शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. सुशील कुमार जोशी जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ (अंक प्रस्तुतकर्त्ता का
रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर
डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है
क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)
छोटी सी बात है चोरी मत उछाल मजाक की भी हद्द है सरकार
खुद गुनाह करे और करे इबादत भी वही गुनहगार
सबसे अच्छा है वही आज का उत्कृष्ट कारोबार
क्या जरूरत वकील की क्या अदालत की
सजा देने को हर खजूर बैठा है जब कलम ले तैयार
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फिर जब कोई चारा नहीं बचा, हालत हद से गुजर गई और जान के लाले पड़ने लगे, तो किसी तरह इज्जत बचाने और यहां से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न पार्टियों के नेताओं से दुहाई की गई ! उनके कारकुनों से सोशल मीडिया पर अपील करवाई जाने लगी ! कुछ फुंके कारतूसों और भीगी दियासलाइयों ने उपस्थिति भी दर्ज भी करवाई ! पर ऐसे प्रयास अवाम के लिए प्रहसन जैसे ही रहे ! क्योंकि आज तो इसके खुद के पढ़ाए हुए बच्चे भी इसका साथ देते नजर नहीं आ रहे ! खैर ! सुनने में आया है कि जल्द ही उन्हें उन्हीं जैसे लोगों द्वारा उबार लिया जाएगा ! प्रभु उन्हें सेहत प्रदान करें!
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पर इधर जाने क्यों
मन के घुप अँधेरे को
लाख टटोला
पर कुछ मिला ही नहीं
जो तुम्हें लिख भेजूँ!
पर मेरी यामिनी
तुम अब भी हो मुझे याद
और मैं फिर लिखुँगी तुम्हें
पहले की तरह ढेरों तार,
वे सभी मरना
चाहते हैं
जो बात-बात पर
धरने पर बैठ जाते
हैं
सत्ता को आँखें
दिखाते हैं
करते हें कोशिश
देश को जगाने की,
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प्राचीन तमिल नाडु में बौद्ध धर्म का इतिहास
प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला महान व्यापारिक मार्ग दक्षिणापथ केवल वस्तुओं के लेन-देन का माध्यम नहीं था, बल्कि यह विचारों का महामार्ग भी था। बौद्ध
भिक्षु, भिक्षुणियां
और सार्थवाह (व्यापारिक कारवां) इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए आंध्र से सुदूर दक्षिण
की ओर आते जाते थे।
बौद्ध साहित्य
और "महावंश" (श्री लंका में लिखा गया पुरातन इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, सम्राट अशोक (राजकाल ईसापूर्व 268 से ईसापूर्व 232 तक) ने अपने पुत्र महेंद्र (पाली भाषा में
महिंदा) और पुत्री संघमित्रा (पाली में संघमित्ता), को श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए भेजा था।
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बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन