शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कुसुम कोठारी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में पढ़िए ताज़ा-तरीन रचनाएँ-
गाथा कहें माँ भारती की हम सदा।
हर ओर गौरव गान हो अभिमान से।।
रख स्वावलंबी आज अपना ध्येय
भी।
पूरा न हो कोई प्रयोजन दान से।।
*****
छिपी है हरेक मन
में
उसे हवा देकर पल
भर को सुलगाती हैं
या कोई मन
छिपाये हो भीतर
प्यार की सुवास
वह बिखर जाती है
किसी अनजान पल
में
*****
बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l
जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी
थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll
*****
पंचम वेद ... (६)_क, ख, ग से BPL कार्ड तक ... !
कभी चौक-चौराहों पर अपने समाज-देश की
बुराइयों को आईना दिखलाने वाले लौंडा नाच दिखला कर भिखारी ठाकुर जी ने और नुक्कड़
नाटक दिखला कर सफ़दर हाशमी जी ने आमजन को समाज में आमूलचूल ज़मीनी परिवर्तन लाने के
लिए प्रेरित करने की जो शुरुआत की थी, उसी का एक आधुनिक स्वरूप दिखलाने वाली लगभग
एक घंटा छियालिस मिनट की इस फ़िल्म को हम सभी को देखनी चाहिए। विशेष कर युवा वर्ग
को, जिसे आज हम Gen Z या Gen G बोलते हैं।
*****
मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!
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