सादर अभिवादन
आज छोटी दिवाली भी है
दीपावली 8 नवंबर को
एडवेंचर स्पोर्ट्स से कम नहीं है।
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
जो तुम हटा रहे हो,
बहुत क़ीमती है,
जो तुम रख रहे हो,
वही कूड़ा है।
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श्रीराम : मर्यादा, धर्म और आदर्श
अयोध्या ने उस प्रभात न एक बालक को जन्म दिया,
युग के संकट का उत्तर, मानव को धर्म दिया।
दशरथ के आँगन उतरा था केवल राजकुमार नहीं,
वह था कालजयी संकल्प, कोई साधारण अवतार नहीं।
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मंज़िलें किसे पसंद होती हैं भला
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
प्रातःवंदन
मौसम की बदलती फ़िजा आजकल सुबह-शाम पर ही पता चलता है। हल्की ठंड की चादर ओढ़े भीनी- भीनी हवा और ओस की बूंद में भीगे पेड पौधे .. अच्छा लगता है न पर काली धुंध (प्रदूषण)..मतलब कुछ न कुछ रह ही जाता है..चलिए इन कवायदो को नजरअंदाज करते हुए नजर डालते हैं लिंको पर..✍️
सुख मिल जाये...
बस थोड़ा सा सुख मिल जाये
इसी आस में मन मानव का डोला करता
इधर-उधर जा निज शक्ति को तोला करता..
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चलते-चलते वे रुक गये।
मेरा हाथ पकड़कर उपदेशक के अंदाज में बोले :
“जीवन, चलने और चलते रहने का नाम है!…लेकिन ‘चलने’ से तात्पर्य सिर्फ ‘पैर’ नहीं है, ‘साँस’ भी है!”
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ख़ूब नचाता
साँसें न लेने देता
वक़्त का ये पहिया
सब बेज़ार,
ख़ुद पर भरोसा..
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लोकतंत्र आबाद रहेगा बरसों तक
रावण आज ज़रूर मरेगा, पगला है तू !
जब-जब पाप बढ़ेंगे भू पर ,प्रभु आएँगे
नेता उनका रूप धरेगा,पगला है तू !
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रेशम के
घूँघट में हँसकर
करे चाँदनी बात.
रंगोली की
आभा सुंदर
दीवाली की रात.
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
जिसने कभी धूप में जलकर
किसी के पाँवों के छाले नहीं गिने,
वह क्या जाने
उस तपते रास्ते की खुरदुरी चुभन को!
मखमली गद्दों पर सोए हुए लोग
महज़ तसल्ली के दो शब्द बोलकर
समझ लेते हैं कि उन्होंने सब बाँट लिया,
पर इस दर्द को
वही जानता है
जिसके पाँवों की हर आहट
दर्द की एक नई चीख सुनाती है।
दूसरों के आँसू देखकर
सिर्फ आँखें भर लेना आसान है,
मगर वह खौलता हुआ लावा क्या है
जो भीतर ही भीतर सुलगता रहता है—
इसे महसूस करने के लिए
उसी आग में जलना पड़ता है।
कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देना अलग है,
और उस वजन को खुद ढोना बिल्कुल अलग!
जब तक अपनी खाल न उधड़े
तब तक दूसरों के घाव की गहराई
सिर्फ़ एक नज़ारा बनी रहती है,
पीड़ा का यथार्थ नहीं।
वो कहते है न-
"जाके पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई"।
सादर अभिवादन
आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है।
'पाँच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से
ढेरों शुभकामनाएँ!
लंबे आंदोलनों और संघर्ष के उपरांत मध्य प्रदेश राज्य से विभक्त होकर एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बनाये जाने की घोषणा तत्कालीन अटल बिहारी बाजपेयी सरकार द्वारा की गयी जिसे छत्तीसगढ़ निवासियों ने तहेदिल से स्वीकार करते हुए केन्द्र सरकार का धन्यवाद किया था। छतीसगढ़ केवल अपनी प्राकृतिक संपदा के लिये ही नहीं जाना जाता बल्कि आदिवासी संस्कृति और छत्तीसगढ़ी बोली के साथ-साथ अनेक सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिये विख्यात है। हिंदी भाषा के स्वनामधन्य श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल जी ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवांवित किया है। खनिज संपदा से समृद्ध यह प्रदेश अपनी अनुपम हरीतिमा के लिये सुविख्यात है। नक्सल समस्या का अंत भी सन् 2025-26 मे समूल उन्मूलन हो चुका है
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रविवारीय अंक में
पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
किसी रोचक कहानी की तरह
मेरी कल्पनाओं को, मेरे सपनों को
कल्पना के पंख देकर
उड़ान भरने के लिए
आसमान में पहुँचा देती हो!
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गुंजित
मउमाछी की गुनगुन
पुष्प-
पुष्प के कर्णों में
जैसे
तुम खुसफुस हो करते
मधु
मिश्रित से वर्णो में
झंकृत
सुर में होकर गुम
पथ पर
बिखरे हृदय कुसुम
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अभिलाषा उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए
शहीदों की शहादत का, क़र्ज़ उतारने के लिए
वीर
प्रसूता वसुधा का, फ़र्ज़ निबाहने के लिए ,
सुख-शान्ति
अमन रहे चमन में वतन के लिए
अभिलाषा
उत्सर्ग होना तिरंगे कफ़न के लिए ।
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“मुझे अपनी जमा की हुई याद
वापस चाहिए।” उसने कहा।
“लेकिन क्यों? आपने तो दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसे जमा किया था।”
अजित की आँखें भर आईं। “दर्द चला गया, पर उसके साथ मेरा बेटा भी चला गया।
अब मैं रोता नहीं, लेकिन मुस्कुराता भी नहीं। समझ आया कि कुछ दु:ख बोझ नहीं होते, वे हमारे अपनों के आखिरी निशान होते हैं।”बैंक ने उसकी याद लौटा
दी।
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“अभी शहर से गाँव जा रहे
हर मुश्किल से लड़ने बाबू
!
ख़त लिखना फिर आ जाएंगे
देश की मूरत गढ़ने बाबू !”
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