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शुक्रवार, 19 जून 2026

4778...हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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आज सड़क पर कोई दुर्घटना हो जाए, तो कई बार लोग पीड़ित की मदद करने के बजाय अपने फोन से वीडियो बनाने या तस्वीरें खींचने में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि स्क्रीन के पीछे छिपे इंसान के लिए दूसरों का दर्द महज एक 'कंटेंट' बनकर रह गया है। सोशल मीडिया पर हम हजारों लोगों से जुड़े हैं, किसी की दुखद खबर पर 'Sad' का इमोजी भी छोड़ देते हैं, लेकिन असल जिंदगी में पड़ोस के घर में क्या चल रहा है, उससे हम बेखबर हैं। आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ ने इंसान को इतना थका और डरा दिया है कि वह सिर्फ अपने और अपने परिवार के दायरे तक सिमट गया है। "मुझे क्या लेना-देना" वाली सोच हावी होने लगी है।
प्रश्न मन कचोटने लगा है कि
क्या हम सचमुच संवेदनहीनता की खतरनाक
ढलान पर है?
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आज की रचनाऍं-


और हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं।
लेकिन सच तो यही है कि
सांप-सीढ़ी के खेल में जीत
अधिकतर अंक और अवसर का परिणाम होती है।
वहां न बुद्धि की विशेष भूमिका होती है,
न कौशल की, न रणनीति की,
जितना अंक आया,
उतना ही चलना होता है।

 
बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,
चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,
तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।
कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।
पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम



चलो अच्छा हुआ तुम लोग आए साथ मिलकर 
ज़मीनों आसमां सागर सभी को शाद़ कर दो 

अगर अपना पड़ोसी है मुसीबत में कहीं भी 
जरूरत में जरुरत भर उसे इमदाद कर दो 





निखिल की आँखें शर्म से झुक गईं। उसने अपनी डायरी में लिखा, “पिछड़ा वह स्थान नहीं जहाँ आधुनिक सुविधाएँ कम हों, बल्कि वह है जहाँ मानवीय संवेदनाएँ और आपसी जुड़ाव ख़त्म हो जाए। यह शहर तो बहुत ही आगे है। जब मैं कुछ महीनों पहले यहाँ आया था तो इस जर्जर पुस्तकालय को देखकर महानगर से आए युवा अधिकारी के रूप में मैंने उपहास उड़ाया था, “आज के डिजिटल युग में भी यह कबाड़खाना चल रहा है! सचमुच, यह शहर कितना पिछड़ा है। वृद्ध पुस्तकाध्यक्ष ने सुना था पर अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मौन रहे थे!”




वह टिनी को परीमहल के पीछे बने एक सुंदर बगीचे में ले गई। वहाँ चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। सूरज की सुनहरी किरणें पत्तों के बीच से छनकर धरती पर बिखर रही थीं। तितली ने टिनी को वह फूल दिखाया जिस पर वह सोती थी, वह फूल भी दिखाया जिसका पराग वह खाती थी और वह भी, जिस पर बैठकर वह हवा का आनंद लेती थी।



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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. कटुसत्य को उजागर करता शानदार अग्रालेख
    आभार
    शानदार अंक
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात! सत्य का बोध कराती मार्मिक भूमिका, सराहनीय रचनाओं से सुसज्जित अंक

    जवाब देंहटाएं

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