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बुधवार, 22 दिसंबर 2021

3250..सूखी नदी, मगर वर्षा में..

 ।। उषा स्वस्ति।।

अरुणिमा आते ही देखो,  

विहग वृन्द उड़ान भरते,

 शक्ति पंखों में समेटे, 

 नाप लेते दिशा चारों।

 अब उठो कुंठा बुहारो।

डॉ.मृदुल कीर्ति

आइए एक बार फिर साहित्यिक कृतियों से परिचित होतें हैं क्योंकि यहाँ सब्ज़ ज़मीं सा ख़्यालत मुस्कुराते है..✍️










मिट्टी की सोंधी खुशबू मिलेगी जिधर,
गीत हम धड़कनों पे सुना दें उधर ।

तुम चले आना दिल जब भी मचले तेरा,
खोल देंगे मुहब्बत से अपना जिगर ।

हक मुहब्बत का हमने अदा कर दिया,
🏵️

रूठी कविता


 






आज कलम से रूठी कविता
कहीं छुपी मन के कोने।
घूम रही सूनी बगिया में
बीज शब्द के कुछ बोने।

भाव बँधे बैठे ताले में

🏵️

मोतीहारी वाले मिसिर जी की चार

 १-   

कविता लिखा कर

सो जा मोहन प्यारे!

जागा मत कर

सोये-सोये कविता लिखा कर ।

गीतकार है

तो प्रेम के गीत लिख

कोई कितने भी जड़ता रहे तड़ातड़ तमाचे

प्रतिक्रिया मत कर 

खिलखिलाकर हँसा कर

🏵️

फिर से कुर्सी चढ़ सकती हूं

जब सत्ता ने दामन त्यागा
तब मेरा लड़कीपन जागा 
प्रोढ़ा हुई पचास बरस की ,
तब लड़की वाला हक मांगा 
सूखी नदी, मगर वर्षा में ,
फिर से कभी उमड़ सकती हूं..
🏵️












 
ये कैसा हमदर्द है जो दर्द दिये जाता है
और – और – और मेरी सिसकीयों को
मेरी मौन स्‍वीकृति समझता है ।
 
ये कैसा हमदर्द है जो खुद ही तोड़ मुझे
जोड़ने का दमखम भरता है
मेरी समपर्ण को मेरी लाचारी कहता है।..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️
 


6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन अंक..
    जोश जगाती
    होश उड़ाती रचनाएँ
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही उम्दा बाद शानदार प्रस्तुति
    लड़की हूं लड़ सकती हूं तो बहुत ही लाजवाब है..! 😃
    आभार🙏🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहतरीन हलचल। 👌👌👌 सभी लिंक्स उम्दा ।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर सारगर्भित सूत्रों का चयन ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति। मेरी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया।

    जवाब देंहटाएं

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