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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

945...सीमित हूँ बहुत.....मैं शब्दों में....

"रचनात्मकता"
 किसी भी 
व्यक्ति के अंदर 
की वह योग्यता होती है 
जिसके द्वारा वह वस्तुओं या 
उन विचारों का उत्पादन करता है।

दैनिक जीवन में 
किसी नवीन दृष्टिकोण, 
विचार या व्यवहार को उत्पन्न 
करना रचनात्मकता है। 
रचनात्मकता सर्वव्यापी है 
प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के 
अनुसार इसका उपयोग करता है।

साहित्यिक पटल रचनात्मकता का सबसे प्रभावशाली उदाहरण है। 
अपनी कल्पनाशीलता,अनुभवों, जिज्ञासाओं और गहन चिंतन 
के द्वारा सृजित मौलिक विचार जो कविताओं,कहानियों साहित्य 
की अन्य विधाओं के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है 
यह अद्भुत गुण "रचनात्मकता" है।

कई बार किसी विशेष विचार या रचना से प्रभावित होकर या 
प्रेरित होकर अपने शब्दों में एक नवीन सृजन किया जाता है 
जिसकी मौलिकता पर प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं।आप बताइये 
आप क्या सोचते है इस बिषय पर??
 मेरे विचार से ऐसा सृजन कम से कम उस रचनात्मकता से तो बेहतर है जिसमें किसी प्रतिष्ठित और लोकप्रिय रचना को आधार मानकर 
उसमें निहित मौलिक विचारों का अपमान किया जाता है।

||सादर नमस्कार||

  आप सभी आमंत्रित हैं अपने विचार और सुझाव के साथ।
कृपया "रचनात्मकता" पर अपने विचार अवश्य लिखें।
चलिए आज के हमारे रचनाकारों के सृजन के संसार में.....

आदरणीया यशोदा दी की कलम से भावात्मक अभिव्यक्ति
अगर न होती स्त्री मैं तो


तुम पुरुष हो....वरना 
व्यर्थ है... 
तुम्हारा...यह 
व्यक्तित्व....

आदरणीय ज्योति खरे जी की कलम से 
निसृत सरस प्रेमपगी प्रभावी रचना
चाहतों के घर-घरोंदे
बैठ सागर के किनारे
कई दिवस कई माह तक
रोज शामों में अकेले
ऊगा दिये थे चाँद-तारे
●●●●●●●
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की लेखनी की लाजवाब़ अभिव्यक्ति 


वक्त के परे, संभावनाएँ हैं अनन्त,
दिशाहीन से वक्त के ये द्वन्द,
छलती रहेंगी हमें, ये दिशाएँ दिग्दिगंत,
आओ चुने हम यहाँ, इन राहों में पड़े मकरंद....
गर हो सके तो मिलो वक्त के परे स्वच्छंद.....
●●●●●●●●●●


आदरणीया कुसुम दी की कूची से प्रकृति की मोहक छवि उकेरती रचना
उषा ने सुरमई शैया से
अपने सिंदूरी पांव उतारे
पायल छनकी
बिखरे सुनहरी किरणों के घुंघरू 

●●●●●●●●●●

आदरणीया पल्लवी जी की कलम सुंदर प्रार्थना के रंग बिखेरती हुई



राग -द्वेष जीवन का हिस्सा, 
कभी न हो ये मेरा किस्सा ।

शत्रु ,मित्र या स्वदेश ,परदेश 
दिखे सबमें, तेरा ही वेश ।


●●●●●●●●●●


आदरणीय डॉ.हीरालाल प्रजापति जी की परिपक्व व 
सधी हुई लेखनी की बात ही निराली है।



दुश्मन ज़रूर था वो मगर इतना प्यारा था ,
उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !!

सचमुच ही बुलंदी को बस इक बार चूमने ,
ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !!

●●●●●●●●●●●●●

चलते-चलते आदरणीया अपर्णा जी की कलम से भावपूर्ण ख़ूबसूरत रचना


मौसम में थी बेपनाह मोहब्बत
लबों पर जज्बातों की लाली 
अलकों में अटका था गुलाबों का स्पर्श 
नाचती धरती ने एक ठुमका लगाया
वसंत ने ली अंगडाई 
और प्रेम 
तारीखों में अमर हो गया.
●●●●●●●●●●●●●
चलिए अब बारी है हम-क़दम के 
छठवें क़दम की ओर
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं 
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं 

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं 

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं 

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं 

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी

आप अपनी रचना शनिवार 17  फरवरी 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 19 फरवरी 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक 
11 जनवरी 2018  का अवलोकन करें

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आप सभी के समीक्षात्मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में





19 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात सखी
    सही उपचार मे कसर
    रचनात्मक कहा जाएगा रचना के विषय बिन्दु को
    जिसकी वजह अंकुरित होती है कविता,आलेख या फिर
    आलोचना, समीक्षा....
    दरअसल ये एक लम्बी चर्चा का विषय है,अस्तु
    आभार...
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज की बेहतरीन प्रस्तुति और मेरे पसंद के अनुकूल सारी रचनाओं को संकलित करने हेतु आदरणीय श्वेता जी बधाई की पात्र हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. रचनात्मकता स्वभूत उपजी अभिव्यक्ति है, रचनात्मकता की कोई सीमा नही होती, रोटी बनाने से लेकर उसे परसने तक और घर साफ करने से लेकर देहरी पर रंगोली डालने तक रचनानत्मकता का बोध होता है, जीवन के छोटे छीटे कामों में भी सलीका हो तो इसमें भी रचनात्मकता झलजती है.
    मन दिमाग और दिल मे जो बहुत अच्छा लगे कुछ नयापन हो और उसे व्यक्त करने की कला हो वह रचनात्मकता है. रचनात्मकता साहित्य कला सिनेमा चित्र संगीत में भर नाही होती जीवन के हर जीते पल में होती है.
    बहुत सुंदर और विचारणीय विषय के साथ आज की पांच लिंको की भूमिका स्वेता जी ने रची है.
    साधुवाद
    सुंदर लिंक सभी रचनाककरों को बधाई
    मुझे सम्मलित करने का आभार
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद सराहनीय रचनात्मक से सम्बंधित विचारणीय प्रस्तुति। सुंदर रचना संकलन सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवम् शुभकामनाएँ
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्वेता जी, सुन्दर प्रस्तुति, जिस सन्दर्भ में आपने भूमिका लिखी है उस विषय पर बस इतना कहना है कि जिस रचना में नवीनता का भाव हो उसे मौलिक रचना कह सकते हैं और किसी मौलिक रचना में चाँद शब्दों के हेर-फेर से की गई नई रचना को मौलिक नहीं कहा जा सकता। जब सवाल मौलिकता की होती है तो समकालीन आलोचक, कवि हरिवंश राय बच्चन को भी नहीं छोड़ा , परन्तु आज निर्विवाद रूप से मधुशाला को मौलिक रचना माना जाता है।
    इस चर्चा में सम्मलित सभी रचनाकारों को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुंदर आभार आदरणीय आप का......

    उत्तर देंहटाएं
  7. विचारणीय भूमिका और सुन्दर प्रस्तुति . बधाई श्वेता जी.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आदरणीय श्वेता जी, आज की प्रस्तुति वास्तव में खास है . बेहद खूबसूरत रचनाओं के साथ आपने मौलिकता जैसे गूढ़ विषय पर भूमिका लिखी है. सवाल यह है किसी भी कृति की परिणति किस प्रकार होती है. अगर आप मुक्तिबोध से प्रभावित हैं तो हो सकता है आपके लेखन में उनकी झलक मिले परन्तु विषय, भाव , शैली, उद्देश्य और संवेदना के स्तर पर अगर रचना लेखक की है तो वह मौलिक रचना मानी जानी चाहिए( मेरी राय मे).
    किसी दूसरे की रचना को सन्दर्भ के साथ प्रस्तुत करते हुए अगर आप अपनी रचना लिखते है जो कि भावबोध में उस रचना से भिन्न है तो भी आपकी रचना मौलिक मानी जानी चाहिए.
    किसी प्रतिष्ठित रचनाकार की रचना में कुछ शब्दों या पंक्तियों का हेर-फेर करके प्रस्तुत की गयी रचना को मौलिक नहीं कहा जा सकता.
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई.
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  9. प्रस्तुति की स्वाभाविक श्वेता-शैली!

    उत्तर देंहटाएं
  10. रचनात्मकता का अर्थ है नवनिर्माण, जोड़ना, बनाना, सृजित करना आदि इस प्रक्रिया में विचार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. पहले विचार अस्तित्व में आता है फिर साधन,तकनीक और श्रम सृजन को फलीभूत करते हैं. बच्चे अनेकानेक तरह के प्रयोग करते हैं और कुछ अनौखा बनाकर ख़ुश होते हैं उन्हें इतिहास नहीं पता होता है कि ऐसी चीज़ें पहले भी बन चुकी हैं लेकिन उस रचनात्मक अभिव्यक्ति का हम संवर्धन और संरक्षण करते हैं ताकि रचनात्मकता अपने विशुद्ध रूप में प्रस्फुटित हो सके स्थापित हो सके. माँ को रोटी बनाते हुए देख नन्हा बच्चा भी उत्सुकतावश रोटी बनाने का यत्न करता है और उसे अनेक कोनों वाली रोटी देखकर हमें उसमें नवीनता और परिवर्तन नज़र आता है ,महसूस होता तब हम इस सृजन पर आल्हादित होते हैं क्योंकि हमारा मन-मस्तिष्क जानता है कि यह भले ही नक़ल है लेकिन कुछ नया है जिसमें कोमलता भरी मिठास का एहसास समाया होता है. अतः फ़्राँसीसी लेखक वाल्टेयर की मौलिकता पर कही गयी उक्ति सोचिये कितनी सटीक है-
    "मौलिकता कुछ भी नहीं सिवाय न्यायपूर्ण नक़ल के"
    आदरणीया श्वेता जी के द्वारा अग्रलेख में रचनात्मकता पर बहस के लिये उठाया गया प्रश्न सीधी बात नहीं करता बल्कि किसी अस्पष्ट लक्षित बिषय की ओर इशारा करता है.
    बहरहाल मैं तो यही कहूँगा इस बिषय पर कि रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिलना चाहिये और जो नकारात्मकता अथव नक़ल के साथ प्रसिद्धि पाना चाहते हैं वक़्त उनका साथ नहीं देता है. साहित्यिक रचनात्मकता में विचार,भाव, संवेदना एवं कल्पनाशक्ति जैसे आयाम अहम होते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. संक्षिप्त किंतु बेहतरीन, प्रभावशाली आलेख ।

      हटाएं
  11. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  12. सुंदर हलचल प्रस्तुति श्वेता जी की। रचनात्मकता पर लिखने के लिए समय तो नहीं निकाल पाई किंतु इतना जरूर कहूँगी कि जिस तरह से आप सभी चर्चाकार अपने अलग अलग अंदाज में रचनाओं की प्रस्तुति देते हैं, वह रचनात्मकता का एक बेजोड़ उदाहरण है। बहुत अच्छा संयोजन आज का। सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  13. श्वेता जी, बेहद सुंदर प्रस्तुति ।मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार ।मैं रविन्द्र जी के विचारों का अनुमोदन करती हूँ।
    प्रकृति की सुन्दरता, सामाजिक ,राजनैतिक घटनाएं प्रभावित होने वाले अनेक व्यक्तियों के सामने समान रूप से ही घटती हैं । बहुत स्वाभाविक है कि उनकी अभिव्यक्ति में समानता का अंश होगा ।उनके शब्द संकलन और भाव संयोजन द्वारा रचना में नवीनता झलकेगी जो व्यक्ति विशेष के लिए मौलिक होगी और स्वान्तः सुखाय भी ।

    रचनात्मकता एक ऐसी अनुभूति है जो सबसे पहले 'स्व'को तुष्ट करती है । किसी भी पठित रचना की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए वह रचना पाठक(लेखक) के हृदय को छुए, यह आवश्यक है । यदि पाठक लेखक की विचारधारा में बहता हुआ अपनी अनुभूतियों का उल्लेख करता चलता है तो ये अनुभूतियाँ ही उसकी मौलिकता है। प्रत्येक मौलिक अनुभूति विचारधारा के नवीन आयाम का परिचय देती है ।यह विचारधारा और साहित्य दोनों को ही समृद्ध करती है ।वैसे भी साहित्य की जिम्मेदारी है कि वह समाज को दर्पण स्वरूप स्वयं में ढाल ले इस दिशा में विभिन्न आयाम अवश्यम्भावी हैं

    इसकेि विपरीत यदि किसी रचना के शब्दों और विचारों को केंद्र में रखकर अनुभूतिविहीन नई रचना रची भी गयी तो वह अल्पायु ही होगी । मेरे विचार से अनुभूतिविहीन ऐसी रचनाओं को रचनात्मकता की श्रेणी मे भी रखना उचित नहीं होगा ।

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  14. रचनात्मकता सर्वव्यापी है....
    बहुत ही सुन्दर, सार्थक, विचारणीय,भूमिका के साथ उम्दा लिंक संकलन....

    उत्तर देंहटाएं

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