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शनिवार, 11 जुलाई 2026

4800..फिर क्यों नफरत के सौदागरों ने हर आँगन में जहर फैलाया

 सादर अभिवादन  


लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।

ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
-दुष्यंत कुमार

मेरी पसंदीदा रचनाएं


जिन  आँखों  में  है  प्यार  रहा 
उन  आँखों  में  आभार  रहा 
सबको  ईश्वर है  तार  रहा 
प्राणों  से  उसके  तार  जुड़े  
ये  प्राणों  का  स्पन्दन  है 





ब्रह्मांड ने कभी हिसाब नहीं रखा
कि किसने कितनी प्रार्थना की,
किसने कितने आंसू बहाए।
वह बस चलता रहा
अपने नियमों पर,
और नियम
कभी दया नहीं जानते।





बने साक्षी तुम्हीं सदा
उस मौन अभिनव प्रेम के
देते रहे संदेश अनवरत
प्रिय के कुशल क्षेम के!
जिसकी महक से महकती
हर नवल प्रभात मेरी!
ओ चाँद !क्या वापस ला सकोगे
वो सुहानी सी चाँद रात मेरी!






ये देश सौहार्द और प्रेम का था,
फिर किसने नफरत में बाँट दिया?
क्यों तौफ़ीक़ मारा गया मुठभेड़ में,
क्यों सूर्या को बेरहमी से काट दिया?

जिस भाईचारे की ख़ातिर बापू ने
राम और रहीम को गले लगाया,
फिर क्यों नफरत के सौदागरों ने
हर आँगन में जहर फैलाया?



तुम्हारी सोहबत का ही असर था,
कि मैं लड़खड़ा रहा था।

मेरी इसी लड़खड़ाहट को देखकर
ट्रैफिक पुलिस ने मुझे रोक लिया।


सादर समर्पित
सादर वंदन

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