सादर अभिवादन
हवा हो गई इतनी कड़वी,
फेफड़ों में अब अंगारे हैं,
हम जीत गए जो जंग मगर,
खुद अपनी ही किस्मत हारे हैं।
पर देखो! उस मलबे के नीचे,
काली राख को चीरकर,
एक नन्हा अंकुर उग आया,
विपदा का सीना बींधकर।
वो चीख-चीख कर कह रहा,
इंसानी इस नादानी से—
"ये धरती फिर सज सकती है,
प्यार और बस पानी से।"
सोच का सृजन से
सोच का सृजन से
रचनाएं...
उन्होंने दुकान के अन्दर देखा। एक शेल्फ पर ताजे ब्रेड का पैकेट, जैम की शीशी और दही की थैली रखी थी। हरीश बाबू ने शटर थोड़ा ऊपर उठाया, अन्दर गए और ब्रेड-जैम और दही ले आए। उस सामान को उस बूढ़ी औरत के हाथों में थमा दिया।
बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से सामान थाम लिया। उसकी सूखी आँखों में अचानक चमक आ गई। "जुग-जुग जियो बाबू! भगवान तुम्हारी तिजोरी हमेशा भरी रखे।" उसने आसमान की तरफ हाथ उठाया और भरभराई आवाज में कहा।
कुछ प्रश्न, प्रश्न तक ही रहे तब ही ठीक है,
कर देंगें वर्ना उनके ये उत्तर लहूलुहान.
यादों के तिनके पैर में कुछ इस क़दर गढ़े,
जूतों के बीच पाँव हैं दिन भर लहुलुहान.
अब मैं दुख की राख सँभाले फिर भी उजियारा बुनता हूँ,
पत्थर खाकर भी दरिया-सा अपना रास्ता चुनता हूँ।
क्योंकि अँधियारे के भीतर एक सत्य सदा मुस्काता है,
भगवान कभी-कभी मानव बनकर राहों में आ जाता है।
झील की गहराई में आकाश डूबा सा लगे,
लौट कर उसे हम ने देखा है कई बार,
ज़िन्दगी कुछ नहीं एक अंधा कुआं सा लगे,
न जाने किस तरह की हैं ये अस्पष्ट प्रतिध्वनियां,
दूर तक सिर्फ़ धुआं धुआं सा लगे,
दूर तक सिर्फ़ धुआं धुआं सा लगे,
क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव,
गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव ।
गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,
राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव ।
उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार ,
बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाचार ।
वृक्ष लगाना छोड़कर, काटे वन दिन रात,
पर्यावरण सुधार पर, करते नहीं विचार ।
सादर समर्पित
सादर वंदन
