सादर अभिवादन
ग्रीष्म ऋतु की तपिश अपने चरम पर होती है ज्येष्ठ मास में।
मौसम की तपन सहता आया इंसान अब उन्मादी,कलुषित,आपराधिक,
स्वार्थी विचारों की असहनीय गरम हवा में कुछ इस तरह झुलस रहा है
कि आसपास उसे कोई राहतभरा नज़ारा नज़र नहीं आता। ज्येष्ठ मास
में लू के झुलसाते थपेड़े झेलने में इंसान ने कभी हार नहीं मानी।
ऐसे मौसम में दिन में यात्रा करते समय छिला हुआ प्याज़ क़मीज़ की
जेब में रखकर चलते थे। कुछ लोग इसे अन्धविश्वास मानते हैं लेकिन
यह बुज़ुर्गों का दिया हुआ नुस्ख़ा कारगर है। प्याज़ में निहित पानी
वाष्पोत्सर्जन के ज़रिये ऊपर की ओर उठता है और नाक के आसपास की
अपेक्षाकृत गर्म हवा को ठंडा करता है और साँस में ठंडक भरी हवा फेफड़ों
में जाती है जिससे लू लगने का ख़तरा टालता है।
कि आसपास उसे कोई राहतभरा नज़ारा नज़र नहीं आता। ज्येष्ठ मास
में लू के झुलसाते थपेड़े झेलने में इंसान ने कभी हार नहीं मानी।
ऐसे मौसम में दिन में यात्रा करते समय छिला हुआ प्याज़ क़मीज़ की
जेब में रखकर चलते थे। कुछ लोग इसे अन्धविश्वास मानते हैं लेकिन
यह बुज़ुर्गों का दिया हुआ नुस्ख़ा कारगर है। प्याज़ में निहित पानी
वाष्पोत्सर्जन के ज़रिये ऊपर की ओर उठता है और नाक के आसपास की
अपेक्षाकृत गर्म हवा को ठंडा करता है और साँस में ठंडक भरी हवा फेफड़ों
में जाती है जिससे लू लगने का ख़तरा टालता है।
इसी तरह गर्मी के कारण शरीर का तापमान नियंत्रित करने हेतु तेज़ रफ़्तार से
पसीना निकलता है जिसके साथ महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट (सोडियम ,पोटेशियम,
क्लोराइड आदि ) शरीर से बाहर निकल जाते हैं। पसीना निकलने के बाद शरीर
पर जो नमक जैसा खारा पदार्थ जमा होता है, दरअसल ये इलेक्ट्रोलाइट होते हैं।
इलेक्ट्रोलाइट के शरीर से बाहर निकलने से Dehydration (पानी की कमी ) की
अवस्था आ जाती है।
राहत की बात है कि ककड़ी में ये सारे इलेक्ट्रोलाइट पाए
जाते हैं। ककड़ी खाकर तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए अन्यथा इलेक्ट्रोलाइट
बेअसर हो जायेंगे। क़ुदरत ने अगर शरीर से पानी पसीना बनकर बाहर जाने के
लिए गर्मी का मौसम दिया है तो उसकी भरपाई के लिए रसभरे फल ककड़ी,खीरा,
तरबूज़ ,ख़रबूज़ा, आम, नींबू आदि भी दिए हैं। हमें इन फलों का इस्तेमाल
सावधानी पूर्वक करना चाहिए अर्थात इस्तेमाल के वक़्त ये ठंडे हों और साफ़ हों।
बाज़ार से लाये गए फल-सब्ज़ियाँ नमक के पानी से धोने से उनमें चिपके हानिकारक
जीवाणु निष्प्रभावी हो जाते हैं।
पसीना निकलता है जिसके साथ महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट (सोडियम ,पोटेशियम,
क्लोराइड आदि ) शरीर से बाहर निकल जाते हैं। पसीना निकलने के बाद शरीर
पर जो नमक जैसा खारा पदार्थ जमा होता है, दरअसल ये इलेक्ट्रोलाइट होते हैं।
इलेक्ट्रोलाइट के शरीर से बाहर निकलने से Dehydration (पानी की कमी ) की
अवस्था आ जाती है।
राहत की बात है कि ककड़ी में ये सारे इलेक्ट्रोलाइट पाए
जाते हैं। ककड़ी खाकर तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए अन्यथा इलेक्ट्रोलाइट
बेअसर हो जायेंगे। क़ुदरत ने अगर शरीर से पानी पसीना बनकर बाहर जाने के
लिए गर्मी का मौसम दिया है तो उसकी भरपाई के लिए रसभरे फल ककड़ी,खीरा,
तरबूज़ ,ख़रबूज़ा, आम, नींबू आदि भी दिए हैं। हमें इन फलों का इस्तेमाल
सावधानी पूर्वक करना चाहिए अर्थात इस्तेमाल के वक़्त ये ठंडे हों और साफ़ हों।
बाज़ार से लाये गए फल-सब्ज़ियाँ नमक के पानी से धोने से उनमें चिपके हानिकारक
जीवाणु निष्प्रभावी हो जाते हैं।
आज के अंक का शीर्षक "ज्येष्ठ मास की तपिश" घोषित किया गया था जिस
आपकी ओर से सुन्दर व प्रभावशाली रचनाओं के रूप में उत्साहवर्धक असर
परिलक्षित हुआ है। एक ही बिषय पर पाठकों के अलग-अलग दृष्टिकोण पढ़ने और
समझने को मिलें तो इससे रचनात्मकता के नये आयाम विकसित होते हैं।
हम आशावान हैं कि आप इस उत्साह को हम-क़दम के रूप में बरक़रार रखेंगे।
आपकी ओर से सुन्दर व प्रभावशाली रचनाओं के रूप में उत्साहवर्धक असर
परिलक्षित हुआ है। एक ही बिषय पर पाठकों के अलग-अलग दृष्टिकोण पढ़ने और
समझने को मिलें तो इससे रचनात्मकता के नये आयाम विकसित होते हैं।
हम आशावान हैं कि आप इस उत्साह को हम-क़दम के रूप में बरक़रार रखेंगे।
सर्वप्रथम उस गीत का ज़िक्र जो आपको उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया था। आदरणीय
जानकी प्रसाद "विवश" जी ग्वालियर के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं।
फेसबुक पर सवा लाख से अधिक पाठकों ने उनकी रचनाओं को like किया है।
जानकी प्रसाद "विवश" जी ग्वालियर के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं।
फेसबुक पर सवा लाख से अधिक पाठकों ने उनकी रचनाओं को like किया है।
मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका सानिध्य एवं मार्गदर्शन मिला।
महासमर का दृश्य ला रही है,
शैतान लपट ।
धूप, चील जैसी छाया पर ,
प्रति पल रही झपट ।
कर वसंत को याद बगीचा,
...देखे महाविनाश।
इस बिषय पर हमारे पिछले अंक 1042 में आयी दो टिप्पणियों का ज़िक्र भी लाज़मी है -
आदरणीया रेणु बाला जी -
Renu24 मई 2018 को 4:15 pm
आदरणीय रवीन्द्र जी -- आज के अंक की छोटी सी भूमिका में तपते ,आग उगलते जेठ मास में
इसकी तपन के साथ खूबियाँ भी साथ साथ याद आ गई | यूँ तो आजकल तरबूज , खरबूजे ,
आम इत्यादि फल पूरा साल मिलते हैं पर इन रसीले मधुर फलों के सेवन का आनंद जो इस
भीषण गर्मी के मौसम में आता है वो किसी और मौसम में नहीं आता | सड़कों और तपते
रास्तों के किनारे इन फलों का ढेर लगाये ग्राहकों की बाट जोहती आशावान आँखें किसी और
मौसम में कहाँ नजर आती हैं ? हम लोग इस गर्मी से जहाँ घरों में दुबक जाते हैं ये लोग
तपती झुलसाती लू में भी रास्तों पर डेरा जमाये रहते हैं | नदियों के किनारे इस फलों के
उपजाने वाले किसान ज्यादातर छोटे किसान होते हैं जिनकी साल भर आजीविका इन
फलों पर निर्भर होती है | वे महीनों पहले इन फलों को उपजाने में उत्साह से जुट जाते हैं |
इन रसीले फलों के पीछे उन की अनथक मेहनत को ना भुलाया जाये , जिसकी बदौलत
हमे बहुत ही कम दामों पर इतने रसीले फल उपलब्ध होते हैं | आज के सभी अंक देखे
बहुत ही शानदार हैं सभी | सभी पर लिखा केवल रश्मि शर्मा जी के सुंदर चित्र श्रृंखला से
सजे लेख पर लिखना संभव ना हो पाया , हालाँकि मैंने बहुत कोशिश की | उन्हें इसी
मंच से मेरी हार्दिक बधाई सुंदर यात्रा संस्मरण के लिए | मेरे लेख के साथ मेरे नए
ब्लॉग को भी पञ्च लिंकों में पहली बार स्थान मिला जिससे बहुत ख़ुशी हुई |
आपका सादर आभार और हार्दिक बधाई सुंदर लिंक संयोजन के लिए |सभी
सहयोगी रचनकारों को सस्नेह शुभकामनाये | सादर ------
इसकी तपन के साथ खूबियाँ भी साथ साथ याद आ गई | यूँ तो आजकल तरबूज , खरबूजे ,
आम इत्यादि फल पूरा साल मिलते हैं पर इन रसीले मधुर फलों के सेवन का आनंद जो इस
भीषण गर्मी के मौसम में आता है वो किसी और मौसम में नहीं आता | सड़कों और तपते
रास्तों के किनारे इन फलों का ढेर लगाये ग्राहकों की बाट जोहती आशावान आँखें किसी और
मौसम में कहाँ नजर आती हैं ? हम लोग इस गर्मी से जहाँ घरों में दुबक जाते हैं ये लोग
तपती झुलसाती लू में भी रास्तों पर डेरा जमाये रहते हैं | नदियों के किनारे इस फलों के
उपजाने वाले किसान ज्यादातर छोटे किसान होते हैं जिनकी साल भर आजीविका इन
फलों पर निर्भर होती है | वे महीनों पहले इन फलों को उपजाने में उत्साह से जुट जाते हैं |
इन रसीले फलों के पीछे उन की अनथक मेहनत को ना भुलाया जाये , जिसकी बदौलत
हमे बहुत ही कम दामों पर इतने रसीले फल उपलब्ध होते हैं | आज के सभी अंक देखे
बहुत ही शानदार हैं सभी | सभी पर लिखा केवल रश्मि शर्मा जी के सुंदर चित्र श्रृंखला से
सजे लेख पर लिखना संभव ना हो पाया , हालाँकि मैंने बहुत कोशिश की | उन्हें इसी
मंच से मेरी हार्दिक बधाई सुंदर यात्रा संस्मरण के लिए | मेरे लेख के साथ मेरे नए
ब्लॉग को भी पञ्च लिंकों में पहली बार स्थान मिला जिससे बहुत ख़ुशी हुई |
आपका सादर आभार और हार्दिक बधाई सुंदर लिंक संयोजन के लिए |सभी
सहयोगी रचनकारों को सस्नेह शुभकामनाये | सादर ------
आदरणीया मीना शर्मा जी -
बहुत बढ़िया सामयिक,मौसमी प्रस्तुति आदरणीय रवींद्रजी की। सच में जानलेवा है जेठ
की तपिश....सुबह दस से शाम चार बजे तक घर से बाहर ना निकलें, गर्मी और लू से कैसे
बचें, आदि चेतावनियाँ आ रही हैं किंतु कितने लोग ऐसे हैं जो इन पर अमल कर पाते हैं ?
कहीं एक कहानी पढ़ी थी - सास ने तीन बहुओं से पूछा,'कौनसा मौसम सबसे अच्छा है ?'
पहली बहू ने कहा - जाड़े का।
की तपिश....सुबह दस से शाम चार बजे तक घर से बाहर ना निकलें, गर्मी और लू से कैसे
बचें, आदि चेतावनियाँ आ रही हैं किंतु कितने लोग ऐसे हैं जो इन पर अमल कर पाते हैं ?
कहीं एक कहानी पढ़ी थी - सास ने तीन बहुओं से पूछा,'कौनसा मौसम सबसे अच्छा है ?'
पहली बहू ने कहा - जाड़े का।
दूजी ने कहा - बारिश का ।
तीसरी गरीब परिवार की बेटी थी। उसने जवाब दिया -
'हुए' का मौसम सबसे अच्छा है यानि जब हमारे पास सुख-सुविधाएँ हों, वही मौसम
सबसे अच्छा है। गरीबों के लिए तो हर मौसम एक नए संघर्ष का मौसम है।
सबसे अच्छा है। गरीबों के लिए तो हर मौसम एक नए संघर्ष का मौसम है।
आज की सुंदर रचनाओं के मध्य मेरी रचना को स्थान देने के लिए सादर आभार !
आइये अब "ज्येष्ठ मास की तपिश" शीर्षक पर आपकी ओर से भेजी गयी रचनाओं का रसास्वादन करें-
इस बार एक कहानी भी....जो कि मार्मिक भी है और सुखांत भी

"चुप, वो बैठी हैं।" कहकर मैं आँखें मूंदकर सोने का उपक्रम करती। तभी बाहर से बातों की
आवाजें पहले की अपेक्षा कुछ तेज हो गईं, बाबूजी की आवाज़ आ रही थी। शायद कोई मेहमान
आया है, अम्मा बाबूजी और दादी की मिली-जुली आवाजें सुनकर मैंने अंदाजा लगाया। फिर
क्या था मैं भूल गई अम्मा की डाँट और उठकर बरामदे में आ गई तो देखा एक महिला.. नहीं
लड़की सिर झुकाए बैठी है, उसके गाल आँसुओं और पसीने से भीगे हुए हैं और हमारे घर की
सभी स्त्रियाँ उसे घेरकर बैठी हैं, मंझली काकी पंखा झल रही थीं। बाबूजी बोले-"हमने तो जब
ये छोटी थी तब देखा था इसीलिए पहचाने नहीं, हमें लगा इतनी दुपहरी में कौन आ सकता
है भला, वो भी ऐसी हालत में!"
आवाजें पहले की अपेक्षा कुछ तेज हो गईं, बाबूजी की आवाज़ आ रही थी। शायद कोई मेहमान
आया है, अम्मा बाबूजी और दादी की मिली-जुली आवाजें सुनकर मैंने अंदाजा लगाया। फिर
क्या था मैं भूल गई अम्मा की डाँट और उठकर बरामदे में आ गई तो देखा एक महिला.. नहीं
लड़की सिर झुकाए बैठी है, उसके गाल आँसुओं और पसीने से भीगे हुए हैं और हमारे घर की
सभी स्त्रियाँ उसे घेरकर बैठी हैं, मंझली काकी पंखा झल रही थीं। बाबूजी बोले-"हमने तो जब
ये छोटी थी तब देखा था इसीलिए पहचाने नहीं, हमें लगा इतनी दुपहरी में कौन आ सकता
है भला, वो भी ऐसी हालत में!"
जेठ दुपहरी कागा बोले
सुन सूरज ए आग के गोले
जलता ये तन तप रहा बदन
क्यू फेंकता यू अंगार के ओले
काहे इतना रिसीयाए हो तुम
किसपर इतना गुस्साए हो तुम

ज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगा
जा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगा
जिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगा
रात में छत पर
बिछती खाट
बादलों की आस
बढती प्यास
सूखते होठ
जलता तन
सूरज बेरहम
हाय रे जेष्ठ की तपन।।
ज्येष्ठ की तपिश और प्यासी चिड़िया....सुधा देवराणी
हम सूरज दादा का गुस्सा सहते
झुलस रहे हैं, हमें बचालो !
छत पर थोड़ा पानी तो डालो !!
जेठ जो आया तपिश बढ गयी
बिन पानी प्यासी हम रह गयी....

उफ यह जेठ महीना
तपता सूरज दरकती धरा
उफ ! यह मौसम गर्मी का
औरबिजली की आँख मिचौली
बेहाल कर रही है
मति भी कुंद हो रही है
यदि कोई काम करना भी चाहे

बावरे पंछी
जानती हूँ
तेरी प्यास अनंत है
और नियति निर्मम अत्यंत है !
ज्येष्ठ का महीना है
और सूर्य की तपिश
अपने चरम पर है !
लेकिन नन्हे नादान पंछी

नारी जीवन तपन दुपहरी
तप्त अलाव सी जलती जाय
तपन घनेरी झुलसे तन मन
अगन जलन के भाव जगाय!
निपट अकेली रेत पजरती
पल कू छाँव ना , हलक सुखाय

भरी दोपहरी भरा हौसला
तपन बाहर भीतर सब एक
जठराग्नी मन झुलसाती
सूरज की आग सेंकती देह !
छोटी उम्र हौसला भारी
दोपहर अलाव सी जला करें

जेठ की इस
ताप्ती दुपहरी में
हाल -बेहाल
पसीने से लथपथ
जब काम खत्म कर
वो निकली बाहर
घर जाने को
बड़ी गरमी थी
प्यास से गला
सूखा.......
घर पहुँचने की जल्दी थी

चहुँ ओर व्याप्त बस सिर्फ जलन
कुछ और नही सखी,
यह सूरज का प्रकोप है,
और मिल गया पूरा वातावरण,
फैल गया है कण-कण तृण-तृण
ये जेठ की तपन
ये जेठ की तपन....
************************
दो रचनाएँ रात में और आई है......
जेठ की तपिश...पंकज प्रियम
झुलसी है धरती सारी
झुलसा सारा आसमां
जेठ की तपन में देख,
झुलसा ये सारा जहां।
आग के शोले बरस रहे
बूंद बूँद लोग तरस रहे
धरती कैसी धधक रही
शोलों सा ये दहक रही।
सावन बोला जेठ से...मीना शर्मा

सावन बोला जेठ से
तुम क्यों तपते हो इतना ?
दया नहीं आती तुमको,
धरती का देख झुलसना ?
त्राहि त्राहि करते हैं प्राणी
वृक्षों को झुलसाए हो,
शीतल पवन झकोरों को
तुम कैद कहाँ कर आए हो ?
अब आज्ञा दें।
फिर मिलेंगे अगले अंक में।
फिर मिलेंगे अगले अंक में।
रवीन्द्र सिंह यादव


