निवेदन।


समर्थक

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

1245...जिस हाथ ख़ज़ाने की चाभी उस पाले दे ताली....

सादर अभिवादन। 
वो 
देखो 
मीडिया 
जिस हाथ 
ख़ज़ाने की चाभी 
उस पाले दे ताली।


आइये अब आपको आज की ख़ास रचनाओं की ओर ले चलें - 


एक पैदाइशी आलोचक का
अपने मित्रों से एक निवेदन......
प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जसवाल 

 à¤®à¥‡à¤°à¥€ फ़ोटो

मैं अराजकतावादी नहीं हूँ और न ही लोकतंत्र की तुलना में तानाशाही का हिमायती हूँ लेकिन मैं यह मानता हूँ कि लोकतंत्र में शासक की नकेल कसने का अधिकार जनता का होना चाहिए और नीति निर्धारण में शासक की सनक से अधिक महत्व, उस विषय के विशेषज्ञों की राय को दिया जाना चाहिए.   



आज भी यहाँ शीर्ष राजनैतिक व्यक्तित्व मसखरी 
करते हुए तथ्यों से, आँकड़ों से खिलवाड़ करते हुए मतदाताओं को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. इक्कीसवीं सदी का मतदाता, जिसे जागरूक 
कहकर पुकारा जाने लगा है, वह भी सहजता से इस मसखरी का शिकार बनता हुआ खुद ही हँसी का 
पात्र बन रहा है. जहाँ स्वार्थ भरा एक कदम किसी 
दल को आगे खड़ा कर देता है, कहीं एक वस्तु का लालच उस व्यक्ति को सबसे आगे ला देता है, जहाँ जिसे चोर बताते थका नहीं जाता है उसी के हाथों में अपना भविष्य सौंप दिया जाता है.




है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ
मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ



मलिन हुई मेरी जलधारा,
सबने मुझसे किया किनारा।
मां कहते-कहते नहीं थकते,
मेरी दशा को कभी न तकते।
ऐसा न हो मैं थक जाऊं,
बहते-बहते मैं रूक जाऊं।


ख़्वाबों मेरे, मरो डूबकर
तुम तो धीरे-धीरे,
इस अपात्र को अब तक आख़िर
हर जीवित ठुकराया है।

चलते-चलते "उलूक टाइम्स" की सरल पहेली को सुलझाने का प्रयास कीजिये-  

सफेद चूहों 
को देखा है 
खोदते हुऐ 
एक मकान
की जड़ों को 
कल तक
आज काले 
उधर की तरफ 
झाँक रहे हैं

हम-क़दम के उनचासवें अंक का विषय
यहाँ देखिए

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी

रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

1244..हिदायत है हमें कम सुनो ..



।।प्रातः वंदन।।


जनतंत्र के पर्व को मद्देनजर रखतें हुए ..
शेर पर गौर फरमाइए..



जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे

किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

राहत इन्दौरी 



इसी के साथ आगे बढ़ते हुए लिंकों पर नजर डाले. ..✍

🔷🔷



ब्लॉग उम्मीद तो हरी है ..से



इस धरती पर 
कुछ नया 
कुछ और नया होना चाहिये-----

चाहिये 

अल्हड़पन सी दीवानगी 

जीवन का 

मनोहारी संगीत 

अपनेपन का..

🔷🔷




थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से ...

कहाँ से आई कहाँ चूम के गई झट से 

शरारती सी थी तितली निकल गई ख़ट से

हसीन शोख़ निगाहों में कुछ इशारा था 
न जाने कौन से पल आँख दब गई पट से..
🔷🔷


ब्लॉग तिरछी नज़र ..से




यह किस्सा मुझे मेरे मौसाजी, स्वर्गीय प्रोफ़ेसर बंगालीमल टोंक, जो कि आगरा कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे, उन्होंने सुनाया था.

नेहरु जी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री आवास, 'तीन मूर्ति' को नेहरु पुस्तकालय और संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया था (सरकारी भवन का दुरूपयोग).
सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में यह भारत का सर्वश्रेष्ठ पुस्तकालय कहा जा सकता है...
🔷🔷


उन्मुक्त उड़ान से..




दुनियाँ की समझदारी सीखी थी

तन बलवान और माथा नर्म

दुनिया जीत लेने का उमंग

तभी बुढ़ापे ने दस्तक दी

सब कुछ सिमट गया

जवानी दौड गुजारी थी

रात दिन सब एक किया
अच्छा, बुरा सब भूलकर
घर को ही बाज़ार बनाया था..
🔷🔷
आज की प्रस्तुति की समाप्ति..
शुभम जी के ग़ज़ल के साथ..




आज से तुम्हें भूल जाने का वादा करते हैं।

मिरी जिस्मों जाँ में बसे हो तुम,तुम कहते हो

सो आज ख़ुद से मनमानी कुछ ज़्यादा करते हैं।

🔷🔷

चलते.. चलते..

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है,

पहले आँखे छीन लेती है फिर चश्में दान करती है... 
(अज्ञात)

हम-क़दम के उनचासवे अंक का विषय
यहाँ देखिए


।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍


मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

1243....शिशिर धूप जब आती है


जय मां हाटेशवरी......
आज ठंड और दिनों से कुछ अधिक है......
हमारे क्षेत्र में मौसम-विभाग की ओर से तेज बारिश व बर्फबारी की चेतावनी  जारी हुई है....
5 राज्यों के चुनाव परिणामों पर, विभिन टीवी चैनलों के एक्जिट पोल भी आ गये हैं.....
इस लिये आज  उतसुकता कुछ अधिक है......
बेशुमार पैसा खर्च होता है.....
हमारे देश में चुनाव पर......
कभी लोक-सभा चुनाव पर.....
कभी विधान-सभा चुनाव पर.....
कभी पंचायत, नगर निगम, नगर परिशद चुनाव पर.....
सोच रहा हूं.....
आज कल सब कुछ Online होता है.....
हम सभी के पास आधार कार्ड भी हैं.....
फिर वोट भी Online क्यों नहीं डाले जाते.....
Mobile OTP से  पारदर्शिता लाई जा सकती है......
जहां तक धांधली या गड़बड़ी की बात है......
वो तो कई खरबों रूपया खर्च करके भी होती है......
....काश ये सत्य हो पाता......
.....कम से कम चुनाव पर खर्च होने वाला ये पैसा......
.....देश के विकास कार्यों में उपयोग हो सकता था.....
....अब देखिये आज के लिये मेरी पसंद.....



ओ उम्र के तीसरे पहर में मिलने वाले
ठहर, रुक जरा, बैठ , साँस ले
कि अब चौमासा नहीं
जो बरसता ही रहे और तू भीगता ही रहे
यहाँ मौन सुरों की सरगम पर
की जाती है अराधना
नव निर्माण के मौसमों से
नहीं की जाती गुफ्तगू


जब बुझते हैं सारे तारे
ऊषा अपनी पंख पसारे
कोमल-कोमल कुसुम-कली पर
ओस की बूंदें लगते प्यारे.
निशीथ सबेरा है सुहावना
बिखरी धरा पर स्वर्ण-ज्योत्सना
पुलक भरी मादक भरी
ह्रदय में भरती स्नेह भावना.



पूरे साल का खाता बही फिर से याद आ रहा है देश तो सागर है 
काहे परेशान होना है मत झाँकिये
कुछ
अपने जैसों के
साथ मिल कर

 नियमों की
धज्जियाँ टाँकिये

मूँछों हों तो
ताव दीजिये

नहीं हों तो
खाँचे में मूँछ के


केंद्र की आया दीदी से बात करते हुए ऐसे कई बच्चों की लोमहर्षक कहानियाँ सुनीं। 
कुछ बच्चे विदेशों में भी गॉड दिए जाते हैं।
पूछने पर कि गोद देने के बाद इन बच्चों की मॉनिटरिंग कैसे की जाती है ? आया दीदी ने बताया कि 
तीन साल तक हर तीन महीने में उनके घर जाकर देखा जाता  है। उसके
बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं उन्हें पता न चले कि गोद दिया गया है इसलिए संस्था के पदाधिकारी 
मेहमान बन कर मिलने जाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि कई बच्चे तो
बड़े होकर खुद पता लगते हैं कि वे कहाँ से गोद लिए गए हैं और फिर हमारे यहाँ मिलने 
आते हैं दान और अन्य सेवाएं देते हैं।


संसृति मृत होती नहीं,
ना ही घन,
ना ये नदियाँ,
ना ही मिटते नभ के तारे,
सब हैं...
इस मौसम के मारे,
ना इन पर उपहास करो
तुम विश्वास भरो...


गुरुर  में   हिलोरे  मार  रहा  मन ,  क़दमों   का  जुनून   देखिये,
रग   रग  में    दौड़ता   देश   प्रेम,   वरदी   को  छू   कर   देखिये |
ठंड  की  ठिठुरन , गर्मी   की   तपन,  प्रकृति  का  ऐसा  रुप  देखिये,
कैसे  होती  है  मुल्क़  की  हिफ़ाज़त   जवानों की   आँखों  में  देखिये ?


लगता है मैं खुद की तलाश में हूँ
प्यार की तलाश में हूँ
जीवन की खोज में हूँ
इसलिए अक्षरों की
शरण में आई हूँ
उनसे पक्की दोस्ती कर
जीना चाहती हूँ
जानना चाहती हूँ
समझना चाहती हूँ
वो जो स्पष्ट नहीं

तुम बोलो
कि तुम नहीं हो कोई दीवार
जो चुनी होती हैं सख्त ईंटों से
ताकि ढह ना जाए।

या तुम भी चुने गए हो
सख्त ईंटों से
कि ढह जाओगे
भरभराकर?

चाँद दिखाये मीरा तुम ज़हर पिलाना,
मेरी हसरतो को कुचलकर शहनाईयां बजाना..

अपने अंजाम में कुछ रोमानियत तो हो,
हल्दी के हाथ से सज धज तुम मेरा गला दबाना,

के जैसे बजती हैं शहनाइयां सी राहों में
कभी कभी मेरे दिल में, ख़्याल आता है
के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँही
उठेगी मेरी तरफ़ प्यार की नज़र यूँही
मैं जानता हूँ के तू ग़ैर है मगर यूँही
कभी कभी मेरे दिल में, ख़्याल आता है


हम-क़दम की बारी
उन्चासवाँ अंक
विषय
शिशिर
उदाहरणः
मंद-मंद हंसता है प्रभात
शिशिर धूप जब आती है.
सांय-सांय बहता है पवन
सिहर-सिहर उठता है बदन
रवि-किरण तन को छूती है
अनुरागी हो जाता है नयन.

रचनाकार
सुश्री भारती दास

प्रविष्टिया दिनांक 15 दिसम्बर 2018 तक प्रेषित करें
प्रकाशन दिनांक 17 दिसम्बर 2018
धन्यवाद।



सोमवार, 10 दिसंबर 2018

1242..हम-क़दम का अड़तालिसवाँ कदम.....शहनाई

आज हम..
सखी को आज कोई कार्य विशेष है
परिस्थिति विशेष मे ऐसे अवसर आ जाया करते हैं...


शहनाई (तूती)
प्रसिद्ध क्यूँ हुआ..

शहनाई और बिस्मिल्ला खां
शहनाई का जिक्र 
भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां के जिक्र के बिना अधूरा है,
एक सामान्य से लोक वाद्य-यंत्र को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में 
उनका योगदान अभूतपूर्व रहा है।
बिहार के डूमरांव में जन्मे अमीरूद्दीन का पालन-पोषण संगीत की लय और तान के बीच ही हुआ था।५-६ वर्ष की अवस्था में वे अपने नाना के यहां काशी आ गए।नाना और मामा काशी के पुराने बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई वादन करते थे। यहां बालक अमीरूद्दीन को अपने चारों ओर शहनाईयां ही दिखाई देती। फिर उसे भी रियाज के लिए बालाजी के मंदिर के नौबतखाने में भेजा जाने लगा।काशी तो है ही संगीत की नगरी, नौबतखाने की ओर जाते हुए अमीरूद्दीन को हर घर से संगीत की स्वर-लहरियां सुनाई देती। जिन्हें सुन-सुनकर उसे संगीत के आरोह-अवरोह का बखूबी ज्ञान हो गया था। धीरे-धीरे शहनाई और बिस्मिल्ला खां एक-दूसरे के पूरक बन गए।काशी में आयोजित संगीत समारोह उनके बिना अधूरे रहते। बढ़ती ख्याति केसाथ ही शहनाई-वादन में उनकी सिद्धहस्तता बढ़ती चली गई। देश-विदेश में होने वाले शास्त्रीय संगीत समारोह में उनका शहनाई-वादन अनिवार्य सा हो गया।

रचनाकारों के द्वारा रची गई अभूतपूर्व रचनाएँ पढ़िए....

तुम भी औरों जैसे ही निकले
स्वार्थी, हृदयहीन और निर्मम !
तुम्हें तो बस औरों की
वाहवाही लूटने से मतलब है
महसूस किया है कभी 
मुझ जैसी शहनाई का दर्द 
कभी सोचा है मुझ पर क्या गुज़रती है
जब मेरे तन के हर छेद पर
तुम्हारी ये उँगलियाँ नाचती हैं !

पीली  हल्दी ,  चमके  कंगना, 
लाल   चुनरियाँ,  सुर्ख   जोड़ा  
सिंदूरी   मंद -मंद  मुस्काई 
सप्त   फेरों  में  मिले  क़दम 
रिश्तों   की   गाँठ   सुहानी 
अश्रु    से  भीगी   खुशियां 
पुरवाई   संदेश  है   लाई 
गूँज   उठी   मीठी   शहनाई

गूंज उठी मधुर शहनाई
सजी चूड़ियां गोरी की कलाई
चल दी गोरी पिया की गली
आंखों में ढेरों सपने लिए
होंठों पर ढेरों नगमे लिए
ओढ़ के प्रीत की चुनरी
चल दी गोरी पिया की गली

दूर कहीं शहनाई बजी
आहा! आज फिर किसी के
सपने रंग भरने लगे
आज फिर एक नवेली
नया संसार बसाने चली
मां ने वर्ण माला सिखाई
तब सोचा भी न होगा
चली जायेगी

प्रातः काल तबले की थाप पर
शहनाई वादन   
बड़ा सुन्दर नजारा  होता
भ कार्य का आरम्भ  होता
प्रभाती का प्रारम्भ
हनाई से ही होता
नि इतनी मधुर होती कि
कोई कार्य करने का
न ही न होता

क्यूँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में?

अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई,
सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई,
खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के,
चंद बूंदे मोतियों के,आ छलक पड़ते हैं इन नैनों में...

गूंज हूं मैं अकेला,
संग गूंजेंगी ये विरानियाँ,
दो पग भी चले,
बन ही जाएंगी पगडंडियाँ,
पथिक भी होंगे,
यूं ही बजेंगी शहनाईयां....

चारों तरफ बज रही शहनाई है
मेरे घरोंदे में चाँदनी उतर आई है ।

पड़ोसी के चेहरे पे उदासी छाई है
लगता है उनको चाँद ने घूस खाई है ।

उदाहरण स्वरूप ''मेरी धरोहर'' में प्रस्तुत रचनाएँ

सुधियों में हम तेरी
भूख प्यास भूले हैं
पतझर में भी जाने
क्यो पलाश फूले हैं
शहनाई गूँज रही
मंडपों कनातों में।

मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई

दूर कहीं दो आंखें भर भर आईं सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात।

रचनाएँ पसंद आई होंगी..रचनाकारों का मनोबल बढ़ाइए
उन्चासवाँ विषय कल के अँक में देखना न भूलिए
सादर
यशोदा



रविवार, 9 दिसंबर 2018

1241...दिसम्बर ने दौड़ना शुरु कर दिया तेजी से बस जल्दी ही साल की बरसी मनायी जायेगी

सादर अभिवादन....
आज का अंक हमारे जिम्मे....
कोशिश करते हैं
अद्यतन रचनाएँ पढ़वाने की....


स्वप्न....श्वेता सिन्हा

दरबार में ठुमरियाँ हैं सर झुकाये
सहमी-सी हवायें शायरी कैसे सुनायें
बेहिस क़लम में भरुँ स्याही बेखौफ़ 
तोड़कर बंदिश लबों की, गीत गाऊँ



पहले मिलन का एहसास..... रेवा

हर बार जाने किस 
तलाश में ये वाक्या 
बयान करती हूं 
पर जितनी बार लिखती हूँ 
लगता है 
कुछ रह गया लिखना

अलमारी...... मुदिता
मेरी फ़ोटो
देखा था
‘अम्मा‘ को
रहते हुए मसरूफ 
ब्याह में साथ आई
शीशम की नक्काशीदार अलमारी को
सहेजते संजोते ....

पुरखों का इतिहास....विश्वमोहन कुमार
बिछुड़ गया हूं
खुद से।
तभी से,
जब डाला गया था,
इस झुंड में।
चरने को,
विचरने को,
धंसने को,
फंसने को,
रोने को,
हंसने को।

घनाक्षरी छंद... अनीता सैनी

मोहब्बत से सराबोर आँखें बरस  रही ,
लफ़्ज  ख़ामोश  रहे  धड़कन कह रही  |

जज़्बात  मोहब्बत के  उर  से  उफ़न रहे, 
आँखों  में  तैरते  सपनें  दास्तां  कह  रहे |

चहरे पर दिखाई देते भाव.... आशा सक्सेना

चेहरे पर भाव विषाद के
किसी को क्या दिखाना
साथ में हंसता खिलखिलाते
चेहरे की झंडी हाथ में लिए घूमते
कोई नहीं जानता किस लिए ?
दो भाव एक साथ क्यूँ ?



उलूक टाईम्स की ताजा कतरन
विदाई 2018 की

रहने दे 
मत खाया कर 
कसम ‘उलूक’ 
नहीं लिखने की 

लिख 
भी देगा 
तब भी 

साल 
इसी तरह 
गुजरते 
चले जायेंगे 

-*-*-*-*-
आज बस इतना ही
फिर मिलेंगे
दिग्विजय














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