मंगलवारीय अंक में
जीना आसान नहीं है,
यह कॉंटों का बिछौना है
मखमली कोई दालान नहीं है।
हर सुबह एक नया इम्तिहान लाती है,
उम्मीदों की पोटली पीठ पर बांधे,
हमें दौड़ना है अंधाधुंध
जिसकी कोई अंतिम रेखा ही नहीं।
ख्वाब कांच की तरह टूटते हैं,
और उनकी किरचें पैरों में नहीं,
सीधे रूह में चुभती हैं।
अपनों के बदले चेहरे,
और वक्त की बेरुखी,
कभी-कभी भीतर तक सब सुखा देती है।
पर शायद,
इस मुश्किल में ही जिंदगी का असली स्वाद है।
आंसुओं से भीगे चेहरे पर
जब एक छोटी सी मुस्कान खिलती है,
जीना आसान तो नहीं है, बिल्कुल नहीं,
लेकिन इस कांटों भरे रास्ते पर
अपने पैरों के निशान छोड़ जाना ही...
जिंदगी है शायद...।
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
अलगनी पर दिन भर टँगी
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई
रात भर चैन की नींद आई ।
भोर उजियारी चुनौती लाई
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई
छाँव बिन धूप रास न आई ।
“मैं आपकी पीड़ा समझता हूँ। शायद आपको पता नहीं कि इसके लिए मैंने एक जांच समिति बना दी है। जो चोर हैं, उन्हें दंड मिलेगा। और तब तक एक नई इमारत बनाई जाएगी—पहले से अधिक भव्य, पहले से अधिक सुरक्षित।”
उस दिन भी रोज की तरह नशे में झूमता शराबी आया और मंदिर का घंटा बजाने लगा। घंटा बजाने से पहले वह एक क्षण के लिए रुका। उसने एक नजर सामने देखा और फिर घंटा बजाने लगा। फिर वही सारी क्रिया दुहराई जो वह रोज करता था। मंदिर से निकलने से पहले उसने गणेश जी की ओर देखा और बोला, छोटू पप्पा आएं तो बता देना कि अंकल आए थे। इतना कहकर वह निकल गया।






सुंदर रचना के साथ
जवाब देंहटाएंयह बेहतरीन अंक
आभार
वंदन