सादर अभिवादन।
ये
बड़ा
अजीब
अपनों से
ले जाता दूर
सोशल-मीडिया
है प्रिय जो सुदूर।
आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें -
कलकल छलछल छलक मदिरा छाई
शाश्वत सुवास सा श्वास श्वास छितराई
सतरंगी सी, इन्द्रधनुषी! रास रंग अतिरेक
एक और एक प्रेम गणित में होते सदा ही एक!
शाश्वत सुवास सा श्वास श्वास छितराई
सतरंगी सी, इन्द्रधनुषी! रास रंग अतिरेक
एक और एक प्रेम गणित में होते सदा ही एक!
सोचती हैं गोपियाँ कि हर्ष के प्रसंग बीच,
राधिका क्यों इतनी उदास लगने लगी ।
प्रेम की पिपासिता का मन कैसे तृप्त होगा !
देख नदिया को फिर प्यास लगने लगी ।।४।।
वर्जनाएं जो लगी,
अब टूटने दो उन्हें!
क्यों रहें बंद ये कपाट!
जाति-धर्म-सम्प्रदाय,
के नाम पर,
क्यों न खोलकर,
नफरतों की धूल झाड़ दें?
अब टूटने दो उन्हें!
क्यों रहें बंद ये कपाट!
जाति-धर्म-सम्प्रदाय,
के नाम पर,
क्यों न खोलकर,
नफरतों की धूल झाड़ दें?
मज़हबों के ढेर से
इंसानों को अलग कर देखो
धर्म की हर एक किताब में
इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाता है।
इंसानों को अलग कर देखो
धर्म की हर एक किताब में
इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाता है।
चल बन जा , तू भी चिराग बन
थोड़ा पिघल , उजाले की किरण
का सबब तू बन ,देख फिर तू भी पूजा
जाएगा ,तेरा जीना सफ़ल हो जाएगा
थोड़ा पिघल , उजाले की किरण
का सबब तू बन ,देख फिर तू भी पूजा
जाएगा ,तेरा जीना सफ़ल हो जाएगा
चलते-चलते हमारा ध्यान आकृष्ट करती आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" जी की एक प्रस्तुति -

आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी
रवीन्द्र सिंह यादव