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सोमवार, 13 जुलाई 2026

4802 ..दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से

 सादर अभिवादन  


कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
वहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।

जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।

-दुष्यंत कुमार

मेरी पसंदीदा रचनाएं






मत पूछना कि कितने हलाक हो गए,
चादर में लिपटे ख़्वाब भी अब रोते हैं।

वीरान रास्तों का 'वर्मा' ही मुसाफ़िर है
ख़ुद का ही जिस्म ख़ुद उठाकर ढोते हैं।





उठो देखो आसमान की नीलिमा 
वे  घुँघराले फाहे बादल
जिस तरह से आसमाँ में 
अपनी गति से  चले जा रहे है 
तुमको भी चलना है ,
विश्राम  का मतलब ठहरना  नहीं  है







सूना आँगन, बंद किवाड़ें,
चीड़ अकेला जागे।
चूल्हे की ठंडी राखों में
दिन के टूटे धागे।

गौरैया हर भोर पुरानी
देहरी पर आ जाती,
खाली घर की चुप दीवारें
बुलबुल बात बनाती।




भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
ग़म न बाँटों किसी से किसी हाल में.
जीत खरगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.




शायद इसलिए फिल्म समाप्त होने के बाद भी उसके संवाद नहीं, उसकी संवेदनाएं हमारे साथ चलती रहती हैं।इस श्रृंखला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कोई कलाकार दूसरे पर भारी पड़ने की कोशिश नहीं करता। अर्शद वारसी की सहजता, वीर हिरानी की ताज़गी, विक्रांत मैसी की प्रभावी उपस्थिति, मोना सिंह, बोमन ईरानी, सत्यदीप मिश्रा, श्रुति मराठे और राजेश शर्मा सहित पूरी टीम मिलकर कहानी को विश्वसनीय और आत्मीय बना देती है। अभिनय कहीं भी अभिनय नहीं लगता, जीवन का स्वाभाविक विस्तार लगता है।






''अरे भाई निकल के आ घर से, आ  घर से ! दुनिया की रौनक देख फिर से, देख ले फिर से !'' किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह गाना उन्हीं की फिल्म नई दिल्ली का है ! उस समय फिल्म के अनुसार गीत का आशय भले ही कुछ और रहा हो, पर ''दुनिया की रौनक के बदले देश की रौनक'' जैसे थोड़े से बदलाव के साथ यदि इसे पर्यटन से जोड़ दें तो यह आज भी मौजूं है ! अपने देश के हर क्षेत्र में ऐसे-ऐसे अनूठे, अनोखे दर्शनीय स्थल, पूजास्थान, विलक्षण वास्तु निर्माण उपलब्ध हैं कि उनको देखने के लिए जीवन कम पड़ जाए !

सादर समर्पित
सादर वंदन

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