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मंगलवार, 23 जून 2026

4782...एक मौन शिल्पकार है...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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बारिश का इंतजार करती चिड़िया

​तपती दोपहर, सूखा शजर,
आसमान पर टिकी नजर।
पंख समेटे, आस लगाए,
ताक रही है सूनी डगर।

​सूख गई हैं नदियां-नहरें,
धूल भरी हैं ठंडी लहरें।
प्यासी चोंच, उदास है मन,
बीत रहे हैं मुश्किल पहरें।

​कब गूंजेगी मेघों की मल्हार,
कब थमेगा यह अंगार?
प्यासे कंठ से पुकारती वो—
"बरसाओ न मेघ थोड़ी-सी फुहार।"
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आज की रचनाऍं- 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 
लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 
आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 
सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.



वह तूफ़ान नहीं
जो पेड़ को गिरा दे।
वह तो जड़ के पास बैठा हुआ
एक मौन शिल्पकार है,
जो हर चोट के साथ
मनुष्य के भीतर से
अनावश्यक पत्थर हटाता रहता है।
कई बार परिणामों की धूप
हमारे हिस्से नहीं आती,
कई बार
मेहनत का पूरा आकाश
बादलों में घिर जाता है।



समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।





बेवजह का यात्री
वर्तमान की  सच्चाईयाँ - वह 
फिर भी तो नहीं है  मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं ,  मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की  जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल 
खुदा से मिलने का अशराना  लिये  हुए  पथ पर बढ़ते जाना ।



कुल कहानी यह है कि स्वाद एक जेल है। स्त्रियों की जेल। और स्त्रियों को ही इसे तोड़ना होगा। लेकिन तोड़ नहीं पा रही हैं। सुबह आँख खुलते ही जब खुद के लिए ही सही किचन में खुद को देखती हूँ तो सोचती हूँ यह कारा कितनी मजबूत है। 



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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