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रविवार, 19 अगस्त 2018

1129....खबर ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ ने की है कवर

इस युग में भी होता है युद्ध.....
कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है.
दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है..

धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है.
हर पंचायत में आज भी पांचाली अपमानित है..

बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना ही रोना है.. 

चलिए चलें रचनाओं की ओर...

ये जो उलझनें हैं जीवन की 
मुझे इनके पार जाना है
कुछ पाने की चाहत है 
कही दूर खो जाना है,

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो 
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ़ हो गई 
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो


मेरा मन भारी था,
पर कोई चारा नहीं था,
दोनों जूते एक दूसरे पर 
इतने निर्भर थे 
कि एक के बिना दूसरे का 
कोई अस्तित्व ही नहीं था.

सम्पाती समुद्र तट पर आ पसरने वाले जिस समूह को अपना प्रभू-प्रदत्त भोजन समझ कर लपक रहा था, वह कोई मामूली वानर दल नहीं था ! यह रावण द्वारा सीता हरण के पश्चात उनकी खोज में जामवंत, हनुमान तथा अंगद जैसे महावीरों के नेतृत्व में  निकली वह वानर सेना की टुकड़ी थी, जो हफ़्तों पहाड़ों, बियाबानों की ख़ाक छानने के बाद भी सीता माता का कोई सुराग न मिल पाने के कारण हताश-निराश, हारी-थकी यहां पहुंची थी..........!

परेशां ज़िन्दगी किस कदर हो गयी
जुबा तुम्हारी जबसे नश्तर हो गयी,

वक़्त की दौड़ ने चेहरे मेरे सुखा दिया
उम्र 30 में जाने कैसे सत्तर हो गयी,

मन्नत....उपासना सियाग
दादी रोज मंदिर जाती और अपने परिवार की खुशियाँ , सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना कर आती। और सोचती कि प्रभु से माँगना क्या ! उसको तो सब पता ही है। लेकिन कल से सोच में डूबी है। कल जब वे रोज़ की तरह दोपहर में धार्मिक चैनल पर प्रसारित होती भागवत कथा सुन रही थी तो उसमें , कथा वाचक बोल रहे थे , " एक गृहस्थ को ईश्वर की पूजा सकाम भाव से करनी चाहिए।

उलूक टाईम्स के पन्नें में 
मुंगौड़ी बाँध कर लायामुंगौड़ी खाने के बाद पन्ने को 
सीधा कर के पढ़ा....
तो ये खबर छपी हुई थी


जय 
जय होगी 
बस 
जय होगी

‘उलूक’ 
बिना दिमाग 
झूठ देख कर 
सच है 
सच है 
यही सच है 

यही सच है

आदेश दें...
देवी जी के दांत में दर्द है...
दवा के बाद आराम से है
.....

आज्ञा दें..
दिग्विजय ..













शनिवार, 18 अगस्त 2018

1128... अवरुद्ध


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

जो राह शिला अवरुद्ध करे
तू रक्त बहा और राह बना
            पथ को शोणित से रन्जित कर
            हर कन्टक को तू पुष्प बना

झंकृत हो रही अंतर्वीणा,
फिर क्यों यह कंठ अवरुद्ध है
नव संकल्प का उल्लास है,
पर फिर भी मन क्यों क्षुब्ध है ?

‘‘मैंने अपने आपको कभी देहाती जीवन की प्रशस्ति
या किसी चरागाह में घटित
अपने निर्दोष अतीत की
पथभ्रष्ट करतूतों की
स्मृतियों से अवरुद्ध नहीं किया

मैं यह मानता हूँ कि जो लय में नहीं है वह कविता नहीं है | इस पर उन्होंने कहा कि यदि आप अपनी अभिव्यक्ति को किसी छंद में बाँध रहे हैं तो आपको नहीं लगता कि आप कुछ
अवरुद्ध रचेंगे | कहीं एक संकोच होगा कि आप छंदों की सीमा ना लांघ जाएँ | मैंने उत्तर दिया कि यदि आप छंदों की सीमा में बंधना नहीं चाहते तो गध्य लिखें |
उस समय यह बात वहीँ समाप्त हो गयी परन्तु यह बात मुझे खटकती रही कि छंद कहीं बंधन तो नहीं |

माँ का औरत होना आरती ... अवरुद्ध
 हो ही गए! ओह! छुटकी!


फिर... मिलेंगे...
अब बारी है
हम-क़दम के बत्तीसवें क़दम की
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का बत्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'परिचित'
...उदाहरण...
सुंदर वन का कौमार्य
सुघर यौवन की घातें सहता था
परिचय विहीन हो कर भी हम
लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों।

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
..........
अंतिम तिथिः आज शनिवार 18 अगस्त 2018  
प्रकाशन तिथि 20 अगस्त 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
..............
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

1127......लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

ठन गई!
मौत से ठन गई!
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
आज समूचा देश शोकाकुल है।
स्वस्थ राजनीति के प्रतीक के रुप में सम्मानित
युगपुरुष अब इतिहास की किताब में एक स्वर्णिम अध्याय 
के रुप में दर्ज हो गये।
 "भारत रत्न" 93 वर्षीय अटल जी जिन्होंने जीवन के महत्वपूर्ण 
वर्ष जनसेवा को समर्पित कर दिया, गंभीर रुप से बीमार थे। 
16 अगस्त 2018 को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान 
में शाम 05:05 में इन्होंने अंतिम साँस ली और जीवन के 
कष्टों से मुक्ति पाकर अनंत की ओर कूच कर गये।

राजनीतिक नेताओं की छवि से अलग एक सहज,सरल,विवेकशील व्यक्तित्व जिन्होंने विपक्षी दल को भी अपनी वाक् पटुता , ओजस्विता, निडरता और सांस्कृतिक मूल्यों के द्वारा सहज सम्मोहित कर लिया।

इनकी वाकपटुता से प्रभावित होकर
लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी ने कहा था,

"इनके कण्ठ में सरस्वती का वास है।"
और नेहरु जी ने "अद्भुत वक्ता" की विश्वविख्यात छवि से नवाजा।

अपने राजनैतिक कार्य काल में तीन बार प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होने का अवसर प्राप्त करने वाले अटल जी ने 
भारत के १३वें प्रधानमंत्री के रुप में अपना सबसे अधिक दिनों तक  सबसे अधिक दलोंं राजनीति दलों के गठबंधन के प्रथम प्रधानमंत्री रहे।
 अटल जी का जन्म 25 जनवरी 1924 ई. को मध्यप्रदेश मेंं 
स्थित ग्वालियर के शिंदे की छावनी में हुआ था।
विद्वान शिक्षक ,सम्मानित कवि कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता कृष्णा के पुत्र अटल जी को रचनात्मक प्रतिभा विरासत में मिली।
  देश सेवा,भारतीय संस्कृति,मानवीयता,राष्ट्रीयता तथा उच्च जीवन मूल्यों के प्रतीक अटल जी को "सर्वश्रेष्ठ सांसद","सबसे ईमानदार व्यक्ति"," पद्म विभूषण" एवं "हिंदी गौरव" से सम्मानित किया गया।
अटल जी नेहरु युगीन संसदीय गरिमा के स्तंभ, आज भी करोड़ो हृदय के लिए विश्वसनीयता और सहिष्णुता के प्रतीक हैं।
अटल जी पहले भारतीय थे जिन्होंने
संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित 
किया और राष्ट्रीय भाषा का मान बढ़ाया। 
उन्होंने "जय जगत" का नारा दिया था।
लाल बहादुर शास्त्री का दिया नारा जय जवान जय किसान को 
आगे बढ़ाते हुये इन्होंने "जय विज्ञान"का नारा दिया।
देश के सर्वांगीण विकास में 
उनका योगदान अविस्मरणीय है।
 हम सब मिलकर ईश्वर से उनकी आत्मा की.शांति के लिए प्रार्थना करते हुए उनको विनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

कवि हृदय अटल जी की कविताओं में एक कविता प्रस्तुत है 
माननीय अटल जी की ओजमयी वाणी में-

-*-*-*-*-*-*-*-


दूर कहीं कोई रोता.....प्रस्तुति हर्षवर्धन श्रीवास्तव
अंतर रोए, आँख न रोए,
धुल जाएंगे स्वप्न संजोए,
छलना भरे विश्व में
केवल सपना ही तो सच होता है।

इस जीवन में मृत्यु भली है,
आतंकित जब गली-गली है।
मैं भी रोता आसपास जब
कोई कहीं नहीं होता है।
दूर कहीं कोई रोता
-अटलबिहारी वाजपेई




विश्वमोहन जी...नाम में क्या रखा है!!!
लापरवाही के एक ऐसे ही मिसाल से हमारा सामना कल हुआ. वाकया 
ये हुआ कि हम दिल्ली से पटना जाने के लिए गो एयर का विमान 
पकड़ने टी 2 टर्मिनल पहुंचे. कल यानी १४ अगस्त को. सारी 
दिल्ली तकरीबन छावनी में तब्दील हो चुकी थी. सुरक्षा जांच के बाद 
हवाई अड्डे में प्रवेश हुआ. बोर्डिंग पास के काउंटर पर पहुंचा. 
हमसे पहले के यात्री को काउंटर वाले ने थोड़ी बहुत बतकुच्चन के 
बाद बड़े अधिकारी के पास भेज दिया. मसला था जमजम के 
अतिरिक्त भार के शुल्क का यात्री का कहना था 
इस पर अतिरिक्त शुल्क देय नहीं है.
◆★◆


अमित निश्छल....आहत ठुमके
चेतन के पतझड़ में आई, बेला वसंत की प्यारी सी;
इक बार बजा दे घुँघरू फिर, तानों में विस्मृति सारी सी।
मैं भूल चुका था सदियों से, नगमें अब वे ही गाता हूँ;
अँधियारों में है वास रहा, कब्रों में दीये जलाता हूँ।

◆★◆

ख़ामोशी की भाषा समझाये कैसे निर्मोही को
मीत!साकल खटखटाये प्रीत की बरजोरी में!!
बहती बयार संदिली खुशबू उसकी पहुँचा जाती,   
भूली यादे छा जाती फिर मन की गहराई में !!

◆★◆



कुछ ख्याल आकर ख्वाबो को सजाते हैं ,

सोये हुये मैं कभी बर्बाद नही रहता

तेरे शहर में ये कौन सा मौसम हुआ करता हैं,
तुम्हारे खतो में कभी जज्बात नही रहता 

◆★◆



चलते-चलते उलूक के पन्ने से आदरणीय
सुशील सर की रचना

नये शब्दों की
नयी किताब के
आजाद पन्नों
को साथ लेकर

'उसके' घर से
तैयार होकर
बहस के लिये
अब निकल रहा है 



हृदययल से श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये एक गीत



आज बस इतना ही
-श्वेता सिन्हा



गुरुवार, 16 अगस्त 2018

1126...स्वतंत्रता का अर्थ उस पीढ़ी से पूछो जिसने पराधीनता का दर्द झेला है...

सादर अभिवादन। 
कल देश ने धूमधाम से मनाया 72 वाँ स्वाधीनता दिवस। हमें सदैव स्मरण रहनी चाहिए अपने स्वतंत्रता संग्राम की शौर्य और क़ुर्बानी से भरी अनमोल गाथा। नयी पीढ़ी में स्वतंत्रता के मूल्य स्थापित करना हमारा दायित्य है। 
"स्वतंत्रता का अर्थ वह क्या जाने 
जो स्वतंत्र वातावरण में खेला है,
स्वतंत्रता का अर्थ उस पीढ़ी से पूछो 
जिसने पराधीनता का दर्द झेला है।"
(मेरे काव्य संग्रह "प्रिज्म से निकले रंग" से ) 

आइये स्वतंत्रता दिवस पर विभिन्न ब्लॉग्स पर रचनाकारों के सारगर्भित भावपूर्ण उद्गारों में निहित संदेशों से आपको अवगत कराते हैं- 





स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ चौपट करती है
लोहा हो या रेशम दोनों बंधन एक जैसे होते हैं
फायदे अक्सर आदमी को गुलाम बना देते हैं




इसकी उज्ज्वला धवला छवि
जन-जन के हृदय समायी है
स्वर्ण मुकुट सम शोभित हिमगिरि
केसरिया गौरव बरसायी है।
श्वेत धवल गंगा सम नदियों से
गौरव गान देता सुनाई है
सदा सम्मान हमारा बढ़ा रही
तो क्यों न हम अभिमान करें
यह मातृभूमि गौरव अपना
फिर क्यों न इसका मान करें



  
माना हमने कभी लड़ी नहीं,
देशहित में एक लड़ाई। 
पर हमको जब-जब मौका मिला,
हम ने भी, जान लगाई। 




वही वतन है आज
हम वतन के वाशिंदे 
बना कर धर्म जाति की
दीवारें और वोट के फन्दे
लडें आपस में और पहुंचाए
वतन की संपत्ति को नुकसान
आरक्षण बन गया है ढाल
चुनावी वादों में
बने मंदिर और मस्जिद भी





साल बहत्तर उमर हो रही,अभी भी चलना सीख  रहा,
दृष्टिभ्रम विकास नाम का,छल जन-मन को दीख रहा।
जाति,धर्म का राग अलाप,भीड़ नियोजित बर्बरता,
नहीं बेटियाँ कहीं सुरक्षित,बस नारों में गूँजित समता।

चलते-चलते ब्लॉग "मेरी धरोहर" से एक नायाब प्रस्तुति- 




बुझा है दिल भरी महफ़िल में रौशनी देकर,
मरूँगा भी तो हज़ारों को ज़िन्दगी देकर
क़दम-क़दम पे रहे अपनी आबरू का ख़याल,
गई तो हाथ न आएगी जान भी देकर


हम-क़दम के बत्तीसवें क़दम
का विषय...
यहाँ देखिए...........

आज बस यहीं तक। 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 
रवीन्द्र सिंह यादव  

बुधवार, 15 अगस्त 2018

1125..स्वाधीनता की अक्षुण्णता अधिकार के साथ कर्तव्य में ही समाहित..


।।शुभ सवेरा।।
🇮🇳🙏🇮🇳
पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है। 
15 अगस्त की भोर आज तो धाता,धरती , धरनीधर भी मदिर हुई..
लोग एक दूसरे को देशभक्ति के गीत ,शुभकामनाएँ के साथ मैसेज भेज रहे है।
15 अगस्त 1947 एक ऐसी सुबह जिसकी एक आँख बटवारे पर रोई तो 
दूजा बेड़ियों के टूटने पर मुस्कराई थी..पर भारत को अपनी रक्षा हेतु विभाजन 
स्वीकार करना ही था।देश आजादी के 71बसंत देख चुका है। स्वाधीनता की अक्षुण्णता अधिकार के 
साथ कर्तव्य में ही समाहित है..
तो फिर ज्यादा समय न लेते हुए

 स्वाधीनता दिवस की भोर में ..रूबरू होते हैं..✍
🇮🇳
जब मेरे हाथों में
मेहंदी लगी थी
कर सोलह श्रृंगार
दुल्हन बनी थी
बारात लेकर आए थे
तुम मेरे अंगना
खिड़की से छुप कर
तुमको ताकना

🇮🇳

आदरणीय विश्वमोहन जी की बोलती कलम..




जा पिया , तू जा समर में,
आतंकियों के गह्वर में.
प्रलय का उत्पात मचा दे.
छोड़, मेरे आंसुओं मे क्या रखा है?
आज वतन की माटी में हैं सिरफिरे फिर 
उतर आये,

भारत-माता के वसन को, देख कहीं वो 
कुतर न जाये
लगे चिर में चीर इससे पहले उनको चीर दो,
छिन्नमस्तिके, रौद्र-तांडव मचा, बचा कश्मीर लो,
लगे माटी लाल, शत्रु-शोणित

🇮🇳

जब स्कूल में पढ़ते थे तो कभी-कभार बच्चों को फ़िल्म भी दिखाई जाती थी. 'मुल्क' ऐसी ही फ़िल्म है 
जो अगर स्कूल न दिखाए तो आप अपने बच्चों के साथ जाएँ क्योंकि उन तक इसकी सोच और 
गहराई का पहुँचना बेहद जरुरी है..

🇮🇳

उसकी बात बात होती है,
मेरी बात गधे की लात।
लग जाये तो ठीक है वरना,
उसकी नहीं कोई बिसात।
 मैं जब तक प्रश्न समझ पाता हूँ,
वह उत्तर दे देती है।
मैं जब तक विषय में उतराता हूँ,

🇮🇳


सीमाएं हों सुरक्षित, राहें हों बाधा-रहित,
बनें निर्भीक हम, हों सदा निर्विकार,
प्रगति के पथ पर सबका हो अधिकार,

मुक्त सांसों में स्वच्छंद हों विचार,
क्लेश मिटे सबके मन से,
ऐसा हो स्वतंत्र भावों का संचार.....
लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही 

🇮🇳

आदरणीय पंकज प्रियम जी की हुंकार करती रचना..



हर सीमा तुम अब तो पार करो।

सुनो ऐ सरहद के वीर जवानों
खुलकर अब तुम तो वार करो।

निकालो अब शमशीर जवानों
दुश्मनों का जमकर संहार करो।

आतंकी का सीना चीर जवानों
हृदय पर उनके तुम प्रहार करो।

🇮🇳

हम-क़दम के बत्तीसवें क़दम
का विषय...
यहाँ देखिए...........


 आप सभी को आजादी के जश्न के साथ आज यहीं तक ..
कल फिर नई लिंकों के साथ।
स्वतंत्र भारत चिरंजीवी हो..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

1124....सच कभी अपने को झूठ नहीं कहता है

सभी भारत वासियों को , १५ अगस्त की पूर्व संध्या पर 
भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ ... 
एक विचार....
एक बार किसी पत्रकार ने गुलज़ार से 
उनके पांच सबसे पसंदीदा गीतकारों के नाम
पूछे। गुलज़ार ने पांच गीतकार गिनवा दिये,
उसमें जावेद अख्तर का नाम नहीं था।
फिर क्या था पत्रकार ने ये बात जावेद अख्तर को
बताई और प्रतिक्रिया चाही?
जावेद अख्तर ने कहा,
इस बात पर बस मैं ये कह
सकता हूँ कि गुलज़ार साहब
की लिस्ट में जगह पाने के
लिए मुझे अभी और मेहनत
करना होगा।
इसे कहते है..व्यक्तित्व,..
इसे कहते है..
सकारात्मक सोच
इसे भी सोचना होगा....
दिगम्बर जी नासवा
खंड में बंटती रही माँ भारती लड़ते रहे हम
प्रांत भाषा वर्ण के झगड़ों में बस उलझे रहे हम
राष्ट्र की परिकल्पना क्यों सोच में आती नहीं है

स्त्री हूँ मैं
स्वाभिमान की पराकाष्ठा तक जाती हूँ,
प्रेम करती हूँ वो भी प्रगाढ़
खुद को मारकर
तुम्हें अपने अंदर जीती हूँ,

मेरी जिंदगी के रुपहले पर्दे पर
तुम विराजमान क्यूँ हो गए हो?
अब मैं तुम्हें भूलना चाहती हूँ।
तुम्हारी आँखों में.......
ये जो लाल कसीदाकारी है।

अब चाहे जहर दो या दवा दो,
मगर तुम्हारे दिल मे क्या हैं मुझको बता दो

ख़ाक हो जाए परवाने उनकी किस्मत हैं
आज नकाब अपने चेहरे से हटा दो


सम्भव होता गर जीवन का द्वितीय संस्करण,
समीक्षा कर लेता जीवन की भूलों का,
फिर जी लेता इक नव-संस्करित जीवन!

क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?

नए सिरे से होता, तब रिश्तों का नवीकरण,
परिमार्जित कर लेता मैं अपनी भाषाएं,
बोली की कड़वाहट का होता शुद्धिकरण!

My Photo
साकी का सुरूर चढ़ ना पाया
मोहब्बत का रंग उतर ना पाया
जाम जो पिला दिया नयनों ने
होश ग़ुम हो गए
मदहोशी के आँचल में
आलम इश्क़ के नशे का ऐसा जमा
बिन पिये ही दिल थिरकने लगा

चलते-चलते...
कौन सा झूठ 
सच होता है 
कौन सा झूठ 
झूठ होता है 
सोच कर देख 
‘उलूक’ किसी दिन 
दुनियाँ दिखाती है 
बहुत कुछ दिखाती है 
उसमें कितना कुछ 
बहुत कुछ होता है 
कितना कुछ कुछ 
भी नहीं होता है 

-*-*-*-
अब बारी है
हम-क़दम के बत्तीसवें क़दम की
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का बत्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
'परिचित'
...उदाहरण...
सुंदर वन का कौमार्य
सुघर यौवन की घातें सहता था
परिचय विहीन हो कर भी हम
लगते थे ज्यों चिर-परिचित हों।

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
..........
अंतिम तिथिः शनिवार 18 अगस्त 2018  
प्रकाशन तिथि 20 अगस्त 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
..............
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
................
इसी के साथ इज़ाज़त दें
यशोदा


सोमवार, 13 अगस्त 2018

1123..हम-क़दम का इक्तीसवाँ अंक

हमारी उम्मीद नहीं थी आपको
हम आते ही नहीं...पर
नियति की इच्छा के विपरीत जा भी तो नहीं सकते...




इस बार प्राप्त रचनाएँ....
रचनाएँ सुविधानुसार लगाई गई है....

आदरणीया रेणुबाला जी
आनी ही थी मौत तो  इक दिन 
जाने किस मोड़ पे आ जाती.
कैसे पर गर्व से   फूलती , 
मातृभूमि  की छाती ;
दिग -दिंगत में आज  गूंज  रहा   
यशोगान तुम्हारा है !!

आदरणीया शकुन्तला राज
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कभी मुन्ने को देखती
कभी माँ को
हे ईश्वर.....
क्या केवल इतने ही दिनों का
साथ दिया था
फिर अचानक याद आया
मैं तो अब हूँ
एक देशभक्त
शहीद की पत्नी

आदरणीया कुसुम कोठारी जी

कण कण रज रंग गया
लहू था शहीदों का
कौन चुका पायेगा ऋण
मातृभूमि के सपूतों का
अब मिट्टी में वो उर्वरकता नही
जो ऐसे सपूत पैदा कर दे
अब प्रतिष्ठा के मान दण्ड
बदल रहे हैं प्रतिपल

आदरणीया अभिलाषा चौहान

हूं अब शहीद की विधवा मैं
कमजोर नहीं, मजबूर नहीं
दूर होकर भी वो दूर नहीं
अमर हुआ है मेरा सुहाग
सबके कहां ऐसे होते भाग
वो वीर सपूत इस जननी का
अपना धर्म निभा आया
वो वीर शहादत की देखो
इक नयी इबारत लिख लाया  ।

आदरणीया नीतू ठाकुर

वीर शहीदों की लाशों पर 
कितने नीर बहाऊँ 
कहाँ छुपाऊँ लालों को 
मै खुद ही समझ ना पाऊँ 
मेरी खातिर लड़ते है 
मुझपर ही चला कर गोली 
तुम सब मेरे लाल हो 
यूँ  ना खेलो खून की होली 

आदरणीय साधना दीदी

धन्य हो गई
धरा जहाँ तुमने
रक्त बहाया !

याद रखेंगे
तुम्हारा बलिदान
हमारे प्राण !

नैनों में नीर
हृदय अभिमान
वीर जवान !

आदरणीया आशा सक्सेना

नमन तुम्हें शहीद
देश के सपूत वीर
क्या नहीं किया तुमने
देश हित के लिए |
हम करते प्रणाम 
सारे शहीदों को
और उन माताओं को  
जिनने जन्मा वीर सपूतों को |

आदरणीय पंकज प्रियम जी की दो रचनाएँ

दुश्मन तो सारे वो मार गया
पर अपना जीवन हार गया
बहादुरी पर देश हुआ मुरीद
एक लाल फिर हुआ शहीद।

वर्षों बाद दीदार हो पाया है
कैसा सैलाब उमड़ आया है
क्या खूब परचम लहराया है
कफ़न पे तिरंगा फहराया है।
-*-*-*-


आज की शाम,वीर शहीदों के नाम कर जाएं
वतन पे मर मिटने वालों को सलाम कर जाएं।

सरफ़रोशी की तमन्ना,लिए दिल झूम लिया
हँसते हँसते उन्होंने,फाँसी को यूँ चूम लिया।

भगत,सुखदेव और राजगुरु,तीन वीर सपूत
अकेले ही फिरंगी बेड़े को, किया नेस्तनाबूद।

त्योहारों की वजह से व्यस्तता अधिक रही
रचनाएँ बस इतनी ही प्राप्त हुई...
अगला विषय देखें कल के अंक में
कमी हम पूरी किए देते हैं
गीत सुनवाते हैं

जो आपकी पसंद का हैं



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