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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

3228......समय साक्षी रहना तुम

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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एक सैनिक  जाति-धर्म के बंधनों
से मुक्त कर्तव्य के पथ पर
चलते रहते हैं। देश के लिए समर्पित, देश की जनता की प्राणों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर सैनिकों का कर्ज़
है हमपर, यह सदैव स्मरण रखना और सच्चे मन से उन्हें सम्मान देना यह प्रमाणित करती है कि स्वयं की खोल में सिमटते स्पंदनहीन दौर में भी दिलों में देश के सपूतों के लिए अगाध श्रद्धा और 
मानवता के बीज जीवित है।
सुनो सैनिक
तुमने पोछें है आँसू, दिया सदैव संबल
तुमने रोके हैं शत्रु, बने  रक्षक उदुंबल,
मृत्यु पर तुम्हारे कमजोर पडूँ कैसे?
अश्रुपूरित नयनों से विदा करूँ कैसे?

देखिए यह भावपूर्ण वीडियो -

वाट्सएप के सौजन्य से-
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धन्य धरा,माँ नमन तुम्हें करती है
धन्य कोख,सैनिक जो जन्म करती है।


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आइये आज की रचनाओं के संसार में चलते हैं-

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किसी भी रचनाकार के लिए उसकी पहली कृति अतिविशिष्ट होती है । सहज,सरल अभिव्यक्ति और पाठकों के हृदय में  विशेष स्थान प्राप्त 
चिट्ठा जगत की प्रसिद्ध चिट्ठाकार प्रिय रेणु दी को
उनके प्रथम काव्य संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं
अनंत शुभमंगलकामनाएँ। 

समय साक्षी रहना तुम

आप सभी के साथ, अपनी पहली पुस्तक ' समय साक्षी रहना तुम ' के प्रकाशन का, सुखद सामाचार साझा करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है। आप सभी के  सहयोग और प्रोत्साहन से ही  इस काव्य-संग्रह  का प्रकाशन संभव हो सका है, जिसके लिए आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं। शब्द नगरी से शुरू होने वाली मेरी रचना-यात्रा कभी पुस्तक प्रकाशन तक पहुंच पायेगी, ये सोचा नहीं था। उन सभी सहयोगियों को धन्यवाद कहना चाहूंगी , जिन्होने बारम्बार पुस्तक प्रकाशित करवाने की प्रेरणा दी ।

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आज फिर से

धूप में झुलसेगी पीठ किसी की
और कोई पसरा होगा
ठंडी छाँव में,
आज फिर से
किसी की आँखे बरसेंगी
और कोई बेशर्मी से
खिलखिलाएगा कहीं,
आज फिर से

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आपदा के समय



सुबह से ही करती रहती है मेरी  बेटी 
बाहर जाने की जिद्द 

कभी कभी करती है वह विनती भी 
दोपहर को मैं
झुक कर बांधती हूँ  उसके कोट का बटन
बांधती हूँ उसका स्काफ
ताकि उसके सिर की टोपी अपनी जगह टिकी  रहे 

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वो न मेरा हुआ अर न अपना मगर,
वो रकीबों में महफ़िल सजाता रहा ।

था तो वो अजनबी फिर भी जालिम नहीं,
मेरे ज़ख़्मों पे मरहम लगाता रहा ।

जब अना भी मेरी आसमाँ छू रही,
तब भी कदमों में ख़ुद को झुकाता रहा ।


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मैं और मेरी माँ

हमेशा कुछ न कुछ नया जानने के लिए उत्सुक रहती थीं। वे रोज़ सुबह बहुत ध्यान से अख़बार पढ़तीं थीं। ...आज अख़बार में मुझे एक मॉल का विज्ञापन देखकर याद आया कि एक दिन शहर में स्थित विशाल मॉल का विज्ञापन अख़बार में देखकर मां ने उसके संबंध में जिज्ञासा प्रकट की। उन्होंने मॉल दिखाने को नहीं कहा किंतु मैं और वर्षा दीदी समझ गईं कि वे मॉल देखना चाहती हैं। मॉल की व्यवस्था के बारे में जानना चाहती हैं। उस समय उनकी आयु 90 वर्ष हो चली थी फिर भी वे बहुत सक्रिय रहती थीं। 


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आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही हैं प्रिय विभा दी।


6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुतै सुन्दर अंक
    सारा कुछ समेट दिया
    इस अविस्मरणीय अंक में
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति प्रिय श्वेता। सैनिकों के लिए तुम्हारे भाव मन को छू गए। सभी रचनाकारों की रचनाएँ हृदयस्पर्शी हैं। सभी रचनाकारों को बधाई। मेरी पुस्तक पर आधरित पोस्ट को साझा करने के लिए हार्दिक आभार। शरद जीका मां को समर्पित भावपूर्ण संस्मरण बगुत भावपूर्ण लगा। पुनः आभार और शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रिय श्वेता ,
    आज जो भी देश से प्यार करता है उसकी आँखें अवश्य ही नम हुई होंगी । विपिन रावत जी का यूँ जाना सबको हिला गया है । कहीं न कहीं मन में आता है कि कहीं ये कोई साजिश तो नहीं ।
    हर उस वीर सैनिक को विनम्र श्रद्धांजलि जो इस हादसे के शिकार हुए ।
    सैनिकों के प्रति तुम्हारे भाव सराहनीय हैं ।

    आज की हलचल एक ओर जहाँ वेदना ले कर आई तो एक खुशी भी कि प्रिय रेणु की काव्य धारा पुस्तक का रूप ले चुकी है । समय साक्षी रहना के लिए समय अवश्य साक्षी रहेगा । रेणु को इस पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई

    नीलेश माथुर के ब्लॉग पर फिर से पहुंचना सुखद लगा ,बहुत अर्से बाद उनको फिर से पढ़ा ।

    अरुण चन्द्र जी आज कल विदेशी कविताएँ पढ़ा रहे हैं । उनके द्वारा किया गया अनुवाद सार्थक रहा ।

    हर्ष महाजन जी की ग़ज़ल हमेशा की तरह उम्दा थी ।

    माँ के प्रति शारद जी की अभिव्यक्ति अभिभूत कर गयी ।

    सराहनीय प्रस्तुति ।
    सस्नेह ।।

    जवाब देंहटाएं
  4. हार्दिक धन्यवाद श्वेता सिन्हा जी, आपका बहुत बहुत आभार 🙏
    मात्र 13 दिन के अंतराल में मां और मां समान वर्षा दीदी को खोने के बाद मेरे लिए जीना बहुत कठिन है, बस, दोनों की यादें मुझे सहारा देती हैं...

    जवाब देंहटाएं

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