शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
जो मैं कर पाया,
वह बहुत अच्छा था,
पर जो कर नहीं पाया,
उसको कर न पाने से
मैं उदास रहता हूँ।
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नहीं सरल समर्पण की राह
पीड़ा से होकर जाती है,
पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा
दुनिया सुखमय हो जाती है!
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नियति उसे
डाँटती-फटकारती है।
एक उम्र तक
दोनों खूब झगड़ते हैं।
फिर
एक दिन
कवि झोले में हाथ डालता है।
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कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी
की नहीं कोई कहानी
धुवें के छल्ले की तरह उड़ा
दें हंस के सारी परेशानी
ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा
देते ठोकरों से सावधानी
अपनी मौज में रह सीखें सलीका
जीने का आसानी।
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