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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

4910...छोड़ जगत यह वापस जाते मधुर याद बनकर रह जाते...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अनीता जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

मधुर याद बनकर रह जाते

छोड़ जगत यह वापस जाते

मधुर याद बनकर रह जाते!


जग मेले में आकर मिलते

सँग-सँग खुशियां सोग बांटते,

इक दूजे का स्नेह पात्र बन

बढ़ते, पलते, और पनपते!

*****

दो रचनाएँ करवा चौथ

ये सुहागिन

औरतों का व्रत
निर्जला, पति की उमर की कामना
थाल पूजा की
सजा कर कर रहीं
पार्वती शिव की सघन आराधना,
आज इनके
पुण्य के फल से
हम मृत्यु से भी नहीं हारेंगे।

*****

1538-ओ मेरे छायादार वृक्ष!

तपती दुपहरी के ताप से तुम्हें बचा सकूँ

प्यार से दुलार से तुम्हारा माथा सहला सकूँ

अनगिनत  झंझावातों  से  लड़  सकूँ

सुख दु:ख  को  सम  हो  सह  सकूँ।

*****

फ़िल्म जो भारतीय लोकरुचि का अंग बन गई

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, शोले कोई यथार्थपरक या स्वाभाविक फ़िल्म नहीं है। यह एक फ़ैंटेसी है। एक ऐसी फ़ैंटेसी जिसकी ख़ासियत यह है कि वह फ़ैंटेसी लगती नहीं है। अपने आप में कई  किस्सों को समेटे हुए एक दिलचस्प किस्सा है यह फ़िल्म। प्रारंभ से अंत तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किए रखने वाली इस फ़िल्म की तुलना एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन से की जा सकती है जिसमें सभी सामग्रियां एवं सभी मसाले सही अनुपात में मिल गए हों जिसके कारण उसका स्वाद ऐसा हो गया हो जो खाने वाले को बार-बार अपनी ओर खींचे। फ़िल्म के केवल दो गीत याद रखने लायक़ हैं - होली गीत तथा जय एवं वीरू की दोस्ती का गीत। सभी कलाकारों ने यादगार अभिनय किया है चाहे वे प्रमुख चरित्र हों या सहायक चरित्र।

*****

हमारे बारे में (About us)

इसकी मुख्य कैटगरी में यात्रा वृत्तांत, जैसे अंडमान, सिक्किम, भूटान इत्यादि जगहों की यात्रा के संस्मरण ! कुछ कम ज्ञात स्थानों का विस्तृत विवरण, जैसे दिल्ली की भूली भटियारी, कोटा का विभीषण मंदिर, जिनके बारे में वहां के रहने वाले भी बहुत कम जानते हैं! पुरानी कथाओं में उपेक्षित चरित्रों का एक अलग सकारात्मक आंकलन जैसे संपाति का सूर्य अभियान या होलिका के मंगेतर इलोजी की कथा! समकालीन विषयों और व्यक्तियों पर चर्चा, जो चर्चित हो रहे हों!

*****

 फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

1 टिप्पणी:

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