शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में प्रस्तुत हैं पाँच+ रचनाएँ-
अस्वीकरण: अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना
ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय कंटेन्ट प्रकाशित हो रहा है वह
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
सम्मान करता है।
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आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-
देखो…,
मेरे पास काम बहुत हैं
और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत
मेरी मानो तो ..,,
खाली वक्त में थोड़ा
आत्ममंथन करना
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मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल
अश्रु धारा में घुल गया काजल,
घनघोर घटा-सी घिर आई रात,
नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद
स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।
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यह धरा ऊसर है तुम बिन
नद स्तर है निम्न तुम बिन
कितने जोड़े सूखी आँखें
बाट जोहती रोज दिन गिन
तप्त धरती, शुष्क वन हैं
आस में सूखे नयन हैं
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उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो?
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देश में
माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना
जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की
पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने
के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का
नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी
दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे
आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
मधुर मधुर गा रे मनुआ , मधुर मधुर
जवाब देंहटाएंशानदार अंक
वंदन
अच्छा संकलन। मेरी रचना को स्थान देने हेतु आभार।
जवाब देंहटाएंसुप्रभात! अच्छी भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। सुंदर प्रस्तुति, आभार!
जवाब देंहटाएंसुंदर संकलन !
जवाब देंहटाएंआज की प्रस्तुति में मेरी रचना को सम्मिलित करने और रचना का अंश शीर्षक रूप में रखकर सृजन को मान प्रदान करने हेतु आपका हृदय तल से सादर आभार 🙏
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