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रविवार, 12 जुलाई 2026

4801...निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विश्वमोहन जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

रविवारीय में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

'क' से कहानी

दाम और वाम तथा उत्तर और दक्षिण की पंथ-विभाजन रेखा ने कहानियों की कहानी को भी बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसी स्थिति में यदि कथा रचती साहित्य-वीरांगना डॉक्टर उषा सिन्हा की ‘क से कहानी’ की ‘अपनी बात’ से यह संगीत निकलता हो कि “ मेरी कहानियाँ किसी वाद के चक्कर में न फँसकर नदी की उन्मुक्त धारा की तरह राह के कंकड़-पत्थर, सीपियाँ और शंख समेटती चलती हैं। जहाँ थाह मिले, थोड़ी देर के लिए रुक जाती हैं और फिर चल पड़ती हैं – असीम सम्भावनाओं के साथ”। - तो निश्चय की निराशा के घटाटोप तिमिर में यह आशा की ‘उषा’ का उन्मेष है। उषा जी की इन बातों के प्रतीकार्थ में दम है कि असल में कहानियों को आज दुनिया की दब्बू क़िस्म की मध्यवर्गीय वनिता रचनाकारों की ही सख़्त ज़रूरत है जो समाज की विसंगतियों को खुद जीती हैं। वही अपनी नित-नित की ज़िन्दगी में इस समाज को पढ़ती हैं, लिखती है, फाड़ती हैं, फेंक देती हैं, बटोरती हैं, छाँटती हैं और फिर सहेजकर सहजता से अनायास-अनवरत कहानियाँ बुनती चली जाती हैं। इस बुनावट में चारों ओर फैले उनकी ज़िंदगी के हर बिम्ब कहानियों के पात्र बनकर पाठकों से बतियाते रहते हैं।*****शिवालय

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

*****

चेहरे को धोना चाहिए था

अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे

तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था

सियासत में वो नफरत बो रहे हैं

जिन्हें बस प्यार बोना चाहिए था

*****

कोरकोट्टी

12 जुलाई 2009 की तड़के नक्सलियों ने मदनवाडा़ कैम्प के दो जवानों को तब गोली मारी, जब वो शौच के लिए गए थे। इस घटना की खबर मिलने के बाद मैं, मेरे साथी पत्रकार कमलेश सिमनकर और दूरदर्शन के रिपोर्टर भाई परमानंद रजक के पुत्र युवा पत्रकार लोकेश रजक के साथ मानपुर और मदनवाडा़ के लिए रवाना हुआ। तब तक हममें से किसी को नहीं पता था कि मदनवाडा़ में नक्सलियों ने जो किया, वो सिर्फ एक ट्रेलर था, नक्सलियों ने कुछ बडा़ करने की तैयारी कर रखी थी। 12 जुलाई 2009 की उस रविवार की सुबह अपने दो जवानों की शहादत की खबर मिलने के बाद राजनांदगाँव के पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे खुद घटनास्थल के लिए निकले और नक्सलियों ने मानपुर से कुछ ही दूर कोरकोट्टी में राजनांदगाँव जिले के इतिहास का सबसे बडा़ खूनी खेल खेल दिया।*****डायरी के पन्नों से : कार्यशाला - प्रकृति संग्रहालय की स्थापना

NCERT की कक्षा 4 की सारंगी के अंतर्गत पत्तियों के प्रकारों को समझाने के लिए विद्यालय प्रांगण में एक गतिविधि आधारित कार्यशाला आयोजित की गई। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर विद्यालय परिसर में स्थित विभिन्न पौधों और वृक्षों से पत्तियाँ एकत्रित करने का कार्य दिया गया। देखते ही देखते बच्चों की जिज्ञासा उन्हें हर पौधे के पास ले गई। कोई पत्ती के आकार को देखकर आश्चर्यचकित था तो कोई उसकी बनावट और रंग में अंतर खोज रहा था। किसी ने चिकनी पत्ती उठाई, किसी ने खुरदुरी; किसी को लंबी पत्ती आकर्षित कर रही थी तो किसी को गोलाकार पत्तियाँ।

जब सभी समूह अपनी-अपनी पत्तियाँ लेकर लौटे, तब कक्षा एक छोटे से 'प्रकृति संग्रहालय' का रूप ले चुकी थी। मेज़ पर सजी विभिन्न पत्तियाँ बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री बन गईं। प्रत्येक समूह ने अपने द्वारा संकलित पत्तों का अवलोकन किया, उनके आकार, किनारों, शिराओं, रंग और विशेषताओं पर चर्चा की तथा अपने निष्कर्ष पूरी कक्षा के सामने साझा किए। बच्चों के प्रश्नों में जिज्ञासा थी और उत्तरों में अनुभव की सहजता देखी जा सकती थी।

*****
फिर मिलेंगे। 
रवीन्द्र सिंह यादव 

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