निवेदन।


फ़ॉलोअर

शनिवार, 12 जून 2021

3057... चाय की चुस्की

 

हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो...

कवि को कल्पना के पहले, गृहणियों को थकान के बाद, सृजक को बीच-बीच में और मुझे कभी नहीं चाहिए..

चाय

एक गज़ल की बात हुई थी आप डायरी तक जा पहुँचे

इसी तरह तो लोग उंगलियाँ थाम, पकड़ लेते हैं पहुंचे

दीवान-ए-गालिब तो बल्लीमाराँ से है लाल किले तक

उसे ढूँढने आप यहाँ अमरीका तक कैसे आ पहुंचे

चाय की चुस्की में घुला है रफ़्ता-रफ़्ता प्यार

मुस्कुराते लबों पर सदा बढ़ता रहता ख़ुमार।

एक कुल्हड़ चाय से उतरे सिरदर्द की मार,

हो चाय सा इश्क़ भी हर दिन बन जाए इतवार

रखो अंदाज़ अपना जैसा होता है दिलदार,

छूटती नहीं तलब इसकी भले ही हो जाए उधार

एक अदद गंध, एक टेक गीत की

बतरस भीगी संध्या बातचीत की

इन्हीं के भरोसे क्या क्या नहीं सहा

छू ली है सभी एक–एक इंतहा

एक चाय की चुस्की , एक कहकहा

चाय की चुस्की

बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.

 ढूंढ़ना उसे , अपने किचन में
जहाँ  हमने साथ चाय बनाई थी
तुम चीनी कम लेते हो
ये बात तुमने उसे पीने के बाद  बताई थी
उस गरम चाय की चुस्की लेकर
जब तुमने रखा था दिल मेरा
>>>>>>><<<<<<<
पुन: भेंट होगी...
>>>>>>><<<<<<<

शुक्रवार, 11 जून 2021

3056...छोटी-सी ज़िंदगी में...

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

----

छोटी-सी ज़िदगी में अपनी---
अनगिनत नन्हीं ख़्वाहिशों की
डोर थामे चलते जाते हैं
कुछ पूरी होती कुछ अधूरी रहती
कुछ दर्द देती बहुत
कुछ से ज़िंदगी पूरी बदल जाती है
पर नयी ख़्वाहिश करना
दिल की फितरत बदल नहीं पाते हैं
टूट कर बिखर भी जाए
नयी उम्मीद की डोर बाँध लेते हैं
समेटे गए टुकड़ों से
एक और खूबसूरत ख़्वाब सजाते हैं
जब तक जीवन का
उलझा-सुलझा-सा ताना-बाना है
जीने के लिए आशा
नयी ख़्वाहिशों का आना-जाना है
इन रंगों की आभा से
 जीवन सफ़र सुहाना है।
#श्वेता

आइये आज के रचनाओं के संसार में-

------

 कुछ ख़्वाहिशें अनछुई ही रह जाती हैं, कुछ दुआएँ हवाओं में बिखरकर गुम हो जाती हैं। जाने क्यों जुड़ जाते हैं एहसास जब तारे हैं दूर आसमां में 


अच्छा किया, तुमने मेरी 
वफा पे शक किया,
कुछ और सबक सीखने थे, 
सीख ही लिए।
-----////-----




मुस्कुराहट,आँसू,खुशी,बेबसी 
भावनाएँ महसूसना स्वाभाविक मानवीय गुण है न फिर किसी की बेरूख़ी पर भी  मौन रहकर गहन अनुभूति में गोते लगाकर रहा जा सकता है तपस्वियों की भाँति अनाहत

तुम महसूस नहीं कर पाते उसे
तुम्हारे संवेगो के चलते
भय की गुंजन से
बस वो एक अनवरत स्पंदन में है
अनियंत्रित रुप से धड़कती 
तुम्हारी धड़कने तुम्हे डरा देती है
उस लौ को बुझा देती है
----//////----




मन की तितलियों के बौराने का भी समय होता है शायद मन भी थक जाता है  पहेलियों सी भरी उम्र की यात्रा के बाद फिर नहीं भटकना चाहता बनकर खानाबदोश

कोई जंगल है जो भीतर
अनगढ़ से विचारों का
उसे बाहर लाना है
किसी ऊँची पहाड़ी पे
एक घर भी बनाना है
------//////----




किसी भी चिकित्सा पद्धति की श्रेष्ठता पर खींचा तानी और बेतुके बहस आम जनता को भ्रमित करते हैं इसलिए जब जीवन हमारा है तो विवेक और तर्क के आधार हमें जो जँचता है उस चिकित्सा पद्धति को चुनना  मर्ज़ी हमारी

बड़ा दुखद है अपनों को भुलाकर हमने गैरों को अपना लिया। गैरों को अपनाने में कोई बुराई नही ये तो हमारी सहृदयता है, सबको मान-सम्मान देने की हमारी भावनाओं ने ही तो हमें अपनी अलग पहचान दी है। मगर, इसके लिए क्या अपनों को उपेक्षित करना जरूरी था ?बिलकुल नहीं।  200 सालो की गुलामी ने हमसे हमारा बहुत कुछ छीन लिया। ये बात सत्य है कि -अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनकी गुलामी से हम कभी आजाद नहीं हुए। उन्होंने हमारी रग-रग में अपनी अपनी संस्कृति और सभ्यता भर दी और उसी में ये एक "एलोपैथ" भी है। 
----/////----


महामारी के इस दौर सीमित संसाधनों में दूसरों की मदद करने की कोशिश करना खासकर ऐसे स्वाभिमानियों की मदद की चेष्टा करना जो चाहकर भी मदद की गुहार नहीं लगा सकते उनके स्वाभिमान की रक्षा की जवाबदेही किसकी है इस

धीरे - धीरे सहायता माँगने के लिए फोन आने लगे और सहायता करने की चाह रखने वालों के भी.  सहायता पहुँचाई जाती रही. पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि किसे सहायता की गई, उनका नाम पता नहीं बताया जायेगा, न कोई तस्वीर. बस एक शर्त थी कि जरूरतमंदों को अपने आधार कार्ड की कॉपी देनी होगी ताकि रिकार्ड रखा जा सके.  जितनी जरूरत थी, उतनी ही सहायता ली गई. 
-------/////////------




और चलते-चलते
एक ही आसमां के नीचे विसंगतियों का डेरा है जिसे समझा गया हो अहं,  शायद वहाँ समय की गूँज में खोये आत्मसम्मान का बसेरा हो जरुरी नहीं परिस्थितियों के सूनापन में गूँथा हो  अहंकार


ज्वार में अहंकार की
धंसती फुफकारती भंवर-सी
तुम्हारी क्षुद्रता की भाटा है।
उठो, झाड़ो धूल अपने अहं की,
गिरा दो दीवार और महसूसो,
-------


कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।

गुरुवार, 10 जून 2021

3055...इंतज़ार कीजिए, यह वक़्त भी गुज़र जाएगा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ओंकार जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है।

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

लो आया नया विहान...कुसुम कोठारी 

झरनों का राग,पहाड़ों की अचल दृढ़ता,

सुरमई साँझ का लयबद्ध संगीत,

नीड़ को लौटते विहंग ,अस्त होता भानु,

निशा के दामन का अँधेरा कहता।

लो आया नया विहान।।


५७६.रात... ओंकार 

ऐसे में ख़ुद को थामे रखिए,

हाथों में हाथ डाले रहिए,

इंतज़ार कीजिए,

यह वक़्त भी गुज़र जाएगा.


उदासी | कविता | डॉ शरद सिंह

इस शब्द के भीतर

है कांच की तरह टूटे हुए

ख़्वाब की किरचें

जो लहूलुहान कर देती हैं

एहसास के

हाथों को, पैरों को

बल्कि समूचे जिस्म को

लहू रिसता है बूंद-बूंद

आंसू बन कर

और देता है जिस्म के

ज़िन्दा रहने का सबूत

कैसे कहूं कि उदासी क्या है?

 

नूतन तरु के गात हो रहे... अनीता 

शब्दों को आशय तुम देते

वाणी के तुम संवाहक हो,

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


ओ री जिंदगी...सुन तो सही... संदीप कुमार शर्मा 

सोचिए
जिंदगी हार रही है
या
हम
जिंदगी हार रहे हैं।
बचपन के बाद
कभी नहीं हंसते
अब
हर पल
हम
अपने जंजाल में
खुद फंसते हैं
और

फंसते जाते हैं। 


चलते-चलते पढ़िए कुछ अलग-सा- 

राजा आप का .. तड़ीपार ... (भाग-). अन्तिम भाग)... सुबोध सिन्हा 

पर जब उसी दिन शाम तक दुबारा फेसबुक पर झाँका, तो पाया कि उनकी तरफ से हम 'अनफ्रैंड' यानी तड़ीपार किए जा चुके हैं। अफ़सोस इस बात की रही, कि हम वेब पन्ने के उस अपशब्द वाले हिस्से का स्क्रीन शॉट (Screen shot) नहीं ले पाए थे, जिसे उन किन्नर मोहतरमा की कलुषिता को प्रमाण के तौर पर, उस दिन या आज भी दिखलाने पर, उनको आदर देने वाले सभी पटना के बुद्धिजीवियों की आँखें फटी की फटी रह जाती .. शायद ...

 

आज बस यहीं 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 


रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 9 जून 2021

3054..अभी जमीर में जान बाकी है..

।। भोर वंदन ।। 
 "भोर की हर किरण को मैं बांध लेना चाहती हूँ, 
तिमिर की सारी दिशाएं लाँघ लेना चाहती हूँ। 
 बहुत दिन तक मौन रहकर फिर कहीं जो खो गया था, 
आज उस स्वर को तुम्हारे द्वार पर गुंजन करूंगी। 
एक दिन माथे चढ़ाकर मैं इसे चंदन करूंगी." 
-निर्मला जोशी 

स्वयं को उठायें और चलते रहे.. साथ ही नज़र डालें लिंकों पर.. 

कतरा के चलते थे जो कभी अपनों की नजर से 
तड़पते है मिलाने को नज़रे अब उनकी नजर से।। 

 बेवफाई की अदा में माहिर थे वो सदा से ही... 
कसूर अपना था मिल गई नज़र उनकी नजर से। 

 क्युं अपने सभी याद आने लगे हैं, 
दिया दुश्मनी का जलाने लगे हैं । 
 वो चुपके से रख कर काँधे पे उनके, 
वफ़ा नफ़रतों की बढ़ाने लगे हैं .. 

दिल को, तसल्ली 
थोड़ी सी, मैंने, दी तो थी, 
अभी, कल ही! 
 पर ये जिद पर अड़ा,
रूठ कर पड़ा, 
बेवजह, दूर वो खड़ा.. 

अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाकी है ज़मीर ज़िंदा रख, 
कबीर ज़िंदा रख सुल्तान भी बन जाये तो, 
दिल में फ़कीर ज़िंदा रख 
 (अज्ञात) 

 "उदासी, संताप, कष्टों से भरा अजीब समय आ गया है। 
कुर्सी पर मायूसी से बैठे 'क' ने गहरी उसाँस भरी। 
 "समय परिवर्तनशील है। 
एक समान कभी नहीं रहता। इसमें अजीब क्या है?" 

क्यों कहते हो कि उसे छोड़ दूँ 
 अदना-सी, वह क्या बिगाड़ती है तुम्हारा? 
 मैंने समय इसके साथ ही गुज़ारा 
 इसने ख़ुद को जलाए दिया मुझको सहारा 
 इसके साथ मेरा वक़्त बेफ़िक्र रहता है 
 और जीवन बेपरवाह चलता है 
 तन्हाइयों में एक वही तो है जो साथ रहती है 
 ** 
।।इति शम ।। 
धन्यवाद
 पम्मी सिंह 'तृप्ति'.. ✍️   

मंगलवार, 8 जून 2021

3053..गंजी खोपड़ियों पर लाल-हरी रोशनी पड़ रही है।

भारतीय साहित्य के आँचलिक चित्रकार फणीश्वर नाथ रेणु जी का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। 
उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'मैला आँचल' की कुछ अंतिम पंक्तियों को देखें। 
कितना सच उतरता है आज के मातमी माहौल पर भी! 
सच में, साहित्यकार युग-द्रष्टा होता है।
.........
"लेबोरेटरी! ....... 
विशाल प्रयोगशाला। ऊँची चहारदीवारी में बंद प्रयोगशाला।........ 
साम्राज्य-लोभी शासकों की संगीनों के साये में वैज्ञानिकों के दल खोज कर रहे हैं, 
प्रयोग कर रहे हैं। .........
गंजी खोपड़ियों पर लाल-हरी रोशनी पड़  रही है। ..........
मारात्मक, विध्वंसक और सर्वनाशा शक्तियों के सम्मिश्रण से एक ऐसे बम की रचना हो रही है 
जो सारी पृथ्वी को हवा के रूप में परिणत कर देगा .......
ऐटम ब्रेक कर रहा है मकड़ी के ........जाल की तरह! 
चारों ओर एक महा-अंधकार! सब  वाष्प! प्रकृति-पुरुष ........
अंड-पिंड! मिट्टी और मनुष्य के शुभचिंतकों की छोटी-सी टोली अँधेरे में टटोल रही है। 
अँधेरे में वे आपस में टकराते हैं।
..........
दिवि सूर्यसहस्त्र ...."
साभार आदरणीय विश्वमोहन कुमार

सादर नमस्कार
भाई कुलदीप जी आज नहीं हैं
सह लीजिए आज हमें

आज की रचनाएँ....

सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है 
उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.

सडकों के सन्नाटे में ये
हादसे क्यूँ कर हो रहे हैं ?
प्रगति के साथ - साथ ये
इंसानियत के जनाजे
क्यूँ निकल रहे हैं ?

.......
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है,
काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या
उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये
सत्य के निकट आने का प्रयास है.

बाहर ही बाहर यदि मन को लगाया
तो पीड़ा और संताप दिखेगा
अंतर गुहा में पल भर बिठाया
तो श्रद्धा का फूल स्वयं खिलेगा
......

जबकि नहीं है यह समय
स्थगित रहने का
क्योंकि
विश्वास, प्रेम, सुकून
सब कुछ तो है स्थगित।
......

बंजारा घर में बंधकर नही रह सकता
भाई सुबोध जी अभी-अभी कौरेन्टाईन से उठे हैं
निकल लिए सैर के लिए..
अनवरत
हैं तर तेरी
यादों की
तरलता से
सोचें
हमारी ..
........................
खुश रह कर दूसरों को भी सदा खुश रखने का
कुछ असंभव सा कार्य करते हुए
खुशी पाने की भरसक कोशिश करता रहता हूं।
आस-पास कोई गमगीन ना रहे यही कामना रहती है। ...शर्मा गगन

भगवान श्रीकृष्ण जब गांधारी के सामने पहुंचे, तो गांधारी का अपने क्रोध पर वश नहीं रहा ! 
बिना कुछ सोचे-समझे उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दे डाला ! 
“अगर मैंने प्रभु की सच्चे मन से पूजा तथा निस्वार्थ भाव से अपने पति की सेवा की है, 
तो जैसे मेरे सामने मेरे कुल का हश्र हुआ है, उसी तरह तुम्हारे वंश का भी नाश हो जाएगा !'' 
सब सुन कर भी कृष्ण शांत रहे ! फिर बड़ी ही विनम्रता से बोले, मैं आपके दुःख को समझता हूँ !
यदि मेरे वंश के नाश से आपको शांति मिलती है, तो ऐसा ही होगा ! 
पर आपने व्यर्थ मुझे श्राप दे कर अपना तपोबल नष्ट किया ! 
विधि के विधानानुसार ऐसा होना तो पहले से ही निश्चित था ! तब कुछ क्रोध शांत होने पर गांधारी को भी पछतावा हुआ और 
श्री कृष्ण से उन्होंने क्षमा याचना की ! पर जो होना था वह तो हो ही चुका था !
......
आज्ञा दें
दिग्विजय  


 

सोमवार, 7 जून 2021

3052 ....... नदी सवाल करती है .....

 आज कल लगता है कि सोमवार बहुत जल्दी आ जाता है ..... न जाने बाकी छः  दिन कैसे इतनी जल्दी बीत जाते हैं ... और मैं सोचती ही रह जाती हूँ कि इस बार क्या दिया जाये  पाँच लिंक के आनन्द में  अपने पाठकों को ..... और अचानक याद आता है कि अरे कल तो सोमवार है .... अब बताइए भला ऐसे कोई विशेष चर्चा  लग सकती है ?... मैं अपने प्रिय पाठकों से करबद्ध क्षमा प्रार्थना कर रही हूँ कि अब तो ये सठियाना भी  ख़त्म  होने वाला है तो ज़रा मेरी  भूलने  की आदत को आप बर्दाश्त कर लीजियेगा .  पता नहीं सत्तर का होने पर क्या होगा ? 

खैर ये तो भूल चूक होती रहेगी शायद ...... चलते हैं आज  के  पाँच लिंकों पर . 

प्रारंभ करते हैं   आक्रोश  से  ----   हमारी विभा जी यूँ तो बहुत शांत स्वाभाव  की हैं ..... लेकिन कभी कभी सही बात पर आक्रोश तो बनता है ......




तालाब पाटकर शजर काटकर

अजायबघर बनाने से मन नहीं भरा।

स्मार्टसिटी बनाने के जुनून में

ओवरब्रिज का जाल बिछा देने का चस्का चढ़ा।

अटल पथ पर बने फुट ब्रिज पर सेल्फी ले आऊँ  | 

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$

अभी आक्रोश को झेल ही रहे थे कि  संदीप कुमार शर्मा जी ले कर आ गए विशाल नदी ...... और खुद कुछ नहीं कह रहे बस इतना ही कि  ----- नदी सवाल  करती  है ......  अब भला ये क्या बात हुई ? आप ही पूछ लो न ....... 




नदी

कह रही है

प्राण हैं

उसमें

जो तुम्हारे

प्राण की भांति ही

जरूरी हैं।

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$

लीजिये ........ नदी ने सवाल क्या किया कि झरोखा पर निवेदिता जी न जाने किसकी बात कर रहीं कि वो भला  बन्दा कह रहा कि ......  मैं चाहता हूँ   .....



अब आपको ब्लॉग पर जा कर ही पढना पड़ेगा कि ये कौन महाशय हैं और क्या चाहते हैं ...... मैं नहीं बता रही कुछ .... 

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$

जहाँ तक चाहत  की बात है तो आज शायद ये बात सबको ही समझ आ गयी होगी कि हमें अपने पर्यावरण को बचाना है ..... जीव , जंगल , मिटटी , पानी सबसे जुड़ना है ..... केवल फेसबुक पर या ब्लॉग पर रचनाएँ लिख देने मात्र से पर्यावरण का संरक्षण नहीं होने वाला ...... फिर भी प्रयास के लिए बार बार इन सभी बातों को याद   कराते रहना भी ज़रूरी है .....  इसी सन्दर्भ में  जेन्नी शबनम जी कुछ हाइकु के माध्यम से चेतना जगाने की  कोशिश कर रही हैं .....

पर्यावरण ( हाइकु ) 



1. 
द्रौपदी-धरा   
दुशासन मानव   
चीर हरण।   

2. 
पाँचाली-सी भू   
कन्हैया भेजो वस्त्र   
धरा निर्वस्त्र।   |

मुझे लग रहा है कि हर हाइकु बहुत गहन अर्थ संजोये है ....... आप भी पढ़ कर देखिये .....

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$

और अब अंत में एक आत्मकथा पढने जा रहे हैं .......किसकी  ?  ये तो बताना ही पड़ेगा ....... चलिए बता ही देती हूँ , वैसे है तो ये बच्चों के लिए फिर भी शायद कुछ बच्चे भी पढ़ते हों ये चर्चा .....शायद थोडा सुधर जाएँ ....... वैसे कोरोना काल होने के कारण तो ये भी बेचारी अलमारी में ही कहीं दुबकी हुई होगी ...... फिर भी पढ़ ही लीजिये ... साधना वैद  जी लायी हैं .....  
 टाई  की आत्मकथा ..... वैसे आत्मकथा से ज्यादा व्यथा कथा है .....




मुझे याद है जब वरुण क्लास वन में आया था तो उसे पहली बार स्कूल ड्रेस के साथ मुझे भी गले में बाँधना अनिवार्य हो गया था ! वरुण कितना खुश था ! सुबह जल्दी जल्दी तैयार होकर मुझे उठा कर पापा के पास पहुँच जाता,

“ ये टाई आप बाँध दीजिये ना पापा ! मम्मी को अच्छी नॉट बाँधनी नहीं आती  |

$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$

ये टाई की बात पर यही कहना है कि जिसका काम उसी को साजे ......  और करे तो डंका बाजे .......

चलिए जी .... बज गया डंका और हम भी समापन करते हैं आज  की चर्चा का ..... 

आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा . 


नमस्कार 

संगीता स्वरुप .







Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...