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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

4852....तेरी यादों का अल्ज़ाइमर

 मंगलवारीय अंक में
आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।


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आज की रचनाओं पर मेरी अभिव्यक्ति -

तुमसे दूर होकर भी 

तुम्हारी स्मृतियों का बीज

बरगद बनकर

मेरे मन पर कब 

जम गया पता ही न चला  

भूलने लगी जब

रास्ते,मुस्कान और चीजें

वैद्य ने कहा—

यह अल्ज़ाइमर है,

चीज़ें भूलने का हुनर।

​तुम्हारी स्मृतियों को 

दिन के शोर में ढूंढती हूॅं 

और रात के सन्नाटे में

सिर से पाँव तक ओढ़ लेती हूँ।

​अगर इस तरह खुद को खोकर

किसी को याद रखना बीमारी है,

तो हाँ, मुझे मंजूर है

तेरी यादों का अल्ज़ाइमर

हर बीता हुआ पन्ना

एक पुरानी टीस की गवाही देता है,

हर सॉंस में किसी अधूरी 

ख़्वाहिश का ज़िक्र दर्ज है।

​किताब के ज़िल्द पर

तुम्हारी ख़ामोश मुस्कान है,

​जब भी कोई पन्ना पलटती हूँ,

कुछ दर्द भरे लम्हें

शब्द बनकर गूॅंजते है

जितने भी तंज कसे गए 

मेरी नाकामियों पर,

वे सब पत्थर बनकर

मेरे पैरों तले जमते गए

और बनती चली गई एक सीढ़ी

अब तो बस चलते ही जाना है

​संघर्षों के इस अग्निपथ पर...।

संसार भर के दुखों से थका-हारा

जब भी कोई माथा घुटनों पर टिकता है,

ममता से भरी उंगलियों के स्पर्श से

दुनिया की सबसे बड़ी फिक्र

एक पल में भाप बनकर उड़ जाती है।

उसने कभी अपनी 

तकलीफ़ों की फेहरिस्त नहीं बनाई,

बस हमारी छोटी-सी मुस्कान के लिए

अपनी पूरी उम्र न्योछावर कर दी।

मां शब्द छोटा है परंतु जब भी

ईश्वर को आकार लेना पड़ा

उसने भाषा की पहली धड़कन चुनी

जिसका कोई पर्यायवाची नहीं होता।

मनुष्य के भीतर का अंधकार 

कितना भी गहरा क्यों न हो,

आत्म-ज्ञान की एक किरण

काम,क्रोध और लोभ पर विजय प्राप्त कर

उसे बुद्धत्व की राह पर ला सकती है।


-श्वेता



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अंक

    अभिनव प्रयोग
    सादर
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह! श्वेता जी, कितना नया और सुंदर अंदाज़ है रचनाओं को प्रस्तुत करने का, बधाई!

    जवाब देंहटाएं

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