी-अभी एक निमन्त्रण संदेश लिखा है उसने, जो व्हाट्सएप के जरिये सभी को भेजना है. उसने सोचा एक बार सेक्रेटरी को दिखा लेना ठीक रहेगा. परसों के लिए कुछ सामान भी खरीदना होगा. प्रसाद के लिए मूंग साबुत दाल, काबुली व काले चने, एक नारियल, एक दीपक, अगरबत्ती और कागज की प्लेट्स. कुछ फूल भी ले जाने हैं.


रुसवाई
 कहीं बहकर ये फिर कोई राज न खोल दे
 मेरी रुसवाई  में इनका भी बड़ा हाथ है.


मन ! तू अपना मूल पिछान
है किन्तु एकाग्रता का अभाव होने के कारण इसका प्रभाव क्षणिक ही रहता है. जब तक साधक ध्यान के अभ्यास द्वारा मन के पार जाकर स्वयं को निराकार रूप में अनुभव नहीं कर लेता उसका मन आकुल रहता है. एक बार अपने भीतर अचल, विराट स्थिति का अनुभव उसे जीवन की हर परिस्थिति को सहज रूप से पार करने की क्षमता दे देता है.


मराम अल-मासिरी की कविताएं
और रिफ्यूजी कैम्पों में
वह आई निर्वस्त्र.
पैर कीचड़ में सने हुए
हाथ ठण्ड से फटे हुए
लेकिन वह आगे बढ़ती रही.
वह चलती रही
उसके बच्चे झूल रहे थे उसकी बाहों में
जब वह भाग रही थी नीचे गिर गए वे
कष्ट से रो पड़ी वह
लेकिन आगे बढ़ती रही.
उसके पाँव टूट गए
लेकिन वह आगे बढ़ती रही
उन्होंने गर्दन रेत दी उसकी
लेकिन वह गाती रही
एक बलत्कृत औरत के
सीरिया की जेल में जन्में बेटे ने कहा
मुझे एक कहानी सुनाओ माँ.



साक्षात्कार ब्रह्म से ...
हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 
उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना 


हाईकू
प्रश्न ही प्रश्न
दिखाई दिए स्वप्न
उत्तर नहीं
क्या आवश्यक
सब  हल करना
ना हुए तो क्या

आज बस इतना ही.....
धन्यवाद।
 क़दम हम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम आठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:::: उदास ::::
उदाहरणः
जब कभी उकेर लेती हूँ तुम्हें 
अपनी नज़्मों में !

आँसुओं से भीगे 
गीले, अधसूखे शब्दों से!!

सूख जायेंगी गर कभी 

आप अपनी रचना शनिवार 03 मार्च 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 05 मार्च 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक 















सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

955....हम-क़दम का सातवाँ क़दम....प्रश्न

प्रश्न हैं, 
बने बनाये हैं, 
बहुत हैं, 
फिर किसलिये 
नये ढूँढने जाता है
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सादर अभिवादन....
इस बार काफी से कम रचनाएँ हैं
सोचनीय भी नहीं है....
आज की प्रस्तुति में आप पाठकों से राय अपेक्षित है...इस कार्यक्रम को चालू रखा जाए या बन्द किया जाए......यदि आप लोगों को अपनी सृजन क्षमता इससे प्रभावित होती है या विकसित होती है...या 
आपको कुछ नया सीखने को मिलता है.....कृपया बताएं
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आज देखिए किसने क्या लिखा
सब की मन अलग-अलग कहता है.....
यह प्रश्नों का संसार भी 
कितना निराला है !
विश्व के हर कोने में
कोने में बसे हर घर में
घर में रहने वाले 
हर इंसान के मन में
उमड़ते घुमड़ते रहते हैं 
ना जाने कितने प्रश्न,
बस प्रश्न ही प्रश्न !
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पा लेना ही प्रेम नहीं हो सकता है,
सब कुछ खोकर भी क्या प्रेम पनपता है?
प्रश्न किया जब जब मेरे मनमीत ने
उत्तर देने जन्म लिया एक गीत ने
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बच्चे  ने प्रश्न किया 
ममता क्या होती है ? 
मां ने कहा
तू हंसता मै तुझ में जीती
ममता यही होती है।

बच्चे ने प्रश्न किया
मां तूं कैसे जीती है ? 
मां ने कहा 
तूं मेरा प्रति पल जीता 
और मैं तुझ में जीती। 
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सखी रेणुबाला जी
हुआ शुरू  दो प्राणों का  -- मौन -संवाद-  सत्र  !
मन प्रश्न  कर  रहे - स्वयम ही दे रहे उत्तर  !!

हैं दूर बहुत  पर दूरी का  एहसास  कहाँ है ?
कोई और एक दूजे के इतना  पास कहाँ है ?
 न कोई पाया जान  सृष्टि का  राज    ये गहरा-
राग- प्रीत गूंज रहा हर  दिशा  में रह- रह कर !!
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प्रश्न अनेक और उत्तर एक 
प्रश्नों की लम्बी श्रंखला से
सत्य परक तथ्यों के हल 
न था सरल खोजना 
बहुत कठिनाई से
उस तक पहुंच पाते 
प्रश्न बहुत आसान लगते 
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उग आते हैं कुछ प्रश्न ऐसे
जेहन की जमीन पर
जैसे कुकुरमुत्ते
और खींच लेते हैं
सारी उर्वरता उस भूमि की
जो थी बहुत शक्तिशाली
जिसकी उपज थी एकदम आला
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"एक प्रश्न
वो बेटी
उस पिता से पूछती है,
"क्यों बोझ मान लिया मुझे?
मेरे जन्म से पहले ही,
क्या किसी बेटी को देखा है,
बूढ़े माता-पिता को वृद्ध आश्रम में भेजते हुए?...."

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अब इसमें क्या अच्छा है ?.
 मूलमंत्र माना इसे मैने....
और अपने मन में, सोच में , व्यवहार में
         भरने की कोशिश भी की....
परन्तु हर बार कुछ ऐसा हुआ अब तक,
         कि प्रश्न किया मन ने मुझसे ,
         कभी अजीब सा मुँह बिचकाकर...
           तो कभी कन्धे उचकाकर
       "भला अब इसमें क्या अच्छा है" ??
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सखी डॉ. इन्दिरा गुप्ता
यक्ष प्रश्न सी लिखी हुई है 
हर रेख चेहरे पर 
घूम घेर कर पूछ रही है 
क्या गलती थी जीवन भर ।
निश्चल नेह या निस्वार्थ कर्म 
क्या यही खोट था मेरा 
जिसके चलते जीवन से पहले 
पड़ाव आ गया मेरा ।

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सखी अनीता लागुरी 
यहां कुछ प्रश्न
मैंने भी पूछे
माँ  से अपनी...
क्यों  लड़के की चाह में
मुझे अजन्मा ही मारने चली..?
क्यों छठे माह तक
बिना किसी भय के
सींचती रही रक्त से अपने..!
सुनाती रही लोरी
और सहलाती रही
उदर को अपने...!!
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श्री पंकज प्रियम जी
न मन्दिर न मस्जिद
न चर्च न हो गुरुद्वारा
सबकुछ सबके दिल मे
फिर क्यूँ ढूंढा जग सारा
सब जानते फिर भी नही मानते हैं
हरबार एक नया प्रश्न पूछ डालते हैं

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अनुजा दिव्या अग्रवाल
कोई भी
नहीं चाहिए
प्रश्न अभी
घिरी हुई हूँ
अभी मैं बहुत से 
प्रश्नों से घिरी
नहीं न जीना 
चाहती मैं......ये 
छटपटाती ज़िन्दगी


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प्रश्न उठना और 
उठते प्रश्न को 
तुरंत पूछ लेना 
बहुत अच्छी बात है 
लेकिन 
किसी के लिये 
समझना जरूरी है 
किसी के लिये 
बस एक मजबूरी है 
प्रश्न कब पूछा जाये 
किस से पूछा जाये 
क्यों पूछा जाये 
सबसे बड़ी बात 
यह देखना 
पूछने के लिये 
उठे प्रश्न की 
क्या औकात है 
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अज़हद खुशी है... 
आप सभी का प्रतिसाद देखकर
अब आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे...







रविवार, 25 फ़रवरी 2018

954...“उलूक” तुझे कुछ ध्यान व्यान करना चाहिये पागल होने वाले को सुना है बंदर बहुत नजर आता है ।

सादर अभिवादन
सब लोग एक विषय का
एक ब्लॉग ले कर आएँगे
तो.....
हमारे पाठकों की रचना को
हम किसे पढ़वाएँगे....

सखी श्वेता वैष्णव देवी की यात्रा पर हैं.....
आज की चुनिन्दा रचनाएँ.....

मधुऋतु...शान्तनु सान्याल

एक अजीब सी लाजवंती कशिश है 
हवाओं में, फिर खिल उठे हैं 
पलाश सुदूर मदभरी 
फ़िज़ाओं में। 


साँझ हो गई.....साधना वैद 
साँझ हो गई
लौट चला सूरज 
अपने घर 

उमड़ पड़ा
स्वागत को आतुर 
स्नेही सागर 


एक बार की विदाई....रश्मि शर्मा
साँझ के झुटपुटे में 
छाये की तरह 
फैलती है उम्मीद 

पाँव का महावर 
ईर्ष्यादग्ध है अब तक 
उसके अधर आलते से

फागुन में उस साल...रेणुबाला
फागुन    में  उस  साल
फागुन मास
में उस साल -
मेरे आँगन की क्यारी में ,
हरे - भरे चमेली के पौधे पर -
जब नज़र आई थी शंकुनुमा कलियाँ
पहली बार !


क्षणिकाएं......सुधा सिंह
यूँ तो हीरे  की परख,
केवल एक जौहरी  ही कर सकता है
पर
आजकल  तो जौहरी  भी,
नकली की चमक पर फिदा हैं
कलयुग इसे  यूँ ही तो नहीं कहते...



कुछ लाइने लिखने वालों के नाम...प्रियंका"श्री"
कहने वाले तो इन्हें 
पागल भी कहते है,
पर ये ऐसे मानव है
जो दूसरों के दुख से
सीधे जुड़े होते है।

इसलिए तो लेखक एक
भावपूर्ण इंसान होते है।




उलूक टाईम्स का रिप्रिन्ट

नहीं सोचना है 
सोच कर भी 
सोचा जाता है 
बंदर, जब उस्तरा 
उसके ही हाथ में 
देखा जाता है
पर हमेशा एक 
योग्य व्यक्ति 
अपने एक प्रिय 
बंदर के हाथ में 
ही उस्तरा 
धार लगा कर 
थमाता है
आज बस....
आज्ञा दें यशोदा को
सादर





शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

953... स्वच्छता


Image result for स्वच्छता पर कविता


आज दिल्ली में हूँ... दिल्ली निवासी मिलें तो अच्छा लगेगा

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
क्या बिहार के बाहर भी होता होगा सड़क पर पच से थूक देना
दो दिन पहले ही की बात है ऑटो से उतरकर पैसे दे रही थी कि
जुगाली करता लड़का थूक दिया ... मुझे लगा कि शायद उसने उलटी की
परन्तु वो तो फिर जुगाली करने में व्यस्त था...
मेरा भी परबचन का इरादा नहीं किया कि उससे कहूँ


स्वच्छता

उठा लो झाड़ू, उठा लो पोंचा
पहुँचो जहाँ कोई भी न पहुंचा
कोई जगह न रहने पाए
हर जगह को हम चमकाएं,
सपना यही है बस अपना



स्वच्छता

आओ हम सब मिलकर करें,
एक स्वच्छ और सुन्दर भारत का निर्माण ।
यहाँ के स्वच्छ गली, सड़क और कूचे,
बढ़ाये इस भारत देश का नाम ॥



स्वच्छता

परहेज़ करो बाहर की चीज़ों से
खाओ धोकर फल- तरकारी
अगर ना मानो मेरी बातें
होगी तुमको निश्चय बीमारी.



स्वच्छता
जब स्वच्छ रहेगा चतुर्दिक वातावरण।
तब ही स्वस्थ रहेगा भारत का जन-जन।।
स्वच्छ वातावरण अर्थात स्वच्छ पर्यावरण।
स्वस्थ तन ,स्वस्थ मन ,स्वस्थ जन- गण।।



स्वच्छता

स्वच्छ वस्त्र पहने हम, अपना, वातावरण भी स्वच्छ रखें ।
स्वच्छ जलाशय, स्वच्छ हो मंदिर, घर, कार्यालय स्वच्छ रखें ॥
गांधी के इन वचनों को हम, करें स्मरण, आचार में लाएं ।
अधिकारों की भीड़ हो गई, कुछ कर्त्तव्य भी क्यों न निभाएं ॥

><

चलिए अब बारी है 
आज इस सप्ताह का अंतिम दिन...
सभी के लिए 
एक खुला मंच
आपका हम-क़दम 
सातवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
...........यहाँ देखिए...........

फिर मिलेंगे .....




शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

952 ईंजीनियर श्री दिनेश चन्द्र गुप्त 'रविकर'

सादर अभिवादन....
देवी श्वेता अवकाश पर
आज हम एक विशेष प्रस्तुति लेकर....
आज हम बात करेंगे 
आदरणीय श्री दिनेश चन्द्र गुप्त 'रविकर' जी की....
आप बहुत सारे ब्लॉग के संचालक हैं..मसलन..
"कुछ कहना है", शांता : श्री राम की बहन
"लिंक-लिक्खाड़", नीम निम्बौरी, रविकर-पुंज
रविकर की कुण्डलियाँ, सृजन मंच ऑनलाईन....
इनमें आपकी छवि साफ नज़र आती है...
उच्चशिक्षित इंजीनियर
(Indian School of Mines, Dhanbad) और साहित्य
रिश्ता अलग...रास्ता अलग
फिर भी जुड़ गए साथ दोनों

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उनका स्वयं का कथन अपने ही बारे में
वर्णों का आंटा गूँथ-गूँथ, शब्दों की टिकिया गढ़ता हूँ| 
समय-अग्नि में दहकाकर, मद्धिम-मद्धिम तलता हूँ|| 
चढ़ा चासनी भावों की, ये शब्द डुबाता जाता हूँ | 
गरी-चिरोंजी अलंकार से, फिर क्रम वार सजाता हूँ ||
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पंजे ने पंजर किया, ठोकी दो-दो मेख-
तू ही लक्ष्मी शारदा, माँ दुर्गा का रूप |
जीव-मातृका मातु तू, प्यारा रूप अनूप ||
जीव-मातृका=माता के सामान समस्त जीवों का
पालन करने वाली सात-माताएं-
धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |
बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||
आध्यात्म ...

अदालत में गवाही हित निवेदन दोस्त ठुकराया।
रहे चौबीस घण्टे जो, हमेशा साथ हमसाया।

सुबह जो रोज मिलता था, अदालत तक गया लेकिन
वहीं वह द्वार से लौटा, समोसा फाफड़ा खाया।

बहुत कम भेंट होती थी, रहा इक दोस्त अलबेला
अदालत तक वही पहुंचा, हकीकत तथ्य बतलाया।

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मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर-
किसी की राय से राही पकड़ ले पथ सही अक्सर।
मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर।
तुम्हें पहचानते होंगे प्रशंसक, तो कई बेशक
मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम रविकर।।

दिया कहाँ परिचय दिया, परिचय दिया उजास-
रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य लकीर।
कर ले दो दो हाथ तो, बदल जाय तकदीर।।

प्रेम परम उपहार है, प्रेम परम सम्मान।
रविकर खुश्बू सा बिखर, निखरो फूल समान।।

फेहरिस्त तकलीफ की, जग में जहाँ असीम।
गिनती की जो दो मिली, व्याकुल राम-रहीम।।
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काव्य पाठ 28 जनवरी

सोते सोते भी सतत्, रहो हिलाते पैर।
दफना देंगे अन्यथा, क्या अपने क्या गैर।।

दौड़ लगाती जिन्दगी, सचमुच तू बेजोड़ 
यद्यपि मंजिल मौत है, फिर भी करती होड़  
                                                            
रस्सी जैसी जिंदगी, तने-तने हालात. 
एक सिरे पर ख्वाहिशें, दूजे पे औकात .

हनुमत रविकर ईष्ट, उन्हें क्यों नही पुकारा
पंडित का सिक्का गिरा, देने लगा अजान।
गहरा नाला क्यूं खुदा, खुदा करो अहसान ।
खुदा करो अहसान, सन्न हो दर्शक सारा
हनुमत रविकर ईष्ट, उन्हें क्यों नही पुकारा ।
इक सिक्के के लिए, करूं क्यों भक्ति विखंडित।
क्यूं कूदें हनुमान, प्रत्युत्तर देता पंडित।।


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शांता : श्री राम की बहन
पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||

चाहत की कीमत मिली, अहा हाय हतभाग ।
इक चितवन देती चुका, तड़पूं अब दिन रात । 

परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||
  
कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम || 

श्रृंगेश्वर महादेव
भगिनी विश्वामित्र की, सत्यवती था नाम |
षोडश सुन्दर रूपसी, हुई रिचिक की बाम || 

दुनिया का पहला हुआ, यह बेमेल विवाह | 
बुड्ढा खूसट ना करे, पत्नी की परवाह ||  

वाणी अति वाचाल थी, हुआ शीघ्र बेकाम | 
दो वर्षों में चल बसा, बची अकेली बाम || 

सत्यवती पीछे गई, स्वर्ग-लोक के द्वार | 
कोसी बन क्रोधित हुई, होवे हाहाकार || 

उच्च हिमालय से निकल, त्रिविष्टक को पार | 
अंगदेश की भूमि तक, है इसका विस्तार || 

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रविकर-पुंज
कुछ हास्य-कुछ व्यंग (विधाता छंद) 
चुनावी हो अगर मौसम, बड़े वादे किये जाते।
कई पूरे हुवे लेकिन, कई बिसरा दिए जाते।
किया था भेड़ से वादा मिलेगा मुफ्त में कम्बल
कतर के ऊन भेड़ो का, अभी नेता लिये जाते।।
(२)
फटे बादल चढ़ी नदियाँ बहे पुल जलजला आया।
बटे राहत डटे अफसर मगर आधा स्वयं खाया | 
अमीरों की रसोई में पकौड़े फिर तले नौकर।
शिविर में तब गरीबों ने कहीं गम, विष कहीं खाया ।।

रविकर की कुण्डलियाँ
बानी सुनना देखना, खुश्बू स्वाद समेत।
पाँचो पांडव बच गये, सौ सौ कौरव खेत।
सौ सौ कौरव खेत, पाप दोषों की छाया।
भीष्म द्रोण नि:शेष, अन्न पापी का खाया ।
लसा लालसा कर्ण, मरा दानी वरदानी।
अन्तर्मन श्री कृष्ण, बोलती रविकर बानी ||1||

देना हठ दरबान को, अहंकार कर पार्क |
छोड़ व्यस्तता कार में, फुरसत पे टिक-मार्क |
फुरसत पर टिक-मार्क, उलझने छोड़ो नीचे |
लिफ्ट करो उत्साह, भरोसा रिश्ते सींचे |
करो गैलरी पार, साँस लंबी भर लेना |
प्रिया खौलती द्वार, प्यार से झप्पी देना ||2||

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दिनेश भाई के बारे में
थोड़ा और जानिए....
पवनपुत्र केसरी नन्दन श्री हनुमान जी इनके ईष्ट हैं
रामायण इनका प्रिय ग्रंथ है

इनका प्रिय संगीत है...
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

ध्वज प्रार्थना
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

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अथाह सागर में गोते लगाने के बाद
ये मोती चुने हैं मैंने...
आज्ञा देंं दिग्विजय को

चलते-चलते ये प्रार्थना 



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