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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

935....देश के वीर सिपाही देखो ! माँ का कर्ज चुकाते हैं.

जय मां हाटेशवरी.....
सरहदों पर  देश के वीर सिपाही.....
दुश्मनों से हमारी रक्षा कर रहे हैं.....
तभी हम चैन की नींद सो पा रहे हैं....
मेले-त्योहारों उत्सवों का आनंद उठा पा रहे हैं....
हम इन सैनिकों को नहीं जानते....न ही जानना चाहते हैं.....
अगर कहीं कोई क्रिकेटर  या फिल्मी हीरो या हिरोइन  के आने की सूचना मिल जाए तो.....
उन्हें देखने के लिये भीड़ इकट्ठा हो जाती है.....
इस से भी अधिक दुख तो तब होता है.....
जब हमारे देश के नौजवान धर्म या जाती  के नाम पर आपस में लड़ते हैं....
राजनीतिक दल इस पर भी राजनीति करते हैं....
इसी राजनीति से जन्मा एक खलनायक नायक बनकर चुनाव जीत जाता है.....
हमारे देश में....कई ऐसे सैनिक है.....
जो दुशमनों से लोहा लेते अपने अंग गवा चुके हैं.....
उनकी क्या स्थिति है....उनकी कव्हरेज मीडिया  भी नहीं करता.....
क्योंकि मीडिया  को भी पैसा चाहिये.....




खून जमाती ठण्ड में भी, सीना ताने खड़े हुए
बदन जलाती गर्मी में भी सीमाओं पर अड़े हुए

बाँध शहादत का सहरा, मृत्यु से ब्याह रचाते हैं
देश के वीर सिपाही देखो ! माँ का कर्ज चुकाते हैं.


वर्षों से अब तक माँ देखो माफ़ ही माफ़ किये सबको
अब छठ्ठी का दूध भी माँ दुश्मन को याद दिलवाना है |
बाबू जी जैसे आये थे सरहद पर से लौट के माँ
वैसे ही ताबूत में सोकर हमको भी घर आना है |
देती हूँ आशीष मैं तुमको जा बेटा पर याद रहे
मातृभूमि का कर्ज चुका कर ही घर वापिस आना है |
सरहद की रखवाली करते शीश कटे तो कट जाए
पर दुश्मन को भूल से बेटे पीठ नहीं दिखलाना है |

घुसपैठ क्यों होती है,
 इसका जवाब कश्मीर (पूरे जम्मू-कश्मीर) की भूगौलिक संरचना में ही छिपा है. उंचे-उंचे पहाड़, दर्रें, घने जंगल, नदी और नालों के चलते भारत-पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा एक टेढ़ी खीर है. शीतकाल में कश्मीर घाटी (और बॉर्डर) पूरा बर्फ से ढक जाता है. बॉर्डर पर लगी कटीली तार (फैंसिग) भी नष्ट हो जाती है. इसे लगाने में काफी वक्त लग जाता है. जंगल इतने घने हैं कि दस मीटर से ज्यादा तक का दिखाई नहीं देता. रात के अधेंरे में तो नाइट-विजन डिवाइस भी काम करना बंद कर देते हैं. नदी-नालों पर फैसिंग नहीं लगाई जा सकती. बस इस सभी का फायदा उठाकर ये आतंकी घुसपैठ करने में कामयाब हो जाते हैं.
किसी भी देश के लिए अपने सभी संसाधन बॉर्डर पर लगा देना कहीं से भी फायदा का सौदा नहीं है. सामरिक और आर्थिक कारणों से ऐसा नहीं किया जा सकता कि हर एक फीट पर एक जवान को बंदूक के साथ सुरक्षा के लिए खड़ा कर दिया जाये. क्योंकि ऐसा हुआ तो हमारे देश की सेना में जवानों की संख्या एक करोड़ और उसका खर्चा उठाने के लिए पूरी जीडीपी ही लग जायेगी. दुनियाभर में सीमाओं की रखवाली पैट्रोलिंग के जरिए ही की जाती है. पहाड़ी इलाकों में सरहदों की रखवाली डोमिनेट करके ही की जाती है.
हमारी सीमाएं सुरक्षित क्यों नहीं है, वहां से घुसपैठ कैसे संभव है, फुलप्रूफ सिक्योरिटी क्यों नहीं है, ऐसे सवाल सिर्फ वही कर सकता है जिसने कभी भारत-पाकिस्तान सीमा को करीब से नहीं देखा है. ऐसा एक सवाल एक बार संसद में एक सांसद ने किया था तो, रक्षा मंत्री ने सिर्फ इतना ही जवाब दिया था कि आपने शायद बॉर्डर देखा नहीं है. जिस दिन देख लेंगे ये सवाल करना छोड़ देंगे. लेकिन इसका मतलब कतई ये नहीं है कि हम घुसपैठ को ऐसी ही होने दें. सुरक्षाबलों को फिजिकली और तकनीक के माध्यम से घुसपैठ को रोकना ही होगा.

अब पेश है....आज के लिये मेरी पढ़ी हुई रचनाएं.....
हम रहें या न रहें पदचिन्ह रहने चाहिए -सतीश सक्सेना
निर्बल गर्दन में फंदा है !
कोई नहीं पालता इसको
कचरा खा खाकर ज़िंदा है !
कर्णधार हिंदी के,कब से
मदिरा की मस्ती में भूले !
साक़ी औ स्कॉच संग ले
शुभ्र सुभाषित माँ को भूले
इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ !
भूखी प्यासी सिसक रही,अभिव्यक्ति
को चारा लाया हूँ !

अकेली विदाई
जहाज में वृद्धों की भीड़ बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ वृद्धाश्रम में भी लोग अकेले रहने पर मजबूर हो रहे हैं, साथ ही शहर के अनेक घर भी वृद्ध-कुटीर में बदलते जा रहे हैं। परिवार टूट गये हैं, एकतरफा रिश्ता निभाया जा रहा है। एक पीढ़ी नये का स्वागत करने लाख दुख देखकर भी परदेस जाती है लेकिन दूसरी पीढ़ी अन्तिम विदाई
के लिये भी आना जरूरी नहीं समझती। पहले और आज भी अधिकांश परिवारों में मृत्यु एक संस्कार माना जाता है और मृत व्यक्ति की आत्मा की शान्ति के लिये पूरा परिवार एकत्र होता है। दूर-दूर से रिश्तेदार आते हैं, एक पीढ़ी अपना सबकुछ देकर विदा होती है तो उसे विदा करने के लिये सब जुटते हैं। 12 दिन साथ रहते हैं और जो पीछे छूट गया है उसे अकेलेपन के अहसास से दूर रखने का प्रयास करते हैं। लेकिन अब कहा जाने लगा है कि जितना जल्दी हो काम खत्म करो और जो आ सके वह ठीक नहीं तो किसी को परेशान मत करो। जाने वाला ऐसे जाता है जैसे उसका कोई नहीं हो, उसने किसी संसार की रचना ही नहीं की हो। तभी तो वृद्धाश्रम में रह रहे एक व्यक्ति ने कहा कि जब अकेले ही रहना है तो विवाह ही क्यों करना और इसलिये मैंने विवाह किया ही नहीं था। वृद्धों की इस व्यथा को कैसे सुलझाया जाए? क्या वाकई वृद्धाश्रम में जीवन है या फिर केवल मौत का इंतजार। अभी तो लोग नये का स्वागत कर रहे हैं कहीं ऐसा ना हो कि फिर नये का स्वागत भी बन्द हो जाए और सब अकेले हों जाएं!

इत्तेफ़ाक से गर तुम्हे मिल जाए जिंदगी ...
पता है हमको मना  तो लेंगे
बस अभी वक़्त की कुछ पाबंदी है
डर  है कहीं रिश्ता न टूट जाए
और वो हमे भूल न जाए...

सुनो, तुम अपना दिल सम्हाल के रखना।
नहीं। मेरे पास कोई ज़रूरी बात नहीं है, जो तुमसे की जाए। ये वैसे दिन नहीं हैं जब 'दिल्ली का मौसम कैसा है?' सबसे ज़रूरी सवाल हुआ करता था। जब दिल्ली में बारिश होती थी और तुमने फ़ोन नहीं किया होता तो ये बेवफ़ाई के नम्बर वाली लिस्ट में तुम्हारा किसी ग़ैर लड़की से बात करने के ऊपर आता था।
हमारे बीच दिल्ली हमेशा किसी ज़रूरी बात की तरह रही। बेहद ज़रूरी टॉपिक की तरह। कि तुम्हारे मन का मौसम होता था दिल्ली। नीले आसमान और धूप या दुखती तकलीफ़देह गर्मियाँ या कि कोहरा कि जिसमें नहीं दिखता था कि किससे है तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यार।

 गजल '' ऐसा मय पिला गईं दो आँखें चलते-चलते,
फ़्रेम में नयन के मढ़ा कर तस्वीर उनकी
लुत्फ़ खूब उठा रहा हूँ ख़्वाब बुनते-बुनते,

उकेरुं रेखाचित्र रोज दिल के कैनवास पे
क्या-क्या सोचूँ तूलिका से रंग भरते-भरते,
अगले मंगलवार को सारे देश में....शिव-विवाह अर्थात शिवरात्री की धूम होगी.....सती ही शायद वो पहली नारी रही होगी....जिन्होंने पिता की इच्छा के विरुद्ध श्री शंकर का पति रूप में वरण किया था......परिवारों में आज भी बेटियों की इच्छा के विरोध विवाह होता है क्या? क्या लड़कियों को अधिकार है अपना वर स्वयम् चुनने का? क्या प्रेम विवाह अधिक सफल रहते हैं या परिवार द्वारा जोड़े गये संबंध वाले विवाह? अगले मंगलवार की चर्चा की भूमिका इन्ही कुछ सवालों के साथ प्रारंभ करेंगे.....आप इस ब्लौग के संपर्क प्रारूप द्वारा  आज शाम तक अपना दृष्टिकौण 100 शब्दों तक हमे भेजे....जिसे हम अपनी भूमिका में अवश्य शामिल करेंगे.....
धन्यवाद।

क़दम हम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम  पाँचवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है...
...यह चित्र
:::: पहाड़ी नदी  ::::
 आज  उदाहरण नही है
परिलक्षित हो रहे दृष्यों के आधार मानकर
आपको एक कविता लिखनी है
उदाहरण कल के अँक मे पढ़  लीजिएगा

आप अपनी रचना शनिवार 10 फरवरी 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 12 फरवरी 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक 
11 जनवरी 2018  का अवलोकन करें
सादर
पुनः आप सभी ने कल हमारे जन्म दिवस पर हमें शुभकामनाएँ दी
हम आपका हृदयतल से आभार व्यक्त करते हैं..
सादर....
.....यशोदा








7 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    मीडिया जो करे उसपर आंख मूंदकर
    भरोसा नही किया जा सकता
    अच्छी रचनाएँ पढ़वाई आपने
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी प्रस्तुति।
    विसंगतियां हर क्षेत्र मे है और कथित प्रजातंत्र मे इससे बचना मुश्किल है वो भी संसार का सब से बडा गणतंत्र जो सदियों की गुलामी से निकला हो खैर..
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    शुभ दिवस।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर विचारपूर्ण प्रस्तुति..
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जवानों की लगातार शहादत की खबरें मन खिन्न कर जाती हैं। सही कहा आपने कि जवानों की कुर्बानी को मीडिया भी ज्यादा कवरेज नहीं देता। जवानों की ज़िंदगी, कैसे हालातों में वे रहते हैं, उनकी शहादत...ये सब बार बार जनता के सामने लाना जरूरी है ताकि मरी हुई आत्मा में कुछ तो प्राणों का संचार हो। पिछले दिनों एक वीडियो भेजा था किसी ने, एक शहीद की माँ मीडिया के सामने कह रही है कि कोई माँ अपने बच्चों को सेना में ना भेजे। उनका रोष सही है किंतु दुःखद भी है। यह विचार का गंभीर विषय है।
    संकलित रचनाएँ बेहतरीन हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सैनिकों के प्रति ध्यान आकृष्ट करता अग्रलेख और विचारणीय लिंक चयन. सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं

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