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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

4903... बदलते हुए दिन

 शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

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धर्म हो या अधर्म,

कोई भी विचार जब तक स्वविवेक से

न उत्पन्न हुआ हो, तबतक धूलकणों की

आँधी मात्र होती है 

जिसमें कुछ भी सुस्पष्ट नहीं होता है।

उधार का ज्ञान किसी भी विषय के अज्ञान को ढक 

सकता है समाप्त नहीं कर सकता।

अंधश्रद्धा, कल्पना,आडंबर और ढोंंग का

आवरण जब कठोर हो जाता है

तो आत्मा की कोमलता और

लचीलेपन को सोखकर पूरी तरह

अमानुषिक और कट्टर 

बना देता  है और अगर धर्म की "कट्टरता" 

मानवता से बड़ी हो जाती है तो

उस व्यक्ति के लिए परिवार, समाज या देश से 

बढ़कर स्व का अहं हो जाता है और वह

 लोककल्याण,परोपकार जैसे मानवीय गुण को

अनदेखा कर,

अपने लोग,अपनी जाति का चश्मा पहनकर

सबकुछ  देखने लगता है।

धर्म का अधकचरा ज्ञान 

ऐसे विचार जिसमें उदारता न हो, उसमें हम अपनी आत्मा की नहीं, छद्म ज्ञानियों के उपदेश से प्रभावित होकर

उनके स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र रह जाते हैं।

काश! कि हम समझ पाते

कि हम अन्य मनुष्यों की भाँति ही

एक मनुष्य सबसे पहले हैं,

किसी भी जाति या धर्म के अंश उसके बाद।


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आज की रचनाऍं-



















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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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1 टिप्पणी:

  1. छद्म ज्ञानियों के उपदेश से प्रभावित होकर
    उनके स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र रह जाते हैं।
    काश! कि हम समझ पाते
    कि हम अन्य मनुष्यों की भाँति ही
    एक मनुष्य सबसे पहले हैं,
    बहुत सुंदर अंक
    आभार
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं

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