निवेदन।


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रविवार, 24 मई 2026

4752 भीतर ही तो तू मिलता है

 सादर अभिवादन


कुंडलिनी 
शरीर के सात चक्र 

कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति।
मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।।




भीतर ही तो तू मिलता है 
कण-कण, पोर-पोर खिलता है 
अब न कोई दूरी कहीं  है 
इक दूजे में ही बसता है !




प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

“आप आकाश ही हैं न? प्रिया ने बताया था कि आपने आज ही फ्लैट में सामान रखा है. आपको फ्लैट प्रवेश की बहुत बधाई.”





क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी 
अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,
वह क़तार के आख़िर में इसलिए है 
कि नए-नए लोग आते गए
और यह कहकर आगे खड़े होते गए 
कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,
लाइन वहीं से शुरू होती है। 





अभी कुछ दिनों पहले तक अलग-अलग दलों के चरणचाटू प्रवक्ताओं के कार्यकलापों और उनकी बेलगाम जुबान से झरते शूलों को देश की जनता बड़ी हैरत से देख-सुन रही थी ! अचंभित इसलिए थी कि अपने झूठे, मक्कार, सत्तालोलुप, सजायाफ्ता आकाओं के बचाव में ये लोग बिना किसी शर्म व लिहाज के दिन-रात तरह-तरह के झूठे निरेटिव गढ़ते रहते थे ! कुछ तो इतने धूर्त और कुटिल थे कि जनता को कुनैन भी चीनी में लपेट कर दिया करते थे ! अपने हित-स्वार्थ और आम जनता को बहकाने के लिए इन बेशउरों ने बड़े-बड़ों की माँ-बहनों की बेइज्जती करने के बाद देश की न्यायपालिका तक की मर्यादा पर भी लांछन लगा दिए थे आम नागरिक जो अपने संस्कारों के साथ जीता है, जिसमें अभी भी बड़े-छोटे की लिहाज है, जो पद की गरिमा, उसकी मर्यादा समझता है, हैरान और अचंभित था कि संबंधित संस्थाएं इतना सब होने पर भी चुप क्यों है ! ऐसा भी क्या धैर्य ? आम और खास के लिए न्याय  मानदंड क्यों ? 


सादर समर्पित
सादर वंदन

शनिवार, 23 मई 2026

4751 ..मैं रेत हूँ— हर बार आँखों में किरकिरी

 सादर अभिवादन


"क्यों नहीं हो सकता है ? तुम कोई भी सवाल पूछो, 
मैं हां या ना में जवाब दूंगा" ।

वह व्यक्ति कुछ सोचते हुए बोला
"हुजूर, नहीं दे पाओगे।"
इससे जज और अधिक गुस्सा हो गया ।
"क्यों नहीं दे पाऊंगा ? जरूर दूंगा, तुम पूछो तो सही"
उस व्यक्ति ने पूछा
"क्या आपकी पत्नी ने आपको पीटना बंद कर दिया है" ?
अदालत में सन्नाटा व्याप्त हो गया।




रंग ज़माने खुदगर्जी यों के थे 
बहरूपिये मयखाने सुरूर रफ्तार में l 

नाजुक थी कड़ियां इसके 
मजहब तालीम छलकते जामों प्याम में ll




संसार का द्वार।जहां भी होओ–चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी 
होओ चाहे भोगी–एक बात ख्याल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, 
वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो–तो पर्याप्त। 




दो राष्ट्र प्रतिनिधियों की है हंसी ठिठोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

कूटनीति में अवसर के जुड़ते हैं अध्याय
राष्ट्रशक्ति हो सक्षम मुड़ते युक्ति निभाय
अनचीन्हे इस अभिवव पल में दो जोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी





यहाँ और अभी होने के लिए 
बस एक ही शर्त है
अपने केंद्र में रहना सीख लो 
तब कहीं और कभी भी रहो 
तुम सदा ही 
अभी और यहाँ हो !!





मैं रेत हूँ—
हर बार
आँखों में किरकिरी
पैरों के नीचे ही क्यों आती हूँ?
कभी किसी ने
मेरे कणों में छिपी
टूटी हुई सदियों को पढ़ा है?
सबने मुझ पर
अपने-अपने महल बनाए,





स्नेह से अंक भरना कभी, 
कभी अंग न समाना खुशी में,
ईश्वर के आगे आँचल पसारना, 
हर मुश्किल और बेबसी में।





"ऐसी भी क्या दुविधा है, आकाश?"

"एक फ्लैट पवई में है—पूरी तरह फर्निश्ड. ए.सी., पंखा, फ्रिज, वाशिंग मशीन, पर्दे, बेड से लेकर किचन के तमाम उपकरणों से लैस है. मुझे सिर्फ अपना सूटकेस लेकर जाना है और चादर बदलनी है. सबसे बड़ी बात है कि यह फ्लैट विक्रोली में मेरे नए ऑफिस के बिल्कुल पास है, एकदम वाकिंग-डिस्टेंस. वहाँ जाने-आने का समय और रोज़ का ऑटो का खर्चा बचेगा. लेकिन उसका रेंट थोड़ा अधिक है. दूसरा विकल्प मैंने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा है—एक छोटा 1BHK, जिसका किराया मेरे बजट में है, लेकिन वह पूरी तरह कोरा है. एक बेड के सिवा सब कुछ जुटाना पड़ेगा. ऑफिस से दूर है लेकिन तुम्हारे फ्लैट के नजदीक है," आकाश ने दोनों विकल्प उसके सामने रख दिए.
****
सादर समर्पित
सादर वंदन

शुक्रवार, 22 मई 2026

4750...आदत कब सुधरेगी रे...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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मन अशांत है और इसे नियंत्रित करना कठिन है ,
लेकिन अभ्यास से इसे वश मे किया जा सकता है ।
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आज की रचनाऍं-


कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा

हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,

बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा

कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !

 

मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन

अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,

लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे

बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !




पिय की भुवनमोहिनी चितवन 
दिल में कब उतरेगी रे 

छह रूपों वाली इक सौतन 
घर से कब निकरेगी रे 

सबसे दिल की कह देने की 
आदत कब सुधरेगी रे 



आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।

वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो या 
सूचना का अधिकार 
संविधान ने दिये हैं अधिकार 
जो व्यक्ति विशेष की कृपा पर निर्भर नहीं
समाज की कमाई है व्यक्ति की नहीं!  




न इसे भोग का विषय समझो,

न भय का अंधकार कहो।

यह तो चेतन दीप शाश्वत,

जिससे जीवन राह गहो।


संतुलित दृष्टि ही धर्म सच्चा,

बाकी सब अनुमान यहाँ।

स्वीकारों से जग चलता है,

घृणा बने श्मशान यहाँ।



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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गुरुवार, 21 मई 2026

4749 ..पूछ रहीं चुप रह दीवारें छाया किसके हिस्से में

 सादर अभिवादन




नींव सोचती मीठी यादें
प्रेम पला जब किस्से में
पूछ रहीं चुप रह दीवारें
छाया किसके हिस्से में
चक्रवात अंतस में उठते
भाव शून्य में ठहर गए।।





प्रभु ने सृष्टि बनाई ! चलो अच्छा किया ! बैठे-बैठे बोर होने से क्या फायदा ! उन्होंने तरह-तरह के निर्माण किए! ऋतुएं बनाई ! पेड़-पौधे, लता-गुल्म, नदी-पहाड़, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और ना जाने क्या-क्या ! फिर उनमें तालमेल भी बैठाया ! उनकी जरूरतों की हर चीज मुहय्या करवाई ! तस्वीर में सारे रंग भरे!कहीं कोई कमी नहीं ! पर फिर पता नहीं क्या सूझी, एक पुतला बना उसे इंसान नाम दे, धकेल दिया धरती पर ! उन्हें लगा यह मेरी सबसे उत्कृष्ट रचना है और इसके साथ ही एक अलग सा संसार अपनी समय सीमा के साथ अस्तित्व में आ गया ! 




विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन,
फिर भी हम छोड़ नहीं पाते
विष दंशन,जो वृक्ष देता
है जीवन दान वही
एक दिन होता
है बलिदान,
काश हम
इस
देश की माटी में देख पाते हृदय
स्पंदन, विभेद नहीं करता
कभी मातृस्तन





बिखरना, बुरा नहीं है। टूटना बुरा है। 
टूटन को छुपाये फिरने के खेल में हम लगातार और टूटते जाते हैं।  कभी सब्र की नब्ज़ टटोलती हूँ। बहुत मद्ध्म मद्ध्म सी हरकत मुश्किल से ढूंढ पाती हूँ। अपने ही सब्र को गले लगाकर बैठी हूँ। आज की इस सुबह में मैं हूँ मेरा लगभग टूटा हुआ सब्र है और कुछ अगड़म बगड़म सा दिन है। 




स्वेद में भीगे ललनाओं के 
मुलायम दुकूल 
इन गर्म हवाओं की छुअन 
मुझे सदा ही
व्याकुल कर जाती है 
ग्रीष्म ऋतु मुझे 
सबसे कम भाती है !






नरक से अमेरिका बात करना लोकल काल रोनाल्ड रीगन, ईदी अमीन और महारानी एलिजाबेथ तीनों की मृत्यु हो गई और वे नरक में मिले। वहाँ उन्होंने एक लाल फोन देखा और शैतान से पूछा कि यह किस काम का है। शैतान ने उन्हें बताया कि यह पृथ्वी पर कॉल करने के लिए है। ईदी अमीन ने अफ्रीका के युगांडा में कॉल किया और 5 मिनट बात की। कॉल खत्म होने पर शैतान ने उन्हें बताया कि इसका खर्च 10 लाख डॉलर है, इसलिए ईदी अमीन ने उसे एक चेक लिख दिया। इसके बाद महारानी एलिजाबेथ ने इंग्लैंड में कॉल किया और 30 मिनट बात की। कॉल खत्म होने पर शैतान ने उन्हें बताया कि इसका खर्च 60 लाख पाउंड है, इसलिए उन्होंने भी उसे एक चेक लिख दिया। अंत में रोनाल्ड रीगन की बारी आई और उन्होंने अमेरिका में कॉल किया और 4 घंटे बात की। कॉल खत्म होने पर शैतान ने उन्हें बताया कि इसका खर्च 500 डॉलर है।


सादर समर्पित
सादर वंदन

बुधवार, 20 मई 2026

4748..मैं 'मौन' हूँ

 प्रातःवंदन 

"जीवन बड़ा अजीब होता है। ...कई बार उसकी परतों में से हम जिस रंग को खोजते हैं, वह नहीं निकलता। पर कोई ऐसा रंग निकल आता है जो उससे भी अधिक ख़ूबसूरत होता है।"

 अमृता प्रीतम

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए..

कुछ नहीं दिखता

सच कहूं तू जहां तक मुझे दिखता है ।

वहां तक मुझे कुछ भी नहीं दिखता है ।

✨️



अधखुला किवाड़

किसी वृक्ष का नाम नहीं लिखना,

न किसी ऋतु का।

कुछ टूटनें

पहले से ही आकाश में लिखी होती हैं।

✨️

मैं 'मौन' हूँ..


मैं शब्दों के बीच की वह चुप्पी हूँ, जिसे तुमने अक्सर शांति समझ लिया। मैं वह दीवार हूँ, जिसे तुमने खुद अपने चारों ओर इतना ऊँचा उठा लिया कि अब तुम्हें बाहर का उजाला भी दिखाई नहीं देता।

आज मैं, लेखिका की कलम से यहाँ सिर्फ कागज पर उतरने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोए हुए उस साहस को जगाने आई हूँ जो अब 'मिट्टी' की तरह दबते-

✨️

मरने से पहले की मौत


लोग बताते हैं कि

मरने से ठीक पहले तक

वह ज़िंदा था—

क्योंकि

उसकी साँसें चल रही थीं,

वह चल रहा था।

पर सच तो यह है कि। 

✨️

दस्तूर

जिंदगीभर पकते रहे यह सुनते-सुनते

कि नेगेटिव नहीं हमेशा पौजेटिव सोचो,

काश कि जमाने को अस्पताल का ..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️


मंगलवार, 19 मई 2026

4747...मगर वो अतिप्रिय कभी न था...

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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आज की रचनाऍं- 



किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.

दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.

ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.



उसके बिना किसी की शाम उदास न थी

वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था

उसे कहा गया प्रिय

मगर वो अतिप्रिय कभी न था



वट वृक्ष सरीखा हो तुम्हारा रिश्ता

जङें गहरी हों इतनी थामे रहें सदा 


वरदान सी विराट वट की छत्रछाया 

यम को कर प्रसन्न तत्क्षण वर पाया




“यह धागा सिर्फ पति की लम्बी उम्र का नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, हमारा सम्मान और हमारे साथ के उस वचन का प्रतीक है, जिसे हर दिन निभाने का प्रयास हमें करना होगा।” बरगद के चारों ओर घूमते हुए नन्दनी बुदबुदा रही थी। 

“हे वटवृक्ष, हमारे रिश्ते की जड़ें भी इतनी ही गहरी होने में साक्षी रहना कि समय की आँधियाँ भी इन्हें हिला न सकें।” आरव ने पेड़ को प्रणाम करते हुए कहा।


परित्यक्ता नहीं... परित्यक्त 


रात भर रो-रोकर सूजी आँखों के साथ अगली सुबह  सना ने एक कठिन निर्णय लिया। उगते सूरज की फीकी किरणें कमरे में फैल रही थीं, लेकिन उसके भीतर सब कुछ राख हो चुका था।
वह प्रतीक के सामने जाकर दृढ़ स्वर में बोली,

"मैं अपने पति को किसी और के साथ साझा नहीं कर सकती। अगर तुम दूसरी शादी करोगे तो मैं तुम्हें तलाक दे दूँगी।"




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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 18 मई 2026

4746..समसामयिक आंधी तूफानों के चलते जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है

 सादर अभिवादन
प्रि-मानसूनी बारिश औ समसामयिक आंधी तूफानों के
चलते जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है
और इससे अछूता नेट-वर्क भी नहीं
क्या तेल क्या तैलोपरि व्यवस्थाओं के चौपट होने चलते
हम भी पिट गए
-रचनाओं पर नज़र डालें



लोग बताते हैं कि
मरने से ठीक पहले तक
वह जिंदा था—
क्योंकि
उसकी साँसें चल रही थीं,
वह चल रहा था।





"सर, बजट के हिसाब से कुछ 1BHK मैंने शॉर्ट लिस्ट किए हैं, वे इन्हीं तीनों इलाकों में हैं. मुंबई में जगह छोटी मिलती है, लेकिन यहाँ लाइफ बड़ी है" संदीप ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ कहा.

आकाश को संदीप ने डेढ़ बजे तक तीनों इलाकों में करीब सात फ्लैट दिखाए. अंत में उसने अंधेरी की एक सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर भीतर कदम रखा. कमरा इतना छोटा था कि कोटा या जयपुर के किसी बड़े मकान का छोटे से छोटा कमरा भी इससे बड़ा होता. दीवारें सीलन की हल्की गंध और मुंबई की हवा की नमी से भरी थीं. उसने खिड़की खोलकर बाहर देखा—सामने इमारतों का एक अनंत जंगल था, जिसमें हर खिड़की के पीछे एक अलग संघर्ष चल रहा था.





मंत्री जी सड़क पर सरपट दौड़े जा रहे थे।तीन-चार अधिकारी छाता लिए उनके पीछे-पीछे भाग रहे थे।सूरज सिर पर चमक रहा था पर मंत्री जी की चमक के आगे वह भी पस्त दिखाई दिया।भोलू यह सब देखकर भौंचक था।उसने अपनी ज़िन्दगी में देवताओं को कभी धरती पर उतरते नहीं देखा था।आज यह सब देखकर उसकी आँखें फटी जा रही थीं।उसे लगा कि जीते जी देवता ज़मीन पर आ गए हैं।
यह सड़क पर उतरना भर नहीं है।यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई पुण्य-स्नान के लिए नदी में उतरता है।मैंने जीवन में सिर्फ़ त्याग सीखा है।चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र का त्याग करना पर्याप्त नहीं था,सो अब अपना काफिला भी त्याग रहा हूँ।काफिले में पहले चालीस गाड़ियाँ चलती थीं,अब मात्र चार हैं।ये गाड़ियाँ भी मुझे कार्यकर्ताओं ने दे रखी हैं।मेरा कुछ नहीं है।मैंने मंत्रिपद के अलावा सब त्याग दिया है।’


परिवार - हाइकु


बने समाज 
सशक्त औ’ सुदृढ़ 
परिवारों से 

जो कुछ पाया 
उपकार मानते
परिवार का 





सादर समर्पित
सादर वंदन

रविवार, 17 मई 2026

4745...अभी शेष है युद्ध कला...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच रचनाएँ-

भार्गव राम (खण्डकाव्य) - 9

राजर्षि कहें अब  राम  से,

अभी शेष  है  युद्ध कला।

आह्वान ही दिव्यास्त्रों का,

अरु प्रयोग है  युद्ध कला।।

*****

किताबें

किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है

कभी-कभी सच को छिपाकर

खेल खिलाती हैं।

*****

अनछुआ शिकवा  

सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से,

मैं हारा तो तुम जुदा हुईंदिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।

 अदाओं की नर्मी में ठहराव होता है असल शजर का,

तुम्हारे लहजे से साफ़ ये लगता सलीक़ा छूटा हुआ है।

*****

मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी होता है 

प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती

रेशों  रेशों, धानों धानों छिटक तिनके

अंक भर अपने प्रात लेती, हिये की संवेदी

निकृष्ट विचार न मैल रहे,

*****

सभ्यता के च‍िन्ह हैं भोजशाला के ये साक्ष्य.. हम अपनी धरोहरों के ल‍िए कोर्ट का मुंह ताकने को क्यों बाध्य हैं

मांडू में शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। "विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट "परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए।

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-"धार एंड मांडू।' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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