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रविवार, 18 अक्टूबर 2026

4898...किसी हजूर को बना भी दिया जाएगा हजूरे आला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।

सादर अभिवादन

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

किसलिए रट लगाए है बैठा है ये भी लिख दो और वो भी लिख दो

पूंछ मोटी होना शुरू हो गई बाल खड़े हो जाएंगे

साहिब के साहिबान पर लिख दो

शर्म नहीं आएगी जरा भी

बलात्कार की खबर सुबह से लेकर शाम लिख दो

किसी हजूर को बना भी दिया जाएगा हजूरे आला

क्या उखाड़ लोगे आला कमान लिख दो

*****

1231 सेदोका / विचित्र वक़्त 

मिटी उम्मीद

अमावस की रात

नहीं बीतती,

कोई तो हो उपाय

नन्हा दीया जलाएँ।

*****

तिनकों का आशियाना

कद्र चीज़ों की नहीं, उन्हें परखने वाली नज़र की होती है,
वरना महलों में भी लोग तन्हाइयों में रह जाते हैं।

*****

साहित्य और सिनेमा : समाज के दर्पण

चाहे कितने ही दुख सहने पड़ें, नायिकाएं परिवार (या पति) को छोड़ने की मानसिकता रखने वाली नहीं बताई जाती थीं। इसीलिए 'एक बार फिर' (१९८०), 'ये नज़दीकियां (१९८२) और 'अर्थ' (१९८२) जैसी फ़िल्मों को नई ज़मीन तोड़ने वाली फ़िल्में माना गया। उसी दौर में 'हमकदम' (१९८०) जैसी सार्थक फ़िल्म भी बनी जो नारी के नौकरी करने के विषय पर आधारित थी। नब्बे के दशक तक जब भारतीय दर्शक समुदाय की मानसिकता पुरुष-प्रधान समाज वाली थी तो फ़िल्मों में प्रायः नारियों को ही झुकते हुए दिखाया जाता था लेकिन जब नारी-सशक्तिकरण का दौर आया तो 'अस्तित्व' (२०००) तथा 'थप्पड़' (२०२०) जैसी फ़िल्में भी बनीं। आज के दौर के सिनेमा की नायिका के परिधान, हाव-भाव, शारीरिक व्यवहार और मानसिकता; सभी कुछ समाज में आए परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तित हो चुके हैं।

*****

डर

हमारे ये मित्र झुमरी तल्लैय्या बैंक से दस साल पहले बतौर जनरल मैनेजर रिटायर हो चुके हैं। सिर के बाल उड़ चुके हैं पर पांच सात सफ़ेद बालों का गुच्छा अभी मौजूद है। इन पांच सात बालों को हमारे साब ने बड़े जतन से संभाल कर रखा हुआ है। पंखे की हवा में जब भी ये लहराते हैं तो तो उन्हें अपनी जवानी याद आ जाती है! आँखों पर मोटा चश्मा है और शरीर गोल मटोल है - बियर के शौक़ीन रहे हैं अपने जमाने में। 

***** 

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव 

 


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