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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

1018...हम-क़दम का सोलहवाँ क़दम

सादर अभिवादन
कहते हैं सोलह की संख्या बड़ी प्यारी होती है, इससे आगे कोई 
जाना ही नहीं चाहता...पर मज़बूरी भी कोई चीज होती है
हवा और समय को कोई नहीं रोक सका....

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एक ही विषय पर कविता लिखना जो इस्तेमाल करता है 

अपनी सोच का कठिन नहीं उसके लिए....
एक छोटी सी कहानी कि कैसे एक कवि ने चार विषयों पर 

दो पंक्तिया की रचना कह दी...
उस समय अमीर खुसरो को ज़ोर से प्यास लगी थी । कुएँ के पास जा पहुँचे । वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। खुसरो के पानी माँगने पर उन्होंने कविता सुनाने की शर्त रख दी । 
एक ने खीर पर, दूसरी ने चर्खे पर, तीसरी ने कुत्ते पर 
और चौंथी ने ढोल पर। 
वे आज के हमारे जैसे कवि नहीं, अमीर खुसरो ही थे – सार्थक और मौलिक रचने वाले । उन्होंने एक ही पद्य सुनाया और चारों महिलाओं से पानी पाने की शर्त जीत गये :
खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चलाय
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय ।
-0-
चलिए चलें देखें....आपकी लेखनी के द्वारा प्रसवित रचनाएँ...

आदरणीय सखी मीना शर्मा की लेखनी

अनगिनत जन्मों से जुड़ा है
मेरा अस्तित्व तुम्हारे साथ,
कुछ यूँ....

जैसे साँसों से जीवन
जैसे वसंत से फागुन,
जैसे सूरज से भोर
जैसे पतंग से डोर,

-0-
आदरणीया आशा सक्सेना जी की कलम से

यूँ तो याद नहीं आती पुरानी बातें
 जब आती हैं
 मन  को ब्यथित कर जाती हैं
उसका अस्तित्व
अतीत में  गुम हो गया है
उसे  खोजती है या
 अस्तित्व उसे खोजता है
कौन किसे खोजता है 

-0-
आदरणीया साधना वैद दीदी 

विवाहोपरांत जब बाहर निकली
उस विराट वटवृक्ष की छाया से
तो मन में अटूट विश्वास था कि
अपने अस्तित्व को अब तो मैं
ज़रूर पा सकूंगी लेकिन
गृहस्थी की शतरंज की बिसात पर
मेरी हैसियत उस अदना से प्यादे की थी

-0-
आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा की कलम से

कैसे भूलूं कि तेरे उस 
एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....
शायद! इक भूल ही थी वो मेरी!
सोचता था कि मैं जानता हूँ खूब तुमको,
पर कुछ भी बाकी न अब कहने को,
न सुनने को ही कुछ अब रह गया है जब,
लौट आया हूँ मैं अपने घर को अब!
-0-

आदरणीय सखी सुधा सिंह जी की लेखनी

क्या जीवित रहना अस्तित्व है?
या कुछ पा लेना अस्तित्व है?

ये अस्तित्व है प्रश्नवाचक क्यों?
और सब है उसके याचक क्यों?

-0-
आदरणीय सखी नीतू जी

इस दुनिया के नक्शे पर
एक छोटा सा अस्तित्व हमारा
झूठे भ्रम में जिंदा है जो
करता रहता मेरा तुम्हारा

-0-

आदरणीय सखी आँचल पाण्डेय
गंगा,तुलसी का घुट कर बुरा हाल हुआ 
और दानव ने मनु को गोद लिया 
फ़िर तम का मनु सिरताज बना 
तब हनन धर्म अस्तित्व हुआ 
घोर कलजुग अस्तित्व से घिरी धरा 
ये भूमि असुरों का लोक हुआ 

-0-

आदरणीय सखी रेणुबाला
मेरी सीमायें और असमर्थतायें सभी जानते हो तुम ,
सुख में भले विरक्त रहो -
पर दुःख में मुझे संभालते हो तुम   ;
ये चाहत नहीं चाहती कि मैं बदलूं
और भुला दूं अपना अस्तित्व !!


-0-

आदरणीय सखी कुसुम कोठारी ने  लिखी दो रचनाएँ

और अस्मिता बचाने की लडाई
खूब लडो जुझारू हो कर लड़ो
पर रुको 
सोचो ये सिर्फ 
अस्तित्व की लड़ाई है या 
चूकते जा रहे 
संस्कारों की प्रतिछाया... 


जग में मेरा अस्तित्व

तेरी पहचान है मां 
भगवान से पहले तू है
भगवान के बाद भी तू ही है मां
मेरे सारे अच्छे संस्कारों का
उद्गम  है तू मां


-0-
आदरणाय सखी डॉ. इन्दिरा गुप्ता ने भी दो रचना रच दी

अस्तित्व कहाँ तन का रहा 
अब केवल परछाई है 
हवस मिटाने वाले तन  मैं 
बदनीयत की बादशाही है 


अस्तित्व पा रही माँ  तुझ मैं 

मेरा विघटन मत करना 
श्वास लेऊ और पंख फैलाऊ 
इतना बस माँ तुम करना !

-0-
आदरणीय पंकज प्रियम जी

यहां हर कोई लड़ रहा है
अपने अस्तित्व की लड़ाई।
दुनियां में खुद को बचाने 
को खुद से खुद की लड़ाई।
कोई लड़ रहा यहां दो जून
की रोटी जुटाने की लड़ाई।

-0-

 बहना सुप्रिया"रानू" की दो रचना
My photo
सृष्टि के अस्तित्व का आधार,
नर नारी के अंतरंग प्रेम का व्यवहार,
आज एक महामारी बना,
समय से पूर्व ही यह शारीरिक भूख
जैसे छुवाछुत की बीमारी बना,



फिर भी मैं नारी हूँ,
My photo
मेरा अस्तित्व संलिप्त है...
असीम प्रेम का सागर है,मुझमे
लुटाती हूँ बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक,
कभी भाइयों के लिए,कभी पति,कभी पुत्र तो कभी पौत्र,
कभी खुद को अलग न सोच पायी,
मैं हूँ सबके लिए बस इसी बात पर जीती आयी,

-0-

आदरणीय भाई सुशील जी जोशी जी का बिल्ला...

किसी की 
छाया भी अगर 
कहीं पा जायेगा 
तेरा अस्तित्व
उस दिन उभर
कर निखर जायेगा
कौड़ी का भाव 
जो आज है तेरा
करोड़ों के मोल
का हो जायेगा 
-0-
रचनाएँ सुविधानुसार लगाई गई है....
इज़ाज़त दें
यशोदा




रविवार, 29 अप्रैल 2018

1017....."तुम तो साहित्य-सेवी हो फिर यह यह राजनीति?"

सादर अभिवादन
आज 29 अप्रैल का दिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो लिखा जा सके
हाँ, रायपुर का एक गरम रविवार ज़रूर है...
ज़ियादा विचार न करते हुए चलें
आज-कल में पढ़ी रचनाओं की ओर....


न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय...रवीन्द्र सिंह यादव 
लोकतंत्र का एक खम्भा 
कहलाती न्याय-व्यवस्था, 
न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय
आयी कैसी जटिल अवस्था। 


"लेखनी की आत्महत्या"...विभा दीदी

स्तब्ध-आश्चर्य में डूबी मैंने यह निर्णय लिया कि इससे 
इस परिवर्त्तन के विषय में जानना चाहिए... 
मुझे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी... मुझे देखकर 
वह स्वत: ही मेरी ओर बढ़ आया।

औपचारिक दुआ-सलाम के बाद मैंने पूछ लिया , 
"तुम तो साहित्य-सेवी हो फिर यह यह राजनीति?"

उसने हँसते हुए कहा, "दीदी माँ! बिना राजनीति में पैठ रखे मेरी पुस्तक को पुरस्कार और मुझे सम्मान कैसे मिलेगा ?"


मैं : विधुर.. सुप्रिया पाण्डेय

मेरे सुख- दुख,मुस्कान-आँसू,
बाँटती रही ताउम्र
बन के मेरी हमकदम,
सारे फूल चुने जीवन के,
काँटो से होकर बढ़ाये कदम,
देकर थाती तीन अमूल्य धन,
छोड़कर यूँ बीच मे साथ कर गयी निर्धन ...


हर नया दिन...नूपुर जी कहती हैं 

हर नया दिन 
एक फूल की तरह
खिलता है,
और कहता है  . .
उठो जागो !
बाहर चलो !
शुरू करो
कोई अच्छा काम,
लेकर प्रभु का नाम ।



बालों पे चांदी सी चढ़ी थी.....निधि सिंघल

ध्यान से देखा बालों पे
चांदी सी चढ़ी थी,
थी तो मुझ जैसी
जाने कौन खड़ी थी।


इंसान...ओंकार केडिया
मेरी फ़ोटो
वह आदमी,
जिससे मैं सुबह मिला था,
कमाल का इंसान था,
बड़ा दयावान,
बड़ा संवेदनशील,
किसी का बुरा न करनेवाला,
किसी का बुरा न चाहनेवाला,


गम कहाँ जाने वाले थे रायगाँ मेरे...रोहिताश घोड़ेला

कितने दिन हो गये अफ़लातून से भरे हुए 
यानी कब तक जियें खुदा को जुदा किये हुए 

उलझी जुल्फें हैं और जिन्दगी भी एक तस्वीर में 
क्या यही बनाना चाहता था मै इसे बनाते हुए?

दें आदेश दिग्विजय को
सादर

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

1016... मुक्तक




सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
तोड़ हर चीज का होता है...
हर बीमारी का इलाज होता है...
पहले कोशिश की जाती है कि
बीमारी हो ही नहीं
तो
तनाव हो ही नहीं 
उसके लिए
क्या-क्या कोशिश की जा सकती है...
मौन हो प्रतीक्षित हूँ 
जब तक आप जबाब ढूंढते हैं
अनुभूतिभावाभिव्यक्ति करते हैं
तब तक सीखिए या सिखाइए


महादेवी वर्मा ने भी गद्यकाव्य पर विचार किया. उन्होंने श्रीकेदार द्वारा रचित ‘अधखिले फूल‘
की भूमिका में कहा कि:



पद्य का भाव उसके संगीत की ओट में छिप जाए, परन्तु गद्य के पास उसे छिपाने के साधन कम हैं. रजनीगंधा की क्षुद्र, छिपी हुई कलियों के समान एकाएक खिलकर जब हमारे नित्य परिचय के कारण शब्द हृदय को भाव–सौरभ से सराबोर कर देते हैं तब हम चौंक उठते हैं. इसी में गद्यकाव्य का सौन्दर्य निहित है. इसके अतिरिक्त गद्य की भाषा बन्धनहीनता में बद्ध चित्रमय परिचित और स्वाभाविक होने पर भी हृदय को
छूने में असमर्थ हो सकती है.




अब तो तेरी बर्बरता ने,सारी सीमायें तोड़ी।
देख जरा अब आईना तू,शर्म जरा करले थोड़ी।
लेंगें हम चुन -चुन कर बदला,तेरी सब करतूतों का।
ओ नापाक पाक अब तेरी,बनने वाली है घोड़ी।




ख़्वाब ख़्वाब होते हैं ,सच से कोई खबर नही होता ,
दिल खूं से भरा होता है ,ये कोई शहर नहीं होता ,
अजीज़  इतना  ही रखना  कि ,मन बहल  जाये ,
वरना  इश्क़  से विषैला कोई  जहर  नहीं   होता |




सहज प्रभावी, सहज स्मरणीय एवं सूत्र रूप में होने के कारण ही विश्व में सर्वप्रथम साहित्य के अन्तर्गत काव्य को सर्वाधिक प्रश्रय मिला। साहित्य को मुख्यतः तीन रूपों में विभाजित किया जाता है- पद्यात्मक, मिश्रित और गत्यात्मक । पद्यात्मक साहित्य के दो रूप है। या कह सकते है कि रूप रचना या स्वरूप विधान की दृष्टि से काव्य के दो भेद माने गए है- 1. प्रबंध काव्य 2. मुक्तक काव्य.

Image result for रसखान

कबीर के दोहे   ( कबीरदास )
मीरा के पद ( मीरा बाई )
बिहारी सतसई  ( बिहारी ) 
रहीम के दोहे  ( रहीमदास )

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चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, Jyoti Sparsha सहित, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं, कार, वृक्ष और बाहर

नभ चेतना भू शून्यों को भर जाती
तंभावती जल मेघ की दरखास्ती
बंद रहे राहों के दरीचों का स्पंदन
प्रस्फुरण प्रेम की डोर की अतिपाती

मुक्त हो जाने का समय निर्धारित

अब बारी है नए विषय की 
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम  सोलहवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय रहा
:::: अस्तित्व   ::::
:::: उदाहरण ::::
मैं बे-बस देख रहा हूँ
ज़माने के पाँव तले कुचलते
मेरे नीले आसमान का कोना
जो अब भी मुझे पुकारता है
मुस्कुराकर अपनी  बाहें पसारे हुये
और मैं सोचता हूँ अक्सर 
एक दिन 
मैं छूटकर बंधनों से
भरूँगा अपनी उड़ान
अपने नीले आसमान में
और पा लूँगा
अपने अस्तित्व के मायने

आप अपनी रचना आज शनिवार 28  अप्रैल 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी 
सोमवारीय अंक 30 अपैल 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 


शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

1015....फ़ैसले करेंगे दूर फ़ुतूर और गुमान....


सादर अभिवादन। 

प्राकृतिक न्याय के लिए वर्षों से 
लाचार जनता तड़पती देखो,  
वर्चस्व के लिए अब आपस में  
न्याय-व्यवस्था झगड़ती देखो।
सत्ता और न्याय-व्यवस्था में 
दोस्ती और साँठगाँठ का अनुमान,
गुज़रेगा यह दुश्वारियों का दौर भी  
फ़ैसले करेंगे दूर फ़ुतूर और गुमान।
-रवीन्द्र   
   
आइये चलते हैं अब आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर -
वर्तमान परिवेश का गहन जाएज़ा लेती हालात की पड़ताल करती 
एक शानदार ग़ज़ल मुलाहिज़ा कीजिये-


My photo

नाज़ुक सी छूई मूई पे, क़ाज़ी के ये सितम,
पहले ही संग सार के, ग़ैरत से मर गई.
सोई हुई थी बस्ती, सनम और ख़ुदा लिए,
"मुंकिर" ने दी अज़ान तो, इक दम बिफर गई.

एक सच जिसे हम ज़िंदगी भर झुठलाते रहते हैं ,दूसरे को 
मरता हुआ देखते हैं लेकिन अपने ऊपर लागू नहीं करते।  
पढ़िए एक आध्यात्मिक रुख़ की सुन्दर रचना-


अंतिम इच्छा..... नीतू ठाकुर

विधिना का लेख लिखित ना हो 
मृत्यू का क्षण अंकित ना हो 
पर शाश्वत पल हो जीवन का 
जब जीवन सूर्य उदित ना हो 

नई कारगर दवाइयाँ आने से अब मलेरिया का भयावह प्रकोप 
नियंत्रित होने लगा है. एक नज़र डालिये आंकड़ों पर 
हर्षवर्धन जी की सामयिक प्रस्तुति में-


विश्व मलेरिया दिवस

विश्व मलेरिया दिवस (World Malaria Day) प्रति वर्ष विश्व भर में 25 अप्रैल को मनाया जाता है। यूनिसेफ द्वारा पहली बार विश्व मलेरिया दिवस 25 अप्रैल, सन् 2008 ई. को मनाया गया था। 'मलेरिया' एक जानलेवा बीमारी है, जो मच्छर के काटने से फैलती है। मलेरिया जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से इस दिन को मनाने की शुरुआत की गई थी।

जीवन के उलझे रहस्य तलाशने की कश्मकश में आदरणीया सुधा सिंह  जी की उर्दू अल्फ़ाज़ से सजी-संवरी एक गंभीर रचना आपकी सेवा में-




बनके मुन्तजीर राह उनकी हम तकते रहे
वो हमें अनदेखा कर बगल से यूँ ही गुजर गए

दर रोज वो बढ़ाते रहे रौनक-ए - महफिल  
शाम-ओ-सुबह हमारी तो तीरगी में ठहर गये

किसानों की पीड़ा को मुखरित करती शुभम जी की 
एक समसामयिक रचना ग़ौर-तलब है-



जंतर मंतर पे धरना करते हुए
मैने देखा है किसान को मरते हुए

आदरणीया पम्मी सिंह जी का 2016 में प्रकाशित  काव्य-संग्रह "काव्यकांक्षी" हमारे संजीदा एहसासात का ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। हिन्दी भाषा के जाने-माने विद्वानों ने उनकी पुस्तक पर मोहक भावपूर्ण टिप्पणियाँ करते हुए उन्हें शुभकामनाऐं प्रेषित की हैं -  


Kavya Kanchhi


काव्यकांक्षी , कवयित्री पम्मी सिंह की कविताओं का पहला संकलन होकर भी भाव और भाषा की दृष्टि से परिपूर्ण है। संकलन की कविताओं में भावना का प्रवाह और अनुभव की कसौटी दोनों ही देखने लायक है। तलाश कविता की पंक्तियां -स्वतंत्रता तो उतनी ही है हमारी जितनी लंबी डोर ! सहज ही स्त्री मन की विवशताओं को  साफगोई से चित्रित करती है, इसी प्रकार कई राह बदल कर, किताबों के चंद पन्ने, निशान धो डालें ,जैसे दर्जनों कविताएँँ हैं जो पाठक के मन -मस्तिष्क को झकझोरती  है। कवयित्री पम्मी सिंह के लगातार लेखन के लिए शुभेच्छा एवं
 'सुरसरि सम सब कहँ  हित होई ' 
की मंगल कामना है।

सुबोध सिंह शिवगीत
हिन्दी विभाग
आदरणीय दिलबाग जी का अंदाज़-ए-बयाँ आपको  
अवश्य प्रभावित करेगा- 


मेरी फ़ोटो

पूछो, दरख़्त भी लगाया है कभी

शौक है जिन्हें छाँव घनी का ।

चलो ‘विर्क’ मैं तो नादां ठहरा

ग़म क्यों हमसाया है सभी का ?

आदरणीय महावीर उत्तरांचली जी की ग़ज़ल में समाये 
बिषयों पर नज़र डालिये -


करूँ क्या ज़िक्र मैं ख़ामोशियों का
यहाँ तो वक़्त भी थम-सा गया है
भले ही खूबसूरत है हक़ीक़त
तसव्वुर का नशा लेकिन जुदा है


हम-क़दम के सोलहवें क़दम
का विषय...

आज के लिए बस इतना ही। 
 मिलेंगे अगले गुरूवार नई प्रस्तुति के साथ। 
कल ज़रूर आइयेगा आदरणीया विभारानी श्रीवास्तव जी की विशेष प्रस्तुति का रसानन्द लेने। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

1014.... चल पथिक, अभय अथक पथ पर

||| सादर नमस्कार |||

आज 26 अप्रैल को विश्व बौद्धिक संपदा अधिकार दिवस 
(world intellectual property day)  मनाया जाता है।
विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के द्वारा 26 अप्रैल  2000 में यह घोषणा की गई।
"किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा अपनी मस्तिष्क के उत्पादन  के अनुसार 
किया गया सृजन बौद्धिक संपदा कहलाती है।"

व्यक्ति को उनके बौद्धिक सृजन के परिप्रेक्ष्य में प्रदान किया जाने वाला 
अधिकार बौद्धिक संपदा अधिकार कहलाता है।

इस दिवस को मनाये जाने का उद्देश्य बौद्धिक संपदा के अधिकारों 
(कॉपीराइट,पेटेंट,ट्रेडमार्क, औद्योगिक डिजायन इत्यादि) के संदर्भ में जागरुक करना है।

इस वर्ष इसका मुख्य विषय(Theme) है,
डिजिटल रचनात्मकता:संस्कृति की पुनर्कल्पना
 Digital Creativity:Culture Re imagined)

आप भी अपनी बौद्धिक संपदा के प्रति जागरुक रहकर अपनी बौद्धिक संपत्ति का सदुपयोग कर सकते हैं।

तो चलिए अवलोकन करते है आपकी बौद्धिक संपदा का....
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आदरणीय विश्वमोहन जी की अद्भुत  
शैली में लिखी
सारगर्भित,प्रेरक रचना का आस्वादन कीजिये
दह दहक दीया, दिल बाती का
तिल जले तेल, सूख छाती का।
समा हो खुद, बुझने को भुक भुक,
फिर, परवाने का मरना क्या!
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मिलिये एक बेहद प्रतिभाशाली, अद्भुत युवा कवि नवीन कुमार श्रोत्रिय जी से
जो हिंदी साहित्य की लुप्त होती लेखन विधायें दोहा,छंद,कहमुकरी इत्यादि में सिद्धहस्त तो है ही साथ 
गीत,गज़ल,हायकु जैसी हर विधा में माँ शारदा का आशीष इन्हें प्राप्त है।
उनकी लिखी भाई-बहन के स्नेह में भीगी एक रचना
बचपन की यादों का दर्पण,तडप जगायें भारी 
पलकें भारी हो  जाती जब,आये  याद तुम्हारी 
रक्षाबंधन    आया   बहिना,राखी तेरी,  गहना 
ओ प्यारी बहिना,ओ मेरी बहिना..
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आदरणीया मीना भारद्वाज जी द्वारा रचित प्रकृति सौंदर्य हायकु के रुप में



बढ़ी आबादी

सिमटी कुदरत
चिन्ता जनक
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आदरणीय लोकेश जी की मन छूती अभिव्यक्ति
तन्हाई के जंगल में 
भटकते हुए 
याद का पल
जब भीग जाता है 
अश्क़ों की बारिश में 
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मानव मन के सूक्ष्म भावों को उकेरती आदरणीया मीना शर्मा जी की रचना
जो प्रीत का धागा कच्चा हो,
टूटेगा ही !
पर उस धागे का एक छोर
जब बँधा हृदय से रह जाए !
और दूजा छोर खोजने में,
हर साँस उलझ कर रह जाए !
तब मन तो, दुखता है ना ?

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हम-क़दम के सोलहवें क़दम
का विषय...




आदरणीय रवींद्र जी लेकर आयेंगे कल का अंक।

आज की प्रस्तुति कैसी लगी अवश्य बताइयेगा
आप सभी के उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में


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