निवेदन।


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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

4810 कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई, ये सोच समंदर उदास है

 सादर अभिवादन 


सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
-दिनकर

मेरी पसंदीदा रचनाएं





तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।





जिसमें मेरे प्रेम का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम का ब्याज
दोनों शामिल हैं।

क्योंकि यह सिर्फ जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त में
हम दोनों का होना जरूरी है।




वो भी विवश होकर कुटिया में जितनी भी खाने की सामग्री थी उससे ही राधा जी का भोग लगाते और खुद भोजन करते ऐसे करते करते कुछ दिन तो बीत गए लेकिन अंत में एसी परिस्थिति हों गयी न तो कुटिया में खाने को कुछ रहा न तो कहीं भिक्षा मिल रही थी ,,,






सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI

कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI





हम आँख पर पट्टी बाँधकर बैठे हैं
कि वांगचुक छला जा रहा जंतर मंतर पर
सच तो यह है कि 'उस' भीड़ के अलावा
हम सब छले जा रहे
हमारी आत्माओं पर बोझ बढ़ रहा





आप पुराने हो जाएँगे
वे मुझे डराने की कोशिश करते हैं
मैं पहले से ही डरा हुआ हूँ
मैं जानकारी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर बहुत ज्यादा निर्भर करता हूँ
अपने दिमाग से ज़्यादा
जिसने मुझे सज़ा दी है



‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 



सादर समर्पित
सादर वंदन

सोमवार, 20 जुलाई 2026

4809...देखो…, मेरे पास काम बहुत हैं और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में प्रस्तुत हैं  पाँच+ रचनाएँ-

अस्वीकरण: अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय कंटेन्ट प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंदपरिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।

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आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-

शुरुआत

देखो…,

मेरे पास काम बहुत हैं

और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत

मेरी मानो तो ..,,

खाली वक्त में थोड़ा

आत्ममंथन करना

*****

जगन्नाथ से संवाद

मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल

अश्रु धारा में घुल गया काजल,

घनघोर घटा-सी घिर आई रात,

नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद

स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।

*****

1506 मेघ से मनुहार 

यह धरा ऊसर है तुम बिन

नद स्तर है निम्न तुम बिन

कितने जोड़े सूखी आँखें

बाट जोहती रोज दिन गिन

तप्त धरतीशुष्क वन हैं

आस में सूखे नयन हैं

*****

उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो?

जब संसार में लोकतांत्रिक व्यवस्था आरंभ हुई थी तो मताधिकार केवल वयस्क पुरुषों को दिया गया था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था। संसार की आधी जनसंख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने से वंचित थी। महिला समुदाय ने यह अधिकार लंबे संघर्ष के उपरांत प्राप्त किया। आज किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की बात और विचार पुरुषों की भांति ही महत्व रखते हैं। स्वतंत्र भारत में वयस्क मताधिकार में महिलाओं को आरंभ से ही सम्मिलित रखा गया। यह पृथक् बात है कि सदनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

*****

मन के पार ही वह मिलता है

शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है।

*****

गांधी के उपवास

देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया थाबेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखेजिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


रविवार, 19 जुलाई 2026

4808...सुनाई किसी को भूले से कभी जो दास्ताने गम...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंदपरिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

धूप

हालात की दुश्वारियों ने

इस तरह कर दिया लाचार

कि हम आज गर्दिशों के

उफनते सैलाब में

तिनके की तरह

बहते रहे

बहते ही रहे

*****

मन का शावक थिर हो जाता 

श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !

*****

चाक की स्मृति

उसकी देह की दरारों में

चाक की स्मृति

अब भी बची है।

लोग कहते हैं-

"वह टूट गया।"

*****

ताना-बाना

लोग सियासत में आते हैं और ही  मक़सद से,

जन-सेवा  के  दा'वे - ना'रे  महज़   बहाने  हैं।

हँसते-हँसते  लाँघ  गए हैं  साहस के  बल पर,

बाधाओं  के पर्वत  को   हम   कब  गर्दाने हैं?

*****

Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026

जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे - वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है

वो गाना था ना - "सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है"

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह याद

 


शनिवार, 18 जुलाई 2026

4807...सज़ा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ (अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार

खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार

सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार

क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की

सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार 

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सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

फिर जब कोई चारा नहीं बचा, हालत हद से गुजर गई और जान के लाले पड़ने लगे, तो किसी तरह इज्जत बचाने और यहां से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं से दुहाई की गई ! उनके कारकुनों से सोशल मीडिया पर अपील करवाई जाने लगी ! कुछ फुंके कारतूसों और भीगी दियासलाइयों ने उपस्थिति भी दर्ज भी करवाई ! पर ऐसे प्रयास अवाम के लिए प्रहसन जैसे ही रहे ! क्योंकि आज तो इसके खुद के पढ़ाए हुए बच्चे भी इसका साथ देते नजर नहीं आ रहे ! खैर ! सुनने में आया है कि जल्द ही उन्हें उन्हीं जैसे लोगों द्वारा उबार लिया जाएगा ! प्रभु उन्हें सेहत प्रदान करें!

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प्रिय रजनी

पर इधर जाने क्यों

मन के घुप अँधेरे को

लाख टटोला

पर कुछ मिला ही नहीं

जो तुम्हें लिख भेजूँ!

पर मेरी यामिनी

तुम अब भी हो मुझे याद

और मैं फिर लिखुँगी तुम्हें

पहले की तरह ढेरों तार,

*****

सोनम मरना चाहता है

वे सभी मरना चाहते हैं

जो बात-बात पर

धरने पर बैठ जाते हैं

सत्ता को आँखें दिखाते हैं

करते हें कोशिश

देश को जगाने की,

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प्राचीन तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का इतिहास

प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला महान व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ केवल वस्तुओं के लेन-देन का माध्यम नहीं था, बल्कि यह विचारों का महामार्ग भी था। बौद्ध भिक्षु, भिक्षुणियां और सार्थवाह (व्यापारिक कारवां) इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए आंध्र से सुदूर दक्षिण की ओर आते जाते थे।

बौद्ध साहित्य और "महावंश" (श्री लंका में लिखा गया पुरातन इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, सम्राट अशोक (राजकाल ईसापूर्व 268 से ईसापूर्व 232 तक) ने अपने पुत्र महेंद्र (पाली भाषा में महिंदा) और पुत्री संघमित्रा (पाली में संघमित्ता), को श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए भेजा था।

*****


*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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