निवेदन।


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शनिवार, 30 सितंबर 2023

3896... कल्पना

        हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...   

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बीते 19 मई 2023 को देश में सबसे बड़े करेंसी नोट यानी 2,000 रुपये के नोट को बंद करने का ऐलान करते हुए इसे सर्कुलेशन से बाहर कर दिया था। बाजार में मौजूद इन नोटों की वापसी की सुविधा देते हुए आरबीआई ने बैंकों के जरिए लौटाने या बदलवाने के लिए 30 सितम्बर 2023  की तारीख तय की थी... मैं दीपक हूँ

है मुझको मालूम!

पुतलियों में दीपों की लौ लहराती,

है मुझको मालूम कि

अधरों के ऊपर जगती है बाती,

उजियाला कर देने वाली

मुस्कानों से भी परिचित हूँ,

साहित्य

रचनात्मक लेखन एक यात्रा है!

यह एक ऐसी प्रक्रिया है

जो लेखकों को उनकी कल्पना को

कागज पर उतारने में मदद करती है

बुद्धि तत्व के आधार पर

विशिष्ट विचारों का निर्माण किया जाता है।

कल्पना

पात्र जीवंत हो उठते हैं इस अभ्यास में, अपनी पसंदीदा पुस्तक या लघु कहानी के एक पात्र के बारे में सोचें। आप चाहें तो कुछ कहानी या उपन्यास दोबारा पढ़ सकते हैं।

अब आओ न पापा

आपके न होने का भार ढो रही हूँ

दिन-प्रतिदिन आंसुओं के बीच जी रही हूँ

जहाँ अकेली थी, वहाँ आप आए थे

मेरी पीठ के पीछे मेरा हौसला बढ़ाए थे

पर आपके गले लगकर रोने का भी मन था

तकलीफों के जाल में लिपटा ये तन मन था

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

3895....प्राण का दीपक जलाओ

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------
संसार में अच्छाई ,सच्चाई, करूणा और मानवता है,
यह सृष्टि में ईश की ही पहचान है।
जो मुझे रोकता,टोकता है गलत करने से,
वो ईश ही है,जो मुझ में प्रेम रूप में विद्यमान है।

ईश्वर का अस्तित्व मनुष्य की चेतना को थामे रखने के लिए बुना गया, जबतक मनुष्य के कर्म बंधे हुए हैं पाप-पुण्य,कर्मफल के तथ्यों को मानते हुए,मनुष्य में दया और प्रेम अंर्तमन की सहज ऊर्जा है जो मनुष्य को संसार के संचालन के लिए संतुलित करती है, किंतु मनुष्य के विचारों एवं व्यवहारों की निरंकुशता असहज करती है ऐसे में एक प्रश्न अक्सर उठता है मन में कि
 ईश्वरविहीन संसार में मनुष्य की नैतिक भूमिका कैसी होगी?
आजकल बौद्धिक समृद्धशाली होने की पहली शर्ते है
ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाना और क्षुद्र विश्लेषण करना...। 


आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-



समुद्र की मचलती लहरें
किनारों से मिलने
बेसुध होकर भागती हैं 
और जलतरंग की धुन
सजने संवरने लगती है

इस संधि काल में
सूरज को धकियाते
उगने लगता है चांद

अब भी समय है
आग को अपनी जलाओ।
बाट मत देखो सुबह की
प्राण का दीपक जलाओ।
  
 मत करो परवाह
 कोई क्या कहेगा
 इस तरह तो वक्त का दुश्मन
  सदा निर्भय रहेगा।


रहे साधते वीणा के स्वर

श्वास काँपती ह्रदय डोलता 
हौले-हौले सुधियाँ आतीं,
कितनी बार कदम लौटे थे 
रह-रह वे यादें धड़कातीं !

निज पैरों का लेकर सम्बल
इक ना इक दिन चढ़ना होगा,
छोड़ आश्रय जगत के मोहक 
सूने पथ पर बढ़ना होगा !



उस पल केवल,
वह बच्ची नहीं हुई थी लहूलुहान,
उस पल समस्त,
मनुष्यजाति का हुआ था अपमान।
 
क्या जग में किसी की वेदना,
नहीं जाग पायी थी ?
इसी जग के द्वारा वह लड़की गयी सतायी थी।



प्रकृति का एक अर्थ मनुष्य का स्वभाव भी है  स्वाभाविक लगनेवाला मनुष्य का बरताव एवं अन्य अदृश्य कारक सार्वजनीन जीवन में असंतुलन लाता रहता है। हाँ, यह भी कि मनुष्य का  व्यवहार और अदृश्य कारक इसे संतुलित भी करता रहता है  असंतुलन-संतुलन की मूल द्वंद्वात्मक प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है। मनुष्य इस अदृश्य कारक को महसूस करता है, लेकिन इसकी व्याख्या नहीं कर सकता है  इस अदृश्य कारक की अमूर्त्त शक्ति को ईश्वर माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ईश्वर अपना उपादान और निमित्त दोनों है।

इधर मजदूर का पेट भरता, उधर कवि की कविता की भूख जाग जाती! मजदूर पेट भर खा कर चैन की नींद सोना चाहता लेकिन कविता की भूख का मारा कवि उल्लू की तरह जाग कर मजदूर से अपनी नई कविता सुनने और आज के काम का दर्द बयान करने को कहता।


--------
आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।

गुरुवार, 28 सितंबर 2023

3894 ..बूँद का अभिशाप मत लो

 सादर अभिवादन

आज गुरुवार है
शायद रवीन्द्र जी भूल गए
कोई बात नहीं
रचनाएं देखें ...

छोटी भाभी को उलाहने और फटकार लगाने वाली अम्मा उनके द्बारा बनाए गए सजावट के सामानों को मुहल्ले की औरतों को दिखा रही थी।उनकी कलाकारी को देख सभी ने दाँतों तले अंँगुली दवा ली। शोकेस में करीने से रखें पेंटिंग्स को देख सभी हतप्रभ रह गई। कहा -"कसीदाकारी के ऐसे नमूने नहीं देखे।"





आँगने का दीप रोया,
चार दिन से मुँह न धोया।
आँख में कीचड़ सजोया,
चुप्पियों का ताप मत लो॥

सुन सको तो ये सुनो न,
जो लिखा है वो पढ़ो न।
या कहा उसको बुनो न,
बिन कहे का चाप मत लो॥





हम सबके प्यारे गूगल बाबा
सारे जग से न्यारे गूगल बाबा

सबको राह दिखाते गूगल बाबा
दुनिया एक सिखाते गूगल बाबा

सबकी खबर लेते गूगल बाबा
सबको खबर देते गूगल बाबा




तब देवर्षि नारद ने उन्हें धन्यवाद तो दिया किन्तु फिर भी उनके मन से वो बात गयी नहीं कि उनके पिता ने उन्हें अकारण ही श्राप दे दिया है। इसी कारण उन्होंने ब्रह्मदेव से कहा - "हे पिताश्री! आपने मुझे अकारण ही श्राप दे दिया है। आपने अपने ही पुत्रों में भेद किया है। मेरे अग्रज (सनत्कुमार) को आपने वन जाकर तप करने की आज्ञा दे दी किन्तु मेरी भी वैसी इच्छा होने पर आपने मुझे अकारण ही श्राप दिया। इसीलिए मैं भी आपको श्राप देता हूँ कि तीन कल्पों तक आप पृथ्वी पर अपूज्य बने रहेंगे। तीन कल्पों के पश्चात ही पृथ्वी पर आपकी पूजा पुनः आरम्भ होगी।"

इस प्रकार पिता और पुत्र को एक दूसरे का श्राप भोगना पड़ा। नारद ने अनेक अधम योनियों में जन्म लिया और अंततः ब्रह्माजी के वरदान के कारण पुनः उनके पुत्र के रूप में जन्में और संसार के सभी ज्ञान को प्राप्त किया। ब्रह्मदेव को भी पृथ्वी पर ना पूजे जाने का श्राप भोगना पड़ा और यही कारण है कि आज भी उनकी पूजा बहुत ही कम की जाती है।

आज बस इतना ही
कल आएगी सखी
सादर

बुधवार, 27 सितंबर 2023

3893.. एकांत एक नदी है..


।। प्रातः वंदन।।

' कठिन होगी राह मगर

कुछ नया सृजन होगा

विचारों का अतिरेक होगा

एक नया स्पंदन होगा !

प्रखरित होंगे नये कुसुम

दूर क्षितिज में

नए सूर्य का आगमन होगा

सुहानी-सी भोर होगी

देखो प्रस्फुटित फिर से जीत होगी..'

मनीष मूंदड़ा

 इसी सुहानी भोर संग आनंद लीजिए   'एक बोर आदमी का रोजनामचा'से

एकांत एक नदी हैं 

जिसमे मै पड़ा रहना चाहता हूँ

किसी मगरमछ की तरह

या फिर बहता रहना चाहता हूँ, 

चुपचाप, किसी टूटे पेड़ के तने

या लट्ठे जैसा

या फिर..

🌟

घराना एक ही है हमारा, एक ही घर है हमारा 

एक ही घर से आये हैं ,एक ही जगह जाना है 
 
एक घर हमारा ,बहुत ही प्यारा बहुत  ही न्यारा 

सजाना संवारना इसे ही है ,यही अपना ठिकाना

🌟

वक्त मिला नहीं अकसर बहाना होता,

वक्त का आना-जाना तो रोजाना होता।

वक्त नहीं करता किसी का इंतजार,

पकड़ो तो याराना, छोड़ो तो वेगाना होता।

नहीं होती भेंट अकल और उमर की,

एक का आना तो, एक का जाना होता।

🌟

क्या मिला....ये छोड़िये

खुद क्या किया...ये सोचीये

आज दुपहरी क्रोशिया चलाते हुए एक पोडकास्ट सुना। इतना सकारात्मक कि मेरे पास शब्द नहीं है।

     पोडकास्ट में एक व्यक्ति अपने साथ हुए एक दुखद हादसे को यह कहकर परिभाषित कर रहा है कि जो भी होता है अच्छे के लिये होता है ।

         इंटरव्यू लेने वाली महिला..

🌟

भ्रष्ट आचरण का लगानेताजी को रोग,

फल इनकी करतूत काभुगतें बाकी लोग, 

जंगल के इस राज में खुदगर्जी आबाद,

जनता भूखी डोलती, नेता छप्पन भोग...

दोहा मुक्तक के साथ ,आज यही तक मिलते कल फिर नये प्रस्तुतकर्ता रवीन्द्र जी के संग।

।। इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

3892....धूप देह पर मद्धम-मद्धम होती है

 मंगलवारीय अंक में आप
 सभी का स्नेहिल अभिवादन।
----------
खुला आसमान और विशाल धरती के बीच इंसान प्रकृति का एक अदना सा हिस्सा है। इंसान कितना भी ज्ञान अर्जित कर ले, कितना भी विज्ञान को जान जाये लेकिन प्रकृति हर बार कुछ ऐसा कर जाती है कि हर बार उसके करिश्मे के आगे विज्ञान भी घुटने टेक देता है।
इस दुनिया की सभी नकारात्मक शक्तियां मनुष्य जनित ही हैं। यदि मनुष्य प्रलोभनों, लोभ व स्वार्थ के अंधेरों में न भटकता तो उसे कृत्रिमता पर आधारित जीवन नहीं अपनाना पड़ता। इसी व्यवहार के कारण मानव और प्रकृति के बीच का तारतम्य टूट गया है। परिणामस्वरूप मानवीय विचार, भावनाएँ तथा ज्ञान पारदर्शी न रहकर द्वंद्वात्मक हो गए। अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाएँ स्वार्थी मानवीय कृत्यों का दंड ही तो है।


आइये आज की रचनाओं के संसार में-


सिद्धि विनायक हे गणनायक 
विघ्नहरण मंगलकर्ता ।
एकदंत प्रभु दयावंत तुम
करो दया संकटहर्ता ।

चौदह लोक त्रिभुवन के स्वामी
रिद्धि सिद्धि दातार प्रभु  !
बुद्धि प्रदाता, देव एकाक्षर
भरो बुद्धि भंडार प्रभु  !



धूप देह पर मद्धम-मद्धम होती है.

माँ की डाँट-डपट भी मरहम होती है.


आशा और निराशा पल-पल जीवन-रत,

माँ तो माँ है हर पल हर-दम होती है.




बाहर फूलों के धोखे में 

काँटों से पाँव छिलवाये 

ख़ुद पे यक़ीन कर 

ख़ुदा में छिपा है ख़ुद 

वह यक़ीन ही छू सकता उसे 

 जर्रे-जर्रे में जो मुस्कुराए 

तू खुश है ही बेवजह 

जैसे दुनिया की वजह नहीं 

तलाश ख़ुशियों की 



लहरें भी तो घूम घूम के वहीं आती है 
तो क्या बेमतलब हो गयीं वो 
शब्दों का पूरा समंदर है 
और उनका निकलना 
लहरों की संगत सा है 
रूठ के शब्द चले गये 
गले से कहीं दूर 
नीचे उतर गये 
उस दिन बिना मौन 



इधर-उधर बिचड़ते और ध्यान लगाते कई तांत्रिक और साधु संत भी दिखाई दिए। इसी बीच कुछ चीज कौतुक का कारण बना । मंदिर में कबूतर और बकरे के बिचड़ने की प्रचुरता थी। रेलगाड़ी पर गया निवासी बड़े भाई अधिवक्ता मदन तिवारी मिले थे । उन्होंने मंदिर में बलि प्रथा को लेकर नकारात्मक बातें कही थी। मैं स्वयं माता के नाम पर जीव हत्या का आलोचक रहा हूं। कई मंदिरों में इसीलिए नहीं जाता ।

-----
आज के लिए इतना ही
फिर मिलते है 
अगले अंक में।


सोमवार, 25 सितंबर 2023

3891 ..राम ने श्रद्धा-पात्र बनाया निर्मल और निष्पाप बनाया

 सादर अभिवादन

तबियत कुछ दिनों से नरम है
डोर का भरोसा नहीं
पता नहीं क्यूं
ऐसा लगती है
अब टूटे तब टूटे
सुहागन जाऊं
बस यही इच्छा है
अब देखिए रचनाएं ....

राम ने श्रद्धा-पात्र बनाया
निर्मल और निष्पाप बनाया.
घृणित नहीं वन्दित हुई वो
निन्दित नहीं पूजित हुई वो
भरत-जननी श्रेष्ठ थी नारी
महान विदुषी दशरथ प्यारी
उन्होंने की जग पे एहसान
देकर शुभ-सुन्दर परिणाम.




इंतज़ार में
लौटने की ख़ुशबु होती है
जैसे- लौट आता है सावन
चंग के साथ फागुनी धमाल।
परंतु, पहाड़ के अनुराग में
पगी नदी
ज़मीन पर नहीं लौटना चाहती




मेरे मन, भाव, शब्दों और नदी के भरोसे में।
मेरे पदचिन्ह
नदी के मुहाने तक चस्पा हैं
उसके बाद नदी है
नदी है
और
मेरी आचार संहिता।


दे न सका कुछ दे न सकूँगा
जो अर्पित निज कह न सकूँगा।
किन्तु मुझे इतना अशीष दो
तव चरणों नत रहे शीश दो।
तुझ पर श्रद्धा रहे अटल मम
सुबह शाम तू लिख ले।
निज नामावलि में मेरा भी
एक नाम तू लिख ले।
ओ! सबकी सुधि रखने वाले
एक काम तू लिख ले।


निज-धंधा करे चिकित्सक अब,
हैं अस्पताल सूने रहते।
जज से वंचित न्यायालय हैं,
फरियादी कष्ट किसे कहते।।
सब कुछ है आज देश में पर,
जनता सुविधाओं से वंचित।
हों अधिकारों के लिए सजग,
वंचित न रहे कोई किंचित।।

.....
आज बस
सादर

रविवार, 24 सितंबर 2023

3890.....कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है?

जय मां हाटेशवरी.....
सादर नमन......
बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें,
आज क्या है कि देख कौम को गम है।
कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में
कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है?
भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में?
कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती तुम्हें शरम है?
आग लगे उस धन में जो दुखियों के काम न आए,
लाख लानत जिनका, फटता नही मरम है।
अब पेश है.....
कुछ चुनी हुई रचनाओ के अंश.....

तुम्हारे बंद दरवाज़े पर
दस्तक देते हुए इंटरव्यू लेने वाली महिला अभिभूत है और प्रश्न पुछती है कि आप इतने पॉजिटिव कैसे है ? सामने वाला व्यक्ति बोलता है कि अपनी माँ की वजह से

❣️

आत्मीय जन और मित्रों की 
कई दुआएं,पूजा, भक्ति  मुझे छीन कर मृत्यु मुख से 
फिर से वापस ले आई थी 
और चिकित्सक की मेहनत भी  
धीरे-धीरे रंग लाई थी

रूखी सूखी में कटे, जिनके बीते साल,
सत्ता मिलते ही हुए, कैसे मालामाल,
नेता बनते ही हुए, तेवर बड़े अजीब, कुर्सी पाते ही चलें, ये शतरंजी चाल

सब करते हैं जग में अपने ही मन की
कोई किसी का यहाँ गुनहगार नहीं है  तुम जीयो, मरो या पा जाओ पुरस्कार कोई 
हमें रत्ती भर भी तुमसे कोई सरोकार नहीं है

 

मट्ठा, दही नहीं खाते हैं।* कहते हैं ज़ुकाम बहुत है।।
पीते हैं जब चाय तब कहीं।*
कहते हैं आराम बहुत है।।*
बंद हो गई चिट्ठी, पत्री।*
फोनों पर पैगाम बहुत है।।

धन्यवाद....

शनिवार, 23 सितंबर 2023

3889... पतझड़ के फूल



बहुत दुखद घटना हो गई। राष्ट्र कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी के सुपुत्र श्री केदार नाथ सिंह जी का निधन,बिहार के बेगुसराय के सिमरिया गाँव में कल हो गया है।

विनम्र श्रद्धांजलि   

एक बार दिल्ली में हो रहे कवि सम्मेलन में पंडित नेहरू पहुँचे। सीढ़ियों से उतरते वक्त वो अचानक लड़खड़ा गए, इसी बीच दिनकर ने उनको सहारा दिया। नेहरू ने उन्हें धन्यवाद कहा। इस पर दिनकर तपाक से बोले-जब जब राजनीति लड़खड़ाएगी, तब-तब साहित्य उसे सहारा देगा। रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' की प्रस्तावना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है। इस प्रस्तावना में नेहरू ने दिनकर को अपना 'मित्र' बताया है।  

विभा रानी श्रीवास्तव: कोई एक ऐसी बात जो आपको इनकी सदैव याद रहती हो?

[22/09, 12:40 pm] राजेन्द्र पुरोहित : समर शेष है,नहीं पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं,समय लिखेगा उनके भी अपराध!

(दिनकर)

[22/09, 12:44 pm] मधुरेश नारायण : जब नाश मनुष्य पर छाता है।

पहले विवेक मर जाता है।

[22/09, 12:57 pm] एकता कुमारी : कर्ण कुंती संवाद

हैं आप कौन? किसलिए यहाँ आयी हैं?

[22/09, 12:44 pm] वर्षा गर्ग: दिनकर जी का नाम सुनते ही उनकी पंक्तियां..

समर शेष है,नहीं पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं,समय लिखेगा उनके भी अपराध!

मस्तिष्क में कौंध जाती हैं,हमेशा ही।

[22/09, 1:04 pm] मीरा श्रीवास्तव: महान कवि श्री दिनकर जी की याद हमेशा ही आती है और आती रहेगी  ।

शूरमा नहीं विचलित होते,

छण एक नहीं धीरज खोते,

      विघ्नों को गले लगाते हैं,

      काँटो में राह बनाते हैं 

 और  .....

कृष्ण की चेतावनी  

  याचना नहीं अब रण होगा,

जीवन जय या की मरण होगा। 

'रश्मि रथि' की इन स्मरणीय पंक्तियाँ 

जो मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं

[22/09, 1:33 pm] राजकांता राज : दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार।

[22/09, 8:19 pm] प्रवीण कुमार श्रीवास्तव: मन कटु वाणी से आहत हो,

भीतर तक छलनी हो जाये।

फिर बाद कहे प्रिय वचनो का,

रह जाता कोई अर्थ नहीं।

[22/09, 8:13 pm] अपराजिता रंजना: सौभाग्य न सब दिन सोता है।

देखें आगे क्या होता है।

[22/09, 1:23 pm] प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र': 

मेंहदी जब सहती है प्रहार

बनती लालनाओ का श्रृंगार

जब फूल पिरोए जाते हैं

हैं उनको गले लगाते हैं।

[22/09, 11:07 pm] पूनम कतरियार: अब तो  भूलने की बीमारी-सी हो गई है, पहले इनके  हिमालय, कलम या कि तलवार,आदि कई कविताएँ,रश्मिरथी एवं कुरूक्षेत्र की बहुत सारी पंक्तियाँ अक्सर गुनगुनाया करती थी। 

हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...   

धरा पर क्यों बिखर गये, तोड़ के साँठगाँठ

 पत्ते नए सिरे से कहे अन्त का कथा पाठ

रामधारी सिंह 'दिनकर' (23 सितम्‍बर 1908- 24 अप्रैल 1974) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता को इनके काव्य की मूल-भूमि मानते हुए इन्हे 'युग-चारण' व 'काल के चारण' की संज्ञा दी गई है।संस्कृति के चार अध्याय राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर की एक बहुचर्चित पुस्तक है जिसे साहित्य अकादमी ने सन् १९५६ में न केवल पहली बार प्रकाशित किया अपितु आगे चलकर उसे पुरस्कृत भी किया। इस पुस्तक में दिनकर जी ने भारत के संस्कृतिक इतिहास को चार भागों में बाँटकर उसे लिखने का प्रयत्न किया है। वे यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारत का आधुनिक साहित्य प्राचीन साहित्य से किन-किन बातों में भिन्न है और इस भिन्नता का कारण क्या है ? उनका विश्वास है कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रान्तियाँ हुई हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रान्तियों का इतिहास है।

पतझड़ के फूल

सुकून --- अरसे बाद देखकर सुकून मिला

मानो पतझड़ में कोई फूल खिला।

रिश्तों में अब भी वही गर्माहट संजो रखा है

जहाँ से राह बदलकर तूने

पतझड़ के फूल

गुल्ल्क यूं ही आबाद नहीं हुआ पाई पाई को जोड़ा है मैंने, 

अरमानो से जाकर पूछना किस कीमत पर उन्हें तोडा है मैंने,

हौसला यूं ही बुलंद नहीं हुआ अपने वजूद को निचोड़ा है मैंने,   

दुश्मनों से जाकर पूछना किस हैसियत में उन्हें छोड़ा है मैंने।

खिज़ा का खौफ़

अलग है सब से तबीअ'त ही उस की ऐसी है 

वो बे-वफ़ा है मगर उस पे ए'तिबार भी है 

बहारें जाती हैं जाने दो तुम तो रुक जाओ 

बहुत दिनों से तबीअ'त में इंतिशार भी है

अन्तिम यात्रा

मालूम नही क्यों

हैरान था हर कोई मुझे

सोते

हुए

देख कर...

मात्रा गणना

अनुनासिक की स्वयं की कोई मात्रा नहीं होती, तो किसी भी वर्ण में अनुनासिक लगने से मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पड़ता, जैसे :- शब्द अँगना = अ की मात्रा एक ही रहेगी

शब्द आँगन = आ की मात्राएँ दो ही रहेंगी

मात्रा कैसे गिरायें

शाश्वत दीर्घ की मात्रा को

कभी नहीं गिरा सकते

सब से पहले समझना जरूरी है

कि दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ क्या है

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

3888....इंसान परेशान बहुत है

शुक्रवार अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज के दिन की शुरुआत करते हैं एक छोटी सी
कहानी से जो मैंने अपने पापा से सुनी थी-
एक बार की बात है सर्दियों के दिन थे, ठंड बहुत ज्यादा थी। एक नन्हीं चिड़िया खाने की तलाश में उड़ती हुई दूसरे प्रदेश जा रही थी परंतु अत्यधिक ठंड के कारण उसका खून जमने लगा और वह एक मैदान में गिर पड़ी। वहाँ घास खाती एक गाय ने उस चिड़िया पर गोबर कर दिया। गोबर की गर्मी ने चिड़िया को सुकून से भर दिया और वह खुश होकर जोर-ज़ोर से गाने लगी। तभी  वहाँ से एक बिल्ली गुज़र रही थी चिड़िया की गाने की आवाज़ सुनकर वह ठिठक गयी और ध्यान से सुनने लगी चिड़िया की आवाज़ कहाँ से आ रही है, उसने गोबर के ढ़ेर को हटाया और चिड़िया को बाहर निकाला और खा गयी।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि
आपके ऊपर गंदगी फेंकने वाला हर कोई आपका दुश्मन नहीं होता और 
आपको.गंदगी से निकालने वाला हर व्यक्ति आपका दोस्त नहीं होता।
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आइये अब आज की रचनाओं का आस्वादन करें-



उसके हिस्से में
पांव के नीचे की ज़मीन
ही तो मिली थी
इस ज़मीन पर
सदाबहार के पेड़ उगाने लगा
सफेद,बैगनी और हल्के लाल रंगों में
अपने प्यार को महसूसता 
और फुरसत के क्षणों में
कच्ची परछी में बैठकर
प्यार से बतियाते हुए
मुस्कराने लगा

शुचि रजत बिछा हुआ यहाँ वहाँ सभी दिशा।
चाँदनी लगे टहल-टहल रही  समंग से।।

वो किरण लुभा रही चढ़ी गुबंद पर वहाँ।
दौड़ती समीर है सवार हो पमंग से।।

रूप है अनूप चारु रम्य है निसर्ग भी ।
दृश्य ज्यों अतुल दिखा रही नटी तमंग से।।



बंद हो गई चिट्ठी, पत्री।

फोनों पर पैगाम बहुत है।।


आदी हैं ए.सी. के इतने।

कहते बाहर तापमान बहुत है।।


झुके-झुके स्कूली बच्चे।

बस्तों में सामान बहुत है।।


हां, यहीं बसी रहती हैं ये चीजें, 
और सबसे पहले इसी हृदय को तोड़ती हैं,
फिर पैरासाइट की तरह खाती रहती हैं देह
तुम्हारे रक्त-चाप को बढ़ाती-घटाती, 
कभी सांसों की गति तेज करतीं, कभी रोक देतीं
कभी लगता प्राण देतीं, कभी लगता घात
इन्हें हृदय में रखने से मिलता सिर्फ अवसाद. 

और चलते-चलते
प्रतिभा,दृढ संकल्प, निरंतर लगन और ईमानदारी से किया कर्म अपना यथोचित सम्मान प्राप्त कर ही लेते हैं



--------
आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।

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