निवेदन।


समर्थक

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

1110....काश नगर में बगुले ना होते

जय मां हाटेशवरी.....
मन-मोहक लगता है ये सावन.....
हर तरफ भोले की जय-जयकार होती है.....
प्रत्येक घर देवालय बन जाता है.....
ये क्रम प्रत्येक महिने.....
कभी शिवरात्रि के रूप में....
कभी नवरात्रों के रूप में.....
कभी दिवाली, कभी दशहरा.....
कभी एकादशी, कभी पूर्णिमा, कभी संक्रांति......
नयी-नयी उत्तेजना, प्रेरणा तथा संकल्पों के साथ.....
जहां हमे धर्म-परायण बनाता है.....
हमे जीवन कैसे जीना चाहिये.....
मानव-जीवन का उदेश्य क्या है....
...ये भी सिखाता है.....
ये प्राचीन परंपरा ही.....
घर के बच्चों में संस्कारों का संचार करती है.....
पर हम आज अपनी इन पावन परंपराओं को छोड़कर.....
....
विदेशी संस्कृति को अपना रहे हैं...
इसी लिये हमारे बच्चों के संस्कारों में भी कमी आ रही है.....
रेप, चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है....
हम क्या थे.....क्या हो गये हैं....
भारत-भारती की इन पंक्तियों ने सब कुछ कह दिया है....
अब पेश है.....
आज के लिये मेरी पसंद.....


तू पत्थर सी मूरत बन जा
सीता का दुख और द्रोपदी अपनी महक लिए है।
जितना भी तपता है सोना उतनी चमक लिए है।
वैसे जूझ, बसो यादों में, सबके लिए मुहुरत बन जा।।
कल की एक जरूरत बन जा। तू पत्थर सी मूरत बन जा।।


भूलोगे कैसे
कुछ गीत मेरे, यूं दोहराओगे तुम,
सूने नैने छलक आएंगे,
कोयल, रुक-रुककर गाएंगे,
जलाएंगे, मन व्याकुल कर जाएंगे....


सीमाओं में कहाँ बँधा है
लिए हाथ में श्रम की लाठी
रच लेते ये नव परिपाटी
सपने आसमान के लेकिन
पाँव तले रहती है माटी
अपनी कूवत से कर लेते
सात समंदर पार
गगन के जाना जिनको पार


सावन
बहनें राह देख रहीं
भाई के आने की
साथ साथ रक्षाबंधन
मनाने की प्यार बांटने की |


हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे ...
बिजलियें, न बारिशें, ना बूँद शबनम की गिरी
रात छत से टूटते तारों को हम गिनते रहे
कुछ बड़े थे, हाँ, कभी छोटे भी हो जाते थे हम
शैल्फ में कपड़ों के जैसे बे-सबब लटके रहे
उँगलियों के बीच इक सिगरेट सुलगती रह गई
हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे



इतवारनामा: बच्चे बड़े होते हैं, माएं नहीं
मातृत्व एकतरफा पगडंडी है, चलते जाना होता है, रुकने का मन भी करे तो भी. मैं किताबों के पन्ने पलटने लगती हूं, अब समय सरपट दौड़ेगा.
“कुछ शॉपिंग भी की या बुक स्टोर ही गए”, बच्चे देखते ही पूछते हैं.
मैं चोरी पकड़ी जाने वाली नज़र से उन्हें देखती हूं. साथ-साथ ही तो चल रहे थे इनके, फिर भी बराबर रास्ता कहां तय पाए? ये तो बड़े भी हो गए..और मां?


काश नगर में बगुले ना होते
ज्ञान की तलाश प्रकाश है
और प्रकाश की तलाश में भटके हुए
कुछ गिने चुने लोग है
अब आप की बताओ साहब, कि 'इतने' से लोग
दीपक की टिमटिमाहट से जग को रौशन कर पायेंगे !

अब बारी है साप्ताहिक विषय की
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'ख्वाब'
...उदाहरण...
रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई
सुबह को जब हम नींद से जागे आंख उन्हीं से चार हुई

चाहे कहो इसे मेरी मोहब्बत, चाहे हंसी में उड़ा दो
ये क्या हुआ मुझे, मुझको खबर नहीं, हो सके तुम्हीं बता दो
तुमने कदम तो रखा ज़मीन पर, सीने में क्यों झनकार हुई
फिल्मः बुढ्ढा मिल गया
https://youtu.be/jFYlChHSdzo

उपरोक्त विषय पर आप को फिल्मी गीत चुनना है
गीत के बोल की चार पंक्तियाँ तथा वीडियो का लिंक देना है
यदि कोई इस विषय पर कविता देने को इच्छुक है तो
स्वागत है, यह क़दम तनिक मनोरंजक भी होगा ऐसा हमारा मानना है 

अंतिम तिथिः शनिवार 04 अगस्त 2018  
प्रकाशन तिथि 06 अगस्त 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 

सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




आने वाला समय सब के लिये मंगलमय हो......
ये सावन सब के लिये खुशियां लाए.....
बारिश से कहीं भी तबाही न हो.....
पाकिस्तान की नयी सरकार शांती-प्रीय हो.....
आतंकवाद मुक्त विश्व के सपने को साकार करने वाली हो.....
इसी कामना के साथ.....
मिलेंगे.....अगले मंगलवार को.....

धन्यवाद।








सोमवार, 30 जुलाई 2018

1109....हम-क़दम का उन्तीसवां कदम

किस्मत, भाग्य, तकदीर, प्रारब्ध या लक 
मानव जीवन से जुड़ा वह चमत्कारिक शब्द है, जिसके आकर्षण से वशीभूत मनुष्य मन अपनी भौतिक जीवन की सफलता में सकारात्मकता और नकारात्मकता का निर्धारण करता है।

कहते है मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।
मनुष्य के कर्मों की शुभता या अशुभता के फल पर ही उसका 
भविष्य निर्माण होता है।
अपने जीवन में घटित होने वाली किसी अच्छी या बुरी परिस्थितियों 
के लिए भाग्य की सराहना या आलोचना करना अकर्मण्यता 
के सिवा कुछ नहीं।
इतिहास साक्षी है कि कर्म प्रधान व्यक्तित्व जिन्होंने बड़े संघर्षों से हर बाधा को पार किया,कर्मठ रहे उनका नाम अमर हो गया। चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो मनुष्य का लग्न, परिश्रम और समर्पण किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर किस्मत का धनी बना देता है।
हाँ यह सही है कि कुछ परिस्थितियाँ हमारे कर्म के द्वारा निर्धारित नहीं होती, कुछ प्रकृति प्रदत्त चमत्कारिक शुभ या अशुभ उपहारों के आगे हम विवश होते है और समय हमारी समझ से परे होता है इसे किस्मत की संज्ञा दी जा सकती है।
पर, चाहे परिस्थितियाँँ कितनी भी विपरीत हो, किस्मत की हाथों की कठपुतली न बनकर अपने कर्मों ज्योति से अपने जीवन के अँधियारे को भगाने का संकल्प ही सफलता और खुशहाली की कुंजी है।

इस सप्ताह के विषय किस्मत पर रची गयी आप सभी की सारगर्भित,सरस, भावपूर्ण रचनाओं ने एक बार फिर आपकी लेखनी के आगे नतमस्तक कर दिया है।
आपकी सृजनात्मकता को सादर नमन।
 चलिए आपके द्वारा सृजित रचनाओं के सुंदर संसार में-

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की लेखनी.से

भाग्य, नसीब,
किस्मत क्या है ?
बस कर्मो से संचित
निधि विपाक
बस सुकृति से
कुछ कर्म गति मोड़
और धैर्य संयम से
सब झेल
◆★◆
आदरणीया आशा सक्सेना जी की लेखनी से-

ऊँचाई पर जाओ 
सफलता का ध्वज फहराओ 
और सबकी दुआएं पाओ 
बनो प्रेरणा आने वाली पीढ़ी की 
घर बाहर दोनों में सक्रिय 
निराशा से कोसों दूर 
कर लो किस्मत को अपनी मुट्ठी में 
और बनो अनूठे गुणों का गुलदस्ता ! 

◆★◆
आदरणीया डॉ.इन्दिरा गुप्ता जी की दो रचना

किस्मत की क्या बात कहे 
किस्मत की अजब बिसात 
किस्मत ने कर डाले भय्या 
कई अजब से काज ! 
लक्ष्मी नारायण भीख मांगते 
दुर्बल सिंह मुटियाये 
शांति बहन रहे अशांत सी 
दिन दिन  भर बतियाये ! 

🌸

मन्नत का धागा बांधों 
या अरमानों की अर्जी 
देने वाला तभी देता 
जब होती उसकी मर्जी ! 
कोई इसको किस्मत कहता 
कोई कहता भाग्य 
मिलना होगा तभी मिलेगा 
चाहे जितना भाग ! 
◆★◆
आदरणीया साधना वैद जी की लेखनी से

लोगों की सुन ऐसी बातें
'किस्मत' सिर धुनती है
अपनी ही किस्मत पर खुल कर
खूब हँसा करती है  !

मत भूलो नादान कि
किस्मत भी तब ही चमकेगी 
मन हो संकल्प और पुरुषार्थ 
तभी दमकेगी ! 

◆★◆
आदरणीया शुभा मेहता जी की कलम से
रख आँख तेरी लक्ष्य की ओर ।
कोई कहे अच्छी है किस्मत
कोई कहे बुरी है किस्मत
बात-बात पर कोसें किस्मत
पाना चाहे इसी के सहारे सब कुछ
◆★◆
आदरणीया नीतू ठाकुर जी की लेखनी से

न जाने किसके हाथ हैं किस्मत के फैसले 
बढ़ती ही जा रहीं हैं राहों की मुश्किलें 
सजदा करें तो किसके दर पर करें बता
कब तक रहेंगे कायम इस दिल के हौसले 
◆★◆
आदरणीया अनुराधा चौहान जी की रचना

किस्मत को अपनी
दीप आस का
जलाएं हम
क्यों कोसे हम
वजूद को अपने
खुद की नई दुनियाँ
बनाएं हम
◆★◆

आदरणीया सुप्रिया" रानू" जी की लिखी रचना
ये तकदीर भी तदबीर से बनती है,
हाथ की ताकत को ही किस्मत भी साथ देती है,
जी भर के कर लो अपनी खुद्दारी का इस्तेमाल 
दे देगी किस्मत भी हीरा अपनी झोली खंगाल


आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।

अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ

-श्वेता सिन्हा

रविवार, 29 जुलाई 2018

1108......चाँद भी पीले से लाल होना चाह रहा है

किसी को नाराज करेंगे तो
गुसियाना लाज़िमी है
और गुसियाया हुआ प्राणी
तो लाल-पीला होता ही है
ये तो फिर चाँद है...कल
विशेष दिन पर उसको
ढांकने की कोशिश कर दिए तो
पूरा लहू उसके चेहरे पर आ ही गया
...............
सादर अभिवादन...
चलिए चलें सावनी पूजा शुरु करें
..........


सावन की गठरी.........कुसुम कोठारी
सावन की गठरी में
कितने अनमोल रत्न भरे ।

भूले किस्से यादों के मेले
इंद्रधनुषी आसमान
बरसती बूंदों की
गुनगुनाती बधाईयां
थिरकता झुमता तन मन
अपनों से चहकता आंगन
सौरभ से महकती बगिया
मिट्टी की सोंधी सुगंध ।

"शिव स्तुति"....मीना भारद्वाज
श्रावण मास…. 
भगवान शिव की आराधना का पावन महिना
करुणानिधि हो , जगपालक हो ।
विनती सुन लो , शिव शंभु प्रभो ।।

 निज जान कृपा , रखना प्रभु जी ।
कर जोरि खड़े , करते विनती ।।

तुम ही जग की , रचना करते ।
भव सागर पार , लगा सकते ।।

दिल भी दफ़्तरी हो गया....रश्मि शर्मा
ऐसे ही तुम्हारे जाने के बाद
बड़ी कड़ाई से लेती हूँ
अपने दिल का हिसाब
किन बातों पर यह पिघलता है
और किन बातों से प्यार मरता है बार-बार
कब मजबूर होकर देती हूँ
तुमको आवाज़
कब चाहती हूँ लौटा लाना अपने पास
और बीते दिनों के खोए एहसासों का
मुआवजा भरना चाहती हूँ

बारिश में....ओंकार केडिया

देखते हैं 
कि बंद पलकों पर 
जब बूँदें गिरती हैं,
तो कैसी लगती हैं,
जब बरसते पानी से
बाल तर हो जाते हैं,
तो कैसा लगता है.

आया सावन.....मालती मिश्रा 'मयंती'
रिझरिम रिमझिम बरसे सावन
लगे नाचने मोर
टर टर करते दादुर निकले
धूम मची चहुँओर ।।


आदमी.........बर्ग वार्ता

आदमी यह आम है बस इसलिये नाकाम है
कामना मिटती नहीं, कहने को निष्काम है।

ज़िंदगी है जब तलक उम्मीद भी कैसे मिटे
चार कंधों के लिये तो भारी तामझाम है।

काली घटा छाई हुई उस पे अंधेरा पाख है
रात ही बाकी है इसकी सुबह है न शाम है।



अथः शीर्षक कथा..
उलूक टाईम्स.....डॉ. सुशील जी जोशी


इतिहास का 
पहला वाकया है 

चाँद भी 
पीले से 
लाल होकर 
अपना क्रोध 

कलियुगी 
गुरु के 
साथ पूर्णिमा 
को जोड़ने 
की बात पर 
दिखा रहा है 

हम समझते हैं ये पर्याप्त है
आज रविवार के लिए

दें आदेश...
यशोदा









शनिवार, 28 जुलाई 2018

1107... उलझन



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

आसाढ़ में सूखा पड़ा तो चिंता
सावन में बारिश शुरू हुई तो चिंता


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उलझन

कविता के लिए वक्त निकालना
आपाधापी भरी जिंदगी में कुछ पल
अपने लिए तलाशना है
कविता एक चाहत है ,
अनुभूतियों को आयाम देना ,
शब्दों से खेलना और बातें करना है.
पर और भी बहुत कुछ है
करने के लिए जिंदगी में वक्त कम

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उलझन

समझदार हो गया हूँ या अभी कुछ नादानी बाकी है !
बेखबर हूँ खुद से मगर लगता है अब सुलझन में हूँ !!

जिंदगी की कशमकश में मशगूल कुछ इस तरह है !
बना बहाना वक़्त का अपनों से दूर बिछडन में हूँ !!

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उलझन

इश दुनियाँ (परिवार) में दीप न जलता , तो लगता है आया काल |
काल रूपी जब दीप जला तो , खुशियाँ बनती है जौजाल ||

जब खुशियाँ उठती है ऊपर , तो आते है काल का छाँव |
इश छाँव में जल जाते है , ऊपर -ऊपर के ही पाँव ||


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उलझन

अब बस हुआ, अब बस करो मुझको नही रहना यंहा,
अब बस हुए ये दर्द और उलझन भरी ये ज़िन्दगी।

जाने दो मुझको दूर, ये सब नही मेरे लिये,
चाहूँगी उसको उम्र भर पर वो नही मेरे लिए।


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उलझन

वक़्त के दरख़तों पर यादें कईं कईं है,
कुछ पड़ी धुँधली कुछ यादें नयी नयी है,
आशाओं के पुलिंदे फिर भी बांधता है इंसान,
कुछ समझ नहीं आता,
क्या चाहता है इंसान |


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हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का उन्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'किस्मत'
...उदाहरण...
मानना होगा इसे और
करना होगा संतोष
क्योंकि - वक्त से पहले और
किस्मत से ज्यादा नहीं मिलता
किसी को भी, कभी भी कुछ।

किस्मत भी बनाना पड़ता है -
सदैव कर्मरत रहकर।
कर्मों का यही हिसाब देता है
हमको वह फल, जो आता है
इस लोक और परलोक में
दोनों ही जगह काम।
-देवेन्द्र सोनी

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
कविता लिखना है.....

आप अपनी रचना शनिवार 28 जुलाई 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 30 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें



शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

1106....दिमाग बन्द करते हैं अपने चल, पढ़ाने वाले से पढ़ कर के आते हैं

"अपने सपनों को सच होने से पहले आपको सपना देखना होगा।"

"अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते है तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो।"

"जीवन में कठिनाइयाँ हमे बर्बाद करने नहीं आती है, बल्कि यह हमारी छुपी हुई सामर्थ्य और शक्तियों को बाहर निकलने में हमारी मदद करती है| कठिनाइयों को यह जान लेने दो की आप उससे भी ज्यादा कठिन हो।"

"आकाश की तरफ देखिये। हम अकेले नहीं हैं। सारा ब्रह्माण्ड हमारे लिए अनुकूल है और जो सपने देखते हैं और मेहनत करते हैं उन्हें प्रतिफल देने की साजिश करता है।"

उपर्युक्त प्रेरक और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण विचार डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के हैं। 15 अक्टूबर 1931 को जन्मे हमारे देश के 11वें राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, मिसाइल मैन,युवाओं की प्रेरणा भारत रत्न डॉ.कलाम ने देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया।
27 जुलाई 2015 को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट शिलांग में एक व्याख्यान देने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
सादर सुमन अर्पित भारत के सच्चे सपूत को।
सादर नमस्कार

चलिए अब आज की रचनाओं की ओर-
आदरणीय विश्वमोहन जी की अद्भुत लेखनी से निसृत
सिंचित सैकत कर उर उर्वर,
प्रस्थित प्रीता, अपरा प्रियवर.
विरह विषण्ण विकल वेला 'मैं'!
महोच्छ्वास, निःशब्द, नि:स्वर!
●★◆

आदरणीय संजय जी की कलम से प्रवाहित

मेरी छाया से ही मुझे हौसला मिलता है !
क्योंकि नाते रिश्तेदार तो 
समय के साथ ही चलते है 
पर धूप हो या छाँव 
छाया हमेशा साथ रहती
●★●

आदरणीया कुसुम जी की लेखनी से
चांद अपनी सुषमा के साथ
        मेरी ही खिडकी पर बैठा
      थाप दे रहा था धीमी मद्धरिम
  विस्मित सी जाने किस सम्मोहन मे
      बंधी मैं छत तक आ गई
     इतनी उजली कोरी वसना
●★●
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की लेखनी से 
भ्रम ने जाल बुने थे कुछ सुंदर,
आँखों में आ बसे ये आकर,
टूटा भ्रम, जब सत्य का भान हुआ
●★●

आदरणीया अभिलाषा "रोली" जी की रचना
ये किस्से भी न

झूठ के पांव से चलते हैं किस्से
बहुत लंबी होती है इनकी उमर
हर मुसाफिरखाने पर रुकते हैं
करते ही हैं थोड़ी सी सरगोशी हवाओं में
फिर बांधकर पोटली निकल पड़ते हैं;
●★●
और चलते-चलते उलूक के पन्ने से 
आदरणीय सुशील सर की अभिव्यक्ति-

इस 
सब से 
ध्यान हटाते हैं 

शेरो शायरी 
कविता कहानी 
लिखना लिखाना 
सीखने सिखाने 
की किसी दुकान 
तक हो कर 
के आते हैं 

कई साल 
हो गये 
बकवास 
करते करते 
एक ही 
तरीके की 


★◆★

आज का यह अंक आपको.
कैसा लगा कृपया अवश्य बताये।
इस सप्ताह के विषय के लिए
यहाँ देखिए

कल मिलिए आदरणीया विभा दी से उनकी विशेष प्रस्तुति के साथ

श्वेता सिन्हा

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

1105...ये ग़मों की रात लम्बी है या मेरे गीत लम्बे हैं...

सादर अभिवादन।
सावन का महीना परसों से आरम्भ हो जायेगा। हरीतिमा से 
आच्छादित धरा का सौंदर्य सावन में बहने वाली
मनमोहक बयार और पक्षियों का प्यारा कलरव आदि हमारी कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं। मन-मस्तिष्क ऊर्जावान होकर सृजन के नये-नये आयाम स्थापित करने को तारतम्य का आधार बनाते हैं। आषाढ़ भी किसान के  लिये अत्यंत महत्वपूर्ण महीना है।

आइये अब सृजन संसार की  झलकियों का रसमय अवलोकन करें-   




सावन के झूले पड़े
तुम चले आओ
दिल ने पुकारा तुम्हें
तुम चले आओ
तुम चले आओ...




ये  ग़मों की  रात लम्बी है या मेरे गीत लम्बे हैं -
 ना ये मनहूस रात खत्म होती ना मेरे गीत खत्म होते 
ये जख्म हैं इश्क  
के यारो -इनकी क्या दवा होवे  -
ये हाथ लगाये भी दुखते हैं  मलहम लगाये भी दुःख  जाते !!!!!




My photo

कदम-कदम पे रौनक होगी
हर चेहरे पर खुशियाँ होंगी
जीवन सरल-सुनहरा होगा
खुशियों के बरसात से जैसे
घर-आँगन मुस्कुराएगा



मेरी फ़ोटो

     नक्श दिल से मिटाये हमारे ।
     फिर हमें भी लगावट नहीं है ।।
     इश्क  करना बुराई  कहां है ।
     हम करें यह इनायत नही है।।




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एक समय था कि इलाहाबाद हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा तीर्थ था। उसकी चमक, ठसक, शान और शोहरत का लोहा चतुर्दिक था। बड़ी बात यह कि उसकी अपनी संस्कृति शैली और मौलिकता थी। बड़े कवियों की परंपरा से संपन्न होने के बावजूद वह कथा की तरह दिलचस्प, सच्चा, काल्पनिक और खुरदुरा था। उस इलाहाबाद को अपने अनुभवों के आधार पर रच रही हैं — प्रसिद्ध कथाकार और कथेतर गद्य में अप्रतिम ममता कालिया। — अखिलेश (तद्भव से साभार)


और देखिए नये विषय की जगह
हम-क़दम के उन्तीसवें क़दम का विषय
इधर है


 आज के लिये बस इतना ही 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

कल  की प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी 

रवीन्द्र सिंह यादव  

बुधवार, 25 जुलाई 2018

1104..कोई खूशबू आती नहीं ..


।।प्रात:वंदन।।

भीड़ तंत्र पर बात चली है 
बेरोजगार भटके युवकों की राह बदली है

पर कहते हैं..


"भीड़ में सब लोग अच्छे कहाँ होते हैं

अच्छे लोगों की भीड़ भी कहाँ होती है"


इसी सोच के साथ रूख करते हैंं आज के लिंकों की ओर..✍




आदरणीया रश्मि शर्मा जी की संवेदनशील शब्दावली..



नहीं भीगी हूँ बौछारों में
बस ज़रा सी हरारत है, परेशान ना हो
सो जाऊँ , रख दूँ सीने पर सर
ओह, ये वो गंध नहीं
तुम्हारी देहगंध नहीं
जाने दो अब, कोई बुलाता है
आँखें झपकी जा रही
पहचान पा रही हूँ अच्छे से
चिरप्रतिक्षित, यह तो मृत्युगंध है




आदरणीया अजित गुप्ता जी..एक और विचारणीय प्रस्तुति..





लोकतंत्र में छल की कितनी गुंजाइश है यह अभी लोकसभा में देखने को मिली। कभी दादी मर गयी तो कभी बाप मर गया से लेकर ये तुमको मार देगा और वो तुमको लूट लेगा वाला छल अभी तक चला है,




आदरणीया अनुराधा चौहान जी की..






मकां तो सब बनाते हैं
खूब शान से सजाते हैं

रखते हैं हर साधन

धन भी खूब लगाते है

रंगते है महंगे कलर से

प्यार का रंग नहीं भरते




आदरणीय मीना शर्मा जी की अनुरोध करती रचना..

इक बार ज़ुबां से कह भी दो,
जो लेन-देन का नाता था
अब उसका मोल बता भी दो !
इतनी इनायत और करो.....








फूट रही है धार रसीली

सुरभित है बरखा की छाँव

डोले पात-पात,बोले दादुर

मोर,पपीहरा व्याकुल आतुर

और अंत करती हूँ आदरणीया श्वेता जी की मनमोहक बरखा ..आनंद ले..
और देखिए नये विषय की जगह
हम-क़दम के उन्तीसवें क़दम का विषय
इधर है


।।इति शम।।
धन्यवाद

पम्मी सिंह..✍


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