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मंगलवार, 22 मई 2018

1040....संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे।

जय माँ हाटेशवरी...
राजा राममोहन राय
एक प्रखर-प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है। वे भारतीय भाषायी प्रेस के सही अर्थों में संस्थापक थे। जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय पैनी पैठ के चिंतक थे।

उन्होंने आंदोलन और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी,वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया। राय हिन्दी, अँग्रेजी के अलावा फारसी, अरबी, संस्कृत एवं बांग्ला भाषा के भी जानकार थे।

राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे।
दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। 
राजा राममोहन राय एक प्रखर-प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है। वे भारतीय भाषायी प्रेस के सही अर्थों में संस्थापक थे। जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय पैनी पैठ के चिंतक थे।   

राजा राममोहन राय ने 'ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन' संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। बंगदूत एक अनोखा पत्र था। इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था।

राजा राममोहन राय के जुझारू और सशक्त व्यक्तित्व का इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि सन् 1821 में अँग्रेज जज द्वारा एक भारतीय प्रतापनारायण दास को कोड़े लगाने की सजा दी गई। फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई।

इस बर्बरता के खिलाफ राय ने एक लेख लिखा। लेख में उठाए मुद्‍दे थे-
1. जूरी प्रथा आरंभ की जाए।
2. न्यायाधीश और दंडाधिकारी के पद अलग किए जाएँ।
3. न्यायालय की कार्रवाई आम जनता के लिए खुली हो।
4. उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति हो।
5. पंचायतें कायम की जाएँ।
6. भारतीय जनमानस पर आधारित विधि का निर्माण हो।

राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। वे अँग्रेजी के हिमायती थे लेकिन हिन्दी के प्रति उनका अगाध स्नेह था।
वे रू‍ढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे।
आज उनके पावन दिवस पर इन महापुरुष को मेरा कोटी कोटी नमन......
....अब कुछ पढ़ी हुई रचनाओंं से......


स्वार्थ
भीगे तेरे आँसू में
दामन भी मेरे,
छलनी मेरा हृदय भी
हुआ दर्द से तेरे,
डोर जीवन की मेरी
है साँसों में तेरे,
मेरी डोलती नैया
है हांथों में तेरे,


छांह भी मांगती है पनाह....अश्वनी शर्मा
रेगिस्तान में जेठ की दोपहर
किसी अमावस की रात से भी अधिक
भयावह, सुनसान और सम्मोहक होती है
आंतकवादी सूरज के समक्ष मौन है
आदमी, पेड़, चिड़िया, पशु



नख से शिख तक ज़िंदा रहूँगी
मैं हीर थी,
हूँ
और रहूँगी !
मुझे भी जीने का हक़ है,
कुछ कहने का हक़ है
....

मेरी फ़ोटो
एक पलायन ऐसा भी .......
ये नामालूम सी दूरी है बनाई
सुनो तुम जानते हो न
निगाहों की भी उम्र होती है ..... निवेदिता


मंजिलें और खुशियाँ
पर मंजिल दर मंजिल
बैठूँ कुछ सुकून से
इसके पहले ही
हर बार
मिल जाता है
एक नया पता
अगली मंजिल का
अब तक के सफर में
कई कदम चलने
कई जंग लड़ने
वक्त के पड़ावों को
पार करते करते


आओ फासलों को गुनगुनाएं
नदी वापस नहीं मुड़ा करती
और रूहें आलिंगनबद्ध नहीं हुआ करतीं
इक सोये हुए शहर के आखिरी मकान पर दस्तक
नहीं तोड़ा करती शताब्दियों की नींद
आओ फासलों को गुनगुनाएं 
इश्क न जन्मों का मोहताज है न शरीर का ...

मेरी फ़ोटो
मुक्तक
निहारना चांद को भला सा लगता है ।
सौंदर्य का रसपान भी अच्छा सा लगता है ।।
खूबसूरती की कमी तो सूरज में भी नहीं ।
बस नजरे चार करना ही टेढ़ी खीर सा लगता है ।।


देश सबका है :)
मत करो देशका विभाजन
जातिवाद और धरम के नाम पर
क्योकि धरती सबकी है
देश सबका है !!
क्योकि धरती सबकी है
देश सबका है !!



हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम बीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:: ज्येष्ठ की तपिश (तपन) ::
उदाहरणः
आज भूनने लगी अधर है ,
रेगिस्तानी प्यास।

रोम रोम में लगता जैसे ,
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।

पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।

रचना की कुछ पंक्तिया दी गई है
यह रचना गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश' की लिखी हुई है

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना शनिवार 26  मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
28 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें


   
धन्यवाद।



   

















सोमवार, 21 मई 2018

1039 ....हम-क़दम का उन्नीसवाँ अंक

सादर नमस्कार
 आज के विशेषांक के मूल विषय पर बातें करना अति आवश्यक है।
मानव प्रकृति पुत्र कहलाता है। जीवन-यापन के लिए मनुष्य प्रकृति 
पर निर्भर है। सभ्यता के विकास की अंधी दौड़ में शहरीकरण 
के दवाब,बढ़ती जनसंख्या और तीव्र उन्नति की लालसा ने सबसे 
ज्यादा अत्याचार पेड़ों पर ही किया है।

पेड़ काटते कंक्रीट बोते हम आने वाले विनाश की दस्तक को 
अनसुना कर अपने अस्तित्व पर छाये खतरे से आँख फेर रहे है। 
इतना समझना तो होगा न कि आँख बंद कर लेने से 
सच्चाई नहीं बदल सकती है।

फ्लैट संस्कृति में बालकनी में बोनसाई लगाकर हम हरियाली 
और पर्यावरण के संतुलन के सुखद परिणाम का भ्रम पालने लगे हैं।
जरुरत है प्रकृति के प्रति  अपनी बोनसाई  सोच को बदलने की।
आप ने कभी कोई पेड़ लगाया है? या किसी पेड़ को कटने से रोकने 
की कवायद की है?  या फिर मेरी तरह बस कलम चलाकर 
बदलाव का सुखद स्वप्न देखते हैं?

हमक़दम के दिए गये विषय पर सभी रचनाकारों की जागरूक रचनात्मकता को नमन है। सभी रचनाकारों की विविधता पूर्ण 
वैचारिकी प्रवाह से निसृत रचनाओं के गर्भ में एक ही संदेश 
निहित है लोककल्याण के निहितार्थ पेड़ो को नष्ट न करें।
आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुये आपके लिखे 
रचनाओं का आस्वादन करते हैं।

 विशेष सूचना
रचनाएँ क्रमानुसार नहीं सुविधानुसार लगायीं गयीं हैं-
🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया साधना वैद जी
आओ ना ! 
ठिठक क्यों गए ? 
चलाओ कुल्हाड़ी ! 
करो प्रहार !
सनातन काल से ही तो 
झेलती आई हूँ मैं 
अपने तन मन पर 
तुम्हारे सैकड़ों वार ! 
भय नहीं है मुझे तुम्हारा 
तुम्हारे इस आतंक के साये में ही तो 
गुज़ारा है मैंने अपना जीवन सारा ! 


🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया आशा सक्सेना जी
मनुष्य अपने स्वार्थ में
इतना अंधा हो गया कि यह तक भूला
 द्रुत गति से पेड़ काटे तो जा सकते है
 पर एक पेड़ लगाना
  उसे बड़ा करना है कितना मुश्किल
 दूर से एक लकड़हारा आया
 हाथ में लिए कुल्हाड़ी पेड़ काटने के लिए 
प्रकृति नटी ने देख उसे भय से
वृक्ष की ऊंचाई पर पनाह पाई

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की कलम से दो रचनाएँ
ठंडी बयार का झोंका
पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं

🔷💠🔷

हे मूरख नर
महा अज्ञानी
क्या कर रहा
तूं अभिमानी
अपने नाश का
बीज बो रहा
क्यों कहते
तूझे सुज्ञानी
आज तक विज्ञान
खोज मे
एक बात तो साफ हुई
कितने ग्रह उपग्रह है
लेकिन
इस धरा को छोड,
ना है मानव कहीं

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता की लिखी दो रचनाएँ
आँख के अंधे नाम नयन सुख
ओ  मूरख अज्ञानी रुकजा 
क्यूँ पाँव कुल्हाड़ी मार रहा 
जो तेरा जीवन सरसाता
क्यों वार उसी पर कर रहा ! 
आँख के अंधे नाम नयन सुख 
करते हो वैसा  भरते हो 
दूषित श्वास तुम्हें मारेगी 

🔷💠🔷

मत बैठो उस ढहती कगार पर 
ना पतन की राह निकालो 
मेरा क्या मैं काष्ठ निर्जीव 
तुम अपना तो भला विचारों ! 

एक कटे और दस उगे 
फिर पांच से पचास 
पीढ़ी दर पीढ़ी यही सुमारग 
दिखलाओ इंसान ! 

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया सुधा सिंह जी कलम से प्रवाहित
 याद रहे सामने तुम्हारे चुनौती बड़ी है.
अब मेरी निस्वार्थ सेवा का फल देने की घड़ी है

अपनी भावी पीढ़ी के शत्रु तुम न बनो.
उनके अच्छे भविष्य की नीव धरो.
कम से कम अपने जन्मदिन
पर ही वृक्षारोपण करो.
🔷💠🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया मीना शर्मा जी
ठहरो, कुल्हाड़ी ना चलाओ !
इसकी बलि लेकर पाप ना कमाओ !
एक साधारण सा पेड़ है ये तुम्हारे लिए !
पर क्या जानते हो,
पेड़ कभी साधारण नहीं होता !!!!!

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया आँचल पाण्डेय जी की रचना

सर पे सूरज चढ़ चुका है
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे


🔷💠🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया सुधा देवरानी जी
बस बहुत हुआ ताण्डव तेरा
अबकी तो अपनी बारी है
हम पेड़ भले ही अचल,अबुलन
हम बिन ये सृष्टि अधूरी है

वन-उपवन मिटाकर,बंगले सजा
सुख शान्ति कहाँ से लायेगा
साँसों में तेरे प्राण निहित तो
प्राणवायु कहाँ से पायेगा...

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आप के द्वारा सृजित हमक़दम का यह अंक 
आपको कैसा लगा कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के 
द्वारा अवश्य अवगत करवाइयेगा।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक देखना न भूले।

अगले सोमवार फिर मिलेंगे नये विषय पर  
आपके द्वारा सृजित रचनाओं के साथ।

आज के लिए बस इतना ही

रविवार, 20 मई 2018

1038...कम्प्यूटर में वायरस

सादर अभिवादन...
आज हम हैं....आपकी अदालत में
ये नामालूम है कि क्या हुआ
कर्नाटक की संसद में..
कौन गुणा और कौन भागा


चलिए ले चलते हैं आज की पढ़-सुनी की ओर... 

तुम जीवित हो माने कैसे?...श्वेता सिन्हा

चित्र-मनस्वी प्रांजल
सोच नहीं बदलता ज़माना 
कभी नारी के परिप्रेक्ष्य में
बदलते युग के गान में दबी
सिसकियों को पहचाने कैसे?

बैठे हो कान में उंगलियाँ डाले
नहीं सुनते हो चीखों को?
नहीं झकझोरती है संवेदनाएँ?
मृत नहीं तुम जीवित हो माने कैसे?



पास की छोटी मछली भली होती है....कविता रावत

भालू को मारने से पहले उसके खाल की कीमत नहीं लगानी चाहिए
मछली पकड़ने से पहले ही उसके तलने की बात नहीं करनी चाहिए

हाथ आई चिड़िया आसमान उड़ते गिद्द से कहीं अच्छी होती है
दूर की बड़ी मछली से पास की छोटी मछली भली होती है



अफ़वाह.....राकेश श्रीवास्तव

कानों सुनी बातों का असर,
डाले ये, समझने पर असर
जगाता है झूठा अहंकार,
सजाता है नफ़रत का शहर.

आसां नहीं है सत्य का डगर, 
तय करता है ये लम्बा सफ़र,
टूटती है उम्मीदें कितनी,
शैतान इससे है बे-असर.

जीवन सरिता बहती जाती.....अनीता

सुख-दुःख मनहर तटों के मध्य
जीवन सरिता बहती जाती,
नित्य नवीन रूप धरकर फिर
माया के नित खेल रचाती !

कम्प्यूटर में वायरस (रहस्य कथा).....पुष्पेन्द्र द्विवेदी

लोनावला का एक सूनसान बंगला जिसमे शायद ही कोई रहता हो,
अरसे गुज़र गए इस बंगले के इर्द गिर्द कोई परिंदा भी भटका हो , 
वैसे ये बंगला एक बहुत बड़े फिल्म प्रोड्यूसर मिस्टर केशवदास मूलचंदानी का है , जो की ९० के दशक के मशहूर प्रोड्यूसर 
हुआ करते थे , अब वो इस दुनिया में नहीं रहे ,




हाथ पकडती है और कहती है.....रोहिताश घोड़ेला

ये सज़ा जो तूने पाई है, खैरात में बाँट
तेजाब से जले चहरे पर नकाब ना रख 

होगी किसी मजबूरी के तहत बेवाफईयाँ 
तू उसे सोचते वक्त नियत खराब ना रख 


खामोशी....पंकज प्रियम

दिल मे क्या गुजरी है ,कोई बताएगा क्या
जो गुजरा है लम्हा,लौट के आएगा क्या।

छोड़कर गए वो तन्हा हमें करके रूसवा
दिल में जो जख़्म बना,भर पाएगा क्या।


एक तस्वीर...पल्लवी गोयल

गुलाबी से इस शहर में 
गुलाबी सा नशा है उनका भी 
रात बीतती है इंतजार में उनके
और दिन ख्वाब  में उनके ही 
बंद आंखों में नशा-ए-इज़हार है  

इज़ाज़त दें दिग्विजय को
आदेश हुआ तो फिर मिलेंगे
सादर











शनिवार, 19 मई 2018

1037... भांग




सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

बूढ़े तन पे युवा मन
अंदाज़ा नहीं होगा कि
सामने वाला चुप है तो
कमजोर नहीं है
कसूरवार कौन है
मैं तू या

भांग

शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ
छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले।
खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि
कब शाट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे।



My photo
ओ रसगुल्ले इधर से
आइधरर से आ, उधर से आ,
सीधे मुंह में गिरती आ
एक सेर मलाई और दो
रसगुल्लेइतनी ही है मांग मेरी



शिव जाग मनुज ललकार रहा

मन में श्रद्धा, भक्ति में निष्ठा, ले करते सब यात्रा अमरनाथ की,
कितने ही लालायित भक्त, उस हिमलिंग का दर्शन करते,
प्रान्त-प्रान्त से आते उपासक, अपना जीवन धन्य करते।
पर हिम शिखा पर बसने वाले, भांग धतुरा रसने वाले,
इस तपती धरती पर अब, तू एक हिम लिंग को तरस रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा

इजाजत दे मुझे

मुझे लौटना है अँधेरों के पास, दूर इस बेदर्द-सहर से, हमेशा के लिए,
इजाजत दे मुझे जाने को, तेरे शहर से, हमेशा के लिए …

जो तुम लौटोगे अगर, तो कोई इशारा करो,
जगह दो दिल में या फिर बंजारा करो,

बस एक तेरे इंतजार में, ज़िंदग़ी के लम्हें गए हैं ठहर से,
अब तो इजाजत दे दे मुझे, जाने को तेरे शहर से,

पोषम पा

उस गली से गुजरा हूँ आज, इकलौता देवदार का पेड़ खड़ा रहता था
जहाँ वहां अब एक टेलिकॉम टाबर है, पेड़ की जड़ों पर
सीमेंट का चबूतरा है, मैंने बच्चों को देखा है, सपाट धरातल पर
 पड़े हुए, भांग के नशे में, देवदार का पेड़ तो रहा नहीं,
 बच्चों की मनोस्थिति भी, बदल गयी है

मेरा फोटो

पिता की मौत

जीवन इतना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दु:खों के
उसके बाद सुख का क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से हमारे ही कान के परदे फट जाएँ
ह्रदय का पारा कब नाभी में उतर आये

><

फिर मिलेंगे .... प्रतीक्षित


उपरोक्त चित्र को आधार मान कर रचना लिखनी है
सबको अपने ढंग से पूरी कविता लिखने की आज़ादी है


आप अपनी रचना आज शनिवार 19  मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं
आगामी सोमवारीय अंक 21 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




शुक्रवार, 18 मई 2018

1036..हमें आदत हो गयी है अब तो ऐसे समाचारों की

"सावधानी हटी,दुर्घटना घटी" 
 "सुरक्षा प्रथम,काम हरदम"|
सारे अनमोल नारे धरे के धरे रह गये जब भीड़ भरे 
बनारस के व्यस्तम इलाक़े में लापरवाही से रखा निर्माणाधीन 
पुल का  गार्डर(बड़ा बीम) भरभरा कर गिर पड़ा। चंद पलों में 
ज़िदगी के सफ़र के राही मौत की आगोश में समा गये। ऐसे हादसे 
पहली बार नहींं हुये हैं। आख़िर क्यों हर बार सात्वंना, मुआवजा 
और संवेदना के जुमलों के साथ हम नये हादसों का पुल तैयार करते हैंं ? सबक लेकर सतर्कता का, सुरक्षा के सही मानकों का कड़ाई से पालन कर कोई और हादसा न हो क्यों नहीं सुनिश्चित करते हैं?


धन या पद से संबंधी भ्रष्टाचार तो फिर भी समझ में आता है पर मानव जीवन के मूल्य पर यह लापरवाही? इस संबंध में बेहद गंभीरतापूर्वक विचार होना आवश्यक है।  जब तक इस हादसे पर जाँच कमेटियां अपने रिपोर्ट देगी तब तक कोई नया हादसा तैयार मिलेगा। हमें आदत हो गयी है अब तो ऐसे समाचारों की, तभी तो दैनिक क्रियाकलापों की तरह संवेदना प्रकट कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।

||  सादर नमस्कार  ||

चलिए अब आप के द्वारा सृजित रचनाओं के संसार में चलते हैं 
आप भी आनंद लिजिए-

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आदरणीया सुधा सिंह जी की बेहद सुंदर और सारगर्भित रचना
हाँ इंसान,
जो कभी हुआ करते थे
कब हुए वो लुप्त, अज्ञात है ये बात.
डायनासोर, डोडो पक्षी
या जैसे लुप्त हुई
कई अन्य प्राणियों की जात 


🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया मीना शर्मा जी की लिखी सुंदर गज़ल

My photo
इक सितारा आसमां में है मेरे भी नाम का,
उसको आँखों में छुपाना, बस यही है ज़िंदगी !

मरने की तो लाख वजहें हैं जहां में दोस्तों !
एक जीने का बहाना, बस यही है ज़िंदगी !


🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीय रंगराज अयंगर सर की लिखी हृदयस्पर्शी रचना
छोड़ दें दुनियां
किसी एक की खातिर
न हो मुमकिन ये मगर,
पर किसी एक की खातिर,
ये दुनियां रुके,
ये भी जरूरी तो नहीं.
🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया पुरुषोत्तम जी की लिखी मर्मस्पर्शी रचना
कोलाहल

खामोश रहा वो, सागर की तट पर,
चुप्पी तोड़ती, उन लहरों की दस्तक पर,
हाहाकार मचाती, उनकी आहट पर,
सहज-सौम्य, सागर की अकुलाहट पर!

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीय मीना भारद्वाज की रचना
"गूफ्तगू"(ताकाँ)
मेरी फ़ोटो
मेरे अपने
तेरा हाथ पकड़
चलना चाहूं
एक नई डगर
बन के सहचर
🔷💠💠🔷💠🔷

और चलते-चलते आदरणीय ध्रुव जी की गंभीर कलम से
गहन मर्मस्पर्शी रचना
चार पाये
उखाड़ता हूँ,रह-रहकर 
कुछ बाल पके-से 
छुपाने हेतु,
अपने उम्र की नज़ाकत !
मरते थे दुनियावाले जिसपर। 
🔷💠🔷💠🔷💠🔷💠🔷

मौत चौक-चौराहोंं में मिलने लगी
 मनहूसियत गलियों में खिलने लगी
मुक्तिधाम में बिलख रही है मासूमियत
कौन करे किसी के कर्म का हिसाब
पशुता मानवता को छलने लगी

🔷💠💠🔷💠🔷
हमक़दम  के इस सप्ताह का
विषय जानने के लिए देखिए

आज के लिए इतना ही
आप सभी की बहुमूल्य प्रतिक्रिया की
प्रतीक्षा में

श्वेता सिन्हा

गुरुवार, 17 मई 2018

1035...जो बोया है वही काटोगे, यही दस्तूर है जीवन का...

सादर अभिवादन।
चुनावी रैलियों में फँसा देश,
वाराणसी में सरकारी लापरवाही का क्लेश,
लाशों की सौदेबाज़ी में इंसानियत को शर्मसार करता परिवेश,
कर्नाटक में राजनीति को सबक़ सिखाता जनादेश,
राष्ट्र-निर्माण की आड़ में जनसेवक मानते ख़ुद को नरेश!
-0-0-0-

आज से माह- ए- रमज़ान का आग़ाज़..
लगभग सोलह जून को ईद का उत्सव सारे देश में मनाया जाएगा
हर आम व ख़ास से गुज़ारिश  है कि सारे देश में अमन (शान्ति) बनाए रखें

-0-0-0-

चलिए अब रुख़ करते हैं आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर -




जब प्राण संकट में पड़ जाते हैं,

भौतिक सम्पदा काम नहीं आती है.

मुक्ति मिलते ही फिर भागते हो, यही दस्तूर है जीवन का। 

नैतिकता नहीं है अब तुम में,

फिर भी ढूंढते हो तुम औरों में,

जो बोया है वही काटोगे, यही दस्तूर है जीवन का।




कूए ग़ायब हो गये ,   सूखे  पोखर - ताल !

पशु - पक्षी और आदमी , सभी हुए बेहाल !!

:

धरती व्याकुल हो रही , बढ़ती जाती प्यास !

दूर  अभी  आषाढ़  है , रहने  लगी  उदास  !!






यह सिर्फ संयोग नहीं वरन उसी सांस्कृतिक विरासत का सुखद परिणाम है, जिसकी चर्चा वे स्वयं करती हैं. गीत-ग़ज़ल-मुक्तक पर समान रूप से अधिकार रखने की कला उनके श्रम का ही नहीं वरन उस सांस्कृतिक विरासत के हस्तांतरण का भी प्रतिफल है जिसे अनिता जी ने कलम और भावनाओं के सहारे एकाकार बनाया हुआ है. उनकी कही-अनकही के आगे का संसार माँ के आँचल में पल्लवित होता है, जहाँ एहसास है, ज़िन्दगी है, कामना है. उनका अनमना-मन शरद में गाँव की यात्रा करता है तो चाँद को आवेदन करता है कि उतर आ धरती पर आज करेंगे बात. 




सदा रहे निस्वार्थ भावना, हो  जग  का कल्याण,
 सतत साधना के ही बल पर,बनती निज पहिचान,





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फिर मुझे सच का पता चला। मैं बदहवास सी भागती हॉस्पिटल पहुँची जहाँ तुम्हारी माँ मौत से लड़ रही थी। ये मेरी बदकिस्मती थी या सच को इसी तरह से सामने आना था कि मेरी आँखों के सामने माँ के वो आखिरी शब्द निकले...बहू का ध्यान रखना। तुम्हारी पत्नी तुम्हें ढाँढस बंधा रही थी। मेरे कदम खुद-ब-खुद पीछे हट गए। कुछ भी नहीं बचा था मेरे पास, सांत्वना के दो शब्द भी नहीं। मैं हॉस्पिटल से बाहर आ गयी। ये तय नहीं कर पा रही थी कि मैं छली गयी या नियति ने मेरे साथ कोई नाइंसाफी की। इतना सब कुछ हो गया और तुमने मुझे सिर्फ दो बोल बोले..सॉरी। क्या इतना कमजोर था मेरा प्यार जो सच नहीं सुन पाता?




तीखी उनकी धार, नहीं दरबार सहेगा !
चंवर बादशाही से ही,तलवार बदल लें !

कोई मसालेदार खबर इन दिनों न आई 
उनको कहिये अपने गोतामार बदल लें !


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तुम मौज-मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते फिरो
कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
औरों के हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या

हम-क़दम के उन्नीसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........

फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
कल आ रही हैं आदरणीया श्वेता सिन्हा जी अपनी प्रस्तुति के साथ।
रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 16 मई 2018

1034..हम अपनी -अपनी हद लिखते हैं..

।प्रातः वंदन ।।
 विश्व परिवार दिवस  (१५मई ) की हार्दिक शुभकामनाएँ । वक्त की जरूरत के
 मुताबिक हम भले ही एकल परिवार की ओर बढ़ रहे हैं रहे हैं पर संयुक्त परिवार के
  खूबसूरती से इनकार नहीं किया जा सकता जहां पीढ़ियों के बीच सामंजस्य बनाने में
 कई पड़ावों से गुजरना पड़ता है क्योंकि परिवार ही पूंजी है.. इसलिए चलो..

 अब हम अपनी -अपनी हद लिखते हैं
रिश्तों को महफूज रखतें हैं

इन्हीं खूबसूरत विचारों  के साथ अब हम लिंकों  पर गौर फ़रमाते हैं..✍
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आदरणीया रेणु व्यास जी की रचना..
कल रात एक सांवली सी लड़की बहुत याद आई 

मैं चुपके से फिर एक बार अपने बचपन में लौट आयी. . 
मिली मुझे एक बार फिर  वो मासूम सी परी 
थोड़ी शरारती , थोड़ी नादान , पर बातों की खरी 
बुनती थी सुन्दर सपने , रहती खयालों में घिरी..

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ब्लॉग लालित्यम्  से
 कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ ! 
एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त,
 सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला, पुटलिया सा भेली बना गँवार अक्खड़  ठस जैसा गुड़?
पर क्या किया जाय पहले
 उन्हीं बुढ़ऊ को याद करते हैं लोग.
 इस चिपकू बूढ़-पुरान के चक्कर में, चंचला ..

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ब्लॉग उलूक टाइम्स से..

होता है 
एक नहीं 
कई बार 
होता है 

कुछ पर 
लिखने 
के लिये 
कुछ भी 
नहीं होता है 
तो मत लिख 
लिखने की 
बीमारी का 
इलाज सुना..

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आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी की कलम से..।
समाचार आया है-
"इज़राइली राजकीय भोज में जापानी प्रधानमंत्री को 
जूते में परोसी मिठाई!" 
ग़ज़ब है जूते को  
टेबल पर सजाने की ढिठाई !!
दम्भ और आक्रामकता में डूबा 
एक अहंकारी देश 

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ब्लॉग कबीरा खडा़ बाज़ार में से ..
नमस् से बना है नमाज़ जबकि वन्दे का भी वही अर्थ है जो नमस् का है। लेकिन वन्दे -मातरम कहने से हमारे माशूक को परहेज़ है ..

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और अंतिम कड़ी में पढे आदरणीया अपर्णा वाजपेयी की रचना..



मैंने देखा है,
कई बार देखा है,
उम्र को छला जाते हुए,
बुझते हुए चराग में रौशनी बढ़ते हुए,
बूढ़ी आँखों में बचपन को उगते हुए
मैंने देखा है...
कई बार देखा है,
मैंने देखा है 
बूँद को बादल बनते हुए,
गाते हुए लोरी बच्चे को..
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हम-क़दम के उन्नीसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........


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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍






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