भोर वंदन
"रश्मियों की कनक धारा में नहा,
मुकुल हँसते मोतियों का अर्घ्य दे;
स्वप्न शाला में यवनिका डाल जो
तब दृगों को खोलता वह कौन है?
सुरभि वन जो थपकियां देता मुझे,
नींद के उच्छवास सा, वह कौन है?"
महादेवी वर्मा
सुप्रभाती के साथ बुधवारिय अंक के क्रम को बढाते हुए ..
वह नज़र झुकाकर चलती थी,
और शोहदे उसके पीछे-पीछे चलते थे।
उसके लिये
रास्ता अक्सर अपमान में बदल जाता था।
उसने हिम्मत की,
एक दूसरी राह चुनी—
कुछ अनकही सी बातें हैं,
जो शब्दों तक आकर लौट जाती हैं,
आँखों की दहलीज़ पर ठहरकर
चुप्पियों में कहीं खो जाती हैं।
कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं,..
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व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग।
लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग ।
लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल...
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"क्या हुआ, प्रिय? तुम इतने अशांत और उदास ! तुम्हारी नील प्रभा पर कोहरे की परछाई!?"
नीलांबर ने एक गहरी आह भरी। "क्या कहूँ, धरा! मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे सौंदर्य को निहारने में है। तुम्हारा हरित आवरण, तुम्हारे गिरि-शिखरों पर बिछी हिम की चादर, तुम्हारे सागरों की असीम गहराइयां - यही तो मेरे जीवन का सार है। परंतु पिछले कुछ दिनों से यह कोहरा मेरे और तुम्हारे बीच एक..
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गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l
सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll..
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इति शम
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंवंदन