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शुक्रवार, 5 जून 2026

4764...प्रेम वह नहीं जो आपको किसी का गुलाम बना दे

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
मैं नीर भरी दुख की बदली
        ------------- महादेवी वर्मा 

इन पंक्तियों में छुपा सार संपूर्ण जीवन दर्शन है।
जीवन से मनुष्य का परिचय शिशु के रुप में होता है, उस शिशु का सर्वप्रथम परिचय माँ की गंध से 
होता है। धीरे-धीरे जीव सासांरिक स्वरुप से गंध और स्पर्श द्वारा,अचेतन से चेतनावस्था में 
प्रवेश करते समय  परिचित होता है।

बतायी गयी,समझायी गयी और स्वयं की तार्किक बुद्धि द्वारा मन का, किसी जीव के 
बाह्य स्वरूप को पहचानना परिचय कहलाता है। किसी व्यक्तित्व के अच्छे-बुरे स्वरूप 
को जानना उस जीव के आंतरिक रुप से परिचित होना कहलाता है।
परिचित वह है जिसके अंतर्मन के भावों को आप पहचानते है।
छोड़िये मेरी दार्शनिक परिभाषा को।
साधारण शब्दों में कहूँ तो
चिर-परिचित व्यक्तित्व 
परिचित कहलाते हैं शायद हैं न...?

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आज की रचनाऍं-


नन्हे सुकोमल हाथों ने 
बनाई थी जो पेंटिंग 
बच्चों के अनमोल रत्न खिलौने 
पढ़ने-लिखने के लिये किताबें-क़लम 
माँ के बनाये हुए स्वेटर
पिता ने सजायी थीं जो ईंटें  
सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी
सहेजे गये भोज्य-पदार्थ और दवाई 
आधुनिकता का साज़-ओ-सामान 
संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान 
यादें-रिश्ते-सपने सब धमाके में ख़ाक हुए जलकर



आख़िर
आत्महत्याएँ हुई ही कितनी हैं?
कुछ गिनी-चुनी।

जो कि उम्मीद से कम है
लोकतंत्र के गणित में
ये संख्याएँ हैं बेकार

आख़िर क्या-क्या देखेगी

बेचारी सरकार।

 



बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम



सत्ता के लोभी 
शकुनि सभी 
दुश्मन से हाथ मिलाते हैं,
भारत की मिट्टी में 
जन्मे गद्दार 
हमें धमकाते हैं,
हे कल्कि 
अवतरण लो जल्दी 
इस धरती का उद्धार करो.



बिन बैटरी 

रोबोट बना सूर्य

रात व दिन 

चकरघिन्नी बन 

मन न चाहे 

चलता ही रहता,

हे यायावर!

एक दिन तो करो

ज़रा विश्राम

तुमसे ही तो जग  

सोता-जागता






"प्रेम वह नहीं है जो आपको किसी का गुलाम बना दे। प्रेम वह है जो आपको एक बेहतर इंसान बना दे। अगर किसी से जुड़कर आप खुद से और इस दुनिया से नफरत करने लगें, तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो वह है जो आपके भीतर की करुणा को जगा दे।"

और फिर वह रात आई, जब आरव के जीवन का सफर पूरा होने को था। वह अपने बिस्तर पर लेटा था, सांसें उखड़ रही थीं। कमरा अंधेरे में डूबा था। लेकिन तभी आरव को लगा कि उस अंधेरे में एक जानी-पहचानी चमक पैदा हुई है।




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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अंक
    असाधारण भूमिका
    साधुवाद 😃

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात!! वाक़ई दार्शनिक परिभाषाएँ उलझा देती हैं, सीधी सी बात है हमारा आपसे परिचय है और 'पाँच लिंकों के आनंद' से भी, आज के सुंदर अंक में 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु आभार!

    जवाब देंहटाएं

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