सादर अभिवादन
नौतपा शेष हो गया
बस कुछ दिनों की बात है
बस कुछ दिनों की बात है
चाहे कितना भी हो विघटन
समाज बंटे, टूटे परिवार
व्यक्ति रह जाए अकेला
पर सदा साथ रहती है उसके
एक अखंड आत्मा !
कुओं-तालों में अब पानी नहीं है,
नदी में भी वो तुग़्यानी नहीं है।
सभी के ज़ख्मों पर रखना है मरहम,
किसी को चोट पहुँचानी नहीं है।
दुखों में भी ये कहते थे पिता जी,
मुझे कुछ दुख-परेशानी नहीं है।
माँ हूँ न तुम्हारी !
सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ
तुम्हारी इस दरियादिली पर
तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !
कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये
सादर समर्पित
सादर वंदन

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