सादर अभिवादन
भाई संजय जी आज भी नहीं है
रचनाएँ तो आएंगी ही
रचनाएँ तो आएंगी ही
वे आएँ या न आएँ
चलते है ......
ज़िन्दगी की यात्रा में लगे कांटो को अपने ही हाथों निकालते हुए आंसुओंके सैलाब को मन में गठरी बना कर जो हमने रख छोड़ा था ,एक दिन न जाने कैसे उस गठरी की गाँठ खुली और बिखर गए आंसू , दर्द कागज पर हम डरे लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे पर दर्द था कि अब गठरी बन दिल में समाना ही नहीं चाहता था| हमने भी जी कड़ा किया और बिखेर दिए अपने दुःख -दर्द , गगन से चमन तक।
इस हक़ीक़त को झुठलाना नहीं आसां,
कि हर एक शख़्स है, चार दीवारों
के बीच कहीं न कहीं खुला
बदन, या और खुल
के यूँ कहें कि
बिलकुल
नंगा।
नदी की राह न रोको ये सिंधु की दीवानी है ,
दिलो की आग न छेड़ो ये दरिया तूफानी है ,
जिंदगी से खुशी सब, दफा हो गयी।
मौत भी कम्बख्त अब, खफा हो गयी।
उन दिनों कुछ हवाऐं, चलीं इस तरह,
जिंदगी काफी हद तक, तवाह हो गयी।
गली में तेरी शख़्स जो मार खाए
सनद मिल गयी जूँ वो आशिक़ कहाए
चलो कुछ हुआ तो मुहब्बत से हासिल
सनम बेवफ़ा है यही जान पाए
हर राह पर गुलों की कालीन तुम बिछाना
आए हजार बाधा धीरज से लाँघ जाना
ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना
और ये है आज की शीर्षक रचना का अंश
क्या चीज़ है अमीरे शहर हक़ीक़त तेरी
अहले दो आलम हस्तियां देखी है मैंनें।
रोशनी मयस्सर नहीं अब तलक अंधेरे को
तन्हा-तन्हा उदास बस्तियां देखी है मैंने।
इज़ाज़त देॆ यशोदा को





