शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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रंगमंच बहुत बड़ा है इस दुनिया का,
और हम सब सिर्फ अदाकार हैं,
परदे के पीछे छिपी पटकथा के हिसाब से
अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
कोई नायक की भूमिका में मुस्कुराता है,
तो कोई खलनायक बनकर कोसा जाता है,
पर सच तो यह है कि भूमिका कोई भी हो—
महत्व इस बात का है कि उसे जिया कैसे गया।
इतिहास गवाह है,
किताबों की 'भूमिका' अगर कमज़ोर हो,
तो लोग आगे के पन्ने पलटना छोड़ देते हैं,
और यदि जीवन में अपनी 'भूमिका' से इंसान भटक जाए,
तो पीढ़ियाँ रास्ता भूल जाती हैं।
यह सिर्फ एक पद, एक नाम या एक काम नहीं,
यह तो वह उत्तरदायित्व है,
जो हमें समय सौंपता है।
महान वह नहीं जिसे बड़ी भूमिका मिली,
महान वह है जिसने अपनी भूमिका को बड़ा बना दिया।
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आज की रचनाऍं-
इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।
कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l
आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll
स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l
टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll
निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।
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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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