बारिश का इंतजार करती चिड़िया
आसमान पर टिकी नजर।
पंख समेटे, आस लगाए,
ताक रही है सूनी डगर।
सूख गई हैं नदियां-नहरें,
धूल भरी हैं ठंडी लहरें।
प्यासी चोंच, उदास है मन,
बीत रहे हैं मुश्किल पहरें।
कब गूंजेगी मेघों की मल्हार,
कब थमेगा यह अंगार?
प्यासे कंठ से पुकारती वो—
"बरसाओ न मेघ थोड़ी-सी फुहार।"
समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,
डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।
मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,
काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।
हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,
बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।
वर्तमान की सच्चाईयाँ - वह
फिर भी तो नहीं है मुझे यूँ हार मानना
बंद कोष्ठक मैं नहीं , मुझको तो है बस चलते जाना
और चलते जाना ... उम्मीद की जिंदा बस्ती में ... मुकम्मल
खुदा से मिलने का अशराना लिये हुए पथ पर बढ़ते जाना ।





बहुत सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर वंदन