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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

3252....जाते हुए पलों में

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------------
आने वाले पलों के उजाले में
विलीन होने के पूर्व
जाने वाले पल ठहर जाते हैं
समय के नेपथ्य में
स्मृतियों की किताब के 
फड़फड़ाते पन्नों के
मनपसंद पृष्ठ पर।

जाते हुए पलों में
हड़बडी में टटोली गयी स्मृतियों से
कुछ शब्दों की उभरी किर्चियाँ
चीर देती है अनायास
कोमल समय की उंगलियां
मन के धरातल उभरी
पीड़ा की गहरी लकीरों पर
आने वाले पलों के क़दमताल  
बना देते हैं नये निशान।
#श्वेता

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 आइये चलते हैं 
आज की रचनाओं के.संसार में-


स्याह तस्वीर


भूख की पीठ पर 
बेबसी के निशान
उम्र के साथ गहरे होते जाते हैं।
कंदील में रोशनी में 
झुलसी रोटी और बच्चे 
एक जैसे लगते हैं। 
रोटी की स्याह तस्वीर
चेहरे पर हर पल नजर आती है।


दायज़


बोझ बढ़ा पगड़ी पर भारी
मान बिलखता पग नीचे।
कोमल आशा अश्रु बहाती
बैठी अँखियों को मीचे।
मान झुके माँगों के आगे 
करके अपना हृदय कड़ा।
चला रहा...

पानी और पारा

अगर ठान लेता
मैं दिल में
पारे जैसा बन सकता था
ख़ुद में ही खोया रहता तो
किसको गीला कर सकता था?


विशालकाय लिए बदन

मेरे बड़े शरीर पर
मां सरस्वती बैठकर
भरती है वीणा मे स्वर
ज्ञान का देती है वर.
सौंदर्य बना सौभाग्य है
हूं गंधहीन दुर्भाग्य है

कहते हुए संतो गुनगुनी धूप में वहीं चारपाई पर लेट जाती है।परिवार का विद्रोही व्यवहार कहीं न कहीं उसके मन की दरारों को और गहरा कर गया। दोनों देवरानी-जेठानी में इतना लगाव कि एक-दूसरे का मुँह देखे बगैर चाय भी नहीं पीती हैं।

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आज के लिए इतना.ही
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं.प्रिय विभा दी।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अंक
    पूरा पढ़ूंगी
    धूप में बैठकर
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. चला रहा सदियों से आरी
    आशाओं के बाग खड़ा।
    माँग बढ़ाता नित ही दायज़
    अपनी हठ को लिए अड़ा।
    लड़कियां आज कल मांग कर लेती हैं दहेज
    ताकि उसे ससुराल उत्पीड़ित न होना पड़े
    सुंदर अंक

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचनाओं का चयन किया गया है। मुझे भी जगह देने के लिये आभार।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत आभार आपका श्वेता जी...। रचना का सम्मान देने के लिए साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!बहुत ही सुंदर सराहनीय संकलन।
    जाते हुए पलों में
    हड़बडी में टटोली गयी स्मृतियों से
    कुछ शब्दों की उभरी किर्चियाँ
    चीर देती है अनायास
    कोमल समय की उंगलियां... अहा!शब्द नहीं है क्या कहूँ।

    मुझे स्थान देने हेतु बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय श्वेता दी जी।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति। मेरी रचना को मंच पर स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार श्वेता जी।

    जवाब देंहटाएं
  7. सार्थक सूत्रों से सज्जित अंक ।बहुत बहुत शुभकामनाएं श्वेता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  8. मार्मिक भूमिका के साथ सरस और मधुर रचनाओं से सजा सुंदर अंक प्रिय श्वेता | लघुकथा हो या कविता सभी को पढ़कर बहुत आनंद आया | सभी रचनाकार बधाई के पात्र हैं | सभी को नमन और शुभकामनाएं| तुम्हें आभार इस सार्थक अंक के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  9. प्रिय श्वेता

    आने वाले पल में उजास मिलेगा या नहीं, लेकिन ठिठक कर उम्मीद तो लगा ही बैठते हैं .... पीछे की स्मृतियाँ कभी किरचें चुभोती हैं तो कभी कुछ सुखद पलों को भी ज़ेहन में ला खड़ा करती हैं ....जो कुछ भी हो आने वाले पल में कदमताल करते नए निशान बने इसी उम्मीद में.....
    आज की प्रस्तुति का हर लिंक बेहतरीन ....
    यूँ धर्मेंद्र जी ग़ज़ल बहुत अच्छी लिखते हैं लेकिन पारा और पानी से समझा दिया कि चमक ही सब कुछ नहीं ...भारती दास ने कहा कि सौंदर्य और सुगंध दोनो ही महत्त्वपूर्ण हैं ....अनुराधा जी ने ध्यान आकृष्ट किया सामाजिक कुरीति दहेज की ओर तो संदीप जी ने भूख का चित्र खींच दिया रही सही कसर अनिता जी ने पूरी कर दी यह बता कर कि वक़्त के साथ मोह का त्याग कर कुछ अपना भी ख्याल करना सीख लेना चाहिए स्त्रियों को ।
    संक्षेप में शानदार प्रस्तुति ।
    सस्नेह ।

    जवाब देंहटाएं

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