।।प्रात:वंदन।।
भीड़ तंत्र पर बात चली है
बेरोजगार भटके युवकों की राह बदली है
पर कहते हैं..
"भीड़ में सब लोग अच्छे कहाँ होते हैं
अच्छे लोगों की भीड़ भी कहाँ होती है"
इसी सोच के साथ रूख करते हैंं आज के लिंकों की ओर..✍
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नहीं भीगी हूँ बौछारों में
बस ज़रा सी हरारत है, परेशान ना हो
सो जाऊँ , रख दूँ सीने पर सर
ओह, ये वो गंध नहीं
तुम्हारी देहगंध नहीं
जाने दो अब, कोई बुलाता है
आँखें झपकी जा रही
पहचान पा रही हूँ अच्छे से
चिरप्रतिक्षित, यह तो मृत्युगंध है
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लोकतंत्र में छल की कितनी गुंजाइश है यह अभी लोकसभा में देखने को मिली। कभी दादी मर गयी तो कभी बाप मर गया से लेकर ये तुमको मार देगा और वो तुमको लूट लेगा वाला छल अभी तक चला है,
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मकां तो सब बनाते हैं
मकां तो सब बनाते हैं
खूब शान से सजाते हैं
रखते हैं हर साधन
धन भी खूब लगाते है
रंगते है महंगे कलर से
प्यार का रंग नहीं भरते
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अब उसका मोल बता भी दो !
इतनी इनायत और करो.....
इक बार ज़ुबां से कह भी दो,
जो लेन-देन का नाता थाअब उसका मोल बता भी दो !
इतनी इनायत और करो.....
फूट रही है धार रसीली
सुरभित है बरखा की छाँव
डोले पात-पात,बोले दादुर
मोर,पपीहरा व्याकुल आतुर
और अंत करती हूँ आदरणीया श्वेता जी की मनमोहक बरखा ..आनंद ले..
और देखिए नये विषय की जगह
हम-क़दम के उन्तीसवें क़दम का विषय
इधर है
और देखिए नये विषय की जगह
हम-क़दम के उन्तीसवें क़दम का विषय
इधर है
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍




