आपके सन्मुख परोसे हैं, अखबारों में प्रकाशित रचनाएं किसी
अन्य ब्लॉग में रख कर लाई गई है
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
।।प्रातःवंदन ।।
कौन शासन से कहेगा, कौन समझेगा,
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है।
~ दुष्यंत कुमार
प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढ़ाते हुए..
कैसे बेच देते हैं लोग चंद सिक्कों में ज़मीर को,जहाँ फ़ायदा हो, वहीं झोंक देते हैं मोम-से शरीर को।कल दिल्ली के आंदोलन के बच्चे दिख रहे थे सभी को,आज झारखंड के बच्चे अकेले पार कर रहे शमशीर को।
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उंगलियों के बीच पहले उसे खूब मरोड़ा जाता है
तब कहीं जाकर तागे को सूई में डाला जाता है।
कर्णधार देश का जिसे बताते हैं सभी सयाने
उसी युवा को सड़क पर सरेआम रघोड़ा जाता है।
तुम्हारे इन निर्जीव तंत्रों से,
अब मुझे ईर्ष्या सी होने लगी है
मेरे हिस्से का स्पंदन, मेरे हिस्से की भोर,
यह निष्ठुर 'स्क्रीन' हर दिन निगलने लगी ह
तुम कहते हो, "यह हमारे कल के लिए है,"
स्वर्णिम भविष्य की इस क्रूर वेदी पर,
तुमने हमारे हँसते हुए आज को बलिदान किया
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https://laghukathaduniya.blogspot.com/2026/06/2025.html?m=1
मंगलवारीय अंक में
आज की ये चर्चा बिलकुल अनौपचारिक थी जिसमें सबको खुलकर बोलने का अवसर मिला। साहित्य की यही विशेषता है कि वह वाचाल को मृदुभाषी और कम बोलने वाले को विचार व्यक्त करना सिखा देता है। सुशील सर के कारण आज ये सम्भव हो सका। चर्चा में सोबन सिंह जीना विश्विद्यालय में भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो ज्योति जोशी, साहित्यकार शम्भु राणा जी, डी आर डी ओ के वैज्ञानिक श्री हेमंत पांडे, पत्रकार जगदीश जोशी जी तथा डॉ पूरन जोशी भी शामिल रहे।
शब्द जहाँ सब थम से जाते,
मंत्र स्वयं स्वर बनकर गाते,
शून्य स्वयं जिसकी वंदना करे, वह परम प्रमाण कौन।
कैलासों की नीरव चोटी,
जिससे पाती अमर ज्योति,
कण-कण में जो स्वयं प्रकाशित, वह अनंत अविराम कौन।
शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में
अब ना और इम्तिहान ले ऐ ज़िन्दगी
कोई समझता नहीं अश्क़ों की ज़ुबान
बिना आवाज़ रोने के दास्तान को
समझता कहाँ है बेरहम ये जहान ।
दफ़्न होकर ही रह गईं ख़ामोशियों में
जो मोहब्बत थी धड़कन ,एहसास में
लब की ज़ुबान से जो कह ना सकी
तर कर ली ऐन की घटा के बरसात में ।
धागे सुलझते रहे और बातें भी। पता चला, उनका नाम सुमित्रा था। पास के वृद्धाश्रम में रहती थीं। वृद्ध का नाम रामनाथ था। उनकी पत्नी को गुज़रे कुछ वर्ष बीत चुके थे। उनकी सन्तान अपने कामों में इतना व्यस्त रहती थी कि उनका स्नेह-सम्मान भी अब मोबाइल की घंटियों में सिमट गया था। दोनों ने अपने-अपने दुःखों का ब्योरा नहीं दिया; शायद उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। क्यों कि वे भविष्य की योजना बना रहे थे। आगे रामनाथ ऊन लाएँगे। फ़ौजियों-अनाथों के लिए स्वेटर तैयार होंगे। कुछ पीड़ाएँ शब्दों से नहीं, केवल उपस्थिति से पढ़ी जाती हैं।
नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला,
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ।
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सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया नूपुरं जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में चुनिंदा रचनाएँ-
(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं की
विषय-वस्तु से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर
डॉट कॉम पर जो स्तरीय एवं पठनीय प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत
किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान
करता है।)
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सोच रही हूॅं ...
मुझे नहीं समझ राजनीति की,
मैं खोना नहीं चाहती तर्क के ज़ाल फेंकते
वामपंथी,दक्षिणपंथी या विचारधाराओं की आड़ में
विष वमन करते क़लमधारियों की
मन में सवाल तैर रहे हैं—
क्या पढ़ाई की परिभाषा केवल कुछ नामों तक सीमित है?
या फिर उन हज़ारों बेटियों के पसीने में भी
वही मशाल जल रही है?
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धन मिला, पर बुझ गया मन
यश मिला, पर ढल गया तन
घर बनाया एक सुंदर
किंतु छायी ग़र थकन!
पूर्ण होकर भी,
अधूरे ही रहेंगे
वे सपन!
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मै हतप्रभ, सुनता रहा शब्दों
का झुनझुना,
व्यथा गढ़े, शब्दोऺऺऺ की अभिव्यऺजना,
कैसे पढ़ लूं, मन की व्यक्त-अव्यक्त रचना?
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