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गुरुवार, 31 मार्च 2016

258.....तन्हा-तन्हा उदास बस्तियां देखी है मैंने

सादर अभिवादन
भाई संजय जी आज भी नहीं है
रचनाएँ तो आएंगी ही
वे आएँ या न आएँ

चलते है ......

ज़िन्दगी की यात्रा में लगे कांटो को अपने ही हाथों निकालते हुए आंसुओंके सैलाब को मन में गठरी बना कर जो हमने रख छोड़ा था ,एक दिन न जाने कैसे उस गठरी की गाँठ खुली और बिखर गए आंसू , दर्द कागज पर हम डरे लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे पर दर्द था कि अब गठरी बन दिल में समाना ही नहीं चाहता था| हमने भी जी कड़ा किया और बिखेर दिए अपने दुःख -दर्द , गगन से चमन तक।


इस हक़ीक़त को झुठलाना नहीं आसां, 
कि हर एक शख़्स है, चार दीवारों 
के बीच कहीं न कहीं खुला 
बदन, या और खुल 
के यूँ कहें कि 
बिलकुल 
नंगा।

नदी की राह न रोको ये सिंधु की दीवानी है ,
दिलो  की आग न छेड़ो ये दरिया तूफानी है ,


जिंदगी से खुशी सब, दफा हो गयी।
मौत भी कम्बख्त अब, खफा हो गयी।

उन दिनों कुछ हवाऐं, चलीं इस तरह,
जिंदगी काफी हद तक, तवाह हो गयी।


गली में तेरी शख़्स जो मार खाए
सनद मिल गयी जूँ वो आशिक़ कहाए

चलो कुछ हुआ तो मुहब्बत से हासिल
सनम बेवफ़ा है यही जान पाए


हर राह पर गुलों की कालीन तुम बिछाना
आए हजार बाधा धीरज से लाँघ जाना

ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना


और ये है आज की शीर्षक रचना का अंश


क्या चीज़ है अमीरे शहर हक़ीक़त तेरी
अहले दो आलम हस्तियां देखी है मैंनें।

रोशनी मयस्सर नहीं अब तलक अंधेरे को
तन्हा-तन्हा उदास बस्तियां देखी है मैंने।


इज़ाज़त देॆ यशोदा को






बुधवार, 30 मार्च 2016

257....बोलो, तुम कौन सा हिस्सा लोगे ?

सादर अभिवादन,,
बिना किसी ताम-झाम के
सीधे चलें...आज..

शांति का संदेश दे रहा
जो भारत सारी दुनिया को
स्वयं अशांत क्यों हो बैठा ?
प्रीत की डोर से बांधा जिसने
दुनिया के हर कोने को
स्वयं दुविधा में क्यों पैठा ?

मूर्ख लोग ईर्ष्यावश दुःख मोल ले लेते हैं।
द्वेष फैलाने वाले के दांत छिपे रहते हैं।।

ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की सुख सम्पत्ति देख दुबला होता है।
कीचड़ में फँसा इंसान दूसरे को भी उसी में खींचता है।।


कितना भोला, कितना चंचल होता है ये मन 
कभी इधर तो कभी उधर भटका करता पल-छिन 
बार-बार सोचा, इसको कर लूँ अपने वश में 
रहा मगर हर बार फिसलता है ये चंचल मन 


विधि की विडंबना देखिये 
जब बच्चा पैदा होता हैं 
नर्स पैर में 
माँ के नाम का टैग 
बाँध देती हैं 
माँ की गोद में देते ही 
माँ के नाम का टैग उतार देती हैं 


मैं भी
भीड़ में
पाँव दबाए
घुस गया,
देख मुझे
मदारी
अचंभित हुआ
मुस्कुराते बोला-
'ओहो ! आप आ गए
आइए जनाब
अभी मैं
मंत्र फूँकता हूँ
आपको गधा बनाता हूँ


और आज की प्रथम व शीर्षक कड़ी

आज बाँटना हैं तुमसे
कुछ भूली सी यादें
कुछ भीगे से पल
कुछ छिटके से आज
कुछ छूटे से कल
कुछ रुसवा सी रातें
कुछ गुमसुम से दिन
कुछ झूठे से लम्हे
कुछ सच्चे पल छिन

आज्ञा दें...
दिग्विजय को









मंगलवार, 29 मार्च 2016

256...तुम मिरे साथ जो होते तो बहारें होतीं.........

जय मां हाटेशवरी...

आनंद का ये सफर...
आज 256 अंक पूरे कर चुका है...
सफर तो चलता रहेगा...

कदम थक गए है दूर निकलना छोड़ दिया,
पर ऐसा नहीं की मैंने चलना छोड़ दिया.......
फासले अक्सर मोहब्बत बढ़ा देते है,
पर ऐसा नहीं की मैंने मिलना छोड़ दिया.........
मैंने चिरागों से रोशन की है अक्सर अपनी शाम,
पर ऐसा नहीं की मैंने दिल को जलाना छोड़ दिया .......
मैं आज भी अकेला हूँ दुनिया की भीड़ में,
पर ऐसा नहीं है की मैंने ज़माना छोड़ दिया......!!!
अब देखिये...

तुम मिरे साथ जो होते तो बहारें होतीं.........सीमा गुप्ता "दानी"
मैं तुझे दिल में बुरा कहना अगर चाहूँ भी,
लफ़्ज़ होंठों पे चले आएँगे दुआ बनकर।
मैं किसी शाख़ पे करती हूँ नशेमन तामीर,
तुम भी गुलशन में रहो ख़ुश्बु-ओ-सबा बनकर।

ये दुनिया (ग़ज़ल)
माना कि  तेरा दिल पाक साफ  है
सफ़ेद चादर पर दाग लगाती है ये दुनिया
अपनी मुसीबतों से खुद ही लड़ेगा तू
सिर्फ अपनी राह के कांटे हटाती है ये दुनिया
कतरा कतरा मर जायेगा यहाँ पर
सिर्फ शमशान तक पहुंचाती है ये दुनिया

तुम क्यूं भूले
वह तो है शक्ति तुम्हारी
उसे यदि साथ ले जाते
अधिक ही सफलता पाते
फिर भी वह साथ रही सदा
तुम्हारी छाया की तरह
आज भी अधूरे हो राधा बिना
कहलाते हो राधा रमण

ग़ज़ल "माँग छोटे आशियानों की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
विदेशी बैंक में जाकर, छिपाया देश के धन को
खुलेगी पोल-पट्टी अब, शरीफों के घरानों की
सियासी गिरगिटों के “रूप” की, पहचान करने को
निकल आयीं सड़क पर टोलियाँ, अब नौजवानों की


व्यावहारिक हिंदी
इन सबके बावजूद भी हिंदी में कई ऐसे व्यावहारिक पद समा गए हैं जो अक्सर सुनने में आते हैं. कभी कभी लेखन में भी दीख पड़ते हैं. पर वे व्याकरण व सटीकता की दृष्टि
में खरे नहीं उतरते.
उदाहरण के तौर पर बहुत ही प्रचलित वाकया लीजिए... रेलगाड़ी में सफर करते वक्त कोई सहयात्री पूछ ही लेता है - भाई साहब फलाँ स्टेशन कब आएगा ?  पूछने वाला शख्स
व जवाब देने वाला दोनों जानते हैं कि सवाल व्याकरण की दृष्टि से व्यवहारिक सही नहीं है. लेकिन जवाब दिया जाता है कि भाई जी फलाँ बजे के लगभग आएगा. रेल चल रही


ख्वाब
सपने सच बोलते वहाँ ज़ोर कहाँ चलता किसी का। कल आई थी चुप-चाप थी गुमसुम थी उलझी थी बिखरी थी लटें। ज़ुल्फों को उँगलियों से कंघा भी किया उसने देखकर मुस्कुराया।
बोला नहीं सुना है सपनों में बोला नहीं करते शोर से टूट जाता बहुत कुछ। कुछ पल के लिए ठहर गया था समा।
बस समझो मज़ा आ गया था।

धन्यवाद।







                                                                                     


सोमवार, 28 मार्च 2016

255...सोने का मंगलसूत्र, कड़ी-कड़ी जोड़ा

सादर अभिवादन स्वीकारें
रात तो गुज़र ही जाती है
दिन गुज़रते भी देर नहीं लगती
बात नहीं न करनी है यहाँ..

आज की चयनित रचनाओं की ओर कदम रखें..

काश कि आस-पास उलझे हुये
यूं बेवजह लड़ते हुये 
लोगों को भी मिटा पाता 
किसी इरेज़र से 
और उगा देता वहाँ 
गुलमोहर और अमलताश के कई सारे पेड़....

मैं ग़ज़ल कहती रहूँगी में....कल्पना रामानी
जलधि जल में, निर्झरों पर, पर्वतों पर, खाइयों में
पूर्णिमा की चंद्र किरणें, रच रहीं सुखदाई होली।

चार दिन की चाँदनी सब, सौंपकर उपहार हमको
‘कल्पना’ आएगी फिर से, चार दिन हरजाई होली।

कौशल में....शालिनी कौशिक
दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.

नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .

मेरे गीत में....सतीश सक्सेना
कुछ श्राप भी दुनियां में आशीर्वाद हो गए,
जब भी तपाया आग ने , फौलाद हो गए !

यह राह खतरनाक है, सोंचा ही नहीं था ,
हम जैसे सख्तजान भी, बरबाद हो गए !

सुधिनामा में....साधना वैद
तुम न आये
बैरी चाँद सताए
कुछ न भाये !

ये है आज की शार्षक रचना का अंश

आपकी सहेली में....ज्याति देहलीवाल
दोस्तों, हमारे यहां कई त्योहारों में उखाने बोलने की प्रथा है। अभी राजस्थानी समाज में गणगौर का त्योहार मनाया जा रहा है। इस त्योहार में भी उखाने बोले जाते है। अत: पेश है हिंदी उखाने। यहां पर जो रिक्त स्थान दिए हुए है उन जगहों पर पति या पत्नी का नाम लेना होता है और पहली लाइन हम दो बार बोल सकते है। जैसेः...
सोने का मंगलसुत्र, कड़ी-कड़ी जोड़ा,

--- के लिए, मैने माता-पिता का घर छोडा।

आज्ञा दें यशोदा को

पर वो कौन है....







रविवार, 27 मार्च 2016

254 .....मिलते रहे तो प्यार भी हो जाएगा कभी

सभी साथियों को मेरा नमस्कार कुछ दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ ज़िंदगी की भागमभाग से कुछ समय बचाकर आज आप सभी के समक्ष उपस्थित हूँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग में आप सभी का हार्दिक स्वागत है !!
रविवार का दिन है तो अब पेश है.............मेरी पसंद के कुछ लिंक :))

कहती है मोम यूँ ही पिघलना फ़िज़ूल है
महलों में इस चिराग का जलना फ़िज़ूल है!
खुशबू नहीं तो रंग अदाएं ही ख़ास हों
कुछ भी नहीं तो फूल का खिलना फ़िज़ूल है !1

स्वप्न मेरे ब्लॉग पर ....................... दिगंबर नासवा :)

अपशब्दों का प्रहार
इतना गहरा होता
घाव प्रगाढ़ कर जाता
घावों से रिसाव जब होता
अपशब्द कर्णभेदी हो जाते
मन मस्तिष्क पर
बादल से मडराते
आकांक्षा ब्लॉग पर ........................आशा सक्सेना :)

सवाल ये नहीं कि
क्यों मंज़ूर कर लेती है
वो घुट घुट के जीना
फिर भी बंधे रहना
उसी बंधन से ताउम्र
जिससे बुझ रही है
आहिस्ता आहिस्ता
चाँद की सहेली ब्लॉग पर .............VenuS "ज़ोया"

मन की बात
कौन कह पाता है
वही जिसने मन को गहरे तक पहचाना हो
क्योंकि मन बड़ा चंचल होता है
और मन की बात कहते कहते  भूल जाता है
अनुभूतियों का आकाश ब्लॉग पर .............कुशवंश

हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में एक नए ब्लॉग आँख भर आई और लेखक वी राज वर्मा का स्वागत है !
और पेश उनकी पहली रचना
मेरी फरियादों मे तेरी यादों मे,
अक्स तेरा जो दिखा तो आंख भर आई।
दिल की तन्हाई मे तेरी रूसवाई मे,
अक्स तेरा जो दिखा तो आंख भर आई।
आँख भर आई ब्लॉग पर .................. वी राज वर्मा :)


इसी के साथ ही मुझे इजाजत दीजिए अलविदा शुभकामनाएं फिर मिलेंगे अगले हफ्ते इसी दिन 

-- संजय भास्कर

शनिवार, 26 मार्च 2016

253 .... माँ


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

आज मेरे बेटे का जन्मदिन है 
सबके आशीष के आकांक्षी हम हैं



अब इस पार या उस पार
बाधाओ से पाना है पार
हौसला मुझे दिखाना होगा
बाधाओ से पार तो पाना होगा
लक्ष्य मैंने साध लिया है
चुनौतियों को स्वीकार लिया है




चैट कीजिये


आज तक केवल चैट और कल्पनाओ की आँख से ही देखता था ।
 कभी भी वह सेल्फ़ी या कोई पिक भेजने से इंकार करती रही थी ।
अब सामने खड़ी होगी और हम खूब बात करेंगे ।
 मन की दुविधा दूर हो जायेगी ।



पढाई के बोझ तले बचपन की खोज

बाल केद्रित शिक्षा,करके सीखना,और मानव निर्माण की शिक्षा,जैसे विचार और नीतियाँ अब सिर्फ शिक्षा शास्त्र की किताबों में गुम हो गयी है.सीसीई पद्धति पर बच्चों का ऐकेडमिक विकास शून्य हो जाता है.बच्चों में पासिंग प्रतिशत तो बढ जाता है पर प्रतियोगी परीक्षाओं में उनका परिणाम औसत से भी कम होता है.आज के समय की माँग है कि बच्चों को स्किलफुल बनाया जाये



मुझको अक्सर दिखती है


 फर्श पे बिखरे पानी पर
 कभी उतर आता
 कभी बादलों से करता
 प्यार भरी मुठभेड़


बे - हिसी

रंजिशों तक ठीक था क्यों साजिशों पर आ गए,
मुतमईन इतने हुए के बदमाशियों पे आ गए.
जानते हैं ये कोई नादान हरकत थी नहीं,
बुद्ध गांधी से चले और याकूब पर तुम आ गए


अचानक

जो ठोकर खाकर भटक गयी
पथ पर रहने के बजाये
पथ का रोड़ा बन गयी ...
अभिलाषाओं को कुंदन हुआ
आशाओं का तुषार पात


माँ

कहने को एक जन्म का नाता हैं
लेकिन सादियों तक कोई भूल ना पाता है
माँ होती हैं बहुत ही खास
कर देती हर संकट को साफ यह मुझको विश्वास
बहुत खुशनसीब होते है वह
रहती माँ हरदम जिसके पास



फिर मिलेंगे .... तब तक के लिए

आखरी सलाम

विभा  रानी  श्रीवास्तव


शुक्रवार, 25 मार्च 2016

252...रंगों ने खूब मस्ती घोली है

सादर अभिवादन
होली तो आज हो ली
पर रचनाएँ जारी रहेंगी
एक सप्ताह तक...
भाई कुलदीप जी के कम्पयूटर को
बुखार आ गया है...डॉक्टर इलाज कर रहा है..

आज की रंगीन प्रस्तुति...

उमर हिरनिया हो गई, देह-इन्द्र-दरबार
मौसम संग मोहित हुए, दर्पण-फूल-बहार

दर्पण बोला लाड़ से, सुन गोरी, दिलचोर
अंगिया न सह पाएगी, अब यौवन का जोर


होली में सब प्यार से, भून रहे होलाक।
होली की ज्वाला जली, हुई होलिका खाक।।

जग में सज्जनवृन्द की, होती है मनुहार।
निश्छल लोगों को सभी, करते प्यार अपार।।

होली रे होली ...........
हुड़दंग मचाए,
बस्ती में सारे ,
रोके न रुके ,
अरे आज हम सारे|
होली रे होली .......

बाहर झांक कर कई दफा देख चुका हूं सिवाय एकाध बच्चे के कोई नजर नहीं आ रहा। 
ऐसा लग ही नहीं रहा कि आज होली है। न होली का हुड़दंग है, न रंग है, न उमंग। 
लोगों के चेहरे और कपड़े सूखे हुए हैं। टोलियां तो अब नजर ही नहीं आतीं।


ये है आज की शीर्षक रचना का अंश

होली है भई होली है 
रंगों ने खूब मस्ती घोली है

राधा और कान्हा का प्यार 
आ गया फागुन मेरे यार 

गोपियों संग हंसी ठिठोली 
भर गयी फूलों से सबकी झोली 

आज्ञा दें मुझे यशोदा को
धन्यवाद दें भाई कुलदीप को..

एक गीत तो बनता है आज













गुरुवार, 24 मार्च 2016

251...जिन मनहूसों को नहीं आती हँसी पसंद

सादर अभिवादन
आज संजय भाई को होली मनाने की छूट दे दी


चुनिन्दा रचनाएँ कुछ यूँ कह रही है...

ठूंठ सिखाये जीवनियाँ
बन्ना सा वन
जमे बन ठनके
बाँध मुरेठा केसरियाँ
चीथड़े पोशाकें
बदरंग चेहरे
सतरंगी बनाए
जोश फगुनियाँ 
भेज कनकनियाँ
आये कुनकुनियाँ
शुरू हुए उठंगुनियाँ 


सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||


सुनो !! दुराचारी मानव !!
कटी टांगों से भी नहीं दे पाऊँगा श्राप
खुश रहना !!
पशु हूँ, पशु ही रहूँगा !!
हो सके तो पश्चाताप के दो आंसू ही कर देना मुझे समर्पित !!


रंग गुलाल 
अम्बर हुआ लाल 
मचा धमाल ! 

थी जुबाँ मुरब्बे सी होंठ चाशनी जैसे
फिर तो चन्द लम्हे भी हो गये सदी जैसे

चाँदनी से तन पर यूँ खिल रही हरी साड़ी
बह रही हो सावन में दूध की नदी जैसे

और ये है शीर्षक रचना का अंश
जिन मनहूसों को नहीं आती हँसी पसंद
हुए उन्हीं की कृपा से, हास्य-सीरियल बंद
हास्य-सीरियल बंद, लोकप्रिय थे यह ऐसे
श्री रामायण और महाभारत थे जैसे
भूल जाउ, लड्डू पेड़ा चमचम रसगुल्ले
अब टी.वी.पर आएँ काका के हँसगुल्ले


आज्ञा दें और सुनें ये गीत
दिग्विजय













बुधवार, 23 मार्च 2016

250..सभी को विश्व कविता दिवस की बहुत बहुत बधाई !!

सादर अभिवादन
आज विरम सिंह जी नहीं हैं
और 10 मई तक नहीं रहेंगे
परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त है
ईश्वर उन्हे सफलता दे....

आज की चयनित रचनाएँ....

उन्हें हंसाने को, बस इक सलाम काफी है,
इसी विश्वास पर, रूठों को हंसाने निकलें  !

बहुत मज़ाक हुआ, एक बार फिर आओ,
तुम कहो रोज ही,मनुहार ही गाने निकलें !

सवाब क्या है, खुशी तुम्हारी,
अज़ाब क्या है, तुम्हारी उलझन,
' वहाँ ' पे कुछ भी नहीं है प्यारे,
यहीं पे सब कुछ, है रोजे-रौशन।

कंधे का दुशाला दुरुस्‍त करते गली में रिक्‍शा पर सपरकर बैठते मामा जी सोच-विचारकर अपने नतीजे पर पहुंचे थे, ऐसा ही जोम चढ़ा है तो जोती बाबू के गुंडों से दोस्‍ती कर लूं, कम्‍युनिस्‍टों को वोट दे आऊं, कंधे पर 'भारतमाता की जै' का गोदना गोदवा लूं, चिरकुटई एक मर्तबा छेरना शुरु कर देती है तो उसका फिर कहीं अंत थोड़े होता है, चल बच्‍चा, इस गंदगी से रेक्‍शा बाहर कर!

छनकारो हो छनकारो
गोरी प्यारो लगो तेरो छनकारो
छनकारो हो छनकारो

तुम हो ब्रज की सुन्दर गोरी
मैं मथुरा को मतवारो
छनकारो हो छनकारो


और आज की शीर्षक कड़ी...

आस-पास हाथ आये 
सब कुछ 
एक साथ मिलाएं 
छोटी छोटी मुस्कानों से सजाएँ 
और  जिंदगी की तश्तरी में 
बड़े अदब से  पेश करें 
हंसती मुस्कराती 
गुनगुनाती 
कुछ कुछ लजाती 
प्यारी सी कविता 

इसी के साथ आज्ञा दें यशोदा को






मंगलवार, 22 मार्च 2016

249...आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

जय मां हाटेशवरी...

सरस्वती माँ की रहे, सब पर कृपा अपार।
हास्य-व्यंग्य अनुरक्त हो, होली का त्यौहार।
फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास।
होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।
गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम।
तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।
होली तो आज से दो दिन बाद है...
पर मेरे साथ तो होली आज ही मनानी पड़ेगी...
नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर।
 होली के दिन भूलिए… भेदभाव अभिमान !
रामायण से मिल’ गले मुस्काए कुरआन !
गहरे रंगों से रँगी, भीगा सारा अंग।
एक रंग ऐसा लगा, छोड़ न पाई संग।
विजया सर चढ़ बोलती, तन मन हुआ अनंग।
चंग संग थिरके क़दम, उठने लगी तरंग।
औरत की क्या हस्ती है?
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कहीं वो घर की दासी है
नदिया हो कर प्यासी है
सब के ताने सहती है
फिर भी वो चुप रहती है
सरस्वती का अवतार है वो
शिक्षा का भंडार है वो

इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।
क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार।
थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।
होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान।
 
दैनिक नवज्योति' हिन्दी समाचार पत्र (राजस्थान) का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर शर्मनाक कारनामा
इसीलिए इसके संपादक या संबंधित पेज  के संयोजक ने मेहनत करने की बजाय इसे सीधे कट-पेस्ट कर दूसरों  के नाम से प्रकाशित कर दिया। वाह रे ''अंतर्राष्ट्रीय महिला
दिवस'' मनाने का अखबारी और कागजी जज्बा।
समाचार पत्र का इतिहास खंगाला तो पता चला कि राजस्थान के स्वाधीनता सेनानी कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी जी  द्वारा संस्थापित दैनिक नवज्योति जयपुर, जोधपुर, अजमेर
और कोटा, राजस्थान से प्रकाशित होने वाला एक दैनिक हिन्दी समाचार पत्र है। इसका प्रथम संस्करण 1936  में प्रकाशित हुआ था। ...... पता नहीं अब यह दैनिक समाचार
पत्र कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी जी की परम्परा को छोड़कर इस प्रकार की साहित्यिक और लेखकीय चौर्य वृत्ति को क्यों प्रवृत्त कर रहा है।  नाम तो नव ''ज्योति' पर
दीपक तले अँधेरा वाली कहावत पूरी चरितार्थ कर रहा है।

महँगाई ने सोख ली, पिचकारी की धार।
गुझिया मुँह बिचका रही, फीका है त्यौहार।
धूप खिली, छत, खेलती, अल्हड़ खोले केश।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष।

चकित हूँ
किन्तु सोते मनुज को यह ज्ञान भी है ?
काल का आवेग, ताण्डव नृत्य क्या है ?
बँधा है, असहाय जीवन जी रहा है,
काटने का बन्धनों को कृत्य क्या है ।।
दुख भीषण है, जगत में क्षणिक सुख है,
चकित हूँ, क्योंकि,
मनुज तो बँधा रहना चाहता है ।।

नेताओं ने पी  रखी, जाने कैसी भंग।
मुश्किल है पहचानना, सब चहरे बदरंग।
योगी तो भोगी हुए, संसारी सब संत।
जिनकी कुटियों में रहे, पूरे बरस बसंत।
कैसी थीं वो होलियाँ, कैसे थे अहसास।
ज़ख़्मी है अब आस्था, टूट गए विशवास।
माइनस इनफिनिटी....
प्रेम इन्फाईनाईट की तरह है,
चाहे तो किसी से जोड़ लो, घटा लो
गुना करो, चाहे तो भाग लगा लो,
आगे माइनस लगा के
चाहो तो माइनस इनफ़िनिटी कर लो,
लेकिन वो वैसे ही बना रहेगा
उसी अभेद्यता के साथ,
जैसे मिले हुये हों
दो शून्य आपस में
सदा सदा के लिए...

नयन हमारे नम हुए, गाँव आ गया याद।
वो होली की मस्तियाँ,  कीचड़ वाला नाद।
कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर।
21 मार्च 2016 .....
नजरों से  नजरें चुराते है वो
यूँ ही दिल में बस जाते है वो
न कुछ  हारते हैं ,न जीतते है
प्यार ही प्यार में जिये जाते हैं  .....

 होली में जलता जिया, बालम हैं परदेश।
मोबाइल स्विच-ऑफ है, कैसे दूँ संदेश।
भोर हुई कब की, मगर, बोल रहा ना काग।
बिन सजना इस बार भी, 'फाग' लगेगा 'नाग'।
कुंजगली में जा छुपे, नटखट मदन गुपाल।
ब्रजबाला बच के चली, फिर भी हो गइ लाल।
मने प्रीत का पर्व ये, सद्‌भावों के साथ।
दो ऐसा सन्देश अब, तने गर्व से माथ।
ढपोरशंख
दल बदलू और स्वार्थ परक ये, अपनो को ही मारे डंक,
लाभ के लिए कुछ भी कर दें, हो गए ये ढपोरशंख ।
होली तो इनकी ही हो ली, इनकी ही होती है दीवाली,
असली पैसों से ये खेले, पर सारे हैं लोग ये जाली ।

रंगों के सँग घोलकर, कुछ, टूटे-संवाद।
ऐसी होली खेलिए, बरसों आए याद।
जाकर यूँ सब से मिलो, जैसे मिलते रंग।
केवल प्रियजन ही नहीं, दुश्मन भी हों दंग।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।
शक्ति असीमित भरी हुई है प्रभू नाम की माला में,
प्यार भरा आशीष निहित है, अक्षत्-चन्दन रोली में।
आओ शिकवे-गिले मिटायें, प्रीत बढ़ाएँ होली में।।

जम कर होली खेलिए, बिछा रंग की सेज।
जात धरम ना रंग का, फिर किसलिए गुरेज।
पल भर हजरत भूल कर, दुःख,पीड़ा,संताप।
जरा नोश फरमाइए, नशा ख़ुशी का आप।
अबके कुछ ऐसा करो, होली पर भगवान।
हर भूखे के थाल में, भर दो सब पकवान।
अब चलते-चलते...
हिरण्यकश्यप मार कर, करी धर्म की जीत।
हे नरसिँह कब आउगे, जनता है भयभीत।
ऐसी होली खेलिये, जरै त्रिविधि संताप।
परमानन्द प्रतीति हो, ह्रदय बसें प्रभु आप ।
’हो ली’, ’हो ली’ सब करें, मरम न जाने कोय।
क्या हो ली क्या ना हुई, मैं समझाऊँ तोय।
हो ली पूजा हस्ति की, माया जी के राज।
हाथी पे परदे पड़े, बिगड़ गए सब काज।
ऊपरोक्त सभी दोहे...
साहित्यम् - Join..से...
आप सभी को रंग पर्व होली की अग्रिम शुभकामनायें।
"दूरियाँ दिल की मिटें, हर कहीं अनुराग हो।
न द्वेष हो, न राग हो,ऐसा यहाँ पर फाग हो।।"

धन्यवाद।









सोमवार, 21 मार्च 2016

248...गैर आशिक़ हैं जो वो आशिक़ बनाए जाएंगे

सादर अभिवादन..
होलिका पर्व की अग्रिम शुभकामनाएँ


चलें चलते हैं आज की चयनित रचनाओं की ओर...

तू रोता है अपने दुःख से 
और मैं 
रोती हूँ
प्यार की चाहत मे 

जब कभी
....मैं
नहीं कह पाती
....तुमसे
अपने मन की बात


जली होलिका 
प्रहलाद न जला 
विजयी सत्य |

कभी-कहीं दि‍ख जाती हैं एक साथ हजारों गौरैया तो वाकई बहुत अच्‍छा लगता है। कुछ साल पहले मैंने ये तस्‍वीर ली थी जो मुझे बेहद पसंद है। एक ढलती शाम में गौरैयों के बसेरे से आती चहचहाहट ने मेरे पांव थाम लि‍ए थे। बहुत देर मैं इन्‍हें देखती रही।


मेरी धरोहर में.. महेश चंद्र गुप्त खलिश
जान लिया नामुमकिन है दिल को पाना अहसासों से
पास न दौलत तो मत जाना उल्फ़त के बाज़ारों में

आज तलक मुँह ना मोड़ा है ख़लिश वफ़ा से तो हमने
भूल न जाना, गिन लेना हमको अपने दिलदारों में.



आज की शीर्षक कड़ी कुछ हुलियाना अंदाज में

मह्वे-हैरत में हूँ कि वो सैटर था कितना बाकमाल
इश्क़ के बारे में पूछा जिसने पर्चे में सवाल
ऐसे ही सैटर अगर दो-चार पैदा हो गए
देखना इस मुल्क में फनकार पैदा हो गए
आम होगी आशिकी कालिज के अर्ज़-ओ-तूल में
लैला-ओ-मजनूं नज़र आएँगे अब इस्कूल में
इश्क़ के आदाब लड़कों को सिखाये जाएंगे

आज्ञा दें
फिर मिलेंगे
एक छोटा सा विज्ञापन वीडियो....
पर इसे कला की दृष्टि से देखें
बच्चो को भी आनन्द आएगा
कोशिश करेंगे बनाने की




रविवार, 20 मार्च 2016

247....विजय ध्वज लहराते चले

सुप्रभात दोस्तो 
सभी को सादर प्रणाम 
आशापुरा माँ की कृपा और आप सब की दुआ से राजस्थान पटवारी भर्ती की प्रारम्भिक परीक्षा मे उत्तीर्ण हो गया । अब मुख्य परीक्षा की तैयारी की वजह से अप्रैल मे मिलना नही हो पाएगा । 


आइए चलते आज की प्रस्तुति की ओर .....


एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??
यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं, यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !
भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

कहाँ खबर थी,तुम्हारे साथ वो...
होली आखिरी थी...
नही तो जी भर कर...
खेल लेती मैं होली...
तुम्हारी हथेलियों से...
मेरे गालो पर लगा वो गुलाल,
तो कब का मिट गया गया था..
पर तुम्हारी हथेलियों के निशां,
आज भी मेरे गालो पर नजर आते है....
मुझे याद है...जब तुमने हँसते हुऐ,
गुलाल से सिंदूर भर दिया था,


ले आजादी की मशाल
वे झूमते गाते चले
कफ़न बाँधकर अपने सर
शान से मुस्काते चले

बाजुओं में जोश था
रक्त में थी रवानगी
भारत माँ के वंदन की
भरी हुई थी दीवानगी
केसरिया से तन मन रँग
विजय ध्वज लहराते चले


पढ़ाई के द्वारा इस दुनिया में कुछ भी हासिल किया जा सकता है,जैसा की हम सब जानते है,कई लोग अपने तेज दिमाग का उपयोग करके लाखो कमा रहे है,जैसा की आप सब जानते है,की दुनिया भर में कई सारे कांटेस्ट चलाये जा रहे है,क्विज आदि के,अगर आप एक छात्र है,और आप पढ़ने में ठीक-ठाक है,और आप को अपने उपर पूरा विशबास है,की मै जित सकता हु,तो आप इन साधनों द्वारा अपने परिवार की थोड़ी बहुत मदद कर पायंगे,और अपने सपनों को भी पूरा कर सकेंगे,अपना नाम दुनिया में फैला सकेंगे,तो चलिए आज मै कुछ ऐसे साधन बताऊंगा जिन के द्वारा आप कुछ कमाई अथवा अपनी रोज्म्रा की जिन्दगी में इस्तेमाल किये जाने बाले यंत्र को हासिल कर सकेंगे।


          कविताएँ
अच्छे लगते हैं मुझे आम के बौर,
हरे पत्तों से झांकते पीले-पीले बौर,
सुन्दर से,मासूम से, नाज़ुक से.

कुछ बौर झर जाएंगे,
फागुन की तेज़ आँधियों में
या बेमौसम की बरसात में,
पर कुछ झेल लेंगे सब कुछ,
खेल-खेल में उछाले गए पत्थर भी
और बन जाएंगे खट्टी कैरियां
या मीठे रसीले आम.


धन्यवाद 
अब दीजिए आज्ञा 
सादर विरम सिंह सुरावा

शनिवार, 19 मार्च 2016

246 .... नुस्खा



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

मन का विश्वास लिखूँ,
यौवन का उल्लास लिखूँ,
बरसात की रिमझिम चुनूँ,
या पपीहे की प्यास लिखूँ ,
>>>>>>>>>>>>>>>>>> नैनी ग्रोवर



मम्मी-दादी से भी जता दो....  
और एक बात मुझे बता दो....
जब लड़की-लड़का एक-समान....
और दोनो से ही है जग की शान....
फिर कन्या भूर्ण हत्यारों को आती क्यों शर्म नहीं?





उसकी आवाज़ को न सुनने वाले
जात ज़रूर समझते हैं
रंग से पहचानते हैं
धर्म के राज्य में
उसे जूतियों में रखते हैं
इन जूतियों में
पुश्तों के बेगार की चमक है






सडकों पर चलती है गाड़ी, शोर शराबा करे सवारी
कहीं अगर कोई दब जाए, नाही सुनते उनका क्रंदन 
मानव जीवन सबसे सस्ता, क़ानून का अब हाल है खस्ता    
उपवन में सजती है क्यारी, माली देखे हो प्रसन्न मन






जो बिगड़ गयी कुछ बात, उसकी याद लिखता हूँ..
कभी-कभी तुम संग बिते पलों का हिसाब लिखता हूँ..
तो कभी तुम बिन जागती रातों का खयाल लिखता हूँ..
फिर बिन तुम्हारें खाली पलों का मलाल लिखता हूँ.





यह प्रक्रिया काफ़ी देर से चल रही थी इसलिए यात्रियों का भी
ध्यान केंद्रित किए हुए थी, परेशान होकर
उस आदमी ने बाहर झांका और बस से नीचे उतर गया,
 किसी तरह से वाहनों कूदते-फांदते थोड़ी देर बाद दूध लेकर लौटा ।






न जाने किस गुनाह ने, बनाया फिर गुनहगार मुझे,
मेरी चाहत फिर बे-वफ़ा हो गयी..!!
फिर दूर हो गयीं सब चाहतें मुझसे,
उनकी बातें भी अब जुदा हो गयीं





स्कूली शिक्षा के दौरान कई कक्षाओं तक परीक्षाओं में एक निबंध अक्सर लिखने के लिए कहा जाता था, जिसका शीर्षक था विज्ञान, वरदान या अभिशाप । उस समय की अपनी समझ के अनुसार पढक़र, रटकर निबंध लिख लिया करता था। अब जब गुम होती बेटियों और उसके कारणों के बारे में धरातल पर तस्वीर देखी, तब उस निबंध का मतलब और महत्व समझ में आ रहा है।


>>>>>>>

फिर मिलेंगे ..... तब  तक के लिए
आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव



शुक्रवार, 18 मार्च 2016

245....भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ

जय मां हाटेशवरी...

दुष्यंत कुमार जी की ये  रचना...
मैं जितनी बार भी पढ़ता हूं...
हर बार नया आनंद आता है...
जब मुझे आनंद आता है उसे पढ़कर...
आप को भी तो आनंद आना चाहिये...
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।
क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।
दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ ।

अब बारी है...
आज के लिये...
मेरी पसंद में आप की रचनाओं की...

टहलना तो बस एक बहाना होता है शायद
शुरूआत करते हैं जह्ान्वी के इस बेहतरीन डायलाग से ... शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है, अगर यही जीना है तो मरना क्या है...मुझे यह डॉयलाग बहुत पसंद
है...अनेकों बार सुन चुका हूं और सुनता रहता हूं ...जैसा आधुिनक जीवन का सार सिमट कर रख दिया हो इसमें...आप भी सुनिए....

सुबह सुबह ऐसे में टहलने से हमें किसी की खुशी में खुश होने की भी सीख मिलती हैं , वरना सत्संग में यह भी तो समझाते हैं कि आज का मानव दूसरे की खुशी से नाखुश
है...उदास है ... और एक बात संक्रामक हंसी से याद आ गई ...
मैं सत्संग में सुनता हूं अकसर कि एक बार एक गुरु ने अपने दो शिष्यों को १००-१०० फूल दिए और उन्हें बांटने के लिए कहा ...शर्त यही रखी कि जो हंसता हुआ दिखे
... उसे ही एक फूल देना है....शाम के वक्त दोनों लौट आए, एक के पास सभी फूल वैसे के वैसे और दूसरे को झोला खाली ....जो चेला सारे फूल वापिस ले कर लौट आया, उन
ने पूछने पर बताया कि बाबा, दुनिया है ही इतनी खराब, सारे के सारे उदासी में जिए जा रहे हैं, सुबह से शाम हो गई , मुझे तो कोई भी मुस्कुराता नहीं दिखा...
चलिए अब दूसरे की बारी आई....उसने कहा ... कि बाबा, लोग इतने अच्छे हैं, मैं जिसे भी मिला, मैं उसे देख कर जैसे ही मुस्कुराता, वह भी खुल कर मुस्कुरा देता..और
मैं झोले में से गुलाब निकाल कर उसे थमा देता....गुरू जी, मेरे फूल तो एक घंटे में ही खत्म हो गये....मुझे तो यही लग रहा था कि मुझे और भी बहुत से फूल लेकर
चलना चाहिए था।
सीख क्या मिलती है इस प्रसंग से, हम सब जानते ही हैं, हंसिए खुल कर हंसिए, और दुनिया आप के साथ हंसेगी...बांटिए, खुशियां बांटिए, मदर टेरेसा ने एक बार कहा था
कि आप जिस से भी मुलाकात करो, उसे आप से मिलकर बेहतर महसूस करना चाहिए।


आओ बदल लें खुद को थोड़ा
ख्वाब ये रखते देश बदल दें,
चाहत है परिवेश बदल दें,
पर औरों की बात से पहले,
क्यों न अपना भेष बदल दें ।
चोला झूठ का फेंक दे आओ,
सत्य की रोटी सेंक ले आओ,
दौड़ा दें हिम्मत का घोड़ा,
आओ बदल लें खुद को थोड़ा ।



वो शख्श
वो तो लगाता रहा
उम्र भर चाहत के फूल
लोगो ने मिलकर
उसकी बगिया ही उजाड़ दी ।।
फैलता रहा वो हरदम
प्रकाश सबके जीवन में
सबने मिलकर उसकी जिंदगी
घुप्प अंधेरो में पाट दी ।।



तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है...
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।
ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-


इक उम्र बीती आए तब मिलने के वास्ते......महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश
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नज़रें मिलीं तो थीं मगर वो ही न मिल सके
मानिंदे-शम्मा हम रहे जलने के वास्ते
बेकार सब जीना रहा, हासिल न कुछ हुआ
हम कुछ नहीं क़ाबिल रहे करने के वास्ते
है अब नहीं उम्मीद या अरमान कुछ ख़लिश
हम जी रहे हैं सिर्फ़ अब मरने के वास्ते.



कमाई कर रही बेटी, हिमालय तक चढ़ाई की
कमाई कर रही बेटी, हिमालय तक चढ़ाई की |
चले नौ दिन मगर दूरी, नहीं पूरी अढ़ाई की ||


जाने क्या क्या देख लिया
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नन्हे से इस दिल में अब भी, अरमान मचलते बच्चे से
एक ख्वाब हकीकत करने में, न जाने क्या क्या देख लिया
दिन रात गये मौसम भी गये, बदले दिन महीनों सालों में
इन बरसों के आने जाने में, ना जाने क्या क्या देख लिया


लगता है...
प्रस्तुति कुछ लंबी हो गयी...
मैं भी क्या करूं....
बहुत आनंद आ रहा है...
रचनाएं पढ़ने में...

धन्यवाद।



 




गुरुवार, 17 मार्च 2016

244....जब जनाजे से मजा नहीं आता है दोबारा निकाला जाता है

सादर अभिवादन..
संजय जी आज फिर नहीं हैं

देखिए आज की चुनिन्दा रचनाओं की कुछ पंक्तियाँ....

रूठने मनाने में
उम्र गुजर जाती  है
शाम कभी होती है
कभी धूप निकल आती है
चंद दिनों की खुशियों से
जिन्दगी सवर जाती है


कल रात मे नींद नही आई 
बहुत देर तक करवटें बदलने के बाद 
कब झपक गया पता नहीं
जब आँख खुली तो 
फगुनायी चेतना मे सराबोर था 



बुरा नहीं है फेसबुक पर दर्ज होना लेकिन किस हद तक ? छद्म प्रशंसाओं के फेर में खुद को खुदा समझ बैठना अपना नुकसान करना ही है। अटैंशन सीकिंग बिहेवियर कहां ले जायेगा पता भी नहीं चलेगा। यह तो ध्यान में रखना ही होगा कि जो जगह हमारी जिंदगी के कुछ लम्हों को हमारी कुछ बातों को कहने सुनने के मंच के तौर पर थी, उसे कहीं जरूरत से ज्यादा महत्व तो नहीं मिलने लगा है।


मन तो करता है 
uninstall कर के 
दुख, दर्द और विरह 
install कर दूँ 


सपने में....शशि पुरवार
धुआँ धुआँ होती  व्याकुलता
प्रेम राग के गीत सुनाओ
सपनों की मनहर वादी है
पलक बंद कर ख्वाब सजाओ



ये है आज की शीर्षक रचना का अंश
सच को लपेटना
किसको कितना
आता है
ठंड रक्खा कर
'उलूक' तुझे
बहुत कुछ
सीखना है अभी
आज बस ये सीख
दफनाये गये
एक झूठ को
फिर से निकाल
कर कैसे
भुनाया जाता है ।


इज़ाज़त दें
दिग्विजय

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