सादर अभिवादन
कल फादर्स डे है
देवी यशोदा की एक रचना
कल किसने देखा..
और देखेगा भी कौन..
कि पिता किस हाल में हैं...
खाना गरम मिला या नहीं
... दवा समय पर मिली या नहीं
रात बिछौना का चादर बदला था या नहीं
ये तो अच्छा है कि मेरे पिता की अब स्मृति शेष है..
मैं अपने भाई-भाभियों को जानती-पहचानती हूँ
वे होते तो क्या हाल होता उनका
मेरा प्रणाम उनको......
अब सुखी तो हैं वो
अब देखिए रचनाएं
जिसने जाना, जो भी जाना
वह कहा नहीं जा सकता
जो कहा गया है
वह मार्ग की खबर देता है
मंज़िल की नहीं
वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है
एक बार चोर तिजोरी लाल अपने प्रतिष्ठित रात्रिकालीन कार्य पर निकला। उसका निशाना था—सेठ सुखविंदर का घर। पूरी पड़ताल के बाद उसे यह विश्वास हो चुका था कि सेठ अपने परिवार सहित कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ है।
तिजोरी लाल ने पूरे इत्मीनान से अपना काम अंजाम दिया। ताले खुले, अलमारियाँ टटोली गईं, तिजोरियाँ हल्की हुईं। इस श्रमसाध्य प्रक्रिया में उसे लगभग तीन घंटे लगे। संतुष्ट मन से वह अपनी बरसों की साधना का फल समेटे घर लौटा।
“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.
“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”
“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”
वृक्ष यह सब देखता था,
लेकिन भीतर कहीं
उसे स्वीकार करना आसान नहीं था।
कभी-कभी
उसकी शरण में आए पक्षी
खुद ही उड़ जाते,
और हिरनियाँ
धूप में ठिठककर रह जाती
जैसे रेत से बातें कर रही हों।
सादर समर्पित
सादर वंदन





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